पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 301–310
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 301–310
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदी [ सूत्र १ वक्तव्यमें बतलाया गया है । दूसरे अर्थका सम्बन्ध आभ्यन्तर क्रियासे है । यह असम्प्रज्ञात - समाधिके लाभ तथा क्लेशोंकी निवृत्तिमें साधनरूप है । समाधिपाद सू ० २३ में समाहित चित्तवाले उत्तम अधिकारियोंके लिये यह अर्थ प्रधानरूपमें लिया गया है । पहले अर्थका सम्बन्ध अधिकतर हमारे व्यावहारिक जीवनसे है । यह सम्प्रज्ञात - समाधि तथा क्लेशोंको तनु ( शिथिल ) करनेमें साधनरूप है । इस सूत्रमें तथा इस पादके सूत्र ३२ में विक्षिप्त चित्तवाले मध्यमाधिकारियोंके लिये ये ही अर्थ प्रधानरूपसे लिये गये हैं ।
कामतोऽकामतो वापि यत् करोमि शुभाशुभम् ।
तत्सर्वं त्वयि संन्यस्तं त्वत्प्रयुक्तः करोम्यहम् ॥
फलेच्छासे या निष्कामतासे जो शुभाशुभ कर्मका मैं अनुष्ठान करता हूँ, वह सब आप परमेश्वरके ही मैं समर्पण करता हूँ; क्योंकि आप अन्तर्यामीसे ही प्रेरित होकर मैं सब कर्म करता हूँ ।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
( गीता ९ । २७ ) हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! जो तुम कार्य करो, भक्षण करो, यज्ञ करो अथवा दान करो और जो तप करो, वह सब मेरे ( परमेश्वरके ) ही अर्पण करो । यहाँ यह ध्यान रखनेकी बात है कि जिस योगीने अपने समस्त कार्य ईश्वरके समर्पण कर दिये हैं, उसका कोई काम अशुभ न होगा । सब शुभ ही होंगे तथा फलोंको ईश्वर - समर्पण कर देनेके कारण उसके कर्म फलेच्छा - परित्यागपूर्वक ही होंगे । कर्मों और उनके फलोंको ईश्वर - समर्पण कर देनेके अर्थ कर्महीन बन जाना नहीं है ।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
( गीता २।४७ ) हे अर्जुन! कर्मों अनुष्ठानहीमें तुम्हें अधिकार है, कर्मोंके फलमें कदापि नहीं; अतः फलके अर्थ कर्मोंका अनुष्ठान मत करो और कर्महीनतामें भी तेरी आसक्ति न होनी चाहिये अर्थात् ईश्वर - समर्पण करके सदा निष्कामभावसे अपने कर्तव्यरूप शुभ कर्म करते रहना चाहिये । शङ्का — समाधिपादमें उत्तम अधिकारियोंके लिये वैराग्य - अभ्यासादि साधन बतलाये गये हैं और इस साधनपादमें मध्यमाधिकारियोंके लिये अष्टाङ्गयोग । फिर यहाँ उस अष्टाङ्गयोगके केवल तीन नियमोंको ही क्यों साधनरूप बतलाया गया है? समाधान — इस पादमें मध्यमाधिकारियोंके लिये वास्तवमें तो अष्टाङ्गयोग ही साधनरूप बतलाया गया है । और तप, स्वाध्याय और ईश्वर - प्रणिधान पाँचों नियमोंके अन्तिम तीन भाग हैं । किंतु ये व्यावहारिक जीवनको शुद्ध और सात्त्विक बनानेमें अधिक सहायक होते हैं । जिससे चित्त शुद्ध और निर्मल होकर अष्टाङ्गयोगपर सुगमतासे आरूढ़ हो सकता है । गीतामें ऐसे योगेच्छुको आरुरुक्षु नामसे पुकारा गया है और इस क्रियायोगका नाम कर्मयोग दिया गया है । यथा— आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । आरुरुक्षु अर्थात् योगारूढ़ होनेकी इच्छा रखनेवाले मननशील पुरुषोंके लिये कर्मयोगको कारण अर्थात् साधन कहा है । तपसे शरीर, वाणी, मन और अन्तःकरणकी अशुद्धि दूर होती है । स्वाध्यायसे ( २७६ )
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सूत्र १ ] * तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः * [ साधनपाद तत्त्व - ज्ञानकी प्राप्ति तथा मनकी एकाग्रता और ईश्वर - प्रणिधानसे कर्मोंमें कामना और फलोंमें आसक्तिका त्याग तथा ईश्वरका अनुग्रह प्राप्त होता है । इसलिये इनको क्रियायोग नामसे अष्टाङ्गयोगके पूर्व अनुष्ठान करना बतलाया है और यदि इन तीनोंके व्यापक अर्थ लिये जायँ तो सारे योगके आठों अङ्ग इन्हीं के अन्तर्गत हो जाते हैं । विशेष वक्तव्य- - सूत्र १ तपकी व्याख्या – जिस प्रकार अग्निमें तपानेसे धातुका मल भस्म हो जानेपर उसमें स्वच्छता और चमक आ जाती है, इसी प्रकार तपकी अग्निमें शरीर, इन्द्रियों आदिका तमोगुणी आवरणके नाश हो जानेपर उनका सत्त्वरूपी प्रकाश बढ़ जाता है । योगमार्गमें आसन - प्राणायाम जिनका सूत्र ४६ एवं ४ ९ में क्रमसे वर्णन किया जायगा और सात्त्विक आहार - विहारादि शरीरके तप माने गये हैं तथा प्रत्याहार जिसका वर्णन सूत्र ५४ में किया जायगा और शम - दम आदि इन्द्रियों तथा मनके तप हैं ।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
( गीता ६ | १६ ) यह योग न तो बहुत अधिक खानेवालेको और न कोरे उपवासीको, वैसे ही न बहुतसोनेवालेको और न बहुत जागनेवालेको प्राप्त होता है । युक्तचेष्टस्य युक्ताहारविहारस्य
कर्मसु ।
युक्तस्वप्रावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
( गीता ६। १७ ) जो मनुष्य आहार - विहारमें, दूसरे कर्मोंमें, सोने - जागनेमें नियमित रहता है, उसका योग दुःखनाशक होता है । युक्ताहार ( मिताहार ) यथा— सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थांशविवर्जितः भुज्यते शिवसम्प्रीत्यै मिताहारः स उच्यते ॥ स्निग्ध, मीठा, प्रिय आहार, क्षुधा परिमाणसे चतुर्थ भागसे न्यून, शिव ( ईश्वर ) की सम्यक् प्रीतिके लिये जो किया जाता है, वह मिताहार कहा जाता है । तामसी, राजसी, हिंसासे प्राप्त किये हुए तथा गरिष्ठ, वात - कफकारक, अति उष्ण, खट्टे, चरपरे, बासी, अतिरूक्ष, सूखे हुए, रूखे, सड़े हुए, जूठे, नशा करनेवाले, उत्तेजक, स्वास्थ्यको हानि पहुँचानेवाले पदार्थोंको त्यागकर केवल शुद्ध, सात्त्विक, हलके मधुर, रसदार, स्निग्ध, ताजा, स्वास्थ्य वर्धक, चित्तको प्रसन्न करनेवाले पदार्थ जैसे दूध, घृत, ताजे रसदार मीठे सात्त्विक फल — जैसे मीठा संतरा, मीठा अनार, मुसम्मी ( मालटा ), अंगूर, सेब, केला, मीठा आडू, खूबानी आदि तथा खुश्क फल जैसे बादाम, अंजीर, मुनक्का इत्यादि, सात्त्विक, सब्जी — जैसे लौकी, परवल, तुरई आदि; सात्त्विक अनाज- -जैसे गेहूँ, मूँग, चावल आदिका नियमितरूपसे भूखसे न्यूनमात्रामें सेवन करना अंर्थात् उदरको दो भाग अन्नसे भरना, एक भाग जलसे और एक भाग वायुके संचारार्थ खाली रखना । रात्रिमें सोनेसे पूर्व दूध, फल आदि स्वल्पमात्रामें लेना चाहिये । योगीजन स्वादको वशीकार किये हुए शरीरसे आसक्ति और ममता त्यागे हुए शरीरको केवल ( २७७ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १ भजनके कार्यमें उपयोगी बनानेके निमित्त खान - पान आदिका विशेष ध्यान रखते हैं । साधारण मनुष्य स्वादके वशीभूत होकर, शरीरमें आसक्ति और ममताके साथ खान - पान आदिके व्यवहारमें लिप्त रहता है । यह योगी और भोगीमें भेद है । योगाभ्यासीके लिये मांस, मादक पदार्थ तथा लाल मिर्च आदि सर्वथा त्याज्य हैं । उनके सेवनकी अपेक्षा भूखा रहना हितकर है । उनके सेवनमें आपत्ति तथा धर्मकी आड़ किसी अवस्थामें नहीं ली जा सकती । अभ्यासियोंको अन्नके सम्बन्धमें पूरी सावधानी रखनी चाहिये । क्योंकि अन्नका शरीर तथा मनपर बड़ा प्रभाव पड़ता है । अन्न सात्त्विक तथा पवित्र कमाईका होना चाहिये । इस सम्बन्धमें हमारे एक प्रेमी सत्संगी पं ० बाबूराम ब्रह्म कविकी एक कविता लिखी जाती है । अन्न ही बनावे मन, मन जैसी इन्द्रियाँ हों इन्द्रियोंसे कर्म, कर्म भोग भुगवाते हैं । अन्नहीसे वीर क्लीब, क्लीब वीर होते देखे अन्नके प्रताप योगी भोगी बन जाते हैं ॥ अन्नहीके दूषणसे तामसी ले जन्म जीव अन्नकी पवित्रतासे देव खिंच आते हैं । मृत्युलोकसे हे ' ब्रह्म ' मोक्ष और बन्धनका वेद आदि मूल तत्त्व अन्न ही बताते हैं ॥ युक्त विहार — ऐसी लंबी कठिन यात्राका न करना जिससे भजनमें विघ्न पड़े । चलना - फिरना बिलकुल बंद न कर दिया जाय जिससे तमोगुणरूपी आलस्य तथा प्रमाद उत्पन्न होकर भजनमें बाधक हों; बल्कि इतना चलता - फिरता और घूमता रहे जिससे शरीर स्वस्थ और चित्त प्रसन्न रहे और भजनका कार्य सफलतापूर्वक होता रहे । युक्त कर्मचेष्टा – नियमितरूपसे कर्तव्य तथा नियत सत्कर्मोंको नित्य करते रहना अर्थात् न इतना अधिक शारीरिक परिश्रम करना जिससे थकान उत्पन्न होकर भजनमें विघ्न पड़े और न सर्वथा कर्तव्यहीन होकर आलसी बन जाना । युक्तस्वप्नावबोध — रात्रिमें सात घंटेसे अधिक न सोना जिससे तमोगुण न बढ़े, न चार घंटेसे कम सोना जिससे भजन करते समय नींद न सतावे । योगमार्गमें चान्द्रायण आदि व्रत तथा लंबे उपवास वर्जित हैं । सप्ताहमें एक दिन उपवास रखना प्रशस्त है, जिससे सप्ताहमें संचित हुए शारीरिक तथा मानसिक विकार निवृत्त होते रहें । उपवासवाले दिन अन्न सर्वथा त्याग दे, दूध - फलादि हलका आहार लेना चाहिये । सर्वथा निराहार रहनेसे प्राणोंके निरोधके साथ भजन करनेकी अवस्थामें मस्तिष्कमें खुश्की पहुँचने और कई दिनोंतक भजनके कार्यमें विघ्न पड़नेकी सम्भावना हो सकती है । विशेष अवस्थामें किसी - किसी ऐसे साधकसे जो शरीरके स्थूल तथा विकारी होने अथवा रजोगुणी मनकी चञ्चलताके कारण योगमार्गपर सुगमतासे नहीं चल सकते, चान्द्रायण आदि व्रत तथा लंबे उपवास भी कराये जाते हैं । ये किसी अनुभवीकी अध्यक्षता और पूरी ( २७८ )
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सूत्र १ ] * तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः * [ साधनपाद देखभालमें होने चाहिये । प्रत्येक दिन नमक और साबुनमिश्रित गुनगुने जलसे एनिमा करते रहना आवश्यक है । ऐसा न करनेसे पिछला बचा हुआ मल आँतोंमें सूख जाता है । उससे आँतोंमें खराश तथा अन्य विकार उत्पन्न होनेकी सम्भावना रहती है । लंबे उपवासमें पित्त बढ़ जाता है । इसलिये उपवासकी समाप्तिपर कागजी नीबूका शरबत अथवा शिकञ्जबी पिलावे । दूध तथा रसीले फल, कागजी नीबू, मीठा अनार, सेब, मीठा संतरा, मुसम्मी, अंगूर आदि शनैः - शनैः बढ़ाते जायँ । खट्टे फलोंको दूधके साथ न दें । कई दिनोंके पश्चात् अन्नको प्रथम मूँगकी दालके पानीसे आरम्भ करें और शनैः - शनैः मात्रा बढ़ाते जायँ । ऐसा करनेसे शारिरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य सुधर जायगा । लंबे उपवासके पश्चात् आँतोंमें पाचन - शक्ति कम हो जाती है और भूख बढ़ जाती है । थोड़ी - सी भूलमें नाना प्रकारके रोग उत्पन्न हो सकते हैं । वाणीका तप — वाणीका तप वाणीको संयममें रखना है अर्थात् केवल सत्य, प्रिय, आवश्यकतानुसार दूसरोंका यथायोग्य सम्मान करते हुए वाणीसे वचन निकालना । वाणीको संयममें रखनेका यत्न करते हुए सप्ताहमें एक दिन मौनव्रत रखना प्रशस्त है । वाणीको संयममें रखनेका यत्न किये बिना केवल देखा - देखी मौन रखना मिथ्याचार है । मनका तप — मनका तप मनको संयममें रखना है अर्थात् हिंसात्मक, क्लिष्ट भावनाओं तथा अपवित्र विचारोंको मनसे हटाते हुए हिंसात्मक अक्लिष्ट भावनाओं और शुद्ध विचारोंको मनमें धारण करना है । इस प्रकार क्लिष्ट विचारोंपर विजय प्राप्त करनेके पश्चात् सब प्रकारके विचार भविष्यके संकल्प - विकल्प और भूतकालकी स्मृतिसे मनको शून्य करनेका अभ्यास करना चाहिये । गीताके अध्याय १७ के अनुसार सात्त्विक, राजसी और तामसी तप—
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १ ९ ॥
फलको न चाहनेवाले निष्कामी योगी पुरुषोंद्वारा परम श्रद्धासे किये हुए उस तीन प्रकारके ( शारीरिक, वाचिक और मानसिक ) तपको सात्त्विक कहते हैं और जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये अथवा केवल पाखण्डसे किया जाता है वह अनिश्चित और क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है । जो तप मूढ़तापूर्वक हठसे मन - वाणी और शरीरको पीड़ा देकर अथवा दूसरेका अनिष्ट करनेके लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है । स्वाध्याय — स्वाध्यायकी व्याख्यामें हमने जो ओंकारसहित गायत्री आदिका जाप बतलाया है, उस गायत्री - मन्त्रके अर्थोंको विशेषरूपसे खोल देना उचित प्रतीत होता है । गायत्री मन्त्रके सम्बन्धमें मनु महाराज लिखते हैं— ओंकारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः । त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ( २/१ ) ॥ ( २७ ९ )
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १ तीन मात्रावाले ओंकारपूर्वक तीन महाव्याहृति और त्रिपदा सावित्रीको ब्रह्मका मुख ( द्वार ) जानना चाहिये । गायत्री मन्त्र 1 ओ ३ म् भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ ( य ० अ ० ३६ मन्त्र ३ ) ( ऋ ० मं ० ३ सू ० ६३ मं ० १० ) ( साम १४६२ ) ( १ ) ओंकारकी तीन मात्राएँ – अकार, उकार, मकार और चौथा अमात्र विराम । अकार — एक मात्रावाले विराट् जो स्थूल जगत्के सम्बन्धसे परमात्माका नाम है । फल — पाँचों स्थूल भूतों और उनसे बने हुए पदार्थोंको आत्मोन्नतिमें बाधक होनेसे हटाकर साधक बनानेवाला अपने विराट्रूपके साथ स्थूल जगत्के ऐश्वर्यका उपभोग करानेवाला । उकार — दो मात्रावाले हिरण्यगर्भ जो सूक्ष्म जगत्के सम्बन्धसे परमात्माका नाम है । फल- -पाँचों स्थूल सूक्ष्म भूतों और अहंकार आदिको आत्मोन्नतिमें बाधक होनेसे हटाकर साधक बनानेवाला, अपने हिरण्यगर्भरूपके साथ सूक्ष्म जगत् में ऐश्वर्यका उपभोग करानेवाला । मकार — तीनों मात्रावाले ईश्वर जो कारण जगत्के सम्बन्धसे परमात्माका नाम है । फल — कारण जगत्को आत्मोन्नतिमें बाधक बननेसे हटाकर साधक बनानेवाला, अपने अपर स्वरूपके साथ कारण जगत्के ऐश्वर्यका उपभोग करानेवाला । अमात्र विराम - परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति अर्थात् स्वरूपावस्थिति जो प्राणिमात्रका अन्तिम ध्येय है । ( २ ) तीन महाव्याहृतियाँ - भूः, भुवः स्वः । भूः– सारे ब्रह्माण्डका प्राणरूप ( जीवन देनेवाला ) ईश्वर, सब प्राणधारियोंका प्राण - सदृश आधार और प्यारा पृथ्वीलोकका नियन्ता । भुवः – सारे ब्रह्माण्डका अपानरूप ( पालन - पोषण करनेवाला ) ईश्वर, सब प्राणियोंको तीनों प्रकारके दुःखोंसे छुड़ानेवाला, अन्तरिक्षलोकका नियन्ता । सुख और स्वः — सारे ब्रह्माण्डका व्यानरूप ( व्यापक ) ईश्वर, सब प्राणधारियोंको ज्ञानका देनेवाला द्यौलोकका नियन्ता । ( ३ ) गायत्रीके तीन पाद- - तत्सवितुर्वरेण्यम् । भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ सवितुः — सब जगत्को उत्पन्न करनेवाले अर्थात् सब प्राणधारियोंके परम माता - पिता । देवस्य – ज्ञानरूप प्रकाशके देनेवाले देवके । तत् — उस । वरेण्यम् — ग्रहण करनेयोग्य अर्थात् उपासना करनेयोग्य भर्गः - शुद्ध स्वरूपका । धीमहि - हम ध्यान करते हैं यः – जो ( पूर्वोक्त सवितादेव ) । नः – हमारी । ( २८० )
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सूत्र २ ] * समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च* [ साधनपाद धियः- बुद्धियोंको । प्रचोदयात् — ठीक मार्गमेंप्रवृत्त करे 1 सब प्राणियोंके परम पिता - माता, ज्ञानरूप प्रकाशके देनेवाले देवके उस उपासना करनेयोग्य शुद्धस्वरूपका हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियोंको ठीक मार्गमें प्रवृत्त करें । तीनों गुणोंका प्रथम विषम परिणाम महत्तत्त्व है । इसको व्यष्टिरूपमें बुद्धि तथा चित्त कहते हैं । इसीसे सत् - असत्, कर्तव्याकर्तव्य, धर्म - अधर्म आदिका निर्णय किया जाता है । इसीमें जन्म, आयु और भोग देनेवाले सारे संस्कार रहते हैं । इसके पवित्र होनेसे सन्मार्गकी प्राप्ति, संस्कारोंकी निवृत्ति और जन्म - आयु और भोगसे मुक्ति हो सकती है । इस गायत्री मन्त्रमें विशेषरूपसे बुद्धि अथवा चित्तकी पवित्रताके लिये प्रार्थना की गयी है I वानप्रस्थ - आश्रम और संन्यास आश्रमके प्रवेश तथा अभ्यासके आरम्भसे कई दिन पूर्व और निश्चित प्रायश्चित्तार्थ आत्मोन्नति तथा शुभ - कामनाकी पूर्तिके लिये एक नि संख्यामें गायत्री मन्त्रका जप अत्यन्त श्रेयस्कर है । गायत्र्यास्तु परं नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् । महाव्याहृतिसंयुक्तां प्रणवेन च संजपेत् ॥ ( संवर्तस्मृति श्लोक २१८ ) गायत्रीसे बढ़कर पापकर्मोंका शोधक ( प्रायश्चित्त ) दूसरा कुछ भी नहीं है । प्रणव ( ओंकार ) सहित तीन महाव्याहृतियोंसे युक्त गायत्री मन्त्रका जाप करना चाहिये । इस गायत्री - मन्त्रके ऋषि विश्वामित्र हैं, देवता सविता और छन्द गायत्री है । सङ्गति — वह क्रियायोग किसलिये है? यह बतलाते हैं— ( ७ ) समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥ २ ॥
शब्दार्थ — ( क्रियायोग ) समाधि - भावनार्थ: -समाधिकी भावना ( समाधिका चित्तमें पुनः - पुनः निवेश ) के लिये; क्लेश - तनू - करण - अर्थ: -च -3 = और क्लेशोंके तनूकरण ( दुबले करने ) के लिये है । ( स हि क्रियायोगः ) ' सो वह उपर्युक्त क्रियायोग ' इतना पाठ भाष्यकारोंने सूत्रके आदिमें अध्याहार किया है । अन्वयार्थ – समाधिकी भावनाके लिये और क्लेशोंके तनू करनेके लिये क्रियायोग है । व्याख्या — समाधि - भावना - ' समाधिरुक्तलक्षणस्तस्य भावना चेतसि पुनः पुनर्निवेशनम् ' = समाधि जिसका लक्षण १ । २ में कहा है, उसकी भावना अर्थात् समाधिका चित्तमें बार - बार निवेश ( लाना ) है।- - ( भोजवृत्ति ) क्लेशतनूकरणार्थ: -क्लेशा वक्ष्यमाणास्तेषां तनूकरणं स्वकार्यकारणप्रतिबन्धः -क्लेश अविद्यादि अगले सूत्रमें कहे हैं, उनका तनूकरण ' उनके स्वकार्यके कारण होनेमें प्रतिबन्धकता ' ।— ( भोजवृत्ति ) अविद्या आदि क्लेश जिनका आगे वर्णन किया जायगा, जिनके संस्कार बीजरूपसे चित्त - भूमिमें अनादि - कालसे पड़े हुए हैं, उनको शिथिल करने और चित्तको समाधिकी प्राप्तिके योग्य बनानेके हेतु क्रियायोग किया जाता है । तपसे शरीर, प्राण, इन्द्रिय और मनकी अशुद्धि दूर होनेपर वे स्वच्छ होकर क्लेशोंके दूर करने और समाधि - प्राप्तिमें सहायता देते हैं । स्वाध्यायसे अन्तःकरण शुद्ध होता है और चित्त ( २८१ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३ विक्षेपोंके आवरणसे शुद्ध होकर समाहित होनेकी योग्यता प्राप्त कर लेता है । ईश्वरप्रणिधानसे समाधि सिद्ध होती है और क्लेशोंकी निवृत्ति होती है भाव यह है कि क्रियायोगद्वारा क्लेशोंको तनू करना चाहिये । क्लेशोंके शिथिल होनेपर अभ्यास - वैराग्यका सुगमतासे सम्पादन हो सकेगा । अभ्यास - वैराग्यसे क्रमप्राप्त सम्प्रज्ञात - समाधिकी सबसे ऊँची अवस्था विवेक - ख्यातिरूप अग्निसे सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंके संस्काररूप बीज दग्ध हो जाते हैं और चित्तका भोग - अधिकार समाप्त हो जाता है । क्लेशरूप बीजोंके दग्ध होनेपर परवैराग्य उत्पन्न होता है । परवैराग्यके संस्कारोंकी वृद्धिसे चित्तका विवेकख्याति - अधिकार भी समाप्त हो जाता है और असम्प्रज्ञात - समाधिका लाभ प्राप्त होता है । सङ्गति - जिन क्लेशोंके दूर करनेके लिये क्रियायोग बतलाया गया है, वे क्लेश कौनसे हैं? यह अगले सूत्रमें बतलाते हैं— अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥ ३ ॥
शब्दार्थ — अविद्या - अस्मिता - राग - द्वेष - अभिनिवेशाः क्लेशाः - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेश हैं । व्याख्या — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेश हैं । ये पाँचों बाधनारूप पीड़ाको उत्पन्न करते हैं और चित्तमें वर्तमान रहते हुए संस्काररूप गुणोंके परिणामको दृढ़ करते हैं; इसलिये क्लेश नामसे कहे गये हैं । ये पाँचों विपर्यय अर्थात् मिथ्याज्ञान ही हैं, क्योंकि उन सबका कारण अविद्या ही है । टिप्पणी – सूत्र ॥ ३ ॥ अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेशोंके ही सांख्य- परिभाषामें
क्रमसे तमस्, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र नामान्तर हैं ।
तमो मोहो महामोहस्तामिस्त्रो ह्यन्धसंज्ञकः ।
अविद्या पञ्चपर्वैषा सांख्ययोगेषु कीर्तिता ॥
तमस् ( अविद्या ), मोह ( अस्मिता ), महामोह ( राग ), तामिस्र ( द्वेष ) और अन्धतामिस्र ( अभिनिवेश ) 1 – यह सांख्य और योगमें पञ्चपर्वा अविद्या कही गयी है । ये तमस् आदि अवान्तरभेदसे बासठ प्रकारके हैं, जैसा कि सांख्यकारिकामें बतलाया है—
भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधो महामोहः ।
तामित्रोऽष्टादशधा तथा भवत्यन्धतामित्रः ॥
( सां ॰ का ० ४८ ) तमस् और मोहका आठ - आठ प्रकारका भेद है । महामोह दस प्रकारका है । तामिस्र और नस ज अन्धतामिस्र अठारह - अठारह प्रकारके हैं । तमस् ( अविद्या ) –प्रधान, महत्तत्त्व, अहङ्कार और पाँच तन्मात्राएँ — इन आठ अनात्मप्रकृतियोंमें आत्मभ्रान्तिरूप अविद्या - संज्ञक तम आठ विषयवाला होनेसे आठ प्रकारका है । मोह ( अस्मिता ) – गौण फलरूप अणिमा - महिमा आदि आठ ऐश्वर्योंमें जो परम पुरुषार्थ भ्रान्तिरूप ज्ञान है, वह अस्मिता - संज्ञक मोह कहलाता है । यह भी अणिमा आदि ( ३-४५ ) आठ भेदसे आठ प्रकारका है महामोह ( राग ) –शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धसंज्ञक लौकिक और दिव्य विषयोंमें जो अनुराग ( २८२ )
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सूत्र ४ ] अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्* * [ साधनपाद है, वह रागसंज्ञक महामोह कहा जाता है । यह भी दस विषयवाला होनेसे दस प्रकारका है । तामिस्र ( द्वेष ) –उपर्युक्त आठ ऐश्वर्यों और दस विषयोंके भोगार्थ प्रवृत्त होनेपर किसी प्रतिबन्धकसे इन विषयोंके भोगलाभमें विघ्न पड़नेसे जो प्रतिबन्धकविषयक द्वेष होता है, वह तामिस्र कहलाता है । वह तामिस्र आठ ऐश्वर्यों और दिव्य - अदिव्य दस विषयोंके प्रतिबन्धक होनेसे अठारह प्रकारका है 1 अन्धतामिस्र ( अभिनिवेश ) - -आठ प्रकारके ऐश्वर्य और दस प्रकारके विषय - भोगोंके उपस्थित होनेपर भी जो चित्तमें भय रहता है कि यह सब प्रलयकालमें नष्ट हो जायँगे, यह अभिनिवेश अन्धतामिस्र कहलाता है । अभिनिवेशरूप अन्धतामिस्र भी उपर्युक्त अठारहके नाशका भयरूप होनेसे अठारह प्रकारका है । ये सब अज्ञानमूलक और दुःखजनक होनेसे अज्ञान, अविद्या, विपर्ययज्ञान, मिथ्याज्ञान, भ्रान्तिज्ञान और क्लेश आदि नामोंसे कहे जाते हैं । सङ्गति — अविद्या सब क्लेशोंका मूल कारण है, यह अगले सूत्रमें बतलाते हैं-अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥ ४ ॥
शब्दार्थ — अविद्या - क्षेत्रम् - अविद्या - क्षेत्र अर्थात् उत्पत्तिकी भूमि है; उत्तरेषाम् = अगलोंकी ( अस्मिता - आदिकी ); प्रसुप्त - तनु- विच्छिन्न - उदाराणाम् = जो प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार अवस्थामें रहते हैं । अन्वयार्थ – प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार अवस्थावाले अस्मिता आदि क्लेशोंका अविद्या - क्षेत्र है । व्याख्या - जिस प्रकार भूमिमें रहकर ही बीज उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार अविद्याके क्षेत्रमें रहकर सब क्लेश बन्धनरूपी फल देते हैं । अविद्या हीही इन सब सबोंका मूल - कारण है । ये क्लेश चार अवस्थाओंमें रहते हैं-प्रसुप्त – जो क्लेश चित्त - भूमिमें अवस्थित हैं, पर अभी जागे नहीं; क्योंकि अपने विषय आदिके -अभाव - कालमें अपने कार्योंको आरम्भ नहीं कर सकते हैं, वे प्रसुप्त कहलाते हैं । जिस प्रकार बाल्यावस्थामें विषयभोगकी वासनाएँ बीजरूपसे दबी रहती हैं, जवान होनेपर जाग्रत् होकर अपना फल दिखलाती हैं । तनु — तनु वे क्लेश हैं, जो प्रतिपक्षभावनाद्वारा अथवा क्रियायोग आदिसे शिथिल कर दिये गये हैं । इस कारण वे विषयके होते हुए भी अपने कार्यके आरम्भ करनेमें समर्थ नहीं होते, शान्त रहते हैं । परंतु इनकी वासनाएँ सूक्ष्मरूपसे चित्तमें बनी रहती हैं । निम्न प्रकारसे इनको शिथिल ( तनु ) किया जाता है— यथार्थ ज्ञानके अभ्याससे अविद्याको, भेद - दर्शनके अभ्याससे अस्मिताको, मध्यस्थ रहनेके विचारसे राग- -द्वेषको, ममताके त्यागसे अभिनिवेश क्लेशको तनु ( शिथिल ) किया जाता है तथा धारणा, ध्यान और समाधिद्वारा अविद्या, अस्मिता आदि सारे क्लेश तनु किये जाते हैं । I विच्छिन्न — विच्छिन्न क्लेशोंकी वह अवस्था है, जिसमें क्लेश किसी दूसरे बलवान् क्लेशसे दबे हुए शक्तिरूपसे रहते हैं और उसके अभावमें वर्तमान हो जाते हैं । जैसे द्वेष - अवस्थामें राग छिपा रहता है और राग- अवस्थामें द्वेष । ( २८३ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ४ उदार — उदार क्लेशोंकी वह अवस्था है, जो अपने सहायक विषयोंको पाकर अपने कार्यमें प्रवृत्त रहे हैं । जैसे व्युत्थान अवस्थामें साधारण मनुष्योंमें होते हैं हो 1 इन सबका मूलकारण अविद्या है । उसीके नाश होनेसे सर्वक्लेश समूल नाश हो जाते हैं दग्धबीज – क्रियायोग अथवा सम्प्रज्ञात - समाधिद्वारा तनु किये हुए क्लेश प्रसंख्यान अर्थात् विवेक - ख्यातिरूप अग्निमें दग्धबीज - भावको प्राप्त हो जाते हैं । तत्पश्चात् पुनः अंकुर उत्पन्न करने और फल देनेमें असमर्थ हो जाते हैं । यथा— बीजान्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः । ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मना सम्पद्यते पुनः ॥ जिस प्रकार अग्निसे जले हुए बीज फिर नहीं उगते हैं, इसी प्रकार विवेकज्ञानरूप अग्निसे जले हुए क्लेश फिर उत्पन्न नहीं हो सकते । शङ्का – सूत्रकारने क्लेशोंकी इस पाँचवीं दग्धबीज - अवस्थाका वर्णन इस सूत्रमें क्यों नहीं किया? समाधान – सूत्रकारने इस सूत्रमें ' अविद्याक्षेत्र ' इस पदसे क्लेशोंकी अविद्यामूलक चारों हेय ( त्यागनेयोग्य ) अवस्थाओंका ही निरूपण किया है । क्लेशोंकी पाँचवीं दग्धबीज - अवस्था अविद्याकी विरोधी होनेसे उपादेय ( ग्रहण करनेयोग्य ) है । अतः उसका इनके साथ कथन करना ठीक न था । इन पाँचवीं दग्धबीज - अवस्थावाले क्लेशोंकी निवृत्ति किसी प्रयत्नविशेषकी अपेक्षा नहीं रखती । असम्प्रज्ञात-समाधिद्वारा उनके धर्मी चित्तके अपने कारणमें लीन होनेके साथ उनकी स्वयं ही निवृत्ति हो जाती है और कैवल्य अवस्थामें चित्तके अपने स्वरूपसे नाश होनेके साथ इनका भी नाश हो जाता है जैसा कि इसी पादके दसवें सूत्रमें बतलाया गया है ' ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः । ' विशेष वक्तव्य – सूत्र ४ – समाधिपाद सूत्र १ ९ के सदृश इस सूत्रकी व्याख्यामें भी कई भाष्यकारोंने -क्लेशोंकी प्रसुप्त अवस्थाके समझानेमें प्रसुप्त क्लेशोंका उदाहरण विदेह और प्रकृतिलयोंके क्लेशोंसे देकर विदेह और प्रकृतिलयोंके सम्बन्धमें भ्रान्तिजनक अर्थ किये हैं । इसका आधार भी वाचस्पति मिश्रकी ही व्याख्या है, जिसका इन सबने अनुकरण किया है । वाचस्पति मिश्रने सूत्रकी व्याख्याके अन्तमें यह श्लोक दिया है—
प्रसुप्तास्तत्त्वलीनानां तन्ववस्थाश्च योगिनाम् ।
विच्छिन्नोदाररूपाश्च क्लेशा विषयसङ्गिनाम् ॥
TETE ‘ तत्त्वलीनोंके क्लेश प्रसुप्त, योगियोंके तनु और विषयी पुरुषोंके क्लेश विच्छिन्न और उदार ( अवस्थावाले ) होते हैं । ' तत्त्वलीनोंसे अभिप्राय विदेह और प्रकृतिलय लिया है । उन्हें अज्ञानी और अयोगी मानकर प्रसुप्तक्लेशयुक्त सिद्ध करनेका यत्न किया गया है । ( १ ) समाधिपाद सूत्र १ ९ की व्याख्या तथा विशेष वक्तव्यमें बतला दिया गया है कि सम्प्रज्ञात-समाधिकी चारों भूमियोंमें उच्चतर और उच्चतम भूमि आनन्दानुगत और अस्मितानुगतको अनुचित विदेह और है । प्रकृतिलय क्रमानुसार प्राप्त किये हुए होते हैं । इन योगियोंको अज्ञानी और अयोगी कहना हैं । इसलिये इनके ( २ ) सम्प्रज्ञात - समाधिमें क्लेश तनु और विवेकख्यातिमें दग्धबीज - भावको प्राप्त होते संदेह नहीं हो सकता । क्लेश यद्यपि दग्धबीज - भावको प्राप्त नहीं हुए हैं तथापि उनके तनु होनेमें तो कोई ( २८४ )
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सूत्र ४ ] अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ** * [ साधनपाद ( ३ ) समाधिपाद सूत्र ३२ में एक तत्त्वके अभ्यासको चित्तकी स्थितिका साधन बतलाया है । सम्प्रज्ञात - समाधिमें किसी - न - किसी विषयको ही आलम्बन ( ध्येय ) बनाकर धारणा, ध्यान और समाधि लगायी जाती है । फिर इस बतलायी हुई प्रणालीपर चलनेवाले साधकोंको योगदर्शनके सूत्रोंकी ही व्याख्यामें अयोगी और अज्ञानी कहना कब ठीक हो सकता है । ( ४ ) फिर भी यदि किसी स्थूल अथवा सूक्ष्मविषयको ध्येय बनाकर समाधि लगानेवालोंको तत्त्वलीन कहा जाय तो भी यह सीमा वितर्कानुगत और विचारानुगततक ही रह जाती है अर्थात् उन्हीं दोनों भूमियोंमें किसी अन्य ग्राह्यविषयको आलम्बन बनाना होता है । आनन्दानुगत और अस्मितानुगतमें तो सारे अन्य विषयोंसे परे होकर केवल ग्रहण और ग्रहीतृ, अहंकार और अस्मिता क्रमानुसार रह जाते हैं । उस उच्चतर और उच्चतम सत्त्वके प्रकाशमें क्लेश बिना तनु हुए प्रसुप्त कैसे रह सकते हैं । ( ५ ) यदि इस अवस्थाको भी अविद्या और अज्ञानमय समझा जाय तब भी क्लेशोंकी इस अवस्थाको उदार कहना होगा न कि प्रसुप्त । विदेह और प्रकृतिलयोंकी इस प्रकार अधोगतिकी अवस्था दिखलाना सूत्रकारके आशयके विरुद्ध है । ( ६ ) तथा व्यास भाष्य और भोजवृत्तिमें विदेह और प्रकृतिलयोंका नाम - निशान भी नहीं है । इसके स्पष्टीकरणके लिये इस सूत्रके व्यासभाष्य तथा भोजवृत्तिका भाषानुवाद कर देना उचित प्रतीत होता है । व्यासभाष्यका अर्थ सूत्र ४ – इनमें अविद्या उत्तर - क्लेश, अस्मिता आदि प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, -उदार- र – चार अवस्थावालोंकी क्षेत्र अर्थात् उत्पत्तिकी भूमि है । उनमें प्रसुप्त क्लेश कौन से हैं? इसका उत्तर यह है कि जो चित्तमें बीजभावको प्राप्त हुए शक्तिमात्रसे रहते हैं । आलम्बन अर्थात् विषयके सम्मुख होनेपर उनकी जागृति होती है । प्रसंख्यान ( विवेकख्याति ) ज्ञानवाले योगीको, जिसके क्लेश दग्धबीज-भावको प्राप्त हो गये हैं, विषयरूप आश्रयके सम्मुख होनेपर भी इन क्लेशोंकी फिर जागृति नहीं होती; क्योंकि जले हुए बीजकी कहाँसे उत्पत्ति हो सकती है । इसलिये जिस योगीके क्लेश क्षीण हो गये हैं, वह ' कुशल चरमदेह ' ( जिसकी मुक्तिमें देह पड़नेतककी देर है ) कहलाता है । उसी योगीमें यह पाँचवीं दग्धबीज - भाववाली क्लेशोंकी अवस्था है, दूसरेमें नहीं । क्लेशोंके रहते हुए भी उस पाँचवीं अवस्थामें बीजकी सामर्थ्य जल जाती है । इस कारण विषयोंके सम्मुखरूपसे रहते हुए भी उनकी जागृति नहीं होती । सोते हुए क्लेशोंका स्वरूप और दग्धबीज क्लेशोंकी अनुत्पत्ति यहाँतक कही गयी है 1 अब तनुक्लेशोंकी निर्बलताका स्वरूप कहा जाता है । प्रतिपक्षभावनाद्वारा नष्ट किये हुए क्लेश तनु होते हैं । उसी प्रकार नष्ट हो - होकर उस - उस रूपसे फिर - फिर जो बर्तने लगते हैं, वे विच्छिन्न कहलाते हैं । किस प्रकार? उत्तर देते हैं, रागकालमें क्रोधके न देखे जानेसे निश्चय रागकालमें क्रोध नहीं बर्तता । राग भी किसी एक पदार्थमें देखे जाते हुए अन्य विषयमें नहीं है — यह नहीं देखा जाता है । ऐसा नहीं है कि एक स्त्रीमें चैत्र नामी पुरुष प्रीतिमान् हो और अन्य स्त्रियोंमें न हो, किंतु उसमें राग वर्तमान है और अन्यमें आगे होनेवाला है । यह लब्धवृत्ति ही तब प्रसुप्त तनु और विच्छिन्न होती है । विषयमें जो वर्तमान वृत्ति है, वह उदार कहलाती है । ये सब क्लेश विषयत्वको नहीं छोड़ते । तब वे कौन - से क्लेश नहीं छोड़ते हैं? उत्तर - प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, उदार चारों नहीं छोड़ते । यह सत्य ही है । तो पुनः इस विशेषरूप हुओंका विच्छिन्नादित्व क्या है? जैसे प्रतिपक्षभावना करते हुए इनकी निवृत्ति होती है, वैसे ही अपने प्रकाशक संस्कार और विषयके द्वारा प्रकाशित होकर प्रकटता होती है । येसब ( २८५ )