पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 351–360
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 351–360
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १ ९ ऐसे ही प्रकृति और पुरुषका पुराणोंमें श्रूयमाण उत्पत्ति भी अन्योन्यके संयोगसे अभिव्यक्ति ही जाननी चाहिये । संयोगलक्षणोत्पत्तिः कथ्यते कर्मजातयोरिति स्मृतेः । स्मृतिका भी यही तात्पर्य है प्रकृति और पुरुषकी संयोगरूप कर्मज उत्पत्ति कही जाती है । तथा चोक्तम्— न घटत उद्भवः प्रकृतिपुरुषयोरजयोरुभययुजा भवन्त्यसुभृतो जलबुद्बुदवत् त्वयि त इमे ततो विविधनामगुणैः परमे सरित इवार्णवे मधुनि लिल्युरशेषाः ॥ ॥ अज प्रकृति और पुरुषका उद्भव - उत्पत्ति नहीं बनती, प्राणधारी जलमें बुदबुदके समान दोनोंसे संयुक्त होते हैं । आपके परमरूपके अंदर ही ये सब नाम और गुणोंके सहित लीन होते हैं जैसे कि समुद्रमें नदियाँ लीन होती हैं और मधुर रसमें सब रस लीन हो जाते हैं I । अब प्रकृति आदिका उन - उनके कार्योंसे अनुमान करानेके लिये पर्व शब्दसे सूचित अलिङ्गादिके अविरल क्रमको दर्शाते हैं – लिङ्गमात्रमिति – लिङ्गमात्रके अलिङ्ग प्रत्यासन्न है - अव्यवहित कार्य है । वही लिङ्गमात्र उस अलिङ्गमें— अलिङ्गावस्था प्रधानमें अव्यक्तरूपसे अविभक्त है अतः उससे विभक्त होता है । उसमें हेतु है— क्रमेति — क्रमका – पौर्वापर्यका कभी भी अतिक्रम नहीं करता, यदि कारणमें अनागत अवस्थासे असत्की भी उत्पत्ति मानें तो अविशेषतया सबकी सर्वत्र उत्पत्ति होनी चाहिये, और अतीतकी भी उत्पत्ति होनी चाहिये जो कि असम्भव है । और प्रागभाव कारण है नहीं; क्योंकि अभाव असिद्ध है । यदि अभावको निमित्तकारण मानें तो उसको ही उपादान कारण भी मान लें, तब तो शून्यवादियोंकी विजय हो गयी । अभावको उपादान देखा भी नहीं है । यदि यह कहा जाय तो निमित्तमें भी यह बात तुल्य ही है । अतः जैसे अभाव उपादान नहीं हो सकता वैसे निमित्त भी नहीं हो सकता । इसलिये कार्यजननशक्ति ही अनागत अवस्थारूपिणी कार्यरूपसे परिणत होती है, वह सत्कार्यवाद इस भाष्यने सिद्ध किया है । तथा इत्यादिकी भी यों ही व्याख्या करनी चाहिये । महद् आदिसे प्रकृति आदिके अनुमानका प्रकार सांख्यसूत्रोंने कहा है, हमने भी उनके भाष्यमें उसको प्रपञ्चित किया है, ( विस्ताररूपसे लिखा है ) विस्तारभयसे यहाँ प्रस्तुत नहीं करते । यह बात पहिले कह दी है । जैसे विशेषोंसे अवान्तरभेद भिन्न विशेष उत्पन्न होते हैं वैसे पहले इसी सूत्रके आदिमें कह दिया है । शङ्का – सूत्रकारने गुणपर्वोंका चतुर्धा ( चार प्रकारका ) विभाग कैसे किया है? ब्रह्माण्ड, स्थावर, जंगमरूपसे पर्व अनन्त हो सकते हैं? समाधान — ब्रह्माण्ड आदि सब विशेष कार्योंका विशेषोंमें ही अन्तर्भाव है, यह कहते हैं — न विशेषेभ्य इति -- विशेषोंसे पर - उत्तर भावि, तत्त्वान्तर - तत्त्वभेद नहीं है, अतः विशेषोंका तत्त्वान्तर परिणाम नहीं है । अतः ब्रह्माण्ड आदिक सब विशेषपर्वसे ही गृहीत हैं यह भाव है । तत्त्वत्व — द्रव्यत्व है, तत्त्वा-न्तरत्व - स्वावृत्तिद्रव्यत्व उससे साक्षात् व्याप्य जातीयत्व है - पच्चीस तत्त्वोंमें पच्चीस जातिके अङ्गीकार न करनेमें तत्त्वान्तरत्व – स्वावृत्तिद्रव्य विभाजक उपाधिमत्त्व — तत्त्वान्तरत्व है । शङ्का -यों तो तत्त्वका भेद होनेसे अन्तःकरणका जो कहीं - कहीं एकत्व कहा है, वह कैसे हो सकेगा? समाधान - जैसे विशेष नामक पञ्च तत्त्वात्मिका एक ही पृथिवी प्रथम उत्पन्न होती है, उसके पीछे उस पृथिवीके खोदने और मथन करनेसे पार्थिव जल और पार्थिव तेज अभिव्यक्तमात्र होते हैं, इसी ( ३२६ )
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सूत्र १ ९ ] विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि * k * [ साधनपाद प्रकार तत्त्वत्रयात्मक ही आदिमें महान् उत्पन्न होता है, पीछे उस महत्त्वमें स्थित अहंकार आदि वृत्तिभेदसे प्रकट होते हैं । प्रश्न - तो क्या विशेषोंके परिणाम ही नहीं होते? उत्तर — नहीं, विशेषोंके परिणाम नहीं होते । उनके तो धर्म - परिणाम, लक्षण - परिणाम और अवस्था - परिणाम – सूत्रकार उत्तरपादमें व्याख्या करेंगे वे होते हैं शङ्का– ऐसा ही सही, महत् - आदिके क्रमसे कहा सृष्टिका प्रकार आकाश आदि क्रम - बोधक श्रुतिके विरुद्ध होनेसे हेय है । श्रुतिमें तन्मात्रकी चर्चा न होनेसे ये पदार्थ कल्पित हैं । मनु आदि स्मृतियाँ सांख्यकी इस कल्पनाका अनुवाद करनेसे धर्मविषयक ही हैं, प्रकृति आदिपरक नहीं हैं; अतः स्मृतियोंसे भी प्रकृतिकी सिद्धि नहीं होती? समाधान — गुणत्रयात्मिका प्रकृति मूलकारणरूपसे मैत्रेयोपनिषद् में सुनी गयी है । यथा-' तमो वा इदमेकमास तत्परं स्यात् तत्परेणेरितं विषमत्वं प्रयाति एतद्वै रजसो रूपं तद्रजः खल्वीरितं विषमत्वं प्रयाति एतद्वै सत्त्वस्य रूपं तत्सत्त्वमेवेरितं तमसः सम्प्रास्त्रवत् तत्सांशोऽयं यश्चेतितामात्रः प्रतिपुरुषं क्षेत्रज्ञः संकल्पाध्यवसायलिङ्गः प्रजापतिस्तस्य प्रोक्ता अस्यास्तनवो ब्रह्मा रुद्रो विष्णुरित्यादि । ' यह प्रपञ्च एक तम ही था, वह पर था, वह परसे प्रेरित विषम बन गया है, यह ही रजका रूप है वह रज परसे प्रेरित होकर विषम हो गया, यह ही सत्त्वका रूप है, वह सत्त्व प्रेरित हुआ तमसे बहा — जुदा हुआ — वह सांश यह है - जो कि पुरुषका चेतितामात्र है - क्षेत्रज्ञ है । सत्त्व प्रेरित हुआ तम संकल्प और अध्यवसाय लिङ्ग है – प्रजापति है, उसका प्रोक्ता ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु इत्यादि उसके तनु शरीर कहे गये हैं । तथा गर्भोपनिषद् में चौबीस तत्त्व इसी क्रमसे कहे हैं, यथा— ' अष्टौ प्रकृतयः, षोडश विकाराः शरीरम् ' इति । आठ प्रकृति हैं ( मूल प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार और पाँच तन्मात्रा ) षोडश विकार हैं और शरीर । तथा प्रश्नोपनिषद्में— ' एवं ह वै तत्सर्वं परे आत्मनि सम्प्रतिष्ठते पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च इत्यादि । ' इस भाँति वह सब पर आत्मामें सम्प्रतिष्ठित है— पृथिवी, पृथिवीमात्रा, जल व तेजोमात्रा, वायु, वायुमात्रा, आकाश और आकाशमात्रा इत्यादिसे परमात्मामें तेईस जलमात्रा, तेज, समुद्रमें नदी नदकी भाँति यह कहा है । अतः चौबीस तत्त्व प्रत्यक्ष तत्त्व प्रतिष्ठित हैं; सिद्ध हैं । व्यवहार और परमार्थ विषयका भेद होनेसे अद्वैत - श्रुति श्रुतिसे और स्मृतिसे अनुमेय श्रुतिसे व्यावहारिक अद्वैतश्रुतियाँ अविभाग लक्षणके अभेद - परक ही हैं इन श्रुतियोंकी बाधक नहीं है । है । उन महदादिकी सृष्टिका क्रम भी श्रुतिमें पाठ - क्रमसे निश्चय — यह बात नदी - समुद्र - दृष्टान्तसे सिद्ध होता है । एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि इससे प्राण उत्पन्न होता है, मन और इन्द्रियाँ च । खं उत्पन्न वायुर्ज्योतिरापः होती हैं पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ , आकाश, वायु, ज्योति, जल और ( ३२७ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप ** [ सूत्र १ ९ सबको धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है । और जो तैत्तिरीय उपनिषद् में वियदादिकी सृष्टि कही है वहाँ वियत् ( आकाश ) से पहिले स्मृतिसे उन्नेय श्रुतिके साथ एकवाक्यताद्वारा बुद्धि आदिकी सृष्टि पूरण कर लेनी चाहिये । छान्दोग्यमें जैसे वियद्वायुकी पूति की है । किंच सांख्योक्त सृष्टिके क्रममें स्पष्ट ही श्रुति प्रमाण है, जैसा कि गोपालतापनीयमें— ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्मासीत् तस्मादव्यक्तमेवाक्षरं तस्मादक्षरान्महत् महतो वै अहङ्कारस्तस्मादेवाहङ्कारात् पञ्च तन्मात्राणि तेभ्यो भूतादीनीति । ' एक अद्वितीय ब्रह्म ही था, उससे अव्यक्त अक्षर उत्पन्न हुआ, उस अक्षरसे महत्तत्त्व और महत्तत्त्वसे अहंकार और अहंकारसे पञ्चतन्मात्रा तथा तन्मात्राओंसे पाँच महाभूत आदि उत्पन्न हुए हैं । वेदान्तसूत्रोंने भी बुद्धि आदिके क्रमसे ही सृष्टि कही है, उनपर नवीनोंकी व्याख्याका हमने अपने भाष्यमें खण्डन किया है, इस प्रकार सांख्यशास्त्रमें प्रपञ्चित ( विस्तारसे वर्णित ) चौबीस तत्त्व ही यहाँ योगदर्शनके दो सूत्रोंने संक्षेपसे कहे हैं । इनके स्वरूप आदि भी वहीं दर्शाये हैं । संक्षेपसे यहाँ भी कहते हैं-पाँच भूत और ग्यारह इन्द्रियाँ तो प्रसिद्ध ही हैं, तन्मात्रा इन पाँच भूतोंके साक्षात् कारण हैं, ये तन्मात्रा शब्द आदिवाले सूक्ष्म द्रव्य हैं, अतः इनको सूक्ष्म भूत भी कहीं कहते हैं । महत् और अहंकारका लक्षण मोक्षधर्ममें कहा है—
हिरण्यगर्भो भगवानेष बुद्धिरिति स्मृतः । महानिति च योगेषु विरञ्चिरिति चाप्युत ॥
धृतं चैकात्मकं येन कृत्स्नं त्रैलोक्यमात्मना । तथैव विश्वरूपत्वाद्विश्वरूप इति श्रुतः ॥
एष वै विक्रियापन्नः सृजत्यात्मानमात्मना । अहंकारं महातेजाः प्रजापतिमहंकृतम् ॥
यह भगवान् हिरण्यगर्भ हैं जिनको बुद्धि कहा है । योगमें इनको महान् और विरञ्चि कहा है, जिनने अपने आत्मरूपसे एकात्मक समस्त त्रैलोक्यको धारण किया है । इसी कारण विश्वरूप होनेसे उनको विश्वरूप कहा है । ये ही विक्रियापन्न अपने आत्मासे आत्माको उत्पन्न करते हैं । ये महातेजा प्रजापति अहंकृतरूप अहंकारको उत्पन्न करते हैं । यहाँ उपासनाके लिये शक्ति और शक्तिमान्के अभेदसे उपाधियोंके नाम और रूपादि उपाधिमानरूप कहे हैं । जैसे कि मनुष्य, पशु आदि शरीरोंके नामसे उन शरीरके अभिमानी आत्माओंको भी मनुष्य और पशु आदि नामसे बोलते हैं । दूसरी स्मृतियोंमें सांख्य और योगके अविवेकसे जड वस्तुरूपसे ही उनका व्यवहार है, ज्ञान और ऐश्वर्यादिरूप महत्तत्त्व और अभिमानरूप अहंकारका अन्तःकरणधर्मत्व होनेसे । प्रकृतिके तो तेईस तत्त्वोंके कारण सत्त्व आदि नामवाले सूक्ष्म द्रव्य असंख्य हैं, उनको गुण इसलिये कहा है कि वे पुरुषके उपकरण हैं और पुरुषको बाँधनेवाले हैं । वे तीन गुण सुख - दुःख - मोहवाले होनेसे सुख - दुःख - मोहात्मक कहलाते हैं । पुरुषोंके सब अर्थोंके साधक होनेसे राजा और मन्त्रीके समान प्रधान कहे जाते हैं । जगत्का उपादान होनेसे प्रकृति और हैं । वैशेषिक आदिने अपनी - अपनी परिभाषासे परमाणु और जगत्का मोहक होनेसे माया कहलाते अज्ञान आदि शब्दोंसे कहा है । तदुक्तं वासिष्ठे-नामरूपविनिर्मुक्तं यस्मिन् संतिष्ठते जगत् । तमाहुः प्रकृति केचिन्मायामेके परे त्वणून् ॥ ( ३२८ )
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* द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः * [ साधनपाद सूत्र २० ] नाम और रूपसे रहित यह जगत् जिसमें ठहरा हुआ है, उसको कोई माया कहते हैं, कोई प्रकृति और कुछ लोग अणु कहते हैं । इनमें तेईस तत्त्व सर्गके आदिमें स्थूलशरीर और सूक्ष्म शरीर - दो रूपसे परिणत होते हैं । उनमेंसे स्थूल तो पाँच भूतोंसे बनता है और सूक्ष्म शेष १७ तत्त्वोंसे बनता है । उन दोनों शरीरोंमेंसे सूक्ष्मशरीर काष्ठवत् चैतन्यका अभिव्यञ्जक होनेसे पुरुषका लिङ्ग - शरीर कहलाता है । और वह अहंकारके बुद्धिमें प्रवेशसे सत्रह तत्त्ववाला ( अवयववाला ) सांख्यशास्त्रमें कहा गया है— ' सप्तदशैक लिङ्गमिति ', इस सूत्रमें एकत्व समष्टिके अभिप्रायसे कहा है । ' व्यक्तिभेदः कर्मविशेषात् ' इस अगले सूत्रसे व्यक्तिरूपसे एक ही लिङ्ग - शरीरको अनेक कहा है । यह व्यष्टि और समष्टिभाव वन - वृक्षवत् नहीं है, किंतु पिता - पुत्रवत् ही है । “ तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः करणैः सह । क्षेत्रज्ञाः समजायन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः उस धीमान् हिरण्यगर्भके स्थूल और सूक्ष्म - दोनों शरीरोंसे समुत्पन्न कार्यों और करणोंके सहित क्षेत्रज्ञ उत्पन्न होते हैं । इन मनु आदिके वाक्योंसे हिरण्यगर्भके दो शरीरोंके अंशसे ही अखिल पुरुषोंके दोनों शरीरोंकी उत्पत्ति सिद्ध होती है । वन और वृक्षोंमें इस प्रकारका कार्य - करण - भाव नहीं होता है ॥ १ ९ ॥ सङ्गति — द्रष्टाका स्वरूप दिखाते हैं— द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥ २० ॥
शब्दार्थ– द्रष्टा - द्रष्टा; दृशिमात्रः = देखनेकी शक्तिमात्र है; शुद्धः - अपि = निर्मल र्मल अर्थात् निर्विकार होनेपर भी; प्रत्यय - अनुपश्य: - चित्तकी वृत्तियोंके अनुसार देखनेवाला है । अन्वयार्थ– द्रष्टा जो देखनेकी शक्तिमात्र है, निर्विकार होता हुआ भी चित्तकी वृत्तियोंके अनुसार देखनेवाला है । व्याख्या - दृशिमात्र, इस शब्दसे यह अभिप्राय है कि देखनेवाली शक्ति विशेषणरहित केवल ज्ञानमात्र है अर्थात् यह देखना या वह देखना उसका धर्म नहीं है, बल्कि यह देखनेकी शक्तिमात्र धर्मी है, उसमें कोई परिणाम नहीं होता । यथा— यथा दीपः प्रकाशात्मा स्वल्पो वा यदि वा महान् । ज्ञानात्मानं तथा विद्यादात्मानं सर्वजन्तुषु ॥ अर्थ — जैसे दीपक चाहे छोटा हो चाहे बड़ा, प्रकाशरूप ही होता है, वैसे ही सब प्राणियोंके अंदर आत्माको भी ज्ञानरूप जानो । ज्ञानं नैवात्मनो धर्मो न गुणो वा कथंचन । ज्ञानस्वरूप एवात्मा नित्यः सर्वगतः अर्थ — ज्ञान न तो आत्माका धर्म है और न किसी भाँति गुण ही है । आत्मा तो नित्य, शिवः विभु और ॥ शिव ( कल्याणकारी ) ज्ञानस्वरूप ही है । प्रत्ययानुपश्य = चित्तकी वृत्तियोंके अनुसार देखनेवाला । चित्तवृत्ति गुणमयी विषयमें उपराग होनेसे वह विषय उसको ज्ञात होता है, पर पुरुष तो चित्तका होनेसे परिणामिनी है । वह चित्त पुरुषके ज्ञानरूपी प्रकाशसे ( प्रतिबिम्बित सदैव साक्षी बना रहता है, ( चित्त ) जिन - जिन वृत्तियोंके तदाकार होता है वह पुरुषसे होकर ) छिपी चेतन नहीं - जैसा रहती भासता । पुरुषमें है । इस कारण वह परिणाम नहीं होता । चित्त - जैसा कोई ( ३२ ९ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २० द्रष्टा स्वरूपसे शुद्ध परिणाम आदिसे रहित सर्वदा एकरस रहता हुआ भी चितकी वृत्तियोंका रखनेवाला है; क्योंकि चित्तमें उसके ही ज्ञानका प्रकाश है अर्थात् वह उसीके ज्ञानसे प्रतिबिम्बित है । चित्त ज्ञान सुख, मोहादि वृत्तियोंके रूपमें परिणत होता रहता है । यह परिणाम आत्मामें नहीं होता है; क्योंकि वह अपरिणामी ज्ञानस्वरूप है । चित्तका साक्षी होनेके कारण उसमें ये वृत्तियाँ अज्ञानसे अपनी प्रतीत होती हैं । नोट- यह बात अच्छी प्रकार जान लेनी चाहिये कि आत्माका वास्तविक दर्शन विवेकख्यातिद्वारा चित्तको अपनेसे भिन्न देखना और असम्प्रज्ञात - समाधिद्वारा स्वरूपस्थिति प्राप्त करना है । इसके अतिरिक्त चित्तकी अन्य वृत्तियोंको आसक्तिके साथ देखना अदर्शन है; क्योंकि यह अविद्यासे होता है और इससे यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं होता । आगे सूत्र तेईसकी व्याख्यामें इसका विशेष ध्यान रखना चाहिये । टिप्पणी- इस सूत्रकी व्याख्या खोलकर स्पष्ट शब्दोंमें कर दी गयी है, फिर भी पाठकोंकी अधिक जानकारी तथा अपनी व्याख्याकी पुष्टिके निमित्त व्यासभाष्य तथा भोजवृत्तिका भाषार्थ भी नीचे दिया जाता है-भाषार्थ व्यासभाष्य – सूत्र ॥ २० ॥ ( दृशिमात्रः ) सब धर्मोंसे रहित जो केवल चेतनमात्र अर्थात्
ज्ञानस्वरूप पुरुष है, वह द्रष्टा कहा जाता है । यदि ज्ञानस्वरूप है तो ज्ञानका आश्रय कैसे हो सकता है अर्थात् ज्ञानस्वरूप धर्मका आधार होनेसे दृशिमात्र कैसे हो सकता है? इस शङ्काका उत्तर देते हैं " शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः " यद्यपि वह स्वभावसे ज्ञानका आधार न होनेसे शुद्ध ही है तथापि प्रत्ययसंज्ञक बुद्धि - धर्म ज्ञानको अनुसरण करनेसे ज्ञानका आधार कहा जाता है । अर्थात् यद्यपि पुरुष ज्ञानस्वरूप ही है तथापि बुद्धिरूपी दर्पणमें प्रतिबिम्बित होनेसे उस बुद्धिके धर्मभूत ज्ञानका आधार प्रतीत होता है । इसलिये बुद्धिवृत्तिका अनुकारी अर्थात् तदाकारधारी होनेसे पुरुष ‘ प्रत्ययानुपश्य ’ कहा गया है । सो यह दृशिमात्र चेतनभूत पुरुष न तो बुद्धिके समान रूपवाला है और न अत्यन्त विरुद्धरूपवाला है । अर्थात् यह पुरुष बुद्धिसे विलक्षण है; क्योंकि ज्ञात - अज्ञात विषय होनेसे बुद्धि परिणामिनी है और सदा ज्ञातविषय होनेसे पुरुष अपरिणामी है । अर्थात् बुद्धिका विषयभूत जो गवादि, घटादि पदार्थ हैं वे कभी ज्ञात होते हैं और कभी अज्ञात, किंतु पुरुषका विषयभूत जो बुद्धितत्त्व है वह सदा पुरुषको ज्ञात ही रहता है । इसलिये बुद्धि सदा एक रस न होनेसे अर्थात् विषयसंनिधिसे विषयाकार होकर ज्ञात - विषय होनेसे और अन्य समयमें अज्ञात - विषय होनेसे परिणामिनी है और पुरुष सदा एक रस होनेसे अपरिणामी है; क्योंकि पुरुषका विषयभूत बुद्धितत्त्व सदा ज्ञात ही रहता है । अतः यह दोनों परस्पर विलक्षण हैं । एवं संहत्यकारी होनेसे अर्थात् तीन गुणोंसे मिलकर पुरुषके भोग अपवर्गरूप अर्थका सम्पादन करनेसे बुद्धि परार्थ है और पुरुष असंहत अर्थात् केवल होनेसे अन्य किसीका अर्थ न होनेके कारण स्वार्थ है. इस कारणसे भी दोनों परस्पर विलक्षण हैं । तथा शान्त, घोर, मूढाकारसे परिणत हुईं बुद्धि शान्त, घोर, मूढ़ पदार्थविषयक अध्यवसायशील होनेसे त्रिगुण तथा अचेतन है और पुरुष गुणोंका उपद्रष्टामात्र होनेसे अर्थात् बुद्धिमें केवल प्रतिबिम्बितमात्र प्रकाश डालनेसे न कि तदाकार परिणत होनेसे गुणातीत और चेतन है, इस कारण बुद्धिके समान रूप नहीं है । तो फिर क्या अत्यन्त विरुद्धरूप है? इसका उत्तर देते हैं कि अत्यन्त विरुद्धरूप भी नहीं है । क्योंकि ( ३३० )
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* द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः * [ साधनपाद सूत्र २० ] ( शुद्धोऽपि ) यह पुरुष शुद्धरूप अर्थात् सब विकारों और परिणामोंसे रहित भी होनेपर बुद्धिवृत्ति भी ( प्रत्ययानुपश्यः ) बुद्धि - वृत्तिरूप ज्ञानको प्रकाशता हुआ बुद्धि - वृत्तिस्वरूप न होनेपर स्वरूपसे भान होता है । ऐसा ही पञ्चशिखाचार्यने भी कहा है— ' अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमनुपतति, तस्याश्च प्राप्तचैतन्योपग्रहरूपाया बुद्धिवृत्तेरनुकारमात्रतया बुद्धि-वृत्त्यविशिष्टा हि ज्ञानवृत्तिरित्याख्यायते । ' अर्थात् अपरिणामी जो भोक्तृ - शक्तिसंज्ञक पुरुष है वह यद्यपि अप्रतिसंक्रम है अर्थात् किसी विषयसे सम्बन्ध न होनेसे निर्लेप है तथापि परिणामिनी बुद्धिमें प्रतिबिम्बित हुआ तदाकार होनेसे उस बुद्धिकी वृत्तिका अनुपाती ( अनुसारी ) हो जाता है और उस चैतन्य प्रतिबिम्ब - ग्राहिणी बुद्धि - वृत्तिके अनुकारमात्र होनेसे बुद्धिवृत्तिसे अभिन्न हुआ वह चेतन ही ज्ञानवृत्ति कहा जाता है । भोजवृत्तिभाषार्थ — ॥ सूत्र २० ॥ पूर्वोक्त प्रकारसे दृश्यके स्वरूपको जो हेय अर्थात् त्यागनेयोग्य होनेके कारण प्रथम जाननेके योग्य है, अवस्थासहित वर्णन करके अब उपादेय अर्थात् ग्रहण करनेयोग्य द्रष्टा पुरुषके स्वरूपको बतलाते हैं । द्रष्टा पुरुष ज्ञानस्वरूप है । पुरुषका ज्ञान धर्म नहीं है, इसलिये सूत्रमें ' मात्र ' शब्द है । कोई एक मानते हैं कि चेतना ( ज्ञान ) आत्माका धर्म है । वह स्वरूपसे शुद्ध होता हुआ परिणाम आदिसे रहित होनेपर भी, ( सुप्रतिष्ठोऽपि ) अपने स्वरूपसे प्रतिष्ठित रहता हुआ भी ( प्रत्ययानुपश्यः ) चित्तकी वृत्तियोंके अनुसार देखनेवाला है । बुद्धिकी समीपता अर्थात् उसमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण उसकी विषयोंसे उपरक्त हुई वृत्ति ज्ञानके अनुसार ( प्रतिसंक्रमाद्यभावेन ) प्रतिसंक्रमके * बिना भी अर्थात् बिना किसी विषयसे सम्बन्ध रखते हुए निर्लेप होनेपर भी देखता है । सारांश यह है कि
बुद्धिमें विषयोंके उपरागकी उत्पत्ति होनेपर संनिधिमात्रसे पुरुषमें द्रष्टापन है ।
विज्ञानभिक्षुके वार्त्तिकका भाषानुवाद सूत्र ॥ २० ॥
सूत्रका अवतरण करते हैं— व्याख्यातमिति - द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः – दृशि यहाँ -गुण नहीं है, किंतु प्रकाशस्वरूप द्रव्य है । ज्ञानं नैवात्मनो धर्मो न गुणो वा कथंचन । ज्ञानस्वरूप एवात्मा नित्यः सर्वगतः शिवः ॥ ज्ञान आत्माका धर्म नहीं है और न किसी भाँति गुण ही है । आत्मा तो ज्ञानस्वरूप ही सर्वगत है और शिव ( कल्याणकारी ) है । इत्यादि स्मृतिसे भी आत्मा ज्ञानस्वरूप द्रव्य ही है, नित्य है, अग्नि और उष्णता आदिमें भेद और अभेद होता है; क्योंकि उष्णताके ग्रहण न होनेपर सिद्ध होता है । ग्रहण होता है, परंतु पुरुषका ग्रहण ज्ञानके ग्रहणके बिना भी चक्षुसे अग्निका नहीं — पुरुषका स्वरूप ही है।मात्र शब्दसे पूर्व सूत्रमें कहे नहीं इन प्रकाश होता ।, अतः क्रिया ज्ञान आदि पुरुषका धर्म या गुण गयी । इन प्रकाश, क्रिया आदिमें सब शेष गुणोंका अन्तर्भाव गुणोंकी व्यावृत्ति हो शब्दसे भूत और इन्द्रियात्मकत्वकी व्यावृत्ति है अर्थात् कोई भी गुण पुरुषमें नहीं है । शुद्ध एकादश - इन्द्रियात्मक भी नहीं है ) । शुद्धोऽपि - बुद्धिसे होती अभेदनके है ( अर्थात् आत्मा पञ्चभूतात्मक और उपपादनार्थ शेष विशेषण हैं ( शुद्ध• और ( ३३१ )
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २० प्रत्ययानुपश्य विशेषण हैं ) । यहाँ परिणामित्व, पारार्थ्य, अचेतनत्व आदि बुद्धिकी अशुद्धि हैं, वे अशुद्धि पुरुषमें नहीं हैं । यही पुरुषकी शुद्धिभाष्यमें व्यक्त होगी । प्रत्ययानुपश्य – प्रत्ययके समान ‘ आकारतापन्न इव ' होता हुआ बुद्धिकी वृत्तिका साक्षी है, यह अर्थ है । इस विशेषणसे द्रष्टामें प्रमाण कहा है । ' शुद्धोऽपीत्यादि ' भाष्यके फलान्तरकी ( दूसरे फलकी ) भाष्यकार व्याख्या करेंगे । दृशिमात्रके शब्दार्थको कहते हैं— दृक् - शक्ति ही है । प्रलय और मोक्ष आदिमें जीवोंके दर्शन नामक चैतन्य फलका उपधान नहीं है ( प्रतीति या व्यवहार नहीं है ), इस प्रयोजनसे भाष्यकारने शक्ति शब्दका प्रयोग किया है । एव शब्दका अर्थ कहते हैं— विशेषणोंसे अपरामृष्ट है ( अछूता है ), इन विशेषणोंसे विशेषितका अर्थ है, व्यावर्तन, द्रव्यान्तरसे भिन्न है यह तात्पर्य है । विशेषण वे विशेष गुण हैं जो वैशेषिक शास्त्रमें कहे हैं । उनसे दृक् शक्ति तीनों कालोंमें असम्बद्ध है, यह अर्थ है । इससे ( सामान्य - गुण ) संयोग, संख्या, परिमाण आदि होनेपर भी क्षति नहीं है । द्रष्टा यह लक्ष्य ( वाचक ) पद है । बुद्धिसे व्यावृत्त - भिन्न रूपसे इसकी व्याख्या करते हैं— स पुरुष इति । संवेदिनी बुद्धिका प्रतिसंवेदी पुरुष है, संवेदन अर्थाकार वृत्तिका नाम है— उस वृत्तिका संवेदन प्रतिध्वनिवत् प्रतिबिम्ब है जिसमें वह पुरुष है, यह अर्थ है । बुद्धिका साक्षी है, यह तात्पर्यार्थ है । इससे प्रतिबिम्बरूप आरोपित क्रियासे कल्पित दर्शन- कर्तृत्व द्रष्टृत्व है, यह बात भी सूचित कर दी है । आत्माकी ज्ञानस्वरूपता तो—
यथा दीपः प्रकाशात्मा स्वल्पो वा यदि वा महान् ।
ज्ञानात्मानं तथा विद्यादात्मानं सर्वजन्तुषु ॥
जैसे दीपक छोटा है या बड़ा, वह प्रकाशरूप ही होता है, वैसे सब प्राणियोंके अंदर आत्माको भी ज्ञानरूप जानें । इत्यादि सैकड़ों वाक्योंके अनुग्रहसे और लाघव तर्ककी सहायतासे आत्मत्वादिरूप व्यतिरेकी आदि लिङ्गोंसे अनुमेय ज्ञानके आश्रयत्वकी कल्पनामें धर्मधर्मिभावापन्न दो वस्तुकी कल्पनाका गौरव होनेसे ( आत्माकी ) ज्ञानरूपता सिद्ध है । मैं जानता हूँ इत्यादि प्रत्यय तो, मैं गोरा हूँ ऐसे सैकड़ों भ्रमोंके अन्तःपाती होनेसे ( जैसा यह भ्रम है ऐसा ही भ्रम होनेसे ), अप्रमाणताकी शङ्कासे युक्त होनेके कारण यथोक्त - अनुमानकी अपेक्षासे दुर्लभ है । बुद्धि और पुरुषके विवेकका प्रतिपादन करनेके लिये और उनके अभेद भ्रमका उपपादन करनेके लिये, उनके वैरूप्य और सारूप्यके प्रतिपादकतया -क्रमसे दो विशेषणोंकी व्याख्या करते हैं - वह आत्मा न बुद्धिके सरूप है और न अत्यन्त विरूप है— पारमार्थिक सारूप्यका अभाव है- यह ' शुद्धोऽपि ' इत्यादि अंशका अर्थ है । प्रतिबिम्बरूप अपारमार्थिक सारूप्य है, यह शेष अंशका अर्थ है । तथा परिणामित्वादिरूप बुद्धिके सारूप्यका अभाव ही शुद्धि है और बुद्धिकी वृत्तिके सारूप्य ही प्रत्ययानुपश्यत्व है, यह बात आ जाती है । सारूप्यके अभाव और सारूप्यका क्रमसे प्रतिपादन करते हैं — ‘ न तावत् ' इत्यादिसे – प्रथम तो वह आत्मा बुद्धिके सरूप - समान नहीं है । क्यों नहीं है? इसका उत्तर है - बुद्धि परिणामिनी है, बुद्धिके परिणामिनी होनेमें हेतु है कि वह बुद्धि ज्ञात और अज्ञात विषयवाली है । ' ज्ञातेति ' इस वाक्यका विवरण करते हैं - तस्याश्चेति — उस बुद्धिके विषय गवादि और घटादि ज्ञात और अज्ञात होते हैं, अतः वे बुद्धिकी परिणामताको दर्शाते हैं - ( व्याख्या ) गवादिरिति — गोशब्द शब्दवाची है, अतः गवादि व घटादि पदोंसे धर्मीके सामान्य रूपसे — धर्म - धर्मीरूप सब ही बुद्धि - विशेषोंका ग्रहण है । वृत्तिसे व्याप्यको ज्ञात कहते हैं और वृत्तिसे ( ३३२ )
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* द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः * [ साधनपाद सूत्र २० ] अव्याप्यको अज्ञात कहते हैं । “ दर्शयति ” का अर्थ है अनुमान कराता है । भाव यह है— बुद्धि परिणामिनी हो तब भी कभी शब्द आदिके आकारवाली होती है, कभी नहीं होती ही —यह विषयाकार हो सकता है । क्यों जी! पुरुषके समान बुद्धिमें अपरिणामी होनेपर भी विषयका प्रतिबिम्बन हो सकता है । उस प्रतिबिम्बके कदाचित्— कभी - कभी होनेसे बुद्धिकी ज्ञाताज्ञातविषयता बन सकती है? यह पड़ना नहीं कह सकते; क्योंकि स्वप्नावस्थामें और ध्यानावस्थामें विषयके समीप न होनेसे प्रतिबिम्बका समान आकार जो असम्भव है । शास्त्रोंमें बुद्धिमें विषयके प्रतिबिम्बको कहनेवाले वचन तो उस विषयके परिणाम होता है उस परिणाम मात्रके कारण कहे गये हैं । अतः बुद्धिके अर्थ - ग्रहणकी अनित्यतासे बुद्धिके अर्थाकार परिणामका अनुमान होता है । बुद्धिके परिणामित्वको दिखलाकर उस परिणामित्वके अभावको पुरुषमें दिखलाते हैं— सदा ज्ञातेति - सदा ज्ञात है— बुद्धिको वृत्तिरूप जिससे उसका भाव सदा ज्ञातविषयत्व है, वह सदा - ज्ञातविषयत्व पुरुषके अपरिणामित्वको अनुमान कराती है । यदि पुरुष परिणामी ही हो तो जडतारूप परिणामसे कभी उस पुरुषका विषय - बुद्धिकी वृत्ति अज्ञात भी रहनी चाहिये, ऐसा माननेमें वर्तमान भी घटादिकी वृत्तिका अज्ञान सम्भव हो जायगा । मैं घटादिको निश्चय जानता हूँ या नहीं इत्यादि ( प्रत्यक्ष घटादि विषयमें ) संशय भी हो सकता है । ऐसे ही योग्यकी अनुपलब्धिसे घटादिके ज्ञानका अभाव नियम न हो सकेगा; क्योंकि अज्ञात वृत्तिकी सत्ताका सम्भव है, यह भाव है I शङ्का - इतनेसे भोक्ताका ज्ञान - परिणाम न सही, परंतु सुखादि - परिणामोंका भोक्तामें अभाव इसमें कैसे अनुमान हो सकेगा? समाधान — शब्द आदि निश्चयरूप परिणामके बुद्धिमें सिद्ध हो जानेसे ही — उन शब्दादिके परिणामके कार्य इच्छा, कृति, सुख, दुःख, अदृष्ट, संस्कार आदि भी बुद्धिके धर्म हैं — यह बात सिद्ध हो जाती है; क्योंकि कारण अपने कार्यको समान अधिकरणमें ही उत्पन्न किया करता है ( अतः बुद्धिरूप अधिकरणमें जिन शब्दादि विषयोंका निश्चय हुआ है, वह निश्चयात्मक ज्ञान अपने कार्य, इच्छा, कृति, सुखादिको भी उसी अधिकरण - बुद्धिमें उत्पन्न करेगा; अतः वे भी बुद्धिके ही धर्म या परिणाम हैं पुरुषके नहीं ) इसीमें लाघव है । शङ्का – पुरुष भी सदा ज्ञातविषय नहीं है; क्योंकि प्रलय आदिमें अपने विषय बुद्धिकी वृत्तिको नहीं जानता है? यह आक्षेप करते हैं — कस्मादिति-समाधान — नहीति — पुरुषविषयक बुद्धिकी वृत्ति भी शब्द आदिके समान नहीं है, अथवा वह वृत्ति अगृहीत और गृहीत कालभेदसे होती है । ऐसा स्मृति भी कहती है-' न चिदप्रतिबिम्बाऽस्ति दृश्याभावादृते किल । क्वचिन्नाप्रतिबिम्बेन किलादर्शोऽवतिष्ठते! ' चितिशक्ति – दृश्यके अभावके सिवा कहीं भी अप्रतिबिम्बा नहीं होती है, जैसे कि दर्पण दृश्यके अभावके सिवा कभी भी प्रतिबिम्बरहित नहीं होता है । तथा च - प्रलय आदिमें वृत्ति नामक दृश्यके अभावसे ही, उस बुद्धिवृत्तिको नहीं देखता, यह भाव है । उपसंहार करते हैं — सिद्धमिति परिणामित्वकी भाँति ही बुद्धि और पुरुषके परार्थत्व और अपरार्थत्वको दिखलाते हैं - किं — चेति-बुद्धि संहत्यकारी होनेसे परार्थ है, अपनेसे भिन्नके भोगादिके साधनार्थ है संहत्यकारीकी अपेक्षा व्यापारवाले, शय्या - आसन और शरीर आदिकी भाँति । पुरुष स्वार्थ है- अपने भोग आदिका ( ३३३ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र २० साधन है, उसमें उक्त हेतुओं - संहत्यकारी आदिका अभाव है । जो सहकारी - सापेक्ष व्यापारवाला होता, वह परार्थ नहीं हुआ करता- -जैसे पुरुष । बुद्धिका ही व्यापारविषय ग्रहणादि- इन्द्रियादि - सापेक्ष नहीं है, शय्या आदि भी जो शयन आदिके लिये हैं, भूमि आदिकी अपेक्षा रखते हैं । पुरुषका सुखादिके प्रकाशनका व्यापार ही नहीं होता, क्योंकि वह उसका स्वरूपसे नित्य है, सुखादिकी सत्तामें सुखादिके प्रकाशनार्थ पुरुष सहकारी कारणकी अपेक्षा नहीं रखता - यह भाव है । बुद्धिके परार्थ होनेमें श्रुति प्रमाण है – “ न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवतीत्यादि ” – सबकी कामनाके लिये सब प्यारे नहीं होते, अपनी कामनाके लिये सब प्यारे होते हैं । यहाँ कोई स्वार्थ इसका यह अर्थ करते हैं कि साध्य परार्थ नहीं होता है । यह नहीं हो सकता; क्योंकि भृत्य चेतनको भी स्वामी चेतनके अर्थ देखा जाता है । परार्थत्व परमात्रार्थ है, यदि यह कहो तो नहीं कह सकते । अचेतनत्वरूप अन्य वैधर्म्यको कहते हैं — तथा सर्वार्थेति – सुख - दुःख - मोहात्मक सर्वार्थ तीन गुणोंको ग्रहण करती हुई बुद्धि भीतदाकारतया त्रिगुणा - -सत्त्व स् आदि गुणत्रयमयी अनुमानसे ज्ञात होतीं है— त्रिगुण होनेसे पृथिवी आदिकी भाँति अचेतन है – यह सिद्ध है । गुणोंका उपद्रष्टा पुरुष तो दृश्या बुद्धिके सांनिध्यसे बुद्धिकी वृत्तिके प्रतिबिम्बमात्रसे गुणद्रष्टा होता है – गुणाकार परिणामसे गुणोंका उपद्रष्टा नहीं होता, जैसे कि बुद्धि; अतः पुरुष त्रिगुण नहीं है, इसीसे चेतन है — यह शेष है । उपसंहार करते हैं-- अत इति — अतः वैधर्म्यत्रयसे पुरुष बुद्धि - सरूप नहीं है । इतनेसे ही शुद्ध है, इसकी व्याख्या -हो गयी । शङ्का – सर्व अभिमानकी निवृत्तिके लिये सामान्यसे ही दृक् और दृश्यके विवेकका प्रतिपादन करना चाहिये, तो वह क्या बुद्धि और पुरुषके वैराग्यका प्रतिपादन किया जाता है? समाधान — नहीं, बुद्धि ही पुरुषकी साक्षात् दृश्या है; क्योंकि अन्योंको बुद्ध्यारूढ होनेसे ही दृश्यता है । उसीमें ( बुद्धिहीमें ) साक्षात् अभिमान होता है और उस बुद्धिके सम्बन्धसे दूसरे विषयोंमें अभिमान होता है । मृत शरीरमें- - सुषुप्त्यवस्थ - प्राणमें चैतन्यका अभाव स्पष्ट देखनेमें आता है । एक इन्द्रियका व्याघात हो जानेपर भी चेतनताकी उपलब्धि होती है, अतः इन्द्रिय भी चेतन नहीं है — यह बात स्पष्ट ही है । अतः बुद्धिके विवेकसे ही सब अभिमानकी निवृत्ति होती है— इस अभिप्रायसे पुरुषमें बुद्धिका वैधर्म्य ही प्रायः प्रतिपादन करते हैं । एक बात यह भी है कि बुद्धिसे व्यतिरिक्तोंसे तो पुरुषका विवेक ( पृथक्त्व ) न्याय और वैशेषिकने सिद्ध कर ही दिया है, बुद्धिसे विवेक ही सांख्य और योगका असाधारण कृत्य है । अत्यन्त वैरूप्यका निराकरण करनेके लिये संदेह उठाते हैं— अस्तु तर्हि- -अच्छा तो विरूप ही सही । समाधान – ना अत्यन्त विरूप - क्योंकि पुरुष प्रत्ययानुपश्य है । इसीकी व्याख्या करते हैं — क्योंकि वह बौद्ध प्रत्ययों ( बुद्धिमें उत्पन्न हुए ज्ञानों ) को बुद्धिके पीछेसे देखता है ( बुद्धिकी वृत्तिको देखता है, यह अर्थ है ) । ? शङ्का - बुद्धिका द्रष्टा होनेपर भी अत्यन्त वैरूप्य क्यों नहीं है समाधान — तमनुपश्यतीति – क्योंकि उस बुद्धिके वृत्ति - प्रत्ययको देखता हुआ पुरुष बुद्ध्यात्मक न होता हुआ भी — परमार्थसे बुद्धिके असमानरूप भी बुद्धि - सरूप - जैसा प्रतीत होता है, जैसे जपापुष्पसे ( ३३४ ) पा ० यो ० प्र ० १२-
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* द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः * [ साधनपाद सूत्र २० ] स्फटिक जपापुष्प - जैसा प्रतीत होता है, वैसे ही पुरुष बुद्धिका अनुकारी हो जाता है । अर्थ – ग्रहणरूपसे बुद्धिस्थलमें पुरुषकी अर्थाकारता ही सिद्ध होती है । प्रतिबिम्बरूपसे और मिथ्या सारूप्यसे पारमार्थिक असारूप्यका विरोध नहीं है । यथोक्त सारूप्य और वैरूप्यके विषयमें पञ्चशिखाचार्यके वाक्यको प्रमाणमें उपस्थित करते हैं — तथा चोक्तमिति — भोक्तृशक्ति बुद्धिके समान परिणामिनी नहीं है, तथा बुद्धिवत् स्वविषयमें संक्रान्त उपरक्त भी नहीं होती है; क्योंकि विकारके हेतुके साथ संयोग ही उपराग है । अतः बुद्धिके विकार प्रतिबिम्बसे ही इसकी सिद्धि हो जाती है — पुरुषके विकारकी कल्पना करना व्यर्थ है । इन दो विशेषणों ( शुद्ध वा प्रत्ययानुपश्य ) से पुरुषका बुद्धिसे वैरूप्य दर्शाया है । अब बुद्धिसे पुरुषका सारूप्य दिखलानेके लिये पहले बुद्धिकी चिद्रूपताका उपपादन करते हैं-परिणामीत्यर्थ इति — परिणामी अपना स्वार्थ विषय जो बुद्धि है उसमें प्रतिबिम्बरूपसे संक्रान्तकी भाँति उपरक्त - जैसी होती हुई चिति - शक्ति - तद्वृत्तिबुद्धिकी विषयाकार वृत्तिकी अनुयायी है— बुद्धिको चेतन - जैसी बना देती है— जैसे कि सूर्य जलमें पड़कर जलको सूर्यवत् कर देता है । इससे बुद्धिके रूपको दिखलाकर पुरुषके बुद्धि - सारूप्यको दर्शाते हैं— तस्याश्चेति — हि शब्द अवधारण वाचक है— उस भोक्तृशक्तिकी भी ज्ञानवृत्ति — ज्ञानरूपा वृत्ति बुद्धि - वृत्तिसे अविशिष्ट ही — अभिन्न ही कही जाती है, इसमें हेतु है— प्राप्तेति — उपग्रह - उपराग है । उक्त रीतिसे प्राप्त चैतन्य उपरागके सदृश बुद्धिको वृत्तिके अनुकरण करनेवाली – प्रतिबिम्बोद्ग्राहिणी-तन्मात्रतया यह ज्ञान वृत्तिका विशेषण है तथा च परस्परके प्रतिबिम्बसे दोनोंका ही चेतनत्व सुखादिपरिणामकत्व रूप सारूप्य कहा जाता है । इस सूत्रने जीव और ईश्वरको साधारणतासे ही चिन्मात्र कहा है । तथा च श्रुति और स्मृति हैं- -" चेतामात्रः प्रतिपुरुषं क्षेत्रज्ञः " ज्ञानमेव परं ब्रह्म ज्ञानं बन्धाय चेष्यते । ज्ञानात्मकमिदं विश्वं न ज्ञानाद् विद्यते परम् ॥ चेतामात्र — प्रतिपुरुष — क्षेत्रज्ञ । -ज्ञान ही परं ब्रह्म है, ज्ञान ही बन्धके लिये है, यह सब ज्ञानात्मक है, ज्ञानसे परे कुछ नहीं है । जो वैशेषिक आदि आत्माको ज्ञानका आश्रय मानते हैं, वे श्रुति और स्मृतिका विरोध होनेसे उपेक्षणीय हैं ( माननेयोग्य नहीं हैं ) किं च लाघवसे प्रत्येक पुरुष एक - एक व्यक्ति ज्ञानमात्र नित्य है, यह सिद्ध हो जानेपर उस ज्ञानका आश्रय माननारूप गौरवकी कल्पना नहीं करनी चाहिये । “ जानामि ” इस प्रतीतिकी संयोग सम्बन्धसे ही उपपत्ति हो जाती है । जैसे कि इन्धन तेजस्वी है — यह प्रत्यय संयोग सम्बन्धसेप्रमा ज्ञान है, ऐसे ही बुद्धिमें ज्ञान नामक द्रव्यके संयोग सम्बन्धसे ज्ञानवत्त्व प्रत्यय प्रमा ही है । ( मैं ) प्रत्ययमें बुद्धि भी भासती है । अनादि मिथ्या ज्ञानकी वासना नामक दोषके प्रतिबन्धकतामें लोगोंके अहं प्रमाण नहीं हैं, अतः ‘ अहं जानामि ' यह अविद्वानोंका प्रत्यय अहं अंशमें कोई प्रमा है — यह बात हम दोनोंको समान ही हैं । विद्वानोंको तो ' जानामि भ्रम है और ज्ञानवत्त्व अंशमें परमेश्वरकी सर्वज्ञताका व्यवहार लोकव्यवहारकी दृष्टिसे होता है, अधिक ' यह प्रत्यय प्रसिद्ध ही है । तो सांख्यके भाष्य आदिमें कहा है— इति दिक् ॥ २० ॥
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