पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 361–370
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 361–370
पृष्ठ 361
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २१
सङ्गति — इस दृश्यका प्रयोजन पुरुषके लिये है, यह अगले सूत्रमें बतलाते हैं ।
तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २१ ॥
शब्दार्थ - तद् - अर्थ एव = उस = ( द्रष्टा पुरुष ) के लिये ही; दृश्यस्य- आत्मा = दृश्यका स्वरूप है I अन्वयार्थ — उस पुरुषके लिये ही ( यह सारा ) दृश्यका स्वरूप है । व्याख्या — ऊपर कहे हुए लक्षणानुसार दृश्यका जो स्वरूप है वह पुरुषके प्रयोजनके हेतु है; क्योंकि प्रकृति अपने किसी भी प्रयोजनकी अपेक्षा न करके केवल पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये प्रवृत्त हो है । इसीको निम्न कारिका स्पष्ट करती है-इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्तः । प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरम्भः ॥ इस प्रकार प्रकृतिसे किया हुआ महत्से लेकर विशेषभूतोंतकका आरम्भ प्रत्येक पुरुषके मोक्षके लिये स्वार्थकी नाईं परार्थ है ।
वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य ।
पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्तिः प्रधानस्य ॥ ५७ ॥
बछड़ेकी वृद्धिके निमित्त जिस प्रकार अचेतन दूधकी प्रवृत्ति होती है उसी प्रकार पुरुषके मोक्षके लिये प्रधानकी प्रवृत्ति होती है ।
नानाविधैरुपायैरुपकारिण्यनुपकारिणः पुंसः ।
गुणवत्यगुणस्य सतस्तस्यार्थमपार्थकं चरति ॥ ६० ॥
नाना प्रकारके उपायोंसे यह उपकारिणी गुणवती ( सत्त्व, रजस्, तमस् गुणवाली ) प्रकृति उन अनुपकारी गुणरहित ( गुणातीत ) पुरुषके अर्थ निःस्वार्थ काम करती है ( जिस प्रकार परोपकारी सज्जन सबका भला करता है और अपना कोई प्रत्युपकार नहीं चाहता ) । टिप्पणी — व्यासभाष्यका भाषानुवाद ॥ सूत्र २१ ॥ दृशिरूप पुरुषके क्रर्म और फलके भोगार्थ दृश्य है । उसकी प्रयोजन - सिद्धिके लिये ही दृश्यका आत्मा होता है अर्थात् स्वरूप होता है, यह अर्थ है । जड होनेके कारण दृश्यका स्वरूप ( पर ) चेतनरूपसे ही लब्ध होता है । इसलिये जिन पुरुषोंका भोग और अपवर्ग प्रयोजन सिद्ध हो गया है उनसे नहीं देखी जाती । अब प्रश्न होता है, क्या स्वरूपके हानसे इस दृश्यका नाश हो जाता है? उत्तर— नाश नहीं होता ॥ २१ ॥
भोजवृत्तिभाषार्थ ॥. सूत्र २१ ॥ है; क्योंकि पूर्वोक्त लक्षणानुसार जो दृश्यका स्वरूप है वह उस पुरुषके भोक्तृत्व - प्रयोजन- सम्पादनार्थ - सम्पादनके लिये प्रकृति अपने किसी भी प्रयोजनकी अपेक्षासे प्रवृत्त नहीं होती, किंतु पुरुषके भोक्तृत्व प्रवृत्त होती है ॥ २१ ॥
विज्ञानभिक्षुके वार्त्तिकका भाषानुवाद ॥ सूत्र २१ ॥ बुद्धिसे अतिरिक्त द्रष्टाके विषयमें सूत्रकार प्रमाण कहते हैं-( ३३६ )
पृष्ठ 362
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् * [ साधनपाद सूत्र २२ ] * तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ । भोग और अपवर्ग ही हैं प्रयोजन जिसके उस पुरुषके अर्थ हैं, प्रयोजन हैं भोग और अपवर्ग वह पुरुष है । यह मध्यमपदलोपी समास है – भोग और अपवर्ग - प्रयोजनवाला ही दृश्यका स्वरूप है — कार्य और कारणरूप तीनों गुण स्वार्थ नहीं हैं । इसमें अनुमानका यह प्रयोग है— गुण परार्थ हैं — संहत्यकारी होनेसे, शय्यादिकी भाँति । इस अनुमानसे — बुद्धिसे अतिरिक्त पुरुष नामक परकी सिद्धि होती है । इस अनुमानकी व्याख्या पूर्व सूत्रमें कर चुके हैं । तदर्थ ही दृश्य है इतना कहनेसे ही निर्वाह हो जाता । धातुका अर्थ जो दर्शन है उसमें अन्वयका भ्रम न हो इसके लिये आत्मपदका प्रयोग किया है । तदर्थत्वमें युक्ति कहते हुए सूत्रकी व्याख्या करते हैं-दृशिरूपस्येति — क्योंकि दृशिरूप पुरुषका जो कर्मके सदृश कर्म - दर्शन, उस दर्शनकी विषयताको प्राप्त हुई वस्तु दृश्य होती है और दर्शन सब वस्तुओंका प्रयोजन है यह बात सर्वसम्मत है, उसीके लिये गुणोंका स्वरूप है । जो वस्तु पर - प्रयोजनके लिये हुआ करती है, वह पर - प्रयोजनके बिना एक क्षण भी नहीं ठहर सकती, नित्य या अनित्य प्रयोजनके बिना किसी भी परार्थ वस्तुकी स्थिति न दीखनेसे वह पुरुषार्थकी सिद्धिका कारण है, यह बात सिद्ध होती है । इस सूत्रसे यह सिद्ध है कि दृश्यकी सत्ता पर - चैतन्यके आधीन है ॥ २१ ॥
सङ्गति — क्या एक पुरुषके प्रयोजनको साधकर यह दृश्य नष्ट हो जाता है? नहीं; क्योंकि-कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २२ ॥
शब्दार्थ — कृतार्थं - प्रति - नष्टम् अपि = जिसका प्रयोजन सिद्ध हो गया है उसके लिये नष्ट हुआ भी; अनष्टम् = ( वह दृश्य ) नष्ट नहीं होता; तद् - अन्य - साधारणत्वात् = क्योंकि वह ( दृश्य ) दूसरोंकी साझेकी है । वस्तु अन्वयार्थ — जिसका प्रयोजन सिद्ध हो गया है उसके लिये यह दृश्य नष्ट हुआ भी नष्ट नहीं होता है; क्योंकि वह दूसरे पुरुषोंके साथ साझेकी वस्तु है । व्याख्या — इस सारे दृश्यकी रचना समस्त पुरुषोंके भोग- अपवर्गके लिये है, न कि किसी विशेषके लिये । इसीलिये जिसका यह प्रयोजन सिद्ध हो गया है उसके लिये यद्यपि इस दृश्यका कार्य समाप्त और नाशके तुल्य हो जाता है, तथापि इसका सर्वथा नाश नहीं हो जाता; क्योंकि एक पुरुषके मुक्त हो जानेसे सब मुक्त नहीं हो जाते । यह दूसरोंके इसी प्रयोजनको साधनेमें लगा रहता है। पुरुष शब्दके अर्थ यहाँ चित्त - प्रतिबिम्बित चिति - शक्ति ( चेतन - तत्त्व ) अर्थात् जीवात्माके हैं । चित्तको बनानेवाले गुणोंका जीवात्माके प्रयोजन भोग और अपवर्गको सम्पादन करनेके हो जाना ही जीवात्माकी मुक्ति ( कैवल्य ) कही जाती है । चित्त पुरुषका दृश्यरूप पश्चात् है अपने कारणमें लीन अन्य सब दृश्योंको पुरुषको बोध करानेका साधन है ॥ वही वृत्तिरूपसे I भी उसके प्रति नष्ट होनेके तुल्य है, किंतु अनन्त जीवोंके एक चित्त चित्तके नष्ट होनेसे उससे दृश्यमान सारा जगत्, अपवर्गका प्रयोजन सिद्ध नहीं किया है अपने विषय सारे दृश्यमान जिन्होंने ( जीवोंके ) उनके प्रति भोग और जगत्सहित वर्तमान रहते हैं । जिस प्रकार आज दृश्य अनष्ट है उसी प्रकार सदा १। १५ ९ में भी ऐसा ही बतलाया गया है- ' इदानीमिव ही अनष्ट था और अनष्ट रहेगा । सांख्य - सूत्र सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः । ' ( ३३७ )
पृष्ठ 363
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २३ शङ्का- - सब चित्तोंके बनानेवाले गुणोंके पुरुषके प्रति भोग और अपवर्गका प्रयोजन सिद्ध करनेके पश्चात् अपने कारणमें लीन हो जानेपर तो यह दृश्य सर्वथा विनष्ट हो जावेगा । समाधान- -ऐसी सम्भावना न करनी चाहिये; क्योंकि पुरुष ( जीवात्मा ) संख्या अनन्त है । असंख्यका कभी शेष नहीं होता । असंख्य - असंख्य = असंख्य । श्रुति भी ऐसा बतलाती है । यथा “ पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ” अर्थात् “ पूर्ण - पूर्ण = पूर्ण ” । इसलिये यह दृश्य अपने स्वरूपसे सदासे था और सदा रहेगा । केवल कृतार्थ पुरुषके प्रति नष्ट होता है । असंख्य पदार्थोंका गणित तत्त्व यह है— असंख्य + असंख्य = असंख्य, असंख्य - असंख्य असंख्य, असंख्य × असंख्य = असंख्य, असंख्य: असंख्य = असंख्य; क्योंकि असंख्यका अधिक या कम नहीं है । टिप्पणी - व्यासभाष्यका भाषानुवाद ॥ सूत्र २२ ॥ कृतार्थ हुए एक पुरुषके प्रति यह दृश्य नष्ट अर्थात् नाशको प्राप्त हुआ भी अन्य पुरुषोंके साझेकी वस्तु होनेसे नाशको प्राप्त नहीं होता । कुशल पुरुषके प्रति नाशको प्राप्त हुआ भी यह दृश्य अन्य अकुशल पुरुषोंके प्रति कृतप्रयोजन नहीं हुआ है । इसलिये उन पुरुषोंकी क्रम विषयताको प्राप्त हुआ यह दृश्य चेतनरूप आत्माके द्वारा निजरूपसे लब्ध सत्तावाला ही होता है । अभावको प्राप्त नहीं होता है । इस कारण ( द्रष्टा ) पुरुष और ( दर्शनशक्ति ) प्रकृतिके नित्य विद्यमान होनेसे इन दोनोंका संयोग अनादि कहा गया है । ऐसा ही पञ्चशिखाचार्यने कहा है धर्मिणामनादिसंयोगाद्धर्ममात्राणामप्यनादिसंयोगः । अर्थात् ( धर्मी ) गुणोंके संयोगके अनादि होनेसे धर्मभूत महत्तत्त्वादिका संयोग भी अनादि है । भोजवृत्ति भाषार्थ सूत्र २२ – यद्यपि विवेकख्यातिपर्यन्त भोग - सम्पादन करना धर्म होनेसे भी यह दृश्य कृतार्थ पुरुषके प्रति नष्ट हो जाता है अर्थात् व्यापार त्याग देता है । तथापि सब पुरुषोंके साधारण अर्थात् साझेकी वस्तु होनेसे अन्यके प्रति अनष्ट व्यापाररूपसे रहता है अतः सम्पूर्ण भोक्ताओंके साधारण होनेसे प्रकृतिकी कृतप्रयोजनता नहीं होती, न कभी उसका नाश होता है । एकके मुक्त होनेसे सब मुक्त नहीं हो जाते, ऐसा शास्त्रका भी सिद्धान्त है । सङ्गति – दृश्यका रूप दिखलाकर अब हेयका हेतु जो दृश्य और द्रष्टाका संयोग है, उसका वर्णन
करते हैं ।
स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥ २३ ॥
शब्दार्थ— स्वस्वामिशक्त्योः = स्व - शक्ति और स्वामी - शक्तिसंज्ञक ( बुद्धि पुरुषके ); स्वरूप-उपलब्धि हेतुः = स्वरूपकी उपलब्धिका जो कारण है; संयोगः = वह ( दृश्य - द्रष्टृका स्व - स्वामिभाव ) संयोगके संयोग है अर्थात् स्वशक्ति और स्वामिशक्तिके स्वरूपकी उपलब्धि ( दृश्य - द्रष्टृके स्व - स्वामिभाव ) वियोगका कारण है । जो कारण है वह अन्वयार्थ – स्व - शक्ति और स्वामी- शक्तिसंज्ञक स्वरूपकी उपलब्धिका शक्तिके स्वरूपकी उपलब्धि ( दृश्य - द्रष्टृका स्व - स्वामिभाव ) संयोग है । अर्थात् कारण स्व - शक्ति है । और स्वामी-( दृश्य - द्रष्टृके स्व - स्वामिभाव ) संयोगके वियोगका पुरुष इसका स्वामी है । शक्ति व्याख्या – चित्त और यह सारा जड दृश्य स्व ( मिल्कियत ) है । चेतन ( ३३८ )
पृष्ठ 364
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः * [ साधनपाद सूत्र २३ ] शब्दका अर्थ स्वभाव या स्वरूप है, दृश्य ज्ञेय है और द्रष्टा ज्ञाता है । दृश्य और द्रष्टा दोनों नित्य और व्यापक हैं, उनका स्वरूपसे भिन्न कोई संयोग नहीं हो सकता । जो दृश्यमें भोग्यत्व और द्रष्टामें भोक्तृत्व है वह अनादिकालसे है । इस दृश्यके भोग्यत्व और द्रष्टाके भोक्तृत्व - भावको ही संयोग नाम दिया गया है । यह संयोग अनादिकालसे चला आ रहा है । इसीके हटानेके हेतु स्वशक्ति और स्वामिशक्तिके स्वरूपकी उपलब्धि की जाती है । अर्थात् स्वशक्ति और स्वामिशक्तिके स्वरूपकी उपलब्धि दृश्यद्रष्टाके स्व - स्वामिभाव संयोगके वियोगका कारण है । यह दृश्यके स्वरूपकी उपलब्धि अर्थात् दृश्य स्वरूपका विवेकपूर्ण साक्षात् करना भोग है और द्रष्टाके स्वरूपकी उपलब्धि अर्थात् पुरुष - दर्शन या स्वरूप - स्थिति अपवर्ग है । गीतामें द्रष्टाको क्षेत्रज्ञ और दृश्यको क्षेत्र तथा सांख्यकारिकामें दृश्यरूप जड प्रकृतिको अन्धे और द्रष्टारूप निष्क्रिय पुरुषको लँगड़ेकी उपमा देकर इनके परस्परके संयोगको दिखलाया है यथा-यावत्संजायते । किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् भरतर्षभ ॥ क्षेत्र क्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि ( गीता १३ | २६ ) हे अर्जुन! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावरजङ्गम वस्तु उत्पन्न होती है, उस सम्पूर्णको तू क्षेत्र ( प्रकृति ) और क्षेत्रज्ञ ( पुरुष ) के संयोगसे ही उत्पन्न हुई जान अर्थात् प्रकृति और पुरुषके परस्परके सम्बन्धसे ही सम्पूर्ण जगत्की स्थिति है ।
पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य ।
पवन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ २१ ॥
( सांख्यकारिका ) पुरुषका दर्शनके लिये और प्रधानका मोक्षके लिये दोनोंका ही लँगड़े और अन्धेकी तरह संयोग है । उससे की हुई ( बनी हुई ) सृष्टि है । यह द्रष्टा - दृश्यका संयोग जैसे अनादि है वैसे अनन्त नहीं है । पुरुष दर्शनपर्यन्त रहता पुरुष - दर्शनसे इसका अभाव हो जाता है । इसलिये पुरुष - दर्शन संयोगके वियोगका कारण है । दर्शन, अदर्शन ( स्वरूप - स्थितिका प्राप्त न होना अर्थात् अविवेक और आसक्तिके साथ चित्तवृत्तियोंका देखना ) का विरोधी है । अतः जैसे दर्शन वियोगका निमित्तकारण है वैसे ही अदर्शन संयोगका निमित्तकारण है । अदर्शनका अभाव ही संयोगरूपी बन्धनका अभाव है, वही अपवर्ग अर्थात् मोक्ष है । दर्शनके होनेपर बन्धनके कारण अदर्शनका नाश हो जाता है । संक्षेपमें स्पष्ट शब्दोंमें सूत्रका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिये । स्वशक्ति और स्वामिशक्तिके स्वरूपकी उपलब्धिका कारण संयोग है अर्थात् संयोग स्वशक्ति और स्वामिशक्तिके स्वरूपकी उपलब्धि की जाती है । स्वशक्ति अर्थात् हटानेके लिये जो भोगरूप है, सम्प्रज्ञात समाधिद्वारा और स्वामिशक्ति अर्थात् पुरुषके दृश्यके स्वरूपकी उपलब्धि है, असम्प्रज्ञात समाधिद्वारा की जाती है । दृश्य और द्रष्टा अर्थात् स्वरूपकी उपलब्धि जो अपवर्गरूप स्व - स्वामि अर्थात् भोग्यत्व और भोक्तृत्व - भाव - सम्बन्ध है वह चित्त और पुरुषका जो आसक्तिपूर्वक बतलाया है । यह संयोग ही वास्तवमें अस्मिता क्लेश २-६ संयोग है । सूत्र १७ में संयोगको हेय - हेतु है । जिसने चित्तरूप - स्व और पुरुषरूप ( ३३ ९ )
पृष्ठ 365
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २३ स्वामीको जड - चेतनके संमिश्रणसे एक नये जीव भावको उत्पन्न किया है । इस संयोगके रहते हुए ही इसी संयोगको हटानेके लिये स्व और स्वामीके स्वरूपकी उपलब्धि की जाती है । टिप्पणी — व्यासभाष्यका भाषानुवाद सूत्र २३ । संयोगके स्वरूपको प्रकाशित करनेकी इच्छासे इस सूत्रकी प्रवृत्ति होती है । पुरुष जो स्वामी है वह अपने दृश्यके साथ दर्शनार्थ संयुक्त है । इस संयोगद्वारा दृश्यके स्वरूपकी जो उपलब्धि है वह भोग और जो द्रष्टाके स्वरूपकी उपलब्धि है वह अपवर्ग है । दर्शन कार्य ( विवेकख्याति ) पर्यन्त संयोग है । इसलिये दर्शनको वियोगका निमित्तकारण कहा है । दर्शन अदर्शनका विरोधी है । इसलिये अदर्शन संयोगका निमित्तकारण कहा गया है । अर्थात् जैसे दर्शन ( विवेकख्याति ) वियोगका कारण है वैसे ही अदर्शन ( अविवेक ) संयोगका कारण है । यहाँ दर्शन मोक्षका कारण नहीं है, ( किंतु ) अदर्शनके अभावसे ही जो बन्धका अभाव होता है वह मोक्ष है । दर्शनके होनेपर बन्धके कारण अदर्शनका नाश हो जाता है । इसलिये दर्शन अर्थात् ( विवेकख्याति ) ज्ञानको कैवल्यका कारण कहा गया है । ( उपर्युक्त कथनका अभिप्राय यह है कि दर्शन अर्थात् ज्ञान = विवेकख्याति अदर्शन अर्थात् अज्ञान = अविवेकका विरोधी होनेसे दर्शन अदर्शनका ही नाश करता है बन्धका नहीं, इसलिये दर्शन साक्षात् मोक्षका कारण नहीं है, किंतु अदर्शननिवृत्तिपूर्वक बन्धनिवृत्तिद्वारा परम्परासे मोक्षका कारण है अर्थात् अदर्शनके अभावसे बन्धका अभाव होता है यहाँ उसीको मोक्ष कहा है और दर्शनके होनेसे ही बन्धके कारण अदर्शनका अभाव होता है, इसलिये इस अभिप्रायसे ही दर्शन कैवल्यका कारण कहा जाता है । कैवल्य साक्षात् ज्ञानजन्य नहीं है । ) अब यहाँपर प्रसङ्गसे यह विचार किया जाता है कि जिस अदर्शन अविद्या, अज्ञानका दर्शन विवेकख्याति - ज्ञानसे अभाव होता है, वह अदर्शन किस स्वरूपवाला है अर्थात् अदर्शन किसका नाम है? ( १ ) क्या गुणोंमें जो कार्योंके आरम्भका सामर्थ्य है उसका नाम अदर्शन है? ( २ ) वा दृशिरूप स्वामीके भोग- अपवर्गरूप अर्थ जिस चित्तने सम्पादन कर दिया है ऐसे चित्तका अनुत्पाद ( फिर उदय न होना ) अर्थात् आत्मदर्शनका अभाव अदर्शन है? ( ३ ) वा गुणोंकी अर्थवत्ता ( चित्तमें भोग- अपवर्गरूप अर्थकी सूक्ष्म अवस्थासे विद्यमानता ) अदर्शन है? जो ( ४ ) अथवा चित्तकी उत्पत्तिका बीजभूत और प्रलयकालमें चित्तके सहित ही प्रकृतिमें लीन विपर्यय ज्ञान वासना है वह अदर्शन है? ( यही पक्ष सिद्धान्त होगा ) अदर्शन ( ५ ) अथवा प्रधानसम्बन्धी स्थिति - संस्कारके क्षय होनेपर गति - - संस्कारकी जो अभिव्यक्ति प्रलयकालीन साम्य है? अर्थात् प्रधानमें दो प्रकारका संस्कार रहता है । एक स्थिति विकारोंका संस्कार आरम्भ है । ऐसा ही.. अवस्थाका कारण है और एक गति - संस्कार जो महत्तत्त्वादि
पञ्चशिखाचार्यनें कहा है-प्रधानं स्थित्यैव वर्तमानं विकाराकरणादप्रधानं स्यात् ।
तथा गत्यैव वर्तमानं विकारानित्यत्वादप्रधानं स्यात् ॥
( ३४० )
पृष्ठ 366
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः * [ साधनपाद सूत्र २३ ] प्रधानव्यवहारं लभते । उभयथा चास्य प्रवृत्तिः नान्यथा कारणान्तरेष्वपि कल्पितेष्वेष समानश्चर्चः ॥ अर्थात् “ प्रधान यदि स्थिति ( गुणोंकी साम्य अवस्था = कारण अव्यक्तरूप ) से वर्ते तो विकारके न करनेसे अप्रधान है और यदि गति ( गुणोंकी विषम अवस्था- कार्य = व्यक्तरूप ) से ही वर्ते तो विकारके नित्य होनेसे अप्रधान है । दोनों तरह इसकी प्रवृत्ति प्रधान नाम पाती है, अन्यथा नहीं, जो और ( आदि ) कारण ( माया, अविद्या, परमाणु ) कल्पना किये गये हैं उनके विषयमें भी यही समान विचार है " एवं गति संस्कारके होनेसे जो महदादिकार्यका आरम्भ है क्या उसका नाम अदर्शन है? ( ६ ) और कोई यह कहते हैं कि " प्रधानस्यात्मख्यापनार्था प्रवृतिः " अर्थात् प्रधानकी प्रवृत्ति अपने स्वरूप ख्यापन ( बोधन ) के अर्थ हैं! इस श्रुतिसे दर्शनशक्ति ही अदर्शन पदका वाच्य है । अर्थात् यद्यपि पुरुष सारे पदार्थोंके ज्ञानमें समर्थ है । तथापि प्रधानकी प्रवृत्तिसे पूर्व पुरुष उनको देख नहीं सकता, सारे कार्य करनेमें समर्थ दृश्य भी उस समय उसे दिखलायी नहीं देता अर्थात् अनुभवका विषय नहीं होता है । अतः प्रधानकी प्रवृत्तिसे जो पुरुषका दर्शन - सामर्थ्य है अर्थात् प्रधानमें जो अनुभव रा शक्ति है क्या उसका नाम अदर्शन है? ( ७ ) कोई यह कहते हैं कि प्रकृति तथा पुरुष – इन दोनोंमें जो परस्पर दर्शन - शक्ति है, वह अदर्शन है । यद्यपि दृश्य जड है और पुरुष असङ्गनिर्धर्मक है, इसलिये दोनोंका ही धर्म दर्शन नहीं हो सकता तथापि चेतनके प्रतिबिम्बसे दृश्यको चेतन - तुल्य होनेसे उस चेतनके प्रतिबिम्बकी अपेक्षासे दृश्यका धर्म दर्शन और बुद्धिरूप दृश्यकी अपेक्षासे पुरुषका धर्म दर्शन जानना । अर्थात् बुद्धि और चेतनका परस्पर अविवेक होनेसे दोनोंका ही जो दर्शन धर्म है वह अदर्शन है । ( ८ ) और कोई यह कहते हैं कि शब्दादि विषयोंका जो ज्ञान है वही अदर्शन है । इस प्रकार अदर्शन ( अविद्या ) के स्वरूप - निरूपणमें आठ प्रकारके सांख्यशास्त्रने विकल्प किये हैं; परंतु यह सब विकल्प सब पुरुषोंके सङ्ग प्रकृति संयोग कारण होनेसे साधारण हैं । अर्थात् यह सब पूर्वोक्त अदर्शन ( अविद्या ) का लक्षण उसीमें रह सकता है जो कि प्रकृति - पुरुषके संयोगद्वारा सारे प्रपञ्चका हेतु है । और जो अविद्या प्रत्येक पुरुषके सङ्गबुद्धि संयोगद्वारा सुख - दुःख - भोगके वैचित्र्य ( विचित्रता ) में हेतु है ( संख्या ४ ) इसका यह लक्षण नहीं अतः यह लक्षण असाधारण है । अर्थात् संयोग दो प्रकारका है, एक सारे संसारका कारण और एक प्रत्येक पुरुषके सुख - दुःख, बन्ध - मोक्षका साधारण संयोगका हेतु जो अदर्शन है उसीके यह सब पूर्वोक्त लक्षण कारण । यहाँ प्रथम ( संख्या ४ ) के ( हेतुभूत अदर्शनके ) नहीं । प्रत्येक पुरुषके सङ्ग असाधारण हैं । द्वितीय बुद्धिसंयोगका असाधारण संयोग अविद्या है उसको अगले सूत्रमें बतलाते हैं । कारण जो भोजवृत्ति भाषार्थ सूत्र २३ – कार्य ( स्वरूपज्ञान ) के द्वारा इस संयोगका दृश्यका स्वरूप ( स्वभाव ) है, स्वामिशक्ति लक्षण करते हैं । स्वशक्ति योग्य और जाननेवालारूप ) से वर्तमानकी द्रष्टाका जो स्वरूप स्वभाव - उपलब्धि ( स्वरूप ) है । इन दोनों ( हेय ज्ञातृरूप जानने-कहलाता है । वह भोग्य - भोक्तृभाव - स्वरूपसे भिन्न और कुछ है उसका जो कारण है वह संयोग भिन्न संयोग और कोई वस्तु नहीं है । जो कि भोग्य ( दृश्य ) नहीं है । इन दोनों नित्य व्यापकोंके स्वरूपसे में भोग्यत्व और भोक्तृ- ( द्रष्टा ) में भोक्तृत्व ( ३४१ )
पृष्ठ 367
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
साधनपाद ] G * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २३ है वह अनादिकालसे है और वही संयोग है । इस संयोगका कारण बतलाते हैं-व्यासभाष्यपर विज्ञानभिक्षुके वार्त्तिकका भाषानुवाद सूत्र २३ द्रष्टा और दृश्यका स्वरूप कह दिया अब उनके संयोगके स्वरूपप्रदर्शक सूत्रको उठाते हैं — संयोगस्वरूपेति — द्रष्टा और दृश्यका सामान्य संयोग हेय ( संसार ) का हेतु नहीं है; क्योंकि सामान्य संयोग तो प्रलय और मोक्ष दोनों दशामें समान ही हैं, अतः संयोगगत विशेषका अवधारण करनेके लिये यह सूत्र प्रवृत्त होता है— स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः– भोग्यताके योग्य होनेसे स्वशक्ति दृश्य है और भोक्तृयोग्य होनेसे स्वामिशक्ति द्रष्टा है; इन दोनोंके स्वरूपकी उपलब्धिका हेतु जो संयोगविशेष है वह ही द्रष्टादृश्यका संयोग, यहाँ हेयका हेतु कहा है । विभुके साथ द्रष्टा और दृश्यका सामान्य संयोग सदा ही रहता है, अतः वह हेयका हेतु नहीं है, यह भाव है । वह संयोगविशेष - बुद्धिद्वारक - दृश्य बुद्धि - सत्त्व उपाधिरूप है, जिसको कि सर्वधर्मा इस भाष्यने कहा है, अतः दृश्यवाली बुद्धिके साथ संयोग ही यहाँ संयोग - विशेष है । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः । इन्द्रियों और मनसे युक्त आत्माको विचारशील भोक्ता कहते हैं । इस प्रकारकी श्रुति आदिसे लिङ्ग देह और आत्माके संयोगसे ही विषयका दर्शन जान पड़ता है, इससे भोक्ता और भोग्यकी योग्यता ही द्रष्टा और दृश्यका अनादिसम्बन्ध संयोग है । ऐसा माननेपर पुरुषमें परिणामिता आ जायगी । ऐसा जो किसीका कथन है, वह ( कथन ) सूत्रके स्वरस ( अभिप्राय ) से ही त्याज्य है । क्योंकि ऐसा होनेपर " स्वस्वामिभावः संयोगः " इस प्रकारका सूत्र होना ही उचित है । सामान्य संयोग एक व्यक्ति अनादि होनेपर तो आगामी दो सूत्रोंसे उत्पत्ति और विनाशवचन संगत न हो सकेंगे? चेतन और अचेतनके अतिरिक्त, प्रतिनियत योग्य - ज्ञानके अवच्छेदकका निरूपण नहीं किया है । वे दोनों ( चेतन - अचेतन ) मोक्षकालमें सामान्य होनेसे हेयके हेतु नहीं हैं । यदि स्वभुक्त वृत्तियोंकी वासनावाली प्रवाहरूपसे वासनाओंकी जो अनादिता है, वही संयोग है — ऐसा कहें; तो भी इस प्रकारके संयोगको जो वक्ष्यमाण भाष्यमें अविद्याकी वासनासे जन्य कहा है, कि संयोगसे वह न घट सकेगा? ऐसे संयोगके त्यागका अनौचित्य भी न बनेगा और जो यह कहा है है; क्योंकि संयोग और पुरुष परिणामी हो जायगा, वह कथन परिणाम लक्षणके अज्ञानसे किया गया धर्मकी विभागमात्रसे आकाश आदिमें परिणामका व्यवहार नहीं होता, अतः सामान्य गुणके संयोग अतिरिक्त और विभाग उत्पत्ति ही परिणाम है — यह बात कही है । अन्यथा प्रतिसर्गमें प्रकृति और पुरुषका विनाश भी न जो श्रुति और स्मृतियोंमें कहे हैं उनसे विरोध होगा, प्रतिसर्गमें योग्यताके और उत्पादन विभागका और ही उत्पादनादि घटेंगे; क्योंकि इससे पुरुषमें परिणामित्व दोष होगा, श्रुतिप्रतिपादित संयोग सोपवर्ग इसतक ( पुरुष स्वामी अपने क्रम उचित है । सूत्रार्थका विवरण करते हैं - पुरुष इत्यादिसे लेकर उपलब्धि भोग है और द्रष्टाके स्वरूपकी दृश्यके साथ दर्शनके लिये संयुक्त होता है, उस संयुक्त दृश्यकी दर्शन सामान्यकी संयोगजन्यताके उपलब्धि अपवर्ग है, ) सूत्रमें स्वरूप पदका प्रयोग, विवेकख्यातिपर्यन्त ' ' तस्य हेतुरविद्या ', इन आगामी दोनों प्रतिपादनके लिये है, अब ' विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ( ३४२ )
पृष्ठ 368
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः * [ साधनपाद सूत्र २३ ] क्रमसे प्रतिपादन करते हैं - दर्शनाकार्येत्यादिसे • सूत्रोंका अर्थ इसी सूत्रने उपपादित कर दिया है, अतः इस कृतकृत्यका प्रयोजन नहीं रहता, अतः उसकी अवस्थिति असम्भव है--अतः दर्शन कार्यका अवसान- द्रष्टाके स्वरूपकी उपलब्धि वियोगका कारण अर्थात् - अन्त होनेतक ही संयोग है । अतः दर्शन-इस सूत्रसे कहनेके लिये उपपादित है । तथा दर्शन अदर्शनका प्रतिद्वन्द्वी है— विरोधी है, अतः अदर्शन -संयोगका हेतु है, यह भी कह दिया अर्थात् सिद्ध कर दिया । दर्शन और अदर्शनके विरोधसे विरुद्ध ही वियोग और संयोगके दोनों कार्य भोग और अपवर्ग उचित ही हैं । शङ्का – अदर्शन संयोगका कारण है तो अदर्शनके अभावसे ही संयोगकी निवृत्तिरूप मोक्ष हो जायगा, तब दर्शनको मोक्षका हेतु किस प्रकार कहा है? समाधान — यहाँ दर्शन मोक्षका कारण है— हमारे शास्त्रमें दर्शन तत्त्वज्ञान मोक्षका कारण नहीं है; क्योंकि इसमें गौरव है, निरोध आदिका व्यवधान होनेसे मोक्षके अव्यवहित पूर्व कालमें नियमसे ज्ञानकी विद्यमानता असम्भव है, किंतु वक्ष्यमाणरूप अदर्शनके अभावसे ही द्रष्टा और दृश्यके संयोगका अभाव होता है और वही मोक्ष है । इससे अनिमित्ततया मोक्ष स्वाभाविक रूपसे नित्य है । यह बात सिद्ध हो जाती हैं । शङ्का — ' विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ' – इस अग्रिम सूत्रसे विरोध है - दर्शन वियोगका कारण है, इस अपने कथनसे भी विरोध है? समाधान – दर्शनस्य भाव इति ( दर्शनके होनेपर बन्धके कारण अदर्शनका नाश होता है, अतः दर्शन - ज्ञान कैवल्यका कारण कहा है ), तथा च तत्त्वज्ञान मोक्षमें प्रयोजनमात्र है, उत्तर सूत्रसे असाधारण संयोगके हेतु अदर्शनका निश्चय करनेके लिये उक्त अदर्शनमें विकल्प करके पूछते हैं — किं चेदमिति — संयोगका कारण जो अदर्शन कहा है वह क्या है? नाम पद वाक्यकी शोभार्थक है, यद्यपि संयोग दर्शनका कारण है, ऐसा सूत्र होनेसे — दर्शनका अनुत्पाद ही संयोगका हेतु है? यह बात उपस्थित होती है, अन्य संयोगका हेतु नहीं है? तो भी उस दर्शनके अनुत्पादके साथ समनियत होनेंसे अन्योंको भी संशयकोटिमें समझना चाहिये । ' १. उनमेंसे प्रथम विकल्प है— क्या सत्त्वादि गुणोंका अधिकार कार्य आरम्भका सामर्थ्य – अदर्शन है? ज्ञानरूप अग्निसे अदग्ध कार्यविशेषकी जननशक्ति जिसका कि अर्थ उससे भी संसारका संयोगविशेष उत्पन्न होता है । द्वितीय विकल्पको छोड़कर सब विकल्पोंमें बन्धके कारण सत्त्वादि हेतु योग होनेसे अदर्शन शब्द गौण है । गुणोंका २. द्वितीय विकल्पको कहते हैं — आहोस्विदिति — ( दृशिरूप स्वामीके दर्शित अनुत्पाद अदर्शन है ) अदर्शन – इसमें दर्शन शब्दका कारण विषयप्रधान चित्तका करनेके लिये ‘ “ दृशिरूपस्य स्वामिन: दर्शितविषयस्य " यह चित्तका साधनत्व ( दृश्यते अनेन ) प्रतिपादन दर्शितो विषयो येन तस्य चित्तस्य – दृशिरूपस्वामिके लिये विशेषण है, दृशिरूपाय – स्वामिने दृशिरूप स्वामीके लिये दर्शित है विषय जिस दर्शित विषय चित्तका ( अनुत्पाद ) ( तात्पर्य ) ( भाष्यकार ) विवरण करते हैं— स्वस्मिन्निति चित्तसे – अपने उस चित्तका अनुत्पादन अदर्शन है? इस कहे हुएका वृत्तिरूप है । उसमें सत्त्व पुरुषकी अन्यता चित्तमें पुरुषार्थरूपसे जो दृश्य है, शब्दादि है ( क्या वह अदर्शन - वृत्तिके हो जानेपर –जो दर्शनका अभाव अभाव है ) मोक्षकालीन दर्शनके अभावकी व्यावृत्तिके चित्तवृत्तिका लिये — सतितकके शब्दोंका प्रयोग ( ३४३ )
पृष्ठ 369
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २३ है । संयोगका अहेतु होनेसे इस प्रकारका अदर्शन तो विचारणीय नहीं है, चित्तमें पुरुषार्थकी सत्ता होनेपर ही अदर्शन संयोगका हेतु होता है । यह भाव है । ३. व्यर्थ होनेसे द्वितीय विकल्पके विशेष्य भागके परित्यागमात्रसे तृतीय विकल्पको कहते हैं — किमर्थवत्तेति — सत्कार्यकी सिद्धिसे भावि भोग और अपवर्ग नामक जो अव्यपदेश्य हैं उनका अपने कारण गुणोंमें अवस्थान अदर्शन है । ४. चतुर्थ विकल्पको कहते हैं - अत्राविद्येति – पाँच पर्ववाली अविद्या प्रलयकालमें अपने चित्तके -साथ गुणोंमें लीन हुई वासनारूपसे ( रहती है ) उनके आश्रय चित्तकी उत्पत्तिका बीज ( अदर्शन है ) तथा च - - अविद्याकी वासना ही अदर्शन है । यह ही पक्ष सिद्धान्त होगा । ५. पञ्चम विकल्पको कहते हैं - किं स्थिति इति — प्रधाननिष्ठ असाम्य परिणामके हेतु स्थितिसंस्कारके क्षय हो जानेपर, गतिसंस्कार जो कि महदादिरूप विसदृश परिणामका हेतु है उसकी अभिव्यक्ति अदर्शन है । उस गतिसंस्कारकी अभिव्यक्तिसे ही प्रकृतिमें क्षोभके द्वारा पुरुष और प्रकृति-संयोग उत्पन्न होता है । उन दोनों संस्कारोंके सद्भावमें मतान्तरका प्रमाण देते हैं — यत्रेदमुक्तम् स्थित्यै और गत्यै — यह तादर्थ्यमें चतुर्थी विभक्ति है एवंकारका दोनोंके पीछे अध्याहार करना चाहिये । स्थित्यैव - ऐसा पाठ हो तो विशेषणमें तृतीया विभक्ति समझनी चाहिये । तथा च प्रधान यदि स्थितिमात्रसे ही वत तो विकारका जनक न होनेसे प्रधान ही न रहेगा; क्योंकि मूलकारणत्व ही प्रधानत्व है, और यदि गतिमात्रसे ही वर्ते तब महदादि भी प्रकृतिके समान नित्य हो जायँगे, तब कौन किसका मूल है - यह व्यवहार ही असम्भव हो जायगा, अतः दोनों प्रकारसे ही स्थिति और गति दोनों रूपसे ही प्रधानका अवस्थान प्रधान व्यवहारके योग्य है । कार्य होनेसे महदादिमें प्रधान व्यवहार नहीं होता । केवल मूल कारणमें ही स्थिति और गतिका कालभेदसे निर्णायक विचार नहीं है, किंतु कल्पित विकाररूप कारणके भेदोंमें भी महदादिमें चर्चा - विचार समान हैं - इस बातको प्रसङ्गसे भी निर्धारण करते हैं— नास्तिकोंके अकुर्वद्रूपतावादका निराकरण करनेके लिये – कारणान्तरेष्वपीति – वह चर्चा – यथा मृत्तिका आदि, यदि स्थितिसे ही या निवृत्तिसे ही वर्ते तो — कभी भी घटके उत्पन्न न करनेसे उसके कारणत्वकी हानि होगी।यदि गतिसे ही ( प्रवृत्तिसे ही ) वर्ते तब भी मिट्टी और घट एक कालमें होनेसे नहीं कार्यकारणकी होता । व्यवस्था न हो सकेगी । अतः विकाररूप कारण भी स्थिति और गति दोनोंवाला - कारण जो क्षमता ६. षष्ठ विकल्पको कहते हैं- दर्शनशक्तिरेवेति - पुरुषके लिये अपनेको दिखलानेकी हेतु “ है, वह दर्शनशक्ति है, वही अदर्शन है और यह शक्ति विवेकख्यातिके अनुत्पादरूपी दर्शनार्थं कैवल्यार्थं संयोगका तथा है- कहा है— द्रष्टाहमित्युपरमत्यन्या इति पुरुषस्य –तथा सांख्यकारिकामें कारण प्रकृति उपरत हो जाती प्रधानस्य पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः - सर्गः - मैं देखी गयी हूँ समान इस दोनोंका ही संयोग होता है, है पुरुषके दर्शनार्थ और प्रधानके - कैवल्यार्थ – लँगड़े और अन्धेके विकल्पमें स्थित शब्द आदि और उस संयोगसे किया हुआ — बनाया हुआ यह सर्ग - सृष्टि है दर्शन । तृतीय शक्ति होनेमें श्रुतिको प्रमाण देते वृत्तिके अनुत्पादके त्यागसे इस छठे विकल्पका भेद है श्रुति । प्रधानकी है । हैं — प्रधानस्येति — कालगतिसे लुप्त शाखाकी यह अवभाससे इसतकसे, सर्वबोध समर्थ भी ७. सप्तम विकल्पको कहते हैं - सर्वबोध्य इससे लेकर ( ३४४ ).
पृष्ठ 370
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* तस्य हेतुरविद्या [ साधनपाद * सूत्र २४ ] पुरुष प्रधानकी प्रवृत्तिसे पहले नहीं देखता, इससे एक अदर्शन पुरुषनिष्ठ है – और दूसरा सब कार्यो क उत्पादनमें समर्थ स्वरूप योग्य भी दृश्य – प्रधानत्व प्रधानकी प्रवृत्तिसे पूर्व पुरुषको दिखलायी नहीं देता. वह दृश्यनिष्ठ अदर्शन है — इस प्रकार दोनों प्रकृति और पुरुषका अदर्शन धर्म है । यह कोई कहते हैं — यह भी ' अदर्शन है ' यह वाक्य- शेष है । शङ्का —जड अदर्शनात्मक है उसका धर्म अदर्शन कैसे हो सकता है; क्योंकि अभाव अधिकरणरूप होता है — अव्यभिचार होनेसे लाघवतया एकत्व सिद्ध है - और दृशिरूप पुरुषका भी अदर्शनरूप कैसे घटता है; क्योंकि प्रकाशरूपका अप्रकाशरूप होना असम्भव है समाधान — उन दोनों अदर्शनोंमेंसे यह एक अदर्शन दृश्य स्वरूपभूत भी दृश्यधर्मत्वसे विशिष्ट होता है, इसमें हेतु है पुरुषप्रत्ययापेक्ष, दृश्य प्रत्ययकी अपेक्षा करके – दृश्यगोचर प्रत्ययके अभावसे — यह अर्थ है । ८. अष्टम विकल्पको कहते हैं — दर्शनज्ञानमिति - ज्ञान- - वासनारूप है वह भी दृश्यके संयोगका हेतु है — भोगापवर्गरूप – अनागतावस्था दर्शन यहाँ नहीं कहा है; क्योंकि अर्थवत्तासे पुनरुक्ति दोष हो जाता । उपसंहार करते हैं — इत्यतः इति – शास्त्रोंमें ये अज्ञानके भेद तान्त्रिकों — दर्शनकारोंने कहे हैं 1 संयोगके भेदसे सब ही अदर्शनोंकी हेतुताको सिद्धान्त बनाते हुए ही संयोगविशेषके हेतु अदर्शन विषयपरक उत्तर सूत्रको उतारते हैं । तत्र विकल्पेति — उस अदर्शनमें विकल्प बहुत हैं- भेद बहुत हैं, ये पुरुष सामान्य और गुण सामान्यके पुरुषार्थके हेतुके संयोग सामान्यके प्रति कारणतामें हैं यह जानना चाहिये । जो प्रत्येक चेतनका तत् - तत् चेतनका अपनी बुद्धिके साथ संयोग है वह हेयका हेतु है- — यह बात स्व - स्वामि इत्यादि प्रकृत सूत्रने कही है । तस्य हेतुरविद्या - चतुर्थ विकल्परूप अदर्शन ही- - -इस S सूत्रके साथ अन्वय ( मेल खाता ) है । प्रत्यक् चेतनस्य – इस पाठमें स्व - स्व बुद्धिके अनुगमशील चेतनका — यह अर्थ है । भाव यह है— अविद्याक्षयके बाद भी जीवन्मुक्तके भोगार्थ विषयरूपसे परिणत गुणोंके साथ संयोग उत्पन्न होता है— अतः अविद्या गुण और पुरुषके सामान्य संयोगका हेतु नहीं किंतु यथोक्त गुणोंका अधिकार ही संयोगकाहेतु है । स्वबुद्धिके साथ संयोग तो जन्म जिसका दूसरा नाम है उस अविद्याके बिना नहीं होता है, अतः बुद्धि और गुणोंके संयोगका असाधारण कारण है — वही बुद्धि ( अविद्या ) संयोगके द्वारा द्रष्टा और दृश्यके संयोगकी हेतु विद्यासे उच्छेद्य अविद्या ही योग्य है, इस आशयसे वह ही उत्तर सूत्रने — काटने सूचित किया हैं — गुणोंके अधिकार आदि नहीं कहे; क्योंकि उनका ज्ञानसे उच्छेद नहीं होता । एक पुरुषके मुक्त हो जानेपर भी दूसरे ज्यों - का - त्यों बना रहता है, जो पुरुषसे काटा जा सकता है पुरुषोंके लिये गुणोंका अधिकार प्रतिपादनीय विषय है, अन्यथा – काल, कर्म, ईश्वर आदि ( जो वही हेयका निदान —हेतु इस शास्त्रका हैं ) वे भी यहाँ प्रतिपादनका विषय बन जायँगे ॥ २३ ॥ कि सब कार्योंके प्रति सामान्य कारण
सङ्गति — अगले सूत्रमें अदर्शनरूपी संयोगका कारण बताते हैं— तस्य हेतुरविद्या ॥ २४ ॥
शब्दार्थ —— तस्य हेतुः: -इस अदर्शनरूपी संयोगका कारण; अविद्या = अविद्या है । ( ३४५ )