पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 381–390
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 381–390
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ ९ और अभिनिवेश क्लेश राग - द्वेष तनु हो जाते हैं । २. नियम — नियमोंका सम्बन्ध केवल अपने व्यक्तिगत है, इसलिये इनके यथार्थ पालनसे अपनी व्यक्तिसे सम्बन्ध शरीर, इन्द्रियों तथा अन्तःकरणके साथ होता राजसी, तामसी, विक्षेप और आवरणरूप मलोंसे धुलकर सात्त्विक रखनेवाला , पवित्र सारा और बाह्य व्यावहारिक जीवन दिव्य बन जाता है । ३. आसन — आसनका सम्बन्ध शारीरिक क्रियासे है । इसके द्वारा अस्थिरता और तमरूप आलस्य और प्रमाद हटकर शरीरमें सात्त्विक प्रकाश शरीरकी और दिव्यता रजरूप चञ्चलता और उत्पन्न होती है । ४. प्राणायाम - प्राणायामद्वारा प्राणकी गतिको रोककर अथवा धीमा करके शरीरकी आन्तरिक ( प्राण ) को सात्त्विक ( दिव्य ) बनाया जाता है गति ५. प्रत्याहार — प्रत्याहारद्वारा इन्द्रियोंको आलस्य और प्रमादरूप तमस् और बहिर्मुखतारूप रजस्से शून्य करके इनको सात्त्विकरूपमें चित्तके साथ अन्तर्मुख करके दिव्य बनाना होता है । ६. धारणा — धारणाद्वारा चित्तके मूढ़ और क्षिप्तरूप तमस् और रजस्को हटाकर उसको सात्त्विकरूपमें वृत्तिमात्रसे किसी एक विषयमें ठहराकर दिव्य बनाना होता है । ७. ध्यान — जिस विषयमें चित्तको वृत्तिमात्रसे ठहराया है, उस वृत्तिको अस्थिर करनेवाले रजस् और प्रमाद उत्पन्न करनेवाले तमस्को हटाकर चित्तको उस सात्त्विक ( दिव्य ) रूपसे लगातार उस एक वृत्तिमें ही ठहराना होता है । ८. समाधि - जिस विषयमें चित्तको वृत्तिमात्रसे ध्यानमें अविच्छिन्नताके साथ लगाया है, उस ध्येयाकार वृत्तिको जो रजस् ध्यान और ध्यातृरूप आकारतामें ले जा रहा है और तमस् जो उस ध्यान और ध्यातृरूप आकारताको रोके हुए है, उस लेशमात्र रजस् और तमस्को भी हटाकर समाधिमें चित्तका उस सात्त्विक ( दिव्य ) रूपमें ध्यातृ और ध्यानसे शून्य - जैसा होकर केवल ध्येयाकाररूपसे भासना होता है । इन आठों अङ्गोंमेंसे पहले पाँच योगके बहिरङ्ग साधन कहलाते हैं । उसमें उनका सीधा सम्बन्ध नहीं होता और अन्तिम तीन इसलिये अन्तरङ्ग साधन कहलाते हैं; क्योंकि जिस विषयमें समाधि लगायी जाती है, वे उसीको लेकर चलते हैं; किंतु ये तीनों भी असम्प्रज्ञात समाधिके बहिरङ्ग साधन हैं । उसका अन्तरङ्ग साधन परवैराग्य है, जिसके द्वारा आत्माको चित्तसे भिन्न साक्षात् करानेवाली विवेकख्यातिरूप सात्त्विक वृत्ति जो अष्टाङ्गयोगकी सीमा है उसका भी निरोध होकर शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति होती है । अविद्या और अस्मितादि क्लेश, धारणा, ध्यान और समाधिमें तनु होकर विवेकख्यातिरूप अग्निमें दग्धबीजतुल्य हो जाते हैं और असम्प्रज्ञात समाधिद्वारा धर्मी चित्तके अपने कारणमें लीन होनेसे उनका भी लय हो जाता है । अष्टाङ्गयोगमें निचली भूमियोंको सात्त्विक बनाते हुए ऊँची भूमियोंमें आरोह ( होती Ascent है । ) उन होता ऊँची है । उन ऊँची भूमियोंकी सात्त्विकताकी अधिकताके अनुसार ही दिव्यताकी नीची वृद्धि भूमियोंको सात्त्विक और भूमियोंकी सात्त्विकता और दिव्यताको लेकर अवरोह ( Descent ) में और दिव्यताको लेकर ऊँची दिव्य बनाया जाता है और फिर उन नीची भूमियोंकी उस सात्त्विकता और ऊँची सारी ही भूमियाँ, भूमियोंको आरोहद्वारा सात्त्विक और दिव्य बनाया जाता है । इस प्रकार सात्त्विक नीची और दिव्य बन जाता है । सारे और उनकी क्रियाएँ अर्थात् बाह्य- आभ्यन्तर सारा ही जीवन . अङ्ग ( ३५६ )
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* सूत्र २ ९ ] * यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि [ साधनपाद चाहिये वरं आरम्भसे ही एक इन अङ्गका पृथक् - पृथक् साधनेका विधान न समझना साथ सब अङ्गोंको साधना चाहिये; क्योंकि जिस प्रकार निचले करनेमें अङ्ग ऊपरवाले होते हैं अङ्गोंकी । ध्यान सहायता और समाधि करते हैं, इसी प्रकार ऊपरवाले अङ्ग निचले अङ्गोंकी दृढ़ भूमि सहायक धारणाकी -ही ऊँची अवस्थाएँ हैं । अतः आरम्भमें केवल धारणाका ही यत्न हो सकता हैI टिप्पणी- ( सूत्र २ ९ ) बौद्धदर्शन – बौद्धधर्ममें ' हानोपाय स्थानमें चतुर्थ आर्य ' के ‘ दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपद् ’, - ‘ अष्टाङ्गयोग ' के स्थानमें ' अष्टाङ्गिक मार्ग ' और ' पाँच यमों ' के स्थानम ‘ पञ्चशील ’ बतलाये गये हैं । यमोंमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तो समान हैं, केवल योगदर्शनके अपरिग्रह यमके स्थानमें बौद्धधर्ममें मद्यका निषेध बतलाया गया है । पाठकोंकी अधिक जानकारी के लिये बौद्ध - धर्मके उन सिद्धान्तोंको कुछ विस्तारके साथ बतला देना उचित प्रतीत होता है । दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपद् – ' प्रतिपद् ' का अर्थ मार्ग है । यह चतुर्थ आर्यसत्य दुःख - निरोधतक पहुँचानेवाला मार्ग है । निर्वाण प्रत्येक प्राणीका गन्तव्य स्थान है । उसतक पहुँचानेवाले मार्गका नाम ' अष्टाङ्गिक मार्ग ' है । आठ अङ्ग ये हैं— ( १ ) सम्यक् दृष्टि ( २ ) सम्यक् संकल्प प्रज्ञा ( ३ ) सम्यक् वाचन ( ४ ) सम्यक् कर्मान्त ( ' ५ ) सम्यक् आजीविका शील ( ६ ) सम्यक् व्यायाम ( ७ ) सम्यक् स्मृति समाधि ( ८ ) सम्यक् समाधि अष्टाङ्गिक मार्ग — यह मार्ग बौद्धधर्मकी आचार -मीमांसाका चरम साधन है । इस मार्गपर चलनेसे प्रत्येक व्यक्ति अपने दुःखोंका हठात् नाश कर देता है तथा निर्वाण प्राप्त कर लेता है । इसलिये ( अष्टाङ्गयोगके सदृश ) यह समस्त मार्गोमें श्रेष्ठ माना गया है । जेतवनके पाँच सहस्र भिक्षुओंको उपदेश देते समय भगवान् बुद्धने अपने श्रीमुखसे इसी मार्गको ज्ञानकी विशुद्धिके लिये तथा मारको मूर्छित करनेके लिये आश्रयणीय बतलाया है-मग्गानट्ठङ्गिको सेट्ठो सच्चानं चतुरो पदा । विरागो सेट्ठो धम्मानं द्विपदानाञ्च एसो व मग्गो नत्थंञ्जोदस्सनस्स विसुद्धिया । एतंहि तुम्हे पटिपञ्जथ मारस्सेतं चक्खुमा ॥ ( मार्गाणामष्टाङ्गिकः श्रेष्ठः सत्यानां चत्वारि पदानि । पमोहनं ॥ विरागः श्रेष्ठो धर्माणां एष एव मार्गो नास्त्यन्यो द्विपदानां दर्शनस्य च चक्षुष्मान् ॥ विशुद्धये । एतं हि यूयं प्रतिपद्यध्वं मारस्यैष प्रमोहनः ॥ ) ) ( धम्मपद २० । १-२ ( ३५७ )
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप ** [ सूत्र २ ९ अर्थात् निवार्णगामी मार्गोंमें अष्टाङ्गिक मार्ग श्रेष्ठ है । लोकमें है । सब धर्मोंमें वैराग्य श्रेष्ठ है और मनुष्योंमें चक्षुष्मान् ज्ञानी बुद्ध जितने श्रेष्ठ है । सत्य ज्ञानकी हैं, विशुद्धिके उनमें आर्यसत्य श्रेष्ठ मारको मूर्छित करनेके लिये यही मार्ग लिये तथा ( अष्टाङ्गिक मार्ग ) आश्रयणीय है । अष्टाङ्गिक मार्गका विशिष्ट रूप ( १ ) सम्यक् दृष्टि – ' दृष्टि ' का अर्थ ज्ञान है I । सत्कार्यके लिये ज्ञानकी भित्ति आवश्यक आचार और विचारका परस्पर सम्बन्ध नितान्त घनिष्ठ होता है । विचारकी भित्तिपर आचार खड़ा होती है । इसलिये इस आचार - मार्गमें सम्यक् दृष्टि पहला अङ्ग मानी गयी है । जो व्यक्ति अकुशलको होता तथा है । अकुशलमूलको जानता है, कुशलको और कुशलमूलको जानता है, वही सम्यक् दृष्टिसे सम्पन्न माना जाता है । कायिक, वाचिक तथा मानसिक कर्म दो प्रकारके होते हैं— कुशल ( भले ) और अकुशल ( बुरे ) – इन दोनोंको भली प्रकार जानना ' सम्यक् दृष्टि ' कहलाती है । ' मज्झिमनिकाय ' में इन दोनोंका वर्णन निम्न प्रकार है-अकुशल कुशल ( १ ) प्राणातिपात ( हिंसा ) काय कर्म ( १ ) अ - हिंसा ( २ ) अदत्तादान ( चोरी ) ( २ ) अ - चौर्य ( ३ ) मिथ्याचार ( व्यभिचार ) ( ३ ) अ - व्यभिचार वाचिक कर्म ( ४ ) मृषा वचन ( झूठ ) ( ४ ) अ - मृषा वचन ( ५ ) पिशुन वचन ( चुगली ) ( ५ ) अ - पिशुन वचन ( ६ ) अ - कटुवचन ( ६ ) परुष वचन ( कटुवचन ) ( ७ ) सम्प्रलाप ( बकवाद ) ( ७ ) अ - सम्प्रलाप ( ८ ) अ - लोभ ( ८ ) अभिध्या ( लोभ ) मानस कर्म ( ९ ) व्यापाद ( प्रतिहिंसा ) ( ९ ) अ - प्रतिहिंसा ( १० ) अ - मिथ्या दृष्टि ( १० ) मिथ्या दृष्टि ( झूठी धारणा ) अकुशलका मूल है लोभ, दोष तथा मोह I । इनसे विपरीत कुशलका मूल है अलोभ, अदोष तथा अमोह । इन कर्मोंका सम्यक् ज्ञान रखना आवश्यक है । साथ - ही - साथ आर्यसत्यों — दुःख, दुःखसमुदाय, दुःखनिरोध तथा दुःखनिरोधमार्गका भलीभाँति जानना भी सम्यक् दृष्टि है । है । निश्चय ( २ ) सम्यक् संकल्प – सम्यक् निश्चय । सम्यक् ज्ञान होनेपर ही सम्यक् निश्चय होता । अतः निष्कामताका, अद्रोहका तथा अहिंसाका होना चाहिये । कामना ही समग्र दुःखोंकी उत्पादिका है प्रत्येक पुरुषको इन बातोंका दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि वह विषयकी कामना न करेगा, प्राणियोंसे द्रोह न करेगा और किसी भी जीवकी हिंसा न करेगा । बकवाद इन सबको छोड़ ( ३ ) सम्यक् वचन — ठीक भाषण । असत्य, पिशुनवचन, कटुवचन तथा वचनोंसे दूसरेके हृदयको चोट देना नितान्त आवश्यक है । सत्यसे बढ़कर अन्य कोई धर्म नहीं है । जिन नहीं कहना चाहिये । वैरकी पहुँचे, जो वचन कटु हो, दूसरेकी निन्दा हो, व्यर्थका बकवाद हो, उन्हें कभी ( ३५८ )
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सूत्र २ ९ ] यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि * * [ साधनपाद शान्ति कटुवचनोंसे नहीं होती, प्रत्युत ' अवैर ' से ही होती है—
नहि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं । अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो ॥
( न हि वैरेण वैराणि साम्यन्तीह कदाचन । अवैरेण च शाम्यन्ति एष धर्मः सनातनः ॥ ) ( धम्मपद १।५) व्यर्थके पदोंसे युक्त सहस्रों काम भी निष्फल होते हैं । एक सार्थक पद ही श्रेष्ठ होता है, जिसे सुनकर शान्ति उत्पन्न होती है । शान्तिका उत्पन्न करना ही वाक्यप्रयोगका प्रधान लक्ष्य है । जिस पदसे इस उद्देश्यकी सिद्धि नहीं होती, उसका प्रयोग नितान्त अयुक्त है-सहस्समपि चे वाचा अनत्थपदसंहिता । एकं अत्थपदं सेय्यो युं सुत्त्वा उपसम्मति ॥ ( सहस्रमपि चेद् वाचो अनर्थपदसंहिताः । एकमर्थपदं श्रेयो यच्छ्रुत्वोपशाम्यति ॥ ) ( धम्मपद ८ । १ ) ( ४ ) सम्यक् कर्मान्त – मनुष्यकी सद्गति या दुर्गतिका कारण उसका कर्म ही होता हैं । कर्मके ही कारण जीव इस लोकमें सुख या दुःख भोगता है तथा परलोकमें भी स्वर्ग या नरकका गामी बनता है । हिंसा, चोरी, व्यभिचार आदि निन्दनीय कर्मोंका सर्वदा तथा सर्वथा परित्याग अपेक्षित है । इन्हींकी संज्ञा पञ्चशील है । पञ्चशील ये हैं— अहिंसा, सत्य, अस्तेय, -मैरेय आदिका- पदार्थोंका ब्रह्मचर्य, सुरा - मे -मादक असेवन । इन कर्मोंका अनुष्ठान सबके लिये विहित है । इनका सम्पादन तो करना चाहिये, परंतु इनका परित्याग करनेवाला व्यक्ति धम्मपदके शब्दोंमें ' मूलं खनति अत्तनो ' अपनी ही जड़ खोदता है— यो पाणमतिपातेति मुसावादैच भासति I । लोके अदिन्नं अदियति परदारञ्च गच्छति ॥
सुरामैरेयपानं च यो नरो अनुयुञ्जति । इधेवमेसो लोकस्मि मूलं खनति अत्तनो ॥
( यः प्राणमतिपातयति मृषावादं च भाषते । लोकेऽदत्तमादत्ते परदारांश्च गच्छति ॥
सुरामैरेयपानं च यो नराऽनुयुनक्ति । इहैवमेष लोके मूलं खनत्यात्मनः ॥ ) ( धम्मपद १८ । १२-१३ ) आत्मविजय — अपने ऊपर विजय पाना ही मानवकी अनन्तशान्तिका चरम साधन है । आत्मदमन इन कर्मोंका विधान चाहता है । ' आत्मा ही अपना नाथ – स्वामी है । अपनेको छोड़कर अपना स्वामी दूसरा नहीं । अपनेको दमन कर लेनेपर ही दुर्लभ नाथ - ( निर्वाण ) को जीव ' अत्ता हि अत्तनो नाथो को हि नाथो परो सिया । अत्तनो व सुदन्तेन नाथं पाता लभति है '. ( आत्मा हि आत्मनो नाथः को हि नाथः परः स्यात् । आत्मनैव सुदान्तेन नाथं लभते दुल्लभं दुर्लभम् ॥ || * ) ( धम्मपद १२ ।४ ) भिक्षुओंके लिये तो आत्मदमनके नियमोंमें बहुत कड़ाई है । इन सार्वजनीन कर्मोंके अतिरिक्तउन्हें * यह आत्मविजयका सिद्धान्त वैदिक धर्मका मूलमन्त्रहै— उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ॥ आत्मैव अनात्मनस्तु ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ( गीता ) ( ३५ ९ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २ ९ पाँच कर्म — अपराह्ण - भोजन, माला - धारण, संगीत, सुवर्ण तथा अमूल्य शय्याका है । इन्हें ही ‘ दशशील ’ कहते हैं । भिक्षुओंके निवृत्तिप्रधान जीवनको आदर्श बनानेके त्याग और भी कर्तव्य अन्य कर्मोंको भी आवश्यक बतलाया है, जिनका लिये भगवान् बुद्धने उल्लेख ' विनयपिटक ' में किया गया है I ( ५ ) सम्यक् आजीव ( जीविका ) – झूठी जीविकाको छोड़कर सच्ची जीविकाके द्वारा शरीरका करना । बिना जीविकाके जीवन धारण करना असम्भव है । मानवमात्रको शरीर - रक्षणके पोषण कोई - न - कोई जीविका ग्रहण करनी ही पड़ती है, परंतु यह जीविका सच्ची होनी चाहिये जिससे लिये प्राणियोंको न तो किसी प्रकारका क्लेश पहुँचे और न उनकी हिंसाका अवसर आये । समाज दूसरे समुदायसे बना है । यदि व्यक्ति पारस्परिक कल्याणकी भावनासे प्रेरित होकर अपनी जीविका व्यक्तियोंके अर्जन करनेमें लगे तो समाजका वास्तविक मङ्गल होता है । उस समयके व्यापारोंमें बुद्धने निम्न पाँच जीविकाओंको हिंसाप्रवण होनेके कारणसे अयोग्य ठहराया है- ( १ ) सत्थवणिज्जा ( शस्त्र- हथियारका व्यापार ), ( २ ) सत्तवणिज्जा ( प्राणीका व्यापार ), ( ३ ) मंसवणिज्जा ( मांसका व्यापार ), ( ४ ) मज्जवणिज्जा ( मद्य = शराबका व्यापार ), ( ५ ) विसवणिज्जा ( विषका व्यापार ) । ' लक्खण सुत्त ' ३ में बुद्धने निम्न जीविकाओंको गर्हणीय बतलाया है - तराजूकी ठगी, कंस ( बटखरे ) की ठगी, मानकी ( नापकी ) ठगी, रिश्वत, वञ्चना, कृतघ्नता, साचियोग ( कुटिलता ), छेदना, वध, बन्धन, डाका - लूट - पाटकी जीविका । ( ६ ) सम्यक् व्यायाम — ठीक प्रयत्न, शोभन, उद्योग, सत्कर्मोंक करनेकी भावना करनेके लिये प्रयत्न करते रहना चाहिये । इन्द्रियोंपर संयम, बुरी भावनाओंको रोकने और अच्छी भावनाओंके उत्पादन करनेका प्रयत्न, उत्पन्न हुई अच्छी भावनाओंको कायम रखनेका प्रयत्न - ये सम्यक् व्यायाम हैं । बिना प्रयत्न किये, चञ्चल चित्तसे शोभन भावनाएँ दूर भागती हैं और बुरी भावनाएँ घर जमाया करती हैं । अतः यह उद्योग आवश्यक है । ( ७ ) सम्यक् स्मृति — इस अङ्गका विस्तृत वर्णन ' दीर्घ निकाय ' के ' महासति पट्ठान ' सुत्त ( २।९ ) में किया गया है । स्मृतिप्रस्थान चार हैं - ( १ ) कायानुपश्यना, ( २ ) वेदनानुपश्यना, ( ३ ) चित्तानुपश्यना तथा ( ४ ) धर्मानुपश्यना । काय, वेदना, चित्त तथा धर्मके वास्तविक स्वरूपको जानना तथा उसकी स्मृति सदा बनाये रखना नितान्त आवश्यक होता है । काय मलमूत्र, केश तथा नख आदि पदार्थोंका समुच्चयमात्र है । शरीरको इन रूपोंमें देखनेवाला पुरुष ' काये कायानुपश्यी ' कहलाता है । वेदना तीन प्रकारकी होती है— सुख, दुःख, न सुख न दुःख । वेदनाके इस स्वरूपको जाननेवाला व्यक्ति ‘ वेदनामें वेदनानुपश्यी ' कहलाता है । चित्तकी नाना अवस्थाएँ होती हैं — कभी वह सराग़ होता है, कभी विराग; कभी सद्वेष और कभी वीतद्वेष; कभी समोह तथा कभी वीतमोह । चित्तकी इन विभिन्न अवस्थाओंमें उसकी जैसी गति होती है, उसे जाननेवाला पुरुष ' चित्तमें चित्तानुपश्यी ' होता है । धर्म भी नाना प्रकारके हैं— ( १ ) नीवरण - कामच्छन्द ( कामुकता ), व्यापाद ( द्रोह ), स्त्यानमृद्ध ( शरीर - मनकी आलसता ), औद्धत्य - कौकृत्य ( उद्वेग - खेद ) तथा चिकित्सा ( संशय ), ( २ ) स्कन्ध, ( ३ ) आयतन, ( ४ ) बोध्यग, ( ५ ) आर्य चतुःसत्य । इनके स्वरूपको ठीक - ठीक जानकर उनको उसी रूपमें जाननेवाला पुरुष ‘ धर्ममें धर्मानुपश्यी ' कहलाता है । सम्यक् समाधिके निमित्त इस सम्यक् स्मृतिकी ( ३६० )
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सूत्र २ ९ ] यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि * * [ साधनपाद विशेष आवश्यकता है । काय तथा वेदनाका जैसा स्वरूप है, उसका स्मरण सदा बनाये रखनेसे आसक्ति नहीं उत्पन्न होती । चित्त अनासक्त होकर वैराग्यकी ओर बढ़ता है तथा एकाग्रताकी योग्यता सम्पादन करता है । ( विशेष विवरणके लिये देखो ' दीर्घनिकाय ' हिंदी अनुवाद पृष्ठ १ ९०–१९ ८ ) ' हानोपायः तथा ऋते ' उपनिषद् ' ( ८ ) सम्यक् समाधि — योगदर्शन विवेकख्यातिरविप्लवा ज्ञानान्न मुक्तिः ' ( ज्ञानके बिना मुक्ति नहीं मिलती ) के सदृश बौद्धधर्ममें ज्ञानको निर्वाण - कैवल्य - मुक्तिका मुख्य साधन माना है । ज्ञानकी उत्पत्ति तबतक नहीं हो सकती, जबतक उसे धारण करनेकी योग्यता शरीरमें पैदा नहीं होती । ज्ञानके उदयके लिये शरीरकी शुद्धि नितान्त आवश्यक है । इसलिये अष्टाङ्गयोगके अनुसार ही बुद्ध भगवान्ने शील और समाधिके द्वारा क्रमशः कायशुद्धि और चित्तशुद्धिपर विशेष जोर दिया है । बुद्ध - धर्मके तीन महनीय तत्त्व हैं— शील, समाधि और प्रज्ञा । अष्टाङ्गिक मार्गके प्रतीक ये तीनों ही हैं । शीलसे तात्पर्य सात्त्विक कार्योंसे है । बुद्धके दोनों प्रकारके शिष्य थे- गृहत्यागी प्रव्रजित भिक्षु तथा गृहसेवी गृहस्थ । कतिपय कर्म इन दोनों प्रकारके बुद्धानुयायियोंके लिये समभावेन मान्य हैं । जैसे अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा मद्यका निषेध – ये ' पञ्चशील ' कहलाते हैं और इनका अनुष्ठान प्रत्येक बौद्धके लिये विहित है । भिक्षुओंके लिये अन्य पाँच शीलकी भी व्यवस्था है - जैसे अपराह्ण - भोजन, मालाधारण, संगीत, सुवर्ण - रजत तथा महार्घ शय्या- - - इन पाँचों वस्तुओंका परित्याग । पूर्व शीलोंसे मिलाकर इन्हें ' दशशील ' ( दश सत्कर्म ) कहते हैं । गृहस्थके लिये अपने पिता, माता, आचार्य, पत्नी, मित्र, सेवक तथा श्रमण - ब्राह्मणोंका सत्कार प्रतिदिन करना चाहिये । बुरे कर्मोंके अनुष्ठानसे सम्पत्तिका नाश अवश्यम्भावी है । नशाका सेवन, चौरस्तेकी सैर, समाज ( नाच - गान ) का सेवन, जूआ खेलना, दुष्ट मित्रोंकी संगति तथा आलस्यमें फँसना —ये छहों सम्पत्तिके नाशके कारण हैं । ( दीर्घनिकाय, सिगालोवाद सुत्त ३१ पृष्ठ २७१ –२७६ ) शील तथा समाधिका फल है प्रज्ञाका उदय । भवचक्रके मूलमें ' अविद्या ' विद्यमान है । जबतक प्रज्ञाका उदय नहीं होता, तबतक अविद्याका नाश नहीं हो सकता । साधकका प्रधान लक्ष्य इसी प्रज्ञाकी उपलब्धिमें होता है । प्रज्ञा तीन प्रकारकी होती है— ( १ ) श्रुतमयी — आप्त प्रमाणोंसे उत्पन्न निश्चय, ( २ ) चिन्तामयी — युक्तिसे उत्पन्न निश्चय तथा ( ३ ) भावनामयी - समाधिजन्य निश्चय । श्रुत - चिन्ता — प्रज्ञासे सम्पन्न शीलवान् पुरुष भावना ( ध्यान ) का अधिकारी होता है । प्रज्ञावान् व्यक्ति नाना प्रकारकी ऋद्धियाँ ही नहीं पाता, प्रत्युत प्राणियोंके पूर्वजन्मका ज्ञान, परचित्त - ज्ञान दिव्य श्रोत्र, दिव्यचक्षु तथा दुःखक्षय ज्ञानसे सम्पन्न हो जाता है । उसका चित्त कामास्रव ( भोगकी, भवास्रव ( जन्मनेकी इच्छा ) तथा अविद्यास्रव ( अज्ञानमल ) से सदाके लिये विमुक्त इच्छा ), प्राप्तकर अर्हत्की महनीय उत उच्च पदवीको पा लेता है । धम्मपदने बुद्धशासनके हो जाता रहस्यको है । साधक तीन शब्दोंमें निर्वाण समझाया है-( १ ) सब पापोंका न करना, ( २ ) पुण्यका संचय तथा ( ३ ) अपनेचित्तकी परिशुद्धि-सब्बपापस्स अकरणं कुसलस्सउपसम्पदा । स - चित्त परियोदपनं एतं बुद्धान सासनं ॥ ) ( धम्मपद १४।५ ( ३६१ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २ ९ ( सर्वपापस्याकरणं कुशलस्योपसम्पदा । स्वचित्तपर्यवदापनं एतद् बुद्धानांशासनम् ॥ ) जैन धर्म — जैन धर्ममें पाँचों यमोंको पाँच महाव्रतका आधारशिला माना गया है । उनकी जानकारी पाठकोंके लिये नाम विशेष दिया गया है और उनको उस धर्मका उनकी प्राकृत भाषामें अर्थसहित नीचे लिखा जाता है लाभदायक होगी । अतः उनको ( १ ) अहिंसा-अहिंसा सुत्तं-तन्थिमं पढमं ठाणं महावीरेण देसियं । अहिंसा निउणा दिट्ठा सव्व जावन्ति लोए पाणा, तसा अदुवा थावरा । ते जाणमजाणं मा न हणे नो भू वि सु संजमा घायए ॥ ॥ २ १ ॥ ॥ ( दश ० अ ० ६ गा ० ९ -१० ) सयं तिवायए पाणे, अदुवऽन्नेहिं घायए । हणन्तं वाऽणु जाणाइ, अप्पणो ॥ ३ ॥
वेरंवड्ढइ ( सूत्र ० श्रु ० १ अ ० १३० १ गा ० ३ ) जगनिस्सि एहिं भूएहिं, तसनामेंहिं थावरेहिं च । नो तेसिमारभे दड, मणसा वयसा कायसा चेव ॥ ४ ॥
( उत्तरा ० अ ० ८ गा ० १० ) सव्वे जीवा वि इच्छन्ति, जीविउंन मरिज्जिउं । तम्हा पाणि वहं घोर निग्गंथा वज्जयंतिणं ॥ ५ ॥
( दश ० अ ० ६ गा ० ११ )
अञ्झत्थं सव्वओ सव्वं दिस्स, पाणे पियायए । न हणे पाणिणो पाणे, भयवेराओ उचरए ॥ ६ ॥
( उत्तरा ० अ ० ६ गा ० ७ ) सव्वाहिं अणु जुत्तीहिं, मईमं पडिलेहिया । सव्वे अक्कन्त दुक्खाय, अओ सव्वे न हिंसया ॥ ७ ॥
( सूत्र ० श्रु ० १ अ ० ११ गा ० ९ )
एवं खु नाणिणो सारं, जं न हिंसई किंचण । अहिंसा समयं चेव एयावन्तं वियाणिया ॥ ८ ॥
( सूत्र ० श्रु ० १ अ ० ११ गा ० १० )
संबुञ्झमाणे उ नरे मईमं, पावाउ अप्पाणं निवट्टएज्जा ।
हिंसप्य सूयाइं दुहाई मत्ता, वेरा नुबन्धीणि महब्भयाणि ॥ ९ ॥
( सूत्र ० श्रु ० अ ० १० गा ० २१ ) समया सव्व भूएसु, यत्तु मित्तेसु वा जगे, पाणा इवाय विरई, जावज्जीवाए दुक्करं ॥ १० ॥
( उत्तरा ० अ ० १ ९ गा ० २५ ) अर्थ — भगवान् महावीरने अठारह धर्म - स्थानोंमें सबसे पहला स्थान अहिंसाका बतलाया है ॥ १ ॥ है संसारमें
। सब जीवोंके साथ संयमसे व्यवहार रखना अहिंसा है, वह सब सुखोंकी देनेवाली मानी गयी न जितने भी त्रस और स्थावर प्राणी हैं उन सबको जान और अनजानमें न स्वयं मारना हिंसा करवाता चाहिये और है और दूसरोंसे मरवाना चाहिये ॥ २ ॥ जो मनुष्य प्राणियोंकी स्वयं हिंसा करता है, दूसरोंसे है ॥ ३ ॥ संसारमें
हिंसा करनेवालोंका अनुमोदन करता है, वह संसारमें अपने लिये वैरको बढ़ाता ( ३६२ )
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सूत्र २ ९ ] * यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि * [ साधनपाद रहनेवाले त्रस और स्थावर जीवोंपर मनसे, वचनसे और शरीरसे किसी भी तरह दण्डका प्रयोग नहीं क्रना चाहिये ॥४ ॥ सभी जीव जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता । इसीलिये निर्ग्रन्थ ( जैन मुनि
प्रति ) घोर प्राणिवधका सर्वथा परित्याग करते हैं ॥ ५ ॥ भय और वैरनिवृत्त साधकको, जीवनके
मोह - ममता रखनेवाले सब प्राणियोंको सर्वत्र अपनी ही आत्माके समान जानकर उनकी कभी भी हिंसा निकायोंका सब प्रकारकी युक्तियोंसे सम्यक् ज्ञान न करनी चाहिये ॥ ६ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य छहों जीव प्राप्त
-करे और ‘ सभी जीव दुःखसे घबराते हैं ' – ऐसा जानकर उन्हें दुःख न पहुँचावे ॥ ७ ॥ ज्ञानी होनेका सार
-ही यह है कि वह किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे । इतना ही अहिंसाके सिद्धान्तका ज्ञान यथेष्ट है । यही अहिंसाका विज्ञान है ॥ ८ ॥ सम्यक् बोधको जिसने प्राप्त कर लिया वह बुद्धिमान् मनुष्य हिंसासे उत्पन्न
होनेवाले वैर - वर्द्धक एवं महाभयंकर दुःखोंको जानकर अपनेको पाप कर्मोंसे बचाये ॥ ९ ॥ संसारमें
प्रत्येक प्राणीके प्रति — फिर वह शत्रु हो या मित्र - समभाव रखना तथा जीवनपर्यन्त छोटी - मोटी सभी प्रकारकी हिंसाका त्याग करना - वास्तवमें बहुत दुष्कर है ॥ १० ॥
२ - सत्य -सच्च सुत्तं निच्च कालऽप्पमत्तेणं, मुसावाय विवज्जणं । भासियव्यं हियं सच्चं निच्चाऽऽउत्तेण दुक्करं ॥ १ ॥
( उत्तरा ० अ ० १ ९ गा ० २६ ) अप्पणट्ठा पग्ट्ठा वा, कोहा वा जइ वाभया । हिंसगं न मुसं बूया, नो वि अन्नं वयावए ॥ २ ॥
मुसावाओ या लोगम्मि, सव्व साहूहिं गरहिओ । अविस्सा सो य भूयाणं, तम्हा मोसं विवज्जए ॥ ३ ॥
( दश ० अ ० ६ गा ० १२-१३ ) नलवेज पुट्ठो सावज्जं, न निरट्टं न मम्मयं । अप्पणट्ठा परट्ठा वा, उभयस्संतरेण वा ॥ ४ ॥
( उत्तरा ० अ ० १ गा ० २५ )
तहेव सावज्जऽणुमोयणी गिरा, ओहारिणी जाय परोवघायणी ।
से कोह लोह भय हास माणवो, न हासमाणो वि गिरं व एज्जा ॥
( दश ० अ ० ७ गा ० ५४ ) दिट्टं, मियं असंदिद्धं, पडिपुराणं वियं जियं । अयंपिरमणुव्विग्गं, भासं निसिर अत्तवं ॥ ६ ॥
( दश ० अ ० ८ गा ० ४ ९ )
भासाए दो से य गुणे य जाणिया, तीसे य दुट्ठे परिवज्जये सया ।
छसु संजए सामणिए सया जए, वएज्ज बुद्धे हियमाणु लोमियं ॥ ७ ॥
( दश ० अ ० ७ गा ० ५६ ) सयं समेच्य अदुवा वि सोच्चा, भासेज धम्मं
जे गरहिया सणियाणप्पओगा, न ताणि सेवन्ति हिययं पयाणं ।
सुधीर धम्मा ॥ ८ ॥
० १ ९ ) ( सूत्र श्रु ० १ अ ० १३ गा ( ३६३ )
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २ ९ सवक्क सुद्धिं समुपेहिया मुणी, गिरं च दुटुं परिवज्जए मियं अदुट्ठ अणुवीह भासए, सयाण मज्झे लहई पसं सया
सणं ।
॥ ९ ॥
तहेव काणं काणेत्ति, पंडगंपंडगेत्ति वा । वाहियं वा वि रोगित्ति तेणं ( दश ० अ ० ७ गा ० ५५ ) चोरेत्ति नो वए ॥ १० ॥
वितहं वितहामुत्तिं, जं गिरं भासए नरो । तम्हा सो पुट्ठो पावेणं किं पुण जो ( दश ० अ ० ७ गा ० १२ ) मुसं वए ॥ ११ ॥
( दश ० अ ० ७ गा ० ५ )
तहेव फरुसा भासा, गुरु भूओ वघाइणी । सच्चा वि सान वत्तव्वा, जसो पावस्स आगमो ॥ १२॥
( दश ० अ ० ७ गा ० ११ ) अर्थ - सदा अप्रमादी और सावधान रहकर, असत्यको त्यागकर, हितकारी सत्य वचन ही बोलना चाहिये । इस तरह सत्य बोलना बड़ा कठिन होता है ॥ १ ॥ अपने स्वार्थके लिये अथवा दूसरोंके लिये
क्रोधसे अथवा भयसे – किसी भी प्रसङ्गपर दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेवाला असत्य वचन न तो स्वयं बोलना, न दूसरोंसे बुलवाना चाहिये ॥ २ ॥ मृषावाद ( असत्य ) संसारमें सभी सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित
ठहराया गया है और सभी प्राणियोंको अविश्वसनीय है । इसलिये मृषावाद सर्वथा छोड़ देना चाहिये ॥ ३ ॥
अपने स्वार्थके लिये, अथवा दूसरोंके लिये, दोनोंमेंसे किसीके भी लिये, पूछनेपर पाप - युक्त, निरर्थक एवं मर्म - भेदक वचन नहीं बोलना चाहिये ॥ ४ ॥ श्रेष्ठ साधु पापकारी, निश्चयकारी और दूसरोंको दुःख
पहुँचानेवाली वाणी न बोले । श्रेष्ठ मानव इसी तरह क्रोध, लोभ, भय और हास्यसे भी पापकारी वाणी न बोले । हँसते हुए भी पाप वचन नहीं बोलना चाहिये ॥ ५ ॥ आत्मार्थी साधकको दृष्ट ( सत्य ) परिमित,
असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट अनुभूत, वाचालतारहित और किसीको भी उद्विग्न न करनेवाली वाणी बोलना -चाहिये || ६ || भाषाके गुण तथा दोषोंको भलीभाँति जानकर दूषित भाषाको सदाके लिये छोड़ देनेवाला, षट्काय जीवोंपर संयत रहनेवाला तथा साधुत्व - पालनमें सदा तत्पर बुद्धिमान् साधक केवल हितकारी मधुर - भाषा बोले ॥ ७॥ श्रेष्ठ धीर पुरुष स्वयं जानकर अथवा गुरुजनोंसे सुनकर प्रजाका हित करनेवाले
धर्मका उपदेश करे । जो आचरण निन्द्य हों, निदानवाले हों उनका कभी सेवन न करे ॥ ८ ॥ विचारवान्
मुनिको वचन- -शुद्धिका भलीभाँति ज्ञान प्राप्त करके दूषित वाणी सदाके लिये छोड़ देनी चाहिये और खूब सोच - विचारकर बहुत परिमित और निर्दोष वचन बोलना चाहिये । इस तरह बोलनेसे सत्पुरुषोंमें महान् प्रशंसा प्राप्त होती है ॥ ९ ॥ कानेको काना, नपुंसकको नपुंसक, रोगीको रोगी और चोरको चोर कहना
यद्यपि सत्य है तथापि ऐसा नहीं कहना चाहिये ( क्योंकि इससे उन व्यक्तियोंको दुःख पहुँचता है ) ॥ १० ॥
जो मनुष्य भूलसे मूलतः असत्य, किंतु ऊपरसे सत्य मालूम होनेवाली भाषा बोल उठता है वह भी पापसे अछूता नहीं रहता, तब भला जो जान - बूझकर असत्य बोलता है उसके पापका तो कहना ही क्या! ॥ ११॥ जो भाषा कठोर हो, दूसरोंको भारी दुःख पहुँचानेवाली हो – वह सत्य ही क्यों न
हो — नहीं बोलनी चाहिये । क्योंकि उससे पापका आस्रव होता है ॥ १२ ॥
३ – अस्तेय— -( ३६४ )
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सूत्र २ ९ ] यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि * * [ साधनपाद अणग सुत्तं चित्तमंतमचित्तं वा, अप्पं वा जइ वा बहुं । दंतसोहणमित्तंपि, उग्गहं से अजाइया ॥ १ ॥
तं अप्पणा न गिण्हन्ति, नो वि गिण्हावए परं । प्रन्नं वा गिण्हमाणंपि नाणुजाणन्ति संजया ॥ २ ॥
( दश ० अ ० ६ गा ०१४-१५ )
उड्ड अहेय तिरियं दिसासु, तसाय जे थावर जे य पाणा ।
हत्थेहिं पाएहिं य संजमित्ता, अदिन्नमन्नेसु य नो गहेज्जा ॥ ३ ॥
( सूत्र ० श्रु ० १ अ ० १० गा ० २ )
तिव्वं तसे पाणिणो थावरे य, जे हिंसति आयसुहं पडुच्च ।
जेलूसए होइ अदत्तहारीं, ण सिक्खई सेय वियस्स किंचि ॥ ४ ॥
( सूत्र ० श्रु ० अ ० ५ उ ० १ गा ० ४ )
दन्त सोहणमाइस्स, अदत्तस्स विवज्जणं । अणवज्जेसणिज्जस्स गिण्हणा अविदुक्करं ॥ ५ ॥
( उत्तरा ० अ ० १ ९ गा ० २७ ) अर्थ — पदार्थ सचेतन हो या अचेतन, अल्प हो या बहुत, दाँत कुरेदनेकी सींक भी जिस गृहस्थके अधिकारमें हो उसकी आज्ञा लिये बिना पूर्ण संयमी साधक न तो स्वयं ग्रहण करते हैं, न दूसरोंको ग्रहण करनेके लिये प्रेरित करते हैं और न ग्रहण करनेवालोंका अनुमोदन करते हैं ॥ १-२ ॥ ऊँची - नीची और तिरछी दिशामें जहाँ कहीं भी जो त्रस और स्थावर प्राणी हों उन्हें संयमसे रहकर अपने हाथोंसे, पैरोंसे किसी भी अंगसे पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिये । दूसरोंकी बिना दी हुई वस्तु भी चोरीसे ग्रहण नहीं करनी चाहिये ॥ ३॥ जो मनुष्य अपने सुखके लिये त्रस तथा स्थावर प्राणियोंकी क्रूरतापूर्वक हिंसा करता
है — उन्हें अनेक तरहसे कष्ट पहुँचाता है, जो दूसरोंकी चोरी करता है, जो आदरणीय व्रतोंका कुछ भी पालन नहीं करता, ( वह भयङ्कर क्लेश उठाता है ) ॥ ४॥ दाँत कुरेदनेकी सींक आदि तुच्छ वस्तुएँ भी
बिना दिये चोरीसे न लेना, निर्दोष एवं एषणीय भोजन - पान भी दाताके यहाँसे दिया हुआ लेना, यह बड़ी दुष्कर बात है ॥ ५ ॥
४- ब्रह्मचर्य-बंभरि सुत्तं
विरई अबंभचेरस्स, कामभोगरसन्नुणा । उगगं महव्वयं बंभं, धारेयव्वं सुदुक्करं ॥ १ ॥
( उत्तरा ० अ ० १ ९ गा ० २८ )
अबंभचरियं घोरं, पमायं दुरहिट्ठियं । नाऽऽयरन्ति मुणी लोए, भेयाययणवज्जिणो ॥ २ ॥
( दश ० अ ० ६ गा ० १६ ) मूलमेयमहम्मस्स, महादोससमुस्सयं । तम्हा मेहुण संसगं, नग्गंथा वज्जयन्ति णं ॥ ३ ॥
) ( दश ० अ ० ६ गा ० ११
विभृसा इत्थिसंसग्गो, पणीयं रसभोयणं । नरस्सऽत्तगवेसिस्स, विसं तालउडंजहा ॥ ४ ॥
५७ ) ( दश ० अ ० ८ गा ० ( ३६५ ),