पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 371–380

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 371 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप: * * [ सूत्र २४ अन्वयार्थ — इस अदर्शनरूपी संयोगका कारण अविद्या है व्याख्या – अदर्शनरूपी संयोगका कारण अविद्या अर्थात् मिथ्या - ज्ञान है; जिससे आत्मा और विवेक न होनेसे अभिन्नता प्रतीत होती है; और चित्तकी सुख, दुःख, मोहरूपी वृत्तियोंका पुरुषमें अध्यारोप चित्तमें है । तस्मात् तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् । गुणकर्तृत्वे च तथाकर्तेव भवत्युदासीनः ॥ २० ॥ ( सांख्यकारिका )

निग इस कारण उनके संयोगसे ( पुरुष और बुद्धिके अविद्याके कारण आसक्ति वा अविवेकपूर्ण संयोगसे ) अचेतन बुद्धि चेतन - सी और वैसे ही गुणोंके कर्त्ता न होनेपर भी उदासीन ( पुरुष ) कर्त्ता - जैसा प्रतीत होता है । प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ २७ ॥ ( गीता अ ० ३ )

वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये हुए हैं तो भी अहंकारसे मोहित हुए अन्तःकरणवाला पुरुष ' मैं कर्ता हूँ ' ऐसा मान लेता है अर्थात् अहंभाव पैदा कर लेता है । सूत्र २३ में बतला आये हैं कि संयोग ही अस्मिता क्लेश २- –६ है । इस संयोगका कारण अथवा अस्मिता क्लेशका क्षेत्र अविद्या है । वह सत्त्व चित्तमें जो लेशमात्र तम है उसमें वर्तमान है । विवेक-ख्यातिकी अवस्थामें सत्त्वकी विशुद्धताके कारण यह अविद्यारूप तम दग्ध बीजभावको प्राप्त होकर इस अत्यन्त सात्त्विक अक्लिष्ट वृत्तिको केवल रोकनेमात्र कार्य करता है 1 टिप्पणी - व्यासभाष्यका भाषानुवाद सूत्र । २४ । जो प्रत्यक् चेतन ( अन्तरात्मा ) का स्वबुद्धिके साथ संयोग है उस असाधारण संयोगका हेतु अविद्या अर्थात् विपर्यय - ज्ञान वासना है । अविद्याका अर्थ है अनादिविपर्यय - ज्ञानजन्य वासना ( वही असाधारण संयोगका हेतु है ) । किए विपर्ययज्ञानकी वासनासे वासित जो बुद्धि है वह न तो कार्यमें निष्ठाको प्राप्त होती है ( अधिकारको समाप्त करती है ) और न पुरुषख्यातिको प्राप्त होती है । साधिकार होनेसे पुनरावृत्तिशील हो जाती है । किंतु पुरुषख्याति पर्यवसान हुई बुद्धि अपने अन्तिम कार्यनिष्ठाको प्राप्त हो जाती है । वह समाप्त अधिकार हुई अज्ञानसे रहित होकर बन्धके कारणके अभाव हो जानेसे पुनरावृत्तिरहित हो जाती है । यहाँपर किसी अबोध स्त्री नास्तिकने एक नपुंसकके दृष्टान्तसे उपर्युक्त कथनका खण्डन उपहासके साथ किया है । वह एक उसको उत्तर अपने नपुंसक पतिसे कहती है " आर्यपुत्र मेरी बहिन तो पुत्रवती है मैं क्यों नहीं हूँ? " नहीं करता देता है “ मैं मरकर तेरे लिये पुत्र उत्पन्न कर दूँगा ” इसी प्रकार यह विद्यमान ज्ञान चित्तनिवृत्ति विद्यमान विवेकख्याति है तो फिर नष्ट होकर करेगा- - इसकी क्या आशा करनी चाहिये ( अर्थात् जब उत्पन्न करेगी इसकी कम चित्तनिवृत्तिरूप मोक्ष नहीं उत्पन्न कर सकती तो परवैराग्यद्वारा विनष्ट होकर मोक्ष बुद्धिवाले आचार्यने इस आशा हो सकती है ) इसका उत्तर एक आचार्यदेशीय अर्थात् निवृत्तिका एक साधारण नाम मोक्ष है । और चित्तके प्रकार दिया है कि चित्तके भोग अपवर्गरूप परिणामोंकी । वह अदर्शन बन्धका कारण है । उसकी भोग - अपवर्गरूप परिणाम निवृत्ति अदर्शनके अभावसे होती है ( ३४६ ) -

पृष्ठ 372

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 372 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* तस्य हेतुरविद्या [ साधनपाद ** सूत्र २४ ] निवृत्ति विवेक - दर्शनसे होती है । विवेक दर्शनकी निवृत्ति परवैराग्यसे होती है । चित्तके ऐसे स्वरूप होते ही मोक्ष होता है । फिर उस नास्तिकका उपहास व्यर्थ ही है । नोट — यहाँ व्यासजीने यह दिखलाया है कि एकदेशीय अर्थात् साधारण बुद्धिवाला आचार्य भी नास्तिककी इस आशङ्काका परिहार कर सकता है तो इसके उत्तर देनेसे कोई प्रयोजन नहीं है । सांख्ययोगके विद्वान् आचार्यका तो यह मत है कि चित्तकी निवृत्ति ही मोक्ष है । चित्तकी निवृत्तिका साक्षात् कारण विवेकदर्शन नहीं है; किंतु स्थिर विवेकख्यातिमें परवैराग्य उदय होता है । परवैराग्यसे असम्प्रज्ञात समाधि । असम्प्रज्ञात समाधिके अधिकत्वके क्रमसे निरधिकार चित्तकी निरिन्धन अग्निके सदृश अपने कारणमें लयरूप निवृत्ति होती है । इसलिये परवैराग्यद्वारा चित्तनिवृत्तिका कारण विवेकदर्शन है । इसलिये नास्तिकका उपहास निरर्थक है । भोजवृत्ति - भाषार्थ ॥ सूत्र २४ || पूर्व जो विपर्यय मोहरूप अविद्या कहा है वह अविवेकख्यातिरूप

संयोगका कारण है ।

व्यासभाष्यपर विज्ञानभिक्षुके वार्त्तिकका भाषानुवाद ॥ सूत्र २४ ॥

तस्य हेतुरविद्या — उस द्रष्टा और दृश्यके संयोगका बुद्धि और पुरुषके संयोगद्वारा अविद्या हेतु है । भाष्यकारने सूत्रकारके तात्पर्यके अभिप्रायसे ही ' तस्य ' इस पदका अर्थ ' बुद्धि - संयोगस्य ' किया है, साक्षात् ही नहीं; क्योंकि द्रष्टाका दृश्यके साथ सामान्य संयोग ही पूर्वसूत्रमें प्रकृत है । ( प्रकरणमें आया हुआ है ) । बुद्धिसंयोगस्येति; अविद्या यहाँ अनात्ममें आत्मबुद्धिमात्र है; क्योंकि वह ही यहाँ बुद्धिके साथ संयोगका कारण है और अनित्यादिमें नित्यादि बुद्धिरूप अविद्या जो आगे कहेंगे उसकी विवेकख्यातिसे निवृत्ति भी नहीं होती है । और वह अविद्या बुद्धिके संयोगसे जन्य है, अतः बुद्धिसंयोगके अव्यवहितपूर्व कालमें होनी चाहिये । ( अनात्ममें आत्मबुद्धि तो सम्भव है, अनित्यादिमें नित्य बुद्धि - रूप सम्भव नहीं है ) अतः भाष्यकार कहते हैं— ' विपर्ययेति ' – सर्गान्तरीय अविद्या स्वचित्तके साथ निरुद्ध हो जाती है — उसकी वासना प्रधानमें स्थित रहती है । उससे वासित प्रधान उसी पुरुषकी संयोगिनी उस प्रकारकी बुद्धिको उत्पन्न करता है, अतः अनादि होनेसे दोष नहीं है । अविद्याकी वासनामें बुद्धि और पुरुषका संयोग हेतु है— इसमें युक्ति कहते हैं — विपर्ययेति - विपर्यय ज्ञानकी वासनाओंके ख्यातिरूप - कार्यनिष्ठारूप स्वकर्तव्यकी अन्तिम अवधिको बुद्धि प्राप्त नहीं होती बलसे पुरुष-पुनः लौट आती है — पुरुषके साथ संयुक्त हो जाती है । वही बुद्धि पुरुषान्यताख्यातिपर्यन्त अतः साधिकार होनेसे उत्पन्न कर देनेसे समाप्तिको प्राप्त होती है । ततः — चरिताधिकारो हुई परवैराग्यके है ) निष्पादितकार्या ( जिसने अपना कार्य भोग और विवेकख्याति ( जिसका अधिकार समाप्त हो चुका ( जिसने अविद्याको निवृत्त कर दिया है ) हुई बुद्धि संयोग नामक सम्पन्न कर दिया है ) निवृत्ताविद्या पुरुषसे संयुक्त नहीं होती । तथा च अन्वय और व्यतिरेकसे बन्धके कारणके अभाव होनेसे फिर है, यह भाव है.। पुरुषख्यातिसे चित्तकी निवृत्ति होती है, विपर्यय वासनाबुद्धि पुरुषके संयोगका हेतु निराकरण करनेका इच्छुक — उसको दिखलाते जो यह कहा है इस विषयमें नास्तिकके आक्षेपके हैं । ' अत्र कश्चित् षण्डक ' के उपाख्यान— दृष्टान्तसे उद्घाटन करते हैं — आक्षेप करते हैं - नपुंसकके आख्यानकोही कहते हैं- ' ' लेकर मुग्धया इत्यादिसे ( ३४७ )

पृष्ठ 373

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 373 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप ** [ सूत्र २५ ' उत्पादयिष्यति ' —- इस तकसे । वह षण्डक उस अपनी भार्याको विनष्टमिति – विनष्टं – परवैराग्यसे निरुद्ध – ज्ञान — जो कि चित्तकी निवृत्तिरूप है— मोक्षको करेगा – मुक्ति देगा, यह नास्तिककी प्रत्याशा है — यह अर्थ है । उपेक्षाको सूचित करनेके लिये – पूर्वाचार्यके वचनोंसे इस विषयमें सिद्धान्तको कहते हैं— ईषद् असमाप्त आचार्य आचार्यदेशीय होता है ( अर्थात् जो आचार्य तो नहीं है परंतु लगभग आचार्य - जैसा है ) । जिस बातके उत्तरकी आचार्यलोग उपेक्षा कर देते हैं, उसका भी उन्होंने उत्तर है; वही उनकी आचार्यदेशीयता है । आचार्य वह है जिसका स्वरूप वायुपुराणमें कहा है- दिया आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि । स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन चोच्यते ॥ इति ॥ शास्त्रके अर्थोंका ( उद्देश्यों – प्रयोजनोंका ) जो संचय करता है, जनताको सदाचारमें नियुक्त करता है और स्वयं भी सदाचारी है, वह आचार्य कहा जाता है । ननु शब्द यहाँ सम्बोधनवाचक है, यों कह सकते हैं— ज्ञान साक्षात् मोक्षका हेतु नहीं है, किंतु अविद्या नामक अदर्शनकी निवृत्ति तत्कार्य निरोध - योगद्वारा मोक्षका हेतु है । तथा च विनष्ट भी ज्ञानबुद्धि पुरुष वियोगरूप मोक्षका व्यापारद्वारा कारण सम्भव है । शङ्का – यदि यह आचार्यदेशीय ही है तो क्या बुद्धि - चित्त आदि नामक अन्तःकरणकी निवृत्ति ही मोक्ष नहीं है? समाधान - तत्र चित्तेति - चित्तनिवृत्ति मोक्ष होता ही है; किंतु उस विषयमें बेमौके ही इस नास्तिकको बुद्धिका मोह व्यर्थ है, इसलिये यहाँ उपेक्षणीय विषयमें समाधान करनेवालेकी आचार्यदेशीयता है, यह

: बात कही है ॥। २४ ॥

सङ्गति - सूत्र १६ में हेय जो दुःख है, १७ में हेय - हेतु द्रष्टा और दृश्यका संयोग जो दुःखका कारण है, २३ में स्वशक्ति और स्वामिशक्तिके स्वरूपकी उपलब्धि जो संयोगके वियोगका कारण है और २४ में संयोगका कारण अविद्या बतलाकर अब अगले सूत्रमें हान अर्थात् अविद्याके कारण संयोगके नाशको • जो कैवल्य है उसको बतलाते हैं— तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम् ॥ २५ ॥

शब्दार्थ — तदभावात् - उसके ( अविद्याके ) अभावसे; संयोगाभावः- संयोगका अभाव; हानम् = हान है; तत् - दृशेः-: = वह चित्ति शक्ति ( द्रष्टा ) का; कैवल्यम् = कैवल्य है । अन्वयार्थ — उसके ( अविद्याके ) अभावसे ( अदर्शनरूपी ) संयोगका अभाव ' हान ' है । वह चिति - शक्तिका कैवल्य है । है । अविद्याके अभाव व्याख्या — अविद्याके विरोधी यथार्थ ज्ञानसे अविद्याका विच्छेद हो जाता ' का मूर्त - द्रव्यके होनेपर अविद्याके कार्य ‘ संयोग ' के अभावको ' हान ' कहते हैं । निराकार वस्तु ' संयोग है । अर्थात् पुरुषका तुल्य छोड़ना नहीं होता है; किंतु अज्ञानसे जन्य संयोग अपने - आप ही निवृत्त हो जाता उसकी बाह्य वृत्तियोंको अपने स्वरूपको भूला - जैसा होकर चित्तको अपने - से भिन्न तेईसमें न समझते बतलाया हुए केवल था, और इसका कारण पिछले ही देखते रहना जो संयोग है उसका कारण अदर्शन सूत्र संयोगका अदर्शनका और अदर्शनके नाशसे सूत्रमें अविद्या बतला दी गयी है । इस अविद्याके नाशसे ' है, अर्थात् दुःखका अपने कारणसहित नाश स्वयं नाश हो जाता है । इस संयोगका नाश होना ही ' हान ( ३४८ )

पृष्ठ 374

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 374 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः [ साधनपाद * सूत्र २६ ] हो जाना । यह हान ही चिति - शक्ति ( पुरुष ) का कैवल्य अर्थात् केवल हो जाना, निखर जाना स्वरूप - स्थिति, मोक्ष अर्थात् शुद्ध परमात्म - स्वरूपमें अवस्थिति है । , अभावसे बुद्धि और टिप्पणी - व्यासभाष्यका भाषानुवाद ॥ सूत्र २५ ॥ इस अदर्शनके पुरुष सङ्गका अभाव ही अत्यन्त दुःखकी निवृत्ति है, यह अर्थ है; यही ' हान ' कहलाता है । यह द्रष्टाका कैवल्य है । यह पुरुषका अमिश्रीभाव है अर्थात् इसके पश्चात् फिर कदापि गुणोंसे संयोग नहीं होता । दुःखके कारणकी निवृत्ति होनेपर दुःखकी निवृत्ति ही परम हान है । तब पुरुष स्वरूप - प्रतिष्ठित हो जाता है अर्थात् शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थित हो जाता है I भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सू ० २५ ॥ अविद्या विरोधी यथार्थ ज्ञानसे अविद्याका उच्छेद हो जाता है । अविद्याके अभाव होनेपर उसके कार्य संयोगका भी जो अभाव होता है वही ' हान ' कहलाता है । मूर्त द्रव्यके समान इसका परित्याग नहीं होता है, किंतु विवेकख्यातिके उदय होनेपर अविवेक निमित्त संयोग स्वयं ही निवृत्त हो जाता है । यही इस संयोगका ' हान ' है । यह जो संयोगका नाश है वही स्वरूपसे नित्य केवली ( शुद्ध - स्वरूप ) पुरुषका कैवल्य कहलाता है । सङ्गति – इस ' हान ' की प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं— विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥ २६ ॥

शब्दार्थ – विवेक - ख्यातिः - विवेकज्ञान; अविप्लवा - शुद्ध, निर्मल, अडोल अर्थात् संशय-विपर्ययरहित; हानोपायः = हानका उपाय है । अन्वयार्थ- शुद्ध विवेकख्याति हानका उपाय है । व्याख्या – विवेक दृश्य - द्रष्टाके भेद; और ख्याति नाम ज्ञानका है । इसलिये चित्त और पुरुष इन दोनोंकी भिन्नताका ज्ञान; अथवा यह ज्ञान कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और चित्त मुझसे भिन्न हैं, विवेकख्याति है । यह विवेकज्ञान आगम अर्थात् आचार्यके उपदेश और शास्त्रोंके पढ़ने तथा अनुमानसे भी उदय होता है, पर यह परोक्ष ज्ञान है; और अनादि अविद्याके निवृत्त करनेमें असमर्थ होता है मिथ्याज्ञानजन्य व्युत्थानके संस्कार चित्तमें बने रहते हैं और तामस - राजस वृत्तियाँ उदय होती यह विवेकख्याति विप्लवसहित है । विप्लवके अर्थ विच्छेद हैं अर्थात् जिसमें बीच रहती हैं । वृत्तियोंका उदय होना बना रहे । इसलिये ऐसा विवेक - ज्ञान हानका - बीचमें राजसी - तामसी निरन्तर सत्कारपूर्वक प्रतिपक्षभावनाके बलसे अर्थात् क्लेशके उपाय विरोधी नहीं है । यह ज्ञान जब दीर्घकाल अविद्याके विरोधी तत्त्वज्ञान, अस्मिताके विरोधी क्रिया - योगके अनुष्ठानबलसे भेदज्ञान, राग - द्वेषके विरोधी मध्यस्थता, अभिनिवेशके विरोधी सम्बन्ध ज्ञान निवृत्तिके अनुष्ठानसे है तो वह अपरोक्ष ज्ञान होता है । इससे जब अविद्याके परिपक्व नाश हो जानेपर समाधिद्वारा साक्षात् कर लिया जाता और राजस - तामस मलोंसे शून्य चित्त हो जाता है । तब हो जानेपर कर्तृत्व - भोक्तृत्व अभिमानसे रहित अर्थात् प्रकाश पड़ रहा है और जिसके कारण सत्त्वगुणके प्रकाशमें चित्तमें चेतनका जो प्रतिबिम्ब साक्षात्कार होता है । यद्यपि यह साक्षात्कार चित्तमें चेतनता प्रतीत हो रही है, चित्तसे भिन्न उसका वृत्ति है तथापि इसके निरन्तर अभ्याससे भी चित्तके द्वारा होता है इसलिये चित्तहीकी एक सात्त्विक सर्वथा नाश होता है और मिथ्या - ज्ञान दग्धबीजके विवेक - ज्ञानका प्रवाह निर्मल और शुद्ध हो जाता है, क्लेशोंका तुल्य बन्धनकी उत्पत्ति करनेमें असमर्थ हो जाता ( ३४ ९ ) है ।

पृष्ठ 375

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 375 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप [ सूत्र २६ * यही अविप्लव अर्थात् अडोल, अविच्छेद निर्मल हानका उपाय है । क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ( गीता १३ । ३४ ) इस प्रकार क्षेत्र ( प्रकृति ) और क्षेत्रज्ञ ( पुरुष ) के भेदको तथा विकारसहित प्रकृतिसे छूटनेके उपायको जो पुरुष ज्ञाननेत्रोंद्वारा ( विवेकख्यातिद्वारा ) तत्त्वसे जान लेते हैं, वे महात्माजन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं विवेकख्यातिकी स्थितिको अर्थात् जब विवेक - ख्याति निरन्तर बनी रहे तब उसको अविप्लव विवेक - ख्याति कहेंगे । इसीका नाम धर्ममेघ समाधि है । यही जीवन्मुक्तिकी अवस्था है । हानका उपाय अविप्लव विवेकख्याति बतलाया है । विवेकख्यातिमें जो आत्मसाक्षात्कार होता है उससे चित्त इतना विशुद्ध हो जाता है कि यह विवेकख्याति भी चित्तकी ही एक वृत्ति प्रतीत होने लगती है । इस प्रकार इस विवेकख्यातिसे भी जो आसक्तिका हट जाना है उसीका नाम पर - वैराग्य है । " तत्परं पुरुषख्यातिर्गुणवैतृष्ण्यम् " विवेकख्यातिमें जो आत्मसाक्षात्कार होता है उस आत्मसाक्षात्कारसे जो इसविवेकख्यातिकी वृत्तिसे भी आसक्तिका हट जाना है वह पर वैराग्य है । इससे विवेकख्यातिमें इस वृत्तिको चलानेवाला रज और इस वृत्तिको स्थिर करनेवाला तमको सर्वथा दबाकर सत्त्व भी रज और तमके बिना इस वृत्तिको चलानेमें असमर्थ हो जाता है । तब चित्तमें किसी भी वृत्तिके न रहनेपर केवल आत्मप्रकाश रह जाता है और आत्मा शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थित हो जाता है । इसीको असम्प्रज्ञात - समाधि कहते हैं । विवेकख्यातितक आत्मा चित्ताकार प्रतीत होता है और असम्प्रज्ञात - समाधिमें चित्त आत्माकार होता है । अविप्लव विवेकख्यातिमें किस प्रकारकी प्रज्ञा होती है यह

अगले सूत्रमें बतलायेंगे ।

टिप्पणी — व्यासभाष्यका भाषार्थ ॥सूत्र २६ ॥

अब हानका उपाय क्या है? यह बतलाते हैं । बुद्धि और पुरुषकी भिन्नताका ज्ञान विवेकख्याति है और वह मिथ्या ज्ञान जिससे निवृत्त हो गया है, ऐसी विवेकख्याति अविप्लव अर्थात् शुद्ध और निर्मल कहलाती है । जब मिथ्याज्ञान दग्धबीजके समान बन्धनकी अनुत्पत्तिके योग्य होता है तब रजोगुणनिमित्तक क्लेशके दूर हो जानेपर सत्त्वके परम प्रकाशमें परमवशीकारसंज्ञक वैराग्यमें वर्तमान हुए योगीके विवेकज्ञानका प्रवाह शुद्ध होता । पुनः है उत्पत्तिके । वह निर्मल योग्य विवेकख्याति हानका उपाय है । उससे मिथ्याज्ञान दग्धबीज - भावको प्राप्त हो जाता है नहीं होता । यह मोक्षका मार्ग है । यही हानका उपाय है व्यासभाष्यपर विज्ञानभिक्षुके वार्तिकका भाषानुवाद सूत्र २६ चतुर्थ व्यूहके इससे परे हानोपाय व्यूहके चतुर्थ पादका भी वाच्य कहाँतक है— इस दुःखके विषयमें हानमें कारण है । प्रतिपादक सूत्रको उतारते हैं — अथेति – बुद्धिके संयोगकी निवृत्ति ही साक्षात् सम्बन्धसे दुःखके हेतु विवेकख्याति तो बुद्धिके संयोगके हेतु अविद्याकी निवर्त्तक होनेसे परम्परा हानका ( ३५० ) -

पृष्ठ 376

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 376 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र २६ ] * विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः * [ साधनपाद है । इस बातको भाष्यकारने प्राप्ति - शब्दसे सूचित किया है । विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः -विवेकख्यातिकी साक्षात्काररूप निष्ठाको सूचित करनेके लिये — उसका अविप्लवा ' विशेषण दिया ' है ( आरम्भमें अभ्यासीको क्षणिक विवेकख्याति होती है । उसीको पर्याप्त समझकर योगी प्रयत्नको ढीला विवेकख्याति मोक्षका उपाय है यह सूचित न कर दे, इसलिये अविप्लवा - कभी भी न हटनेवाली, किया है ) उसमें अविप्लव शब्दसे यह अर्थ कैसे निकलता है, इस आकाङ्क्षाके लिये कहते हैं - मिथ्याज्ञान संस्कारोंके कारणसे विवेकख्याति प्लवित हो जाती – मिथ्याज्ञानके संस्कारोंसे बीचमें वह अभिभूत हो जाती है । यदेति — जब साक्षात्कारकी दशामें सूक्ष्म मिथ्याज्ञान- अनागत- अवस्थामें हो, दग्ध - बीजक समान हो, उसका विवरण है— बन्ध्य प्रसव, यह मिथ्याज्ञानका प्रसव - सामर्थ्य बन्ध्या हो जाता है ( उत्पादनकार्यके योग्य नहीं रहता ), तब जिसकी क्लेशधूलि धुल गयी है, उस बुद्धि - सत्त्वके परवैशारद्य — वैलक्षण्य होनेपर – इसीका विवरण है— परस्यां वशीकारसंज्ञायाम् – परवशीकारसंज्ञक वैराग्यमें बर्तनेवाले बुद्धि - सत्त्वके— परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः - इस सूत्रोक्त जो इच्छाका अप्रतिघातरूप है, उसमें वर्तमान बुद्धि सत्त्वका विवेकख्याति प्रवाह निर्मल – मिथ्या ज्ञानसे अकलुषित होता है, अतः वह विवेकख्याति अविप्लवा कहलाती है । वह साक्षात्काररूपिणी विवेकख्याति हानका उपाय है । किसके द्वारा हानका उपाय है, इस आकाङ्क्षाके विषयमें कहते हैं — उस विवेकख्यातिसे सूक्ष्मरूप मिथ्याज्ञान दग्धबीज हो जाता है । फिर वह नहीं जमता, इस प्रकारसे यह विवेकख्याति-रूपचित्तकी निवृत्ति आदिरूप - मोक्षका मार्ग है— इसीका विवरण है हानोपाय— शङ्का — इस प्रकार ज्ञानसे ही दुःखहान नामक मोक्षकी प्राप्तिके वचनसे असम्प्रज्ञात योगका प्रयोजन क्या रहा? समाधान — परवैराग्यजन्य असम्प्रज्ञात योगको भी यहाँ ज्ञानके द्वारा ही मोक्षकी हेतुता है — यह आशय है ॥ २६ ॥

टिप्पणी — सूत्र २६ । बौद्ध दर्शन – बौद्धधर्ममें ' हान ' के स्थानमें ' तृतीय आर्य सत्य ' ' दुःखनिरोध ' ( निर्वाण ) बतलाया गया है । दुःखनिरोध ( निर्वाण ) —तीसरे आर्य सत्यका नाम ' दुःखनिरोध ' है । निरोध शब्दका अर्थ नाश या त्याग है । यह सत्य बतलाता है कि दुःखका नाश होता है । बुद्धने भिक्षुओंके सामने इस सत्यकी इस प्रकार व्याख्या की है-“ इदं खोपन भिक्खवे दुकखनिरोधं अरियसच्चं । सो तस्सायेव तण्हाय असेस विराग निरोधो चागो पटिनिस्सागो मुत्ति अनालयो । ” अर्थात् दुःखनिरोध आर्यसत्य उस तृष्णासे अशेष-सम्पूर्ण वैराग्यका नाम है; इस तृष्णाका त्याग, प्रतिसर्ग, मुक्ति तथा अनालय ( स्थान न देना ) यही है । दुःखके कारणका दूसरे आर्यसत्यमें विवरण दिया गया है । उस कारणको यदि नष्ट कर दिया जाय, तो कार्य आप - से - आप स्वतः नष्ट हो जायगा। अतः कार्य - कारणका सत्ताका पर्याप्त प्रमाण है । सम्बन्ध ही इस सत्यकी ( ३५१ )

पृष्ठ 377

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 377 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप [ सूत्र २७ * दुःखनिरोधकी ही लोकप्रिय संज्ञा ' निर्वाण ' है । तृष्णाके नाश कर अवस्थापर पहुँच जाता है— जिसे निर्वाणके नामसे पुकारते हैं । ' अंगुत्तर निकाय देनेसे इसी ' में निर्वाणप्राप्त जीवनमें पुरुष उस उपमा शैलसे दी गयी है— पुरुषकी सैलो यथा एकघनो वातेन न समीरति । एवं रूपा, रसा, सट्टा, गन्धा, फस्साच इट्ठा धम्मा अनिट्ठा च, न यवेधन्ति तादिनो । ठितं चित्तं विप्प मुत्तं वस यस्सानु पस्सति केवला ॥ ॥ ( अंगुत्तर निकाय ३ । ५२ ) अर्थात् प्रचण्ड झंझावात पर्वतको स्थानसे च्युत नहीं कर सकता, भयंकर आँधीके चलनेपर भी पर्वत एकरस, अडिग, अच्युत बना रहता है । ठीक यही दशा निर्वाण प्राप्त व्यक्तिकी है । रूप, रस, गन्धादि विषयोंके थपेड़े उसके ऊपर लगातार पड़ते रहते हैं, परंतु उसके शान्त चित्तको किसी प्रकार भी नहीं करते । आश्रयोंसे विरहित होकर वह पुरुष अखण्ड शान्तिका अनुभव करता है क्षुब्ध । नागार्जुनने माध्यमिक कारिकाके २५ वें परिच्छेदमें निर्वाणकी व्याख्या इस प्रकार की है ।

अप्रहीणमसम्प्राप्तमनुच्छिन्नमशाश्वतम् । अनिरुद्धमनुत्पन्नमेतन्निर्वाणमुच्यते ॥

निर्वाण न छोड़ा जा सकता है, न प्राप्त किया जा सकता है । यह न तो उच्छिन्न होनेवाला पदार्थ है और न शाश्वत पदार्थ है । यह न निरुद्ध है और न उत्पन्न । हीनयान तथा महायान दोनोंके ग्रन्थोंमें निर्वाणका सामान्य स्वरूप इस प्रकार है— ( १ ) यह शब्दोंके द्वारा प्रकट नहीं किया जा सकता । निष्प्रपञ्च यह असंस्कृत धर्म है । अतः न तो इसकी उत्पत्ति है, न विनाश है और न परिवर्तन । ( २ ) इसकी अनुभूति अपने ही अंदर स्वतः की जा सकती है । इसीको योगाचारी लोग ' प्रत्यात्मवेद्य ' कहते हैं और हीनयानी लोग ' पच्चतं वेदित्तव्यं ' शब्दके द्वारा कहते हैं । ( ३ ) यह भूत, वर्तमान और भविष्य – तीनों कालोंके बौद्धोंके लियेएक है और सम है 1 ( ४ ) मार्गके द्वारा निर्वाणकी प्राप्ति होती है । ( ५ ) निर्वाणमें व्यक्तित्वका सर्वथा निरोध हो जाता है । योगदर्शनमें चौथा प्रतिपाद्य विषय ' हानोपाय ' को ' विवेकख्याति ' बतलाया गया है और विवेकख्यातिकी प्राप्ति अष्टाङ्गयोगद्वारा सूत्र २८ में बतलायी गयी है; किंतु बौद्धदर्शनमें हानोपायके स्थानमें चतुर्थ आर्यसत्य ‘ दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपत् ' को सीधा अष्टाङ्गयोग बतलाया है । अष्टाङ्गयोगका नाम बौद्धदर्शनमें अष्टाङ्गिक मार्ग दिया गया है । इसका वर्णन २ ९ वें सूत्रकी टिप्पणीमें किया जायगा । सङ्गति – निर्मल विवेकख्यातिमें योगीकी जैसी प्रज्ञा उत्पन्न होती है उसका स्वरूप बतलाते हैं— तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७ ॥

शब्दार्थ — तस्य = उसकी ( निर्मल विवेकख्यातिवाले योगीकी ); सप्तधा = सात प्रकारकी; प्रान्तभूमिः = सबसे ऊँची अवस्थावाली; प्रज्ञा = बुद्धि होती है । प्रज्ञा अन्वयार्थ — उस निर्मल विवेकख्यातिवाले योगीकी सात प्रकारकी सबसे ऊँची अवस्थावाली होती है । दूसरे व्याख्या – निर्मल विवेकख्यातिद्वारा योगीके चित्तके अशुद्धि रूप आवरण - मल नष्ट हो जानेसे ( ३५२ ) -

पृष्ठ 378

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 378 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र २७ ] * तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा * [ साधनपाद सांसारिक ज्ञानोंके उत्पन्न न होनेपर सात प्रकारकी उत्कर्ष अवस्थावाली प्रज्ञा उत्पन्न होती है । उनमेंसे प्रथम चित्तके अधिकारकी समाप्तिको कहते हैं चार प्रकारकी प्रज्ञा कार्यसे विमुक्त करनेवाली है । विमुक्ति । यह चार प्रकारकी प्रज्ञासम्बन्धी विमुक्ति कार्य अर्थात् प्रयत्नसाध्य है, इस कारण वे वह कार्य - विमुक्ति प्रज्ञा कहलाती है और अन्तकी तीन चित्तसे विमुक्त करनेवाली हैं, इस कारण चित्त - विमुक्त प्रज्ञा कहलाती हैं । उपर्युक्त चारों प्रज्ञाओंके लाभसे ये तीन प्रज्ञा स्वतः ही लब्ध हो जाती हैं । कार्य - विमुक्ति प्रज्ञा-१ - हेयशून्य अवस्था- “ परिज्ञातं हेयं नास्य पुनः परिज्ञेयमस्ति । " जो कुछ हेय था जान लिया, अब कुछ जानना शेष नहीं रहा अर्थात् जितना गुणमय दृश्य है वह सब परिणाम, ताप और संस्कार - दुःखों तथा गुणवृत्ति विरोधसे दुःखरूप ही है, इसलिये ' हेय ' है— यह मैंने जान लिया ( २ । १५, १८, १ ९ ) । २ - हेयहेतु क्षीण अवस्था- " क्षीणा हेयहेतवो न पुनरेतेषां हातव्यमस्ति । ” जो दूर करना था अर्थात् नहीं योग जो ' हेय - हेतु ' है वह दूर कर दिया, अब कुछ दूर करनेयोग्य शेष नह रहा और दृश्यका द्रष्टा ( २ । १६, १७ ) । ३- प्राप्यप्राप्त अवस्था- - " साक्षात्कृतं निरोधसमाधिना हानम् । " जो साक्षात् करना था वह साक्षात् कर लिया है, ( अर्थात् निरोध - समाधिद्वारा हानको साक्षात् कर लिया ) अब कुछ साक्षात् करनयाग्र करनेयोग्य शेष नहीं रहा ( २ । २५ ) । ४ – चिकीर्षाशून्य अवस्था - " भावितो विवेकख्यातिरूपो हानोपायः । " जो सम्पादन करना था वह कर लिया है अर्थात् हानका उपाय निर्मल विवेकख्याति सम्पादन कर लिया, अब कुछ सम्पादन करनेयोग्य शेष नहीं रहा ( २ । २६ ) । यह प्रज्ञा पर - वैराग्यकी पराकाष्ठा है अर्थात् बुद्धि व्यापारकी प्रान्त रेखा है । चित्तविमुक्तिप्रज्ञा-५ – चित्तसत्त्व - कृतार्थता— " चरिताधिकारा बुद्धिः । " चित्तने अपना अधिकार भोग अपवर्ग देनेका पूरा कर दिया है, अब उसका कोई अधिकार शेष नहीं रहा है । ६ – गुणलीनता— “ गुणा गिरिशिखरकूटच्युता इव ग्रावाणो निरवस्थायाः स्वकारणे प्रलयाभिमुखाः सह तेनास्तं गच्छन्ति । न चैषां प्रविलीनानां पुनरस्त्युत्पादः प्रयोजनाभावादिति प्रकार पर्वतकी चोटीके किनारेसे गिरे हुए पत्थर बिना रुके हुए पृथिवीपर । ’ ” जिस प्रकार चित्तके बनानेवाले गुण अपने कारणमें लय होनेके अभिमुख जा रहे आकर हैं; क्योंकि चूर - चूर अब हो जाते हैं इसी प्रयोजन शेष नहीं रहा । इनका कोई ७. -आत्मस्थिति – “ एतस्यामवस्थायां गुणसम्बन्धातीतः स्वरूपमात्रज्योतिरमलः इति ’ ” गुणोंके सम्बन्धसे परे होकर पुरुषकी परमात्मस्वरूपमें स्थिति हो रही केवली पुरुषः है । अब कुछ शेष नहीं रहा । इस सात प्रकारकी प्रान्तभूमि प्रज्ञाको अनुभव करता है, और चित्तके अपने कारणमें लीन होनेपर भी कुशल ( विदेहमुक्त हुआ योगी कुशल ( जीवन्मुक्त ) कहा जाता अर्थात् गुणोंके सम्बन्धसे रहित केवल शुद्ध आत्मस्वरूपसे ) कहलाता है । ये दोनों ही गुणातीत अवस्थाको जीवन्मुक्त दशामें ही प्रत्यक्ष कर लेता है स्थित होते हैं । इसलिये यह योगी विदेहमुक्त ( ३५३ )

पृष्ठ 379

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 379 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २८ सङ्गति — हानका उपाय निर्मल विवेकख्यातिकी प्रज्ञाओंका स्वरूप दिखाकर योग - अङ्गोंको बतलाते हैं- अब उसकी प्राप्तिके साधन योगाङ्गाऽनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ २८ ॥

शब्दार्थ – योग - अङ्ग - अनुष्ठानात् = योगके अङ्गोंके अनुष्ठानसे; होनेपर; ज्ञानदीप्तिः = ज्ञानका प्रकाश; आविवेक - ख्यातेः - विवेकख्याति - पर्यन्त अशुद्धिक्षये हो जाता = अशुद्धिके नाश है । अन्वयार्थ – योगके अङ्गोंके अनुष्ठानसे अशुद्धिके नाश होनेपर ज्ञानका प्रकाश विवेकख्याति- पर्यन्त हो जाता I व्याख्या – योगके आठ अङ्गोंके अनुष्ठानसे क्लेश ( २ । ३ ) रूपी अशुद्धि दूर होती है और सम्यक् ज्ञानका प्रकाश बढ़ता है । इन अङ्गोंका अनुष्ठान जितना जितना बढ़ता जाता है उतनी ही क्लेशकी निवृत्ति और ज्ञानके प्रकाशकी अधिकता होती जाती है । यहाँतक कि यह ज्ञानके प्रकाशकी वृद्धि विवेकख्यातिपर्यन्त पहुँच जाती है, जिसका सूत्र सत्ताईसमें वर्णन किया है । योगके अङ्गोंका अनुष्ठान अशुद्धिके वियोगका कारण है और विवेकख्यातिकी प्राप्तिका कारण है । किस टिप्पणी - ( सूत्र २८ ) कारण नौ प्रकारके हैं-उत्पत्तिस्थित्यभिव्यक्तिविकारप्रत्ययाप्तयः । वियोगान्यत्वधृतयः कारणं नवधा स्मृतम् ॥ कारण नौ प्रकारका माना गया है । उत्पत्ति- कारण, स्थिति - कारण, अभिव्यक्ति - कारण, विकार - कारण, प्रत्यय - कारण, प्राप्ति - कारण, वियोग- कारण, अन्यत्व - कारण, धृति - कारण । ( १ ) उत्पत्ति - कारण - जैसे बीज वृक्षका या मन विज्ञानका या अविद्या संयोगकी उत्पत्तिका कारण है । ( सूत्र २ । २४ ) ( २ ) स्थिति - कारण — जैसे आहार शरीरकी स्थितिका या पुरुषार्थ मनकी स्थितिका; क्योंकि मन तबतक बना रहता है जबतक भोग और अपवर्गको सिद्ध नहीं कर देता । ( ३ ) अभिव्यक्ति - कारण- जैसे प्रकाश रूपकी अभिव्यक्ति ( प्रकटता ) का कारण है या रूपज्ञान पौरुषेय बोधकी अभिव्यक्तिका कारण है । ( ४ ) विकार- कारण - जैसे अग्निसे पककर चावल बदल ( गल ) जाते हैं, सो अग्नि उनका विकार - कारण है, या मनका दूसरे विषयमें लग जाना मनके विकारका कारण है । ( ५ ) प्रत्यय - कारण — जैसे धुएँका देखना अग्निके ज्ञानका कारण है । ( ६ ) प्राप्ति - कारण — जैसे धर्म सुखकी प्राप्तिका कारण कारण है है,, या या योगके योगके अङ्गोंका अनुष्ठान 1 प्रातिका विवेक - ख्यातिकी प्राप्तिका कारण है ( ७ ) वियोग- -कारण- - -जैसे कुल्हाड़ा लकड़ीके टुकड़ोंके वियोगका कारण है या स्वशक्ति और स्वामिशक्तिके स्वरूपकी उपलब्धि संयोगके वियोगका कारण है । ( सूत्र २ । २३ ) या योगके अङ्गोंका अनुष्ठान अशुद्धिके वियोगका कारण है । ( सूत्र २ । २८ ) देनेका कारण ( ८ ) अन्यत्व - कारण — जैसे सुनार सोनेके कुण्डलको दूसरी वस्तु अर्थात् , सपलियोंके कड़ा बना दुःख, बेगाने है या जैसे रूपवती स्त्रीका देखना एक ही है, पर वह देखना पतिके सुख ( ३५४ )

पृष्ठ 380

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 380 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र २ ९ ] * यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि * ..साधनपाद पुरुषोंके मोह और तत्त्वज्ञानीकी उदासीनताका कारण होता है । के धारनेका कारण है; और इन्द्रिय ( ९ ) धृति - कारण- जैसे शरीर इन्द्रियों ( प्राणों ) ( प्राण ) शरीरके धारनेके कारण हैं या मनुष्य, पशु, पक्षी, ओषधि, वनस्पति एक - दूसरेके धारनेके कारण हैं ( व्यासभाष्य ) सङ्गति – वे योगके अङ्ग ये हैं-यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ॥ २ ९ ॥ शब्दार्थ – यमनियमासन समाधयः = यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि— ( ये ); अष्टौ अङ्गानि = आठ योगके अङ्ग हैं । अन्वयार्थ — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि – ( ये ) आठ योगके अङ्ग हैं । व्याख्या — ये आठ योगके अङ्ग विवेकख्यातिके साधन हैं । उनमेंसे धारणा, ध्यान, समाधि – साक्षात् सहायक होनेसे योगके अन्तरङ्ग साधन कहलाते हैं । यम - नियम योगके रुकावट हिंसादि वितर्कोंको निर्मूल करके समाधिको सिद्ध करते हैं । अन्य तीन अंगले- अगले अङ्गमें उपकारक हैं अर्थात् आसनके जीतनेपर प्राणायामकी स्थिरता होती है और प्राणायामकी स्थिरतासे प्रत्याहार सिद्ध होता है । समाधिपादमें बतलाये हुए अभ्यास, वैराग्य, श्रद्धा, वीर्य आदि और इस पादमें बतलाया हुआ क्रियायोग इन्हीं आठों अङ्गोंके अन्तर्गत हो जाते हैं । अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि बिना अभ्यास - वैराग्यके नहीं हो सकते; क्योंकि अभ्यास तो इन आठों अङ्गोंका पुनः - पुनः अनुष्ठानरूप ही है और बिना वैराग्यके समाधि सिद्ध हो ही नहीं सकती; क्योंकि सम्प्रज्ञात - समाधिमें एकाग्रता अर्थात् एकवृत्ति रहती है, जिसमें राग बना रहता है, पर उस वृत्तिमें राग स्थिर नहीं रह सकता । जबतक उससे इतर अन्य सब प्रकारकी वृत्तियोंमें वैराग्य न हो । सम्प्रज्ञात - समाधिकी पराकाष्ठा विवेकख्याति है । उसमें भी जो वैराग्य है वह पर - वैराग्य कहलाता है; और निर्बीज - समाधिका साक्षात् सहायक होनेसे उसका अन्तरङ्ग साधन है । श्रद्धा, वीर्यके बिना किसी साधनका अनुष्ठान हो ही नहीं सकता । क्रियायोगके तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान नियममें आ जाते हैं । महाभारतमें भी योगके आठ अङ्ग बतलाये हैं- “ वेदेषु चाष्टगुणिनं योगमाहुर्मनीषिणः । ' मनीषिगण वेदोंमें योगको अष्टाङ्ग कहते हैं । विशेष वक्तव्य- - ( सूत्र २ ९ ) इस पादमें सूत्र ३ से १३ तक बतला आये हैं कि पुरुष क्रमशः क्लेशों और सकाम कर्मोंद्वारा ( अविद्यासे अस्मिता, अस्मितासे राग, रागसे द्वेष, इन दोनोंसे अभिनिवेश क्लेश कर्म, सकाम कर्मोंकी वासनाओंसे जन्म उससे सकाम , आयु, भोग और उनमें सकाम कर्मोंके पाप- -पुण्यके अनुसार दुःख - सुख ) बहिर्मुख होकर नाना प्रकारके दुःखोंको प्राप्त होता है । इन दुःखोंकी निवृत्तिके अन्तर्मुख होनेका सरल उपाय अष्टाङ्गयोग है । लिये इसी क्रमानुसार १. यम — बहिर्मुखताकी सबसे अन्तिम अवस्था मनुष्यका अन्य सब है । प्राणियोंके साथ व्यवहार इसलिये सबसे प्रथम इस व्यावहारिक जीवनको यमोंद्वारा सात्त्विक और दिव्य बनाना होता है । सकाम कर्म, जो जन्म, आयु और भोगके कारण हैं, निवृत्त हो जाते हैं । बाह्य व्यवहारसे सम्बन्ध रखनेवाले ( ३५५ )