पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 451–460

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 451 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र ४६ ] स्थिरसुखमासनम् * * * [ साधनपाद पहुँचनेकी सम्भावना नहीं है, यद्यपि इसमें समय अधिक लगेगा । साधारणतया छेदनका कार्य किसी धातुके तीक्ष्ण यन्त्रसे प्रति आठवें दिन उस शिराको बालके बराबर छेदकर घावपर कत्था और हरड़का चूर्ण लगाकर करते हैं । इसके छेदनके लिये नाखून काटनेवाला - जैसा एक तीक्ष्ण यन्त्र और खाल छीलनेके लिये एक दूसरे यन्त्रकी आवश्यकता होती है, जिससे कटा हुआ भाग फिर न जुड़ने पावे | इसमें नाड़ीके सम्पूर्ण अंशके एक साथ कट जानेसे वाक् तथा आस्वादन - शक्तिके नष्ट हो जानेका भय रहता है । इसलिये इसे किसी अभिज्ञ पुरुषकी सहायतासे करना चाहिये । छेदनकी आवश्यकता केवल उनको होती है, जिनकी जीभ और यह नाड़ी मोटी होती है । जिनकी जीभ लम्बी और यह नाड़ी पतली होती है, उन्हें छेदनकी अधिक आवश्यकता नहीं है I दूसरा एवं तीसरा साधन — चालन व दोहन – अँगूठे और तर्जनी अँगुलीसे अथवा बारीक वस्त्रसे जीभको पकड़कर चारों तरफ उलट - फेरकर हिलाने और खींचनेको चालन कहते हैं । मक्खन अथवा घी लगाकर दोनों हाथोंकी अँगुलियोंसे जीभका गायके स्तनदोहन - जैसे पुनः - पुनः धीरे - धीरे आकर्षण करनेकी क्रियाका नाम दोहन है । निरन्तर अभ्यास करते रहनेसे अन्तिम अवस्थामें जीभ इतनी लम्बी हो सकती है कि नासिकाके ऊपर भ्रूमध्यतक पहुँच जाय । इस मुद्राका बड़ा महत्त्व बतलाया गया है, इससे ध्यानकी अवस्था परिपक्व करनेमें बड़ी सहायता मिलती है । जिह्वाओंके भी नाना प्रकारके भेद देखनेमें आये हैं । किसी जिह्वामें सूताकार नाड़ीके स्थानमें मोटा मांस होता है, जिसके काटनेमें अधिक कठिनाई होती है । किसी - किसी जिह्वामें न यह नाड़ी होती है, न मांस । उसमें छेदनकी आवश्यकता नहीं है । केवल चालन एवं दोहन होना चाहिये । २ महामुद्रा — मूलबन्ध लगाकर बायें पैरकी एड़ीसे सीवन ( गुदा और अण्डकोषके मध्यका चार अंगुल स्थान ) दबाये और दाहिने पैर को फैलाकर उसकी अँगुलियोंको दोनों हाथोंसे पकड़े । पाँच घर्षण करके बायीं नासिकासे पूरक करे और जालन्धर - बन्ध लगाये । फिर जालन्धर - बन्ध खोलकर दाहिनी नासिकासे रेचक करे । यह वामाङ्गकी मुद्रा समाप्त हुई । इसी प्रकार दक्षिणाङ्गमें इस मुद्राको करना चाहिये । दूसरी विधि- -- -बायें पैरकी एड़ीको सीवन ( गुदा और उपस्थके मध्यके चार अंगुल भाग ) में बलपूर्वक जमाकर दायें पैरको लंबा फैलावे । फिर शनैः - शनैः पूरकके साथ मूल तथा जालन्धर - बन्ध लगाते हुए दायें पैरका अँगूठा पकड़कर मस्तकको दायें पैरके घुटनेपर जमाकर यथाशक्ति कुम्भक करे । कुम्भकके समय पूरक की हुई वायुको कोष्ठमें शनैः - शनैः फुलावे और ऐसी भावना करे कि प्राण कुण्डलिनीको जाग्रत् करके बैठ सुषुम्णामें प्रवेश कर रहा है, तत्पश्चात् मस्तकको घुटनेसे शनैः - शनैः रेचक करते हुए उठाकर यथास्थितिमें जाय । इसी प्रकार दूसरे अङ्गसे करना चाहिये । प्राणायामकी संख्या एवं समय बढ़ाता रहे । फल — मन्दाग्नि, अजीर्ण आदि उदरके रोगों तथा प्रमेहका नाश, क्षुधाकी वृद्धि और कुण्डिलिनीका जाग्रत् होना । ३ अश्विनी मुद्रा – सिद्ध अथवा पद्मासनसे बैठकर योनिमण्डलको अश्वके सदृश पुनः - पुनः सिकोड़ना # मनी अश्विनी मुद्रा कहलाती है । होती है -यह मुद्रा प्राणके उत्थान और कुण्डलिनी शक्तिके जाग्रत् करनेमें सहायक फल-( ४२५ )

पृष्ठ 452

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 452 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ४६ अपानवायुको शुद्ध और वीर्यवाही स्नायुओंको मजबूत करती है । # शक्तिचालिनी मुद्रा -1 –सिद्ध अथवा पद्मासनसे बैठकर हाथोंकी हथेलियाँ पृथ्वीपर जमा दे । बीस-४ पचीस बार शनैः - शनैः दोनों नितम्बोंको पृथ्वीसे उठा - उठाकर ताड़न करे । तत्पश्चात् मूलबन्ध लगाकर दोनों नासिकाओंसे अथवा वामसे अथवा जो स्वर चल रहा हो उस नासिकासे पूरक करके प्राणवायुको अपानवायुसे संयुक्त करके जालन्धर - बन्ध लगाकर यथाशक्ति कुम्भक करे । कुम्भकके समय अश्विनीमुद्रा करे अर्थात् गुह्यप्रदेशका आकर्षण - विकर्षण करता रहे । तत्पश्चात् जालन्धर - बन्ध खोलकर यदि दोनों नासिकापुटसे पूरक किया हो तो दोनोंसे अथवा पूरकसे विपरीत नासिकापुटसे रेचक करे और निर्विकार होकर एकाग्रतापूर्वक बैठ जाय । घेरण्डसंहितामें इस मुद्राको करते समय बालिश्त - भर चौड़ा, चार अंगुल लम्बा, कोमल, श्वेत और सूक्ष्म वस्त्र नाभिपर कटिसूत्रसे बाँधकर सारे शरीरपर भस्म मलकर करना बतलाया है । फल — सर्वरोग - नाशक और स्वास्थ्यवर्द्धक होनेके अतिरिक्त कुण्डिलिनी - शक्तिको जाग्रत् करनेमें अत्यन्त सहायक है । इससे साधक अवश्य लाभ प्राप्त करें । # ५ योनिमुद्रा – सिद्धासनसे बैठ सम - सूत्र हो षण्मुखी मुद्रा लगाकर अर्थात् दोनों अँगूठोंसे दोनों कानोंको, दोनों तर्जनियोंसे दोनों नेत्रोंको, दोनों मध्यमाओंसे नाकके छिद्रोंको बंद करके और दोनों अनामिका एवं कनिष्ठकाओंको दोनों ओठोंके पास रखकर काकीमुद्राद्वारा अर्थात् जिह्वाको कौएकी चोंचके सदृश बनाकर उसके द्वारा प्राणवायुको खींचकर अधोगत अपानवायुके साथ मिलावे । तत्पश्चात् ओ ३ म्का जाप करता हुआ ऐसी भावना करे कि उसकी ध्वनिके साथ परस्पर मिली हुई वायु कुण्डलिनीको जाग्रत् करके षट्चक्रोंका भेदन करते हुए सहस्रदल - कमलमें जा रही है । इससे अन्तर्ज्योतिका साक्षात्कार होता है । ६ योगमुद्रा — मूलबन्धके साथ पद्मासनसे बैठकर प्रथम दोनों नासिकापुटोंसे पूरक करके जालन्धर - बन्ध लगावे, तत्पश्चात् दोनों हाथोंको पीठके पीछे ले जाकर बायें हाथसे दायें हाथकी और दायें हाथसे बायें हाथकी कलाईको पकड़े, शरीरको आगे झुकाकर पेटके अंदर एड़ियोंको दबाते हुए सिरको जमीनपर लगा दे । इस प्रकार यथाशक्ति कुम्भक करनेके पश्चात् सिरको जमीनसे उठाकरजालन्धर - बन्ध खोलकर दोनों नासिकाओंसे रेचन करे । फल- -पेटके रोगोंको दूर करने और कुण्डलिनी शक्तिको जाग्रत् करनेमें सहायक ७ शाम्भवी मुद्रा - मूल और उड्डीयान बन्धके साथ सिद्ध अथवा पद्मासनसे बैठकर होती है । अग्रभाग अथवा भ्रूमध्यमें दृष्टिको स्थिर करके ध्यान जमाना शाम्भवी मुद्रा कहलाती नासिकाके है । ८ तड़ागी मुद्रा — तड़ाग ( तालाब ) के सदृश कोष्ठको वायुसे भरनेको शवासनसे चित्त लेटकर जिस नासिकाका स्वर चल रहा हो तड़ागी मुद्रा कहते हैं । फैलाकर वायुसे भर ले । तत्पश्चात् कुम्भक करते हुए उससे पूरक करके तालाबके समान पेटको तालाबका जल हिलता है । कुम्भकके पश्चात् सावधानीसे वायुको वायुको पेटमें इस प्रकार हिलावे जिस प्रकार सर्वरोग समूल नाश होते हैं । शनैः - शनैः रेचन कर दे, इससे पेटके ९ विपरीतकरणी मुद्रा – शीर्षासन कपालासन रखकर उसपर अपने मस्तकको रखे । फिर दोनों हाथोंके – पहिले जमीनपर मुलायम गोल लपेटा हुआ वस्त्र तलोंको मस्तकके पीछे लगाकर शरीरको उलटा ( ४२६ )

पृष्ठ 453

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 453 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र ४६ ] स्थिरसुखमासनम् * * [ साधनपाद ऊपर उठाकर सीधा खड़ा कर दे । थोड़े ही प्रयत्नसे मूल और उड्डीयान स्वयं लग जाता है । यह मुद्रा पद्मासनके साथ भी की जा सकती है । इसको ऊर्ध्व - पद्मासन कहते हैं । आरम्भमें इसको दीवारके सहारे करनेमें आसानी होगी । फल – वीर्यरक्षा, मस्तिष्क, नेत्र, हृदय तथा जठराग्निका बलवान् होना, प्राणकी गति स्थिर और शान्त होना, कब्ज, जुकाम, सिरदर्द आदिका दूर होना, रक्तका शुद्ध होना और कफके विकारका दूर होना । १० वज्रोली मुद्रा - मूत्रत्यागके समय कई बार मूत्रको बलपूर्वक ऊपरकी ओर आकर्षित करे । ऐसा करते समय इस बातको ध्यानसे देखे कि मूत्रधारा कितने नीचेसे आकर्षित होकर लौटती है और पुनः उतरते समय कितना समय लगता है । निरन्तर अभ्याससे जब मूत्रधार दस - बारह अंगुल नीचेसे आकर्षित होकर खींची जा सके और उतारनेमें कुछ शक्ति लगाना पड़े तो समझना चाहिये कि वज्रोली क्रिया सिद्ध हो गयी है । तत्पश्चात् क्रमशः जल, दूध, तेल अथवा घी, शहद और अन्तमें पारा खींचनेका अभ्यास करे । दूसरी विधि - एक चौदह अंगुल रबरका कैथीटर ( जो कि अंग्रेजी दवाखानोंमें मिल सकता है ) पानीमें उबालकर लिङ्ग - छिद्रमें प्रवेश करनेका अभ्यास करे । यह अभ्यास एक अंगुलसे प्रारम्भ करके क्रमशः एक - एक अंगुल बढ़ाता जाय । जब बारह अंगुल प्रविष्ट होने लगे तो चौदह अंगुल लम्बी और लिङ्गके छिद्र - अनुसार चौड़ी जस्तेकी सलाई जो दो अंगुल मुड़ी हुई ऊपरको मुँहवाली हो जिससे कि लिङ्गेन्द्रियमें प्रविष्ट कर सके उपर्युक्त रबरके कैथीटरकी रीति से लिङ्ग - छिद्रमें प्रवेश करनेका अभ्यास करे । जब बारह अंगुलतक प्रविष्ट होने लगे, तब चौदह अंगुल लम्बी लिङ्गके छिद्र - अनुसार चौड़ी अंदरसे पोली एक चाँदीकी सलाई बनवावे, जो दो अंगुल टेढ़ी और ऊर्ध्वमुखी हो । इस टेढ़े भागको लिङ्ग - छिद्रमें प्रविष्ट करके दो अंगुल बाहर रहने दे, फिर सुनारकी धमनीके सदृश धमनीसे उस सलाईमें लगातार फूत्कार करे । इस प्रकार लिङ्गमार्गकी अच्छी प्रकार शुद्धि हो जानेपर वायुको खींचने और छोड़नेका अभ्यास करे, इस अभ्यासके सिद्ध हो जानेपर लिङ्ग - छिद्रसे उपर्युक्त रीतिसे जल, तेल, दुध, शहद और पारेके खींचनेका क्रमशः अभ्यास करे । कैथीटर और यन्त्र इन्द्रीके छिद्र और उसके आकारके अनुसार होने चाहिये । फल- -लिङ्गेन्द्रियके छिद्रकी शुद्धिं और अपानवायुपर पूर्णतया अधिकार प्राप्त हो जाता है, पथरीको तोड़कर निकालनेमें सहायता मिलती है । इस मुद्राका फल हठयोगके शास्त्रमें अलौकिक सिद्धियाँ बतलायी गयी हैं; परंतु जरा - सी असावधानी होनेपर इन्द्रिय - छिद्रमें विकार होनेसे भयङ्कर शारीरिक रोग उत्पन्न होने तथा स्त्रीके रज खींचनेकी चेष्टामें ऊँचे - से - ऊँचे अभ्यासीके लिये भी आध्यात्मिक पतन होनेकी अधिक सम्भावना है । इस प्रकारके बहुत - से उदाहरण दृष्टिगोचर हुए हैं । इन मुद्राओं आदिको किसी अनुभवीकी सहायतासे करना चाहिये अन्यथा लाभके स्थानमें हानि पहुँचनेकी अधिक सम्भावना है । ११ उन्मुनि मुद्रा — किसी सुख - आसनसे बैठकर आधी खुली हुई और आधी बंद आँखोंसे नासिकाके अग्रभागपर टकटकी लगाकर देखते रहना यह उन्मुनि मुद्रा कहलाती है । इससे मन एकाग्र होता है । काकी और भुजङ्गी मुद्राका वर्णन पचासवें सूत्रके विशेष वक्तव्यमें किया जायगा । चित लेटकर करनेके आसन - नासाग्र - स्पर्शासन – पृथिवीपर समसूत्रमें पीठके बल सीधा लेट जाय । दृष्टिको नासाग्रमें १ पादाङ्गुष्ठ-( ४२७ )

पृष्ठ 454

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 454 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पातञ्जलयोगप्रदीप @ NAL सिद्धासन गोमुखासन पादाङ्गुष्ठ - नासाग्र - स्पर्शासन पादाङ्गुष्ठ- नासाग्र - स्पर्शासन कार छ प्रकार -पश्चिमोत्तानासन सम्प्रसारण भू नमनासन

पृष्ठ 455

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 455 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पातञ्जलयोगप्रदीप III जानुशिरासन आकर्णधनुपासन शीर्षपादासन ह्रदयस्तम्भासन उत्थित विपादासन द्विपाद - चक्रासन पा ० यो ० प्र ० १५-

पृष्ठ 456

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 456 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ४६ जमाकर दायें पैरके अँगूठेको पकड़कर नासिकाके अग्रभागको स्पर्श करे, इसी प्रकार पुनः - पुनः करे, मस्तक, बायाँ पैर और नितम्ब पृथिवीपर जमे रहें । इसी प्रकार दायें पैरको फैलाकर बायें पैरके अँगूठेको नासिकाके अग्रभागसे स्पर्श करे । फिर दोनों पैरोंके अंगूठोंको दोनों हाथोंसे पकड़कर नासिकाके अग्रभागको स्पर्श करे । कई दिनके अभ्यासके पश्चात् अँगूठा नासिकाके अग्रभागको स्पर्श करने लगेगा । फल- -कमरका दर्द, घुटनेकी पीड़ा, कंद - स्थानकी शुद्धि एवं उदर - सम्बन्धी सर्वरोगोंका नाश करता है । यह आसन स्त्रियोंके लिये भी लाभदायक है । २ पश्चिमोत्तानासन — दोनों पाँवोंको उड्डीयान और मूलबन्धके साथ लम्बा सीधा फैलावे । दोनों हाथोंकी अँगुलियोंसे दोनों पैरोंकी अँगुलियोंको खींचकर, शरीरको झुकाकर, माथेको घुटनेपर टिका दे, यथाशक्ति वहींपर टिकाये रहे । प्रारम्भमें दस - बीस बार शनैः - शनैः रेचक करते हुए मस्तकको घुटनेपर ले जाय और इसी प्रकार पूरक करते हुए ऊपर उठाता चला जाय । फल — पाचनशक्तिका बढ़ाना, कोष्ठबद्धता दूर करना, सब स्नायु और कमर तथा पेटकी नस - नाड़ियोंको शुद्ध एवं निर्मल करना, बढ़ते हुए पेटको पतला करना इत्यादि । इस आसनको कम - से - कम दस मिनटतक करते रहनेके पश्चात् उचित लाभ प्रतीत होगा । ३ सम्प्रसारण भू- नमनासन - - ( विस्तृत पाद भू- नमनासन ) पैरोंको लम्बा करके यथाशक्ति चौड़ा फैलावे । तत्पश्चात् दोनों पैरोंके अँगूठेको पकड़कर सिरको भूमिमें टिका दे । फल – इससे ऊरु और जङ्घाप्रदेश तन जाते हैं । टाँग, कमर, पीठ और पेट निर्दोष होकर वीर्य -स्थिर होता है । ४ जानुशिरासन – एक पाँवको सीधा फैलाकर दूसरे पाँवकी एड़ी गुदा और अण्डकोषके बीचमें लगाकर उसके पाद - तलसे फैले हुए पाँवकी रानको दबावे । मूल और उड्डीयान - बन्धके साथ फैले हुए पैरकी अँगुलियोंको दोनों हाथोंसे खींचकर धीरे - धीरे आगेको झुकाकर माथेको पसारे हुए घुटनेपर लगा दे, इसी प्रकार दूसरे पाँवको फैलाकर माथेको घुटनेपर लगावे । फल- -इस आसनके सब लाभ पश्चिमोत्तान - आसनके समान हैं । वीर्य - रक्षा तथा कुण्डलिनी जाग्रत् करनेमें सहायक होना यह इसमें विशेषता है । इसको भी वास्तविक लाभ - प्राप्तिके लिये कम - से - कम दस मिनट करना चाहिये । ५ आकर्ण धनुषासन — दोनों पाँव एक - दूसरेके साथ जमीनपर फैलाकर दोनों हाथोंकी अँगुलियोंसे दोनों पाँवके अँगूठे पकड़ ले । एक पाँव सीधा रखकर दूसरे पाँवको उठाकर उसी ओरके कानको लगावे, हाथों और पैरोंके हेर - फेरसे यह आसन चार प्रकारसे किया जा सकता है- -( क ) दाहिने हाथसे दाहिने पाँवका अँगूठा पकड़कर बायें पाँवका अँगूठा बायें हाथसे खींचकर बायें कानको लगावे । ( ख ) बायें हाथसे बायें पाँवका अँगूठा पकड़कर दाहिने पाँवका अँगूठा दाहिने हाथसे खींचकर दाहिने कानको लगावे । ( ग ) दाहिने हाथसे बायें पाँवका अँगूठा पकड़कर उसके नीचे दाहिने पाँवका अँगूठा खींचकर बायें कानको लगावे । बायें हाथसे ( ४२८ )

पृष्ठ 457

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 457 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सूत्र ४६ ] स्थिरसुखमासनम् * * * [ साधनपाद ( घ ) बायें हाथसे दाहिने पाँवका अँगूठा पकड़कर उसके नीचे बायें पाँवका अँगूठा दाहिने हाथसे खींचकर दाहिने कानको लगावे । फल – बाहु, घुटने, जङ्घा आदि अवयवोंको लाभ पहुँचता है । ६ शीर्ष - पादासन — चित लेटकर सिरके पृष्ठ - भाग और पैरोंकी दोनों एड़ियोंपर शरीरको कमानके सदृश कर दे । इस आसनको पूरक करके करे और ठहरे हुए समयमें कुम्भक बना रहे, तत्पश्चात् धीरेसे रेचक करना चाहिये । फल- — मेरुदण्डका सीधा और मृदु होना, सम्पूर्ण शरीरकी नाड़ियों, गर्दन और पैरोंका मजबूत होना । ७ हृदयस्तम्भासन — चित लेटकर दोनों हाथोंको सिरकी ओर और दोनों पैरोंको आगेकी ओर फैलावे, फिर पूरक करके जालन्धर - बन्धके साथ दोनों हाथों और दोनों पैरोंको छः - सात इंचकी ऊँचाईतक धीरे - धीरे उठावे और वहींपर यथाशक्ति ठहरावे, जब श्वास निकालना चाहे तब पैरों और हाथोंको जमीनपर रखकर धीरे - धीरे रेचक करे । फल – छाती, हृदय, फेफड़ेका मजबूत और शक्तिशाली होना और पेटके सब प्रकारके रोगोंका दूर होना । ८ उत्तानपादासन — चित लेटकर शरीरके सम्पूर्ण स्नायु ढीले कर दे, पूरक करके धीरे - धीरे दोनों पैरोंको ( अँगुलियोंको ऊपरकी ओर खूब ताने हुए ) ऊपर उठावे, जितनी देर आरामसे रख सके रखकर पुनः धीरे - धीरे भूमिपर ले जाय और श्वासको धीरे - धीरे रेचक कर दे । प्रथम बार तीस डिग्रीतक, दूसरी बार पैंतालीस डिग्रीतक, तीसरी बार साठ डिग्रीतक पैरोंको उठावे । इस आसनके आधुनिक अनुभवियोंने नौ भेद किये हैं-( क ) द्विपाद - चक्रासन — हाथोंके पंजे नितम्बके नीचे रख, चित लेट, एक पैर घुटनेमें मोड़कर घुटनेको पेटके पास लाकर तथा दूसरा पैर किंचित् ऊपर उठाकर बिलकुल सीधा रखे; और इस प्रकार पैर चलावे जैसे साइकिलपर बैठकर चलाते हैं । इससे नितम्ब, कमर, पेट और टाँगें निर्दोष होकर वीर्य शुद्ध, पुष्ट और स्थिर रहता है । ( ख ) उत्थित द्विपादासन —चित लेटकर दोनों पैर पैंतालीस डिग्रीतक ऊपर उठाकर जमीनसे बिना लगाये धीरे - धीरे ऊपर - नीचे करे । इससे पेटके स्नायु मजबूत होते हैं और मलत्याग - क्रिया ठीक होती है । ( ग ) उत्थित एकैक - पादासन — -चित लेटकर, दोनों पैर ( एक पैर बीस डिग्रीमें और दूसरा पैर ४५ डिग्रीमें ) अधरमें रखकर जमीनसे बिना लगाये हुए ऊपर - नीचे करे । इससे कमरके स्नायु मजबूत होते हैं, मलोत्सर्ग - क्रिया ठीक होती है, वीर्य शुद्ध और स्थिर होता है । ( घ ) उत्थितहस्त - मेरुदण्डासन - हाथ - पैर एक रेखामें सीधे फैलाकर चित लेटे । दोनों हाथ उठाकर पैरोंकी ओर ले जाय, इस प्रकार पुनः - पुनः पीठके बल लेटकर पुनः - पुनः उठे । इससे कमर, छाती, रीढ़ और पेट निर्दोष होते हैं1 ( ङ ) शीर्षबद्धहस्त - मेरुदण्डासन - पूर्ववत् पीठके बल लेटकर, सिरके पीछे हाथ बाँधे, बिना पैर उठाये कमरसे शरीर ऊपर उठावे । इससे पेट, छाती, गर्दन, पीठ और रीढ़के दोष दूर होते हैं । , ( ४२ ९ )

पृष्ठ 458

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 458 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ४६ ( च ) जानुस्पृष्टभाल - मेरुदण्डासन — उपर्युक्त आसन करके घुटना मोड़कर बारी - बारी धीरे - धीरे माथेमें लगावे, नीचेका पैर भूमिपर टिका हुआ सीधा रहे । इससे यकृत् ( जिगर ), प्लीहा ( तिल्ली ), फेफड़े आदि नीरोग होकर पेट, गर्दन, कमर, रीढ़, ऊरु बलवान् और निर्विकार होते हैं । ( छ ) उत्थित हस्तपाद - मेरुदण्डासन - पूर्ववत् पीठके बल लेटकर हाथ - पैर दोनों एक साथ ऊपर उठावे और पुनः पूर्ववत् एक रेखामें ले जाय, चार - पाँच बार ऐसा करे । इससे पेट, छाती, कमर और ऊरु निर्दोष होते हैं I ( ज ) उत्थितपाद - मेरुदण्डासन – पैर सामनेको फैलाकर हाथोंकी कोहनियोंके बल धड़को उठावे, अनन्तर पैर पैंतालीस डिग्रीतक ऊपर उठाकर ऊपर - नीचे करे । इससे कमर, रीढ़ और पेट निर्दोष होते हैं । ( झ ) भालस्पृष्ट द्विजानु - मेरुदण्डासन- - ऊपर कहे अनुसार ही करे, किंतु इसके अतिरिक्त सिर दोनों घुटनोंमें लगा दे । इससे पीठ, छाती, रीढ़, गर्दन और कमरके सब विकार दूर होते हैं ९ हस्त - पादाङ्गुष्ठासन — चित लेटकर दोनों नासिकासे पूरक करके बायें हाथको कमरके निकट लगाये रखे, दूसरे दाहिने हाथसे दाहिने पैरके अँगूठेको पकड़े और समूचे शरीरको जमीनपर सटाये रखे, दाहिना हाथ और पैर ऊपरकी ओर उठाकर तना हुआ रखे । इसी प्रकार दाहिने हाथको दाहिनी ओर कमरसे लगाकर बायें हाथसे बायें पैरके अँगूठेको पकड़कर पूर्ववत् करना चाहिये । फिर दोनों हाथोंसे दोनों पैरोंके अँगूठे पकड़कर उपर्युक्त विधिसे करना चाहिये । फल — सब प्रकारके पेटके रोगोंका दूर होना, हाथ - पैरोंका रक्तसंचार और बलवृद्धि । १० स्नायु - संचालनासन — चित लेटकर दोनों पैरोंको पृथिवीसे एक इंच उठाकर पूरक करके जालन्धर - बन्ध लगा ले और हाथोंको सिरकी ओर ले जाकर एक इंच ऊपर उठावे, बायें पैर तथा बायें हाथको मोड़े और फैलावे, फिर दाहिने हाथ तथा दाहिने पैरको मोड़े और फैलावे, जबतक कुम्भक रह सके इसी प्रकार उलट - फेरसे हाथों और पैरोंको मोड़ता और फैलाता रहे, तत्पश्चात् जालन्धर - बन्ध खोलकर हाथ और पैरोंको जमीनपर रखकर धीरे - धीरे रेचक करे । फल- ल - शरीरके सब स्नायुओंमें प्रगति उत्पन्न होना, पेटकी शिराएँ, घुटने एवं मेरुदण्डका पुष्ट होना । ११ पवन - मुक्तासन — चित लेटकर पहले एक पाँवको सीधा फैलाकर दूसरे पाँवको घुटनेसे मोड़कर पेटपर लगाकर दोनों हाथोंसे अच्छी प्रकार दबाये, फिर इस पाँवको सीधा करके दूसरे पाँवसे भी पेटको खूब इसी प्रकार दबावे । तत्पश्चात् दोनों पाँवोंको इसी प्रकार दोनों हाथोंसे पेटपर दबावे । पूरक र कुम्भकके साथ करनेमें अधिक लाभ होता है । फल — उत्तानपाद - आसनके समान इसके सब लाभ हैं । वायुको बाहर निकालनेमें विशेषरूपसे सहायक होता है, बिस्तरपर लेटकर भी किया जा सकता है, देरतक कई तथा शौचशुद्धिमें मिनटतक करते रहनेसे वास्तविक लाभकी प्रतीति होगी । १२ ऊर्ध्व - सर्वाङ्गासन – भूमिपर चित लेटकर दोनों पैरोंको तानकर धीरे - धीरे कंधोंऔर सिरके सहारेसे ( ४३० )

पृष्ठ 459

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 459 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पातञ्जलयोगप्रदीप II उत्थित एकैकपादासन उत्थित हस्त मेरुदण्डासन A. शीर्षबद्ध - हस्त मेरुदण्डासन जानु स्पृष्ट - भाल मेरुदण्डासन उत्थित हस्तपाद मेरुदण्डासन उत्थितपाद मेरुदण्डासन FATTE लकड भालस्पृष्ट - द्विजानु मेरुदण्डासन

पृष्ठ 460

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 460 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ साधनपाद स्थिरसुखमासनम्* सूत्र ४६ ] * *************** पूर्ण शरीरको ऊपर खड़ा कर दे । आरम्भमें हाथोंके सहारेसे उठावे, कमर और पैर सीधे रहें, दोनों पैरोंके अँगूठे दोनों आँखोंके सामने रहें । मस्तक कमजोर होनेके कारण जो शीर्षासन नहीं कर सकते हैं, उनको इस आसनसे लगभग वही लाभ प्राप्त हो सकते हैं । एक पाँवको आगे और दूसरेको पीछे इत्यादि करनेसे इसके कई प्रकार हो जाते हैं । इसमें ऊर्ध्व - पद्मासन भी लगा सकते हैं । फल – रक्तशुद्धि, भूखकी वृद्धि और पेटके सब विकार दूर होते हैं । सब लाभ शीर्षासन-- -समान जानना चाहिये । १३ सर्वाङ्गासन— ( हलासन ) – चित लेटकर दोनों पाँवोंको उठाकर सिरके पीछे जमीनपर इस प्रकार -लगावे कि पाँवके अँगूठे और अंगुलियाँ ही जमीनको स्पर्श करें, घुटनोंसहित पाँव सीधे समसूत्रमें रहें, हाथ पीछे भूमिपर रहें । दूसरा प्रकार — दोनों हाथोंको सिरकी ओर ले जाकर पैरके अँगूठोंको पकड़कर ताने । फल-: – कोष्ठबद्धता दूर होना, जठराग्निका बढ़ना, आँतोंका बलवान् होना, अजीर्ण, प्लीहा, यकृत् तथा अन्य सब प्रकारके रोगोंकी निवृत्ति और क्षुधाकी वृद्धि । १४ कर्णपीडासन - हलासन करके घुटने कानोंपर लगानेसे कर्णपीडासन बनता है, इसमें दोनों हाथोंको पीठकी ओर जमीनमें लगाना चाहिये । फल – सर्वाङ्गासनके समान, पेटके रोगोंके लिये इसमें कुछ अधिक विशेषता है । नादानुसंधानमें भी सहायक है । देरतक करनेसे वास्तविक लाभकी प्रतीति होगी । १५ चक्रासन — चित लेटकर हाथों और पैरोंके पंजे भूमिपर लगाकर कमरका भाग ऊपर उठावे । हाथ पैरोंके पंजे जितने पास - पास आ सकें उतने लानेका यत्न करे । यह आसन खड़ा होकर पीछेसे हाथोंको जमीनपर रखनेसे भी होता है । फल — कमर और पेटके स्थानको इससे अधिक लाभ पहुँचता है, पृष्ठवंश सदा आगेकी ओर झुकता है, उसका दोष इस आसनद्वारा विशुद्ध झुकाव होनेसे दूर हो जाता है । १६ गर्भासन – चित लेटकर दोनों पैरोंको ऊपर उठाकर सिरकी ओर जमीनमें लगावे, फिर दोनों पैरोंको गर्दनमें एकपर दूसरे पैरको देकर फँसावे, तत्पश्चात् दोनों हाथोंको पैरोंके अंदरकी ओरसे ले जाकर कमरको एक - दूसरें हाथसे पकड़कर बाँधे । इससे पेटके सब प्रकारके रोग, कोष्ठबद्ध, यकृत, प्लीहा ( तिल्ली ) आदि दूर होते हैं । १७ शवासन ( विश्रामासन ) – शरीरके सब अङ्गोंको ढीला करके मुर्देके समान लेट जाय । सब आसनोंके पश्चात् थकान दूर करने और चित्तको विश्राम देनेके लिये इस आसनको करे । पेटके बल लेटकर करनेके आसन १८ मस्तक - पादांगुष्ठासन — पेटके बल लेटकर सारे शरीरको मस्तक और पैरोंके अँगूठेके उठाकर कमानके सदृश शरीरको बना दे । शरीरको उठाते हुए पूरक, ठहराते हुए कुम्भक और उतारते बलपर हुए रेचक करे । फल — मस्तक, छाती, पैर, पेटकी आँतें तथा सम्पूर्ण शरीरकी नाड़ियाँ शुद्ध औरबलवान् होती हैं । ( ४३१ )