पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 461–470
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 461–470
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पातञ्जलयोगप्रदीप हस्तपादाङ्गुष्ठासन ( पहिला प्रकार ) पवनमुक्तासन अणनीयर उर्ध्व सर्वाङ्गासन हस्तपादाङ्गुष्ठासन उर्ध्व - सर्वाङ्गासन शर शिक लिहि F सर्वाङ्गासन ( हलासन )
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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ४६ .......... पृष्ठवंश एवं मेरुदण्डके लिये विशेष लाभ पहुँचता है । १ ९ नाभ्यासन — पेटके बल समसूत्रमें लेटकर दोनों हाथोंको सिरकी ओर आगे दो हाथकी दूरीपर एक - दूसरे हाथसे अच्छी तरह फैलावे, दोनों पैरोंको भी दो हाथकी दूरीपर ले जाकर फैलावे । फिर पूरक करके केवल नाभिपर समूचे शरीरको उठावे, पैरों और हाथोंको एक या डेढ़ हाथकी ऊँचाईपर ले जाय, सिर और छातीको आगेकी ओर उठाये रहे, जब श्वास बाहर निकलना चाहे तब हाथों और पैरोंको जमीनपर रखकर रेचक करे । फल- — नाभिकी शक्तिका विकास होना, मन्दाग्नि, अजीर्णता, वायु - गोला तथा अन्य पेटके रोगोंका तथा वीर्यदोषका दूर होना । २० मयूरासन — दोनों हाथोंको मेज अथवा भूमिपर जमाकर दोनों हाथोंकी कोहनियाँ नाभिस्थानके दोनों पार्श्वसे लगाकर मूल तथा उड्डीयान - बन्धके साथ सारे शरीरको उठाये रहे । पाँव जमीनपर लगे रहनेसे हंसासन बनता है । फल — जठराग्निका प्रदीप्त होना, भूख लगना, वात - पित्तादि दोषोंको तथा पेटके रोगों गुल्म - कब्जादिका दूर करना और शरीरको नीरोग रखना । वस्ती तथा एनिमाके पश्चात् इसके करनेसे पानी तथा आँव जो पेटमें रह जाती है, वह निकल जाती है, मेरुदण्ड सीधा होता है । २१ भुजङ्गासन ( सर्पासन ) - आधुनिक आसन - व्यायामके अनुभवियोंने भुजङ्गासनके निम्न तीन भेद किये हैं । ( क ) उत्थितैकपाद - भुजङ्गासन – पेटके बल लेटकर हाथ छातीके दोनों ओरसे कोहनियोंमेंसे घुमाकर भूमिपर टिकावे, भुजङ्गके सदृश छाती ऊपरको उठाकर दृष्टि सामने रखे, एक पैर भूमिपर टिका रहे, दूसरा पैर घुटनेको बिना मोड़े जितना जा सके ऊपर उठावे; इसी प्रकार बारी - बारीसे पैरोंको नीचे -ऊपर उ करे । इससे कटि - दोष, यकृत, प्लीहादिके विकार दूर होते हैं । ( ख ) भुजङ्गासन — पैरोंके पंजे उलटी ओरसे भूमिपर टिकाकर हाथोंको भी भूमिपर किञ्चित् टेढ़े रखकर धड़को कमरसे उठाकर भुजङ्गाकार होवे । इससे पेट, छाती, कमर, ऊरु, मेरुदण्ड आदिके सब दोष नाश होते हैं । ( ग ) सरलहस्त - भुजङ्गासन — हाथोंको भूमिपर सीधा रखकर पैरोंको पीछेकी ओर ले जाकर दोनों हाथोंके बीच कमर आ जाय इस रीतिसे कमर झुकाकर छाती और गर्दन भरसक ऊपर उठाकर आकाशकी ओर देखे । इससे पेटकी चरबी निकल जाती है, पेट, कमर और गर्दनके सब विकार दूर होते हैं सीधे । २२ शलभासन — शलभ टिड्डीको कहते हैं । पेटके बल लेटकर दोनों हाथोंकी अँगुलियोंको मुट्ठी बाँधकर कमरके पास लगावे, तत्पश्चात् धीरे - धीरे पूरक करके छाती तथा सिरको हाथोंके बल एक पैरको यथाशक्ति एक - डेढ़ हाथकी ऊँचाईपर ले जमीनमें लगाये हुए चाहे तब धीरे - धीरे पैरको जमीनपर रखकर शनैः - शनैः रेचक करे जाकर । इसी ठहराये प्रकार दूसरे रहे, जब श्वास निकलना दोनों पैरोंको उठावे । पैरको उठावे, फिर फल — जंघा, पेट, बाहु आदि भागोंको लाभ पहुँचता है, पेटकी आँतें मजबूत प्रकारके उदर विकार दूर होते हैं । होती हैं और सब ( ४३२ )
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पातञ्जलयोगप्रदीप दूसरा प्रकार सर्वाङ्गासन ( हलासन ) चक्रासन मस्तक - पादाङ्गुष्ठासन नाभ्यासन प्रयूक्सन.
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पातञ्जलयोगप्रदीप भुजंगासन - भुजंगासन उत्वितैकपाद भुजंगासन धनुरासन
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सूत्र ४६ ] स्थिरसुखमासनम् ' * [ साधनपाद * २३ धनुरासन — पेटके बल लेटकर दोनों हाथोंको पीठकी ओर करके दोनों पैरोंको पकड़ लेवे और शरीरको वक्र - भावसे रखे । कहीं - कहीं इस आसनको वज्रासनकी भाँति एड़ियोंपर बैठकर पीछेकी ओर झुककर करना बतलाया है । फल — कोष्ठबद्धादि उदरके सब विकारोंका दूर होना, भूख तथा जठराग्निका प्रदीप्त होना बैठकर करनेके आसन । २४ मत्स्येन्द्रासन — इसको पाँच भागोंमें विभक्त करनेमें सुगमता होगी — ( क ) बायें पाँवका पंजा दाहिने पाँवके मूलमें इस प्रकार रखे कि उसकी एड़ी ट्रेंडीमें लगे और अङ्गुलियाँ पाल्थीके बाहर न हों । ( ख ) दायाँ पाँव बायें घुटनेके पास पञ्जा भूमिपर लगाकर रखे । ( ग ) बायाँ हाथ दाहिने घुटनेके बाहरसे चित डालकर उसकी चुटकीमें दाहिने पाँवका अँगूठा पकड़े, उस दाहिने पाँवके पंजेको बाहर सटाकर रखे । ( घ ) दाहिना हाथ पीठकी ओरसे फिराकर उससे बायें पैरकी जंघा पकड़ ले । ( ङ ) मुख तथा छाती पीछेकी ओर फिराकर ताने तथा नासाग्रमें दृष्टि रखे । इसी प्रकार दूसरी ओरसे करे । फल — पीठ, पेटके नल, पाँव, गला, बाहु, कमर, नाभिके निचले भाग तथा छातीके स्नायुओंका अच्छा खिंचाव होता है, जठराग्नि प्रदीप्त होती है और पेटके सब रोग आमवात परिणाम - शूल तथा आँतोंके सब रोग नष्ट होते हैं । २५ वृश्चिकासन — कोहनीसे पंजेतकका भाग भूमिपर रखकर उसके सहारे सब शरीरको सँभालकर दीवारके सहारे पाँवको ऊपर ले जाय, तत्पश्चात् पाँवको घुटनोंमें मोड़कर सिरके ऊपर रख दे । ' दूसरे प्रकारसे केवल पञ्जोंके ऊपर ही सब शरीरको सँभालकर रखनेसे भी यह आसन किया जाता है । यह आसन कठिन है । मोड़चालसे चलनेवाले लड़के इंस आसनको शीघ्र कर सकते हैं । फल- – हाथों और बाहोंमें बलवृद्धि, पेट तथा आँतोंका निर्दोष होना, शरीरका फुर्तीला और हलका होना, मेरुदण्डका शुद्ध और शक्तिशाली होना, तिल्ली, यकृत् एवं पाण्डु रोग आदिका दूर होना । २६ उष्ट्रासन — वज्रासनके समान हाथोंसे एड़ियोंको पकड़कर बैठे । पश्चात् हाथोंसे पाँवोंको पकड़े हुए चूतड़ोंको उठाये, सिर पीछे पीठकी ओर झुकावे और पेट भरसक आगेकी ओर निकाले । फल- – यकृत्, प्लीहा, आमवात आदि पेटके सब रोग दूर होते हैं और कण्ठ नीरोग होता है । २७ सुप्त वज्रासन – वज्रासन करके चित लेटे, सिरको जमीनसे लगा हुआ रखे, पीठके भागको भरसक जमीनसे ऊपर उठाये रखे और दोनों हाथोंको बाँधकर छातीके ऊपर रखे अथवा सिरके नीचे रखे । जंघाओंके रोगोंको दूर करता है I फल – पेट, छाती, गर्दन और २८ कन्द - पीड़ासन — पृथ्वीपर बैठकर दोनों हाथोंसे दोनों पैरोंको पकड़कर ठीक पेटके ऊपर नाभिके पास ले जाकर इस प्रकार मिलाये कि पैरोंकी पीठ मिली रहे और तलुए कुक्षियोंकी ओर हो जायँ, दोनों पैरोंके अँगूठे और कनिष्ठिकाएँ मिली रहें । हाथ इस प्रकार जोड़कर बैठ जाय कि हाथकी हथेली पैरोंके अँगूठेपर और अँगुलियाँ छातीके ऊपर आ जायँ । ( ४३३ )
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पातञ्जलयोगप्रदीप ३४ THERES ि FATIS SETS S उतन्तपुर -मत्स्येन्द्रासन • मत्स्येन्द्रासन सुप्त वज्रासन वृश्चिकासन उष्ट्रासन पार्वती - आसन TS SPETITS सिंहासन
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पातञ्जलयोगप्रदीप बकासन ऊर्ध्व पद्मासन गर्भासन उत्थित पद्मासन कुक्कुटासन II TESTE मत्स्यासन काल गरुड़ासन
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* पातञ्जलयोगप्रदीप साधनपाद ] [ सूत्र ४६ * ..................... फल – पैर, घुटने तथा पेटके रोग दूर होते हैं । क्षुधाकी वृद्धि, तिल्ली और वायुगोलेका नाश होता है । स्कन्ध - स्थानके पवित्र होनेसे शरीरकी सब नाडियोंका शोधन होता है । २ ९ पार्वती - आसन — दोनों पैरोंके तलुए इस प्रकार मिलावे कि अँगुलियोंसे अँगुलियाँ और तलुएसे तलुआ मिल जायँ; और मिले हुए भागोंको इस प्रकार घुमावे कि अँगुलियाँ नितम्बोंके नीचे आ जायँ और एड़ियाँ अण्डकोषके नीचे मिलकर सामने दिखायी देने लगें । फल — घुटने, पैरोंकी अँगुलियों, मणिबन्धों, अण्डकोष और सीवनीके सब रोगोंका नाश होना, वीर्यवाही नसोंका पवित्र होना । ब्रह्मचारिणी स्त्रियोंके लिये भी यह आसन लाभदायक है । ३० गोरक्षासन — दोनों पैरोंके तलुओंको पूर्ववत् मिलाकर दोनों एड़ियोंको सीवनीपर जमाकर पैरोंको इस प्रकार चौड़ा करे कि बायें पैरकी अँगुलियाँ बायीं पिंडलीकी ओर आ जायँ और दायें पैरकी अँगुलियाँ दायें पैरमें जा मिलें फिर दोनों हाथोंको पीठकी ओर जंघाके नीचेसे लाकर घुटनेके पाससे पैरोंकी अँगुलियोंको पकड़कर जालन्धर - बन्ध लगाकर चित्तको स्थिर करके बैठे । फल – कण्ठ, स्कन्ध, बाहु और हृदयादि ऊपरके अङ्गों तथा जंघा, पिंडली, पैर, सीवनी, अण्डकोष और कटिप्रदेशकी व्याधियोंका दूर करना । ३१ सिंहासन — दोनों पैरोंको नितम्बोंके नीचे इस प्रकार जमावे कि बाँया पैर दायें नितम्बके नीचे और दायाँ पैर बायें नितम्बके नीचे आ जाय, फिर दोनों हाथोंको पेटकी ओर अंगुलियाँ करके जंघापर जमावे । पेटको अंदर खींचते हुऐ, छातीको बाहर निकाले हुए, मुँहको खोलकर जिह्वाको बलपूर्वक बाहरकी ओर निकाल ठोढ़ीपर जमा दे । फल — बाहु और पैरोंका शक्तिशाली होना, गर्दनका नीरोग होना, कटि और सीवनी आदिकी शुद्धि, हकलाना बंद होना । ३२ वकासन — दोनों हाथोंके पंजे जमीनपर रखकर दोनों घुटनोंको बाहुओंके सहारे ऊपर उठाकर पाँवसहित सारे शरीरको ऊपर उठावे, केवल हाथोंके पंजे भूमिपर रहें, शेष शरीर ऊपर उठाये रहे । घुटनोंको अन्दर रखकर भी यह आसन किया जा सकता है । फल- - भुजदण्डोंमें बलवृद्धि, सीनेका विकास, रक्तकी शुद्धि और क्षुधाकी वृद्धि । ३३ लोलासन — वकासनके अनुसार दोनों पंजोंको भूमिपर रखकर केवल उनपर ही सारे उठावे । वकासनमें पाँव पीछेकी ओर झुकते हैं और इसमें आगेकी ओर । शरीरको फल - वकासनके समान । ३४ एक पादाङ्गुष्ठासन — एक पैरकी एड़ीको गुदा और अण्डकोषके बीचमें लगाकर अङ्गुलियोंसहित पृथ्वीपर जमाकर दूसरे पैरको ठीक उसके घुटनेपर रखकर उसीके अँगूठेको सँभालकर बैठे । नासाग्रभागपर दृष्टि जमाकर छातीको किञ्चित् उभारे रहे, उसपर सारे शरीरका भार दायें - बायें दोनों अङ्गसे बारी - बारीसें करें । फल- ठ - वीर्यदोषका दूर होना और वीर्यवाही नाड़ियोंका शुद्ध और पद्मासन लगाकर करनेके आसन पुष्ट होना 1 ३५ ऊर्ध्व पद्मासन — शीर्षासन और ऊर्ध्व सर्वाङ्गासनके साथ । ( ४३४ )
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सूत्र ४६ ] स्थिरसुखमासनम् * * [ साधनपाद ३६ उत्थित पद्मासन — पद्मासन लगाकर दोनों हाथ दोनों ओर जमीनपर रखकर उनके शरीरको पेट अन्दर खींचे हुए और छातीको बाहर निकाले हुए भरसक पृथिवीसे ऊपर ऊपर सारे पृथिवीसे ऊपर उठा रहेगा उतना ही अधिक लाभ होगा । उठावे । जितना - बाहुबलकी वृद्धि, छातीका विकास, पेटके रोगोंका नाश और क्षुधाकी वृद्धि । फल-३७ कुक्कुटासन — पद्मासनसे बैठकर दोनों पाँवोंके पञ्जे भीतर रहें, इस प्रकार दोनों जाँघों और पिंडलियोंके बीचमेंसे दोनों हाथ कोहनीतक नीचे निकालकर पञ्जे भूमिपर टिकाकर सारे शरीरको तोलकर रखे । फल — उत्थित पद्मासनके समान लाभ । जठराग्निका प्रदीप्त होना, आलस्यका दूर होना आदि ३८ गर्भासन — कुक्कुटासन करके हाथोंकी अङ्गुलियोंसे दोनों कान पकड़े ॥ ३ ९ कूर्मासन - कानोंको न पकड़कर हाथोंकी अङ्गुलियाँ एक - दूसरेके साथ मिलाकर गला पीछेसे पकड़े । फल- – आँतोंके विकारका दूर होना, शौच - शुद्धि, क्षुधा - वृद्धि । ४० मत्स्यासन — पद्मासन लगाकर चित लेटे, दोनों हाथोंसे दोनों पाँवोंके अँगूठे पकड़े और दोनों हाथोंकी कोहनियाँ जमीनपर टिका दे । सिरको पीछे मोड़कर छाती तथा कमरको भरसक जमीनसे ऊपर उठाये रखे । फल- - शौच - शुद्धि, अपानवायुकी निम्न गति, आँतोंके सब रोगोंका नाश इत्यादि । दस - पंद्रह मिनटतक करनेसे विशेष लाभकी प्रतीति होती है । इस आसनसे देरतक जलमें तैरा जा सकता है । ४१ तोलांगुलासन — पद्मासन लगाकर नितम्बोंके नीचे हाथोंकी मुट्ठियाँ रखकर उनपर तराजूके सदृश सारे शरीरको तोल रखे । फल — मत्स्यासनके समान है । ४२ त्रिबन्धासन — मूलबन्ध, उड्डीयान - बन्ध और जालन्धर - बन्ध लगाकर पद्मासनसे बैठे । फिर निम्न क्रियाएँ करे — दोनों हाथोंको मिलाकर भरसक ऊपर उठावे । दोनों हाथोंको गोमुख करके रखे । दोनों हाथ पीछे फेरकर दाहिने हाथसे बायें पाँवके अँगूठेको और बायें हाथसे दाहिने पाँवके अँगूठेको पकड़े । दोनों हाथोंको भूमिपर जमाकर उनपर सारा शरीर अर्थात् पूरे आसनको उठावे और नितम्बोंको पुनः भूमिपर ताड़न करे । फल – तीनों बन्धोंके फलके अतिरिक्त इससे कुण्डलिनीकी जागृति और प्राणोंके उत्थानमें विशेष सहायता मिलती है; किंतु सावधानीके साथ करे । खड़े होकर करनेके आसन ४३ ताड़ासन — गला, कमर, पाँवकी एड़ी आदि सबको समरेखामें करके सीधा खड़ा हो एक हाथको भरसक सीधा ऊपर ताने और दूसरेको जंघासे मिलाये रखे । ऊपरवाले हाथको धीरे - धीरे तानता हुआ नीचे ले जाय और नीचेवालेको ऊपर । इसी प्रकार कई बार करे । फल — सारे शरीरको नीरोग रखना, मेरुदण्डका सीधा करना, शौच - शुद्धि, अर्श रोगका नाश करना इत्यादि । ४४ गरुडासन – सीधे खड़े होकर एक पैर को दूसरे पैरसे लपेटे, तत्पश्चात् दोनों हाथोंको भी उसी ( ४३५ )
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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ४६ प्रकार लपेटकर हथेलीमें हथेली मिलाकर दोनों हाथोंको नाकके पास ले जाय । -पैरोंके स्नायुकी शुद्धि, अण्डकोषकी वृद्धिका रोकना, घुटने और कोहनियों आदिके दर्दका फल-नाश करना । ४५ द्विपाद मध्यशीर्षासन- दोनों पैरोंको भरसक फैलावे, मस्तकको आगेकी ओर झुकाकर दोनों पैरोंके बीचमें ले जाकर पृथिवीपर लगावे । फल- -पेटके स्नायु, कमर, मेरुदण्ड और वीर्यवाही नसोंका पुष्ट होना । ४६ पादहस्तासन – सीधे खड़े होकर धीरे - धीरे आगेकी ओर झुककर दोनों हाथोंसे दोनों पैरोंके अँगूठे पकड़े, उड्डीयान और मूलबन्धके साथ बिना घुटने तथा पाँव झुकाये घुटनेपर सिरको लगा दे । फल – तिल्ली, यकृत्, कोष्ठबद्धता आदिका दूर होना । देरतक करनेसे विशेष लाभकी प्रतीति होगी । ४७ हस्तपादाङ्गुष्ठासन – सीधा समसूत्रमें दोनों पैरोंको मिलाकर खड़ा हो एक पैरको सीधा उठाकर कटिप्रदेशकी जगहतक ले जाय, दूसरे हाथसे इस पैरके अङ्गूठेको पकड़कर सीधा ताने, दूसरा हाथ कमरपर रहे । इसी प्रकार दूसरी ओर करे । जब यह आसन लगभग एक मिनटतक टिकने लगे तो मस्तकको फैलाये हुए घुटनेपर लगावे । फल – पेट, पीठ, जंघा, कमर, कण्ठ आदि अवयवोंका बलवान् होना । ४८ कोणासन — टाँगोंको फैलाकर समसूत्रमें खड़ा हो, तत्पश्चात् एक हाथको सीधा रखकर दूसरे हाथसे बायीं ओर झुककर बायें पैरके घुटनेको पकड़े । इसी प्रकार दूसरी ओर करे । ल — पीठ, कमरका नीरोग होना, स्नायुओंमें रक्त और खूनका संचार इत्यादि । यहाँ लगभग सभी मुख्यासन उनके फलसहित बतला दिये गये हैं; किंतु बहुत - से आसनोंको करनेकी अपेक्षा अपनी आवश्यकतानुसार थोड़े - से विशेष विशेष आसनोंको निम्नलिखित सूची अनुसार विधिपूर्वक देरतक करना अधिक लाभदायक होगा । आसनोंको ओ ३ म्के मानसिक जप तथा स्थान - विशेषपर ध्यानके साथ करना अच्छा रहेगा । लंबे समयतक शीर्षासन करनेके पश्चात् ऊर्ध्वसर्वाङ्गासन अथवा ताड़ासन अवश्य करना चाहिये । १ शीर्षासन ( विपरीतकरणी मुद्रा ) ( ९ ) २०. मिनट -से-कम--कम २ मयूरासन ( २० ) २ " " " ३ ऊर्ध्वसर्वाङ्गासन ( १२ ) १० ४ पश्चिमोत्तानासन ( २ ) " १० " " ५ जानुशिरासन ( ४ ) १० 33 " " ६ उत्तानपादासन ( ८ ) ५ " " ७ पवन - मुक्तासन ( ११ ) " ५ " " ८ भुजङ्गासन ( २१ ) " ९ शलभासन ( २२ ) १० त्रिबन्धासन ( ४१ ) ११ ताड़ासन ( ४३ ) " " " ( ४३६ )