पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 481–490

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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सूत्र ५० ] बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः * * [ साधनपाद रेचक तथा पूरक करते समय दोनों नथुनेपरसे अंगुलियाँ हटा ली जाती हैं । आरम्भमें ही अंगुलियोंके प्रयोगकी आवश्यकता होती है । अभ्यास परिपक्व हो जानेपर नथुनोंको अंगुलियोंसे दबाये बिना भी रेचक, पूरक, कुम्भक किया जा सकता है । यदि कुम्भकमें जालन्धर - बन्ध लगाया हो तो अंगुलियोंद्वारा नथुनोंको बंद करनेकी आवश्यकता नहीं होती । आगे बतलाये जानेवाले, रेचक, पूरक, कुम्भकमें अंगुलियोंद्वारा नासिकापुटका खोलना, बंद करना पाठकगण स्वयं समझ लें, हमें अब उनके बतलानेकी आवश्यकता नहीं रही । ३ प्राणायामके आरम्भमें जिस नासिकापुटसे पूरक करना हो उससे प्रथम पूरा श्वास बाहर निकाल देना चाहिये । सगर्भ ( सबीज ) सहित कुम्भक—

सहितो द्विविधः प्रोक्तः प्राणायामं समाचरेत् ।

सगर्भो बीजमुच्चार्य निर्गर्भो बीजवर्जितः ॥

' सहित- कुम्भक सगर्भ और निर्गर्भ भेदसे दो प्रकारका कहा गया है । उसका आचरण करे । सगर्भ बीजमन्त्रके उच्चारणके साथ किया जाता है और निर्गर्भ बीजमन्त्रको छोड़कर किया जाता है । ' सगर्भ अर्थात् सबीज प्राणायामकी विधि - पूरकका बीजमन्त्र ' अं ' है कुम्भकका ' उं ' और रेचकका ‘ मं ’ है । इस प्रकार सहित -प्राणायामको प्रणवात्मक समझकर उसमें ' प्रणव ' की उपासनाकी भावना करते हुए पूरकमें ‘ अं ' का, कुम्भकमें ' उं ' का और रेचकमें ' मं ' का जाप करते हुए अथवा पूरक, कुम्भक और रेचक तीनोंको अलग - अलग प्रणवात्मक जानकर उनमें ' प्रणव ' की उपासनाकी भावना करते हुए तीनोंमें ' ओ ३ म् ' की निश्चित मात्रासे जाप करना सबीज अथवा सगर्भ प्राणायाम है । १ साधारण सहित अथवा अनुलोम विलोम कुम्भक — बीजमन्त्र ' अं ' अथवा ओ ३ म्का छः बार मानसिक जाप करते हुए बायें नासिकापुरसे धीमे - धीमे बिना आवाज किये हुए वायुको मूलाधारतक पूरक करे । चौबीस बार बीजमन्त्र ' उं ' अथवा ओ ३ म्का मानसिक जाप करते हुए कुम्भक करे । बीजमन्त्र ‘ मं ’ अथवा ओ ३ म्का बारह बार मानसिक जाप करते हुए धीरे - धीरे बिना आवाज किये वायुको दायें नासिकापुटसे रेचक करे । थोड़ी देर ( एक सेकण्ड ) वायुको बाहर रोककर पूर्ववत् छः मात्रामें ' अं ' अथवा ओ ३ म्का जाप करते हुए इसी नासिकापुटसे पूरक करे । पूरकके पश्चात् पूर्ववत् कुम्भक, तत्पश्चात् बायें नासिकापुटसे रेचक करे, ये दो प्राणायाम हुए । इसी प्रकार दोनों नासिकापुटोंसे एक साथ पूरक, कुम्भक और रेचक करके प्राणायाम किया जा सकता है । प्राणायामकी संख्या यही रहे । मात्राएँ पूरक, कुम्भक और रेचक १-४-२ के हिसाब से यथाशक्ति बढ़ाते रहें मात्राओंको शनैः - शनैः बढ़ाया जा सकता है— निम्नलिखित क्रमानुसार८ मात्रासे कुम्भक ६ मात्रासे रेचक १५ दिनतक ६ मात्रासे पूरक ९ १२ w " " " " " " " 22 १० १८ vir " " " " " " " १२ २४ W " " " " " " " " १४ २८ ७ " " " > " 2 " " " ( ४४५ )

पृष्ठ 482

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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५० ८ मात्रा पूरक ३२ मात्रासे कुम्भक १६ मात्रासे रेचक १५ दिनक काल " " ३६ " " १८ " " १० ११ १२ " " " " " " " " " " ४० I ४४ I ४८ " " " " " 64 " " " २०o R २२ २४ " " " " " " " " " १३ " " ५२ " " " २६ " " १४ " " " ५६ " " " २८ " " १५ " " " " ६० " ३० " " " " " १६ " " " ६४ " " " ३२ " " " " " १७ " " " ६८ " ३४ " " " " " १८ " " " ७२ " ३६ " १ ९ " " ७६ " " " ३८ " " " " " " ४० २० ८० " " " " " " II " इसके पश्चात् यदि चाहें तो केवल कुम्भक कर सकते हैं । मात्राओंको बढ़ानेमें शीघ्रता न करें, यथाशक्ति शनैः - शनैः बढ़ावें । साधारण सहित - कुम्भकके अन्तर्गत कई अन्य उपयोगी प्राणायाम--( क ) तालयुक्त प्राणायाम — हाथकी कलाईपर अंगूठेकी ओर नवजवाली नाड़ीपर अङ्गुलियोंको रखकर उसकी धड़कन ( गति ) की चालको अच्छी प्रकार पहचाननेका अभ्यास करनेके पश्चात् इस प्राणायामको निम्न प्रकार करे-किसी सुखासनसे विधिके अनुसार बैठकर उस नाड़ीकी धड़कनको १ से ६ तक गिनते हुए पूरक, १ से ३ तक गिनते हुए आभ्यन्तर कुम्भक, १ से ६ तक गिनते हुए रेचक और १ से ३ तक गिनते हुए बाह्य कुम्भक करे । यह १ प्राणायाम हुआ, इस प्रकार सात प्राणायाम करे । मात्राएँ इसी क्रमानुसार यथाशक्ति बढ़ाते जायँ । इसी प्रकार अनुलोम - विलोम रीतिसे यह प्राणायाम किया जा सकता है । फल- —मनकी एकाग्रता तथा बिना तारके तारवाले यन्त्र ( Wireless Telegram ) अथवा रेडियो ( Radio ) के सदृश दूर - दूर स्थानोंमें बैठे हुए दो मनुष्य एक निश्चित समयपर इस प्राणायामद्वारा तालयुक्त होकर अपने विचारकी तरंगें ( धारें ) एक - दूसरेतक पहुँचा सकते हैं ( सूत्र ३२ वि ० व ० सम्मोहनशक्ति दूसरी विधि — उपर्युक्त विधिके परिपक्व होनेपर सातों चक्रोंपर क्रमानुसार ध्यान करते ) । प्राणायामको करे - हुए इस मूलाधार चक्र - पूरकमें ऐसी भावना करे कि श्वास उस स्थानमें अंदर आ कुम्भकके पश्चात् रेचकमें ऐसी भावना करे कि श्वास वहाँसे बाहर निकल रहा है । आभ्यन्तर इस प्रकार सात प्राणायाम करे । इसी प्रकार क्रमानुसार स्वाधिष्ठान चक्र रहा है । फिर बाह्य कुम्भक करे । विशुद्ध चक्र, आज्ञाचक्र तथा ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यान करते हुए प्राणायाम, मणिपूरक चक्र, अनाहत चक्र, करे । ( ४४६ )

पृष्ठ 483

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सूत्र ५० ] बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः * * [ साधनपाद फल • चक्रभेदनमें सहायता, शरीरके किसी विशेष अङ्गके विकारी होनेपर उस स्थानपर इस प्राणायामद्वारा प्राणको भरकर विकारका हटाना । २ सूर्यभेदी कुम्भक – बलपूर्वक सूर्यनाड़ी अर्थात् दाहिने नासिकापुटसे धीरे - धीरे आवाजकें साथ पूरक करें, ( प्राणवायुको पूर्णतया कोष्ठमें भरकर नखसे शिखापर्यन्त फैलाकर ) बलपूर्वक जबतक वायुको रोक सकें कुम्भक करें । इसके पश्चात् चन्द्र - नाड़ी अर्थात् वाम - नासिकापुरसे धैर्यके साथ आवाज करते हुए वेगपूर्वक रेचक करें । यह एक प्राणायाम हुआ । आरम्भमें इस प्रकार पाँच प्राणायाम करें, शनैः - शनैः शक्तिके अनुसार संख्या बढ़ाते जायँ । इस प्राणायाममें पुनः पुनः केवल सूर्यनाड़ीसे ही पूरक और वाम नाड़ीसे ही रेचक किया जाय । सूर्यभेदी प्राणायामसे शरीरमें उष्णता तथा पित्तकी वृद्धि होती है । बात और कफसे उत्पन्न होनेवाले रोग, रक्त - दोष, त्वचा - दोष, उदर - कृमि आदि नष्ट होते हैं । जठराग्नि बढ़ती है और कुण्डलिनी शक्तिके जागरण करनेमें सहायता मिलती है । इस प्राणायामका अभ्यास गर्मी के दिनोंमें तथा पित्त - प्रधान प्रकृतिवाले पुरुषोंके लिये हितकर नहीं है । चन्द्रभेदी प्राणायाम सूर्यभेदी प्राणायामसे बिलकुल उलटा अर्थात् चन्द्रस्वर ( बायें नासिकापुट ) से पूरक और सूर्यस्वर ( दाहिने नासिकापुट ) से रेचक करनेसे चन्द्रभेदी प्राणायाम होता है । इससे थकावट और शरीरकी उष्णता दूर होती है ३ उञ्जायी कुम्भक – मुखको किसी कदर झुकाकर कण्ठसे हृदयपर्यन्त शब्द करते हुए दोनों नासिकापुटसे ( अथवा दाहिने नासिकापुटसे ) शनैः - शनैः पूरक करें । कुछ देरतक कुम्भक करनेके पश्चात् बायें नासिकापुटसे इसी प्रकार रेचक करें । यह एक प्राणायाम हुआ । इस प्राणायाममें कुम्भक, पूरक, रेचक स्वल्प परिमाणमें किये जाते हैं । कुम्भकमें वायु हृदयसे नीचे नहीं जाना चाहिये । रेचकमें जितना हो सके शनैः - शनैः वायुको विरेचन करना चाहिये । इसमें पूरकमें नासिका छिद्रद्वारा वायुको बाहरसे खींचकर मुखमें, मुखसे कण्ठमें और कण्ठसे ले जाकर हृदयमें धारण किया जाता है । फिर यथाक्रम रेचकमें हृदयसे कण्ठमें, कण्ठसे मुखमें और मुखसे वायुको बाहर निकाला जाता है । पाँचसे आरम्भ करके शनैः - शनैः यथाशक्ति संख्या बढ़ाते जायँ । फल- कफ- - प्रकोप, उदर - रोग, आमवात, मन्दाग्नि, प्लीहा आदिका दूर होना, अग्निका प्रदीप्त होना एवं कण्ठ, मुख और फेफड़ोंकी स्वच्छता । दीर्घसूत्री उज्जायी — इसमें कण्ठकी सहायतासे लंबी, दीर्घ और हलकी आवाज उत्पन्न करते हुए मनकी एकाग्रताके लिये केवल पूरक - रेचक किया जाता है ४ शीतली कुम्भक – काकके चोंचकी आकृतिमें जिह्वाको ओष्ठसे बाहर निकालकर वायुको - शनैः पूरक करे । धीरे - धीरे पेटको वायुसे पूर्ण करके सूर्यभेदी प्राणायामके सदृश कुछ देर कुम्भक शनैः कर पश्चात् दोनों नासिकापुटसे रेचक करे । पुनः पुनः इसी प्रकार करे । फल.. - -अजीर्ण, पित्तसे उत्पन्न होनेवाले रोग, रक्तपित्त, रक्तविकार, पेचिश, अम्लपित्त, प्लीहा, तृषा आदि रोग इससे दूर होते हैं, बल और सौन्दर्यकी वृद्धि होती है । कफ प्रकृतिवाले मनुष्योंके लिये तथा शीतकालमें इस प्राणायामका अभ्यास हितकर नहीं है । ( ४४७ )

पृष्ठ 484

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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५० निम्नलिखित प्राणायामोंको शीतलीके अन्तर्गत समझना चाहिये । इनकी विधि तथा फल भी लगभग उसीके समान है । शरीरमें ठंड पहुँचाने तथा क्षय ( थाइसिस ) ( Phthisis ) राजयक्ष्मा आदि रोगोंके नाश करनेमें अति उपयोगी होते हैं । ( क ) शीतकारी - जिह्वाको ओष्ठोंसे बाहर निकालकर और उसका बिलकुल अलग भाग दोनों दाँतोंकी पंक्ति एवं ओष्ठोंसे साधारण हलका दबाकर छिद्रोंसे वायुको शीत्कारपूर्वक अर्थात् शीत्कारकी आवाज उत्पन्न करते हुए पूरक करें, अन्य सब विधि शीतलीके समान । काकी प्राणायाम- इसमें ओष्ठोंको सिकोड़कर काककी चोंचके समान बनाकर वायुको ( ख ) शनैः - शनैः पूरक किया जाता है, अन्य सब विधि शीतलीके समान । ( ग ) कवि प्राणायाम — दोनों दाँतोंकी पंक्तियोंको दबाकर उनके छिद्रोंद्वारा वायुको शनैः - शनैः पूरक करे, अन्य सब विधि पूर्ववत् । वाणीका मीठा और कण्ठका सुरीला होना यह इसमें विशेषता है । ( घ ) भुजङ्गी प्राणायाम- भुजङ्गके सदृश मुखको खोलकर वायुको पूरक करें । अन्य सब विधि पूर्ववत् । इन प्राणायामोंमें कहीं - कहीं पाँच बार केवल पूरक - रेचक करनेके पश्चात् छठी बार कुम्भक करना बतलाया है । ५ भस्त्रिका - कुम्भक – भस्त्रिका प्राणायाम कई प्रकारसे किया जाता है । इसके मुख्य चार भेद हैं — मध्यम - भस्त्रिका, वाम - भस्त्रिका, दक्षिण- भस्त्रिका और अनुलोम - विलोम - भस्त्रिका । ( क ) मध्यम - भस्त्रिका — जैसे लुहारकी धौंकनीसे वायु भरी जाती है, इसी प्रकार दोनों नासिकापुटसे वायुको आवाजके साथ धीमे - धीमे लम्बा, दीर्घ और वेगपूर्वक मूलाधारतक पूरक करे । बिना कुम्भक किये इसी प्रकार दोनों नासिकापुटसे रेचक करे । इस प्रकार बिना आभ्यन्तर और बाह्य कुम्भकके आठ बार पूरक - रेचक करके नवीं बार पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करके दसवीं बार उसी प्रकार धीमे - धीमे दोनों नासिकापुटसे रेचक करे । यह एक प्राणायाम हुआ । इस प्रकार तीन प्राणायाम करे । ( ख ) वाम - भस्त्रिका – दक्षिण नासिकापुटको बंद करके उपर्युक्त रीतिसे वाम नासिकापुटसे मूलाधारतक आठ बार पूरक, रेचक करके नवीं बार पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करें । तत्पश्चात् उपर्युक्त विधि - अनुसार दक्षिण नासिकापुटसे धीमे - धीमे रेचक कर दे । यह एक प्राणायाम हुआ । ( ग ) दक्षिण - भस्त्रिका — वाम नासिकापुट बंद करके दक्षिण नासिकापुटसे आठ बार बिना आभ्यन्तर और बाह्य कुम्भकके उपर्युक्त विधि अनुसार पूरक- रेचक करनेके पश्चात् नवीं बार पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करे । तत्पश्चात् वाम नासिकापुटसे रेचक करे । यह एक प्राणायाम हुआ । वाम - भस्त्रिका और दक्षिण- भस्त्रिकाको मिलाकर करनेकी विधि - पहिले वाम - भस्त्रिकाका प्राणायाम करे, फिर दक्षिण- भस्त्रिकाका एक प्राणायाम, तत्पश्चात् वाम - भस्त्रिकाका एक प्रकार इन तीन प्राणायामोंमें दो बार वाम - भस्त्रिका और एक बार दक्षिण - भस्त्रिका एक प्राणायाम । इस होगा । ( घ ) अनुलोम - विलोम - भस्त्रिका - जैसे लोहारकी धौंकनीसे वायु भरी नासिकापुटसे वायुको आवाजके साथ धीमे - धीमे लम्बा, दीर्घ जाती है इसी प्रकार बायें बिना कुम्भक किये इसी प्रकार दक्षिण नासिकापुटसे रेचक करें । और बिना वेगपूर्वक मूलाधारतक पूरक करें । पूरक करके फिर बायें नासिकापुटसे विधि - अनुसार रेचक करें । ये बाह्य कुम्भकके उसी नासिकापुटसे चार प्राणायाम हुए । इस प्रकार आठ ( ४४८ )

पृष्ठ 485

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बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः * सूत्र ५० ] [ साधनपाद * बार बिना कुम्भक किये केवल पूरक, रेचक करते हुए नवीं बार वाम नासिकापुटसे पूरक करके यथाशक्ति कुम्भक करें । तत्पश्चात् दसवीं बार दक्षिण नासिकापुटसे रेचक करें । यह दस प्राणायामका पहला प्राणायाम हुआ । अब दक्षिण नासिकापुटसे आरम्भ करके नवीं बार कुम्भकके पश्चात् दसवीं बार वाम नासिकापुटसे रेंचक करें । यह दूसरा प्राणायाम हुआ । अब पहले प्राणायामकी भाँति तीसरा प्राणायाम करें । इन विधियोंमें पूरककी समाप्तिपर मूलाधार चक्रपर एक सेकंड ( कुछ देर ) ध्यानके पश्चात् रेचक करें । इसी प्रकार रेचककी समाप्तिपर नासिकाके अग्रभागपर कुछ देर ( एक सेकंड ) ध्यानके पश्चात् पूरक करें । कुम्भकके समय नाभि - स्थान मणिपूरक - I - चक्रपर ध्यान लगावें । यह प्राणायाम तीन बार ही करें । अर्थात् तीनसे अधिक बार कुम्भक बढ़ानेका यत्न न करें । किंतु तीनों प्राणायामोंकी संख्या दससे ऊपर शनैः - शनैः यथाशक्ति चार - चार बढ़ाते हुए १४, १८, २२ इत्यादि करते हुए चले जायँ । पूरक, रेचक और कुम्भकका समय भी यथाशक्ति बढ़ाते जायँ । अभ्यासीगण यदि चाहें और उनके पास समय अधिक हो तो तीन प्राणायामको बढ़ाकर सात, ग्यारह इत्यादि कर सकते हैं अर्थात् चार - चार बढ़ा सकते हैं । इस प्राणायामसे त्रिधातु - विकृतिसे उत्पन्न हुए सब रोग नष्ट हो जाते हैं, आरोग्यता बढ़ती है, जठराग्नि प्रदीप्त होती है । गर्मी, सर्दी सब ऋतुओंमें किया जा सकता है । कुम्भक बढ़ाने, मनके स्थिर करने और कुण्डलिनी जाग्रत् करनेमें अति उपयोगी है । अभ्यासीगण ध्यान करनेसे पूर्व इसे अवश्य करें । भस्त्रिकामें रेचक, पूरक अधिक लाभदायक होते हैं, इसलिये इनकी संख्या अधिक और कुम्भककी कम बतलायी गयी है । अभ्यासीगण यदि चाहें तो आभ्यन्तर कुम्भकके पश्चात् रेचक करनेके बाद बाह्य कुम्भक भी कर सकते हैं । बाह्य कुम्भकका समय आभ्यन्तर कुम्भकके समयसे आधा अथवा बराबर रख सकते हैं । ( १ ) बलहीन अशक्त साधकोंको साधारण वेगपूर्वक, ( २ ) स्वस्थ, शक्तिशाली साधकोंको लम्बा, दीर्घ वेगपूर्वक और ( ३ ) अभ्यस्त साधकोंको अतिवेगपूर्वक पूरक - रेचक करना चाहिये । रेचकमें पूरकसे अधिक समय देना चाहिये । इसलिये पूरक और कुम्भकमें उतना ही समय देना चाहिये जिससे रेचक करनेके लिये काफी दम बना रहे । निम्नलिखित दो प्राणायामोंको भस्त्रिकाके अन्तर्गत समझना चाहिये-( ( क ) अन्तर्गमन प्राणायाम- सिद्धासनसे बैठकर वाम नासिकापुटसे रेचक करते हुए पूरे उड्डीयानके साथ वाम घुटनेपर सिरको टेक देना तत्पश्चात् पूरक करते हुए सीधा हो जाना । इस प्रकार रेचक, पूरक करते हुए दसवीं बार पूरक करके जालन्धरबन्धके साथ सिरको घुटनेपर रखकर यथाशक्ति कुम्भक करना, तत्पश्चात् जालन्धर - बन्ध खोलकर सीधे हो जाना । फिर रेचक करके तीनों बन्धोंके साथ सिरको घुटनेपर रखकर यथाशक्ति बाह्य कुम्भक करना । इसी प्रकार दक्षिणकी ओर करें । ( ख ) सिद्ध अथवा पद्मासनसे बैठकर वाम नासिकापुटसे पूरक करें, फिर जालन्धर - बन्ध लगाकर दोनों हाथोंकी अङ्गुलियोंको आपसमें साँठकर उनको उलटा करके सिरको दबाते हुए यथाशक्ति कुम्भक करें और ऐसी भावना करें कि प्राण ब्रह्मरन्ध्रमें चढ़ रहा है । तत्पश्चात् दोनों हाथोंको सिरपरसे हटाकर और जालन्धर - बन्ध खोलकर दक्षिण नासिकापुटसे रेचक करें । इसी प्रकार कई बार करें । ६ भ्रामरी कुम्भक — इस प्राणायाममें पूरक और रेचककी विशेषता है । पूरक वेगसे और भौंरेके शब्दके सदृश शब्दयुक्त होता है और रेचक भृङ्गी ( भँवरी ) के सदृश मंद - मंद शब्दसे युक्त होता है । रेचकका महत्त्व अधिक है, इसलिये इसका नाम भ्रमरी रखा गया है । ( ४४ ९ )

पृष्ठ 486

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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५० नेत्र बंद करके भ्रूमध्यमें ध्यान करते हुए दोनों नासिकापुटसे भृङ्ग अर्थात् भौंरेके सदृश ध्वनि करते हुए लम्बे स्वरमें पूरक करें । यथाशक्ति कुम्भक करके भृङ्गी अर्थात् भौंरीके मन्द - मन्द शब्दके सदृश ध्वनि करते हु कण्ठसे रेचक करें । आवाज मीठी, सुरीली और एक तानकी होनी चाहिये । इसके साथ - साथ मूल और उड्डीयान - बंध लगाते जाना चाहिये । कहीं - कहीं साधारण रीतिसे वेगपूर्वक पूरक करके दृढ़तापूर्वक जालंधर - बंध लगाकर कण्ठसे उपर्युक्त रीतिसे शब्द करते हुए रेचक करना बतलाया है घेरण्डसंहितामें दोनों कानोंको अँगुलियोंसे बंद करके शब्द सुननेका अभ्यास करना बतलाया गया है । इस प्रकार पहिले झींगुर, भौंरे और पक्षियोंके चहचहाने - जैसे शब्द सुनायी देते हैं फिर क्रमशः घुँघरू, शङ्ख, घण्टा, ताल, भेरी, मृदङ्ग, नफीरी और नगाड़ेके सदृश शब्द सुनायी देते हैं । इस प्रकार उन शब्दोंको सुनते हुए ‘ ॐ ’ शब्दका श्रवण होने लगता है । अनुलोम - विलोम भ्रामरी प्राणायाम- —उपर्युक्त विधि - अनुसार वाम नासिकापुटसे पूरक करके कुछ देर कुम्भकके पश्चात् दक्षिण नासिकापुटसे उसी प्रकार रेचक, फिर दक्षिण नासिकापुटसे पूरक, वामसे रेचक, वामसे पूरक, दक्षिणसे रेचक । यह एक प्राणायाम हुआ । फल — इस प्राणायामसे वीर्यका शुद्ध होकर ऊर्ध्वगामी होना, रक्त एवं मज्जातन्तुओंका शुद्ध होना और मनका एकाग्र होना है । ध्वन्यात्मक प्राणायाम — इस प्राणायामको भी भ्रामरीके अन्तर्गत समझना चाहिये । विधि यह है कि दोनों नासिकापुटसे पूरक करके किंचित् मुँहको खोलकर जिह्वा और कण्ठके सहारे ‘ ओम् ' का मीठी सुरीली लगातार एक ध्वनिके साथ उच्चारण करो । आवाजके साथ - साथ मूल और उड्डीयान - बंध लगाते जाना चाहिये और रेचक करते जाना चाहिये । इसे प्रणवानुसंधान भी कहते हैं I - भ्रामरी प्राणायामके सदृश । फल-७ मूर्च्छा कुम्भक— ( षण्मुखी सर्वद्वार बंद मुद्रा ) - इस प्राणायाममें, रेचक, भ्रामरी प्राणायामके पूरक, सदृश किया जाता है । उससे इसमें केवल इतनी विशेषता है कि यह दोनों कान, नेत्र, नासिका और मुँहपर क्रमशः दोनों हाथोंके अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका तथा कनिष्ठिकाको रखकर किया जाता है । पूरकके समय नासिकापुटपरसे मध्यमाको किंचित् ऊपर उठाकर पूरक किया जाता है । इसके पश्चात् नासिकापुटको मध्यमासे दबाकर कुम्भक किया जाता है । कुम्भककी समाप्तिपर फिर नासिकापुटसे मध्यमाको शिथिल करके रेचक किया जाता है । यह प्राणायाम अनुलोम - विलोम रीतिसे भी उपर्युक्त विधि अनुसार किया जा सकता है । - इससे मन मूर्छित और शान्त होता है, अतः इसका नाम मूर्छा है । फल-८ प्लावनी कुम्भक — यथाविधि आसनसे बैठकर दोनों नासिकापुटसे पूरक करे । नाभिपर एकाग्र कर सब शरीर - मात्रकी वायुको उदरमें भरकर पेटको चारों ओरसे मनको फुलाकर ऐसी भावना करे कि सारे शरीरका वायु पेटमें एकत्र हो गया है, और मसक शरीरके या किसी रबड़के गोले सदृश वायु नहीं रहा है । यथाशक्ति इस स्थितिमें कुम्भक करके दोनों नासिकासे अङ्ग - प्रत्यङ्गमें शनैः - शनैः रेचक कर दें । फल- प्राणवायुपर पूर्णतया अधिकार, पेटके सब प्रकारके अपान - वायुकी शुद्धि, जठराग्निकी शुद्धि, वीर्य तथा रक्तकी शुद्धि रोग कोष्ठवद्धता आदिका नाश, , जलमें सुखपूर्वक तैरना इत्यादि । ( ४५० )

पृष्ठ 487

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बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिदेशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः सूत्र ५० ] * [ साधनपाद * केवल कुम्भक — केवल कुम्भक बिना पूरक - रेचक किये हुए एकदम श्वास - प्रश्वासकी गतिको जहाँ - का - तहाँ रोक देनेसे होता है । अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ कोई अपानवायुमें प्राणको हवन करते हैं ( पूरकसहित अथवा आभ्यन्तर ( गीता ४। २ ९ ) प्राणमें अपानवायुको होमते हैं ( रेचकसहित अथवा कुम्भक करते हैं ) । कोई प्राण कुम्भक करते हैं ) । कोई गतिको रोककर ( केवल कुम्भक ) प्राणायाम करते हैं । - अपान ( दोनों ) की सहित कुम्भकके निरन्तर अभ्याससे केवल कुम्भक होने लगता है । केवल कुम्भककी विधि हठयोगद्वारा - तीनों बन्धोंके साथ प्राणको हृदयसे नीचे ले जाकर और अपानको मूलाधारसे ऊपर उठाकर समान वायुके स्थान नाभिपर दोनोंको टक्कर देकर मिलानेसे हठयोग - विधिसे केवल कुम्भक किया जाता है । पर इसमें हानि पहुँचनेकी सम्भावना है और राजयोगियोंके लिये अधिक हितकर नहीं है, उनके लिये सबसे उत्तम प्रकार निम्नलिखित है-साधारण स्वस्थ अवस्थामें मनुष्यके श्वासकी गति एक दिन - रातमें २१६०० बार बतलायी जाती है इस स्वाभाविक श्वासकी गतिकी संख्या गायन, भोजन करने, चलने, निद्रा, मैथुन, व्यायाम आदिमें । क्रमशः बढ़ जाती है । जिस प्रकार साधारण घटनाओंको छोड़कर एक घड़ी अथवा अन्य यन्त्रोंकी आयु उसके काम करनेकी शक्तिपर निश्चित की जाती है, इसी प्रकार मनुष्यकी आयु उनके श्वास - प्रश्वासकी गतिपर निर्भर बतलायी जाती है । श्वास - प्रश्वासकी गतिकी संख्या जिस परिमाणसे बढ़ती जायगी उसी परिमाणसे आयुका क्षय और जिस परिमाणसे घटती जायगी उसी परिमाणसे आयुकी वृद्धि होती जायगी । केवल कुम्भकमें श्वास - प्रश्वासकी गतिका निरोध होता है । प्राण और मनका घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिये प्राणके रुकनेसे मनका भी निरोध हो जाता है । जो योगका अन्तिम ध्येय है । केवल कुम्भककी विधि राजयोगद्वारा - श्वास - प्रश्वासकी गतिमें प्रणव- उपासनाकी भावना करे, अर्थात् हर समय यह भावना रहे कि श्वासमें ' ओ ' और प्रश्वासमें ' अम् ' रूपसे प्रत्येक श्वास - प्रश्वासमें ओम्का जाप हो रहा है, इस ओम्के अजपाजापको केवल कुम्भकमें परिणत करनेकी विधि यह है कि ' ओ ' से श्वास लेकर जितनी देरतक शान्तिपूर्वक रोक सकें रोकें, उसके पश्चात् ' अम् ' से छोड़ दें । क्रमशः कुम्भकका अभ्यास बढ़ता रहे । इसका अभ्यास नासिका - अग्रभाग, भृकुटि, ब्रह्मरन्ध्र आदि स्थानोंपर गुरु - आज्ञानुसार करना चाहिये । ' ओ ' और ' अम् ' के उच्चारणकी आवश्यकता नहीं है । केवल अपने नियत स्थानपर श्वास - प्रश्वासकी गतिपर इस भावनासे ध्यान देना होता है । इसको ५१ वें सूत्रमें बतलाये हुए चौथे प्राणायामके अन्तर्गत ही समझना चाहिये । विशेष सूचना - ॥ सूत्र ५० ॥ प्राणायामोंको किसी अनुभवीसे सीखकर उनका अभ्यास करना चाहिये, अन्यथा लाभके स्थानपर हानि पहुँचनेकी सम्भावना है । नियमित आहार आदि ( १ । ३४ ) तथा ( २। ३२ ) में बतलाये हुए नियमोंका पालन करना भी अति आवश्यक है । यद्यपि सभी प्राणायाम स्वास्थ्य, नीरोगता, जठराग्नि, दीर्घ आयु, नाड़ी तथा रक्तशोधन और मनकी स्थिरताके लिये अति उपयोगी हैं और सबकी जानकारी आवश्यक है, पर सबके अभ्यासके लिये पर्याप्त समय मिलना कठिन है, इसलिये राजयोगके साधकोंके लिये चतुर्थ प्राणायामका अभ्यास ही अधिक पा ० यो ० प्र०१६- ( ४५१ )

पृष्ठ 488

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साधनपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ५१ हितकर हो सकता है । निम्न तीन प्राणायामोंको चौथे प्राणायाम और ध्यान तथा अन्य सब प्रकारके प्राणायामोंका पूर्व अङ्ग बनानेमें शीघ्र सफलता प्राप्त हो सकती है । नाड़ीशोधन - प्राणायाम – वाम नासिकापुटसे एकदम बाहर साँस फेंके, फिर उसी नासिकापुटसे बाहरसे वायुको खींचकर बिना रोके हुए एकदम दूसरे दाहिने नथुनेसे बाहर फेंक दे । पुनः दाहिनेसे वायुको खींचकर बायेंसे फेंके । इस प्रकार कई बार करें । रेचक- पूरकमें नासिकापुटको बतलाये हुए नियमानुसार निश्चित अँगुलियोंसे खोलते और बंद करते रहें । ते - - जिसकी विधि ( १ । ३४ ) के वि ० व ० में बतलायी है । २ कपालभाति ३ अनुलोम - विलोम भस्त्रिका प्राणायाम - इसकी विधि आठ कुम्भकोंमें पाँचवें प्राणायाममें बतलायी है I सङ्गति — चौथे प्राणायामका लक्षण बताते हैं— बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ ५१ ॥

शब्दार्थ – बाह्य - आभ्यन्तर - विषय - आक्षेपी - बाहर अंदरके विषयको फेंकनेवाला अर्थात् आलोचना करनेवाला; चतुर्थः = चौथा प्राणायाम है । अन्वयार्थ – बाहर अंदरके विषयको फेंकनेवाला अर्थात् आलोचना करनेवाला चौथा प्राणायाम है । व्याख्या -- व्यासभाष्य-देशकालसंख्याभिर्बाह्यविषयपरिदृष्ट आक्षिप्तः । तथाऽऽभ्यन्तरविषयपरिदृष्ट आक्षिप्तः । उभयथा दीर्घसूक्ष्मः । तत्पूर्वको भूमिजयात्क्रमेणो भयोर्गत्यभावश्चतुर्थः प्राणायामः । तृतीयस्तु विषयानालोचितो गत्यभावः सकृदारब्ध एव देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः । चतुर्थस्तु श्वासप्रश्वासयोर्विषयावधारणात्क्रमेण भूमिजयादुभयाक्षेपपूर्वको गत्यभावश्चतुर्थः प्राणायाम इत्ययं विशेष इति ॥ ५१ ॥

देश - काल और संख्यासे परिदृष्ट जो बाह्य विषय ( नासा द्वादशान्तादि बाह्य - प्रदेश ) है उसके आक्षेपपूर्वक ( आलोचनपूर्वक = ज्ञानपूर्वक = विषयपूर्वक = विचारपूर्वक ), ऐसे ही देश - काल और संख्यासे परिदृष्ट जो आभ्यन्तर विषय ( हृदय, नाभि - चक्रादि आभ्यन्तर प्रदेश ) है उसके आक्षेपपूर्वक दीर्घ और सूक्ष्म दोनों प्रकारसे उत्तरोत्तर क्रमसे भूमियोंके जयके पश्चात् जो श्वास और प्रश्वास इन दोनोंकी गतिका अभाव है, वह चौथा प्राणायाम है । तीसरा प्राणायाम तो ( बाह्य और आभ्यन्तर ) विषयके आलोचन बिना ही ( श्वास - प्रश्वासकी ) गतिके अभावसे होता है । वह एकदम ही आरम्भ होकर देश - काल और संख्यासे परिदृष्ट दीर्घ और सूक्ष्म हो जाता है । चौथे प्राणायाममें यह विशेषता है कि यह श्वास - प्रश्वासके ( आभ्यन्तर और बाह्य ) विषयको अवधारण करके उन दोनों ( विषयों ) के आक्षेपपूर्वक क्रमानुसार भूमियोंके जयसे ( श्वास - प्रश्वासकी ) गतिके अभावसे होता है । व्यास - भाष्यका भावार्थ – पिछले सूत्रमें प्राणायामके तीन भेद रेचक, पूरक और १ रेचक प्राणायामसे जब श्वासको बाहर निकालकर उसकी गतिका अभाव कुम्भक किया बतलाये हैं । उसको बाहर ही रोक दिया जाय, तब वह रेचकसहित कुम्भक अथवा बाह्य कुम्भक कहलाता जाय अर्थात् है । २ पूरक प्राणायामसे जब श्वासको अंदर खींचकर उसकी गतिका अभाव किया अंदर ही रोक दिया जाय, तब वह पूरकसहित कुम्भक अथवा आभ्यन्तर कुम्भक जाय अर्थात् उसको कहलाता है । ( ४५२ )

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पातञ्जलयोगप्रदीप चतुर्थ प्राणायाम पांचवी विधि षट् चक्रद्योतक चित्र चक्र सहस्रार चक्र ब्रह्मरन्ध्र आज्ञा चक्र Y विशुद्ध चक्र अनाहत चक्र मणिपूरक चक्र अश्वनी मुद्रा स्वाधीष्ठान चक्र मूलधार चक्र कुण्डलनी

पृष्ठ 490

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सूत्र ५१ ] बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः* * [ साधनपाद ३ जब प्राणवायुको जहाँ - का - तहाँ एकदम बिना रेचक- पूरकके केवल विधारण प्रयत्नसे रोककर श्वास - प्रश्वासकी गतिका अभाव किया जाय, तब वह केवल कुम्भक कहलाता है ४ चौथा प्राणायाम बाह्य तथा आभ्यन्तर कुम्भकके बिना केवल रेचक, पूरकद्वारा बाह्य तथा आभ्यन्तर विषय ( प्रदेश ) के केवल आलोचनपूर्वक स्वयं ही श्वास - प्रश्वासकी गतिके निरोधसे होता है । इसमें तीसरे प्राणायामसे यह विषेषता है कि जहाँ तीसरा प्राणायाम रेचक, पूरकके बिना एकदम दोनों श्वास - प्रश्वासकी गतिके विषय अभावसे होता है, वहाँ चौथा प्राणायाम रेचक, पूरकद्वारा बाह्य तथा आभ्यन्तर ( प्रदेश ) के आलोचनपूर्वक उत्तरोत्तर भूमियोंके जयके क्रमसे स्वयं ही श्वास - प्रश्वासका गतिके अभावसे होता है । उदाहरणार्थ उसकी चार विधियाँ बतलाये देते हैं— पहली विधि — केवल रेचकद्वारा जहाँतक जा सके श्वासको बाहर ले जायँ । बिना रोके हुए वहाँसे पूरकद्वारा जहाँतक जा सके अंदर ले जायँ । यह एक प्राणायाम हुआ । इस प्रकार ११, १५, २० इत्यादिकी संख्यामें बिना कुम्भक किये हुए केवल रेचक, पूरक देरतक करते रहनेसे स्वयं दीर्घ और सूक्ष्म होकर दोनों श्वास - प्रश्वासकी गतियोंका स्वयं ही अभाव हो जाता है I दूसरी विधि - ओ ३ म्के मानसिक जापके साथ यह भावना करें कि ' ओ ' से श्वास अंदर आ रहा है और ' अम् ' से बाहर निकल रहा है । इस क्रमसे श्वास - प्रश्वासद्वारा ओ ३ म्का मानसिक जाप करते रहें अर्थात् बाह्यप्रदेश तथा आभ्यन्तरप्रदेश हृदय, नाभि आदितक जहाँतक श्वास जाय वहाँतक उसकी गतिको आलोचनपूर्वक दीर्घकालतक ओ ३ म्का इस विधिसे जाप करें तो स्वयं श्वास - प्रश्वास दीर्घ और सूक्ष्म होते - होते निरुद्ध हो जायगा । तीसरी विधि — नासिका - अग्रभाग, भृकुटी, ब्रह्मरन्ध्र अथवा अन्य किसी चक्रपर इस भावनासे ओ ३ म्का मानसिक जाप करें कि ' ओ ' से उसी प्रदेशमें श्वास अंदर आ रहा है और ' अम् ' से बाहर निकल रहा है । इस प्रकार उस विशेष स्थानको श्वास - प्रश्वासका केन्द्र बनाये हुए जापके निरन्तर अभ्याससे श्वास - प्रश्वासकी गति दीर्घ और सूक्ष्म होते हुए स्वयं निरुद्ध हो जाती है 1 चौथी विधि — ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यान करते हुए श्वास - प्रश्वासकी गतिमें ऐसी भावना करना कि ‘ ओ ' से श्वास मेरुदण्डके भीतर सुषुम्णा नाड़ीमें होता हुआ मूलाधारतक जा रहा है और ' अम् ' के साथ वहाँसे ब्रह्मरन्ध्रतक लौट रहा है । चक्रभेदनमें इस प्राणायामका अभ्यास- इसी प्रकार निचले चक्रों – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक इत्यादिमें ध्यान करते हुए.‘ओ ' से श्वास और ‘ अम् ' से प्रश्वासकी गतिकी भावना करते हुए उसको ऊपरके चक्रोंमें आलोचन करनेसे किया जाता है । विशेष वक्तव्य— ॥ सूत्र ५१ ॥ इस सूत्रके अर्थ भिन्न - भिन्न टीकाकारोंने भिन्न - भिन्न किये हैं । ‘ आक्षेप ’ के अर्थ फेंकनेके हैं । इससे किसीने उलाँघने = त्यागने = हटानेसे अभिप्राय लिया है और किसीने विषय करने = जानने = आलोचनसे अभिप्राय लिया है । यहाँ सूत्रके दूसरे ' आलोचन ' अर्थ सूत्रके आशयको अधिक स्पष्ट करनेके उद्देश्यसे मूल व्यासभाष्य उसके शब्दार्थ, भावार्थ किये गये हैं । प्राणायामके चार उदाहरण भी दे दिये हैं । चौथे प्राणायामकी विधियाँ राजयोगके उत्तम अधिकारीके तथा चतुर्थ लिये हैं तथा गोपनीय और गुरु - गम्य हैं । ( ४५३ )