पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 491–500

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 491–500

पृष्ठ 491

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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ५२-५३ || आक्षेपीके अर्थ उलाँघने अर्थात् त्यागने करनेसे सूत्रका अर्थ इस प्रकार होगा-बाहर और अंदरके विषयके अर्थात् रेचक और पूरकको त्यागनेवाला चौथा प्राणायाम है । उसकी विधि निम्न प्रकार होगी-पाँचवीं विधि - मूलाधार, आज्ञा, ब्रह्मरन्ध्र आदि किसी चक्र अथवा नासिका - अग्रभाग आदि किसी स्थानको बिना रेचक - पूरकके श्वास - प्रश्वासकी गति बनाते हुए अर्थात् ऐसी भावना करते हुए कि ' ओ ’ से उसी विशेष स्थानपर श्वास आ रहा है और ' अम् ' से छूट रहा है, ओम्का मानसिक जाप करें । उसके निरन्तर अभ्याससे श्वास - प्रश्वासकी गतिका निरोध हो जाता है । इस विधिको सबसे प्रथम स्थान देना चाहिये । चक्रभेदनमें इस विधिसे शीघ्र सफलता प्राप्त हो सकती है ( समाधिपाद वि ० व ० सूत्र ३४ ) । यदि उपर्युक्त रीतिसे जाप करनेमें कठिनाई प्रतीत हो तो उस विशेष स्थानपर केवल मानसिक ओम्का जाप करें, अथवा ऐसी भावना करें कि वहाँ ओमका जाप हो रहा है या ओम् शब्दको सुन रहे

हैं । मुख्य बात यह है कि उस विशेष ध्येय स्थानपर मन ठहरा रहे ।

सङ्गति — प्राणायामका फल बताते हैं-ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥ ५२ ॥

शब्दार्थ — ततः = उस प्राणायामके अभ्याससे; क्षीयते = नाश हो जाता है; प्रकाशावरणम् - प्रकाशका आवरण ( विवेक - ज्ञानका पर्दा ) । अन्वयार्थ - उससे प्रकाशका आवरण ( विवेक ज्ञानका पर्दा ) क्षीण हो जाता है । व्याख्या – विवेक ज्ञानरूपी प्रकाश तम तथा रजोगुणके कारण अविद्यादि क्लेशोंके मलोंसे ढका हुआ है । प्राणायामके अभ्याससे जब यह आवरण क्षीण हो जाता है, तब वह प्रकाश प्रकट होने लगता है 1 जैसे पञ्चशिखाचार्यने कहा है-तपो न परं प्राणायामात् ततो विशुद्धिर्मलानां दीप्तिश्च ज्ञानस्य ॥ ‘ प्राणायामसे बढ़कर कोई तप नहीं है, उससे मल धुल जाते हैं और ज्ञानका प्रकाश होता है । ' इसी

प्रकार मनु भगवान्‌का श्लोक है-दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः ।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥

‘ जैसे अग्निसे धौंके हुए स्वर्ण आदि धातुओंके मल नष्ट हो जाते हैं, इसी प्रकार प्राणायामके करनेसे इन्द्रियोंके मल नष्ट हो जाते हैं । ' सङ्गति – प्राणायामका दूसरा फल बतलाते हैं— धारणासु च योग्यता मनसः ॥ ५३ ॥

शब्दार्थ – धारणासु - धारणाओंमें; च = और; योग्यता - मनसः = मनकी योग्यता होती है । अन्वयार्थ — और धारणाओंमें मनकी योग्यता होती है । व्याख्या – प्राणायामसे मन स्थिर होता है । जैसे कि ' प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ' पाद १ सूत्र ३४ में बतलाया है और उसमें धारणाकी ( जिसका वर्णन अगले पादमें किया जायगा ) योग्यता प्राप्त हो जाती है । सङ्गति – प्रत्याहारका लक्षण बताते हैं-( ४५४ )

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सूत्र ५४-५५ ] * ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् '* [ साधनपाद स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥ ५४ ॥

असम्प्रयोगे = सम्बन्ध न होनेपर; चित्तस्य शब्दार्थ – स्वविषय = अपने विषयोंके साथ; स्वरूप - अनुकारः इव - चित्तके स्वरूपका अनुकरण अर्थात् नकल - जैसा करना; इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंका; प्रत्याहारः = प्रत्याहार कहलाता है । अन्वयार्थ – इन्द्रियोंका अपने विषयोंके साथ सम्बन्ध न होनेपर चित्तके स्वरूपका अनुकरण ( नकल ) जैसा करना प्रत्याहार है । व्याख्या – प्रत्याहारका अर्थ है पीछे हटना, उलटा होना, विषयोंसे विमुख होना । इसमें इन्द्रियाँ अपने बहिर्मुख विषयसे पीछे हटकर अन्तर्मुख होती हैं । इस कारण इसको प्रत्याहार कहा गया है । जिस प्रकार मधु बनानेवाली मक्खियाँ रानी मक्खीके उड़नेपर उड़ने लगती हैं और बैठनेपर बैठ जाती हैं, इसी प्रकार इन्द्रियाँ चित्तके अधीन होकर काम करती हैं । जब चित्तका बाहरके विषयोंसे उपराग होता है, तभी उनको ग्रहण करती हैं । यम, नियम, प्राणायामादिके प्रभावसे चित्त जब बाहरके विषयोंसे विरक्त होकर समाहित होने लगता है, तब इन्द्रियाँ भी अन्तर्मुख होकर उस - जैसा अनुकरण करने लगती हैं और चित्तके निरुद्ध होनेपर स्वयं भी निरुद्ध हो जाती हैं । यही उनका प्रत्याहार है । इस अवस्थामें चित्त तो बाह्य विषयोंसे विमुख होकर आत्मतत्त्वके अभिमुख होता है, पर इन्द्रियाँ केवल बाह्य विषयोंसे विमुख होती हैं । चित्तके सदृश आत्मतत्त्वके अभिमुख नहीं होतीं । इसलिये ' अनुकार इव ' अर्थात् नकल - जैसा कहा गया है । इस प्रकार चित्तके निरुद्ध होनेपर इन्द्रियोंके जीतनेके लिये अन्य किसी उपायकी अपेक्षा नहीं रहती ।

पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥

( कठोपनिषद् २ । १ । १ ) ' स्वयम्भूने ( इन्द्रियोंके ) छेदोंको बाहरकी ओर छेदा है अर्थात् इन्द्रियोंको बहिर्मुख बनाया है । इस कारण मनुष्य बाहर देखता है । अपने अंदर नहीं देखता । कोई विरला धीर पुरुष अमृतको चाहता हुआ आँखों अर्थात् इन्द्रियोंको बंद करके ( अन्तर्मुख होकर प्रत्याहारद्वारा ) अन्तर आत्माको देखता है । ' सङ्गति — प्रत्याहारका फल बतलाते हैं— ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ ५५ ॥

शब्दार्थ- -ततः = = उससे ( प्रत्याहारसे ); परमा = सबसे उत्तम - उत्कृष्ट; वश्यता - वशीकरण होता है; इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंका । अन्वयार्थ — उस प्रत्याहारसे इन्द्रियोंका उत्कृष्ट वशीकार होता है । व्याख्या — सूत्रमें प्रत्याहारसे इन्द्रियोंकी परमवश्यता बतलायी है । यह परमवश्यता किस अपरम - वश्यताकी अपेक्षासे है, इसको व्यासभाष्यमें इस प्रकार बतलाया है-१ कोई कहते हैं कि शब्द आदि विषयोंमें आसक्त न होना अर्थात् विषयोंके अधीन न होकर उनको अपने अधीन रखना इन्द्रियवश्यता अर्थात् इन्द्रियजय है । २ दूसरे कहते हैं कि वेद - शास्त्रसे अविरुद्ध विषयोंका सेवन और उनसे विरुद्ध है ३ तीसरे कहते हैं कि विषयोंमें न फँसकर अपनी इच्छासे विषयोंके साथ इन्द्रियोंका विषयोंका परित्याग इन्द्रियजय हे । ४ चौथे कहते हैं कि राग - द्वेषके अभावपूर्वक सुख - दुःखसे शून्य शब्दादि विषयका सम्प्रयोग ज्ञान होना इन्द्रियजय है । होना इन्द्रियजय है । ( ४५५ )

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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप ** [ सूत्र ५५ इन सब उपर्युक्त इन्द्रियजयके लक्षणोंमें विषयोंका सम्बन्ध बना ही रहता है दूर नहीं हो सकती । इसलिये यह इन्द्रियोंकी परमवश्यता नहीं वरं अपरमवश्यता । जिससे है गिरनेकी । आशङ्का भगवान् जैगीषव्यका मत है कि चित्तकी एकाग्रताके कारण इन्द्रियोंकी विषयोंमें प्रवृत्ति न होना इन्द्रियजय है उस एकाग्रतासे चित्तके निरुद्ध होनेपर इन्द्रियोंका सर्वथा निरोध हो जाता है और अन्य किसी इन्द्रिय - जयके उपायमें । प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं रहती । इसलिये यही इन्द्रियोंकी परमवश्यता है, जो सूत्रकारको अभिमत है । साधनपादका उपसंहार पूर्वोक्त प्रकारसे पूर्वपादमें कहे हुए योगके अङ्गभूत क्लेशोंको सूक्ष्म बनानेवाले क्रियायोगको कहकर और क्लेशोंके नाम, स्वरूप, कारणं, फलोंको कहकर कर्मोंके भी भेद, कारण, स्वरूप और फलको कहकर विपाकके कारण और स्वरूपको कहा । फिर क्लेशोंके त्याज्य होनेसे, क्लेशोंको बिना जाने त्याग न कर सकनेसे, क्लेश - ज्ञानको शास्त्राधीन होनेसे, शास्त्रको हेय, हेय - हेतु, हान, हान- उपायके बोधनद्वारा चतुर्व्यूहको अपने - अपने कारणसहित कहकर मुक्तिके साधन विवेकज्ञानके कारण जो अन्तरङ्ग - बहिरङ्ग भावसे स्थित यम - नियमादि हैं । उनके फलसहित स्वरूपको कहकर आसनसे लेकर प्रत्याहारतक जो परस्पर उपकार्योपकारक - भावसे स्थित हैं, उनका नाम लेकर प्रत्येकका लक्षण और कारणपूर्वक फल कहा है । इस उपसंहारमें व्याख्याताके अपने विशेषवक्तव्य, विशेष - विचार, टिप्पणी इत्यादि अर्थात् ( प्रथम सूत्रमें ) तपका वास्तविक स्वरूप, युक्ताहार, युक्त - विहार, युक्त - स्वप्न, युक्त - बोध, उपवास आदिके नियम, गायत्री - मन्त्रकी विशेष व्याख्या, ( सूत्र ४ में ) ' विदेह ' तथा ' प्रकृतिलयों के सम्बन्धमें संकीर्ण और अयुक्त विचारोंका युक्तियों, व्यासभाष्य और भोजवृत्तिद्वारा निराकरण, ( सूत्र ५ में ) अविद्याके उत्पत्तिस्थानका निर्देश सत्त्वचित्तोंमें लेशमात्रतम, ( सूत्र १३ में ) प्रधान कर्माशय, नियत विपाक, अनियत विपाक, अनियत विपाककी तीन गतियाँ, आवागमनके सम्बन्धमें विकासवादियोंकी शङ्काओंका समाधान, आवागमनद्वारा ईश्वरकी दया तथा न्याय, सर्वशक्तिमत्ता, कल्याणकारिता और आवागमनका मनुष्यके विकासके लिये अनिवार्य होना, ( सूत्र १७ में ) व्यासभाष्यका तथा योगवार्त्तिकका भाषार्थ, ( सूत्र २०, २१, २२, २३, २४, २५ में ) व्यासभाष्य योगवार्त्तिक तथा भोजवृत्तिका भाषार्थ, ( सूत्र ३० में ) यमोंका योगियोंके अभिमत - स्वरूप, ( सूत्र ३१ में ) यमोंका सार्वभौम - स्वरूप तथा संसारमें फैली हुई अशान्तिको मिटानेका एकमात्र उपाय, केवल उनका यथार्थरूपसे पालन, महाभारत कर्णपर्व अध्याय ६ ९ के श्लोक जिनमें श्रीकृष्णजी महाराजने राष्ट्रकी सारी परिस्थितियोंको दृष्टिकोणमें रखते हुए सत्यका स्वरूप बताया है, ( सूत्र ३२ में ) नियमोंका विस्तारपूर्वक वर्णन, हठयोगकी छहों क्रियाओंद्वारा शरीर - शोधन, ओषधियों, प्राकृतिक नियमों, सम्मोहन शक्ति, संकल्प - शक्तिद्वारा नीरोगता, पाश्चात्त्य देशकी आधुनिक विद्याएँ हिपनोटिज्म, मैस्मेरिज्म, क्लेयरबायन्स, टेलीपैथी, स्प्रीच्युलिज्मका विधिपूर्वक वर्णन, ( सूत्र ४६ में ) ध्यानपर बैठनेके सब प्रकारके आसन, योगसाधनके नियम, सब प्रकारकी मुख्य - मुख्य मुद्राएँ, बन्ध और आसन, उनके फलसहित; ( सूत्र ५० में ) आठ प्रकारके प्राणायाम, उनके अवान्तरभेदसहित, ( सूत्र ५१ में ) चौथे प्राणायामकी पाँच विधियाँ इत्यादि भी उपसंहृत कर लेना चाहिये । इस प्रकार यह योग यम - नियमोंके बीजभावको प्राप्त हुआ, आसन, प्राणायाम आदिसे अङ्कुरित हुआ और प्रत्याहारसे पुष्पवाला होकर धारणा, ध्यान और समाधिसे फलित होगा । इस प्रकार पातञ्जलयोगप्रदीपमें साधनपादवाले दूसरे पादकी व्याख्या साधनपादो द्वितीयः । समाप्त हुई । इति पातञ्जलयोगप्रदीपे ( ४५६ )

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सूत्र ५५ ] * परिशिष्ट * [ साधनपाद परिशिष्ट साधनपाद सूत्र ३२ के विशेष वक्तव्यमें बतलाये हुए शरीर - शोधनके चार साधनोंमेंसे चौथासाधन ओषधि यहाँ परिशिष्टरूपसे दिया जाता है । ओषधिद्वारा शरीर - शोधन ( आरोग्यता ) शरीरका शोधन ओषधिद्वारा भी होता है । आजकल लगभग निन्यानबे प्रतिशत मनुष्योंको कोष्ठबद्ध अर्थात् पूर्णतया मलत्याग न होनेका विकार रहता है । जिससे भजन अर्थात् मनकी एकाग्रतामें नाना प्रकारके विघ्न उपस्थित होते हैं, उनके निवारणार्थ चिकित्सकके अभावमें कब्ज तथा अन्य साधारण रोगोंके शान्त करनेके लिये अभ्यासियोंके उपयोगी कुछ अनुभूत तथा अनुभवी संन्यासियों, वैद्यों, डाक्टरों और हकीमोंसे प्राप्त की हुई ओषधियाँ लिख देते हैं । कोष्ठबद्ध दूर करनेकी कुछ रेचक ओषधियाँ-( १ ) त्रिफला ( हड़, बहेड़ा, आँवला सम - भाग ) दो माशेसे छः माशेतक अथवा केवल बड़ी हड़का चूर्ण दो माशेसे छः माशेतक अथवा इतरी फल जमानी एक तोलेसे दो तोलेतक रातको सोते समय दूध अथवा पानीके साथ । बड़ी हड़का प्रयोग पूरे वर्षके लिये-हड़का चूर्ण तीन माशे चैत और वैशाख शहद एक तोलासे दो तोलाके साथ ज्येष्ठ और आषाढ़ गुड़ " " " " श्रावण और भादों सेंधा नमक एक माशेसे तीन माशेके साथ आश्विन और कार्तिक मिश्री एक तोलासे दो तोलाके साथ " " मार्गशीर्ष और पौष पीपल एक माशेसे तीन माशेके साथ " " माघ और फाल्गुन सोंठ " ( २ ) गुलाबके फूल एक तोला, सेंधा नमक एक तोला, बड़ी हड़का बक्कल एक तोला, सौंफ एक तोला, सोंठ एक तोला, सनायकी पत्ती चार तोला, इनका चूर्ण दो माशेसे छः माशेतक रातको सोते समय पानीके साथ अथवा दिनमें आवश्यकतानुसार । ( अनुभूत ) ( ३ ) सनायकी फली छः- चार घंटेतक थोड़ेसे ( आधी छटाक ) पानीमें भिगोकर फली निकालकर पानीको पीना । ( अनुभूत ) ( ४ ) रब्बूस्सूस एक तोला, बंसलोचन एक तोला, एलुआ दो तोला, रेवनचीनी दो तोला, रूमी मस्तगी एक तोला, सबका चूर्ण खरल करके थोड़ा - सा पानी डालकर चनेके गोली सोते समय दूध या पानीके साथ लें । ( अनुभूत ) बराबर गोली बनावें । एक ( ५ ) रूमी मस्तगी, असार रेवेन्द, एलुआ, सुरञ्जान शीरीं बराबर - बराबर बराबर गोलियाँ बनावें । एक गोली सोते समय पानी लेकर चूर्ण करके चनेके या दूधके साथ लें । ( अनुभूत ) ( ६ ) खील सुहागा छः माशे, एलुआ छः माशे, निसौत सनायकी पत्ती दो तोला, सकमोनिया विलायती एक माशा, तीन माशे, बड़ी हड़का बक्कल दो तोला, बराबर गोलियाँ बनावें । सोते समय एक गोली दूध सबको घीकुमारके रसमें खरल करके चनेके या पानीके साथ लें । ( अनुभूत ) ( ४५७ )

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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५५ ( ७ ) सकमोनिया बिलायती एक तोला, जुलाफा हड़ एक तोला, एलुआ एक तोला, रेवेन्द असार एक तोला, रूमी मस्तगी एक तोला, सोंठ छः माशे, भरमुकी छः माशे, सबको पानीमें खरल करके चनेके बराबर गोली बनावें, सोते समय एक गोली दूध या पानीके साथ । ( अनुभूत ) वातविकारनाशक तथा रेचक-( १ ) रेवन्दचीनी ( रेवनचीनी ), सोडा खानेका, सोंठ बराबर - बराबर लेकर चूर्ण कर लें, सोते समय एक माशेसे चार माशेतक दूध या पानीके साथ लें । ( २ ) त्रिकुटा अर्थात् पीपल, काली मिर्च, सोंठ बराबर - बराबर लेकर चूर्ण कर लें, सोते समय तीन माशेसे छः माशेतक दूधके साथ लें । कफ तथा वातनाशक । ( ३ ) एलुआ, तिर्वी सफेद ( निसौत ), सुरञ्जान मीठा, सब सम - भाग- -उनके चूर्णको घीकुमारके गूदेमें खरल करके चने - बराबर गोली बनावे, एक या दो गोली रातको सोते समय दूध या ताजे पानीके साथ खाय । रेचक, पाचक, वातविकार ( दर्द आदि ), कब्ज और आमको दूर करता है । ( अनुभूत ) कफनाशक पाचक एवं रेचक-बड़ी हरड़की बकुली तीन तोला, काली मिर्च चार तोला, पीपल छोटी दो तोला, चव्वह एक तोला, तालीसपत्र एक तोला, नागकेशर छः माशे, पीपलामूल दो तोला, पत्रज डेढ़ माशे, छोटी इलायची तीन माशे, दारचीनी तीन माशे, नीलोफरके फूल तीन माशे, इन सबका चूर्ण बनावें । इन सबकी चारगुणी मिश्रीकी चासनी बनाकर उसमें उस चूर्णको मिलावें, तीन माशेसे एक तोलातक सोते समय दूधके साथ या दोपहरको खानेके बाद लें । ( अनुभूत ) ( १ ) बिगड़े हुए जुकाम, खाँसी, सिरका भारी रहना, सिर तथा आधे सिरका दर्द या हर प्रकारके मस्तिष्क तथा पेटके विकारोंके लिये अत्युत्तम रेचक अनुभूत ओषधि -अयारुज़ फिकरा ( यूनानी दवा, कई ओषधियोंका चूर्ण ) एक माशेसे तीन माशेतक इतरीफल कशनीज़ी एक तोलेसे दो तोलेतकमें मिलाकर प्रातः - सायं दूधके साथ खा सकते हैं । अयारुज़ फिकराका नुसखा – बालछड़, सलीफा, दारचीनी, असार्वन, जाफरान, ऊदबलसान, हुबबलसान, रूमी मस्तगी एक - एक तोला, एलुआ एक पाव- - इन सबका चूर्ण । अयारुज फिकराका दूसरा नुसखा – जो स्वयं बनवाना होगा अत्तारोंके पास न मिल सकेगा । पोस्त इन्द्रायन ( हिंजल ) पाँच तोला, गाजीकोन पाँच तोला, सकमोनिया विलायती पाँच तोला, अफतीमून तीन तोला, गूगल शुद्ध तीन तोला, अनीसून तीन तोला, तज तीन तोला, काली मिर्च तीन तोला, सोंठ तीन तोला, उस्तखद्दूस तीन तोला, गुलाबके फूल तीन तोला, बादरंजबोया तीन तोला, पोदीना दो तोला, पोस्त तुरंज दो तोला, वग गावजवाँ दो तोला – इन सबके चूर्णसे दुगुना शहद मिलाकर चालीस दिनके पश्चात् तीन माशेसे एक तोलेतक खुराक । ( २ ) हर प्रकारके बिगड़े हुए जुकाम, दिमागी खराबी या हाज़मेके लिये निहायत अनुभूत ( मुजर्रब ) नुसखा-लौंग एक तोला, पत्रज दो तोला, बड़ी इलायचीका दाना तीन तोला, अकरकरा चार तोला, दारचीनी पाँच तोला, पीपलामूल छः तोला, पीपल छोटी सात तोला, काली मिर्च आठ तोला, सोंठ नौ तोला, लाल चन्दनका चूर्ण दस तोला, इस मात्रामें इनका चूर्ण होना चाहिये । इसलिये इन सबके चूर्णका ( ४५८ )

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सूत्र ५५ ] * परिशिष्ट * [ साधनपाद अलग - अलग नाप लें । सबको एक करके सुबह और शाम चार रत्तीसे एक माशातक शहदके साथ खायँ । ( ३ ) जुकामका बंद होना, सरका दर्द तथा खाँसी एवं दमामें बहुत लाभदायक ( अनुभूत ) । नौसादर उड़ाया हुआ अथवा शुद्ध किया हुआ दो रत्ती, भस्म फटकरी एक रत्ती, खील सुहागा एक रत्ती । साधारण जुकामके लिये-( ४ ) गुलबनफशा छः माशे, तुख्म ख़तमी ( खतमीके बीज ) अथवा खतमीका गूदा चार माशे, उस्तखुद्दूस चार माशे, मुलहठी चार माशे, गावजवाँ चार माशे, बड़ी हड़ छः माशे, उन्नाव विलायती सात दाने, लहसौड़ा ग्यारह दाने, इनका जोशांदा मिश्री या चीनी डालकर सुबह या सोते समय पीये । इन चीजोंको आवश्यकतानुसार न्यून - अधिक कर सकते हैं । ( अनुभूत ) भजन ( प्राणायाम, ध्यानादि क्रिया ) से उत्पन्न होनेवाली खुश्कीके लिये-( १ ) मीठे बादामकी गिरी ग्यारहसे पंद्रहतक, काली मिर्च ग्यारह दाने, सौंफ चार मारो, गुलाबके फूल चार माशे, कासनी चार माशे, गुलबनफशा ( फूल ) चार माशे, बड़ी इलायचीके दाने दो माशे, इन सबको पीस - छानकर मिश्री या बूरा एक छटाँक डालकर पियें । सर्द मौसममें इनको घीमें छौंककर पियें । इन चीजोंको आवश्यकतानुसार न्यून - अधिक कर सकते हैं । ( अनुभूत ) ( २ ) इलायचीके दाने, जीरा, बादामकी गिरी, मुनक्का, गुलबनफ़शा, मिश्रीको आवश्यकतानुसार मात्रामें पीसकर चाटें । ( अनुभूत ) ( ३ ) रूमी मस्तगी, इलायचीके दाने, वंशलोचन सम- मात्रा, इससे दुगुनी मिश्री सबका चूर्ण एक माशे घी या मक्खनमें खूब खरल करके सोते समय दूध या बिना दूधके खायँ । ( अनुभूत ) आँवका रोग मरोड़ एवं पेचिशके लिये-( १ ) सौंफ आधी भुनी हुई और आधी कच्ची पीसकर उसमें मिश्री या चीनी मिलाकर दिनमें कई बार दो - तीन चुटकी लें । ( अनुभूत ) ( २ ) सौंफ, सोंठ, बड़ी हड़के बक्कल, सब बराबर - बराबर लेकर सोंठ एवं हड़को किसी कदर घीमें भूनकर सबको कूटकर चीनी मिलाकर सोते समय चार माशेसे छः माशेतक पानी या दूधके साथ खायँ यह रेचक भी है । ( अनुभूत ) । ( ३ ) ईसबगोलका सत अर्थात् उसकी भूसी छः माशे दूधमें घोलकर पीना । ( अनुभूत) ( ४ ) गर्मीसे आँव, पेचिश एवं दस्तके लिये गोंद कतीरा एक तोला, बिलगिरी दो चार माशे, बिहीदाना तीन माशे, अर्क बेदमुश्क छः छटाँकमें सबका चूर्ण मिलाकर तोला, ईसबगोल ( ५ ) बालंगूके बीज तीन माशे, गुलाबका अर्क एक पाव खिलावें । ( अनुभूत ) दो तोला सबको पकाकर रातको खिलावें और उस रात खानेको , रोगन बादाम एक माशा, शर्बत शहतूत साधारण ज्वरके पश्चात् निर्बलता दूर करनेके लिये- कुछ न दें । ( अनुभूत ) दारचीनी तीन माशे, छोटी इलायचीके दाने छः माशे, पीपल गिलोयका सत दो तोला, मिश्री आठ तोला, इनका चूर्ण एक छोटी एक तोला, वंशलोचन दो तोला, माशा कुछ घीमें चिकना करके मिलाकर खाना । ( अनुभूत ) शहद ( ४५ ९ )

पृष्ठ 497

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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५५ खाँसी खुश्क या तर-( १ ) गोंद बबूल छः माशे, कतीरा छः माशे, बहेड़ा छः माशे, मुलहठी एक तोला, काकरासिंगी तीन माशे, रब्बुस्सूस ( मुलहठीका सत ) छः माशे, नमक काला एक तोला, भुने हुए लाल इलायचीके दाने एक तोला, कूट - छानकर चनेके बराबर गोलियाँ बनावें, एक गोली मुँहमें डालकर रस चूसें । ( अनुभूत ) ( २ ) रब्बुस्सूस एक तोला, मुलहठी चार तोला, काकरासिंगी दो तोला, सोंठ एक तोला, काली मिर्च एक तोला, पीपल एक तोला, बिहीदाना एक तोला, मग़ज बादाम ( बादामकी गिरी ) एक तोला पीसकर शहदमें चनेके बराबर गोलियाँ बनावें, एक या दो गोली सोते समय मुँहमें डाले रहें । खाँसीके वक्त भी मुँहमें रखकर चूसते रहें । ( अनुभूत ) ( ३ ) अनारका छिक्कल जला हुआ चार रत्ती पानके साथ । साँस, दमा, खाँसी आदिके लिये-पारा शुद्ध, गन्धक शुद्ध, मीठा तेलिया शुद्ध, त्रिकुटा ( सोंठ, पीपल, काली मिर्च ), सुहागाकी खील, काली मिर्च सम - भाग लेकर सबका चूर्ण बनाकर अदरक के रसमें खरल करें, एक रत्ती अदरकके रसके साथ लें । ( अनुभूत ) दमाके अनुभूत नुसखे-( १ ) स्थायी रूपसे रोगको जड़से हटानेके लिये निम्नलिखित ओषधियाँ अनुभूत सिद्ध हुई हैं — प्रातःकाल एक छटाँक अदरकका रस शहदके साथ । रात्रिमें किसी समय १ तोला सोंठ, भारंगी और बड़ी हरड़का चूर्ण सम - भाग पानीके साथ । यदि फिर भी कुछ कफ, नजले आदिकी शिकायत रहे तो एक या आधा शुद्ध किया हुआ भिलावा गायके दूधमें औटाकर पीवें; अथवा आधी या एक रत्ती शुद्ध कुचलाके चूर्णको चार रत्ती त्रिकुटाके चूर्ण में मिलाकर सोते समय गायके दूधके साथ सेवन करें । ( २ ) दमेमें स्थायीरूपसे ताकतके लिये श्वासकुठार, अभ्रक भस्म, लोह भस्म प्रातः एवं सायंकाल शहदके साथ लें ( अनुभूत ) । किंतु दौरेकी अवस्थामें इसको न लें । कफके सूख जानेसे हानि पहुँचनेकी सम्भावना हो सकती है । जरित हिंगुल, चान्द्रोदय, सोमनाथी ताम्र - भस्म, मल्ल चान्द्रोदय और मल्ल सिंदूर भी लाभदायक सिद्ध हुए हैं, किंतु दौरे तथा गर्म ऋतुमें इनका सेवन न किया जाय । अन्य साधारण ओषधियाँ-( ३ ) नौसादर धतूरेके रसमें उड़ाया हुआ दो रत्ती पानी या दूधके साथ लें । इसके अभावमें शुद्ध अथवा साधारण नौसादर भी लाभदायक है । ( अनुभूत ) उड़ाये हुए नौसादरके साथ भस्म फिटकरी एवं खील सुहागा मिलाना अधिक लाभदायक रहेगा । ( ४ ) चनेके छिलकोंका पाताल - यन्त्रसे निकाला हुआ तेल एक बूँद बताशेके साथ । ( ५ ) पीली कौड़ी तीन दिन पानीमें नमक मिलाकर रखें, फिर गरम पानीसे धोकर एक उपलेपर कौड़ियोंको रखकर दस उपले ऊपरसे रखकर जलावें । जब कौड़ियाँ जल जायँ, तब आकके दूधमें खरलकर टिक्की बनाकर एक मिट्टीके बरतनमें रखकर भीगी मिट्टी लगे हुए कपड़ेसे लपेटकर जलायें; उसको पीसकर आकके दूधमें फिर पकावें, तीन बार ऐसा ही करें फिर इसको पीसकर एक रत्ती शहदके साथ प्रातः - सायं खायँ, ऊपरसे गायका दूध पीयें । ( ४६० )

पृष्ठ 498

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* परिशिष्ट [ साधनपाद सूत्र ५५ ] * ********** ( ६ ) लोहेकी कड़ाहीमें चार तोले कलमी शोरा रखकर उसके ऊपर और चारों ओर एक छटाँक भलावा फैलाकर किसी बर्तनसे ढक दें । एक अँगीठीमें कोयले जलाकर उसको ऐसी जगहपर रख दें जहाँ किसीको धुआँ न लगे । जब जलकर जम जाय तो खुरचकर शीशीमें रख लें । खुराक — दो रत्ती बताशेमें । परहेज – खटाई, लाल मिर्च इत्यादि । ( अनुभूत ) ( ७ ) सं ० ३ एवं ६ को वसूटीके खारके साथ दोसे चार रत्तीतक गलेमें डालकर ऊपरसे दूध या पानी पी ले । ( ८ ) मदार, धतूरा, वसूटीका खार, उड़ाये हुए नौसादरके साथ अथवा अलग - अलग चार रत्तीतक उपर्युक्त विधि - अनुसार । ( ९ ) कड़वे तम्बाकूके पत्ते एक पाव मिट्टीके बर्तनमें डालकर मदारके दूधसे खूब भीगो दें । सूख जानेपर बरतनको सम्पुट करके उपलोंमें भस्म कर लें । एक रत्ती भस्म प्रातः काल उबाले हु चनोंके पानीके साथ । घी - दूधका सेवन रहे । दवाकी मात्रा धीमे - धीमे बढ़ाते जायँ । ( १० ) निम्नलिखित ओषधि दमाके लिये अत्यन्त उपयोगी और अनुभूत बतलायी गयी है, यह अत्यन्त गोपनीय थी, हमने प्राप्त तो कर लिया है; किंतु कभी उसको बनवाने तथा प्रयोग करवानेका अवसर नहीं मिला है । पाठकोंके हितार्थ लिखी जाती है-नौसादर १ तोला, सुहागा भुना हुआ १ तोला, कलमी शोरा १ तोला, खील फटकरी १ तोला, लोटन सज्जी १ तोला । सबको पीसकर आकके १ सेर दूधमें भिगोकर कोरे बरतनमें रखकर उसे सम्पुट करके २४ घंटेतक आँच दें, २-३ बार इसी प्रकार आकके दूधमें भिगोकर आँच दें, यदि जलते हुए कोयलेपर रखनेसे धुआँ दे तो कच्ची समझना चाहिये । प्रयोगविधि – ३ रत्ती निहार मुँह २३ तोले शुद्ध -मक्खनमें मिलाकर खायँ । दोपहरको मूँगकी दाल, फुलका खायँ, दालमें पकते समय दो तोला शुद्ध घी डालें । ओषधि - सेवनके पाँच घंटे अंदरतक ठंडा जल न पीवें, गर्म पीवें । रातको १ तोला बनफशा उबालकर दूध खाँड डालकर पीयें । रात्रिका भोजन बन्द रखें । सब प्रकारके नशे तम्बाकू, सिगरेट, खटाई, तेल आदिका परहेज! यदि कब्ज हो तो २३ तोले गुलकन्द रातको दूधके साथ खायँ । ( ११ ) भाँगके पत्ते डेढ़ तोला, धतूरेके पत्ते डेढ़ तोला, इन दोनोंको कूटकर दो तोले कलमी शोरा भिगोकर उसमें मिलाकर धूपमें सुखा लें । एक माशा यूकेलिप्टस - आयल ( Eucaliptus oil पानीमें इनका सिगरेट बनाकर पिलावें । धुआँ कुछ देर रोककर छोड़ दें । तुरन्त दमाका दौरा रुक जायेगा ) मिलाकर रख लें । ( १२ ) लाल फिटकरीकी भस्म एक छटाँक संख्या २ आने भरको कागजी नीबूके रसमें । ( अनुभूत ) दानेके बराबर गोली बनावें । गोली मुँहमें रखकर चूसें । ( अनुभूत ) खरल करके बाजरेके एक छटाँक चना एक पाव पानीमें उबालना चाहिये, जब आधा पाव पानीरह जाये तब उस पानीके साथ एक रत्ती भस्म लेना चाहिये । परहेज़ — गुड़, तेल, खटाई, चाय, लाल मिर्च । ( अनुभूत ) बदहजमी, दस्त एवं कैके लिये-( १ ) अमृतधाराकी दो - चार बूँदें पानी या बताशेके साथ लें अमृतधाराका नुसखा — पीपरमेण्ट एक तोला, काफूर एक 1 तोला, अजवाइनका सत एक तोला, ( ४६१ )

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साधनपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ५५ दारचीनीका सत छः माशे, लौंगका सत छः माशे, छोटी इलायचीका सत छः माशे — सबको मिलाकर एक शीशीमें रख लें । दो बूँद पानी अथवा बताशेमें लें । ( अनुभूत ) ( २ ) सञ्जीवनी वटी, जो वैद्योंके पास बनी हुई मिलती है, अदरक या सोंठके रसके साथ लें । ( अनुभूत ) सञ्जीवनी वटीका नुसखा — बायविडङ्ग, सोंठ, पीपल, काली मिर्च, बड़ी हड़, आँवला, बहेड़ा, बछ, गिलोय, भलावा शुद्ध, मीठा तेलिया शुद्ध सब सम भाग, इनका चूर्ण सात दिनतक गोमूत्रमें खरल कर गोलियाँ बनावें । भलावेकी शोधन विधि - बिना ब्यायी गाय ( बछेरी ) के गोबरके साथ पकावें और कच्ची ईंटके चूर्णमें डालकर उसके नोक काटें और गरम पानीमें धोवें । इसके शोधनमें सावधान रहें, धुएँसे बचें । मीठा तेलिया दूधमें पकावें, जब सींक उसमें गड़ने लगे तब समझना चाहिये कि वह पक गया है । सञ्जीवनी बटीको अजीर्ण रोगमें अदरकके रसके साथ एक गोली, हैजेमें दो, साँपके काटेमें तीन, सन्निपात अर्थात् सरसाममें चार और खाँसीमें सोंठके साथ लेना बतलाया गया है । अजीर्ण ( बदहज़मी ) के लिये-( १ ) अष्टक गोली - सोंठ, काली मिर्च, पीपल, जीरा काला एवं सफेद, अजमोद, प्रत्येक एक - एक तोला, हींग घीमें भुनी हुई छः माशे, नमक काला डेढ़ तोला, गन्धक शुद्ध दो तोला, सबको पीसकर कागजी नीबूके रसमें खरल करके चनेके बराबर गोली बनावें, खानेके बाद एक या दो गोली लें । ( अनुभूत ) ( २ ) भुना हुआ सुहागा, पीपल बड़ी, हड़का बक्कल, हिंगुल अर्थात् शिंगरफ़ शुद्ध, एक - एक तोला, सबको कागजी नीबूके रसमें खरल करके मटरके बराबर गोली बनावें । ( अनुभूत ) ( ३ ) हींग घीमें भुनी हुई छः माशे, जीरा सफेद और काला, मिर्च सफेद ( दक्षिणी ), नमक, पीपल, प्रत्येक ढाई तोला, नीबूका सत छः तोला, मिश्री छः तोला, सबका चूर्ण । खुराक चार माशे । ( ४ ) अजीर्ण, पेटका फूलना, वायुविकार, खाँसी - श्वासादि सब विकारोंको हटाकर जठराग्नि बढ़ानेवाली अनुभूत दवा आनन्द भैरव रस - हिंगुल अर्थात् शिंगरफ़ शुद्ध दो तोला, गन्धक आँवलेसार ( शुद्ध ) एक तोला, मीठा तेलिया शुद्ध एक तोला, खील सुहागा एक तोला, सोंठ एक तोला, पीपल एक तोला, काली मिर्च एक तोला, धतूरेके बीज एक तोला, अदरकके रसमें खरल करके काली मिर्चके बराबर गोली बनावे । एक या दो गोली प्रातः और सायंकाल दूध या पानीके साथ । ( अनुभूत ) ( ५ ) सोंठ १ तोला, काली मिर्च १ तोला, पीपल छोटी १ तोला, काला जीरा १ तोला, सफेद जीरा १ तोला, अजवायन १ तोला, सैंधा नमक १ तोला, हींग १ तोला, टाटरी ३ माशा, राई १ तोला, आक ( मन्दार ) के फूल सूखे १ तोला – सबको कूट - छानकर लगभग छः नीबू कागजीके रसमें खरल करके चनेके बराबर गोली बनावें । एक गोली भोजनके पश्चात् पानीके साथ । ( अनुभूत ) संग्रहणी -( १ ) बड़ी हड़, मोचरस, पठानी लोद, धावेके फूल, बेलगिरी, इन्द्र जौ, अफीम, पारा शुद्ध, गन्धक नोट — दमेमें निहार मुँह गुनगुना पानी नोनमिश्रित पीकर उल्टी करे । धोती, नेती और न्योली अधिक लाभदायक हैं । ( ४६२ )

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सूत्र ५५ ] परिशिष्ट * K [ साधनपाद आँवलेसार, सब सम - भाग, गन्धक और पारेकी कजली करके अन्य सब दवाओंका चूर्ण मिलाकर खरल करें । तीन रत्ती प्रातःकाल गौके छाछके साथ, तीन रत्ती सायंकाल बकरीके दूध अथवा खसखसके दूधके साथ । भोजन चावल मूँगकी खिचड़ी दहीके साथ । ( २ ) एक तोला शुद्ध गन्धक आँवलेसारको एक माशे त्रिकुटेके साथ खूब बारीक पीसकर तीन भाग बनावें । तीन मलमलके टुकड़ोंपर एक - एक भाग रखकर तीन बत्तियाँ बनावें । एक बत्तीको तिलके तेलमें भिगोकर जलावें । तीन बूँद एक पानमें टपकाकर उसमें दो रत्ती शुद्ध पारा डालकर खिलावें । तीन दिनतक ऐसा करें । खुराक दूध - चावल । हैजा-मदारका गूदा तीन तोले बारीक पीसकर दो तोले अदरकके रसमें खरल करके चनेके बराबर गोली बनावें । गुलाबके अर्क या ताजा पानीके साथ एक गोली खिलावें । अम्लपित्तसे हाजमा ठीक न रहना-I अविपत्तिकरचूर्ण, सोंठ, काली मिर्च, पीपल, हड़, बहेड़ा, आँवला, वायविडङ्ग, नागरमोथा, पत्रज, छोटी इलायचीके दाने, बिड़ नमक, एक - एक तोला, लौंग ग्यारह तोला, निसौत चौवालीस तोला, मिश्री छाछठ तोला – इन सबका कपड़छन चूर्ण घीमें चिकनाकर शहद मिलाकर रख लें । तीन माशेसे एक तोलातक रातको सोते समय दूधके साथ या दिनमें भोजनके बाद ताजे पानीके साथ लें । यह रेचक भी है । ( अनुभूत ) वात - विकारके लिये रेचक-( १ ) वातारि गूगल — गूगल शुद्ध, गन्धक शुद्ध, हड़, बहेड़ा, आँवलाका चूर्ण सब बराबर वजनमें लेकर कैस्टर आइल ( अरण्डीका तेल ) में छः - छः मारोकी गोली बनावें । सोते समय एक गोली दूधके साथ लें । यह रेचक भी है । वायुके दर्द दूर करता है । ( अनुभूत ) ( २ ) वातव्याधिके लिये अरण्डीपाक – यह रेचक है, शीतकालमें अधिक लाभदायक है । त्रिकुटा डेढ़ तोला, लौंग तीन माशे, बड़ी इलायचीके दाने छः माशे, दारचीनी छः माशे, पत्रज छः माशे, नागकेसर छः माशे, असगन्ध एक तोला, सौंफ एक तोला, सनाय एक तोला, पीपलामूल छः माशे, मालेके बीज ( निर्गुण्डी ) छः माशे, सतावर छः माशे, बिसखपरा ( पुनर्नवा सफेद ) की जड़का बक्कल छः माशे, खस छः माशे, जायफल चार माशे, जावित्री चार माशे – इन सबका चूर्ण करें । दस तोले अरण्डीके बीजकी गिरी बारीक पीसकर एक सेर गायके दूधमें मावा बनावें । उसको दो छटाँक गायके घीमें दवाओंका चूर्ण और एक सेर बूरा मिलाकर छः - छः तोलाके लड्डू बनावें । खुराक -एक लड्डू भूनें । फिर दूधके साथ अथवा बिना दूधके प्रातःकाल एवं सायंकाल खाय । यह रेचक भी है । ( गायके अनुभूत ) ( ३ ) गठिया और प्रत्येक वातविकारके लिये – एक छटाँक अरण्डीके बीज चबायें और उसके ऊपर आधसेर या जितना पिया जा सके गायका दूध पिलावें रेतमें या भाड़में भुनाकर दिनतक ऐसा करें । खुराक — दाल मूँग और चावलकी पतली खिचड़ी । इससे दस्त आयेंगे । सात । हवासे बचाये रखें । ( ४ ) वातविकारके लिये असगन्ध, चोबचीनी, आँवला सम - भाग या पानीके साथ ।, चूर्ण ६ माशे सोते समय दूध ( ४६३ )