पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 51–60
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 51–60
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दूसरा प्रकरण ] : षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा प्राप्त किये हुए जीवकी अपेक्षासे अद्वैत कहा जा सकता है न कि सांसारिक जीवोंकी अपेक्षासे । यह द्वैतवाद सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक चारों दर्शनोंका सिद्धान्त है । दुःखनिवृत्तिके उद्देश्यसे इन प्राचीन दर्शनकारोंने खोज की है । दुःख - प्रतीति और उसकी निवृत्तिका प्रयत्न चेतन - तत्त्व ( आत्मसत्ता ) के अस्तित्वको सिद्ध करता है । इसलिये पहला जड अद्वैतवाद दूषित ठहरता है । यदि दुःख चेतन - तत्त्व ( आत्मसत्ता ) का ही धर्म होता तो उसकी प्रतीति न होती और यदि दुःखकी प्रतीति भी आत्माका धर्म माना जाय तो दुःख और उसकी प्रतीति दोनों चेतन - तत्त्व ( आत्मसत्ता ) का स्वाभाविक गुण होनेसे उसकी त्रिकालमें भी निवृत्ति असम्भव होती । इसलिये दूसरासिद्धान्त चेतन - अद्वैत -वाद - व भी इनको संतुष्ट न कर सका । इसलिये ये तत्त्ववेत्ता ऋषि इसी परिणामपर पहुँचे हैं कि एक तो चेतन - तत्त्व ( आत्मसत्ता ) है, जो हमारा वास्तविक स्वरूप है और इससे भिन्न एक कोई दूसरा जडतत्त्व ( अनात्मसत्ता ) है, जिसके स्वाभाविक धर्म दुःखादि हैं, जिनके हटानेका प्रयत्न किया जाता है । इसके अतिरिक्त सिद्धान्त सं ० १ तथा सं ० २ के पक्षमें न तो कोई श्रुति मिलती है न युक्ति और न संसारमें कोई उदाहरण; परंतु सिद्धान्त सं ॰ ३ को सारी श्रुतियाँ, स्मृतियाँ, युक्ति और उदाहरण सिद्ध करते हैं । शङ्का — जैसे सुवर्णके आभूषण नाना प्रकारकी आकृति रखते हुए भी सुवर्णरूप ही हैं, जैसे तरंगें, बुलबुले, नदी, तालाब आदि सब जलरूप ही हैं, वैसे ही सारा जगत् केवल एक अद्वितीय ब्रह्मरूप ही है । समाधान — ये उदाहरण तो द्वैत - सिद्धान्तकी ही पुष्टि करते हैं; क्योंकि सुवर्णके आभूषणोंके आकारोंमें एक दूसरा तत्त्व आकाश, जलके तरङ्ग - बुलबुले आदिमें वायु और नदी - तालाब आदिमें पृथिवी भेदक है । शङ्का - " यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वम् ॥ " ( मु ० १।१।७ ) ‘ जिस प्रकार चेतन मकड़ी जड - जन्तुओंकी अभिन्न निमित्त - उपादान - कारण है, इसी प्रकार चेतन ब्रह्म इस जड जगत्का अभिन्न निमित्त उपादान - कारण है । ' इससे चेतन - अद्वैतवाद सिद्ध होता है । समाधान - यह श्रुति द्वैत - सिद्धान्तको ही सिद्ध करती है । अर्थात् जिस प्रकार जड - जन्तुकी उत्पत्तिका चेतन मकड़ी निमित्त - कारण है और उसके मुँहका जड लेप उपादान कारण है, इसी प्रकार जड जगत्का उपादान - कारण त्रिगुणात्मक जड प्रकृति है और निमित्त कारण चेतन ब्रह्म है । शङ्का - " सर्वं खल्विदं ब्रह्म " इस श्रुतिसे केवल एक ब्रह्म ( चेतन तत्त्व ) ही सिद्ध होता है । समाधान — इससे यह अभिप्राय है कि ब्रह्म ( चेतन -सत्ता ) ही सारे त्रिगुणात्मक जगत्में व्यापक हो रहा है; जड - सत्ताका अभाव सिद्ध नहीं होता । यह श्रुति ब्रह्मके शबल, अपर, साकार, सगुण अर्थात् त्रिगुणात्मक प्रकृतिसे मिले हुए स्वरूपका बोध करा रही है न कि शुद्ध, पर, निराकार, निर्गुण, प्रकृतिसे सर्वथा निखरे हुए केवली स्वरूपका । अन्य
श्रुतियाँ भी ऐसा ही बताती हैं । यथा-सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु ( ईश ० उ ० मन्त्र ५ ) वह ब्रह्म इस सब ( त्रिगुणात्मक जगत् ) के अंदर है, वह निश्चय ही इस सब ( त्रिगुणात्मक जगत् ) के बाहर है । तथा— ( ३१ )
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दूसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ उत्तरमीमांसा न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्यो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो तद्विदितादथो अविदितादधि अविदितादधि ॥ इति इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ( केन - उ ० १।३ ) वहाँ ( उस ब्रह्मतक ) नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती, वाणी नहीं जाती, मन नहीं जाता । अतः जिस प्रकार शिष्यको इस ब्रह्मका उपदेश करना चाहिये, वह हम नहीं जानते - वह हमारी समझमें नहीं आता । वह विदितसे अन्य ही है तथा अविदितसे भी परे है - ऐसा हमने पूर्व पुरुषोंसे सुना है जिन्होंने हमारे प्रति
उसका व्याख्यान किया था ।
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
( केन - उ ० १।४ ) जो वाणीसे प्रकाशित नहीं है, किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती है, उसीको तू ब्रह्म जान । जिस
इस ( इन्द्रियगोचर त्रिगुणात्मक जगत् ) की लोग उपासना करते हैं वह ब्रह्म नहीं है ।
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
( केन उ ० १।५ ) जो मनसे मनन नहीं किया जा सकता बल्कि जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है, उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस ( इन्द्रियगोचर, त्रिगुणात्मक जगत् ) की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है । यचक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ( केन - उ ० १ । ६ ) जिसे कोई नेत्रद्वारा नहीं देख सकता वरन् जिसकी सहायतासे नेत्र देखते हैं, उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस ( इन्द्रियगोचर, त्रिगुणात्मक जगत् ) की लोक उपासना करते हैं वह ब्रह्म नहीं है I यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ( केन - उ ० १।७ ) जो कानसे नहीं सुना जा सकता वरन् जिससे श्रोत्रोंमें सुननेकी शक्ति आती है, उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस ( इन्द्रियगोचर त्रिगुणात्मक जगत् ) की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है । यत्प्राणेन च प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ( केन - उ ० १। ८ ) जो प्राण द्वारा विषय नहीं किया जा सकता वरन् जिससे प्राण अपने विषयोंकी ओर जाता है, उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस ( इन्द्रियगोचर, त्रिगुणात्मक जगत् ) की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है । स्मृति भी ऐसा ही बताती है । यथा—
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥
( गीता १३ । ३३ ) ' हे भारत! जैसे सूर्य अकेला इस सारे लोकको प्रकाशित करता है वैसे क्षेत्रका मालिक ( ब्रह्म ) इस सारे लोक ( इन्द्रियगोचर, त्रिगुणात्मक जगत् ) को प्रकाशित करता है । ' ( ३२ )
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दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा श्रीस्वामी शङ्कराचार्यने भी अपने निर्माण षट्कमें इसी बातको सिद्ध किया है । यथा—
मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ १ ॥
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्च वायुर्न वा सप्त धातुर्न वा पञ्च कोशः ।
न वाक् पाणिपादं न चोपस्थपायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ २ ॥
मैं अर्थात् आत्मतत्त्व मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त नहीं है; कान और जिह्वा भी नहीं, नासिका और नेत्र नहीं है; आकाश और पृथ्वी नहीं, तेज नहीं है, वायु नहीं है । मैं अर्थात् आत्मतत्त्व चिदानन्दरूप है शिव है, शिव है ॥ १ ॥
मैं अर्थात् आत्मतत्त्व प्राणवर्ग नहीं है, पञ्चवायु नहीं है, सप्तधातु नहीं है, पाँच कोश नहीं है, वाणी, हाथ, पैर नहीं है, जननेन्द्रिय और गुदा नहीं है । मैं अर्थात् आत्मतत्त्व चिदानन्दरूप है शिव है, शिव है ॥ २ ॥
इसलिये सब दर्शनकारोंका सिद्धान्त जड - चेतन द्वैतवाद है । जड - तत्त्व ( अनात्मसत्ता ) को चेतन - तत्त्व ( आत्मसत्ता ) से भिन्न करनेके उद्देश्यसे जड - तत्त्व के अवान्तरभेद करण, माप और वर्णनशैलीमें भेद होनेके कारण बाह्यदृष्टि रखनेवालोंको इनमें परस्पर भेद होनेका भ्रम होता है । दार्शनिक दृष्टिकोणसे जानना अपनेसे भिन्न वस्तु जड - तत्त्व ( अनात्मसत्ता ) का ही हो सकता है । अपनेको अर्थात् चेतन - तत्त्व ( परमात्मसत्ता ) अर्थात् परब्रह्मको जाननेका शब्द प्रयोग करना अयुक्त है यथा ' विज्ञातारमरे केन विजानीयात् ' सबके जाननेवाले विज्ञाताको किससे जाना जा सकता है । अर्थात् किसीसे भी नहीं जाना जा सकता है । ' येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् ॥ ( बृ ० २।४ ) जिससे यह सब जाना जाता है, उसको किससे जानें? सम्प्रज्ञात -समाधिकी सारी भूमियाँ वितर्क, विचार, आनन्द, अस्मिता और विवेकख्यातिमें त्रिगुणात्मक प्रकृतिके ही सारे कार्योंको साक्षात् करते हुए इनसे आसक्ति हटाकर विरक्त होना होता है । असम्प्रज्ञात -समाधिमें कुछ जानना शेष न रहनेपर केवल शुद्ध चैतन्यस्वरूप ( परमात्म = परब्रह्म ) में स्वरूप - अवस्थिति होती है । इसी प्रकार जहाँ - जहाँ परमात्मा अथवा परब्रह्मके जाननेका वर्णन आया है जैसे ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः । ' वहाँ अनात्म ज्ञेय पदार्थोंको ( चाहे उन्हें प्रकृति कहो, चाहे माया, चाहे अविद्या और चाहे भ्रम ) जानकर " नेति नेति ” द्वारा पृथक् करते हुए अन्तमें सारे ज्ञेय पदार्थोंकी समाप्तिपर शेष जाननेयोग्य न कुछ रहनेपर शुद्ध परमात्मस्वरूपमें ही अवस्थिति होती है । यथा—
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥
( कठ ० २ । ३ । १० ) जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मनके साथ रुक जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टारहित हो जाती है, उसको परमगति अर्थात् परमात्मस्वरूपमें अवस्थिति कहते हैं । इसलिये इन तत्त्ववेत्ता प्राचीन दर्शनकारोंका ऋतम्भरा - प्रज्ञाद्वारा साक्षात्कार परप्रत्यक्ष है, जो शब्द और अनुमानका बीज है अर्थात् जिसके आश्रय शब्द और अनुमान होते हैं । ( ३३ )
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दूसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ उत्तरमीमांसा ****** ' श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषयाविशेषार्थत्वात् । ' ( यो ० द ० १।४ ९ ) शब्द और अनुमानकी प्रज्ञासे ऋतम्भराप्रज्ञाका विषय अलग है, विशेषरूपसे अर्थका साक्षात्कार करानेसे । केवल शब्द और अनुमानका आश्रय लेनेवाले आचार्यों और उनके आधारपर पाश्चात्त्य विद्वानोंने उनके वास्तविक सारको न समझकर इन प्राचीन दर्शनकारोंके कहीं अनीश्वरवादी और कहीं बहु ईश्वरवादी होनेका धोखा खाया है अब उत्तरमीमांसाके जिन सूत्रोंमें अन्य दर्शनोंके खण्डन होनेका भ्रम हुआ है, उनका स्पष्टीकरण किया जाता है । ' ईक्षतेर्नाशब्दम् । ' ( ब्रह्म ० १।१।५ ) ( ईक्षतेः ) ईक्षणसे ( अशब्दम् ) शब्द - प्रमाणरहित ( न ) नहीं है । अर्थात् ब्रह्मको जगत्की उत्पत्ति आदिमें निमित्त- -कारण मानना शब्दप्रमाणरहित नहीं है; क्योंकि उसमें यह शब्द प्रमाण है । ' तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति । ' उसने ईक्षण किया, मैं बहुत होऊँ, प्रजावाला होऊँ । वि ॰ व ॰ — कई साम्प्रदायिक भाष्यकारोंने ' अशब्दम् ' के अर्थ प्रमाणरहित प्रकृति लगाकर सांख्यदर्शनका खण्डन किया है, जो सर्वथा अनुचित और अन्यायपूर्ण है; क्योंकि सांख्यकी त्रिगुणात्मक प्रकृति अनेक श्रुतियों और स्मृतियोंसे प्रमाणित है । यथा— ' मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । ' ( श्वेता ० ४। १० ) ' प्रकृतिको माया जानो और महेश्वरको मायावाला । ' ' अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । ' ( श्वेता ० ४।५ ) ' एक अजा ( अनादि प्रकृति ) है जो लाल, श्वेत और काली ( रजस्, सत्त्व और तमस् — इन तीन गुणोंवाली ) है । वह अपने समान रूपवाली ( तीन गुणोंवाली ) बहुत - सी प्रजाओंको उत्पन्न कर रही है । ' ' महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः । ' ( कठ ० १ । ३ । ११ ) ' महत्तत्त्वसे परे अव्यक्त ( मूलप्रकृति ) और अव्यक्तसे परे पुरुष ( ब्रह्म ) है । निम्न वेद - मन्त्रों में कितनी उत्तम रीतिसे प्रकृतिका वर्णन किया गया है—
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥
( श्वेता ॰ ४। ६-७, अ ॰ का ९ सूक्त ९ मन्त्र २० ) ( पुरुष और पुरुषविशेष अर्थात् जीव और ईश्वररूप ) दो पक्षी जो साथ रहनेवाले और मित्र हैं, वे दोनों एक ही त्रिगुणात्मक प्रकृतिरूप वृक्षको आलिङ्गन किये हुए हैं । उन दोनोंसे एक जीवरूपी पक्षी ( जन्म, आयु और भोगरूपी सुख - दुःख ) स्वादवाले फलको खाता है और दूसरा ईश्वररूपी पक्षी फल न खाता हुआ केवल साक्षीरूपसे रहता है । उसी प्रकृतिरूप वृक्षपर जीवरूपी पक्षी आसक्त असमर्थतासे धोखा खाता हुआ शोक करता है ( किंतु ) जब योगयुक्त होकर अपने होकर दूसरे ( ३४ )
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GNE महिषासुर मर्दिनी गीताप्रेस, गोरखपुर जगताच प्रयत महिषासुर मर्दिनी गीताप्रेस, गोरखपुर
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दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा * साथी ईश और उसकी महिमाको देखता है, तब शोकसे पार हो जाता है । ' इस प्रकृतिरूप वृक्षकी जड़ ऊपरकी ओर है और शाखाएँ नीचेकी ओर । पृथ्वीमें छिपी हुई उसकी जड़ अव्यक्त मूल प्रकृति गुणोंकी साम्यावस्था है जो अलिङ्ग कहलाती है और प्रत्यक्ष न होनेके कारण केवल आगम और अनुमानगम्य है । जिसके सम्बन्धमें कहा गया है—
गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति ।
यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायैव सुतुच्छकम् ॥
( वार्षगण्याचार्य षष्टितन्त्र ) अर्थ — गुणोंका असली रूप अर्थात् साम्य परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होता । जो ( विषम परिणाम ) दृष्टिगोचर होता है वह माया- - जैसा है और अविनाशी है I । दिखलायी देनेवाला वृक्षका आधार तना गुणोंका प्रथम विषम परिणाम व्यक्त महत्तत्त्व लिङ्गमात्र है जो सत्त्व - ही - सत्त्व है । उसमें क्रिया मात्र रज और उस क्रियाको रोकने मात्र तम है, जो कारण जगत्, देवयानवाला आदित्यलोक और ओ ३ म्के तीसरे पाद साधारण मनुष्योंके लिये सुषुप्ति - अवस्थावाली और योगियोंके लिये अस्मिता अनुगत सम्प्रज्ञात समाधि और विवेक - ख्यातिकी अवस्थावाली तीसरी मात्रा मकार है । जो आनन्दमय कोश कहलाता है । यही महत्तत्त्व सत्त्वकी विशुद्धताको लिये हुए विशुद्ध सत्त्वमय चित्त, समष्टि चित्त और ईश्वरका चित्त कहलाता है । जिसमें ईश्वरका जीवोंके प्रति कल्याण करनेका नित्य संकल्प, वेदोंका ज्ञान, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता और सारी शक्तियाँ निरतिशयताको प्राप्त किये हुए विद्यमान हैं । और सत्त्वकी विशुद्धताको छोड़े हुए, सत्त्व चित्त = जीवोंका चित्त = कारण शरीर कहलाता है, जो संख्यामें अनन्त हैं और सत्त्वचित्तकी अपेक्षा परिच्छिन्न, अल्पज्ञ और अल्पशक्तिवाले हैं । और इनमें जो लेशमात्र तम है उसमें अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशादि क्लेशोंकी जन्मभूमि अविद्या वर्तमान है । यह तम विवेक ख्यातिकी अवस्थामें अविद्या क्लेशोंके दबनेपर उस वृत्तिको रोकने मात्रका कार्य करता है । चेतनतत्त्व - पुरुषका शुद्ध स्वरूप, शुद्ध आत्मतत्त्व = परब्रह्म = शुद्धब्रह्म = परमात्मा जिसकी सन्निधिसे यह विषम परिणाम हो रहा है, उसीके ज्ञानका प्रकाश महत्तत्त्वके दोनों समष्टि और व्यष्टिरूपोंमें पड़ रहा है । महत्तत्त्वके ज्ञान - स्वरूप चेतनतत्त्वसे प्रकाशित होनेको गीतामें अतिसुन्दर शब्दोंमें वर्णन किया गया है— मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । कौन्तेय हेतुनानेन जगद्विपरिवर्तते ॥ ( ९ ।१० )
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
( १४ । ३ )
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
F ( १४ । ४ ) ( ३५ )
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* पातञ्जलयोगप्रदीप दूसरा प्रकरण ] [ उत्तरमीमांसा * ********** अर्थ — हे अर्जुन! मेरा आश्रय करके प्रकृति चराचरसहित सब जगत्को रचती है इसी कारण जगत् परिवर्त्तित हो रहा है । हे अर्जुन! मेरी योनि ( गर्भ रखनेका स्थान ) महत्तत्त्व है । उसीमें मैं गर्भ रखता हूँ ( अपने ज्ञानका प्रकाश डालता हूँ ) और उसी ( जडचेतनके ) संयोगसे सब भूतोंकी उत्पत्ति होती है और है । हे अर्जुन! सब योनियोंमें जो शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी योनि महत्तत्त्व उनमें बीजको , डालनेवाला मैं ( चेतन - तत्त्व ) पिता हूँ । चेतनतत्त्वसे प्रकाशित अथवा प्रतिबिम्बित समष्टिचित्त, समष्टि अस्मिता और व्यष्टिचित्त, व्यष्टि अस्मिता कहलाते हैं । समष्टिचित्तके सम्बन्धसे चेतनतत्त्व ईश्वर - पुरुष विशेष - शबलब्रह्म - साकार ब्रह्म और = व्यष्टिचित्तके सम्बन्धसे जीव कहलाता है । ईश्वर उपास्य और जीव यहाँपर प्राज्ञरूपसे उपासक है ( देखो पातञ्जलयोगप्रदीप समाधिपाद सूत्र २८ का विशेष विचार ) । यहाँ यह बात भी ध्यानमें रखनेकी है कि पुरुष शब्द तीन अर्थोंमें प्रयुक्त होता है । पहिला चेतनतत्त्वका शुद्ध स्वरूप अर्थात् परब्रह्म - शुद्धब्रह्म = परमात्मा । दूसरा समष्टि जगत् के सम्बन्धसे चेतनतत्त्वका शबल स्वरूप अर्थात् ईश्वर = अपरब्रह्म = शबलब्रह्म । और तीसरा व्यष्टि शरीरोंके सम्बन्धसे चेतन - तत्त्वका शबल स्वरूप अर्थात् जीवात्मा । इस वृक्षके तनेमें गुणोंका दूसरा विषम परिणाम अविशेषरूप अहंकार है जो विज्ञानमय कोश कहलाता है और योगियोंके लिये आनन्द अनुगत सम्प्रज्ञात समाधिका स्थान है अहंकारसे उत्पन्न हुई शाखाएँ गुणोंका तीसरा विषम परिणाम ( पाँच तन्मात्राएँ ) पाँच सूक्ष्मभूत और मनसहित शक्तिरूप पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । ये प्राणमय कोश और मनोमय कोश हैं । तथा दूसरे विषम परिणाम अहंकार अर्थात् विज्ञानमय कोशको साथ लेकर व्यष्टिरूपसे जीवोंके सूक्ष्म शरीर तथा समष्टिरूपसे सूक्ष्म जगत् - द्यौः लोक = ब्रह्मलोक और पितृयाणवाला चन्द्रलोक = सोमलोक कहलाता है । स्थूलभूतोंसे लेकर तन्मात्राओंतक सूक्ष्मताका जो तारतम्य चला गया है इसीको लेकर इसको पाँच सूक्ष्म लोकों स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् में विभक्त करके दिखलाया गया है तथा उपनिषदोंमें गन्धर्वलोक, देवलोक, पितरलोक, अजानजदेवलोक, इन्द्रलोक, बृहस्पतिलोक, प्रजापतिलोक और ब्रह्मलोक आदि कई भागोंमें विभक्त करके दिखलाया है । जो वास्तवमें सूक्ष्मताकी अवस्थाएँ हैं और जिनका अनुभव योगियोंका विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधिमें होता है । इन सूक्ष्म शरीरोंके सम्बन्धसे जीवकी संज्ञा तैजस, उपासक और समष्टिरूपमें इन सूक्ष्म लोकोंके सम्बन्धसे ईश्वरकी संज्ञा हिरण्यगर्भ उपास्य है । यह ओ ३ म्के दूसरे पादकी उकार मात्रा है जो साधारण मनुष्योंके लिये स्वप्न और योगियोंके लिये सम्प्रज्ञात समाधिकी अवस्था है । अन्तकी पतली शाखाएँ पत्तोंसहित गुणोंका चौथा विषम परिणाम १६ विकृतियाँ अर्थात् पाँच स्थूलभूत और ग्यारह इन्द्रियोंके स्थूलरूप अर्थात् समष्टिरूपमें इसकी शाखाएँ स्थूल जगत् – नक्षत्रलोक, भूलोक और भुवःलोक और व्यष्टिरूपमें इसके पत्ते जीवोंके स्थूल शरीर हैं जिनको अन्नमय कोश कहते हैं । यह ओ ३ म्के पहले पाद जाग्रत् अवस्थावाली अकार मात्रा है ( देखो पातञ्जलयोगप्रदीप समाधिपाद सूत्र २८ का विशेष विचार ) स्थूल जगत्के सम्बन्धसे ईश्वरकी संज्ञा उपास्य विराट् उपासक विश्व है । यहाँ यह ध्यानमें रखनेकी बात है कि भूः और भुवः दोनों और जीवकी संज्ञा स्थूल जगत् अर्थात् ( ३६ )
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दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा * नक्षत्रलोकमें हैं । हमको अपनी पृथ्वीका विशेषरूपसे वर्णन करना होता है इसलिये इसको नामसे पुकारते हैं । दूसरे नक्षत्रवाले हमारी पृथ्वीको भुवः में शामिल करके अपने लोकको भूः अलग भूः व्यष्टिरूपसे स्थूल शरीरके अंदर सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म शरीरके अंदर कारण शरीर कहेंगे । और समष्टिरूपमें स्थूल जगत्के अंदर सूक्ष्म जगत् और सूक्ष्म जगत्के अन्दर कारण व्यापक जगत् हो रहा है. व्यापक हो रहा है । इस वृक्षका फल जन्म, आयु और भोग है । उसका स्वाद सुख और दुःख है, जिसको जीवरूपी पक्षी चखता रहता है जीवरूपी पक्षीकी असमर्थतासे धोखा खाना क्रमशः अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, क्लेश, उनसे पाप - पुण्यरूपी सकाम कर्म, सकामकर्मसे कर्माशय, कर्माशयसे जन्म, आयु और भोगके लिये स्थूल शरीररूपी अनन्त, अस्थिर पत्तोंमें घूमना है । योगयुक्त होकर जीवरूपी पक्षीका ईश्वररूपी पक्षी और उसकी महिमाको देखना योगके अङ्गोंका अनुष्ठान तथा ईश्वरप्रणिधान है, जिसका वर्णन योगदर्शन साधनपाद सूत्र १ व ३२ में तथा समाधिपादके सूत्र २३ से २८ तक किया गया है । ' आत्मा ज्ञातव्यः प्रकृतितः विवेक्तव्यः न पुनः आवर्तते ' ‘ आत्माको जानना चाहिये, प्रकृतिसे भिन्न उसका विवेक करना चाहिये, वह पुनः नहीं लौटता है । ' ' प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । ' ( गीता ३ । २७ ) ' सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये हुए हैं । ' ' मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । ' ( गीता ९ । १० ) ' हे कौन्तेय! मेरी ( ईश्वरकी ) अध्यक्षताके रहते हुए प्रकृति चराचर जगत्को उत्पन्न करती है । '
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥
( गीता १३ । २ ९ ) ' जो पुरुष समस्त कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिसे ही किये हुए देखता है तथा आत्माको अकर्ता देखता है, वही तत्त्वज्ञानी है । '
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
( गीता १४ । ५ ) ' हे महाबाहो! सत्त्व, रज और तम – ये प्रकृतिसे उत्पन्न हुए तीनों गुण अविनाशी आत्माको ( अविवेकसे ) शरीरमें बाँधते हैं । ' प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ ( गीता १३ । १ ९ ) ' प्रकृति और पुरुष — इन दोनोंको ही तू अनादि जान और विकारोंको तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थोंको भी प्रकृतिसे उत्पन्न हुए जान । ' जब स्वयं व्यासजी महाराज अपने स्वरचित गीतामें इस प्रकार प्रकृतिका स्पष्टरूपसे वर्णन कर रहे हैं तो इन्हींके सूत्रोंमें ‘ अशब्दम् ' के अर्थ ' प्रमाणरहित ' प्रकृति निकालना कितना घोर पक्षपात और ( ३७ )
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दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा अत्याचार है । यह पाठक स्वयं समझ सकते हैं । श्रुति और स्मृतिद्वारा तो सांख्य और योग ही प्राचीन वेदान्त और ब्रह्मप्राप्तिका साधन सिद्ध होता है । यथा— सर्वपाशैः ॥ ' ज्ञात्वा देवं मुच्यते सांख्ययोगाधिगम्यं ' तत्कारणं ( श्वेता ॰ ६ । १३ ) ‘ उस देवको — जो जगत्की उत्पत्ति आदिका निमित्त कारण है और जो सांख्ययोगद्वारा ही जाना जा सकता है- है । ' - जानकर मनुष्य सारे फाँसोंसे छूट जाता
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥
( गीता ३ । ३ ) ' हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्य - लोकमें मैंने पुरातन कालमें ( कपिल मुनि और हिरण्यगर्भरूपसे ) दो निष्ठाएँ बतलायी हैं । ( कपिलमुनिद्वारा बतलायी हुई ) सांख्ययोगकी निष्ठा ज्ञानयोगसे होती है और ( हिरण्यगर्भरूपसे बतलायी हुई ) योगियोंकी निष्ठा निष्काम कर्मयोगसे । '
सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥
( म ० भा ० ) ' सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल हैं और योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं । इनसे पुरातन इनका वक्ता और कोई नहीं है । '
ज्ञानं महद् यद्धि महत्सु राजन् वेदेषु सांख्येषु तथैव योगे ।
यच्चापि दृष्टं विविधं पुराणे सांख्यागतं तन्निखिलं नरेन्द्र ॥
( महाभारत, शान्तिपर्व ) ' हे नरेन्द्र! जो महत् ज्ञान महान् व्यक्तियोंमें वेदोंके भीतर तथा योगशास्त्रोंमें देखा जाता है और पुराणमें भी विविध रूपोंमें पाया जाता है, वह सभी सांख्यसे आया है । ' इस प्रकार श्रीव्यासजी महाराजने स्वरचित गीता और महाभारतमें कपिल ऋषिके सांख्यकी महिमा बतलायी है । न केवल कपिल मुनिका सांख्य और उसकी प्रकृति ही श्रुतियों और स्मृतियोंसे प्रमाणित है, किन्तु कपिल मुनिको ऋषियोंमें सर्वोच्च और श्रेष्ठ स्थान दिया गया है । यथा— ' ऋषिप्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति । ' ( श्वेता ० ) ' जो पहिले उत्पन्न हुए कपिल मुनिको ज्ञानसे भर देता है । ' " सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ ' ( गीता १० | २६ ) ‘ सिद्धोंमें मैं कपिल मुनि हूँ । ' श्रीगौड़पादाचार्यजीने भी सांख्यके २५ तत्त्वोंके ज्ञानद्वारा मुक्तिका होना बतलाया है । यथा— ( ३८ )