पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 41–50

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 41 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * [ उत्तरमीमांसा आचार्यका नाम ( ब्रह्म ॰ सू ० ३ । ४ । ४४ में ) और जैमिनिदर्शनमें ( ४ । ३ । १८, ६ । १ । २६ ) दो बार आया है । आचार्य आश्मरथ्यका नाम ( ब्रह्म ० सू ० १।२।२ ९, १।४ । २० ) और जैमिनिसूत्र ( ३।५,१६ ) में आया है । आचार्य कार्ष्णजिनिका नाम ( ब्रह्म ० सू ० ३ । १ । ९ ) और मीमांसासूत्र ( ४ । ३ । १७, ६ । ७ । ३५ ) में आया है । इससे सिद्ध होता है कि जैमिनिसूत्र और बादरायणसूत्रोंसे पूर्व दोनों पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसापर बहुत - से प्राचीन आचार्योंके सूत्र विद्यमान थे और परस्पर विचारोंमें मतभेद भी था; क्योंकि ऐसे गूढ़ विषयोंमें विचारोंकी भिन्नताका होना स्वाभाविक ही है । किंतु उन सूत्रोंके ` भाष्यकारं नवीन साम्प्रदायिक आचार्योंकी कटाक्ष ( Controversy ) की शैलीके विरुद्ध वे अपने विचारोंसे भिन्नता रखनेवाले आचार्योंके मतको आदर और सम्मानसे दिखलाते थे । वेदान्तपर भाष्यकार आचार्योंके नवीन सम्प्रदाय प्राचीन समयमें उपनिषद् वेदान्त कहलाते थे, किंतु वे भिन्न - भिन्न समयमें भिन्न - भिन्न ऋषियोंद्वारा प्रचार किये गये तथा बनाये गये थे । इसलिये उनकी विचार- भिन्नताको जिसका हो जाना स्वाभाविक था, जब बादरायण आचार्यने अपने ब्रह्मसूत्रोंमें सब उपनिषदोंकी विचारैकता सिद्ध कर दी, तब यह ब्रह्मसूत्र भी उपनिषदोंके समान ही प्रामाणिक माना जाने लगा । इन्हीं बादरायण आचार्यद्वारा व्यास नामसे भगवद्गीतामें सारे उपनिषदोंका सार अति निपुणतासे समझाया गया है । इसलिये अन्तमें उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता ये तीनों प्रस्थानत्रयी नामसे वेदान्तके मुख्य प्रामाणिक ग्रन्थ माने जाने लगे । बौद्ध धर्मके पतनके पश्चात् प्रत्येक नवीन सम्प्रदायके प्रवर्तक आचार्यको वेदान्तके प्रस्थानत्रयीके इन तीनों भागोंपर अपने सम्प्रदायके सिद्धान्तके आधारपर भाष्य लिखकर यह सिद्ध करनेकी आवश्यकता हुई कि उसका सम्प्रदाय वेदान्तके अनुसार है और अन्य सम्प्रदाय इसके विरुद्ध हैं । साम्प्रदायिक दृष्टिसे प्रस्थानत्रयीपर भाष्य लिखनेकी रीति चल पड़नेपर भिन्न - भिन्न पण्डित अपने - अपने सम्प्रदायोंके भाष्योंके आधारपर टीकाएँ लिखने लगे । इसके परिणामस्वरूप नवीन वेदान्तके पाँच सम्प्रदाय अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैतके सिद्धान्तोंके आधारपर लगभग पाँच * दृष्टिकोणसे ब्रह्मसूत्रोंपर भाष्य किये गये हैं । १ – ब्रह्मसूत्रपर भाष्यकार श्रीस्वामी शङ्कराचार्यका अद्वैतसिद्धान्त अद्वैत सिद्धान्त– %. आँखोंसे दिखलायी देनेवाले सारे जगत् अर्थात् सृष्टिके पदार्थोंकी अनेकता सत्य नहीं है । वास्तवमें यह सब एक ही शुद्ध चैतन्य सत्ता ( तत्त्व ) है, जो निर्गुण, निर्विशेष, शुद्ध- ज्ञान - स्वरूप है, जिसको परब्रह्म या परमात्मा कहते हैं । २. परमात्माके साथ अनादिसे एक विशेष शक्ति है जिसको माया अथवा अविद्या कहते हैं, जो न सत् है और न असत् अर्थात् अनिर्वचनीय है । ब्रह्म इस सारे अनेकविध जड़ - चेतन सृष्टिके प्रपञ्चको इसी अविद्या अथवा मायाद्वारा रचता है । जिस प्रकार मायावी मदारी अपनी * पाँचों अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोशोंका विस्तारपूर्वक वर्णन योगदर्शन समा ० पा ० सू ० १७ वि ० व ॰ में, तीनों स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीरोंका समाधिपाद सूत्र २८ के विशेष वक्तव्यमें; पुनर्जन्मका साधनपाद सूत्र १३ के विशेष वक्तव्यमें और देवयाने, पितृयान आदिका वि ० पा ० सू ० ३ ९ वि ० व ० में देखें । ( २१ )

पृष्ठ 42

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 42 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ उत्तरमीमांसा माया - शक्तिसे नाना प्रकारके जड़ - चेतन पदार्थोंको प्रकट करके दिखलाता है, जो अपनी वास्तविक सत्ता नहीं रखते हैं, केवल भ्रान्तिमात्र होते हैं । ३. इसलिये मायासम्बद्ध ब्रह्म ही इस जगत्का अभिन्न निमित्त उपादान कारण है । मायाके सम्बन्धसे ब्रह्मको ईश्वर कहते हैं और अविद्याके सम्बन्धसे जीव ४ जीव अविद्याके कारण अपने ब्रह्मस्वरूप अर्थात् शुद्ध ज्ञानस्वरूपको भूलकर बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियों और शरीर आदिको उपाधियोंको अपना वास्तविक स्वरूप समझकर उनकी अवस्थाओंको अपनी अवस्था मान S लेता है । इस अध्यासके कारण अल्पज्ञता, अल्पशक्तिमत्ता और परिच्छिन्नताकी सीमामें आकर कर्ता और भोक्ता बन जाता है और सकाम कर्मोंद्वारा पुण्य और पापका संचय करता हुआ आवागमनके चक्रमें फँसकर उनके फलोंको भोगता है । ५. आत्मा और परमात्मा अथवा जीव और ब्रह्मकी एकताके अनुभवसिद्ध पूर्ण ज्ञानसे अविद्याका नाश हो जानेपर शरीर, इन्द्रियों, मन, अहंकार और बुद्धि आदि उपाधियोंमेंसे आत्मभाव मिट जाता है, जिसके उपरान्त कर्ता - भोक्ताका अभिमान निवृत्त हो जानेपर कर्म, उनके फलों और आवागमनसे मुक्ति पाकर परिच्छिन्नता और अल्पज्ञताकी सीमाको तोड़कर अपने अनन्त. शुद्ध ज्ञानस्वरूपमें अवस्थित हो जाता है । यह अद्वैत सिद्धान्त कहलाता है । इसको निर्विशेषाद्वैत तथा विवर्त्तवाद भी कहते हैं । इस सम्प्रदायके आचार्य श्रीस्वामी शङ्कराचार्य हुए हैं, जिनके सम्बन्धमें कई इतिहासलेखकोंद्वारा यह निश्चित किया गया है कि इन्होंने विक्रमी संवत् ८४५ तदनुसार ७८८ ई ॰ सन्में जन्म ग्रहण किया था और ३२ वें वर्षमें वि ० सं ० ८७८, ई ० सन् ८२० में शरीर त्याग किया था; किंतु श्रीस्वामी दयानन्दजी महाराजने स्वामी शङ्कराचार्यका समय आजसे २२०० वर्ष पूर्व माना है 1 श्रीस्वामी शङ्कराचार्यजी अपने समयके अद्वितीय विद्वान् थे । इनका ब्रह्मसूत्रपर भाष्य शारीरकभाष्य कहलाता है । ब्रह्मसूत्रोंके संस्कृतमें जितने भाष्य हुए हैं, उनमें सबसे अधिक प्रचलित और प्रसिद्ध श्रीस्वामी शङ्कराचार्यका है और शङ्करप्रतिपादित मत ही सामान्यरूपसे वेदान्त समझा जाने लगा है । किंतु बहुत - से विद्वानोंका विचार है कि स्वामी शङ्कराचार्यजीने अपनी अलौकिक बुद्धि और विद्याको बादरायणसूत्रोंके आशयको स्पष्ट करनेकी अपेक्षा अपने प्रवर्तित सम्प्रदायके मण्डन और अपनेसे विभिन्नता रखनेवाले मतोंके खण्डनमें अधिक प्रयोग किया है । डाक्टर घाटेने ‘ वेदान्त ' नामक अंग्रेजी पुस्तकमें शङ्कर, रामानुज, निम्बार्क, मध्व तथा वल्लभके व्याख्यानोंका तारतम्य अनुशीलनकर मूल सूत्रोंके प्रतिपाद्य सिद्धान्तोंको खोज निकालनेका यत्न किया है । उनकी सम्मतिमें शङ्कराचार्यके अनेक सिद्धान्तोंकी पुष्टि सूत्रोंसे नहीं की जा सकती । कार्य - कारणके सम्बन्धमें सूत्रकार ‘ परिणामवाद ' के पक्षपाती प्रतीत होते हैं न कि ' विवर्तवाद’के । ' आत्मकृतेः परिणामात् ' ( ब्र ॰ सू ० १।४ । २६ ) में सूत्रकारने परिणाम शब्दका स्पष्ट निर्देश किया है । प्रसिद्ध पाश्चात्त्य पण्डित थीबोंने शङ्कराचार्यकृत भाष्यके स्वरचित अनुवादकी भूमिकामें शङ्कराचार्यकी व्याख्याके सम्बन्धमें लिखा है कि ' बादरायणका दार्शनिक सिद्धान्त शङ्कराचार्यके सिद्धान्तसे सर्वथा भिन्न था, किंतु शङ्कराचार्यने अपने शुष्क निर्विशेष अद्वैत सिद्धान्तका प्रचार करनेके लिये बादरायणके ऊपर अपने मतका आरोप किया है, इसलिये ब्रह्मसूत्रके शाङ्करभाष्यको पढ़नेसे सूत्रकारका वास्तविक सिद्धान्त ( २२ )

पृष्ठ 43

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 43 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * ** [ उत्तरमीमांसा नहीं मालूम हो सकता । ' इनकी समालोचनाके अनुसार ही पूर्ववर्ती बहुत - से समालोचकोंने स्वामी शङ्कराचार्यके विषयमें ऐसा ही मत प्रकट किया है । प्राचीन कालके रामानुजाचार्यने भी ब्रह्मसूत्रके व्याख्यानके प्रसङ्गमें स्वामी शङ्कराचार्यके व्याख्यानके ऊपर विभिन्न स्थलोंपर दोष दिखलाये हैं । रामानुजाचार्यके पूर्ववर्ती आचार्य भास्करने अपने भाष्यके आरम्भमें लिखा है कि ' शङ्कराचार्यने सूत्रकारके अभिप्रायको गुप्त करके अपना सिद्धान्त ब्रह्मसूत्रके भाष्यके बहाने प्रकट किया है । ' सम्भव है उपर्युक्त समालोचनाओंमें अत्युक्तिसे काम लिया गया हो; क्योंकि ब्रह्मसूत्रके भाष्यकारोंमें · अपने सम्प्रदायसे भिन्न विचारवालोंके प्रति प्रायः ऐसी ही शैली चल निकली है । किंतु बादरायणके मूल.. सूत्रोंपर साम्प्रदायिक पक्षपातसे रहित होकर स्वतन्त्र विचारसे दृष्टि डालनेसे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि अन्य सब दर्शनकारों ( न्याय, वैशेषिक, विशेषकर सांख्य और योग ) के सदृश उनमें भी सांख्य और योगके द्वैतसिद्धान्तका ही प्रतिपादन किया गया है जो स्वामी शङ्कराचार्यकी अद्भुत विद्वत्ताद्वारा निर्विशेष अद्वैत सिद्धान्तके रूपमें दिखलाया गया है I ब्रह्मसूत्रमें वैदिक दर्शनोंका खण्डन नहीं प्रत्युत श्रुतियोंके साथ उनका समन्वय है और बादरायणसे लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात् भगवान् बुद्धका जन्म हुआ है; जिनके सम्प्रदायोंका ब्रह्मसूत्रके शाङ्करभाष्यमें खण्डन किया गया है । वास्तवमें यह बात प्रतीत होती है कि स्वामी शङ्कराचार्यके समयमें सारे भारतवर्षमें नास्तिकता फैल रही थी और अवैदिक मतमतान्तरोंका सब ओर प्रचार था । तान्त्रिक सम्प्रदाय, पाशुपत और पाञ्चरात्र तथा शाक्तमतवालोंकी नास्तिकता बढ़ रही थी । बौद्ध धर्म जो एक प्रकारसे सांख्य और योगका ही रूपान्तर है, जिसके निवृत्तिमार्गमें भगवान् बुद्धने अन्वय - व्यतिरेक करते हुए समाधिद्वारा नेति - नेतिरूप ( सर्ववृत्तिनिरोध रूप ) स्वरूप- अवस्थिति प्राप्त करना सिखलाया था । सौत्रान्तिक, वैभाषिक, योगाचार, माध्यमिक आदि सम्प्रदायोंमें विभक्त होकर अपने उच्च आत्म और चैतन्यवादसे विच्युत होकर जडवादकी ओर झुक रहा था और बहुत सम्भव है कि इस जडवादके प्रभावमें उस समयके कोई - कोई दार्शनिक विद्वान् भी वैदिक दर्शनोंसे अनीश्वरवादको सिद्ध करनेमें प्रवृत्त हो रहे हों । इसलिये इस सारे अवैदिक और नास्तिक वातावरणको वैदिक धर्ममें परिवर्तित करनेके लिये स्वामी शङ्कराचार्यको पाशुपत, पाञ्चरात्र और शाक्त सम्प्रदायोंके साथ - साथ वैदिक दर्शनोंके भी खण्डनकी आवश्यकता हुई हो और जडवादके स्थानमें अद्वैत चैतन्यवाद स्थापन करना आवश्यक समझा हो । यहाँ वैदिक दर्शनों विशेषकर सांख्य और योगके द्वैत - सिद्धान्तको संक्षेपसे बतलाकर उसकी शङ्करके अद्वैतसिद्धान्तसे सामान्यरूपसे तुलना दिखला देना पाठकोंकी जानकारीके लिये उचित प्रतीत होता है— सांख्ययोगका द्वैत - सिद्धान्त - चेतन और जड दो अनादि तत्त्व हैं । चेतन - तत्त्व ( पुरुष ) अपरिणामी, निष्क्रिय, निर्विकार, ज्ञानस्वरूप, कूटस्थ, नित्य है । जड - तत्त्व ( मूलप्रकृति ) त्रिगुणात्मक, सक्रिय और परिणामी नित्य है । चेतन तत्त्वकी संनिधिसे जड - तत्त्वमें एक प्रकारका ज्ञान नियम और व्यवस्थापूर्वक विरूप अर्थात् विषम परिणाम हो रहा है । सत्त्वमें क्रियामात्र रज और उस क्रियाको रोकनेमात्र तमका सबसे पहला विषम परिणाम महत्तत्त्व कहलाता है । यही महत्तत्त्व सत्त्वकी विशुद्धतासे अपने समष्टिरूपमें विशुद्ध सत्त्वमय चित्त कहलाता है, जिसमें समष्टि अहंकार बीजरूपसे रहता है । यह ईश्वरका चित्त ( २३ )

पृष्ठ 44

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 44 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ उत्तरमीमांसा है और अपने व्यष्टिरूपमें सत्त्वकी विशुद्धताको छोड़े हुए सत्त्वचित्त कहलाते हैं, जो संख्यामें अनन्त हैं, जिनमें व्यष्टि अहंकार बीजरूपसे रहते हैं । ये जीवोंके चित्त हैं । चेतन तत्त्वमें अपने ज्ञानके प्रकाश डालनेकी और महत्तत्त्वमें उसको ग्रहण करनेकी योग्यता अनादि चली आ रही है । पुरुषसे प्रकाशित अथवा प्रतिबिम्बित समष्टि चित्त समष्टि अस्मिता और व्यष्टि चित्त व्यष्टि अस्मिता कहलाते हैं । पुरुष निष्क्रिय होता हुआ भी अपने चित्तका द्रष्टा है अर्थात् चित्तमें उसके ज्ञानके प्रकाशमें जो कुछ भी हो रहा है वह उसे स्वयं ज्ञात रहता है । व्यष्टि चित्तके सम्बन्धसे चेतन - तत्त्वका नाम जीव है, जो संख्यामें अनन्त और अल्पज्ञ हैं और समष्टि चित्तके सम्बन्धसे चेतन तत्त्वका नाम ईश्वर, अपर ब्रह्म, सगुण ब्रह्म और शबल ब्रह्म है, जो एक और सर्वज्ञ है । अपने शुद्ध स्वरूपसे चेतन तत्त्वका नाम परमात्मा, निर्गुण ब्रह्म, शुद्ध ब्रह्म और परब्रह्म है । पुरुष शब्दका प्रयोग जीव, ईश्वर और परमात्मा तीनों अर्थोंमें होता है । दूसरा विषम परिणाम अहंकार है अर्थात् पुरुषसे प्रकाशित अथवा प्रतिबिम्बित महत्तत्त्व ही रज और तमकी अधिकतासे विकृत होकर अहंकाररूपसे व्यक्तभावमें बहिर्मुख हो रहा है । यह अहंकार ही अहंभावसे एकत्व, बहुत्व, व्यष्टि और समष्टिरूप सब प्रकारकी भिन्नताका उत्पन्न करनेवाला है । विभाजक अहंकारसे ग्रहण और ग्राह्यरूप दो प्रकारके विषम परिणाम हो रहे हैं । अर्थात् विभाजक अहंकार सत्त्वमें रज और तमकी अधिकतासे विकृत होकर ग्रहणरूप ग्यारह इन्द्रियों ( पाँच ज्ञान- इन्द्रियाँ, पाँच कर्म - इन्द्रियाँ, ग्यारहवाँ इनका नियन्ता मन ) और सत्त्वमें रज - तमकी कुछ विशेषताके साथ अधिकतासे विकृत होकर परस्पर भेदवाली पाँच तन्मात्राओंमें विकृत होकर बहिर्मुख हो रहा है । पाँचवाँ विषम परिणाम पाँच स्थूल भूत हैं अर्थात् अहंकारसे व्याप्त पाँचों तन्मात्राएँ ही सत्त्वमें रज और तमकी अधिकतासे विकृत होकर पाँचों सूक्ष्म और स्थूल भूतोंमें व्यक्तभावसे बहिर्मुख हो रही हैं । इस प्रकार बहिर्मुखतामें महत्तत्त्वकी अपेक्षा अहंकारमें, अहंकारकी अपेक्षा ग्यारह इन्द्रियों और पाँचों तन्मात्राओंमें और तन्मात्राओंकी अपेक्षा पाँचों सूक्ष्म और स्थूल भूतोंमें क्रमशः रज तथा तमकी मात्रा बढ़ती जाती है और सत्त्वकी मात्रा कम होती जाती है । यहाँतक कि स्थूल जगत् और स्थूल शरीरमें रज - तमका ही व्यवहार चल रहा है । सत्त्व केवल प्रकाशमात्र ही है और महत्तत्त्वमें प्रकाशित अथवा प्रतिबिम्बित चेतन - तत्त्व भी उपर्युक्त राजसी - तामसी आवरणोंमें आच्छादित होता हुआ स्थूल शरीर और भौतिक जगत्में केवल झलकमात्र ही दिखलायी दे रहा है । यह सब अवरोहक्रम ( Descent ) है । इससे उलटे आरोहक्रम ( Ascent ) में जितनी अन्तर्मुखता बढ़ती जायगी उतनी ही रज तथा तमका विक्षेप - आवरण हटकर सत्त्वका प्रकाश बढ़ता जायगा और उस प्रकाशमें चेतन तत्त्वकी अधिक स्पष्टतासे प्रतीति बढ़ती जायगी । इस प्रकार अन्तमें गुणोंके सबसे प्रथम विषम परिणामरूप चित्तको भी सर्ववृत्तिनिरोधद्वारा अपने कारणमें लीन करके शुद्ध चेतन स्वरूपमें अवस्थिति प्राप्त की जा सकती है । व्यष्टि चित्तोंमें जो लेशमात्र तम है, उसमें बीजरूपसे अविद्या विद्यमान है । इस अविद्याक्लेशसे क्रमशः अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश, क्लेश और उनसे सकाम कर्म, सकाम कर्मोंसे कर्माशय, कर्माशयके अनुसार जन्म, आयु और भोग तथा उनमें सुख और उन्हींके अनुसार समाधिकी चारों भूमियों वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता अनुगतमें ये दुःख सब क्लेश उत्पन्न तनु होते हैं । सम्प्रज्ञात अर्थात् शिथिल ( २४ )

पृष्ठ 45

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 45 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] • षड्दर्शनसमन्वय * * [ उत्तरमीमांसा हो जाते हैं और उसकी उच्चतम अवस्था विवेकख्यातिमें सत्त्वकी विशुद्धतासे सारे क्लेश अपनी जननी अविद्यासहित दग्ध बीजतुल्य हो जाते हैं । अब वही तम अपने अविद्यारूप धर्मको छोड़कर इस सबसे उच्चतम सात्त्विक वृत्तिको स्थिर रखने में सहायक होता है । सर्ववृत्तिनिरोधरूप असम्प्रज्ञात समाधिमें चित्तमें कोई वृत्ति न रहनेके कारण द्रष्टाकी शुद्ध परमात्मस्वरूप में अवस्थिति होती है । उस समय चित्तमें निरोधके संस्कारोंका परिणाम होता है । कैवल्यमें व्युत्थानके सारे संस्कारोंको नष्ट करनेके पश्चात् निरोधके संस्कार स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं । तब अपने धर्मी ( उपादान - कारण ) चित्तके अपने कारणमें लीन होनेके साथ दग्ध बीजरूप अविद्या -क्लेशका भी लय हो जाता है । शंकरके निर्विशेष अद्वैतसिद्धान्त और सांख्य - योगके द्वैतसिद्धान्तमें तुलना वैदिक दर्शनकारोंने जहाँ चेतन तत्त्वको निमित्त कारण और जड - तत्त्वको इस जगत्का उपादान कारण बतलाया है, वहाँ शंकरने चेतन तत्त्वको ही जगत्का अभिन्न निमित्त - उपादान कारण माना है 1 शङ्करने ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें एक स्थानपर सांख्यके इस आक्षेपको कि चेतन तत्त्वसे जड - तत्त्व कैसे उत्पन्न हो सकता है ( अर्थात् चेतन - तत्त्व जड - तत्त्वका उपादान कारण नहीं हो सकता ) इस प्रकार निवारण किया है कि जैसे तुम्हारे अव्यक्त मूल प्रकृतिसे व्यक्त महत्तत्त्व अहंकारादि उत्पन्न होते हैं, वैसे ही चेतन तत्त्वसे जड - तत्त्व उत्पन्न हो सकता है, किंतु सांख्य - योगका जड - तत्त्व मूल प्रकृति त्रिगुणात्मक है । सत्त्वमें रज और तम जितना बढ़ता जाता है उतनी ही स्थूलता और जितना रज और तम कम होता है उतनी ही सूक्ष्मता बढ़ती जाती है । स्थूलताके क्रमको व्यक्त होना और सूक्ष्मताके क्रमको अव्यक्त होना कहते हैं । इसलिये सारा सूक्ष्म और स्थूल अर्थात् अव्यक्त और व्यक्त संसार तीनों गुणोंका ही परिणाम है । किंतु एक अपरिणामी निर्विकार कूटस्थ नित्य ब्रह्ममें इन नाना प्रकारके विकारों और परिणामोंका होना कैसे सम्भव हो सकता है । इसलिये शंकरको भी जगत्के उपादान कारण त्रिगुणात्मक प्रकृतिके स्थानमें ब्रह्मके साथ एक अनादि तत्त्व माया अर्थात् अविद्याका मानना अनिवार्य हो गया, जिसके द्वारा ब्रह्म स्वयं अपरिणामी और निर्विकार रहता हुआ भी इस सारे संसारकी रचना कर सकता है । जैसा कि शांकरभाष्य उपसंहारदर्शन अधिकरणसूत्र २४ में बतलाया है— अद्वैतं तत्त्वतो ब्रह्म तच्चाविद्यासहायवत् । नानाकार्यकरं कार्यक्रमोऽविद्यास्थशक्तिभिः ॥ ( ब्र ० सू ० अ ० २ पा ० १ अधि ० ८ शांकरभाष्य ) ‘ यद्यपि परमार्थतः ब्रह्म एक ही है, तथापि वह अविद्याकी सहायतासे अनेक विचित्र कार्योंको उत्पन्न कर सकता है और अविद्याकी शक्तियोंसे कार्य - क्रमकी व्यवस्था हो सकती है । ' इस माया अर्थात् अविद्याकी अलग सत्ता माननेमें अद्वैतसिद्धान्त खण्डित होता था और असत् माननेमें इसके अन्तर्गत सारा संसार श्रुति, स्मृति और स्वयं अपना अद्वैतसिद्धान्त असत् और मिथ्या सिद्ध होता था, इसलिये इसको अनिर्वचनीय नाम दिया गया, जिसको न सत् कह सकते हैं और न असत् । इस प्रकार शंकरकी त्रिगुणात्मक माया अर्थात् अविद्या सांख्यकी त्रिगुणात्मक प्रकृति है । अनिर्वचनीय अथवा सत् और असत् ( २५ )

पृष्ठ 46

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 46 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप: * * [ उत्तरमीमांसा दोनोंसे विलक्षण कह देना केवल शब्दोंका ही रूपान्तर है । दोनों सिद्धान्तोंका इससे परे होकर अपने शुद्ध चेतन स्वरूपमें अवस्थित होना अन्तिम ध्येय है । एक और मुख्य भेद इन दोनों सिद्धान्तोंमें यह है कि जहाँ सांख्य चेतन - तत्त्वकी संनिधिसे त्रिगुणात्मक जड - तत्त्वमें स्वाभाविक ज्ञान, नियम और व्यवस्थापूर्वक क्रियाका होना इस संसारकी रचनाकाकारण बतलाता है, वहाँ शंकरको ब्रह्मकी स्वतन्त्रता, स्वेच्छाचारिता और महिमा दिखलानेके लिये यह मानना पड़ा कि ब्रह्म अपनी इच्छासे अपनी महिमा दिखलानेके लिये शोबदेवाज मदारीके सदृश अपनी अनादि माया अर्थात् अविद्यासे इस जगत्की रचना करता है । इसमें नाना प्रकारके दोष आते हैं, जिनका युक्तिद्वारा संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सकता अर्थात् – ( १ ) ब्रह्मको क्यों ऐसे जगत्के रचनेकी इच्छा होती है, जिसमें दुःख ही दुःख है और फिर स्वयं ही उससे मुक्ति पानेके लिये श्रुति - स्मृतिद्वारा उपदेश दिलवाता है । ( २ ) यदि यह कहा जाय कि जगत् और उसके अन्तर्गत सुख - दुःख सब मिथ्या और भ्रमरूप ही हैं, केवल एक ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही सत्य है तो ब्रह्मने इस भ्रमको क्यों फैलाया और निर्भ्रान्त ब्रह्ममें भ्रम कैसा? ( ३ ) अविद्यासे ब्रह्म जगत्की रचना करता है और अविद्या ब्रह्मसे अभिन्न है फिर अविद्या और जगत्से छुटकारा कैसे सम्भव हो सकता है? ( ४ ) ब्रह्मकी शक्तिरूप अविद्यासे जगत्की उत्पत्ति है, इसलिये विद्या अर्थात् ज्ञानद्वारा ही इससे मुक्ति हो सकती है; किंतु अविद्याके अन्तर्गत होनेके कारण सारे साधन श्रुति और स्मृति भी अविद्यारूप ही होंगे । विद्या और ज्ञान ब्रह्मसे बाहर कहाँसे लाया जा सकता है । ( ५ ) सर्वज्ञ ज्ञानस्वरूप ब्रह्मकी शक्ति माया अर्थात् अविद्या नहीं होनी चाहिये । प्रत्युत निर्भ्रान्त विद्या और सत्य ज्ञान होना चाहिये । ( ६ ) और यदि उसमें संसारके रचनेकी इच्छा भी हो तो वह निर्भ्रान्त विद्या और सत्य ज्ञानके साथ हो न कि माया और अविद्याके साथ । ( ७ ) मदारी पैसा कमाने अथवा अपनेसे बड़े आदमियोंको खुश करनेके प्रयोजनसे शोबदे और तमाशे दिखलाता है । आप्तकाम ब्रह्मको इस मायाजालके फैलानेमें प्रयोजन क्या है? ( ८ ) यदि अपनी महिमा और प्रभुता दिखलानेके लिये, तो यह किसको दिखलाना? जब कि एक ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई है ही नहीं । ( ९ ) यदि अपनी प्रभुता और महिमा दिखलानेके लिये जीवोंको उत्पन्न करता है तो इस प्रकारकी महिमा और प्रभुता दिखलानेकी अभिलाषा होना ही महिमा और प्रभुताके अभावको सिद्ध करता है । ( १० ) यदि बिना किसी अपने विशेष प्रयोजनके ब्रह्मद्वारा संसारकी रचना केवल जीवोंके कल्याण अर्थात् भोग और अपवर्गके लिये स्वाभाविक मानी जाय तो यह सांख्य और योगका ही सिद्धान्त आ गया । इस प्रकार जहाँ द्वैतवादी सांख्ययोग सारे दोषों, विकारों और परिणामों आदिको, त्रिगुणात्मक प्रकृतिमें डालकर ब्रह्मका अद्वैत, निर्दोष, निर्विकार, अपरिणामी, निष्काम, निष्क्रिय, कूटस्थ, नित्य शुद्ध ज्ञानस्वरूप सिद्ध करता है और उस शुद्ध ज्ञानस्वरूपमें अवस्थिति अपना अन्तिम ध्येय ठहराता है, वहाँ यह निर्विशेष अद्वैतवाद इन सारे दोषोंका ब्रह्ममें आरोप करके ब्रह्मको सदोष, विकारी सकाम और अपनी महिमा दिखलाने और प्रतिष्ठा पानेका अभिलाषी,, परिणामी, सक्रिय, भ्रमयुक्त सिद्ध करता है; किंतु यद्यपि यह निर्विशेष अद्वैत - सिद्धान्त व्यवहार प्रसवधर्मी - दशामें , अज्ञान, अविद्या और और युक्तिहीन है; तथापि यह भावना कि यह सारा द्रष्टव्य संसार मिथ्या, अविद्या और इस प्रकार दोषयुक्त भ्रमरूप है, केवल ( २६ )

पृष्ठ 47

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 47 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय #* * [ उत्तरमीमांसा एक ब्रह्म ही सत्य है, साधकोंको साधनरूपसे शुद्ध - चेतन - स्वरूपमें अवस्थिति प्राप्त करानेमें रोचक और सहायक प्रतीत होता है । इसीलिये बहुत - से महात्माओंने इस सिद्धान्तको अपनाया है और अपना रहे हैं । इसलिये सांख्ययोगके द्वैतवाद अर्थात् परिणामवाद और शंकरके निर्विशेष अद्वैतवाद अर्थात् विवर्तवादमें अन्तिम लक्ष्यकी प्राप्तिमें कोई वास्तविक अन्तर नहीं है । २ - ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीरामानुजाचार्यका विशिष्टाद्वैत-सिद्धान्त शंकरसे लगभग २५० वर्ष पश्चात् ( जन्म विक्रम सं ० १०७३ तदनुसार ई ॰ सन् १०१६ ) श्रीरामानुजाचार्यने विशिष्टाद्वैत - सम्प्रदाय चलाया । इनका ब्रह्मसूत्रपर भाष्य ' श्रीभाष्य ' कहलाता है । प्रसिद्ध है कि ब्रह्मसूत्रपर एक अति प्राचीन व्याख्या ' वृत्ति ' अथवा ' कृतकोटि ', नामसे बौधायन ऋषिकी बनायी हुई थी; किंतु वह लुप्त हो चुकी थी; उसको टंकमिर्ड, गुहदेव आदि पूर्व - आचार्योंने संक्षेप किया था । उसके आधारपर श्रीरामानुजाचार्य अपने श्रीभाष्यका लिखा जाना अपने वेदार्थ - संग्रहमें बतलाते हैं “ भगवान् बौधायनकी विस्तीर्ण वृत्तिका जो पूर्व - आचार्योंने संक्षेप किया है, उनके मत अनुसार सूत्रोंका व्याख्यान किया जाता है । " श्रीस्वामी रामानुजाचार्यका विशिष्टाद्वैत - सिद्धान्त — इस सम्प्रदायका मत है कि शंकराचार्यका माया - मिथ्यात्ववाद और अद्वैत - सिद्धान्त दोनों झूठे हैं । चित् अर्थात् जीव और अचित् अर्थात् विषय, शरीर, इन्द्रियाँ आदि पाँचों स्थूल भूतोंसे बना हुआ भौतिक जगत् और ब्रह्म ये तीनों यद्यपि भिन्न हैं तथापि चित् अर्थात् जीव और अचित् अर्थात् जड जगत् ये दोनों एक ही ब्रह्मके शरीर हैं; जैसा कि अन्तर्यामी ब्राह्मण ( बृह ॰ उप ॰ ३ । ७ ) में कहा है कि यह सारा बाह्य जगत् शरीर इत्यादि और जीवात्मा ब्रह्मका शरीर है और वह इनका अन्तर्यामी आत्मा है । इसलिये चित् - अचित् विशिष्ट ब्रह्म एक ही है । इस प्रकारसे विशिष्ट रूपसे ब्रह्मको अद्वैत माननेसे यह सिद्धान्त विशिष्टाद्वैत कहलाता है । इस सिद्धान्तके अनुसार मोक्षमें जीवात्मा ब्रह्मको प्राप्त होकर ब्रह्मके सदृश हो जाता है न कि ब्रह्मरूप । पुरुषोत्तम, नारायण, वासुदेव और परमेश्वर ब्रह्मके पर्यायवाचक हैं । उपर्युक्त सारी बातोंसे सिद्ध होता है कि इस सम्प्रदायमें सगुण ब्रह्म अर्थात् अपर ब्रह्म = शबल ब्रह्मकी प्राप्ति ही अपना लक्ष्य माना है, जो योगकी सम्प्रज्ञात - समाधिका अन्तिम ध्येय हो सकता है । ३ - ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीमध्वाचार्यका द्वैत - सिद्धान्त श्रीरामानुजाचार्यके १८२ वर्ष पश्चात् विक्रमी सं ० १२५४, तदनुसार ई ० सन् ११ ९ ७ में श्रमदानन्द तीर्थका, जो मध्वाचार्यके नामसे प्रसिद्ध हैं, जन्म हुआ । ८६ वर्षकी अवस्थामें विक्रमी सं ० १३४०, तदनुसार ई ॰ सन् १२८३ में इनका शरीर त्याग हुआ । इनका ब्रह्मसूत्रपर भाष्य ' पूर्णप्रज्ञभाष्य ' के नामसे प्रसिद्ध है । यह द्वैत - सम्प्रदायके प्रवर्तक हुए हैं । इनका मत है कि ब्रह्म और जीवको कुछ अंशोंमें एक कुछ अंशोंमें भिन्न मानना परस्पर विरुद्ध और असम्बद्ध बात है । इसलिये दोनोंको सदा भिन्न ही और मानना चाहिये; क्योंकि इन दोनोंमें पूर्ण अथवा अपूर्ण रीतिसे भी एकता नहीं हो सकती । लक्ष्मी ब्रह्मकी शक्ति ब्रह्मके ही अधीन रहती है; किंतु उससे भिन्न है । ( २७ )

पृष्ठ 48

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 48 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ उत्तरमीमांसा आर्यसमाजके प्रवर्तक श्रीस्वामी दयानन्दजी महाराजका सिद्धान्त भी द्वैतवाद कहलाता है, किंतु इन दोनोंमें अन्तर यह है कि जहाँ श्रीमध्वाचार्यजीने अधिकतर पुराणोंका आश्रय लिया है वहाँ श्रीस्वामी दयानन्दजीने वेदों, उपनिषदों, वैदिक दर्शनों और प्रामाणिक स्मृतियोंका उसके साथ समन्वय दिखलाया है । श्रीस्वामी दयानन्दका द्वैतवाद सब वैदिक दर्शनोंके समन्वयके साथ सांख्ययोगका ही सर्वांशमें द्वैतवाद है; किंतु लेखकका यह व्यक्तिगत स्वतन्त्र विचार है कि उन्होंने चैतन्य - तत्त्वका शुद्ध स्वरूप अर्थात् परब्रह्मको न दिखलाकर केवल ईश्वर, जीव और प्रकृतिका ही वर्णन किया है; जो इस सृष्टिकी सारी बाह्य रचनामें पाये जा रहे हैं । इस सिद्धान्तके अनुसार पुनरावर्तनीयरूप अपर ब्रह्मकी प्राप्ति ही मुक्तिकी सीमा हो सकती है, जो योगकी सम्प्रज्ञात - समाधिका अन्तिम ध्येय हो सकता है, किंतु स्वामीजीका योगसाधनपर पूरा जोर देने और उसको ही परमात्माकी प्राप्तिका साधन बतलाने तथा पातञ्जलयोगको योगका मुख्य प्रामाणिकग्रन्थ माननेसे योगकी अन्तिम सीमा असम्प्रज्ञात- त - समाधि और उसका अन्तिम ध्येय शुद्ध परमात्मस्वरूपमें अवस्थितिरूप कैवल्य भी आ जाता है । स्वामी दयानन्दजीने ईश्वर, जीव और प्रकृति इन तीनोंका जो विशेषरूपसे वर्णन किया है, इससे सामान्यतया इनका सिद्धान्त त्रैतवाद समझा जाता है; किंतु चेतन - तत्त्वका समष्टि ब्रह्माण्डके सम्बन्धसे ईश्वर नाम है और व्यष्टि - पिण्डोंके सम्बन्धसे जीव । ये दोनों चेतन - तत्त्वके शबल अर्थात् मिश्रितरूप हैं । इसलिये लेखकके व्यक्तिगत विचारके अनुसार स्वामी दयानन्दजीका सिद्धान्त द्वैतवाद ही है । स्वामी दयानन्दजीने शुद्धचेतन- -तत्त्व अर्थात् परब्रह्मका वर्णन विशेषरूपसे इस कारण नहीं किया कि उस समयका जनसमूह उसके समझनेमें अयोग्य था और उनका मुख्य उद्देश्य समाज - सुधार और धर्मरक्षा था । स्वामी दयानन्दजीके समयमें हिंदू - समाज और वैदिक धर्म - जैसी विकट परिस्थितिमें मृत्युकी ओर जा रहा था, उसका उदाहरण किसी भी पूर्वाचार्यके समयमें न मिल सकेगा । स्वामी दयानन्दजीका हिंदू - धर्म और समाजकी निम्न प्रकारकी दुर्दशाको हटाना मुख्य उद्देश्य था— १. वैदिक धर्मका नाना प्रकारके मत - मतान्तर और सम्प्रदायोंमें विभक्त होकर परस्पर एक - दूसरेका विरोध करना । २. एक ईश्वर - उपासनाके स्थानमें न केवल अनेक देवी - देवताओं किंतु भूत, प्रेत, पीर, पैगम्बर, क़ब्र, मजार आदिको सांसारिक कामनाओंके लिये पूजना । ३. मूर्तिपूजाका दुरुपयोग और मन्दिर - तीर्थ आदि पवित्र स्थानोंमें नाना प्रकारके दुर्व्यवहार | ४. गुण, कर्म, स्वभावको छोड़कर जन्मसे जाति - पाँतिकी व्यवस्था माननेके कारण ऊँची कहलानेवाली जातियोंकी प्रमादके कारण अवनति और नीची कहलानेवाली जातियोंकी उन्नतिके मार्गमें रुकावट, इसका परिणामरूप सारे हिंदू - समाजकी अधोगति । ५. स्वयं अपने गुण, कर्म और स्वभावको ऊँचा बनानेकी अपेक्षा एक - दूसरेको नीचा, छोटा और अपूर्ण बतलाकर अपनेको ऊँचा, बड़ा सच्चा और पूर्ण सिद्ध करनेकी आसुरी चेष्टा । इस, प्रकार झूठा हिंदुओंमें परस्पर भ्रातृभाव, समानता, आदर और सत्कारका अभाव । ६. ऊँचे सवर्ण कहलानेवाले संकीर्ण - हृदय मनुष्योंका नीची कहलानेवाली निर्धनजातियोंका न ( २८ )

पृष्ठ 49

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 49 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय '** [ उत्तरमीमांसा केवल धार्मिक, सामाजिक और नागरिक अधिकारोंका हरण करना किंतु उनके प्रति पिशाचवत् अत्याचार करके उनको दूसरे मजहबोंके जालमें फँसनेके लिये मजबूर करना । ७. बाल - विवाह, वृद्ध - विवाह आदि नाना प्रकारकी कुरीतियाँ । स्त्रियोंको शूद्रा बतलाकर उनको जन्म - सिद्ध धार्मिक अधिकारोंसे वञ्चित रखना, विधवाओंके साथ अन्यायपूर्वक दुर्व्यवहार | ८. हिंदुओंके सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रिय, नागरिक और वैयक्तिक आदि सारे अङ्गोंमें स्वार्थमय जीवन । ९. सार्वभौम वैदिक धर्मको मूर्खता और अज्ञानतासे संकीर्ण करके न केवल अन्य मतावलम्बियोंके लिये उसमें प्रवेशका द्वार बंद कर देना किंतु अपनी झूठी स्वार्थ - सिद्धिके लिये अपने वैदिक धर्मी छोटी - छोटी बातोंमें अपनेसे पृथक् करके विधर्मियोंके जालमें फँसनेमें सहायक होना । १०. उपर्युक्त सारे दोषोंसे अनुचित लाभ उठाकर दो विदेशीय मजहबोंका न केवल विद्याहीन छोटी जातिवाले गाँवों, पहाड़ों और जंगलोंमें रहनेवाले अनपढ़ हिंदुओंको किंतु नीलकण्ठ - जैसे बड़े - बड़े अँग्रेजी पढ़े हुए विद्वानोंको पौराणिक कथाओंमें अयुक्ति और दोष दिखलाकर अपने मजहबके जालमें फँसाना । ११. राष्ट्रका परतन्त्र होना, विदेशी राजके कारण देशभक्ति, प्राचीन सभ्यता और धर्म - भाषाके प्रति प्रेमका अभाव, दासताके विचार, विदेशी भाषा, संस्कृति और सभ्यताकी ओर प्रवृत्ति इत्यादि - इत्यादि । ४ - ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीवल्लभाचार्यका शुद्धाद्वैत-सिद्धान्त श्रीवल्लभाचार्यका जन्म विक्रमी संवत् १५३६ तदनुसार १४७ ९ ई ० सन्‌में हुआ । इनका ब्रह्मसूत्रपर भाष्य " अणुभाष्य " कहलाता है । उनका मत निर्विशेष - अद्वैत, विशिष्ट अद्वैत और द्वैत तीनों सिद्धान्तोंसे भिन्न है । यह शंकराचार्यके समान इस बातको नहीं मानते कि जीव और ब्रह्म एक हैं और न मायात्मक जगत्‌को मिथ्या मानते हैं; बल्कि मायाको ईश्वरकी इच्छासे विभक्त हुई एक शक्ति बतलाते हैं । माया - अधीन जीवको बिना ईश्वरकी कृपाके मोक्षज्ञान नहीं हो सकता, इसलिये मोक्षका मुख्य साधन ईश्वरभक्ति है । मायारहित शुद्ध जीव और परब्रह्म ( शुद्ध ब्रह्म ) एक वस्तु ही हैं दो नहीं हैं । इसलिये इसको - अद्वैत त - - स सम्प्रदाय कहते हैं । इस अंशमें यह सिद्धान्त सांख्ययोगके सदृश है; किंतु पौराणिक रंगमें शुद्ध इसकी दार्शनिकता छिप गयी है । ५ - ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीनिम्बार्काचार्यका द्वैत - अद्वैत - सिद्धान्त श्रीनिम्बार्काचार्य लगभग विक्रम सं ० १२१ ९ तदनुसार ११६२ ई ० सन्में हुए हैं । इन्होंने ‘ वेदान्त - पारिजात ' नामसे ब्रह्मसूत्रपर भाष्य लिखा है । जीव, जगत् और ईश्वरके सम्बन्धमें इनका मत है कि यद्यपि ये तीनों परस्पर भिन्न हैं तथापि जीव और जगत्का व्यवहार तथा अस्तित्व ईश्वरकी इच्छापर अवलम्बित है, स्वतन्त्र नहीं है और ईश्वरमें ही जीव और जगत्के सूक्ष्म तत्त्व रहते हैं । विशिष्ट अद्वैतसे अलग करनेके लिये इसका नाम द्वैत - अद्वैत - सम्प्रदाय रखा गया है । उपर्युक्त सम्प्रदाय शंकरके मायावादको स्वीकृत न करके ही उत्पन्न हुए हैं और ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिप्रधान हैं । वैष्णवसम्प्रदायसे सम्बन्ध रखते हैं । इसलिये जहाँ स्वामी शंकराचार्यका भाष्य उपनिषदोंपर ( २ ९ )

पृष्ठ 50

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 50 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरा प्रकरण ] ** • पातञ्जलयोगप्रदीप* [ उत्तरमीमांसा निर्भर है, वहाँ इन सम्प्रदायोंके भाष्यमें पुराणों और विशेषकर विष्णुपुराणको अधिक उद्धृत किया गया है । प्रायः ये सब सम्प्रदाय चार प्रकारकी मुक्ति मानते हैं— ( १ ) सालोक्य मुक्ति – विष्णु अर्थात् ईश्वरके लोकमें निवास करना । ( २ ) सामीप्य मुक्ति – ईश्वरके लोकमें ईश्वरके समीप रहना । ( ३ ) सारूप्य मुक्ति – विष्णु अर्थात् ईश्वरके समान रूपवाला बन जाना । ( ४ ) सायुज्य मुक्ति — विष्णु - लोकमें विष्णुके समान विभूतिको प्राप्त होना । ये मुक्तिकी अवस्थाएँ एक प्रकारसे द्यौ लोक अर्थात् सूक्ष्म जगत्के स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् के अन्तर्गत हो सकती हैं । ब्रह्मसूत्रपर विज्ञानभिक्षुका भाष्य नये ढंगका ' विज्ञानामृत ' नामसे है; जिसमें श्रुति, स्मृति और दर्शनोंकी एक तात्पर्यमें संगति दिखलायी गयी है, किंतु वह किसी भी साम्प्रदायिकरूपमें नहीं है । ब्रह्मसूत्रोंमें अन्य वैदिक दर्शनोंका खण्डन नहीं है ब्रह्मसूत्रोंमें किसी वैदिक दर्शनका खण्डन नहीं है; बल्कि श्रीव्यासजीने तो जिन सिद्धान्तोंमें अन्य विद्वानोंका उनसे मतभेद था, उनको भी आदरपूर्वक दिखलाया है; किंतु साम्प्रदायिक आचार्योंने जहाँ सूत्रोंके शब्दोंसे अपने सम्प्रदायके पक्षमें और अपनेसे भिन्न सम्प्रदायोंके विपक्षमें अर्थ निकालनेमें खींचातानी की है, वहाँ प्राचीन तत्त्ववेत्ता ऋषियोंके दर्शनोंको भी जो वेदोंके उपाङ्गरूप हैं, दूषित ठहरानेमें पूरा जोर लगाया है । इसी कारण कणाद मुनिप्रणीत वैशेषिक और कपिल मुनिके सांख्यका ब्रह्मसूत्रोंमें खण्डन होनेका भ्रम हुआ है ' जन्माद्यस्य यतः ' ( ब्र ० सू ० १ । १ । २ ) के अर्थ जो तैत्तिरीय उपनिषद्के " यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद् विजिज्ञासस्व । तद् ब्रह्मेति । " के प्रतीकमें है, तीन प्रकारसे हो सकते हैं । १. जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका अभिन्न उपादान - निमित्तकारण जड - तत्त्व ( सांख्यकी प्रकृति, वैशेषिकके परमाणु अथवा चार्वाकके चार भूत ) है । २. जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका अभिन्न - निमित्त - उपादान - कारण चेतन - तत्त्व है । ३. जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और -तत्त्व अर्थात् आत्मसत्ता और उपादान - कारण जड - तत्त्व ( प्रकृति अथवा प्रलयका निमित्त - कारण चेतन-परमाणु ) अनात्मसत्ता है । इस प्रकार मुख्य तीन वाद अथवा सिद्धान्त हो सकते हैं । १. जड - अद्वैत - वाद ( चार्वाकवालोंका जडवाद ) २. चेतन - अद्वैत - वाद ( नवीन वेदान्तियोंका अद्वैत - वाद ) ३. चेतन जड अर्थात् आत्म - अनात्म द्वैत - वाद ( वैदिक दर्शनोंका द्वैत - वाद ) । सिद्धान्तरूपमें तो यह द्वैत - वाद है; किंतु व्यवहारदशामें त्रैतवाद हो जाता है अर्थात् ( १ ) ईश्वर ( सगुण ब्रह्म - शबल ब्रह्म = अपर ब्रह्म ) जो ब्रह्माण्ड अर्थात् समष्टिरूपेण जड - तत्त्वके सम्बन्धसे चेतन तत्त्व अर्थात् परमात्मसत्ताका नाम है । ( २ ) जीव, जो पिण्ड अर्थात् व्यष्टिरूपेण जड - तत्त्वके सम्बन्धसे चेतन - तत्त्व अर्थात् आत्मसत्ताका नाम है और ( ३ ) प्रकृति ( जड - तत्त्व ) जो अनात्मसत्ता है और केवल कैवल्य - अवस्थामें ही जब द्रष्टाकी शुद्ध चैतन्य ( परमात्मा = परब्रह्म = निर्गुण ब्रह्म - शुद्ध ब्रह्म ) स्वरूपमें अवस्थिति होती है, तब उस कैवल्य ( ३० )