पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 531–540
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 531–540
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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १३ धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्थापरिणामकी व्याख्या समझ लेनी चाहिये ) भाष्य । शङ्का – पूर्व सूत्रमें चित्तका परिणाममात्र कहा है— धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्थापरिणाम नहीं कहे? इस शङ्काको परिणामोंके विभाग दिखलाकर दूर करनेके लिये उपक्रम करते हैं । तत्र व्युत्थानेति — उनमेंसे व्युत्थान और निरोधके अभिभव और प्रादुर्भाव ही धर्मी - चित्तमें धर्मपरिणाम प्रथम सूत्रने ही कहा है, ' अवस्थित ' धर्मके पूर्व धर्मका तिरोभाव होनेपर धर्मान्तरके प्रादुर्भावको ही धर्मपरिणामत्व है, यह भाव है । यद्यपि प्रथम सूत्रमें व्युत्थान और निरोधके संस्कारोंका ही अभिभव और प्रादुर्भाव कहा है, तथापि व्युत्थान और निरोधका अपाय और उपजन भी अर्थात् लब्ध है, धर्म द्रव्य है या गुण- -यह बात दूसरी है तथा उसी सूत्रने अभिभव और प्रादुर्भाव शब्दोंसे धर्मका लक्षणपरिणाम भी कहा है । अतः भाष्यकार कहते हैं, लक्षणपरिणामश्चेति - लक्षणपरिणाम अवस्थित धर्मका अनागत आदि लक्षणके त्यागनेपर वर्तमान आदि लक्षणके लाभका नाम है, और वह अभिभव और प्रादुर्भाव वचनसे ही लब्ध है, क्योंकि अतीतता और वर्तमानताका ही अभिभव और प्रादुर्भाव हुआ करता है, यह भाव है । उनमेंसे पहले निरोधरूप धर्मके प्रादुर्भाव शब्दसे कहे लक्षणपरिणामका उदाहरण देते हैं । निरोधस्त्रिलक्षण इति - इसीका विवरण है, तीन अध्व ( मार्गसे ) युक्त है, क्रमके सम्बन्धसे अध्वके तुल्य होनेसे अनागत आदि भाव अध्व कहलाते हैं; तथा धर्मी और धर्मोके अन्योन्यके व्यावर्तनसे और लक्षण शब्दसे तन्त्रमें कहा है, इससे क्या आया? इसको कहते हैं - खल्विति — वह निरोध प्रादुर्भाव कालमें अनागतलक्षण रूप अध्व नामको छोड़कर इत्यादि अर्थ है । यहाँ सत्कार्यकी सिद्धिके लिये और धर्म - परिणामके उपपादनार्थ ' धर्मत्वमनतिक्रान्तः ' कहा है । स्वरूपसे अवस्थित ही धर्मके रूपान्तरके हटनेपर रूपान्तरकी उत्पत्तिमें धर्मपरिणाम शब्दका व्यवहार होता है । वर्तमान अवस्थाको इतर दो अवस्थाओंसे विवेचन करके दिखलाते हैं । यत्रेति – स्वरूपसे, अर्थक्रियाकारित्वसे अभिव्यक्ति उपलब्धि है । वह अनागतकी अपेक्षासे द्वितीय अध्व है । यह शिष्यके व्युत्पादनके लिये प्रसंगसे कहते हैं - एषोऽस्येति । असत् की उत्पत्ति और सत्के विनाशके प्रतिषेधके लिये कहते हैं — न चेति । निरोधक्षणमें ही निरोधके लक्षणपरिणामको दिखलाकर व्युत्थानको भी दिखलाते हैं तथा व्युत्थानमिति – सब पूर्ववत् है । विशेष है - वर्तमानताको छोड़कर अतीतताको प्राप्त होता है, यह तृतीय -अध्व है । इस भाँति व्युत्थान कालमें भी व्युत्थान और निरोधके लक्षणपरिणामोंको क्रमसे दर्शाते हैं, ‘ एवं पुनर्व्युत्थानमुपसम्पद्यमानमिति ' उपसम्पद्यमान जायमानका नाम है, और वह व्यक्ति अन्तर है, क्योंकि अतीत व्यक्तिका अनुत्पाद आगे कहेंगे । अन्य सब पूर्ववत् है । एवं पुनर्निरोध इति — यहाँ एवं पदसे तथा व्युत्थानम् — इत्यादि वाक्यसे कहे निरोधके तृतीय अध्वकी प्रक्रिया निर्देश की है । अतः निरोधके तृतीय अवस्थाके कथनके अभावकी शून्यता नहीं है, ( अर्थात् तृतीय अध्वकी प्रक्रियाके निर्देशसे निरोधकी तृतीय अवस्थाके कथनका अभाव है ) यह व्युत्थान निरोध परिणामका चक्र अपवर्गपर्यन्त ही है — यह संक्षेपसे कहते हैं । एवं पुनर्व्युत्थानमिति – पुनर्व्युत्थान आदि अर्थ है । चित्तके धर्मोक लक्षण – परिणामको दर्शाकर उस लक्ष्यके अवस्थापरिणामकी ' तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ' इस सूत्रपर व्याख्या बलवत्त्व हो चुकी है यह दिखलाते हैं — तथा अवस्था - परिणाम — इति - अवस्था - परिणामको कहते हैं — संस्कारोंका और दुर्बलत्व घटके नये और पुरानेपनकी भाँति है, वृद्धि और ह्रास - उत्पत्ति और विनाशरूप हैं, लक्षण ( ४ ९ ४ )
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सूत्र १३ ] एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः * * [ विभूतिपाद परिणामसे भेदकी अनुपपत्ति है, लक्षणके ही नवपुराणत्व आदि अवस्था परिणाम आगे कहेंगे— शङ्का - द्रव्यके ही वृद्धि और क्षय देखे जाते हैं, गुणके नहीं? समाधान — यह बात नहीं है, रूप आदि गुणोंके भी वृद्धि और ह्रासका अनुभव होता है । वृद्धि-ह्रासको रूपका अन्य भेद मानें तो गौरव होगा, वही रूप अब बढ़ गया है ऐसी जो प्रत्यभिज्ञा होती है वह भी न बनेगी । अतः संस्कार और अदृष्ट आदिका अवस्थापरिणाम होता है । ज्ञान और इच्छा आदिके उत्पत्ति और विनाशका अनुभव होता है । दो क्षणमात्र स्थायी होनेपर भी द्वितीय क्षणमें वर्तमान लक्षणका अवस्थापरिणाम होता है । वह क्षणत्वसे ही उस परिणामका हेतु है, यदि ऐसा न मानें तो सब वस्तुओंके प्रतिक्षण परिणामकी — जो कि आगे कहेंगे —उपपत्ति ही न होगी, इस कथनसे उसका भी खण्डन हो गया, जो किसीने कहा है कि उत्तर वृत्ति विभु- विशेष गुणकी ही ज्ञानादिके नाशक होनेसे एकाग्रता -दशामें भी ज्ञानके बहुत क्षण - स्थायी होनेसे अवस्थापरिणाम सम्भव नहीं है । तब इस प्रकार तीनों परिणामोंकी व्याख्या करके उनके आधारकी व्यवस्थाको कहते हैं, तत्र धर्मिण इत्यादिसे लक्षणोंका भी अवस्थाओंसे परिणाम होता है, यद्यपि बाल्य आदि अवस्थाओंका भी लक्षणपरिणाम होता है, तथापि यथोक्त क्रम माननेमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । शङ्का – वर्तमान लक्षणका नव पुराण ( नया, पुराना ) आदि अवस्थापरिणाम हो सकता है, अनागत और अतीत लक्षणका अवस्थाभेद किस प्रकार होगा? समाधान- शीघ्र भविष्यता, विलम्ब भविष्यता आदिरूप विशेष उन लक्षणोंका भी अनुमान हो सकता है; क्योंकि सत्त्व आदिकी भाँति ही गुणत्वसे, प्रतिक्षण परिणामित्व सिद्ध है, यथोक्त चित्तके परिणामोंसे सर्व वस्तुओंके परिणामोंका अतिदेश करते हुए वैराग्याग्निको प्रज्वलित करनेके लिये उनकी प्रतिक्षण परिणामिता दिखलाते हैं, एवं धर्मलक्षणेति – वह मनु आदिने भी कहा है-घोरेऽस्मिन् हतसंसारे नित्यं सततघातिनाम् । कदलीस्तम्भनिःसारे संसारे सारमार्गणम् ॥ यः करोति स सम्मूढो जलबुदबुदसन्निभे । नित्य सतत घातियोंके इस घोर संसारमें जो कि केलेके स्तम्भके समान निःसार है, जलके बुल - बुलेके सदृश पोला और क्षणभङ्गुर है, जो प्राणी सार ढूँढ़ता है वह सम्मूढ़ है गुणवृत्त — सत्त्व आदि गुणोंका व्यापार है, वह अपने कार्य धर्मादि परिणामोंसे क्षणभर भी शून्य नहीं रहता, प्रतिक्षण परिणत होता रहता है । शङ्का— अव्यापार - दशामें तो अपरिणामी होगा? समाधान — चलं हि गुणवृत्तिमिति – चलं यह भावप्रधान निर्देश है— गुणोंका चाञ्चल्य स्वभाव -यह तात्पर्यार्थ है । प्रश्न — प्रतिक्षण चाञ्चल्यमें प्रमाण क्या है? उत्तर- - गुणस्वभाव्यं त्विति - गुणोंका स्वभाव है, राजाके गुणों - उपकरणों नौकर स्वामीके लिये प्रतिक्षण ही व्यापार दिखायी देता है । अतः गुणस्वभावता ही आदिका पुरुष पूर्व आचार्यने प्रमाण कहा है । परके ही भोग और अपवर्गका हेतुत्व सत्त्वादि गुणोंकी भी प्रवृत्तिमें तीनों परिणामोंकी व्याख्या करके दाष्टन्तिकमें भी उसकी व्याख्याका आरम्भ गुणत्व करते है । चित्तके दृष्टान्तमें हैं । एतेनेति – इससे ( ४ ९ ५ )
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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १३ भूत और इन्द्रियोंमें धर्म - धर्मी भेदसे धर्म - धर्मीका आश्रय लेकर उन पृथिवी आदि धर्मियोंमें घट आदि धर्मका परिणाम धर्मपरिणाम तीन प्रकारका है, घट परिणाम आदि जानना चाहिये । अतीतता लक्षणपरिणाम है, वर्तमान आदि तीनों लक्षणोंका भी बाल्य - यौवन आदि अवस्थापरिणाम धर्मोंकी वर्तमान हैं । तीनों परिणाम भूत और इन्द्रियोंमें किस प्रकार कहे हैं; क्योंकि वे धर्मी हैं । उनमें धर्ममात्र शङ्का-परिणाम होगा? समाधान- तीनों धर्म - धर्मी परिणाम ही परमार्थसे तो एक ही परिणाम हैं, क्योंकि धर्मीस्वरूप होता है । अतः धर्मपरिणाम ही यह लक्षणादि परिणाम है— जो धर्मादिके अवान्तर विभाग ही ही धर्म हैं । अब प्रतिक्षण परिणाममें क्षणिकता आदिके प्रसङ्ग ( अतिव्याप्ति ) को हटानेके लिये तीनों परिणामोंकी क्रमसे परीक्षा करनी है । प्रथम धर्मपरिणामकी परीक्षा करते हैं, तत्र धर्मस्येत्यादिना –उन परिणामोंके मध्यमें धर्मीके सत्य होनेपर ही धर्मकी अतीत आदि अवस्थाओंमें धर्मीका भावान्यथात्व धर्मान्यथात्व ही होता है, द्रव्यान्यथात्व नहीं होता । स्वरूपान्यथात्व होनेपर ही प्रतिक्षण परिणामसे, क्षणिकताकी आपत्ति, प्रत्यभिज्ञा आदिकी अनुपपत्ति होती है, यह भाव है । सुवर्णका बर्तन आदि रूप हटनेषर कटकादि धर्मकी अभिव्यक्ति भावान्यथात्व है, प्रत्यभिज्ञाके बलसे सर्वविकारानुगत सुवर्ण सामान्य सिद्ध है । यह सामान्य ही अवयवी रूप धर्मी है । वैशेषिकके अनुयायी तो कहते हैं कि सुवर्णके अन्यथात्व होनेपर भी अवयवोंके संयोगके नाशसे पूर्व सुवर्ण व्यक्ति नष्ट हो ही जाती है । उसमें जो प्रत्यभिज्ञा होती है ( यह वही सुवर्ण है ) वह जातिविषयक होती है— -वह ठीक नहीं है । ऐसा माननेसे प्रतिक्षण अवयवोंके उपचय और अपचयके लिये अवयवोंका संयोग और विभाग अवश्य ही मानना होगा और उससे शरीर आदि अखिल वस्तुओंकी क्षणिकत्वकी आपत्तिको ब्रह्मा भी न हटा सकेगा और जातिसे ही सर्वत्र प्रत्यभिज्ञाकी उपपत्ति होनेमें प्रत्यभिज्ञासे घटादिके स्थैर्यका जो स्व - सिद्धान्त है उससे विरोध आवेगा । इसलिये अवयवके संयोगका नाश द्रव्यके नाशका हेतु नहीं है; किंतु वह्नि आदिमें तृण, अरणि और मणि आदिकी भाँति अव्यवस्थित ही फलके बलसे कारणकी कल्पना करनी चाहिये । अथवा विजातीय अवयवविभाग विशेष है, यह स्वरूपान्यथात्ववादी बौद्धोंके धर्म परिणाममें कहे दोषोंको निराकरण करनेके लिये उठाते हैं-अपर आह— धर्मोंसे धर्मी अतिरिक्त नहीं होता, अत्यन्त अभिन्न होता है, इसमें हेतु हैं, पूर्व तत्त्वका अतिक्रम न होनेसे, पूर्वतत्त्व धर्मीके अनतिक्रमकी आपत्तिसे, कौटस्थ्यकी आपत्तिसे, यह प्रयोजन है । इसीका विवरण करते हैं- ' पूर्वापरेति ' पूर्व और अपर अवस्था - भेदमें अनुपतित अनुगत कौटस्थ्यसे च्युत हो जायगा, यदि अन्वयी होगा । यदि धर्मी धर्मोंमें अन्वयी होगा, तब पूर्व, अपर, सफल, अवस्था भेदोंमें अनुगत होनेसे अतीत आदि अवस्थामें भी सत्त्व मानना होगा और वह चित् शक्तिके समान कूटस्थ रूपसे रहेगा; क्योंकि नित्यत्व और कूटस्थका एक ही अर्थ है और वह तुमको भी अनिष्ट है ' अयमदोषः ' - -यह दोष नहीं है— एकान्तेति — क्योंकि हम एकान्त इसका परिहार करते हैं— हम नित्यत्व नहीं मानते हैं । ‘ एकान्तेन ' का अर्थ है, सर्वथा स्वरूपसे और धर्मसे नित्यत्व ही । कौटस्थ्य मानते हैं, और वह चिति शक्तिका ही है, धर्मरूपसे अनित्य धर्मीकी कूटस्थता नहीं है , सत्यकी अतीत और विकारव्यावृतत्वं प्रकृतेर्नित्यत्वम् - विकारसे व्यावृत्ति ही प्रकृतिकी नित्यता है ( ४ ९ ६ )
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सूत्र १३ ] एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः * * [ विभूतिपाद अनागत अवस्थासे शून्यत्व नित्यत्व है । स्वरूपसे और धर्मसे नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों रूपता इस प्रपञ्चका प्रतिपादन करते हैं । तदेतदिति — यह कार्य, कारणात्मक त्रिलोकी, चौबीस तत्त्व अपने कार्योंके -सहित यथायोग्य धर्मरूपसे और स्वतः व्यक्तिसे वर्तमान अवस्थासे च्युत होते हैं; क्योंकि इनके नित्यत्वका श्रुति निषेध करती है ‘ नैवेह किंचनाग्र आसीत् ' यहाँ आगे कुछ भी नहीं था, ' असद्वा इदमग्र आसीत् ' यह प्रपञ्च पहले असत् था इत्यादि श्रुतियोंने नित्यत्वका प्रतिषेध किया है । व्यक्ताव्यक्तात्मिका तस्मिन् प्रकृतिः सम्प्रतीयत इत्यादि । उसमें व्यक्त और अव्यक्त रूप प्रकृति भलीभाँति प्रतीत होती है इत्यादि स्मृतियोंसे जो सावयव होता है वह अनित्य होता है जैसे कि घट आदि इस अनुमानसे भी नित्यत्वका प्रतिषेध है । शङ्का- तब तो अत्यन्त उच्छेद ही हो जायगा? समाधान-- अपेत - अतीत भी प्रकृति आदि धर्मरूपसे और अतीतरूपसे है, क्योंकि विनाशका प्रतिषेध किया है, अत्यन्त उच्छेदका श्रुतिने निषेध किया है ' तद्वैक आहुरसदेवैकमग्र आसीत् ' उसको एक कहते हैं । असद् ही एक आगे था इत्यादि श्रुतिसे अत्यन्त उच्छेदकी आशङ्का करके जब ' कथमसतः सज्जायेत् ' ' सत्यमेव सौम्येदमग्र आसीत् ' इति असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है? हे सौम्य! सत् तो यह आगे था, इस प्रकार श्रुतिने उस असत्का प्रतिषेध किया है । विनाशित्व होनेपर अनादित्व भावकी अनुपपत्ति होती है । यद्यपि सत्यमेव इस श्रुतिमें सत् शब्दका अर्थ परमात्मा ही है, क्योंकि उत्तरवाक्यमें तदैक्षत आया है, तो भी सत्के एकीभावसे इदमासीत् यह था, इस वचनसे प्रपञ्चकी भी प्रलयकालमें सत्ता सिद्ध होती ही है । इसी प्रकार ' तद्वेदम् ' तर्ह्यव्याकृतमासीत्तम-सैवेदमासीत् ' यह अव्याकृत था, तमस् ही यह था— ' आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्'- — यह प्रपञ्च तमरूप अलक्षण और अज्ञात था इत्यादि श्रुति और स्मृति भी अत्यन्त उच्छेदका निषेध करनेवाली प्रमाण हैं युक्ति भी — असत्से सत्की उत्पत्तिमें शशशृङ्ग आदिकी उत्पत्ति माननी पड़ेगी और बन्ध, मोक्ष भी अकारण ही होंगे जो कि नहीं हो सकते यह युक्ति भी प्रमाण हैं । यदि अतीत होनेपर भी हैं तो उपलब्ध क्यों नहीं होते? इसपर कहते हैं - संसर्गसे उपलब्ध नहीं होते । इस कार्य जगत्का अपने कारण प्रकृतिमें संसर्ग होने, विभक्त न रहने, लय हो जानेसे उपलब्धि नहीं होती है; क्योंकि उसके लौकिक साक्षात्कारमें उनकी सूक्ष्मता प्रतिबन्धक है । इस प्रकार कार्य - कारणके अभेदसे सभी परिणामी प्रकृति आदिकोंके प्रकारभेदसे नित्य और अनित्य उभय रूपकी व्यवस्था हो जानेसे उनके सत् और असत् रूपताका सिद्धान्त सिद्ध हो गया । ‘ सदसत्ख्यातिर्बाधाबाधाभ्याम् ' बाध और अबाधसे सत्, असत् ख्याति है । दर्शनका सूत्र भी प्रमाण हो जाता है । यही जड़ोंकी व्यावहारिकी सत्ता पुराण आदिमें कही यह गयी सांख्य-‘ निःसत्तासत्तं प्रधानम्’भाष्यकारने पूर्व कहा है वह पारमार्थिक सत् और असत्के अभिप्रायसे है जो हमने उसकी वहीं व्याख्या कर दी है । इससे आत्मा ही सत् है, अन्य सब कहा है । स्मृतिके वादके भी विरुद्ध नहीं है । एकान्त नित्यकी ही पारमार्थिक सत्ता असत् है । यह श्रुति और है, क्योंकि वह असत्ताके संपर्कसे रहित है । प्रकृतियोंकी व्यवहारसत्ता है और वह कूटस्थ नित्यकी ही नित्य नहीं है, इसी प्रकार-( ४ ९ ७ )
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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १३
नासद्रूपा न सद्रूपा माया नैवोभयात्मिका ।
सदसद्भ्यामनिर्वाच्या मिथ्या भूता सनातनी ॥
माया न सद्रूपा है, न असद्रूपा है, न उभयरूपा ही है । सत् और असत्से अनिर्वचनीया मिथ्यारूपा सनातनी है इत्यादि वाक्य भी संगत हो जाते हैं । आधुनिक वेदान्तियोंके अनिर्वचनीयवादमें संगत नहीं होते; क्योंकि उन्होंने माया नामक जगत्के कारणका भी विनाश या अत्यन्त तुच्छत्व ही परमार्थसे माना है, उनके मतमें सनातन शब्दका विरोध है । धर्मपरिणामकी परीक्षा करके अब लक्षणपरिणामकी परीक्षा करते हैं । ' लक्षणपरिणाम ' इति ' अध्वसु वर्तमान ' इति — धर्मोंका नित्यत्व कहा है । बिना नित्यत्व अतीत अनागत लक्षणके संयोग असम्भव है । यहाँ एक - एक लक्षणके अभिव्यक्तिके कालमें भी धर्म सूक्ष्म लक्षणान्तरके बिना नहीं होता । यह समुदायका अर्थ है तथा धर्मोकी भाँति लक्षण भी नित्य ही है । अतः न असत्की उत्पत्ति होती है और न सत्का अत्यन्त उच्छेद होता है । यह प्रसङ्ग दोष नहीं है । शङ्का – एक लक्षणकी व्यक्तिके कालमें लक्षणान्तरकी अनुपलब्धिसे उनका अभाव ही युक्त है । समाधान — उनकी उपलब्धि अनुमानसे होती है । उसको दर्शाते हैं — यथेति न शेषासु विरक्त इति — शेषोंमें विरक्त नहीं है । रागके भावी होनेमें विरक्त व्यवहार नहीं देखा जाता, तथा च एक विषयक रागादिके कालमें अन्योंकी सत्ता अनुमानसे सिद्ध होती है । लक्षणपरिणाममें भी दूसरोंके दूषणकी उद्भावना करते हैं । अत्रेति - सब अनागतादिको वर्तमानादि सब लक्षणोंसे योग होनेसे अनागत आदि भी वर्तमान ही हो जायँगे । तब अध्वोंका संकर हो जायगा, यदि उनमें क्रम मानें तो असत्की उत्पत्ति माननी पड़ेगी, अतः वर्तमान लक्षण ही सब वस्तु होंगी । पूर्व और उत्तरकालमें उनका अभावमात्र होगा और अभावके प्रतियोगी होनेसे उनमें अतीतादि व्यवहार हो जायगा । इसमें पहले धर्मोंमें लक्षणत्रयके सम्बन्धकी व्यवस्था करते हैं । धर्माणामिति – धर्मोंका धर्मत्व पूर्व सिद्ध कर चुके हैं, यहाँ सिद्ध नहीं करना है, धर्मत्वके सिद्ध हो जानेपर धर्मोंका लक्षण भेद और लक्षणबहुत्व भी कहना चाहिये, अर्द्ध - वैनाशिकके कहे वर्तमान मात्र एक लक्षण नहीं है; क्योंकि वर्तमान समयमात्रमें ही इस धर्मका धर्मत्व नहीं है, किंतु अतीतादि समयमें भी धर्मका धर्मत्व है । यहाँ हेतु कहते हैं एवं हीति — क्योंकि इस प्रकार वर्तमान कालमें ही धर्मत्व होनेपर सब ही चित्त रागधर्मक नहीं होंगे, अर्थात् विरक्त होंगे, विरक्त व्यवहारके योग्य होंगे, क्योंकि क्रोधके कालमें रागका आविर्भाव नहीं होता । भाव यह है — जैसे कि जब कभी चिद्रागकी सत्तासे आपका चित्त रक्त है यह व्यवहार होता है, तथा जब कभी चिद्रागके अभावसे चित्त विरक्त है यह व्यवहार होना चाहिये, अतः अतीतादि कालमें भी राग आदि चित्त आदिके धर्म हैं, धर्मोंका त्रिलक्षणत्व सिद्ध है । जो उन्होंने कहा है कि अभावकी प्रतियोगितामात्रसे अतीत आदि व्यवहार होता है, वह भी हेय है; क्योंकि घटके न होनेपर ध्वंसके प्रतियोगिता आदि रूप अतीतत्वकी वृत्ति ही नहीं बन सकती, संयोगित्व आदिकी भाँति प्रतियोगित्व आदिकी दो सम्बन्धियोंके बिना अनुपपत्ति है, क्योंकि सत् और असत् सम्बन्ध देखा हो नहीं गया जाता , घट, अतः होगा ध्वंस और प्रागभाव असिद्ध हैं, घट वर्तमान है । इसकी भाँति, घटोऽतीत, घट अतीत यदि ऐसा न मानें तो इन प्रतीतियोंसे घटकी अतीत और होनेवाली अवस्थाविशेष ही सिद्ध है । ( ४ ९ ८ )
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सूत्र १३ ] • एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः * * [ विभूतिपाद भावका अभाव भी अतिरिक्त सिद्ध होने लगेगा, इत्यादि दोषोंकी स्वयं ऊहा कर लेनी चाहिये । इस प्रकार धर्मोंकी तीन लक्षण ( काल ) की स्थापना करके अब उसके सांकर्यका परिहार करते हैं — किं चेति — तीनों अनागतादि कालोंका एक वस्तुमें सम्भव नहीं है; किंतु अपने व्यञ्जक, दण्ड, चाक आदि वस्तुके व्यञ्जनके समान जिसके उस प्रकारके लक्षणका क्रमसे भाव होता है उस वस्तुकी अभिव्यक्ति होती है । अतः अभिव्यक्तिमें सांकर्य नहीं है, स्वरूपसे तो सांकर्य इष्ट ही है । अव्यक्त लक्षणोंका व्यक्त लक्षणोंके साथ विरोध नहीं है, इस विषयमें पञ्चशिखाचार्यके वाक्यको प्रमाण देते हैं । उक्तं चेति — ' रूपातिशया वृत्त्यतिशया च परस्परेण विरूद्ध्यन्ते सामान्यानि तु अतिशयैः सह वर्तन्ते । ' रूप अतिशय और वृत्ति अतिशय आपसमें विरोधी हैं । सामान्य तो अतिशयोंके साथ रहा करते हैं । धर्मसे लेकर अनैश्वर्यतक आठ चित्तके रूप हैं । ज्ञान आदि आश्रय शान्त घोर मूढ़ चित्त परिणाम वृत्ति हैं, इनका अतिशय - अभिव्यक्ति रूप उत्कटता है । इस वाक्यकी व्याख्या ' गुणवृत्तिविरोधाच्च ' ( २ । १५ ) इस सूत्रपर कर दी है । उपसंहार करते हैं — तस्मात् इति - असंकरमें दृष्टान्त कहते हैं । यथैति रागस्यैवेति - धर्मोके तीन लक्षणोंके सम्बन्धमें रागका ही यह अर्थ है । क्वचित् विषयमें अन्यत्र विषयान्तरमें अभाव है— सामान्याभाव है यह अर्थ है, दाष्टन्तिकको कहते हैं ' तथा लक्षणस्येति ' कहीं समुदाचार है इत्यादि अर्थ है, यह लक्षण परिणाम धर्मीका नहीं होता; किंतु धर्मोंका ही होता है, इस प्रकार धर्म परिणामसे विशेष कहते हैं — न धर्म इति । शङ्का— लक्षण परिणाम लक्षणमें है या नहीं? यदि है तो अनवस्था - दोष है । यदि नहीं है अर्थात् लक्षणमें लक्षण परिणाम नहीं है तो लक्षण परिणाममें परिणाम लक्षण असम्भव है, क्योंकि पूर्व लक्षण अतीत होनेपर लक्षणान्तरकी अभिव्यक्तिका ही लक्षण परिणामत्व है । समाधान- -ऐसा नहीं है क्योंकि बीज और अङ्कुरकी भाँति प्रामाणिक होनेसे यह अनवस्था दोष नहीं । यदि इसको भी दोष मानें तो धर्मका धर्म उस धर्मका भी धर्म इत्यादि अनवस्थाको भी दोषकी आपत्तिसे धर्म - धर्मीभाव आदि भी सिद्ध न होंगे । अधिक तो निर्वितर्क सूत्र ( १ ।४३ ) पर है । इस प्रकार सब धर्मोका सदा ही तीन लक्षणोंसे सम्बन्ध है और अभिव्यक्ति तीनोंकी क्रमसे कह होती दिया है । यह बात सिद्ध हो गयी । शङ्का— यही हो लक्षणकी अभिव्यक्तिके भी नित्य होनेसे क्रमिकत्व किस प्रकार होगा क्रमिकत्व सम्भव है तो लक्षण क्रमिकत्वने क्या अपराध किया है जो उसमें? यदि उसमें क्रमिकत्व नहीं माना? समाधान— इस विषयमें कहते हैं नित्य और अनित्य उभयरूपके कहनेसे कार्योंमें अनित्य रूपसे क्रम सम्भव है । लक्षणोंका भी क्रम इष्ट नित्य होनेपर भी सब सांकर्यके लिये प्रकृतमें प्रदर्शित है । अधिक तो निर्वितर्क ही समापत्ति है । लक्षणाभिव्यक्तिका क्रम तो लक्षण परिणामकी परीक्षा करके अवस्था - परिणामकी परीक्षा करनेके सूत्रमें हमने कहा है । लक्षण-लिये धर्मगत विभागको कहते ते लक्षिता इति – लक्षिता - व्यक्ता वर्तमान अलक्षित हैं । बाल, यौवन और वार्धक्य आदि अवस्थाओंको, अव्यक्त, अतीत और अनागत उस - उस प्राप्त होते हुए अन्योन्य - अन्यत्वसे- - -भेदसे बोले जाते हैं । यह बालक है युवा नहीं है इत्यादि रूपसे बोले जाते हैं । वह निर्देश अवस्थान्तरसे, अवस्था- -भेदसे ' ( ४ ९९ )
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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १३ ही होता है, द्रव्यके भेदसे नहीं होता है । तब पूर्व अवस्थाके हटनेपर अवस्थान्तरकी प्राप्ति सिद्ध है । वही अवस्था परिणाम है । यह भाव है । यद्यपि इस प्रकारका अवस्थान्तर परिणाम अनागत और अतीत लक्षणोंमें भी पूर्व कहा है, तथापि वर्तमान लक्षणके ही अवस्थापरिणाम स्फुटतया उपलब्ध होते हैं । इस आशयसे वर्तमान लक्षणको आलम्ब करके ही वह उदाहरण दिया है । धर्मीके एक होनेपर भी निमित्तभेदसे अन्यत्व व्यवहारमें दृष्टान्त देते हैं । यथैकेति — जैसे एकत्वकी व्यञ्जक रेखा – अङ्कविशेष जब दो बिन्दुओंके ऊपर ( प्रथम बायीं ओर ) रहता है तब सौ है - एक नहीं, ऐसा व्यवहार होता है । इनमें से एक बिन्दुके लोप होनेपर यह दस है, सौ नहीं है यह व्यवहार होता है और अवशिष्ट बिन्दुके स्थानमें आनेपर एकत्वकी व्यञ्जक रेखा देनेपर ग्यारह है - दस नहीं, यह व्यवहार होता है । दृष्टान्तान्तर कहते हैं । यथा चेति उच्यते चेति – पुत्र- पिता - भ्राताओंसे जनकत्व आदि निमित्तभेदसे व्यवहार होता है । अवस्था परिणाममें भी बौद्धोंके कहे दूषणको कहते हैं | अवस्थेति- माननेमें - अवस्था परिणामके धर्म - धर्मी - लक्षण - अवस्था — इन चारोंको कूटस्थकी आपत्ति है । इसमें हेतु पूछते हैं कथमिति – किस प्रकारसे? उत्तर — अध्वके व्यापारसे व्यवहित होनेसे । क्योंकि व्यापारके निमित्तसे ही सब वस्तुओंमें अनागत आदि अध्वोंके अन्योन्य व्यवधानको माना है, और विभाग माना है, भागरूपसे नहीं माना, क्योंकि धर्म और लक्षणको सदा सत्य स्वीकार किया है । अब विभागके व्यापार - निमित्तक होनेका विवरण करते हैं । ' यदा धर्म ' इससे लेकर ' तदा अतीत ' इसतक । धर्म शब्द यहाँ आश्रित - वाचक है । न करता हैन करेगा आदि और अन्तके अध्वोंके व्यापारकी निमित्तता, व्यापारके अभावके निमित्तसे परम्परासे है । ऐसा होनेपर पूर्वधर्मकी अतीततामें धर्मान्तरकी अभिव्यक्ति होती है, इस प्रकार परिणामलक्षणकी अनित्यता अवस्थाओंकी भी आपको कहनी होगी विनाश नहीं कह सकते । अवस्थाओंके नित्य होनेपर तो कुछ भी अनित्य नहीं होगा । इस भाँति तो सभी धर्म - धर्मी जगत् कूटस्थ होगा । यह दूसरोंने दोष कहा है । उपसंहार — नित्यत्वमात्र कौटस्थ्य नहीं है, किंतु एकान्त नित्यत्व कौटस्थ्य है । इस आशासे पूर्ववत् उक्त दोषका परिहार करते हैं । नासौ दोषा इति कौटस्थ्य दोष नहीं है । गुण नित्यत्वेऽपेति - धर्मीके नित्य होनेपर भी धर्मोके विमर्द - विनाशकी कूटस्थसे विचित्रता है, विलक्षणता है, अपरिणाम नित्यता ही कौटस्थ्य है और वह पुरुषके अतिरिक्त दूसरेमें नहीं है; यह भाव है । गुणोंके नित्य होनेपर भी गुणोंके विमर्दका उदाहरण देते हैं । यथेति – दृष्टान्तमें नहीं, किंतु उदाहरणमें है । संस्थापनमिति – अर्थके विनाशसे अविनाशी शब्द तन्मात्रा आदिके पञ्चभूतरूप संस्थानधर्ममात्र आदिवाले हैं, अतः वे विनाशी हैं । यह अर्थ है एवं इत्यादिकी इसी भाँति व्याख्या करनी चाहिये । लिङ्ग महत्तत्त्वका नाम है । इसी भाँति अहंकार आदि और घट आदि भी अपने विनाशसे अविनाशी कारणोंके धर्ममात्र और विनाशी हैं, यह बात जाननी चाहिये । वह ही यह श्रुतिने कहा है – ' वाचारम्भणविकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यमिति ' वाचारम्भण - प्रथममात्र विकार नाममात्र है, मृत्तिका है इतना ही सत्य है । सत्य यहाँ विकारकी अपेक्षा स्थिरका नाम है । उस धर्ममें ही विकारसंज्ञा या परिणामसंज्ञा है । अतः धर्मियोंमें परिणामी होनेसे कौटस्थ्य नहीं है और भलीभाँति तो धर्म, लक्षण और अवस्थाओंको कौटस्थ्य नहीं है । तीनों परिणामोंकी विस्तारसे परीक्षा कर दी । अब भूत और इन्द्रियोंमें तीनों परिणामोंको क्रमसे दिखलाते ( ५०० )
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सूत्र १४ ] • शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी * ** [ विभूतिपाद हैं — उसमें यह उदाहरण है धर्मत इति — धर्मसे परिणामित होते हैं । धर्म परिणामके स्वरूपको दर्शाते हैं, घटाकार इति — परिणाम घटाकार है । नवपुराणतामिति - नवीनताके अनन्तर पुराणताको प्राप्त होता हुआ सब ही धर्म आदिकोंके अवस्थात्वसे अविशेष होनेपर भी गोबलीवर्द - न्यायसे ही इनका तान्त्रिक भेदनिर्देश है यह कहते हैं— धर्मियोंके भी— लक्षणकी पुराणत्व आदि अवस्था प्राप्त होनेसे ही नहीं कही है । एक एवेति — एक अवस्थामात्र ही परिणाम है यह अर्थ है । इस भाँति अवस्था और लक्षण भी धर्म होनेसे धर्म - परिणाम भी गोबलीवर्द - न्यायसे ही जानने चाहिये । इसी भाँति पदार्थान्तरमें भी जानना चाहिये — भूतान्तरमें, इन्द्रियोंमें, प्रत्यय आदिमें - यह अर्थ है । जिसकी विशेषताको जो पूर्वोक्त ही परिणामोंमें स्मरण कराते हैं । त एते इति - तीनों ही परिणाम धर्मीके स्वरूपका अतिक्रमण न करते हु धर्मीमें ही अनुगत हैं, अतः धर्म - धर्मीके अभेदसे एक धर्म परिणाममात्र ही है । सामान्यसे धर्मी होता है । वही सब परिणामोंको प्राप्त करता है । सूत्रस्थ परिणाम शब्दकी प्रश्नपूर्वक व्याख्या करते हैं, अथ कोऽयं परिणाम इति – यह परिणाम कौन है, क्या है? उत्तर - अवस्थितस्येति - संस्कारोंमें भी परिणाम कहा है । अतः द्रव्यस्येति — धर्मीका यह अर्थ है । धर्म शब्द आश्रितमात्रका वाचक है । निवृत्ति अतीतता है और उत्पत्ति वर्तमानता है । शङ्का– धर्मसे अतिरिक्त धर्मीका अनुभव नहीं होता जिसमें कि धर्म आदि परिणाम हैं । इस शंकापर धर्मसे विवेचन करके धर्मीका प्रतिपादन सूत्रकार करेंगे ॥ १३ ॥
सङ्गति — ऊपर बतलाये हुए तीनों परिणाम जिसके धर्म हैं, उस धर्मीका स्वरूप निरूपण करते हैं । शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥। १४ ॥ शब्दार्थ – ( तत्र = उन परिणामोंके ) । शान्त = अतीत । उदित = वर्तमान । अव्यपदेश्य = भविष्यत् । धर्मानुपाती = धर्ममें रहनेवाला । धर्मी = धर्मी है । अन्वयार्थ– ( उन परिणामोंके ) अतीत, वर्तमान और भविष्यत् धर्मोंमें अनुगत धर्मी । व्यारख्या – सूत्रको तत्र शब्दसे पूरा करके पढ़ें । ( व्यासभाष्य ) ऊपर उदाहरण देकर समझा आये हैं कि मिट्टी - द्रव्य धर्मी है और मिट्टीके गोले बर्तन और बर्तनके टुकड़े आदि भिन्न - भिन्न आकार जो हो चुके हैं और जो होंगे, उसके धर्म हैं । अर्थात् धर्म धर्मीके विशेष रूप आकार हैं, और धर्मी सामान्यरूप द्रव्य है जो सारे आकारोंमें अनुगत है । द्रव्यके दो रूप हैं सामान्य और विशेष । विशेष धर्म है और सामान्य धर्मी है । विशेष भी अपने अगले विशेषके प्रति धर्मी बन जाता है । शान्त — इसमें शान्त वे धर्म हैं जो अपना - अपना व्यापार करके अतीत ( भूत ) मार्ग ( काल ) में चले गये । जैसे बर्तन ( घट ) टूटकर मिट्टीमें मिलनेपर वर्तमान धर्मसे अतीत धर्ममें चलागया । उदित — उदित वे धर्म हैं जो अनागत मार्ग ( काल ) को त्यागकर वर्तमान व्यापार कर रहे हैं । जैसे घट ( बर्तन ) के आकार, मिट्टीके धर्म, जो उसमें छिपे मार्ग हुए ( काल ) में अपना छोड़कर वर्तमान धर्ममें आ गये । थे, अब उसको अव्यपदेश्य – जो अनागत या भविष्यत्में शक्तिरूपसे रह रहे सकता है अर्थात् जो शक्तिरूपसे स्थित हुए व्यवहारमें न लाये जा हैं और जिनका निर्देश नहीं किया जा जैसे घट ( बर्तन ) के आकार मिट्टी धर्मीमें प्रकट होनेसे पहले छिपे रहते सकें हैं, और जो बतलानेमें न आ सकें । वर्णनमें नहीं आ सकते । ( ५०१ )
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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १४ इस प्रकार नियमसे कार्य - कारणरूप योग्यतासे युक्त शक्ति ही धर्म पदार्थ है, उस शक्तिरूप धर्मके उक्त तीन भेद हैं । उन तीनोंमें जो अन्वयीरूपसे रहनेवाली मिट्टी है वह धर्मी है अर्थात् जो मिट्टीके विशेष रूप, आकार आदि हैं वे उसके धर्म हैं; और सामान्यरूपसे मिट्टी द्रव्य जो उन सबमें अनुगत है वह धर्मी है । यहाँ यह समझ लेना भी आवश्यक है कि धर्मीका धर्मों तथा धर्मका धर्मसे परस्पर भेद प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः इनमें अभेद है । धर्मोंकी वर्तमान अवस्थाका प्रत्यक्ष और भूतावस्थाका स्मरण होता है; पर उनकी अनागतावस्था अनुमेय होती है । यदि धर्मी मृत्तिकादिमें अनागत धर्म घटादि न हों तो मृत्तिकामें ही घट होता है, तन्तुओंमें ही पट होता है, यह नियम नहीं बन सकता । इससे सिद्ध है कि मृत्तिका आदि धर्मीमें घटादि अनागत धर्म रहते हैं । अनागतावस्था नैयायिकका प्रागभाव और अतीतावस्था उनका प्रध्वंसाभाव है । वर्तमानावस्थाकी कारण अनागतावस्था है । अनागत धर्म तो वर्तमान मार्गमें आते हैं और वर्तमान धर्म अतीत मार्गमें चले जाते हैं; परंतु अतीत धर्म वर्तमानमें नहीं आते, क्योंकि वर्तमानके कारण अतीत धर्म नहीं हैं बल्कि अनागत धर्म हैं । इसलिये जो घट चूर्ण होकर मिट्टीमें मिलकर अतीत मार्गमें चला गया वह फिर वर्तमान मार्गमें नहीं आयेगा । क्योंकि स्वकारण मिट्टीमें लीन हो जानेसे सूक्ष्मताको प्राप्त होकर वह दर्शनके अयोग्य हो गया है । इसलिये उपलब्धि अर्थात् प्रत्यक्ष ज्ञानका विषय नहीं बन सकता ( किंतु पूर्व अनुभूत अतीत लोकों आदिको स्वदेहमें देखा था इत्यादि सिद्ध योगियोंके वाक्य हैं । क्योंकि योगियोंके इस प्रत्यक्षमें विषय और उस अतीत विषयका सन्निकर्ष कारण है । ) उसके सदृश अन्य घट अवश्य आ सकते हैं । यहाँ यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि न्याय, वैशेषिकादि दर्शनोंमें गुण - गुणीको प्रायः धर्म और धर्मी कहा गया है । परंतु योगदर्शनमें धर्म और धर्मी शब्द कार्य और उपादान कारणके लिये प्रयुक्त हुए हैं I इस उपादान कारणरूप धर्मीमें उसके कार्य अव्यपदेश्य ( अनागत ) धर्म शक्तिमात्र अव्यक्त रूपसे छिपे रहते हैं । उनको अव्यपदेश्य ( अनागत ) से उदित ( वर्तमान ) धर्ममें व्यक्तरूपसे प्रकट करने और फिर उदित धर्मसे शान्त ( अतीत ) धर्ममें अव्यक्तरूपसे छिपानेमें चेतन पुरुष ( ईश्वर तथा जीव ), देश, काल और संयोग विशेषादि निमित्त कारण होते हैं । अपने - अपने निमित्तोंके मिलनेसे धर्मीके धर्म प्रकट
होते हैं ।
टिप्पणी- -व्यासभाष्यका भाषानुवाद ॥ सूत्र १४ ॥
योग्यतावच्छिन्न धर्मीकी शक्ति ही धर्म है । उस शक्ति ( धर्म ) की सत्ता फलकी उत्पत्तिके भेदसे अनुमान की जाती है और वह शक्ति ( धर्म ) एककी अन्योन्य देखी जाती है उनमें वर्तमान स्वव्यापारका अनुभव करता हुआ धर्म - धर्मान्तर जो शान्त और अव्यपदेश्य हैं उनसे भेदित होता है । जब सामान्यसे समन्वागत होता है, तब धर्मी स्वरूपमात्र होनेसे कौन किससे भेदित होवे । उस धर्मीमें तीन धर्म हैं— शान्त, उदित और अव्यपदेश्य । उनमेंसे वे शान्त हैं जो अपना व्यापार करके उपरत हो गये हैं, सव्यापार उदित हैं, और वे अनागत लक्षणके समनन्तर होते हैं, वर्तमानके अनन्तर अतीत होते हैं, अतीतके अनन्तर वर्तमान नहीं हुआ करते; क्योंकि उन अतीत और वर्तमानमें पूर्व पश्चिमताका अभाव है, जैसी अनागत और वर्तमानकी पूर्व पश्चिमता है वैसी अतीत और वर्तमानकी पूर्व ( ५०२ )
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सूत्र १४ ] शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी * [ विभूतिपाद पश्चिमता नहीं है, इसलिये अतीतकी समनन्तरता नहीं है, वह अनागत ही वर्तमानके समनन्तर है । अब अव्यपदेश्य कौन हैं? ' सर्वं सर्वात्मकम् ' अव्यपदेश्य हैं जिसके विषयमें कहा है कि जल और भूमिका पारिणामिक रसादिका वैश्वरूप्य स्थावरों ( वृक्षादि ) में देखा है, तथा स्थावरोंका वैश्वरूप्य जंगमोंमें देखा जाता है और जंगमोंका स्थावरोंमें देखा जाता है । इस प्रकार जातिके अनुच्छेदसे सर्व सर्वात्मक हैं । देश, काल, आकार, निमित्तका सम्बन्ध न होनेसे, समानकालमें आत्माओं ( स्वरूपों ) की अभिव्यक्ति नहीं होती, जो इन अभिव्यक्त और अनभिव्यक्त धर्मोंमें अनुपाती सामान्य विशेष आत्मा ( स्वरूप ) है वह अन्वयी धर्मी है । जिसके मतमें यह प्रपञ्च धर्ममात्र निरन्वय है, उसके मतमें भोगका अभाव है, क्योंकि अन्य विज्ञानसे किये कर्मका अन्य भोक्ता कैसे होगा? और अन्यके अनुभवकी स्मृतिका अभाव होगा, क्योंकि लोकमें अन्यके देखेका अन्यको स्मरण नहीं होता है । वस्तुके प्रत्यभिज्ञानसे ( यह वही है जो पूर्व देखा था इससे ) अन्वयी धर्मी स्थित है जो धर्मके अन्यथात्वको प्राप्त होकर भी वही प्रतीत होता है । इसलिये यह प्रपञ्च धर्ममात्र निरन्वय नहीं है ( इसमें अन्वयी धर्मी अवयवी विद्यमान है । ) ॥१४ ॥
विज्ञानभिक्षुके योगवार्त्तिकका भाषानुवाद ॥ सूत्र १४ ॥ उस सूत्रको तत्र शब्दसे पूरा करके पढ़ते हैं, उन परिणामोंके शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी — अतीत, वर्तमान, अनागत धर्मोंमें अनुपाती वर्तमान रूपसे अनुगत धर्मी होता है यहाँ अव्यपदेश्य विशेषण धर्म और धर्मीके विवेक प्रदर्शनके लिये है । तथा च वर्तमानत्व और अवर्तमानत्व वैधर्म्यसे धर्मी और धर्मका विवेक है, यह भाव है । धर्मशब्दार्थकी व्याख्या करते हैं । योग्यतासे अवच्छिन्न धर्मीकी शक्ति ही धर्म है, योग्यतावच्छिन्ना- - यह विशेषण दग्धशक्तिके संग्रहार्थ दिया है । वर्तमानताका अर्थ स्वरूपकी योग्यता है 1 उससे अतीतादि साधारण्यका भी लाभ होता है, वर्तमान आदि विशेष व्यवच्छेदार्थ एवकारका प्रयोग है । शक्तित्व यहाँ अनागन्तुकत्व है ( स्वाभाविकी ) है तथा च अग्निके दाहशक्तिवर्द्धक भी धर्मीमें यावद्द्रव्य भावी है । शक्तिमान्से शक्तिका वियोग नहीं हुआ करता, क्योंकि शक्ति और शक्तिमान्का अभेद सम्बन्ध है । धर्म शब्दके अर्थको कहकर उसके शान्त उदितके उपपादनके लिये अनभिव्यक्ति दशामें भी उनकी सत्ताको सिद्ध करते हैं, स चेति — और वह धर्म शक्तिरूप फलकी उत्पत्तिसे उस समय अनुमित है, अव्यक्त अवस्थामें विद्यमान है । आकस्मिक माननेमें मिट्टीसे ही घटकी उत्पत्ति और तन्तुसे ही पटकी उत्पत्ति इत्यादि भेद फलकी उत्पत्तिमें न होने चाहिये । अतः अनादि कहना होगा; जब अनादि कहेंगे भी माननी पड़ेगी ( क्योंकि भाव वस्तु अनादि होनेपर अनन्त होती है यह नियम देखा तो अनन्तता जाता है ) एकत्व और अनेकत्वके वैधर्म्यसे भी धर्म - धर्मीके विवेकके लिये कहते हैं— एकस्येति एक धर्मीके अनेक भी देखे गये हैं । सूत्रके तात्पर्यके विषयधर्मसे धर्मीके विवेकका – वे धर्म पहिले धर्मोके ही अन्योन्यका प्रतिपादन करते हैं । तत्रेति – उन धर्मोक प्रतिपादन करके वर्तमानातिरिक्त धर्मान्तरोंसे, शान्त और अव्यपदेश्योंसे मध्यमें वर्तमान धर्म इसका वर्तमानत्व और अवर्तमानत्व वैधर्म्य है । वर्तमानका भेदित विवरण है, विवेचित है — है, भिन्न है; क्योंकि उनसे व्यापारका अनुभव करता हुआ । स्वव्यापारमनुभवन् – अपने ( ५०३ )