पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 521–530
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 521–530
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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ७
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥
( १७।४–६ ) सात्त्विक पुरुष देवताओंको पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसोंको और तामस पुरुष और प्रेतोंको पूजते हैं । जो लोग दम्भ और अहंकारसे युक्त होकर कामना, आसक्ति और बलके अभिमानपर भूत शास्त्रविरुद्ध घोर तप तपते हैं तथा जो मूर्ख शरीररूपसे स्थित भूतसमुदायको अर्थात् शरीर, इन्द्रिय और मन आदिके रूपोंमें परिणत हुए पाँचों पृथ्वी, जल आदि स्थूल भूतोंको और अन्तः - करणमें स्थित मुझ अन्तरात्माको भी व्यर्थ कष्ट देते हैं, उन अज्ञानियोंको आसुरी स्वभाववाला जान । यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥ * ( P ( गीता ९ ।२५ ) देवताओंको पूजनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं, अर्थात् उनका चित्त देवताओंके स्वरूपको धारण करता है । पितरों ( तथा यक्ष - राक्षस ) को पूजनेवाले पितरों ( तथा यक्ष - राक्षसों ) को प्राप्त होते हैं अर्थात् उनका चित्त पितर और यक्ष राक्षसोंके तदाकार हो जाता है । भूतोंको पूजनेवाले भूतों ( और प्रेतों ) को प्राप्त होते हैं अर्थात् उनका चित्त भूतों - प्रेतों - जैसे तामसी स्वभावमें परिणत हो जाता है और शुद्ध परब्रह्म परमात्माके उपासक उसको प्राप्त होते हैं अर्थात् वे शुद्ध परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें अवस्थित होते हैं । सङ्गति — शङ्का — योगके आठ अङ्गोंमेंसे केवल पहले पाँच अङ्गोंका साधनपादमें वर्णन किया गया । -धारणा, ध्यान और समाधिका क्यों नहीं किया? उत्तर — पहले पाँच अङ्ग समाधिके साक्षात् साधन नहीं बहिरङ्ग - साधन हैं । धारणा, ध्यान, समाधि अन्तरङ्ग साधन हैं । इसलिये इनका विभूतिपादमें लक्षण किया । इसीको अगले सूत्रमें बतलाते हैं-त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥ ७ ॥
शब्दार्थ – त्रयं अन्तरङ्गम् - ये तीनों अन्तरङ्ग हैं; पूर्वेभ्यः = पहलोंसे । अन्वयार्थ — पहलोंकी अपेक्षासे तीनों ( धारणा, ध्यान और समाधि ) अन्तरङ्ग हैं । व्याख्या — पहले पादमें बताये हुए यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहारकी अपेक्षासे ये तीनों धारणा, ध्यान और समाधि सम्प्रज्ञात - समाधिके अन्तरङ्ग हैं अर्थात् साधनीय सम्प्रज्ञात - समाधिका जो विषय है वही धारणादिका विषय है, इसलिये समान विषय होनेसे ये धारणादि तीनों सम्प्रज्ञात - समाधिके अन्तरङ्ग हैं और यम - नियमादि पाँचों यद्यपि चित्तको निर्मल बनाकर योगके उपयोगी बनाते हैं तथापि समान विषय न होनेसे बहिरङ्ग हैं, इसलिये इन पाँचोंको साधनपादमें और धारणादि तीनोंको विभूतिपादमें वर्णन किया । * यहाँ सांख्यकी निष्ठावाले अहङ्कारादेश ' माम् और मद् ' शुद्ध परब्रह्म परमात्माके बोधक हैं । ( विशेष षड्दर्शन - समन्वयके तीसरे और चौथे प्रकरणमें देखें ) । ( ४८४ )
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सूत्र ८ ] * तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य * [ विभूतिपाद सङ्गति — ये धारणादि तीनों भी निर्बीज - समाधिकी अपेक्षासे बहिरङ्ग हैं, यह अगले सूत्रमें बतलाते हैं-तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥ ८ ॥
शब्दार्थ – तत् अपि = वह ( धारणा, ध्यान, समाधि ) भी; बहिरङ्गम् - बाहरका अङ्ग है; निर्बीजस्य - असम्प्रज्ञात - समाधिका । अन्वयार्थ — वह धारणा, ध्यान, समाधि भी असम्प्रज्ञात - समाधिका बाहरका अङ्ग है । व्याख्या --- -ये धारणा, ध्यान, समाधि सम्प्रज्ञात - समाधिके अर्थात् सबीज - समाधिके अन्तरङ्ग हैं, पर असम्प्रज्ञात ( निर्बीज - समाधि ) के ये भी बहिरङ्ग साधन हैं । अर्थात् जिस प्रकार यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार परम्परासे उपकारक होते हुए भी समान विषय न होनेसे सम्प्रज्ञात - समाधिके बहिरङ्ग साधन हैं, उसी प्रकार धारणा, ध्यान, समाधि परम्परासे उपकारक होते हुए भी समान विषय न होनेसे त - समाधिके बहिरङ्ग साधन हैं । उसका साक्षात् साधन पर वैराग्य है । अर्थात् जो साधन असम्प्रज्ञात-साध्यके समान विषयवाला होता है अथवा जिस साधनके दृढ़ होनेके अनन्तर साध्यकी सिद्धि अवश्य ही हो, वह अन्तरङ्ग होता है । धारणा, ध्यानादि सालम्बन ( किसीको आलम्बन = सहारा = ध्येय बनाकर ) ध्येयरूप समान विषयवाले होते हैं और उनके दृढ़ होनेपर सम्प्रज्ञात - योग सिद्ध होता है, इसलिये वे सम्प्रज्ञात - समाधिके अन्तरङ्ग हैं । किंतु असम्प्रज्ञात -समाधि निरालम्बन ( बिना आलम्बन = सहारा = ध्येयके ) निर्विषय होती है और धारणादि संयमके दृढ़ होनेपर असम्प्रज्ञात - योग अवश्य ही सिद्ध हो जाय, ऐसा भी कोई निश्चित नियम नहीं है । इसलिये निर्बीज समाधिके प्रति धारणादि तीनों बहिरङ्ग हैं । इसका अन्तरङ्ग परवैराग्य है जो निर्बीज समाधिके सदृश निरालम्ब और निर्विषय है और जिसके दृढ़ होनेपर असम्प्रज्ञात -समाधि अवश्य ही सिद्ध होती है । सङ्गति — अब यह शङ्का होती है कि गुणकी वृत्ति चलायमान है अर्थात् वह एक क्षण भी बिना परिणाम नहीं रहती । चित्र त्रिगुणात्मक है, निर्बीज समाधिमें जब चित्त निरुद्ध हो जाता है, तब उसका परिणाम कैसा होता है? इसी शङ्काकी निवृत्तिमें अगले चार सूत्र हैं । परिणामोंका वर्णन तेरहवें सूत्रमें है । पर जबतक परिणामोंको ठीक - ठीक न जाँच लिया जाय उसके समझनेमें कठिनाई आयेगी । इस कारण उसका संक्षेपसे वर्णन करते हैं-परिणाम तीन प्रकारके हैं— धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम, अवस्थापरिणाम । ये तीन परिणाम तीनों गुणोंसे उत्पन्न हुए सब द्रव्योंमें पाये जाते हैं । जिसमें ये परिणाम होते हैं उसको धर्मी कहते हैं और वे परिणाम धर्म कहलाते हैं । निरपेक्ष धर्मी केवल कारणरूप प्रकृति है । अन्य उसके सब विकार लेकर पाँचों स्थूलभूतपर्यन्त सापेक्ष धर्मी हैं । इन धर्मियोंमें जिस प्रकार ये तीनों परिणाम होते महत्तत्त्वसे हैं उनको उदाहरण देकर समझाते हैं-१ धर्मपरिणाम – जैसे मिट्टीके गोले बनाकर कुम्भकार नाना प्रकारके वर्तन धर्मी है, उसमें नाना प्रकारके बर्तनके आकार जो क्रमके बदलनेसे बनाता है, यहाँ मिट्टी द्रव्य ज्यों - की - त्यों बनी रहती है, उसमें कोई परिणाम नहीं होता । यह बर्तनके हो आकार गये हैं, धर्म हैं । मिट्टी धर्मी बदलनेसे बने हैं, उसके धर्म हैं । इनमेंसे एक धर्मका दबना, दूसरे जो भिन्न प्रकारके क्रमके धर्म - परिणाम कहलाता है । धर्मका प्रकट होना मिट्टी धर्मीका ( ४८५ )
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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ९ २ लक्षणपरिणाम – ऊपर बतलाये हुए धर्मपरिणाममें बर्तन मिट्टीका एक नया आकार है । यह आकार उसमें छिपा हुआ था, अब प्रकट हो गया । ये बर्तनके आकार मिट्टीहीके धर्म हैं, जो उसमें छिपे रहते हैं । उस छिपे हुए धर्म ( आकार ) का प्रकट होना अर्थात् भविष्यसे वर्तमानमें आना लक्षण - परिणाम । लक्षण - परिणाम कालभेदसे होता है । बर्तनका आकार प्रकट होनेसे पहिले धर्मी मिट्टीमें छिपा था । जबतक प्रकट नहीं हुआ था, तबतक वह अनागत ( भविष्य ) लक्षणवाला था; जब प्रकट हो हुआ तब वर्तमान लक्षणवाला हो गया और जब टूटकर मिट्टीमें मिल गया, तब भूत लक्षणवाला हो गया, बर्तन तीनों कालमें मिट्टीमें वर्तमान है । भूत, भविष्य में छिपे रूपसे, वर्तमान में प्रकट रूपसे । इस गया प्रकार । कालभेदसे धर्मीमें तीन लक्षण - परिणाम होते हैं - अनागत ( भविष्य ) लक्षण - परिणाम, वर्तमान लक्षण - परिणाम, अतीत ( भूत ) लक्षण - परिणाम । ३ अवस्थापरिणाम — ऊपर बतला आये हैं कि बर्तनका प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण - परिणाम है । यह बर्तन ज्यों - ज्यों पुराना होता जाता है त्यों - त्यों जीर्ण होता चला जाता है, यहाँतक कि एक समय इतना जीर्ण हो जाता है कि हाथ लगानेसे टूटने लगता है । यह जीर्ण होनेकी अवस्था प्रतिक्षण होती रहती । इस कारण उसको अवस्थापरिणाम कहते हैं I इन परिणामोंमें धर्म और लक्षण - परिणाम वस्तुके उत्पत्ति - समयमें होता है और अवस्थापरिणाम उसके अन्त होनेतक होता रहता है । अन्य कई दर्शनोंमें गुण और गुणीको धर्म और धर्मी कहा गया है, परंतु योगदर्शनमें धर्म, धर्मी शब्द कार्य - कारण अर्थमें लाये गये हैं । व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥ ९ ॥
शब्दार्थ- व्युत्थान - निरोध- संस्कारयोः = व्युत्थानके और निरोधके संस्कारोंका; अभिभव-प्रादुर्भावौ = दबना और प्रकट होना; निरोधक्षण - चित्त - यह जो निरोधकालमें होनेवाले चित्तका ( दोनों संस्कारोंमें ); अन्वयः = अनुगत अर्थात् सम्बन्ध होना है; निरोधपरिणामः = वह निरोध परिणाम कहा जाता है । अन्वयार्थ – व्युत्थानके संस्कारका दबना और निरोधके संस्कारका प्रकट होना, यह जो निरोधकालमें होनेवाले चित्तका दोनों संस्कारोंमें अनुगत होना है, यह निरोध - परिणाम कहा जाता है । व्याख्या - व्युत्थान- क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त - इन तीन पूर्वोक्त भूमियोंको व्युत्थान कहते हैं । यह एकाग्रता ( सम्प्रज्ञात - समाधि ) की अपेक्षासे व्युत्थान है । निरोध ( असम्प्रज्ञात - समाधि ) की अपेक्षासे एकाग्रता ( सम्प्रज्ञात - समाधि ) भी व्युत्थानरूप ही है । इसलिये व्युत्थान पदका अर्थ यहाँ एकाग्रता ( सम्प्रज्ञात - समाधि ) जानना चाहिये । निरोध – व्याकरणकी रीतिसे यदि नि - पूर्वक रुध् धातुके आगे करणमें ' घञ् ' ' प्रत्यय ' मानें तो निरोध शब्दका अर्थ पर - वैराग्य होता है तथा पर - वैराग्यका संस्कार निरोध शब्दका अर्थ होता है; और यदि भावमें प्रत्यय मानें तो निरोध शब्दका अर्थ रुकना है । इसलिये सूत्रमें ' पहिले निरोध शब्दका अर्थ पर - वैराग्य है, ' ' दूसरे निरोध शब्दका अर्थ किसी वृत्तिका उदय न होना अर्थात् सब वृत्तियोंका रुक जाना ' और ' तीसरे निरोध पदका अर्थ पर - वैराग्यका संस्कार ' जानना चाहिये । ( ४८६ )
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सूत्र ९ ] व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोध ० [ विभूतिपाद * * अभिभव = छिपना = कार्य करनेकी सामर्थ्यसे रहित निर्बल रूपसे रहना । वर्तमानावस्थासे भूतावस्थामेंजाना । प्रादुर्भाव — अनागतावस्थासे वर्तमान कालमें प्रकटरूपसे आना । सा निरोधक्षणचित्तान्वय— निरोधकालमें होनेवाले धर्मी चित्तका अपने धर्म व्युत्थान ( एकाग्रता अर्थात् सम्प्रज्ञात - समाधि ) और निरोध ( पर - वैराग्य ) के संस्कारोंमें अनुगत होना । योगकी सिद्धियोंकी व्याख्या करनेकी इच्छासे सूत्रकार संयमका विषय शोधनेके लिये क्रमसे तीन परिणामोंको कहते हैं । इस सूत्रमें निरोध - परिणामका वर्णन है । निरोध - परिणाम - चित्त त्रिगुणात्मक होनेसे परिणामी है । उसमें प्रतिक्षण वृत्तिरूप परिणाम हो रहा है । निर्बीज समाधिमें व्युत्थानकी सारी वृत्तियाँ रुक जाती हैं और एकाग्रता - वृत्ति भी नहीं रहती । तब उस निरोधक्षणवाले चित्तमें कैसा परिणाम उस समय होता है? इसको इस प्रकार समझाते हैं-चित्त धर्मी है, व्युत्थान तथा एकाग्रताके संस्कार उसके धर्म हैं । ये संस्कार वृत्तिरूप नहीं हैं । जैसा कि व्यासभाष्यकारने कहा है-व्युत्थानसंस्काराश्चित्तधर्मा न ते प्रत्ययात्मकाः । इति प्रत्ययनिरोधे न निरुद्धाः । व्युत्थानके संस्कार चित्तके धर्म हैं, प्रत्ययात्मक अर्थात् वृत्तिरूप नहीं हैं । इसलिये त्तियोंके निरोध होनेपर भी इनका निरोध नहीं हो सकता । इसलिये वृत्तियोंके रुकनेपर ये संस्कार नहीं रुकते, धर्मी -चित्तमें बने रहते हैं । इसी प्रकार निरोध ( पर - वैराग्य ) के संस्कार भी चित्तके धर्म हैं । इन दोनों संस्काररूपी धर्मोंमेंसे एक धर्मका दबना, दूसरेका प्रकट होना चित्तरूपी धर्मीका धर्म - परिणाम है । निरोधक्षण ( निर्बीज - समाधिकालवाले ) चित्तके अंदर उस समय यह परिणाम होता है कि व्युत्थान ( एकाग्रता ) के संस्कार अभिभूत होते हैं ( दबते हैं ) और निरोध ( पर - वैराग्य ) के संस्कार प्रादुर्भूत होते हैं ( प्रकट होते हैं ) । व्युत्थानके संस्कार जो पहिले वर्तमानरूपमें थे, अब भूतरूपमें हो गये । यह उनका भूत लक्षण - परिणाम है और निरोधके संस्कार जो पहिले अनागतरूपमें थे, अब वर्तमानरूपमें हो गये । यह उनका वर्तमान लक्षण - परिणाम है । निरोध समयका धर्मी -चित्त अपने धर्म इन दोनों व्युत्थान ( एकाग्रता ) और निरोध ( पर - वैराग्य ) के संस्कारोंके बदलनेमें ( आविर्भाव - प्रादुर्भाव होनेमें ) अनुगत रहता है । इस प्रकार एक चित्तके एकाग्रता और पर वैराग्यके संस्कारोंका बदलना निरोध - परिणाम है । उस समय संस्कार शेषवाला चित्त होता है, जैसा कि ( १।१८ ) में बतलाया गया है कि असम्प्रज्ञात - समाधिमें चित्तके संस्कार शेष रहते हैं । शङ्का — वृत्तियोंसे संस्कार उत्पन्न होते हैं । जैसे व्युत्थानकी वृत्तियोंसे व्युत्थानके संस्कार, समाधि ( आरम्भ ) की वृत्तियोंसे समाधि ( आरम्भ ) के संस्कार, एकाग्रताकी वृत्तियोंसे एकाग्रताके संस्कार; और सब वृत्तियोंके निरोधका कारण जो पर - वैराग्य है उसकी वृत्तियोंसे पर - वैराग्य ( निरोध होते हैं । इसलिये वृत्तियाँ ही संस्कारोंके कारण हैं । निरोध अर्थात् असम्प्रज्ञात - ) के संस्कार उत्पन्न वृत्तिका भी निरोध हो जाता है, तब उसके कार्य निरोधके संस्कार कैसे शेष समाधिमें जब पर - वैराग्यकी रह सकते हैं । समाधान — कारण दो प्रकारके होते हैं — एक निमित्तकारण, जैसे कुलाल दूसरा उपादान, जैसे मिट्टी घटका उपादान कारण है । निमित्त कारणके अभावसे घटका कार्यका निमित्तकारण है, अभाव नहीं ( ४८७ )
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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १०-११ होता, केवल उसके आगेकी उत्पत्ति बंद हो जाती है, किंतु उपादान कारणके अभावमें कार्यका अभाव होता है । वृत्तियाँ संस्कारोंकी निमित्त कारण हैं, उपादान कारण नहीं हैं । संस्कारोंका उपादान कारण इस उपादान कारणको ही सांख्य तथा योगकी परिभाषामें धर्मी कहते हैं और उसके कार्योंको चित्त धर्म है ॥ इसलिये निरोधक्षण ( असम्प्रज्ञात -समाधि ) में सब वृत्तियोंके निरोधके निमित्त कारण पर - वैराग्यकी वृत्ति भी निवृत्त हो जाती है, पर उनके कार्य निरोध ( पर - वैराग्य ) के संस्कार वर्तमानरूपसे शेष रहते हैं; क्योंकि उनका उपादान कारण धर्मी- चित्त विद्यमान रहता है । कैवल्यमें जब चित्त अपने उपादान कारण धर्मीमें लय हो जाता है, तब उसके साथ उसके कार्य निरोधके संस्कार ( संस्कारशेष ) भी निवृत्त हो जाते हैं । सङ्गति — उस निरोध - संस्कारका फल कहते हैं— तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ १० ॥
शब्दार्थ — तस्य = उस ( चित्त ) का प्रशान्तवाहिता - प्रशान्त बहना; संस्कारात् = निरोध - संस्कारसे ( होता है ) । अन्वयार्थ – निरोध - संस्कारसे चित्तकी शान्त - प्रवाहवाली गति होती है । व्याख्या – प्रशान्तवाहिता निरोध - संस्कारके अभ्याससे जब निरोध- संस्कार प्रबल होता है, तब व्युत्थानके संस्कार सर्वथा दब जाते हैं और व्युत्थान - संस्काररूप मलसे रहित जो निर्मल निरोध - संस्कारोंकी परम्परा प्रवृत्ति होती है, यही चित्तका प्रशान्त या एकरस बहना, चित्तकी प्रशान्तवाहिता स्थिति है । भाष्यकार इस सूत्रका आशय यह बतलाते हैं कि निरोध - संस्कारोंके अभ्यासको दृढ़ करनेकी आवश्यकता है, जिससे चित्तकी प्रशान्तवाहिता स्थिति हो जाय; क्योंकि निरोधके संस्कार मन्द होते ही व्युत्थानके संस्कार उनको फिर दबा लेते हैं । यहाँ यह बात भी समझ लेनी चाहिये कि निरोध - समाधिके भङ्गतक, जो चित्तमें उन्हीं संस्कारोंके दृढ़ और दुर्बल होते हुए प्रशान्त प्रवाहका बहना है, वह उसका अवस्था - परिणाम है । सङ्गति — निरोध - परिणाम बताकर अब चित्तमें समाधि ( सम्प्रज्ञात ) परिणाम बताते हैं--सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ११ ॥
शब्दार्थ – सर्वार्थता - एकाग्रतयोः E सर्वार्थता और एकाग्रताका; क्षय - उदयौ = क्षय और उदय होना; चित्तस्य समाधिपरिणामः - चित्तका समाधि - अवस्थामें परिणाम है । अन्वयार्थ – चित्त ( धर्मी ) के सर्वार्थता और एकाग्रतारूप धर्मोंका ( क्रमसे ) नाश होना और प्रकट होना चित्तका समाधि - अवस्थामें परिणाम है । व्याख्या — सर्वार्थता = सब विषयोंकी ओर जाना । यह शब्द चित्तकी विक्षेप अवस्थाके लिये यहाँ आया है । विक्षेप अवस्थामें सत्त्वगुण प्रधान होता है पर रजोगुण बना रहता है और अपने कार्य करता रहता है । इस कारण चित्त सारे विषयोंकी ओर जाता है । यह अवस्था समाधिके आरम्भ - कालमें होती है । एकाप्रता — समाधिकी अवस्था जिसमें चित्त सब विषयोंको त्यागकर एक विषयपर टिकता है अर्थात् एक ही आलम्बन ( सहारा ) होनेपर सजातीय प्रवाहमें परिणत होना चित्तकी एकाग्रता कहलाती है 1 ( ४८८ )
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सूत्र १२-१३ ] * एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः * [ विभूतिपाद विक्षिप्तता और एकाग्रता दोनों चित्तके धर्म हैं, चित्त - धर्मी दोनोंमें अनुगत है । जब विक्षिप्तताका धर्म दबता है और एकाग्रताका धर्म प्रकट होता है, तब इस प्रकार दोनों धर्मोंमें अनुगत - धर्मी चित्तमें समाधि - परिणाम अर्थात् सम्प्रज्ञात - समाधि - कालमें होनेवाला चित्तका परिणाम है । चित्तका यह एकाग्रताका आकार धारण करना चित्तमें धर्म - परिणाम है । एकाग्रता जो चित्तकी सर्वार्थता ( विक्षिप्तता ) में अनागत रूपसे छिपी हुई थी अब वर्तमान रूपमें आ गयी । यह एकाग्रतारूप चित्त - धर्मीका वर्तमान लक्षण - परिणाम है! समाधि - परिणाम और निरोध परिणाममें भेद निरोध - परिणामसे समाधि - परिणाममें यह भेद है कि निरोध - परिणाममें व्युत्थान- ( एकाग्रता ) के संस्कारोंका अभिभव और निरोध - संस्कारोंका प्रादुर्भाव होता है और समाधि - परिणाममें संस्कारजनक जो व्युत्थान अर्थात् सर्वार्थतारूप चित्तका विक्षेप है उसका क्षय और एकाग्रतारूप धर्मका उदय होता है अर्थात् प्रथम सम्प्रज्ञातमें व्युत्थानका क्षय और एकाग्रताका उदय किया जाता है फिर असम्प्रज्ञातमें निरोध - संस्कारोंके प्रादुर्भावसे व्युत्थान ( एकाग्रता ) के संस्कारोंका भी तिरोभाव ( दबना ) होता है । सङ्गति — समाधि - अवस्थामें जब विक्षिप्तता बिलकुल दब जाती है, तब चित्तकी समाहित अवस्थामें एकाग्रता - परिणाम बताते हैं— ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥ १२ ॥
शब्दार्थ – ततः पुनः - तब फिर; शान्त - उदितौ = शान्त और उदय हुई; तुल्यप्रत्ययौ = समान वृत्तियाँ; चित्तस्य - एकाग्रतापरिणामः - चित्तका एकाग्र परिणाम है । = अन्वयार्थ — तब फिर समान वृत्तियोंका शान्त और उदय होना चित्तका एकाग्रता - परिणाम है । व्याख्या - समाहित चित्तकी वृत्तिविशेष ही एक प्रत्यय कहलाती है । यह अतीत ( भूत ) मार्गमें प्रविष्ट हुई शान्त और वर्तमान मार्गमें बर्तती हुई उदित कहलाती है । यह दोनों ही चित्तके समाहित होनेके कारण, तुल्य अर्थात् एक विषयको ही आलम्बन करनेसे सदृश - प्रत्यय हैं । इन दोनोंमें समाहित चित्तका अन्वयी ( अनुगत ) भावसे रहना एकाग्रता - परिणाम कहलाता है । अर्थात् समाधि - परिणामके अभ्यासबलसे जब चित्तका विक्षेप बिलकुल दब जाता है, तब वह समाहित हो जाता है । इस अवस्थामें भी चित्त बराबर बदलता रहता है; किंतु जिस प्रकार विक्षेपमें एक वस्तुको छोड़कर दूसरीको पकड़ता था, इस प्रकार समाहित अवस्थामें नहीं होता । इसमें जिस वस्तुको पकड़ता है उसीमें लगा रहता है । चित्तके बदलनेके कारण वृत्तियाँ बदलती तो हैं पर जैसी वृत्ति दबती है वैसी ही उदय होती रहती है, जबतक समाधि भङ्ग न हो जाय । यह धर्मी- चित्तका एकाग्रता - परिणाम है समाधिके भङ्ग होनेतक एकाग्रता प्रबल होती रहती है, उसके पश्चात् दुर्बल होती जाती है । यह उसकी अवस्थाका बदलना अवस्था - परिणाम है । साबधानी — सम्प्रज्ञात - समाधिकी प्राप्तिसे ही योगी अपने - आपको कृतकृत्य व्युत्थानके विक्षेपकी निवृत्तिके लिये असम्प्रज्ञात - समाधिका अनुष्ठान करना चाहिये न मान बैठे; किंतु सङ्गति – अब प्रसङ्गसे चित्तके सदृश ही भूत और इन्द्रियोंके परिणाम बताते हैं- । एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः शब्दार्थ — एतेन = इससे ही ( चित्तके परिणामसे ही ); भूत - इन्द्रियेषु - भूत और ॥ १३ ॥
इन्द्रियोंमें; धर्मलक्षण-( ४८ ९ )
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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १३ अवस्था - परिणामाः - व्याख्याताः = धर्म - परिणाम, लक्षण - परिणाम और अवस्था - परिणाम व्याख्यान किये जानने चाहिये । हु अन्वयार्थ — चित्तके परिणामसे ही भूतों और इन्द्रियोंमें धर्म, लक्षण और अवस्था - परिणाम व्याख्या किये गये जानने चाहिये । व्याख्या- - जिस प्रकार चित्तके धर्म, लक्षण और अवस्था - परिणाम होते हैं, इसी प्रकार पाँचों भूतों और इन्द्रियोंमें समझना चाहिये । यद्यपि पूर्व चार सूत्रोंमें धर्म, लक्षण और अवस्था - परिणामका नाम नहीं लिया गया है, तथापि उनमें चित्तके ये परिणाम दिखलाये गये हैं । पाठकोंके सुभीतेके लिये नवें सूत्रकी संगतिमें वे उदाहरणसहित समझा दिये गये हैं; और पिछले चार सूत्रोंमें चित्तके निरोध आदि परिणामोंमें भी इनको यथास्थान बतलाते चले आये हैं । यहाँ उनको संक्षेपसे फिर बतलाये देते हैं-धर्म - परिणाम – धर्मीके अवस्थित रहते हुए पूर्वधर्मकी निवृत्ति होनेपर उसके अन्य धर्मकी प्राप्ति होना धर्म - परिणाम है।— ( भोजवृत्ति ) चित्तमें धर्म - परिणाम- नवें सूत्रमें निरोध - परिणाममें धर्म - परिणाम बतला आये हैं । धर्मी -चित्तके दो धर्म व्युत्थान - संस्कार और निरोध - संस्कारमेंसे व्युत्थान - संस्कारका दबना और निरोध - संस्कारका प्रकट होना धर्मी - चित्तका धर्म- परिणाम है, इसी प्रकार सूत्र ग्यारहमें समाधि - परिणाममें धर्मी - चित्तके सर्वार्थता धर्मके दबने और एकाग्रता धर्मके प्रकट होनेमें धर्मी -चित्तका धर्म - परिणाम है । भूतोंमें धर्म - परिणाम - पृथ्वीका उदाहरण – मृत्तिकारूप धर्मीका पिण्डरूप धर्मको छोड़कर घटरूप धर्मको स्वीकार करना उसका धर्म - परिणाम है । इन्द्रियोंमें धर्म - परिणाम — नेत्रेन्द्रियका उदाहरण- — -धर्मी नेत्रका अपने धर्म नील, पीत, रूपादि विषयोंमेंसे एक रूपको छोड़कर दूसरे रूपका आलोचन - ज्ञान धर्म - परिणाम है । लक्षण - परिणाम – काल - परिणामको लक्षण - परिणाम कहते हैं । वह तीन भेदवाला है, अनागत ( भविष्य ), उदित ( वर्तमान ), अतीत ( भूत ) । प्रत्येक धर्म इन तीन लक्षणोंसे युक्त होता है I किसी धर्मका वर्तमान कालमें प्रकट होनेसे पहले भविष्यत् कालमें छिपा रहना उसका अनागत लक्षण - परिणाम है । उस धर्मका भविष्यकालको छोड़कर वर्तमानकालमें प्रगट होना वर्तमान लक्षण - परिणाम है और वर्तमान कालको छोड़कर भूतकालमें छिप जाना अतीत लक्षण - परिणाम है । सूत्र ९ में धर्मी -चित्तके निरोध - परिणाममें उसके दोनों धर्म, व्युत्थान- संस्कार तथा निरोध - संस्कार इन तीनों लक्षणोंसे युक्त हैं । उनमेंसे व्युत्थान - संस्कारका, वर्तमान लक्षणको छोड़कर, धर्मभावको न त्यागते हुए, अतीतकालमें छिप जाना उसका अतीत ( भूत ) लक्षण - परिणाम है । इसी प्रकार निरोध - संस्कारका अनागत मार्गको छोड़कर, धर्मभावको न छोड़ते हुए वर्तमानकालमें प्रकट होना, उसका वर्तमान लक्षण - परिणाम है । ऐसे ही सूत्र ग्यारहमें चित्तके समाधि - परिणाममें उसके धर्म सर्वार्थता और एकाग्रता दोनों लक्षणवाले हैं । उनमेंसे सर्वार्थताका वर्तमान लक्षणको त्यागकर धर्मभावको न छोड़ते हुए अतीत लक्षणको प्राप्त होना उसका अतीत लक्षण - परिणाम है और एकाग्रता धर्मका अनागत लक्षणको त्यागकर धर्मभावको न छोड़ते हुए वर्तमान लक्षणमें प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण - परिणाम है । मृत्तिकाके घटरूप धर्मका प्रकट होनेसे पहले, अनागत कालमें छिपा रहना उसका अनागत ( ४ ९ ० )
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सूत्र १३ ] एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः * * [ विभूतिपाद लक्षण - परिणाम है । अनागत लक्षणसे वर्तमानकालमें प्रकट होना वर्तमान लक्षण और घटरूप धर्मका वर्तमान लक्षणसे अतीत कालमें छिप जाना उसका अतीत लक्षण - परिणाम है । इसी प्रकार धर्मी नेत्रके, धर्मों अर्थात् नील, पीत रूपादि विषयोंके आलोचनमें इन तीनों लक्षण - परिणामोंको समझ लेना चाहिये । अर्थात् धर्मी नेत्रके धर्म नीलादि ज्ञानके प्रकट होनेसे पूर्व अनागत कालमें छिपा रहना उसका अनागत लक्षण - परिणाम है । अनागत कालसे वर्तमान कालमें प्रकट होना वर्तमान लक्षण - परिणाम है और वर्तमान कालसे अतीत मार्गमें छिप जाना अतीत लक्षण - परिणाम है । अवस्था - परिणाम – एक धर्मके अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें प्रकट होनेतक उसकी अवस्थाको दृढ़ करनेमें और इसी प्रकार वर्तमान लक्षणसे अतीत लक्षणमें जानेतक उसकी अवस्थाको दुर्बल करनेमें जो प्रतिक्षण परिणाम हो रहा है, वह अवस्था - परिणाम है । सूत्र १० में निरोध - समाधिके भङ्गतक जो निरोध संस्कारके प्रतिक्षण दृढ़ और उसके पश्चात् उनका दुर्बल होते हुए प्रशान्त प्रवाहका बहना है, वह उनका अवस्था - परिणाम है । इसी प्रकार मृत्तिकाके घटधर्मके अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें आनेतक और वर्तमान लक्षणसे अतीत लक्षणमें जानेतक उसकी अवस्थाको क्रमसे दृढ़ और दुर्बल करनेमें जो प्रतिक्षण परिणाम हो रहा है, वह घटधर्मका अवस्था - परिणाम है । ऐसे ही धर्मी नेत्रके धर्म नील, पीत, रूपादिक विषयके आलोचनमें अवस्था - परिणामको जानना चाहिये । अर्थात् वर्तमान लक्षणवाले नीलादि विषयके आलोचन ( ज्ञान ) रूप धर्मका स्फुटता - अस्फुटतारूप अवस्था - परिणाम है । धर्मीका धर्मोसे, धर्मका लक्षणों ( अनागत, वर्तमान, अतीत ) से और लक्षणोंका अवस्थासे परिणाम होता है । इस प्रकार गुणवृत्ति एक क्षण भी धर्म - लक्षण और अवस्था - परिणामसे शून्य नहीं रहती । गुणोंका स्वभाव ही प्रवृत्तिका कारण है 1 यथार्थमें यह सब एक ही परिणाम है । धर्मीका स्वरूपमात्र ही धर्म है, कोई भिन्न वस्तु नहीं; क्योंकि धर्मीका विकार ही धर्म नामसे कहा जाता है । धर्मीके विकाररूप धर्मका ही धर्मीमें वर्तमान रहते हुए, अतीत, अनागत, वर्तमान मार्गमें अन्यथा भाव होता है, न कि धर्मी द्रव्यका अन्यथापन होता है 1 । जैसे सुवर्णका कोई आभूषण तोड़कर अन्य प्रकारका आभूषण बनानेसे भूषण - आकार अन्यथा होता है, सुवर्णका स्वरूप नहीं बदलता, ज्यों - का - त्यों रहता है । इसी प्रकार चित्त आदि धर्मियोंका स्वरूप नहीं बदलता, उनके निरोध आदि धर्मोके भाव बदलते रहते हैं । भाष्यकारने प्रतिपक्षियोंकी शङ्काओंका युक्तिपूर्वक समाधान करते हुए स्वपक्षका विस्तारके वर्णन किया है । हमने सूत्र ९ की सङ्गति और इस सूत्रकी व्याख्या पर्याप्त समझकर विस्तारके साथ छोड़ दिया है । इतना और बतला देना आवश्यक है कि सांख्य तथा योगमें धर्मी उपादान - कारणके भयसे उसे है और धर्म उसका विकार कार्य है, वैशेषिकवालोंके गुणके अर्थमें नहीं है । अर्थमें टिप्पणी- व्यासभाष्यका भाषानुवाद। सूत्र १३ ॥ इस पूर्वोक्त धर्म - लक्षण और अवस्थारूप चित्तके परिणामसे लक्षण - परिणाम और अवस्थापरिणाम भी व्याख्यात समझने चाहिये । उनमें भूत और इन्द्रियोंमें धर्मपरिणाम, धर्मोंका अभिभाव और प्रादुर्भाव धर्मपरिणाम है । धर्मी में व्युत्थान और निरोध लक्षणपरिणाम - निरोध त्रिलक्षण होता है । तीन अध्व ( मार्ग ) सेयुक्त होता है, वह अनागत लक्षण ( ४ ९ १ )
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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप '* [ सूत्र १३ प्रथम अध्व ( मार्ग ) को छोड़कर धर्मत्वको न छोड़ता हुआ वर्तमान लक्षणको प्राप्त होता है, जहाँ कि इसकी स्वरूपसे अभिव्यक्ति होती है, यह इसका द्वितीय अध्व ( मार्ग ) है, वह अतीत और अनागत लक्षणसे वियुक्त नहीं है । तथा व्युत्थान त्रिलक्षण तीन अध्वसे युक्त होता है । वर्तमान लक्षणको छोड़कर धर्मत्वका परित्याग न करके अतीत लक्षणको प्राप्त होता है, यह इसका तृतीय अध्व है और वह वर्तमान और अनागत लक्षणसे जुदा नहीं है । इसी भाँति पुनः व्युत्थान उपसम्पाद्यमान अनागत लक्षणको छोड़कर धर्मत्वका उल्लङ्घन न करता हुआ वर्तमान लक्षणको प्राप्त हो जाता है, जहाँ कि इसके स्वरूपकी अभिव्यक्ति होनेपर व्यापार होता है । यह इसका द्वितीय अध्व है । वह अतीत और अनागत लक्षणसे वियुक्त नहीं है । इसी भाँति पुनः निरोध और पुनः व्युत्थान होता रहता है I तथा अवस्थापरिणाम होता है । उसमें निरोधके क्षणोंमें निरोधके संस्कार बलवान् होते हैं और व्युत्थानके संस्कार दुर्बल होते हैं, यह धर्मोंका अवस्थापरिणाम है । उसमें धर्मीका धर्मोसे परिणाम होता है, धर्मोका लक्षणोंसे परिणाम होता है और लक्षणोंका अवस्थाओंसे परिणाम होता है । इस भाँति धर्म, लक्षण और अवस्था - परिणामोंसे शून्य एक क्षण भी गुणोंकी वृत्ति नहीं रहती है; क्योंकि गुणोंकी वृत्ति चञ्चल स्वभाववाली है, गुणोंका गुणस्वभाव प्रवृत्तिका कारण कहा है, इससे भूत और इन्द्रियोंमें धर्म - धर्मी-भेदसे त्रिविध परिणाम जानना चाहिये और परमार्थसे तो एक ही परिणाम है । धर्मीका स्वरूपमात्र ही धर्म है, धर्मीकी विक्रिया ही यह धर्मद्वारा विस्तारसे कही है । उस धर्मीमें वर्तमान धर्मके ही अतीत, अनागत और वर्तमान अध्वोंमें भावका अन्यथात्व होता रहता है, द्रव्यका अन्यथात्व नहीं होता । जैसे सुवर्णपात्रको तोड़ अन्यथात्व करनेपर भावका अन्यथात्व होता है, सुवर्णका अन्यथात्व नहीं होता । दूसरे कहते हैं — धर्मसे धर्मी अन्यूनाधिक होता है, क्योंकि वह पूर्व तत्त्वका अतिक्रम नहीं करता । पूर्व, अपर अवस्था - भेदसे अनुपतित प्राप्त हुआ कौटस्थ्यसे परिवर्तित होगा, यदि वह अन्वयी है? समाधान — यह दोष नहीं है, क्योंकि यह बात एकान्ततः नहीं मानी है, यह त्रैलोक व्यक्तिसे च्युत होता है; क्योंकि इसके नित्यत्वका निषेध किया है, च्युत हुआ भी है; क्योंकि इसके विनाशका प्रतिषेध किया है, संसर्गसे इसकी सूक्ष्मता है और सूक्ष्म होनेसे उपलब्धि नहीं होती । लक्षणपरिणाम – धर्म अध्वोंमें वर्तमान अतीत होता है, अतीत लक्षणसे युक्त होता है, अनागत और वर्तमान लक्षणसे वियुक्त नहीं होता है तथा अनागत - अनागत लक्षणयुक्त होता है, वर्तमान और अतीतसे वियुक्त नहीं होता तथा वर्तमान- वर्तमान लक्षणसे युक्त होता है, अतीत और अनागत लक्षणसे वियुक्त नहीं होता, जैसे पुरुष एक स्त्रीमें रक्त है, वह शेषोंसे विरक्त नहीं है । यहाँ लक्षणपरिणाममें सर्वथा सर्व लक्षणोंके साथ योग होनेसे अध्वसंकर प्राप्त होता है । यह दूसरे दोष देते हैं? उसका यह परिहार है— धर्मोंका धर्मत्व अप्रसाध्य है, धर्मत्वके होनेपर ही लक्षण - भेद भी कहना होगा? उसको धर्मत्व वर्तमान समयमें ही नहीं है, इस भाँति ही चित्त रागधर्मवाला नहीं होगा; क्योंकि क्रोधके समय राग समुदाचार नहीं है । और भी? तीनों लक्षणोंका एक साथ एक व्यक्तिमें सम्भव नहीं? क्रमसे तो उसके व्यञ्जककी सहायतासे भाव हो सकता है । उक्तं च - रूपातिशय और वृत्ति - अतिशय दोष नहीं हैं । जैसे परस्पर विरोधी हैं । सामान्य तो अतिशयके साथ रहा करते हैं, इस कारणसे संकर सामान्यसे रागका ही कहीं समुदाचार है, इसलिये उस समय अन्यत्र अभाव नहीं है; किंतु केवल ( ४ ९ २ )
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सूत्र १३ ] एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः * * [ विभूतिपाद समन्वागत है । अतः उस समय उसका वहाँ भाव है तथा लक्षणका भी भाव है । धर्मी - त्रि - अध्व ( तीन मार्गवाला ) नहीं होता । धर्म - त्रि - अध्व हुआ करते हैं । वे धर्म लक्षित और अलक्षित उस - उस अवस्थाको प्राप्त हुए अवस्थान्तरके कारण अन्यत्व निर्देश किये जाते हैं, द्रव्यान्तरसे नहीं । जैसे एक रेखा शत स्थानमें शत, दस स्थानमें दस और एक स्थानमें एक होती है, जैसे एकत्व होनेपर भी एक स्त्री माता कहलाती है, पुत्री कहलाती है, बहन कहलाती है । अवस्थापरिणाममें कौटस्थ्यप्रसङ्गदोष कुछ लोगोंने कहा है, किस प्रकार कि अध्वोंके व्यापारसे व्यवहित होनेसे जब धर्म अपने व्यापारको नहीं करता, तब अनागत है; जब करता है, तब वर्तमान है; जब करके निवृत्त हो जाता है, तब अतीत है । इस प्रकार धर्म और धर्मी, लक्षण और अवस्था इन सबको कूटस्थ मानना पड़ेगा — यह दूसरे सज्जन दोष देते हैं । वह दोष नहीं है; क्योंकि गुणोंके नित्य होनेपर भी गुणोंके विमर्द - विनाशकी विचित्रता है । जैसे विनाशी और अविनाशी शब्द आदिकोंका आदिमत् संस्थान धर्ममात्र होता है, वैसे ही विनाशी और अविनाशी सत्त्व आदि गुणोंका आदिमान् लिंग धर्ममात्र है, उसमें विकार संज्ञा है ( उसीको विकार कहते हैं ) 1 । उसमें यह उदाहरण है – मिट्टी धर्मी अपने पिण्डाकार धर्मसे धर्मान्तरको प्राप्त होता हुआ धर्मसे परिणत घटाकार होता है । यह घटाकार अनागत - लक्षण ( काल ) को छोड़कर वर्तमान लक्षण ( काल ) में आ गया है । यह लक्षणसे परिणाम होता है — घट नवीनता और पुराणताका प्रतिक्षण अनुभव करता हुआ अवस्थापरिणामको प्राप्त होता है — यह धर्मीकी भी धर्मान्तर अवस्था है और धर्मकी लक्षणान्तर अवस्था । यह एक ही द्रव्यको परिणामभेदसे दिखलाया है । इसी भाँति पदार्थान्तरमें भी योजित कर लेना चाहिये । धर्म, लक्षण और अवस्था - परिणाम धर्मीके स्वरूपका उल्लङ्घन न करते हुए है, इससे एक ही परिणाम उन सब विशेषोंको व्याप्त कर रहा है । अब यह परिणाम क्या है? इसका उत्तर देते हैं-अवस्थित द्रव्यके पूर्व धर्मकी निवृत्ति होनेपर धर्मान्तरकी उत्पत्ति ( प्रादुर्भाव ) परिणाम है ॥ १३ ॥
' वार्त्तिक ' का भाषानुवाद । सूत्र १३ ॥
इस प्रकार योग और योगके अङ्गोंके परिणामरूपकी विलक्षणता उनके विवेकके लिये दिखला दी है । इसी रीतिसे व्युत्थानकालीन चित्तके परिणाम भी व्याख्यातप्राय ही हैं । यहाँसे ' परिणामत्रयसंयमात् ' इस आगामी सूत्रकी उपोद्घात संगतिसे सर्वत्र वैराग्यरूपी अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये चित्तवत् ही अन्योंमें भी अतिदेशसे ही परिणामोंकी व्याख्या सूत्रकार करते हैं । ' एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ' धर्मोसे, लक्षणोंसे और अवस्थाओंसे जो परिणाम हैं, वे धर्मलक्षणावस्था परिणाम हैं । उनकी भाष्यमें व्याख्या करनी है । यही परिणाम भूत और इन्द्रियोंमें होते हैं, कोई तत्त्वान्तर परिणाम नहीं होते । इस असाधारण आशयसे ही परिणाम नहीं कहे । इससे तत्त्वान्तर - परिणामवत् ये परिणाम भी सब ही यथायोग्य यहाँ प्रकृति आदिमें जानने चाहिये, ऐसा ही भाष्यकार कहेंगे । इस प्रकार धर्म, लक्षण और प्रकृति आदिमें भी भी गुण वृत्त नहीं ठहरता ( नहीं रहता ) -इससे सर्व वस्तुओंमें तीन परिणाम अवस्था हैं - परिणामोंमें शून्य क्षणभर हैं — एतेनेति ( इस पूर्वोक्त धर्मलक्षण और अवस्थारूप चित्तके परिणामसे । सूत्रकी व्याख्या करते भूत और इन्द्रियोंमें ( ४ ९ ३ )