पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 551–560

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १७ समाधान – ' वर्णाः पुनरित्यादि ' यहाँसे लेकर संकेत्यते इस पर्यन्त वाक्यसे समाधान -उसका अर्थ यह है, यद्यपि वर्ण पदसे भिन्न हैं, तथापि अवस्था और अवस्थावालेके अभेदकी किया है । है । ( अभेद भी है ) अतः एक - एक भी वर्ण पदरूप है — पदसे अभिन्न है । जैसे कि बीज भी सत्ता और • अङ्कुर वृक्षसे अभिन्न होते हैं । इसीलिये पदरूपसे सर्व पदार्थोंके अभिधानकी योग्यतासे सम्पन्न होते हेतु कहते हैं — सहकारीति पदभावमें सहकारी जो वर्णान्तर उनका प्रतियोगी - सम्बन्धी होनेसे हैं । इसमें रूपताको प्राप्तकी भाँति आपन्न होता है ( बन जाता है ) -यहाँ इव शब्दका प्रयोग अनन्त भाष्यकारसे पद-वैश्वरूप्यकी योग्यतामात्रके प्रतिपादनके लिये किया है । वैश्वरूप्यका प्रकार कहते हैं - पूर्व गकार उत्तर और इस वर्णद्वयके साथ गण इत्यादि होता है ( पृथक् होता है ) । उत्तर विसर्जनीय, पूर्व गौ इन वर्णद्वयसे ' गौः ' इत्यादि पदोंसे व्यावृत्त पदसे व्यावृत्त होकर ( पृथक् होकर ) विशेष ‘ गौ: ' इस अखण्ड स्फोट पदमें तादात्म्यसे ( अभेद रूपसे ) अवस्थापित होता है । इस हेतुसे इस प्रकारके क्रमानुरोधी बहुत - से वर्ण, आनुपूर्वी - विशेषकी अपेक्षा रखनेवाले, पदके अभेदसे अर्थ - संकेतसे अवच्छिन्न ( युक्त ) नियमित होकर सर्व - अभिधानमें समर्थ भी इतने, इतने संख्यावाले ये गकारादि गौको ही अवस्थापित करते हैं ( गौका कथन करते हैं ) अतः उस प्रकारसे वर्ण मुखसे, वह पद ही अविवेकसे संकेत किया जाता है – यह भाष्यका अन्वय है । उसमें हेतु है वाच्यस्य वाचकमिति -पद ही वाच्यका वाचक है— उपस्थापक है ( वाच्यको कहनेवाला है ) । अन्यका अन्य रूपसे संकेतमें हेतु है । ' एतेषाम् ' से लेकर ' निभासः ' तक । जो पद नामक बुद्धिमात्रग्राह्य अर्थसंकेतसे अवच्छिन्न ( युक्त ) इन वर्णोंका स्फोट है, तथा समाप्त ध्वनिजन्य क्रम आनुपूर्वी विशेष जिन उस प्रकारके वर्णोंकी है, वह एक है, अभिन्न है, यह पदके स्वरूपका कथन किया है । वाक्यार्थ समाप्त हुआ । भाव यह है कि जैसे मिले हुए दो कपाल जल लानेके हेतु होते हैं - यह अविवेकसे बालकोंके लिये कहा जाय, क्योंकि पटसे घटको पृथक् करनेवाला अन्य असम्भव है, उससे बालक कपालके अविवेकसे घटको ही जल लानेका हेतु समझता है । ऐसे ही स्फोटान्तरके व्यावर्तनके लिये वर्णोंके अविवेकसे ही स्फोटमें संकेतका उपदेश और संकेतका ग्रहण होता है, अतः वर्णोंमें संकेतताकी अनुपपत्ति असिद्ध नहीं है । त्रिविध शब्दको दर्शाकर अब उनमेंसे संकेतके कारणका प्रतिपादन करते हैं, तदेकमिति - प्रतीयते, इसके साथ अन्वय है । अर्थ यह है, यद्यपि वह पद स्फोट नामक एक ही है, वर्णोंके समान अनेक नहीं है, और एकत्वमें प्रमाण है एक बुद्धिविषयत्व, तथा वक्ताके एक ही प्रयत्नसे ध्वनि आदिद्वारा उत्पादित है ( उत्पन्न होता है ), वर्ण तो प्रयत्नभेदसे भी उत्पन्न होते हैं, तथा यह पद अभाग है, निरंश है । वर्णसमूह तो वनके सदृश सांश है, तथा यह पद ( स्फोट ) अक्रम है, एक कालमें ही उत्पद्यमान है । वर्णोंके समान क्रमसे उत्पन्न नहीं होता, अतः इन हेतुओंसे पद स्फोट वर्णोंसे भिन्न है । किं च – स्फोट बौद्ध है, बुद्धिमात्रसे ग्राह्य है तथा अन्त्य वर्णके प्रत्ययरूप व्यापारसे व्यक्त होता है, वर्ण ऐसे नहीं हैं तो भी दूसरोंके प्रति प्रतिपादनकी इच्छासे वक्ताके बोले और श्रोताके सुने इस प्रकारके वर्णोंके द्वारा ही सिद्धवत्, परमार्थवत् एक - दूसरेकी सम्प्रतिपत्तिके संवारसे प्रतीत होते हैं, व्यवहारमें आते हैं, वर्णोंसे भिन्नरूपसे व्यवहारमें नहीं आते, उसमें हेतु है – अनादि वाग् व्यवहारकी वासनाओंसे वशीकृत लौकिक बुद्धि । यहाँ ‘ अभिधीयमानैः ' इससे पदके वाग् - इन्द्रियविषयक वर्णोंका अविवेक समझना चाहिये और ' श्रूयमाणैः ' इससे पदके श्रोत्रविषयक शब्दका अविवेक जानना चाहिये । . पा ० यो ० प्र ० १८-( ५१४ )

पृष्ठ 552

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शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराभ्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् [ विभूतिपाद सूत्र १७ ] * इस प्रकार तीन प्रकारके शब्दोंके अन्योन्याध्याससे संकरको दर्शाया है । अब त्रिविध शब्दसे अर्थ और प्रत्ययके अभ्यासका प्रतिपादन करनेके लिये शब्द व्यवहारके संकेत ग्रहमूलक होनेको कहते हैं —उस पदका प्रविभाग विषयकी व्यवस्थाके संकेतके ग्रहणसे ही होता है । प्रविभागको ही कहते तस्येति-हैं एतावतामिति — इतने वर्णोंका, इस प्रकारका, ऐसा आनुपूर्वीवाला अनुसंहार - मिलन, इस अर्थका वाचक है, उपस्थापक है, इस भाँतिका विभाग होता है एकस्यार्थस्य - इस प्रकारका पाठ मानें तो उसका अर्थ होता है — अर्थविशेषका । संकेतका शब्दार्थ कहते हैं— ' संकेतस्त्विति ' अध्यास संकेतकर्ताका आहार्य आरोप है जिसका अर्थ है आरोपितका अभेद, उसहीका ज्ञान पदार्थका उपस्थापक होता है, उसमें आधुनिकोंकी कल्पनाकी व्यावृत्तिके लिये स्मृत्यात्मक पदका प्रयोग है, अतः विषय और विषयीके अभेदसे पाणिनि आदिकी स्मृति है । यह भी नहीं कह सकते कि कल्पित अभेद असत्से वह असत् संकेत कैसे हो सकता है? क्योंकि असत् - ख्याति तो स्वीकार ही नहीं है, अन्यत्र सत् - अभेदकी अन्यत्र कल्पना होती है, ( अन्यत्र सत् - रजतकी अन्यत्र सीपमें कल्पना होती है ) अध्यासके संकेतत्वमें प्रमाण कहते हैं— ' योऽयं शब्दः ' इससे लेकर ' भवति ' तक । ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म इत्यादि शास्त्रोंमें, कम्बुग्रीवादिमान् घटः इत्यादि लोकमें पद और पदार्थका अभेद आरोप ही संकेत दिखलायी देता है, क्योंकि ओमित्यादिके शब्द वाच्यत्वकी लक्षणामें कोई प्रमाण नहीं है, अतएव कोशोंमें ' अमरा निर्जरा देवाः ' इत्यादि शब्द और अर्थका आरोप्यमाण अभेद ही संकेत दिखायी देता है, अतएव इस अनादि अभेदके आरोपसे आगमी लोग मन्त्र और अर्थके अभेद-उपासनाका उपदेश करते हैं, और मीमांसक मन्त्रमयी देवता कहते हैं । जो तो- -इस शब्दसे यह अर्थ जानना चाहिये इस प्रकारकी ईश्वरकी इच्छाका विषयशक्ति दूसरे तन्त्रोंमें लक्षित है वह अप्रमाणिकी है और लक्षणाशक्ति - जैसी ही है । दूसरी बात यह है कि ईश्वरको न जाननेवालेको भी शब्दार्थ प्रत्यय देखा जाता है तथा पद और पदार्थके अभेदसे संकेत भी युक्त न हो सकेगा, इत्यादि दोष जान लेने चाहिये । अब संकेत बुद्धिनिमित्तक तीनोंका संकेत है । इसको कहते हैं एवमेव इति – इस प्रकार संकेत -बुद्धिके कारणसे वे तीन प्रकारके शब्द, अर्थ और प्रत्यय संकीर्ण - अविविक्त हैं, उनमें संकेतका ग्रह ही शब्द और अर्थका इतरेतर अध्यास है, क्योंकि शब्द और अर्थका तो प्रत्ययके साथ एकाकार होनेसे अन्योन्याध्यास प्रसिद्ध ही है । यह भाव है । संकरके आकारको कहते हैं - गौरिति य इति - वह ही शब्द आदिका तत्त्वज्ञ है अन्य नहीं । वर्ण, ध्वनि पदोंके अन्योन्य संकरकी भाँति अब पद - वाक्य और उनके अर्थोंके संकरसे भी शब्द -अर्थ और प्रत्ययोंका संकर दिखलाते हैं सर्वपदेष्विति वाक्यकी शक्तिपदार्थान्तर के सहकारसे वाक्यभवन शक्ति है ( वाक्य बननेकी शक्ति है ) तथा वृक्ष इत्यादि पदोंकी ' वृक्षोऽस्ति ' ( वृक्ष है ), वृक्षश्चलति ( वृक्ष चलता है ), है ) इत्यादि वाक्योंसे संकर – अविवेक होता है यह भाव है । पदोंमें वाक्यशक्तिका वृक्षच्छिद्यते उदाहरण ( वृक्ष कटता हैं — वृक्ष - इत्युक्त - इति वृक्ष ऐसा कहनेपर आकांक्षाको पूर्ण करनेके लिये योग्यता आदिके वशसे अस्ति ( है देते ) इस क्रियाका अध्याहार होता है । तथा पदमें वाक्यका संकर है यह भाव है । शंका – शब्दका अध्याहार सम्भव नहीं है क्योंकि एक ही अर्थमें अनन्त शब्दोंका प्रयोग और किसी विशेष शब्दका अनुमापक लिङ्ग उपस्थित नहीं है । होता है ( ५१५ )

पृष्ठ 553

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १७ समाधान — यह बात नहीं है क्योंकि अपनी इच्छासे स्वयं कल्पित किसी भी आकांक्षाके पूरक शब्दसे वक्ताके तात्पर्यविषयक अर्थका बोध हो सकता है, अर्थविशेषके अनुमानमें तो योग्यता, आकांक्षा, तात्पर्यादिक लिङ्ग हैं ही । यही कहते हैं, ' न सत्तामिति ' योग्यताके दिखलानेसे आकांक्षा, तात्पर्य आदि भी उपलक्षित हो गये हैं, क्योंकि केवल योग्यता तो अर्थान्तरमें भी साधारण है, उदाहरणान्तर कहते हैं, नहीति- - असाधन- कारकरहित कोई क्रिया तथा नहीं होती, पचति कहनेपर सब कारकोंका आक्षेप, अर्थात् अनुमान होता है । शङ्का— यह बात है तो कारकवाचक पदोंका कहीं भी प्रयोग नहीं होगा? समाधान - नियमाय इति - कारकवाचक पदोंका नियमके लिये अनुवाद होता है, योग्यता आदिसे सर्वत्र विशेष अर्थका अनुमान सम्भव नहीं है, अतः अनुमित कारकोंका भी सामान्यसे ' नियमार्थ - दूसरे कारकोंसे व्यावृत्ति ( पृथक् करनेके लिये ) प्रयोग होता है ' चैत्रोऽग्निना भजनम् - इत्यादि पदोंसे चैत्र, अग्नि, भजन इस कर्ता, करण, कर्मका अनुवाद है! अब अध्याहारके बिना भी अर्थके अभेदनिमित्तक पद और वाक्यके संकरको दिखलाते हैं, दृष्टश्चेति छन्दोऽधीते ( छन्द पढ़ता है ) इस वाक्यके अर्थमें श्रोत्रिय इस पदकी- - तथा प्राणान् धारयति - ( प्राणोंको धारण करता है ) इस वाक्यके अर्थमें जीवति इस पदका वचन है— कथन है ।

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते ।

विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते ॥

जन्मसे ब्राह्मण जानना चाहिये और संस्कार ( यज्ञोपवीत - संस्कार ) से द्विज कहा जाता है, विद्यासे विप्रत्वको पाता है और तीनोंसे ( जन्म, संस्कार और विद्या - वेद - विद्यासे ) श्रोत्रिय कहलाता है । इस स्मृति - प्रमाणसे और जीव - बलप्राणधारयोः उस अनुशासनसे ( साधुपाठ प्रमाणसे ) । शङ्का— यदि वाक्यार्थकी सिद्धि पदसे भी होती है तो ' गुरुतरस्य छन्दोऽधीते ' इस वाक्यका वचन कभी भी न होगा? समाधान - तत्र वाक्य इति — उस वाक्यमें पदके अर्थकी अभिव्यक्ति होती है, ( उससे पदका विभाग करके क्रियावाचक है या कारकवाचक है विवरण करना चाहिये ) अतः पद और वाक्यके संकरसे संशयके स्थलमें पदका वाक्यसे विवरण करना चाहिये । प्रसंगसे कहते हैं, तत इति — क्योंकि वाक्यार्थमें भी पदरचना होती है । अतः संदेहस्थलमें पदका अंश भेदोंके द्वारा वाक्यसे विवरण करना चाहिये । व्याकरण न होनेपर अर्थका बोध न होनेसे वाक्यका व्यवहार ही व्यर्थ हो जायगा । इसके लिये कहते हैं, अन्यथेति - भवति - यह प्रयोग करनेपर नाम और आख्यातके समान रूप होनेसे ‘ भवति घटः ', ' भवति भिक्षां देहि ' इन दो अर्थोंमें संदेह होनेपर अनवधारित पदका किस प्रकार किस प्रयोजनसे क्रिया या कारकमें विवरण किया जाय? श्रोताको अर्थका ज्ञान असम्भव है, इसी भाँति ' अश्व ' यह कहनेपर ‘ गतिमकार्षीर्घोटको वा ' चला था या घोड़ा है, यह संदेह होता है; क्योंकि नाम और आख्यातमें समानरूपता है । तथा ' अजापयः ' यह कहनेपर ' छाग्याः पयः " शत्रून् पराभावितवान् वा ' इस अर्थमें संदेह अब होता है, क्योंकि नाम और आख्यात समान रूप है । इस प्रकार अर्थ और प्रत्ययोंके संकरको दिखलाकर प्रविभागको दिखलाते हैं, तेषामित्यादि से उनमेंसे पहले शब्दका भेद होनेपर भी अर्थ और ( ५१६ )

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शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् [ विभूतिपाद सूत्र १७ ] * प्रत्ययके अभेदसे शब्द और अर्थके भेदको दिखलाते हैं— ' श्वेतते ' इससे लेकर ' प्रत्ययश्च ' इसतकसे ( श्वेतते प्रासादः ) यह क्रियाका अर्थ है, ( श्वेतः प्रासादः ) यह कारकका अर्थ है – शब्द क्रिया कारक रूप है, उस शब्दका अर्थ और प्रत्यय ( ज्ञान होता है — यह भाष्य है ) क्रियासे साध्यरूप है अर्थ जिसका वह क्रियाका अर्थ है । ‘ श्वेतते ' यह उसका शब्द है, तथा ' कारकः ' सिद्धरूप है अर्थ जिसका वह कारकार्थ है — श्वेतः — यह उसका शब्द है । ये शब्द भिन्न हैं, इनका अर्थ क्रिया कारकरूप श्वेतगुणमात्र एक ही है, इसी प्रकार प्रत्यय भी जानना चाहिये । क्रिया कारकात्मक गुणाकार है । इसमें प्रमाण पूछते हैं, कस्मात् इति — किस प्रकार? उत्तर देते हैं, सोऽयमित्यभिसम्बन्धात् - यह वही है इस सम्बन्धसे क्रिया कारकात्मक गुणाकार है, श्वेतन जो क्रिया है वही यह श्वेतरूपकारक गुण है, और जो ' श्वेतते ' इससे श्वेताकार प्रत्यय है वही प्रत्यय ' श्वेतः ' इस शब्दसे भी श्वेताकार प्रत्यय ही अभेदकी प्रत्यभिज्ञासे होता है । शब्द और अर्थके अभेदसे संकेत कैसे होता है? इस विषयमें कहते हैं- एकाकार इति — एकाकार — आरोपरूप प्रत्यय ही संकेतसे आरोपितके अभेदमें ही संकेत है, पारमार्थिक अभेदरूपमें संकेत नहीं है - शब्द और अर्थके अभेद प्रत्ययसे प्रत्यभिज्ञाका ही बाध क्यों नहीं हो जाता? शङ्का-समाधान — तत्राह — यस्त्विति – जो श्वेत अर्थ है वह शब्द और प्रत्यय ( ज्ञान ) का विषय होनेसे -अपनी शब्द आदिसे भिन्न नयी - पुरानी अवस्थाओंसे विक्रियमाण होनेसे शब्द और प्रत्ययके सहगत ( साथ ) नहीं रहता, कालसे —- कालरूप अधिकरणके भिन्न होनेसे सहचार नहीं रहता । ऐसे ही देशसे भी सहचार नहीं रहता, क्योंकि शब्दका अधिकरण आकाश है और प्रत्यय ( ज्ञान ) का अधिकरण बुद्धि है और अर्थ श्वेत गुणादि प्रासाद आदिमें रहते हैं । यह भाव है । एवमिति – इस प्रकार शब्द भी अपनी अवस्थाओंसे विक्रियमाण अर्थ और बुद्धिका भी सहचारी नहीं है, इस प्रकार प्रत्यय ( ज्ञान ) भी शब्द और अर्थका सहचारी नहीं रहता । उपसंहार करते हैं — इत्यन्यथेति - अन्यथा शब्द है, अन्यथा अर्थ है और अन्यथा प्रत्यय है— यह विभाग है । सूत्रके अर्थका उपसंहार करते हैं — एवं – तत्प्रविभागेति ( इस प्रकार उनके विभागमें ) संयम करनेसे योगीको सब भूतोंके शब्दका ज्ञान होता है । इस प्रकार मनुष्यके विषयमें शब्द, अर्थ और प्रत्ययोंमें ( जो प्रविभाग है ) उसमें संयम करनेसे -साक्षात् पर्यन्त संयम करनेसे सब भूतोंके शब्द, उसके अर्थ और प्रत्यय ( ज्ञान ) को योगी जान लेता है; क्योंकि योगज धर्म अचिन्त्य शक्तिवाला है, स्वसदृश फल देना धर्मोंका स्वाभाविक है । हमारे सदृशोंको शब्द, अर्थ और प्रत्ययके भेदका साक्षात्कार होनेपर भी उस साक्षात्कारके संयमजन्य न होनेके कारण सब भूतोंके शब्दका ज्ञान नहीं होता, संयमकी ही यह सिद्धि है — ऐसे ही अगले सूत्रोंमें भी यथास्थल यही समाधान है ॥ १७ ॥

विशेष वर्णन— ॥ सूत्र १७ ॥ शब्द तीन प्रकारका है— १ – वर्णात्मक ( क, ग आदि ) जो वाणीरूप इन्द्रियसे उत्पन्न होता है । २. - ध्वन्यात्मक वा नादात्मक ( शङ्ख आदिका शब्द ) यह प्रयत्न - प्रेरित परिणाम - विशेष है । यही शब्दोंकी धाराको उत्पन्न करता हुआ श्रोताके श्रोत्र उदान वायुका ३ – स्फोट नामक शब्द ( स्फुटत्यर्थोऽस्मादिति स्फोटः ) यह अर्थका बोधक - इन्द्रियतक और जाता केवल है बुद्धिसे । ( ५१७ )

पृष्ठ 555

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप [ सूत्र १८ * ***** गृहीत होता है । निरवयव, नित्य और निष्क्रम है । वर्ण शीघ्र उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं । इनका मेल नहीं हो सकता; क्योंकि ‘ गौ ’ यहाँपर गकारोच्चारणके समयमें औकार नहीं और औकारके उच्चारणके समयमें गकार नहीं इत्यादि 1 । मेल न होनेपर भी, वर्णोंके संस्कार और उन संस्कारोंसे स्मृति होती है । अन्तिम वर्ण ( जैसे ' पचति ' में इकार ) स्फोटका व्यञ्जक है । यदि इसे न माना जाय तो ' गौः ' यह एक पद है; ऐसा व्यवहार नहीं हो सकता; क्योंकि एकताको ग्रहण करनेवाली बुद्धि न वर्णोंमें ( जो विनाशी है ) हो सकती है और न स्फोटबोधक ध्वनिमें, यह स्फोट नामक शब्द दो प्रकारका है— पद - स्फोट और वाक्य - स्फोट ( स्फोटका विषय नागेशकृत मञ्जूषा और वैयाकरणभूषणमें विस्तृतरूपसे लिखा है; व्याकरणाचार्य और योगाचार्य – इनका स्फोट - विषयमें एक मत है । नैयायिक शब्दमात्रको अनित्य मानते हैं । मीमांसक शब्दोंको नित्य मानते हैं, उत्तर मीमांसक ' वेदान्ती ' शब्दोंको आपेक्षिक नित्य मानते हैं; ये सब स्फोटवादी नहीं हैं ) । स्फोटका बड़ा शास्त्रार्थ है । इन तीनों अर्थात् शब्द, अर्थ और ज्ञानका परस्पर अध्यास ( भिन्नोंमें अभिन्न बुद्धि ) होता है । आरोपको अर्थात् अन्यमें अन्य बुद्धि करनेको अध्यास कहते हैं । इन शब्दोंका अर्थ और ज्ञानके साथ संकेतरूप ( इस पदका यह अर्थ है एतद्रूप ) अध्यास है । पर वस्तुतः शब्द, अर्थ, प्रत्यय तीनों भिन्न हैं । जब उनके भेदमें योगी चित्तकी एकाग्रता करता है, तब उनका प्रत्यक्ष कर वानर, कौवे आदिकी बोलीको जान लेता है कि इस अर्थको लेकर ये बोल रहे हैं । योगियोंमें विचित्र शक्ति होती है । धारणा, ध्यान और समाधिकी बड़ी महिमा है । साधारण लोगोंको जो शब्द, अर्थ और ज्ञानका भेद प्रतीत होता है वह समाधिजन्य नहीं है, इससे वे नहीं जान सकते । सङ्गति – दूसरी सिद्धि कहते हैं— संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥ १८ ॥

शब्दार्थ – संस्कार - साक्षात् करणात् - संस्कारके साक्षात् करनेसे; पूर्वजातिज्ञानम् - पूर्वजन्मका ज्ञान होता है । अन्वयार्थ —– संस्कारके साक्षात् करनेसे पूर्वजन्मका ज्ञान होता है । व्याख्या — संस्कार दो प्रकारके होते हैं, एक स्मृतिके बीजरूपसे रहते हैं जो स्मृति और क्लेशोंके कारण हैं । दूसरे विपाकके कारण वासनारूपसे रहते हैं जो जन्म, आयु, भोग और उनमें सुख - दुःखके कारण होते हैं । वे धर्म और अधर्मरूप हैं । ये सब संस्कार इस जन्म तथा पिछले जन्ममें किये हुए कर्मोंसे बनते हैं और ग्रामोफोनके प्लेटके रेकार्ड ( Records ) के सदृश चित्तमें चित्रित रहते हैं । वे परिणाम, चेष्टा, निरोध, शक्ति, जीवन और धर्मकी भाँति अपरिदृष्ट चित्तके धर्म हैं । उनमें संयम करनेसे योगीको उनका साक्षात् हो जाता है । इससे उसको जिस देश, काल और जिन निमित्तोंसे वे संस्कार बने हैं, सब स्मरण हो जाते हैं । यही पूर्वजन्मज्ञान है । ( योगियोंके अतिरिक्त बहुत - से शुद्ध संस्कारवाले बालक भी अपने पूर्वजन्मका हाल बतला देते हैं ) जिस प्रकार संस्कारोंके साक्षात् करनेसे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होता है इसी प्रकार दूसरेके संस्कारोंके साक्षात् करनेसे दूसरेके पूर्वजन्मका ज्ञान होता है । ( विज्ञान - भिक्षुके है ) । अनुसार, ‘ पर ' अर्थात् भावी जन्मोंका भी इसी भाँति संस्कारके साक्षात् करनेसे ज्ञान हो जाता नामक टिप्पणी— ॥ सूत्र १८ ॥ पूर्वोक्त अर्थमें श्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये भाष्यकारोंने आवट्य । योगीश्वरका योगिराज जैगीषव्यके साथ एक संवाद उपन्यस्त किया है । उसका यहाँ निरूपण किया जाता है ( ५१८ )

पृष्ठ 556

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सूत्र १ ९ -२० ] * न च तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ** [ विभूतिपाद भगवान् जैगीषव्य जो प्रसिद्ध योगीश्वर हुए हैं उनके सम्बन्धमें ऐसा प्रसिद्ध है कि वे संस्कारोंके साक्षात्कारसे दस महाकल्पोंमें व्यतीत हुए अपने जन्म - परिणाम - परम्पराका अनुभव करते हुए विवेकज - ज्ञान - सम्पन्न थे और योगिराज भगवान् आवट्यके सम्बन्धमें कहा जाता है कि योगबलसे स्वेच्छामय दिव्य विग्रहको धारण करके विचरते थे । किसी समय इन दोनों योगियोंका संगम हो गया । तब आवट्यने जैगीषव्यसे यह बात पूछी कि दस महाकल्पोंमें देव, मनुष्यादि योनियोंमें उत्पन्न होते हुए आपने जो अनेक प्रकारके नरक, तिर्यक - योनियोंमें और गर्भमें दुःखोंका अनुभव किया है वह सब आपको परिज्ञात है, क्योंकि स्वच्छ और अनभिभूत बुद्धि सत्त्व होनेके कारण आपको सारे पूर्व जन्मोंका ज्ञान है । इसलिये आप यह बतलायें कि दस महाकल्पोंमें जो आपने अनेक प्रकारके जन्म धारण किये हैं, उन जन्मोंमें आपने सुख और दुःखमें अधिक किसको जाना अर्थात् संसार सुखबहुल है वा दुःख - बहुल? तब जैगीषव्यजीने बतलाया कि इन दस महाकल्पोंमें अनेक प्रकारके नरक तिर्यग् योनियोमें दुःखोंका अनुभव करते हुए बारंबार देव और मनुष्यादि योनियोंमें उत्पन्न होते हुए मैंने जो अनुभव किया है, उन सबको दुःखरूप ही जानता हूँ अर्थात् विषय - सुख, दुःखरूप होनेसे संसार दुःखबहुल ही है सुखबहुल नहीं । आवट्य मुनिने फिर पूछा — ' हे जैगीषव्य मुने! दीर्घायुवाले जो आपको प्रधान वशित्व और अनुत्तम संतोष सुखका लाभ हुआ है क्या वह भी दुःखपक्षमें निक्षिप्त है? ' तब भगवान् जैगीषव्यने कहा- -'हे आवट्य मुने! विषय - सुखकी अपेक्षासे ही यह संतोष सुख अनुत्तम कहा जाता है । कैवल्यकी अपेक्षासे तो यह दुःखरूप ही है; क्योंकि संतोष - बुद्धि सत्त्वका ही धर्म है और जो - जो बुद्धिका धर्म है वह सब त्रिगुणात्मक प्रत्यय होनेसे हेय पक्षमें पतित है । ' अर्थात् बुद्धिका धर्म होनेसे संतोष भी सुखस्वरूप नहीं है । सूत्रकारने ' संतोषादनुत्तमसुखलाभ: ' इस सूत्रसे संतोषको जो अनुत्तम सुखका हेतु कहा है, उसका तात्पर्य यह है कि रज्जुके सदृश पुरुषोंको बाँधनेवाली जो दुःखस्वरूप तृष्णातन्तु है उस तृष्णारूप दुःखका संतोषसे नाश होता है । तब तृष्णाके अभावसे चित्त पीड़ासे रहित होकर प्रसन्न हो जाता है । इस प्रकार तृष्णाकी निवृत्तिद्वारा सर्वानुकूल संतोष सुखको उत्तम कहा है । कैवल्यकी अपेक्षासे तो यह सब दुःखरूप ही है । प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥ १ ९ ॥ शब्दार्थ – प्रत्ययस्य - दूसरेके चित्तकी वृत्तिके साक्षात् करनेसे; परचित्तज्ञानम् = दूसरेके चित्तका ज्ञान होता है । अन्वयार्थ – दूसरेके चित्तकी वृत्तिके साक्षात् करनेसे दूसरेके चित्तका ज्ञान होता है । व्याख्या – जब योगी किसीके चेहरे तथा नेत्र आदिकी आकृति देखकर उसके चित्तकी वृत्तिमें संयम करता है तो उसको उस चित्तका साक्षात् हो जाता है । इससे उसको ज्ञान हो जाता है कि चित्त राग, द्वेषादि संसारकी वासनाओंसे रँगा हुआ है अथवा वैराग्ययुक्त है । इस समय उसका सङ्गति– शङ्का – दूसरेके चित्तकी वृत्तिमें संयम करनेसे यह चित्त चित्त - म - मात्र प्रत्यक्ष होता है अथवा स्वविषयसहित? इसका उत्तर देते हैं— न च तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥ २० ॥ शब्दार्थ – न - च - तत् - पर नहीं वह ( चित्त ); स - आलम्बनम् = विषय - सहित( साक्षात् होता है ); ( ५१ ९ )

पृष्ठ 557

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २१-२२ तस्य = उस विषयसहित चित्तके; अविषयी भूतत्वात् = संयमका विषय न होनेसे । अन्वयार्थ — पर वह ( दूसरेका चित्त ) अपने विषय - सहित साक्षात् नहीं होता; क्योंकि वह ( विषयसहित चित्त ) उसका ( संयमका ) विषय नहीं है । व्याख्या – पिछले सूत्रमें दूसरेके चित्तकी वृत्तिमें संयम करना बतलाया है । इससे इतना ही ज्ञान हो सकता है कि चित्त राग - द्वेषादिसे युक्त है अथवा वीतराग है । राग, द्वेष आदिका विषयज्ञान नहीं होता कि किस विषयमें राग है, किस विषयमें द्वेष है इत्यादि । क्योंकि ये उस संयमके विषय न थे । संयमद्वारा उसीका साक्षात् होता है जो उसका विषय है । और संयमका विषय वही होता है जिसको किसी - न - किसी प्रकारसे पहले जान लिया है । बाहरी चिह्नों अर्थात् नेत्र अथवा चेहरेकी आकृतिसे केवल राग - द्वेषादि जाने जा सकते हैं न कि राग - द्वेषादिके विषय । इसलिये वे सालम्बन चित्तके संयमके विषय नहीं बन सकते । यदि राग - द्वेषादि आभ्यन्तर लिङ्गोंद्वारा संयम किया जावे तो उनके विषयका भी अर्थात् सालम्बन चित्तका भी ज्ञान हो सकता है । टिप्पणी – विज्ञानभिक्षुने इस सूत्रको भाष्य मानकर उन्नीसवें सूत्रमें ही सम्मिलित कर दिया है । भोज

और वाचस्पति मिश्रने इसको अलग सूत्र माना है ।

कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुः-प्रकाशा सम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥ २१ ॥

शब्दार्थ — काय - रूप - संयमात् = अपने शरीरके रूपमें संयम करनेसे; तद् - ग्राह्य - शक्ति - स्तम्भे = उसकी ( रूपकी ) ग्राह्य - शक्ति रुक जानेपर; चक्षुः प्रकाश - असम्प्रयोगे दूसरेकी आँखोंके प्रकाशका संयोग न होनेपर; अन्तर्धानम् = योगीको अन्तर्धान प्राप्त होता है । अन्वयार्थ — अपने शरीरके रूपमें संयम करनेसे रूपकी ग्राह्य - शक्ति रुक जाती है । इससे दूसरेके आँखोंके प्रकाशसे योगीके शरीरका संनिकर्ष न होनेके कारण योगीके शरीरका अन्तर्धान ( छिप जाना ) हो जाता है । व्याख्या — चक्षु ग्रहण - शक्ति है और रूप ग्राह्य - शक्ति है । इन दोनों शक्तियोंके संयोगसे ही देखनेका काम होता है । इन दोनोंमेंसे किसी एककी शक्तिके रुक जानेसे देखनेका कार्य बंद हो जाता है । योगी संयमद्वारा शरीरके रूपकी ग्राह्य - शक्तिको रोक देता है । उस कारण चक्षुकी ग्रहण - शक्ति होते हुए भी दूसरे पुरुष उसके शरीरको नहीं देख सकते । यह उस योगीका अन्तर्धान अर्थात् छिप जाना है । इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रस और गन्धमें संयम करनेसे उस - उसकी ग्राह्य - शक्ति रुक जाती है और उनके वर्तमान हुए भी वे अपने विषय करनेवाली इन्द्रियोंसे ग्रहण नहीं किये जा सकते । रहते सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥ २२ ॥

शब्दार्थ – सोपक्रमम् = उपक्रमसहित ( तीव्र वेगवाले ) अथवा आरम्भसहित; च निरुपक्रमम् = और उपक्रमरहित ( मन्द वेगवाले ) अथवा आरम्भरहित; कर्म = ( दो प्रकारके ) कर्म होते हैं; तत् - संयमात् - उनमें संयम करनेसे; अपरान्त - ज्ञानम् - मृत्युका ज्ञान होता है; अरिष्टेभ्यः वा = अथवा उलटे चिह्नोंसे । अन्वयार्थ – कर्म सोपक्रम और निरुपक्रम दो प्रकारके होते हैं । उनमें संयम करनेसे मृत्युका ज्ञान होता है अथवा अरिष्टोंसे मृत्युका ज्ञान होता है । जो व्याख्या – आयु नियत करनेवाले पूर्वजन्मके कर्म दो प्रकारके होते हैं । एक सोपक्रम अर्थात् वे कर्म ( ५२० )

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सूत्र २३ ] मैत्र्यादिषु बलानि * * [ विभूतिपाद आयु समाप्त करनेका काम पूरे वेगसे कर रहे हैं, जिनका बहुत - सा फल हो गया है और कुछ शेष हैं दूसरे निरुपक्रम अर्थात् वे कर्म जो मन्द वेगवाले हैं, जिन्होंने आयु भोगनेका कार्य अभीतक आरम्भ नहीं किया है । जैसे गीला वस्त्र गरम देशमें विस्तारपूर्वक फैलाया हुआ शीघ्र ही सूख जाता है अथवा जैसे शुष्क तृणोंके ऊपर फेंकी हुई अग्नि चारों ओर वायुसे युक्त होकर शीघ्र ही तृणोंको जला देती है, वैसे ही शीघ्र फल करनेवाले सोपक्रम कर्म हैं । और जैसे वही गीला वस्त्र इकट्ठा लपेटकर शीत देशमें रखा हुआ देरमें सूखता है अथवा जैसे हरित तृणोंपर फेंकी हुई अग्नि वायुरहित स्थानमें देरसे तृणोंको जलाती है, वैसे ही विलम्बसे फल देनेवाले निरुपक्रम कर्मको जानना चाहिये । अपरान्त शरीरके वियोगको कहते हैं । इन दोनों कर्मोंमें संयम करनेसे उनका साक्षात् हो जानेपर योगीको संशय - रहित यह ज्ञान हो जाता है कि आयु कितनी शेष रही है । किस काल और किस देशमें शरीरका वियोग होगा । अथवा अरिष्टोंसे अर्थात् उलटे चिह्नोंसे जो मृत्युके बतलानेवाले हैं, अपनी मृत्युका ज्ञान हो जाता है । अरिष्ट तीन प्रकारके हैं-१ आध्यात्मिक — अभ्यास होते हुए भी कानोंको बंद करनेपर अंदरकी ध्वनिका न सुनायी देना । अथवा आखोंको हाथोंसे दबानेपर भी ज्योतिके कनकोंका न दिखलायी देना । २ आधिभौतिक – मरे हुए पुरुषोंका इस प्रकार दिखलायी देना मानो सामने खड़े हैं । ३ आधिदैविक — अकस्मात् सिद्धोंका दिखायी देना, अथवा आकाशके नक्षत्र - तारा आदिका उलटा - पुलटा दिखायी देना । इन अरिष्टोंके देखनेसे मृत्युके निकट होनेका ज्ञान होता है इसी प्रकार प्रकृतिका बदल जाना अर्थात् उदारका कृपण और कृपणका उदार हो जाना इत्यादि; तथा विपरीत ज्ञानका होना, जैसे धर्मको अधर्म, अधर्मको धर्म, मनुष्यलोकको स्वर्गलोक और स्वर्गलोकको मनुष्यलोक समझना इत्यादि भी अरिष्ट अर्थात् संनिहित - मरणके चिह्न हैं । पहिला संयमद्वारा मृत्युका ज्ञान तो केवल योगियोंको ही होता है । दूसरा अरिष्टोंद्वारा योगियों और साधारण मनुष्योंको भी होता है । मृत्युके जाननेके प्रसङ्गमें अरिष्टोंका भी वर्णन कर दिया है, इन अरिष्टोंसे भी अयोगियोंको साधारण रीतिसे और संशयात्मक ज्ञान होता है । योगियोंको संशय - रहित प्रत्यक्षके तुल्य देश और कालसहित मृत्युका ज्ञान होता है । सङ्गति — पूर्वोक्त परिकर्म अर्थात् चित्तशुद्धिसे हुई सिद्धियोंको बतलाते हैं— मैत्र्यादिषु बलानि ॥ २३ ॥

शब्दार्थ – मैत्री - आदिषु - मैत्री आदिमें ( संयम करनेसे ); बलानि = मैत्री आदि बल प्राप्त होते हैं । अन्वयार्थ —– मैत्री आदिमें संयम करनेसे मैत्री आदि बल प्राप्त होता है । व्याख्या – पहिले पादके तैंतीसवें सूत्रमें मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा- -चार भावनाएँ बतलायी गयी हैं । इनमेंसे पहली तीन भावनाओंमें साक्षात् पर्यन्त संयम करनेसे योगीका मुदिता बल बढ़ जाता है । अर्थात् योगीको मैत्री आदि ऐसी उत्कृष्ट हो जाती है कि क्रमानुसार सबकी मित्रता मैत्री, आदिको करुणा, प्राप्त होता है । जब मैत्रीमें संयम करता है तो सब प्राणियोंका सुखकारी मित्र बन करनेसे दुःखियोंके दुःख दूर करनेकी शक्ति आ जाती है । मुदितामें संयम जाता है । करुणामें संयम चौथा उपेक्षा अर्थात् उदासीनता अभावात्मक पदार्थ है, इस कारण करनेसे पक्षपाती नहीं होता । वह संयमका विषय नहीं बन सकता । ( ५२१ )

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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र २४–२६ बलेषु हस्तिबलादीनि ॥ २४ ॥

शब्दार्थ — बलेषु = बलोंमें ( संयम करनेसे ); हस्ति - बल - आदीनि = हाथी आदिके बल प्राप्त होते हैं । अन्वयार्थ — हाथी आदिके बलोंमें संयम करनेसे हाथी आदिके बल प्राप्त होते हैं । व्याख्या — जब योगी हाथी, सिंह आदिके बल और वायु आदिके वेगमें तदाकार होकर साक्षात् - पर्यन्त संयम करता है तो उन - जैसे बलोंको प्राप्त होता है अर्थात् जिसके बलमें संयम किया जाता

है वही बल प्राप्त होता है ।

प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥ २५ ॥

शब्दार्थ - प्रवृत्ति - आलोक--न्यासात् = प्रवृत्तिके प्रकाश डालनेसे; सूक्ष्म = सूक्ष्म ( इन्द्रियातीत ); व्यवहित = व्यवधानवाली ( आड़में रहनेवाली ); विप्रकृष्ट = दूरकी वस्तुओंका; ज्ञानम् = ज्ञान होता है । अन्वयार्थ — प्रवृत्तिके प्रकाश डालनेसे सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट वस्तुका ज्ञान होता है । व्याख्या- -पहले पादके छत्तीसवें सूत्रमें बतलायी हुई मनकी ज्योतिष्मती प्रवृत्तिके प्रकाशको जब योगी संयमद्वारा किसी सूक्ष्म ( इन्द्रियातीत ) जैसे अदृश्य परमाणु आदि, व्यवहित ( ढके हुए ) जैसे भूमिके अंदर दबी हुई खानें, दीवारकी ओटमें छिपी हुई वस्तुएँ, शरीरके अंदरके भाग इत्यादि, विप्रकृष्ट - दूरस्थ वस्तुपर, जहाँ आँख नहीं पहुँचती, डालता है तब उनका उसको प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है । जैसे सूर्यादिके प्रकाशसे घटादि प्रत्यक्ष होते हैं वैसे ही ज्योतिष्मतीके प्रकाशमें सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट वस्तुका ज्ञान होता है भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥ २६ ॥

शब्दार्थ - भुवन -ज्ञानम् = भुवनका ज्ञान; सूर्ये - संयमात् = सूर्यमें संयम करनेसे होता है । अन्वयार्थ — सूर्यमें संयम करनेसे भुवनका ज्ञान होता है । व्याख्या – प्रकाशमय सूर्यमें साक्षात् पर्यन्त संयम करनेसे भूः, भुवः स्वः आदि सातों लोकोंमें जो भुवन हैं अर्थात् जो विशेष हदवाले स्थान हैं, उन सबका यथावत् ज्ञान होता है । पिछले पचीसवें सूत्रमें सात्त्विक प्रकाशके आलम्बनसे संयम कहा गया है, इस सूत्रमें भौतिक सूर्यके प्रकाशद्वारा संयम बताया गया है, किंतु सूर्यका अर्थ सूर्यद्वारसे लेना चाहिये और यहाँ सूर्यद्वारसे अभिप्राय सुषुम्ना है । उसीमें संयम करनेसे उपर्युक्त फल प्राप्त हो सकता है । श्रीव्यासजीने भी सूर्यके अर्थ सूर्यद्वारसे किये हैं । तथा मुण्डकमें भी सूर्यद्वारका वर्णन है । ' सूर्यद्वारेण ते विरजा । ' टिप्पणी — कई टीकाकारोंने सूर्यका अर्थ पिंगला नाड़ीसे लगाया है पर यह अर्थ न भाष्यकारको अभिमत है, न वृत्तिकारको और न इसका प्रसङ्गसे कोई सम्बन्ध है ।. भाष्यकारने इस सूत्रकी व्याख्यामें अनेक लोकोंको बड़े विस्तारके साथ वर्णन किया है, उसको किया इस विषयके है । लिये उपयोगी न समझकर हमने व्याख्यामें छोड़ दिया है और सूत्रका अर्थ भोजवृत्तिके अनुसार इसका इस भाष्यके सम्बन्धमें कई एकोंका मत है कि यह व्यासकृत नहीं है, इसीलिये भोजवृत्तिमें कोई अंश भी नहीं मिलता । हैं, इन सब इसमें अलंकाररूपसे वर्णन की हुई तथा संदेहजनक बहुत - सी बातें लिये स्पष्टीकरणीय कर देना उचित भी समझते हैं-बातोंके स्पष्टीकरणके साथ व्यासभाष्यका भाषार्थ पाठकोंकी जानकारीके ( ५२२ )

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सूत्र २६ ] भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्** * [ विभूतिपाद व्यासभाष्यका भाषानुवाद सूत्र ॥ २६ ॥

भूमि आदि सात लोक, अवीचि आदि सात महानरक ( सात अधोलोक जो स्थूलभूतोंकी स्थूलता और तमस्के तारतम्यसे क्रमानुसार पृथिवीकी तलीमें माने गये हैं ) तथा महातल आदि सात पाताल ( सात जलके बड़े भाग जो पृथिवीकी तलीमें सात महानरक - संज्ञक प्रत्येक स्थूल भागके साथ माने गये हैं ); यह भुवन पदका अर्थ है । इनका विन्यास ( ऊर्ध्व - अधोरूपसे फैलाव ) इस प्रकार है कि अवीचि ( पृथ्वीसे नीचे सबसे पहिला नरक तामसी स्थूल भाग । अवीचिके पश्चात् क्रमानुसार स्थूलता और तामस आवरणकी न्यूनताको लेते हुए छः और स्थूल भाग हैं ) से सुमेरु ( हिमालय पर्वत ) की पृष्ठपर्यन्त जो लोक है वह भूलोक है, और सुमेरु पृष्ठसे ध्रुव - तारे ( Polestar पोलस्टार ) पर्यन्त जो ग्रह, नक्षत्र, तारोंसे चित्रित लोक है वह अन्तरिक्ष लोक है ( यह अन्तरिक्ष- लोक ही भुवः - लोक कहलाता है ) । इससे परे पाँच प्रकारके स्वर्ग - लोक हैं । उनमें भूलोक और अन्तरिक्ष- लोकसे परे जो तीसरा स्वर्गलोक है वह महेन्द्रलोक ( स्वःलोक ) कहलाता है । चौथा जो महः लोक है वह प्राजापत्य - स्वर्ग कहलाता है । इससे आगे जो जनःलोक, तपःलोक और सत्यलोक नामके तीन स्वर्ग हैं, वे तीनों ब्रह्मलोक कहे जाते हैं । ( इन पाँचों -- स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यलोकको ही द्यौः -लोक कहते हैं ) । इन सब लोकोंका संग्रह निम्न श्लोकमें हैं—

ब्राह्मस्त्रिभूमिको लोकः प्राजापत्यस्ततो महान् ।

माहेन्द्रश्च स्वरित्युक्तो दिवि तारा भुवि प्रजा ॥

( जनः, तपः, सत्यम् ) तीन ब्राह्म लोक हैं, उनसे नीचे महः नामका प्राजापत्य लोक है । उनसे नीचे स्वः नामका महेन्द्र लोक है, उनसे नीचे अन्तरिक्षमें भुवः नामक तारा लोक है, उनसे नीचे प्रजा मनुष्यों का लोक – भूलोक है । -जिस प्रकार पृथ्वीके ऊपर छः और लोक हैं, इसी प्रकार पृथ्वीसे नीचे चौदह और लोक हैं, उनमें सबसे नीचा अवीचि नरक है । उसके ऊपर महाकाल नरक है जो मिट्टी, कंकड़, पाषाणादिसे ऊपर अम्बरीष नरक है जो जलपूरित है । उसके ऊपर रौरव नरक है जो अग्निसे भरा हुआ युक्त है है ॥ उसके ऊपर महारौरव नरक है जो वायुसे भरा हुआ है । उसके ऊपर महासूत्र नरक है जो उसकें उसके ऊपर अन्धतामिस्र नरक है जो अन्धकारसे व्याप्त है । इन नरकोंमें वही अंदरसे खाली है । आयुको प्राप्त होते हैं । जिनको अपने किये हुए पाप कर्मोंका दुःख भोगना होता पुरुष है दुःख । इन देनेवाली दीर्घ महातल, रसातल, अतल, सुतल, वितल, तलातल, पाताल – ये सात पाताल नरकोंके साथ यह भूमि है जिसको वसुमती कहते हैं, जो सात द्वीपोंसे युक्त हैं हैं । आठवीं इनके ऊपर सुमेरु विराजमान है । उस सुमेरु पर्वतराजके चारों दिशाओंमें चार , जिसके मध्य भागमें सुवर्णमय पर्वतराज पूर्व दिशामें शृङ्ग है वह रजतमय है ( सम्भवतः यह शान स्टेटका शृङ्ग पर्वत ( पहाड़की चोटी ) हैं । उनमें जो नमूर पर्वतमें आजकल रजत निकलती भी है ); दक्षिण - शृङ्ग हो, वर्माकी शान स्टेटके मणिके सदृश ) है, जो पश्चिम दिशामें शृङ्ग है वह स्फटिक दिशामें जो शृङ्ग है वह वैदूर्य्य - मणिमय ( नीली है ) और जो उत्तर दिशामें शृङ्ग - मणिमय ( जो कि प्रतिबिम्ब ग्रहण कर सकती है । वहाँ वैदूर्य - मणिकी प्रभाके है सम्बन्धसे वह सुवर्णमय सुमेरुके ( या सुवर्णके रंगवाले पुष्पविशेषके वर्णवाला ) दक्षिण भागमें स्थित आकाशका वर्ण ( ५२३ )