पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 561–570
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 561–570
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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र २६ नीलकमलके पत्रके सदृश श्याम ( दिखलायी देता है । पूर्व भागमें स्थित आकाश श्वेत वर्ण ( दिखलायी देता ) है । पश्चिम भागमें स्थित आकाश स्वच्छ वर्ण ( दिखलायी देता ) है । और उत्तर भागमें स्थित आकाश पीत वर्ण ( दिखलायी देता है । अर्थात् जैसे वर्णवाला जिस दिशाका शृङ्ग है वैसे ही वर्णवाला उस दिशामें स्थित आकाशका भाग ( दिखलायी देता है । इस सुमेरु पर्वतके ऊपर उसके दक्षिण भागमें है जिसके नामसे इस द्वीपका नाम जम्बू द्वीप जम्बू - वृक्ष पड़ा है ( प्रायः विशेष देशोंमें विशेष वृक्ष हुआ करते हैं । सम्भव है यह प्रदेश किसी कालमें जम्बू - वृक्ष - प्रधान देश हो । वर्तमान समयमें जम्बू रियासत सम्भवतः जम्बू द्वीपका अवशेष हो ) । इस सुमेरुके चारों ओर सूर्य भ्रमण करता है, जिससे यह सर्वदा दिन और रातसे संयुक्त रहता है । ( जब कोई बड़े मोटे बेलनके साथ पतला छोटा बेलन घूमता है तब वह भी अपना पूरा चक्र करता है । इस दृष्टिसे उस पतले बेलनके चारों ओर बड़े बेलनका चक्र हो जाता है । इसी प्रकार जब पृथ्वी सूर्यके चारों ओर घूमती है तो चौबीस घंटेमें सूर्यका भी पृथिवीके चारों ओर घूमना हो जाता है । इस भाँति सुमेरु पर्वतके एक ओर उजाला और एक ओर अँधेरा है । उजाला दिन है और अँधेरा रात्रि है । इसी प्रकार दिन और रात सुमेरु पवर्तसे मिले - जैसे मालूम होते हैं ) । सुमेरुकी उत्तर दिशामें नील, श्वेत और शृङ्गवान् नामवाले तीन पर्वत विद्यमान हैं जिनका विस्तार दो - दो हजार वर्ग योजन है । इन पर्वतोंके बीचमें जो अवकाश ( बीचके भाग = घाटी = valley ) हैं उनमें रमणक, हिरण्मय, उत्तर कुरु ( शृङ्गवान्के उत्तरमें समुद्र - पर्यन्त उत्तर कुरु है । टालेमीने लिखा है कि चीनके एक प्रदेशका नाम उत्तर कोर्ह Ottarakorrha है, जो कि उत्तर कुरु शब्दका अपभ्रंश प्रतीत होता है, इससे आस - पासका समुद्रपर्यन्त प्रदेश उत्तर कुरु प्रतीत होता है । ) नामक तीन वर्ष ( खण्ड ) हैं जो नौ - नौ हजार वर्ग योजन विस्तारवाले हैं ( नीलगिरि मेरुके साथ लगा है । नीलगिरिके उत्तरमें रमणक है । पद्मपुराणमें इसे रम्यक कहा है । श्वेतगिरिके उत्तरमें हिरण्मय है । ) और दक्षिण भागमें तीन पर्वत निषध, हेमकूट, हिमशैल दो - दो हजार वर्ग योजन विस्तारवाले हैं ( लंकाके उत्तर - पूर्व सागरतक विस्तृत हिमगिरी है 1 । हिमगिरीके उत्तर हेमकूट है । यह भी समुद्रतक फैला हुआ है । हेमकूटके उत्तरमें निषध पर्वत है । यह जनपद शायद विन्ध्याचलपर अवस्थित था । दमयन्तीपति नल निषधके राजा थे ) । इनके बीचके अवकाशमें नौ - नौ हजार वर्ग योजन विस्तारवाले तीन वर्ष ( खण्ड ) हरिवर्ष, किंपुरुष और भारत विद्यमान हैं, ( सम्भवतः हिमालयके इलावृत्त प्रदेश और निषध पर्वतके बीचके प्रदेशको भारत कहा गया हो, हरिवर्ष सम्भवतः वह प्रदेश हो जो कि हरि अर्थात् वानर जातिके राजा सुग्रीवद्वारा कभी शासित होता था ) सुमेरुकी पूर्व दिशामें सुमेरुसे संयुक्त माल्यवान् पर्वत है ( माल्यवान् पर्वतसे समुद्रपर्यन्त प्रदेश भद्राश्व नामक है । आजकल बर्माके नीचे एक मलय प्रदेश है । सम्भवतः यह प्रदेश और इसके ऊपरका बर्मा प्रदेश माल्यवान् हो ) । माल्यवान्से लेकर पूर्वकी ओर समुद्रपर्यन्त भद्राश्व नामक प्रदेश है [ बर्मा और मलयसे पूर्वकी ओर श्याम और अनाम देश ( इण्डो चाइनाके प्रदेश सम्भवतः ) भद्राश्व नामक हैं ] । सुमेरुके पश्चिममें केतुमाल और गन्धमादन हैं । और केतुमाल तथा भद्राश्वके बीचके वर्षका नाम इलावृत है [ सुमेरुके दक्षिणमें जो उपत्यका ( अर्थात् पर्वतपादकी ऊँची भूमि ) है उसे यहाँ इलावृत कहा गया है ] । पचास हजार वर्गयोजन विस्तारवाले देशमें सुमेरु विराजमान है और सुमेरुके चारों ओर पचास हजार ( ५२४ )
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सूत्र २६ ] * भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् * [ विभूतिपाद ***** वर्गयोजन विस्तारवाला देश है । इस प्रकार सम्पूर्ण जम्बूद्वीपका परिमाण सौ हजार वर्गयोजन है । इस परिमाणवाला जम्बूदीप अपनेसे दुगुने परिमाणवाले वलयाकार ( कङ्कणके सदृश गोल आकारवाले ) क्षार समुद्रसे वेष्टित ( घिरा हुआ ) है । जम्बू द्वीपसे आगे दुगुने परिमाणवाला शाकद्वीप है, जो अपनेसे दुगुने परिमाणवाले वलयाकार इक्षुरस ( एक प्रकारका जल ) के समुद्रसे वेष्टित है ( भारतमें शक जातिने आक्रमण किया था । कास्पीयन सागरके पूर्वकी ओर ' शाकी ' नामकी एक जातिका निवास है । यूरोपीय पुराविदोंने स्थिर किया है कि वर्तमान तातार, एशियाटिक रूस, साईबेरिया, क्रिमिया, पोलेंड, हंगरीका कुछ हिस्सा, लिथुयनिया, जर्मनीका उत्तरांश, स्वीडन, नारवे आदिको शाकद्वीप कहा गया है ) । इससे आगे इससे दुगुने परिमाणवाला कुश द्वीप है, जो अपनेसे दुगुने परिमाणवाले वलयाकार मदिरा ( एक प्रकारका जल ) के समुद्रसे वेष्टित है । इससे आगे दुगुने विस्तारवाला क्रौञ्चद्वीप है जो अपनेसे दुगुने परिमाणवाले वलयाकार घृत ( एक प्रकारका जल ) के समुद्रसे वेष्टित है । इससे आगे इससे दुगुने परिमाणवाला शाल्मलिद्वीप जो अपनेसे दुगुने परिमाणवाले वलयाकार दधि ( एक प्रकारका जल ) के समुद्रसे वेष्टित है । इससे आगे दुगुने परिमाणवाला मगधद्वीप है जो अपनेसे दुगुने परिमाणवाले वलयाकार क्षीर ( एक प्रकारका जल ) के समुद्रसे वेष्टित है । इससे आगे दुगुने विस्तारवाला पुष्करद्वीप है, जो अपनेसे दुगुने विस्तारवाले वलयाकार मिष्ट जलके समुद्रसे वेष्टित है । इन सातों द्वीपोंसे आगे लोकाऽलोक पर्वत है । इस लोकाऽलोक पर्वतसे परिवृत जो सात समुद्रसहित सात द्वीप हैं वे सब मिलकर पचास कोटि वर्ग योजन विस्तारवाले हैं [ वर्तमान समयमें पृथ्वीका क्षेत्रफल १ ९, ६५,००,००० वर्ग मील तथा घन फल २,५ ९, ८८,००,००,००० घन मील माना जाता है । साथ ही वर्तमान समय में योजन ४ कोसोंका तथा कोस २ मीलके लगभग माना जाता है ] । यह जो लोकाऽलोक पर्वतसे परिवृत विश्वम्भरा ( पृथिवी ) मण्डल है वह सब ब्रह्माण्डके अन्तर्गत संक्षिप्त रूपसे वर्तमान है और यह ब्रह्माण्ड प्रधानका एक सूक्ष्म अवयव है, क्योंकि जैसे आकाशके एक अति अल्प देशमें खद्योत विराजमान होता है वैसे ही प्रधानके अति अल्प देशमें यह सारा ब्रह्माण्ड विराजमान है ।I इन सब पाताल, समुद्र और पर्वतोंमें असुर, गन्धर्व, किन्नर, किंपुरुष, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, अपस्मारक, अप्सराएँ, ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड, विनायक नामवाले देवयोनि - विशेष ( मनुष्योंकी अपेक्षा निकृष्ट अर्थात् राजसी - तामसी प्रकृतिवाले प्राणधारी ) निवास करते हैं । और सब द्वीपोंमें देव - मनुष्य ं निवास करते हैं । सुमेरु पर्वत देवताओंकी उद्यान - भूमि है, वहाँपर मिश्र पुण्यात्मा चैत्ररथ - वन, सुमानस - वन- -चार वन हैं । सुमेरुके ऊपर सुधर्मा नामक देव - सभा - वन, नन्दन - वन, है और वैजयन्त नामक प्रासाद ( देव - महल ) है । यह सब पूर्वोक्त भूलोक है, सुदर्शन नामक पुर अन्तरिक्ष लोक है, जिसमें ग्रह ( बुध, शुक्र आदि जो कि सूर्यके चारों ओर कहा जाता है । इसके ऊपर आदि जिसमें कि चन्द्रमा गति करता है ), तारका ( ग्रहों और घूमते हैं ), नक्षत्र ( अश्विनी नक्षत्रोंसे भिन्न अन्य तारे तथा तारामण्डल भ्रमण करते हैं । यह सब ग्रह, नक्षत्र आदि, ध्रुव नामक ज्योति ) वायुरूप रज्जुसे बँधे हुए ( वायु - मण्डलमें स्थित ) वायुके नियत ( Pole Star पोल स्टार ) के साथ, चारों ओर भ्रमण करते हैं । ध्रुवसंज्ञक ज्योति मेढिकाष्ठ ( एक काठका संचारसे लब्ध संचारवाले होकर, ध्रुवके स्तम्भ जो कि खलिहानके मध्यमें ( ५२५ )
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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र २६ खड़ा होता है जिसके चारों ओर बैल घूमते हैं ) के सदृश निश्चल है । इसके ऊपर स्वर्गलोक है । जिसको माहेन्द्र - लोक कहते हैं । माहेन्द्र - लोकमें त्रिदश, अग्निष्वात्त, याम्य, तुषित, अपरिनिर्मित - वशवर्ती, परिनिर्मित वशवर्ती ये छः देवयोनि - विशेष निवास करते हैं । ये सब देवता संकल्पसिद्ध, अणिमादि ऐश्वर्य - सम्पन्न और कल्पायुषवाले तथा वृन्दारक ( पूजने योग्य ), कामभोगी और औपपादिक देहवाले ( बिना माता - पिताके दिव्य शरीरवाले ) हैं; और उत्तम अनुकूल अप्सराएँ इनकी स्त्रियाँ हैं । इस स्वर्गलोकसे आगे महान् नामक स्वर्ग - विशेष है, जिसको महालोक तथा प्राजापत्यलोक कहते हैं । इसमें कुमुद, ऋभु, प्रतर्दन, अञ्जनाभ, प्रचिताभ – ये पाँच प्रकारके देवयोनि - विशेष काम करते हैं । ये सब देवविशेष महाभूतवशी ( जिनकी इच्छामात्रसे महाभूत कार्यरूपमें परिणत होते हैं ) और ध्यानाहार ( बिना अन्नादिके सेवन किये ध्यानमात्रसे तृप्त और पुष्ट होनेवाले ) तथा सहस्र कल्प आयुवाले हैं । महर्लोकसे आगे जनः लोक है जिसको प्रथम ब्रह्मलोक कहते हैं । जनः लोकमें ब्रह्मपुरोहित, ब्रह्मकायिक, ब्रह्ममहाकायिक और अमर – ये चार प्रकारके देवयोनि - विशेष निवास करते हैं । ये भूत तथा इन्द्रियोंको स्वाधीनकरणशील हैं । जनः लोकसे आगे तपोलोक है जिसको द्वितीय ब्रह्मलोक कहते हैं । तपोलोकमें अभास्वर, महाभास्वर, सत्य - महाभास्वर – ये तीन प्रकारके देवयोनि विशेष निवास करते हैं, जो भूत, इन्द्रिय, प्रकृति ( अन्तःकरण ) - इन तीनोंको स्वाधीनकरणशील हैं और पूर्वसे उत्तर - उत्तर दुगुने - दुगुने आयुवाले हैं । ये सभी ध्यानाहार ऊर्ध्वरेतस् ( जिनका वीर्यपात कभी नहीं होता ) हैं । ये ऊर्ध्व — सत्यादि लोकमें अप्रतिहत ज्ञानवाले और अधर, अवीचि आदि लोकमें अनावृत्त ज्ञानवाले अर्थात् सब लोकोंको यथार्थरूपसे जाननेवाले हैं । तपोलोकसे आगे सत्यलोक है जिसको तृतीय ब्रह्मलोक कहते हैं । इस मुख्य ब्रह्मलोकमें अच्युत, शुद्ध - निवास, सत्याभ, संज्ञासंज्ञी - ये चार प्रकारके देवता - विशेष निवास करते हैं । ये अकृत- भवनन्यास ( किसी एक नियत ग्रहके अभाव होनेसे अपने शरीररूप ग्रहमें ही स्थित ) होनेसे स्वप्रतिष्ठित हैं और यथाक्रमसे ऊँची - ऊँची स्थितिवाले हैं । ये प्रधान ( अन्तःकरण ) को स्वाधीनकरणशील और पूरी सर्ग आयुवाले हैं । अच्युत नामक देव - विशेष सवितर्क ध्यानजन्य सुख भोगनेवाले हैं, शुद्धनिवास सविचार ध्यानसे तृप्त हैं । इस प्रकार ये सभी सम्प्रज्ञात ( समाधिपाद सूत्र १७ ) निष्ठ हैं । ये सब मुक्त नहीं हैं, किंतु त्रिलोकीके मध्यमें ही प्रतिष्ठित हैं । इन पूर्वोक्त सातों लोकोंको ही परमार्थसे ब्रह्मलोक जानना चाहिये । ( क्योंकि हिरण्यगर्भके लिङ्ग - देहसे यह सब लोक व्याप्त है ) । विदेह और प्रकृतिलय नामक योगी ( समाधिपाद सूत्र १ ९ ) मोक्षपद ( कैवल्यपद ) के तुल्य स्थितिमें हैं, इसलिये वे किसी लोकमें निवास करनेवालोंके साथ नहीं उपन्यास किये गये । सूर्यद्वार ( सुषुम्ना नाड़ी ) में संयम करके योगी इस भुवन - विन्यासके ज्ञानको सम्पादन करे करनेसे । किन्तु भी यह नियम नहीं है कि सूर्यद्वारमें संयम करनेसे ही भुवन - ज्ञान होता हो, अन्य स्थानमें संयम संयमका भुवन - ज्ञान हो सकता है, परंतु जबतक भुवनका साक्षात्कार न हो जाय तबतक दृढ़चित्तसे अभ्यास करता रहे और बीच - बीचमें उद्वेगसे उपराम न हो जाय । -सी बातोंका हमने स्पष्टीकरण कर दिया है । कुछ एक बातें जो पौराणिक उपर्युक्त व्यासभाष्यमें बहुत - स दिया है । विचारोंसे सम्बन्ध रखती हैं उनको हमने वैसा ही छोड़ ( ५२६ )
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सूत्र २६ ] भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् * * [ विभूतिपाद भूलोक अर्थात् पृथिवीलोकको विशेषरूपसे वर्णन किया गया है । उसके ऊपरी भागको जो सात द्वीपों और सात महासागरोंमें विभक्त किया गया है उनका इस समय ठीक - ठीक पता चलना कठिन है; क्योंकि उस प्राचीन समयसे अबतक भूलोकसम्बन्धी बहुत कुछ परिवर्तन हो गया होगा तथा योजन चार कोसको कहते हैं । यहाँ कोसका क्या पैमाना है? यह भाष्यकारने नहीं बतलाया है । यह वही हो सकता है जिसके अनुसार भाष्यकारका परिमाण पूरा हो सके । वर्तमान समयके अनुसार सात द्वीप और सात सागर निम्न प्रकार हो सकते हैं । सात द्वीप- - १. एशियाका दक्षिण भाग अर्थात् हिमालय - पर्वतके दक्षिणमें जो अफगानिस्तान, भारतवर्ष, बर्मा और स्याम आदि देश हैं । २. एशियाका उत्तरी भाग अर्थात् हिमालय - पर्वतके उत्तरमें तिब्बत, चीन तथा तुर्किस्तान इत्यादि । ३. यूरोप, ४. अफ्रीका, ५. उत्त अमेरिका, ६. दक्षिणी अमेरिका, ७. भारतवर्षके दक्षिण - पूर्वमें जो जावा, सुमात्रा और आस्ट्रेलिया आदिका द्वीप - समूह है । सात महासागरः-हिंद महासागर ( Indian Ocean ) २. प्रशान्त महासागर ( Pacific Ocean ) ३. अन्ध महासागर ( Aflantic Ocean ) ४. उत्तर हिममहासागर ( Arctic Ocean ) ५. दक्षिण हिममहासागर ( Antarctic Ocean ) कक्षीय स्किल ६. अरब सागर ( Arabian Sea. ) ७. भूमध्य सागर ( Mediterranean Sea. ) सुमेरु अर्थात् हिमालय पर्वत उस समय भी ऊँची कोटिके योगियोंके तपका स्थान था । स्थूल भूतोंकी स्थूलता और तमस्के तारतम्यके क्रमानुसार पृथिवीके नीचे भागको सात अधोलोकोंमें नरक - लोकोंके नामसे विभक्त किया गया है । इनके साथ जो जलके भाग हैं उनको सात पातालोंके नामसे दशार्या गया है तथा इन तामसी स्थानोंमें रहनेवाले मनुष्यसे नीची राजसी, तामसी योनियोंको असुर, राक्षस आदि नामोंसे वर्णन किया गया है । भुवःलोक अन्तरिक्ष - लोक है, जिसके अन्तर्गत पृथिवीके अतिरिक्त इस सूर्य - मण्डलके सारे ग्रह, नक्षत्र, तारका आदि तारागण हैं । यह सब भूलोक अर्थात् हमारी ध्रुवपर्य्यन्त भूतोंवाले हैं । इनमें किसीमें पृथ्वी, किसीमें जल, किसीमें अग्नि और किसीमें वायु तत्त्वकी पृथिवीके सदृश स्थूल प्रधानता है । अन्य पाँच सूक्ष्म और दिव्य लोक हैं जिनकी सम्मिलित संज्ञा अर्थात् पृथिवी और अन्तरिक्ष- लोकके अंदर हैं । इनकी सूक्ष्मता द्यौः - लोक है । यह सारे भूः - भुवः चला गया है अर्थात् भूः और भुवःके अंदर स्वः, स्वःके अंदर और सात्त्विकताका क्रमानुसार तारतम्य महः, महःके अंदर( जनः, जनःके अंदर तपः और तपःके अंदर सत्यलोक है । सूक्ष्मता और सात्त्विकताके तारतम्यसे और बहुत - से इनके स्वः, महः, स्वर्गलोक और जनः, तपः और सत्यलोक ब्रह्मलोक अवान्तर भेद भी हो सकते हैं । इनमेंसे छोड़नेके पश्चात् निवास करते हैं जो वितर्कानुगत भूमिकी कहलाते हैं । इनमें वे योगी स्थूल शरीरको परिपक्व अवस्था, विचारानुगत भूमि तथा ( ५२७ )
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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २७ आनन्दानुगत और अस्मितानुगत भूमिकी आरम्भिक अवस्थामें संतुष्ट हो गये हैं और जिन्होंने विवेक - ख्यातिद्वारा सारे क्लेशोंको दग्धबीज करके असम्प्रज्ञातसमाधिद्वारा स्वरूपावस्थितिके लिये यत्न नहीं किया है । आनन्दानुगत और अस्मितानुगत भूमिकी परिपक्व अवस्थावाले उच्चतर और उच्चतम कोटिके विदेह और प्रकृतिलय योगी सूक्ष्म शरीरों, सूक्ष्म इन्द्रियों और सूक्ष्म विषयोंको अतिक्रमण कर गये हैं; इसलिये वे इन सब सूक्ष्म लोकोंसे परे कैवल्यपद - जैसी स्थितिको प्राप्त किये हुए हैं । सूर्यके भौतिक स्वरूपमें संयमद्वारा योगीको भूलोक अर्थात् पृथ्वी - लोक और भुवःलोक अर्थात् अन्तरिक्षलोकके अन्तर्गत सारे स्थूल लोकोंका सामान्य ज्ञान प्राप्त होता है और इसी संयममें पृथ्वीका आलम्बन करके अथवा केवल पृथिवीके आलम्बनसहित संयमद्वारा पृथिवीके ऊपरके द्वीपों, सागरों, पर्वतों आदि तथा उसके अधोलोकोंका विशेष ज्ञान प्राप्त होता है । ध्यानकी अधिक सूक्ष्म अवस्थामें इसी उपर्युक्त संयमके सूक्ष्म हो जानेपर अथवा सूर्यके अध्यात्म सूक्ष्म स्वरूपमें संयमद्वारा सूक्ष्म लोकों अर्थात् स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यलोकका ज्ञान प्राप्त होता है । वाचस्पति मिश्रने सूर्यद्वारको सुषुम्ना नाड़ी मानकर सुषुम्ना नाड़ीमें संयम करके भुवन - विन्यासके ज्ञानको सम्पादन करना बतलाया है । वास्तवमें कुण्डलिनी जाग्रत् होनेपर सुषुम्ना नाड़ीमें जब सारे स्थूल प्राणादि प्रवेश कर जाते हैं तभी इस प्रकारके अनुभव होते हैं । उस समय संयमकी भी आवश्यकता नहीं रहती, किंतु जिधर वृत्ति जाती है अथवा जिसका पहलेसे ही संकल्प कर लिया है उसीका साक्षात्कार होने लगता है 1 TIRE स्कृति – अन्य भौतिक प्रकाशको संयमका विषय बनाकर भिन्न - भिन्न सिद्धियाँ कहते हैं-चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥ २७ ॥
शब्दार्थ –चन्द्रे - चन्द्रमामें ( संयम करनेसे ); तारा - व्यूह -ज्ञानम् = ताराओंके व्यूहका ( नक्षत्रोंके-स्थान - विशेषका ) ज्ञान होता है । अन्वयार्थ — चन्द्रमामें संयम करनेसे ताराओंके व्यूहका ज्ञान होता है । व्यास्था – ताराओंकी स्थितिका अर्थात् अमुक तारा अमुक स्थानपर है इसका यथावत् ज्ञान चन्द्रमामें संयम करनेसे होता है । पृथिवी एक दिनमें प्रायः दो - दो घंटोंमें एक - एक राशिके हिसाबसे, बारह राशियोंको एक बार देखा करती है और एक - एक राशिमें एक - एक मासतक निवास करती हुई बारह राशियोंका चक्कर बारह मासोंमें अर्थात् एक वर्षमें करती है; परंतु चन्द्रमा चूँकि अपने चान्द्रमासमें एक बार पृथिवीके चारों ओर घूमता है, अर्थात् एक चान्द्रमासमें बारह राशियोंमें एक बार घूम लेता है, इसलिये एक वर्षमें चन्द्र बारह राशियोंमें बारह बार घूमेगा । इस कारण चन्द्रमें संयमद्वारा उन योगीको सबमें राशि - चक्रका ज्ञान सुगम रीतिसे हो सकता है । ज्योतिषका यह सिद्धान्त है कि जितने ग्रह हैं, चन्द्र एक राशिपर सबसे कम समयतक रहता है, इस हिसाब से प्रत्येक तारा - विकर्षण व्यूह राशिकी शक्तिके आकर्षण - विकर्षण शक्तिके साथ चन्द्रका अतिघनिष्ठ सम्बन्ध है । अतः उस आकर्षण आलम्बनसे युक्त तारा व्यूहके ज्ञानमें चन्द्रकी सहायता ली जा सकती है । गयी है । टिप्पणी - कई टीकाकारोंने चन्द्रमासे इडा नाड़ी अर्थ लिया है जो सुषुम्नाके वाम ओरसे सम्बन्ध है । यह अर्थ व्यासभाष्य और भोजवृत्तिके अभिमत नहीं है और न इसका प्रसङ्गसे कोई ( ५२८ )
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सूत्र २८-३१ ] कूर्मनाड्यां स्थैर्यम्* * [ विभूतिपाद ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥ २८ ॥
शब्दार्थ — ध्रुवे - ध्रुवमें संयम करनेसे; तद् - गति - ज्ञानम् = उनकी ( ताराओंकी ) गतिका ज्ञान होता है । अन्वयार्थ — ध्रुवमें संयम करनेसे ताराओंकी गतिका ज्ञान होता है । व्याख्या — ध्रुव सब ताराओंमें प्रधान और निश्चल है । इसीलिये उसमें संयम करनेसे प्रत्येक ताराकी गतिका ज्ञान, नियत काल और नियत देश - सहित हो जाता है । अर्थात् इतने समयमें यह तारा अमुक राशि, अमुक नक्षत्रमें जायगा । टिप्पणी - कई टीकाकारोंने ध्रुवसे सुषुम्ना नाड़ी अर्थ लिया है जो मेरुदण्डमें मूलाधारसे लेकर सहस्रदलतक चली गयी है । पूर्व सूत्रकी टिप्पणीमें इस सम्बन्धमें जो लिख आये हैं वही यहाँ भी समझना चाहिये । व्यासभाष्यमें इतना और है- ऊर्ध्व ( आकाशमें उड़नेवाले ) विमानोंमें संयम करनेसे उनका ज्ञान होता है । सङ्गति — बाहरकी सिद्धियोंका प्रतिपादन करके अब आभ्यन्तर सिद्धियोंका आरम्भ करते हैं-नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥ २ ९ ॥ शब्दार्थ – नाभि - चक्रे - नाभि - चक्रमें संयम करनेसे; काय - व्यूह - ज्ञानम् - शरीरके व्यूहका ज्ञान होता है । अन्वयार्थ – नाभि - चक्रमें संयम करनेसे शरीरके व्यूहका ज्ञान होता है । व्याख्या – सोलह अरों ( सिरों ) वाला नाभिचक्र, शरीरके मध्यमें है और सब ओर फैली हुई नाड़ियों आदिका विशेष स्थान है । इसीलिये इसमें संयम करनेसे शरीरमें रहनेवाली वात, पित्त, कफ – तीनों दोष और त्वचा, रक्त, मांस, नाड़ी, हड्डी, चरबी, वीर्य - सातों धातुओं की स्थिति आदिका पूरा - पूरा ज्ञान हो जाता है । कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥ ३० ॥
- कण्ठ- 5- कूपमें ( संयम करनेसे ); क्षुत् - पिपासा - निवृत्तिः = क्षुधा और शब्दार्थ - कण्ठ - कूपे पिपासाकी निवृत्ति होती है । अन्वयार्थ — कण्ठ - कूपमें संयम करनेसे क्षुधा और पिपासा ( भूख - प्यास ) की निवृत्ति होती है । व्याख्या – जिह्वाके नीचे सूतके समान एक नस है, उसके नीचे कण्ठ है । उस कण्ठके नीचे जो गढ़ा है उसे कण्ठकूप कहते हैं । उस स्थानमें प्राणादिका स्पर्श होनेसे पुरुषको भूख - प्यास लगती है । इसलिये इस कण्ठ - कूपमें संयमद्वारा प्राणादिके स्पर्शकी निवृत्ति हो जानेसे योगीको भूख - प्यास नहीं लगती है । कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥ ३१ ॥
शब्दार्थ – कूर्मनाड्याम् = कूर्मनाड़ीमें ( संयम करनेसे ); स्थैर्यम् - स्थिरता होती है । अन्वयार्थ— कूर्म - नाड़ीमें संयम करनेसे स्थिरता होती है । व्याख्या – कण्ठ - कूपके नीचे छातीमें कछुवेके आकारवाली एक नाड़ी है । उसे कूर्म उसमें संयम करनेसे स्थिरताकी प्राप्ति होती है । जैसे सर्प और गोह स्थिर - नाड़ी कहते हैं । वास्तविक घटना भी है — सर्प छिद्रमें आधा घुसा हो तो आधेको पकड़कर होते हैं । ( प्रसिद्ध भी है और वह ऐसा जम जाता है कि चाहे टूट जाये परंतु खिंचता नहीं । यही बात कितना ही बलपूर्वक खींचे प्रायः चोर किसी छतपर चढ़नेके निमित्त गोहके कमरमें रस्सी बाँधकर गोहके सम्बन्धमें भी प्रसिद्ध है । उसको ऊपर चढ़ा देते हैं । जब वह ( ५२ ९ )
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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३२-३४ मुँडेरपर पहुँच जाती है तब पैर जमा लेती है और चोर रस्सीके सहारे ऊपर चढ़ जाते हैं । श्रीअङ्गदजीके पैर न उठनेकी बात भी इसी संयमकी सिद्धिकी सूचक हो सकती है । ) मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥ ३२ ॥
शब्दार्थ - मूर्ध - ज्योतिषि - मूर्धाकी ज्योतिमें ( संयम करनेसे ); सिद्ध - दर्शनम् = सिद्धोंका दर्शन होता अन्वयार्थ - मूर्धाकी ज्योतिमें संयम करनेसे सिद्धोंका दर्शन होता है है । व्याख्या — शरीरके कपालमें ब्रह्म- रन्ध्र नामक एक छिद्र है । उसमें जो प्रकाशवाली ज्योति है वह मूर्धा - ज्योति कहलाती है । उसमें संयम करनेसे सिद्धोंके दर्शन होते हैं । द्यौ और पृथिवीलोकमें विचरनेवाले सिद्ध ( व्यासभाष्य ) द्यौ और पृथिवीलोकके अन्तरालमें विचरनेवाले सिद्ध, अर्थात् दिव्य - पुरुष जो दूसरे प्राणियोंको अदृश्य रहते हैं, योगी उनको ध्यानावस्थामें देखता है और उनके साथ भाषण करता है । ( भोजवृत्ति ) विशेष विचार — इस ज्योतिका सम्बन्ध भ्रुकुटी अर्थात् आज्ञाचक्रसे है । इसलिये ब्रह्मरन्ध्रमें प्राण तथा मनको स्थिर करनेके पश्चात् जब आज्ञाचक्रमें ध्यान किया जाता है तो इस मूर्धा - ज्योतिके सत्त्वगुणके प्रकाशमें सूक्ष्म जगत्का अनुभव होने लगता है । विशेष १ । ३४ के वि ॰ व ॰ में देखो । सङ्गति — सब वस्तुओंको जाननेका उपाय कहते हैं-प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥ ३३ ॥
शब्दार्थ — प्रातिभाद्वा = अथवा प्रातिभ - ज्ञानसे; सर्वम् - सब कुछ जाना जाता है । अन्वयार्थ – अथवा प्रातिभ - ज्ञानसे योगी सब कुछ जान लेता है । व्याख्या – प्रातिभ ( Intutional insight ) वह प्रकाश अथवा ज्ञान है जो बिना किसी बाहरके निमित्तके स्वयं अंदरसे प्राप्त हो । प्रातिभ ही तारक - ज्ञान ( ३-५४ ) का नाम है, यह विवेकज्ञानका प्रथम रूप है । जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेका प्रथम ज्ञापक चिन्ह प्रभा है, इसी प्रकार प्रसंख्यानके उदय होनेका प्रथम लिङ्ग प्रातिभज्ञान है । जैसे सूर्यकी प्रभाके उत्पन्न होनेपर सब कुछ जाना जा सकता है इसी प्रकार प्रातिभ - ज्ञानकी उत्पत्ति होनेपर योगी बिना संयमके ही सब कुछ जान लेते हैं । वा ( अथवा ) शब्द इस अभिप्रायसे लगाया गया है कि इससे पूर्व जो - जो संयम कहा गया है उससे जिन - जिन विषयोंका
ज्ञान होता है यह सब प्रातिभ - ज्ञानसे हो जाता है ।
हृदये चित्तसंवित् ॥ ३४ ॥
शब्दार्थ — हृदये - हृदयमें ( संयम करनेसे ); चित्तसंवित् - चित्तका ज्ञान होता है । अन्वयार्थ — हृदयमें संयम करनेसे चित्तका ज्ञान होता है । व्याख्या — हृदयकमल चित्तका निवासस्थान है, उसमें संयम करनेसे वृत्तिसहित चित्तका साक्षात्कार होता है । विशेष व्याख्या १ । ३४ के वि ० व ॰ में अनाहतचक्र देखें । टिप्पणी — हृदय शरीरमें विशेष स्थान है; उसमें सूक्ष्म कमलाकार जिसका मुख नीचेको है उसके अंदर अन्तःकरण चित्तका स्थान है । उसमें जिस योगीने संयम किया है, उसको अपने और दूसरेके चित्तका ज्ञान उत्पन्न होता है । अपने चित्तमें प्रविष्ट सब वासनाओं और दूसरेके चित्तमें प्रविष्ट रागादिको जान लेता है । यह अर्थ है भोजवृत्ति । ( ५३० )
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सूत्र ३५ ] • सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः * पुरुषज्ञानम् * [ विभूतिपाद सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थान्य-स्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम् ॥ ३५ ॥
शब्दार्थ – सत्त्व - पुरुषयोः = चित्त और पुरुष; अत्यन्त - असंकीर्णयोः = जो परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं ( इन दोनोंकी ); प्रत्यय - अविशेषः = प्रतीतियोंका अभेद; भोगः = भोग है; उनमेंसे; परार्थ = परार्थ - प्रतीति ( से ); अन्य - स्वार्थ - संयमात् - भिन्न जो स्वार्थ - प्रीति ( पौरुषेय प्रत्यय ) है उसमें संयम करनेसे; पुरुषज्ञानम् = पुरुषका ज्ञान होता है अर्थात् पुरुष - विषयक प्रज्ञा उत्पन्न होती है । अन्वयार्थ - चित्त और पुरुष जो परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं, इन दोनोंकी प्रतीतियोंका अभेद भोग है । उनमेंसे परार्थ - प्रतीतिसे भिन्न जो स्वार्थ - प्रतीति है उसमें संयम करनेसे पुरुषका ज्ञान होता है अर्थात् पुरुष - विषयक प्रज्ञा उत्पन्न होती है । व्याख्या – सत्त्व अर्थात् चित्त प्रकाश और सुखरूप होनेसे और पुरुष ज्ञानस्वरूप होनेसे तुल्य - -जैसे जे प्रतीत होते हैं, किंतु वास्तवमें ये दोनों अत्यन्त भिन्न हैं; क्योंकि चित्त परिणामी, जड और भोग्यरूप है और पुरुष निर्विकार, चैतन्य और भोक्ता - स्वरूप है । इस जड चित्तमें चैतन्य पुरुषसे प्रतिबिम्बित होकर जो दुःख, सुख और मोहरूपी वृत्तियोंका उदय होना है, यह प्रत्ययाविशेष है; क्योंकि इससे चित्तके धर्म सुख, दुःख और मोह आदिका चित्तमें प्रतिबिम्बित चैतन्य पुरुषमें अध्यारोप होता है । यही प्रत्ययाविशेष अर्थात् चित्त और चित्तमें प्रतिबिम्बित चेतनके प्रत्ययों ( वृत्तियों ) का अभेद भोग है । यह भोगरूप प्रत्यय यद्यपि चित्तका धर्म है तथापि चित्तको ( परार्थत्वात् ) पुरुषके अर्थवाला होनेसे और पुरुषका चित्तका भोक्ता होनेसे यह भोगरूप प्रत्यय भी परार्थ अर्थात् पुरुषके अर्थ है । और जो भोगरूप प्रत्ययसे भिन्न चेतनमात्रको अवलम्बन करनेवाला पौरुषेय प्रत्ययरूप चित्तका धर्म है वह स्वार्थ प्रत्यय है I अर्थात् यद्यपि सुख - दुःखादिके अनुभवका नाम भोग है और भोगका अनुभव करनेवाला भोक्ता कहलाता है ऐसा भोग - कर्तृत्वरूप भोक्तृत्व निर्विकार - चेतन - पुरुषमें भी वास्तवमें सम्भव नहीं है, तथापि चित्तके धर्म इस प्रत्ययरूप भोग, सुख - दुःख आदिका पुरुषके प्रतिबिम्बद्वारा पुरुषमें आरोप- स्वरूप ही है । जैसे स्वच्छ जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमामें जलके कम्पनसे चन्द्रमा काँपता है, ऐसा कम्पनका आरोप होता है । वास्तवमें चन्द्रमामें कम्पन नहीं होता है, वैसे ही यह भोग चित्तका परिणाम होनेके कारण वास्तवमें चित्तहीमें होता है, परंतु प्रतिबिम्बद्वारा निर्विकार पुरुषमें सुख - दुःखादिका आरोपरूप भोग है । इसलिये आरोपित भोगवाला होनेसे पुरुष भोक्ता कहलाता है । ऐसा चित्तका परिणाम प्रत्ययस्वरूप भोग जड होनेसे परार्थ है और परार्थ होनेसे भोग्य है; क्योंकि जो वस्तु परार्थ होती है वह भोग्य होती है । इस परार्थ जड - भोगसे भिन्न जो पुरुषका प्रतिबिम्बित रूप प्रत्यय है वह स्वार्थ कहलाता है । वह पौरुषेय प्रत्ययरूप भोग किसीका भोग्य नहीं है । उस प्रतिबिम्बरूप स्वार्थ - प्रत्ययको पौरुषेय - बोध भी कहते हैं । इस स्वार्थ - प्रत्ययमें संयम करनेसे पुरुष ( विषयक ) पौरुषेय- ज्ञान -प्रत्यय और अर्थात् पुरुषको विषय करनेवाली प्रज्ञा उत्पन्न होती है । इससे यह नहीं समझना चाहिये उत्पन्न होता है पुरुष व - -3 प्रत्ययसे पुरुष जाना जाता है, किंतु पुरुष ही चित्तमें प्रतिबिम्बित हुआ स्वात्मावलम्बन कि चित्तके धर्म स्वरूपको प्रकाश करनेवाली ) रूप प्रत्ययको देखता है; क्योंकि ज्ञाता ( अपने नहीं जाना जा सकता है, जैसा बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा है— पुरुषका वास्तविक स्वरूप चित्तद्वारा ( ५३१ )
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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ३६ विज्ञातारमरे केन विजानीयात् । अर्थ- सबको जाननेवाले विज्ञानीको किससे जाना जा सकता है अर्थात् किसीसेनहीं जाना जा सकता है । विशेष वक्तव्य – सूत्र ३५ । वाचस्पति आदिने इस सूत्रमें " परार्थस्वार्थसंयमात् " पाठ पढ़कर -शब्दका अध्याहार करके अर्थ पूरा किया है । पर भोजवृत्तिका पाठ “ परार्थान्यस्वार्थसंयमात् ' अन्य ” ' अध्याहारकी अपेक्षा नहीं रखता । इसलिये यहाँ यही पाठ रखा गया है । इस सूत्रके भावको औरअधिक स्पष्ट करनेके उद्देश्यसे भोजवृत्तिका भाषार्थ भी दिये देते हैं-भोजवृत्तिका भाषार्थ – सूत्र ३५ । सत्त्व ( चित्त = बुद्धि ) जो प्रकाश और सुखरूप है वह प्रकृतिका परिणाम - विशेष है । पुरुष उसका भोक्ता और अधिष्ठाता ( स्वामी ) रूप है । ये दोनों भोग्य - भोक्ता और जड - चेतनरूप होनेसे अत्यन्त भिन्न हैं । इन दोनोंके प्रत्ययों ( वृत्तियों - ज्ञानों ) का जो अविशेष अर्थात् अभेदका भासित होना है उससे सत्त्व ( चित्त = बुद्धि = अन्तःकरण ) की कर्तृत्व - वृत्तिद्वारा जो सुख, दुःखका ज्ञान होना है वह भोग है । सत्त्व ( चित्त = बुद्धि ) स्वार्थ अर्थात् अपने किसी प्रयोजनकी अपेक्षा नहीं रखता इसलिये वह भोग उसके लिये ' स्वार्थ ' नहीं है, किंतु ' परार्थ ' दूसरेके निमित्त अर्थात् पुरुषके निमित्त है । उससे भिन्न ' स्वार्थ ' पुरुषका अपने स्वरूपमात्रका आलम्बन ( अपने स्वरूपका विषय करना ) अर्थात् अहंकार - रहित सत्त्व ( चित्त = बुद्धि ) में जो चेतनकी छाया ( प्रतिबिम्ब ) का संक्रमण है उसमें संयम करनेवाले योगीको पुरुष - विषयक ज्ञान उत्पन्न होता है । इस प्रकार पुरुष स्वावलम्बन ( अपने स्वरूपको विषय करनेवाले ) सत्त्व ( चित्त ) में रहनेवाले ज्ञानको जान लेता है । यह नहीं है ( इससे यह न समझना चाहिये ) कि इस प्रकार ज्ञाता चेतन पुरुष ज्ञानसे जाना जाता है; क्योंकि ऐसा माननेमें ज्ञाता पुरुष ज्ञेय ( ज्ञानका विषय ) मानना पड़ेगा और ज्ञाता और ज्ञेयमें अत्यन्त भेद है I सङ्गति – स्वार्थ - प्रत्ययके संयमके मुख्य - फल अर्थात् पुरुष - ज्ञानके उत्पन्न होनेसे पूर्व जो सिद्धियाँ होती हैं, उनका निरूपण करते हैं— ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥ ३६ ॥
स्वार्थसंयमके अभ्याससे; प्रातिभ - श्रावण- वेदना - आदर्श - आस्वाद-शब्दार्थ - ततः = उस वार्ता जायन्ते = प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद और वार्ता - I -ज्ञान उत्पन्न होता है । अन्वयार्थ — उस स्वार्थ - संयमके अभ्याससे प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद और वार्ता - ज्ञान उत्पन्न होता है । व्याख्या — स्वार्थ - संयमके अभ्याससे पुरुष - ज्ञान उत्पन्न होनेसे पूर्व निम्न प्रकारकी छः सिद्धियाँ प्रकट होती हैं-१ प्रातिभ - मनमें सूक्ष्म ( अतीन्द्रिय ), व्यवहित ( छिपी हुई ), विप्रकृष्ट ( दूरस्थ ), अतीत और अनागत वस्तुओंके जाननेकी योग्यता । सूत्र ३ । ३३ । २ श्रावण- - श्रोत्रेन्द्रियकी दिव्य और दूरके शब्द सुननेकी योग्यता । ३ वेदना – त्वचा - इन्द्रियकी दिव्यस्पर्श जाननेकी योग्यता । ( ५३२ )
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बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः सूत्र ३७-३८ ] * * [ विभूतिपाद ‘ वेद्यतेऽनया ' इस व्युत्पत्तिके द्वारा स्पर्शेन्द्रियमें उत्पन्न ज्ञानकी ' वेदना ' संज्ञा है । ( भोजवृत्ति ) ४ आदर्श – नेत्रेन्द्रियकी दिव्य रूप देखनेकी योग्यता । आ समन्ताद् दृश्यतेऽनुभूयते रूपमनेन । ( भोजवृत्ति ) इस व्युत्पत्तिसे नेत्रेन्द्रियसे उत्पन्न ज्ञानका नाम आदर्श है।— ५ आस्वाद — रसनेन्द्रियकी दिव्य रस जाननेकी योग्यता । ६ वार्ता — घ्राणेन्द्रियकी दिव्य गन्ध सूँघनेकी योग्यता । शास्त्रीय परिभाषामें वृत्ति शब्द घ्राणेन्द्रियका वाची है ' वर्तते गन्धविषये इति वृत्ति: ' गन्ध जिसका विषय है वह वृत्ति है अर्थात् नासिकाग्रवर्ती घ्राणेन्द्रिय है, उससे उत्पन्न हुआ ज्ञान ‘ वार्ता ’ कहलाता है - - ( भोजवृत्ति ) सङ्गति —– स्वार्थ प्रत्ययका संयम पुरुष - ज्ञानके निमित्त किया है; उससे पूर्व इन सिद्धियोंको पाकर योगी अपने - आपको कृतार्थ मानकर उपरामको प्राप्त न हो जावे किंतु पुरुष - ज्ञानके लिये बराबर प्रयत्न करता रहे, इस हेतुसे कहते हैं— ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥ ३७ ॥
शब्दार्थ –ते = वे उपर्युक्त छः सिद्धियाँ; समाधौ - उपसर्गाः समाधि ( पुरुष - दर्शन ) में विघ्न हैं; व्युत्थाने सिद्धयः = व्युत्थानमें सिद्धियाँ हैं । अन्वयार्थ – वे उपर्युक्त छः सिद्धियाँ समाधि ( पुरुष - दर्शन ) में विघ्न हैं, व्युत्थानमें सिद्धियाँ हैं । व्याख्या- -पिछले सूत्रमें बतलायी हुई छः सिद्धियाँ एकाग्र चित्तवालोंको समाधि- प्राप्ति ( पुरुषदर्शन ) में विघ्नकारक हैं; क्योंकि उनमें हर्ष, गौरव, आश्चर्यादि करनेसे समाधि शिथिल होती है, पर व्युत्थान - दशामें विशेष फलदायक होनेसे सिद्धिरूप होती हैं अर्थात् जैसे जन्मका कँगला अत्यल्प द्रव्यको पाकर ही अपने - आपको कृतार्थ समझने लगता है वैसे ही विक्षिप्त चित्तवालोंको ही पुरुष - ज्ञानसे पूर्व होनेवाले उपर्युक्त प्रातिभादि छः ऐश्वर्य सिद्धिरूप दीखते हैं । समाहित चित्तवाला योगी इन प्राप्त ऐश्वर्योंसे दोष- दृष्टिद्वारा उपराम होकर इनको समाधिमें रुकावट जानकर अपने अन्तिम लक्ष्य आत्मसाक्षात्कारके लिये स्वार्थ - संयमका निरन्तर प्रमाद - रहित होकर अभ्यास करता रहे । सङ्गति – पुरुष - दर्शनपर्यन्त संयमका फल ज्ञानरूप ऐश्वर्य - विभूतियोंका निरूपण करके अब क्रियारूप सिद्धियोंको दिखलाते हैं— बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥ ३८ ॥
शब्दार्थ — बन्ध - कारण - शैथिल्यात् - बन्धके कारणके शिथिल करनेसे; प्रचार - संवेदनात् - च - और घूमनेके मार्ग जाननेसे; चित्तस्य - चित्तका ( सूक्ष्म - शरीरका ); पर - शरीर - आवेशः - दूसरेके शरीरमें आवेश होता है अन्वयार्थ — बन्धके कारणके शिथिल करनेसे और घूमनेके मार्गके जाननेसे चित्त ( सूक्ष्म - शरीर ) का । दूसरेके शरीरमें आवेश होता है । व्याख्या – चित्तका शरीरमें बन्ध रहनेका कारण धर्माऽधर्म अर्थात् सकाम कर्म और उनकी वासनाएँ ( ५३३ )