पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 581–590

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र ४५ सामान्यका और स्नेहादि धर्मोंसहित शब्दादि विशेषोंका ' अयुतसिद्धावयव प्रकार सामान्य - विशेषोंका ' अयुतसिद्धावयव समुदाय ' रूप अग्नि आदि द्रव्य समुदाय भी जान ' रूप जल द्रव्य है । इसी सामान्य - विशेषोंका समुदायरूप द्रव्य सूत्रमें ' स्वरूप ' शब्दसे बतलाये हुए पाँचों लेना चाहिये । यही भूतोंका दूसरा रूप है । इन पृथ्वी आदि पाँचों भूतोंके कारण पञ्चतन्मात्राएँ हैं और तन्मात्राओंके परिणाम तन्मात्राएँ परमाणुओंका ‘ अयुतसिद्ध अवयवानुगत समुदाय ' हैं । इसलिये परमाणु हैं अर्थात् सूत्रमें सूक्ष्म पदसे बतलाये हुए पाँचों भूतोंके तृतीय रूप हैं अर्थात् पाँचों परमाणु और पञ्चतन्मात्राएँ हैं, वैसे ही पञ्चतन्मात्राएँ परमाणुओंके सूक्ष्म रूप हैं । भूतोंके जैसे परमाणु सूक्ष्म रूप भूतादि सर्व कार्योंमें अनुगत जो प्रकाश - क्रिया - स्थितिशील तीन गुण हैं, वे सूत्रमें अन्वय बतलाये हुए पाँचों भूतोंका चतुर्थ रूप हैं । शब्दसे पुरुषके भोग और अपवर्गके सम्पादन करनेका जो गुणोंमें सामर्थ्यविशेष है, वह सूत्रमें अर्थवत् शब्दसे कथन किया हुआ भूतोंका पाँचवाँ रूप है I जो यहाँ इतना और जान लेना चाहिये कि गुणोंमें तो भोगापवर्ग - सम्पादनकी सामर्थ्य साक्षात् अनुगत हैऔर तन्मात्राभूत आदिकोंमें परम्परासे ( गुणोंद्वारा ) अनुगत है तथा साक्षात् और परम्परासे सभी पदार्थ अर्थवत्तावाले हैं । इस प्रकार पाँच भूतोंके पाँच रूपोंमें जिस - जिस रूपमें योगी संयम करता है, उस - उस रूपका योगीको साक्षात्कार जय और होता है । स्थूल स्वरूप सूक्ष्मादि रूपोंके क्रमसे पाँचों भूतोंके पाँचों रूपोंमें संयम करनेसे योगीको पाँचों भूतोंका प्रत्यक्ष और वशीकार हो जाता है । ऐसे योगीको भूतजयी कहते हैं । सब भूतोंकी प्रकृतियाँ उसके संकल्पानुसार हो जाती हैं अर्थात् भूतोंका स्वभाव उसके संकल्पानुसार हो जाता है । उपर्युक्त कथित भूतजयकी कई सिद्धियाँ पूज्यपाद परमहंस श्रीविशुद्धानन्दजी महाराज प्रसिद्ध गन्धबाबा ( जिनकी सिद्धियोंसे पाश्चात्त्य विद्वान् भी विस्मित होते थे ) में देखी गयी थीं, जिनके जीवनके अन्तसमयमें लेखकको लगभग छः मास सेवामें रहनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था । सङ्गति - भूतजयका फल बतलाते हैं— ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च ॥ ४५ ॥

शब्दार्थ – ततः - उससे ( भूतजयसे ); अणिमादि - प्रादुर्भावः = अणिमादि आठ सिद्धियोंका प्रादुर्भाव; काय - सम्पत् = काया सम्पत्; तत् - धर्म - अनभिघातः- च = और पाँचों भूतोंके धर्मोसे चोटका न लगना- - रुकावट न होना होता है । अन्वयार्थ — उस भूतजयसे अणिमा आदि आठ सिद्धियोंका प्रादुर्भाव और कायसम्पत् होती है और उन पाँचों भूतोंके धर्मोंसे रुकावट नहीं होती । व्याख्या – चौवालीसवें सूत्रमें बताये हुए भूतजयसे निम्न प्रकारकी आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । १ अणिमा — शरीरका सूक्ष्म कर लेना । २ लघिमा – शरीरका हलका कर लेना -३ महिमा — शरीरका बड़ा कर लेना । ४ प्राप्ति - जिस पदार्थको चाहें प्राप्त कर लेना । ये सिद्धियाँ भूतोंमें संयम करनेसे प्राप्त होती हैं । ५ प्राकाम्य – बिना रुकावटके इच्छा पूर्ण होना । यह पाँचों भूतोंके स्वरूपमें संयम करनेसे सिद्ध होती है । ( ५४४ )

पृष्ठ 582

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सूत्र ४६ ] * रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् * [ विभूतिपाद ६ वशित्व — पाँचों भूतों तथा भौतिक पदार्थोंका वशमें कर लेना ( भूतोंके सूक्ष्मरूपमें संयम करनेसे ) । ७ ईशित्व — भूत - भौतिकं पदार्थोंके उत्पत्ति - विनाशका सामर्थ्य । ( यह सिद्धि अन्वयमें संयम करनेसे प्राप्त होती है । ) ८ यत्रकामावसायित्व — प्रत्येक संकल्पका पूरा हो जाना अर्थात् जैसा योगी संकल्प करे उसके अनुसार भूतोंके स्वभावका अवस्थापन हो जाना है । वह योगी यदि संकल्प करे तो अमृतकी जगह विष खिलाकर भी पुरुषको जीवित कर सकता है । ( यह सिद्धि अर्थवत्त्वमें संयम करनेसे प्राप्त होती है । ) ये सब संकल्प होते हुए भी योगीके संकल्प ईश्वरीय नियमके विपरीत नहीं होते । अपने परमगुरु नित्यसिद्ध योगिराज ईश्वरके संकल्पानुसार ही योगियोंका संकल्प होता है । भगवत् - भाष्यकार कामावसायी योगीके सम्बन्धमें लिखते हैं कि यद्यपि यह योगी सर्वसामर्थ्यवाला है तथापि वह पदार्थोंकी शक्तियोंको ही विपरीत करता है न कि पदार्थोंको । अर्थात् चन्द्रमाको सूर्य और सूर्यको चन्द्रमा तथा विषको अमृत नहीं करता है, किंतु विषमें जो प्राण - वियोग करनेकी शक्ति है, उसको निवृत्त कर उसमें जीवन - शक्तिका सम्पादन कर देता है; क्योंकि पदार्थोंका विपरीत होना नित्यसिद्ध ईश्वरके संकल्पके विरुद्ध है । इसलिये ऐसा नहीं होता है और शक्तियाँ पदार्थोंकी अनियत हैं । इसलिये उनके विपरीत करनेमें कोई दोष नहीं अर्थात् पूर्वसिद्ध अन्यकामावसायी सत्यसंकल्प ईश्वरका यह संकल्प है कि सूर्य सूर्य ही रहे और चन्द्रमा चन्द्रमा ही रहे । इसलिये उसकी आज्ञाके विरुद्ध योगी संकल्प नहीं कर सकता । यहाँ यह भी जान लेना चाहिये कि कामावसायी योगी शुद्धचित्त और न्यायकारी होते हैं । उनका संकल्प, ईश्वर - संकल्प और उसकी आज्ञाके विपरीत नहीं होता है । इसलिये जब कभी वे अपने इस ऐश्वर्यको काममें लाते हैं तो वह ईश्वरके संकल्प और उसके आज्ञानुसार न्याय और व्यवस्थाके धारणार्थ ही होता है । ( १ ) कायसम्पत् — शरीरकी सम्पदा । इसका वर्णन अगले सूत्रमें दिया है । ( २ ) तद्धर्मानभिघातः — इन पाँचों भूतोंके कार्य योगीके विरुद्ध रुकावट नहीं डालते अर्थात् मूर्तिमान् कठिन पृथ्वी योगीकी शरीरादि क्रियाको नहीं रोकती । शिलामें भी योगी प्रवेश कर जाता है । जलका स्नेहधर्म योगीको गीला नहीं कर सकता । अग्निकी उष्णता उसको नहीं जला सकती । वहनशील वायु उसको नहीं उड़ा सकता । अनावरणरूप आकाशमें भी योगी अपने शरीरको ढक लेता है और सिद्ध पुरुषोंसे भी अदृश्य हो जाता है । सङ्गति – अगले सूत्रमें कायसम्पत्को बतलाते हैं— रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् ॥ ४६ ॥

शब्दार्थ – रूप = रूप; लावण्य = लावण्य; बल - बल; वज्रसंहननत्वानि - वज्रकी - सी बनावट; कायसम्पत् - शरीरकी सम्पदा कहलाती है । अन्वयार्थ – रूप, लावण्य, बल, वज्रकी - सी बनावट । कायसम्पत् ( शरीरकी सम्पदा ) कहलाती है । व्याख्या - १ रूप- -मुखकी आकृतिका अच्छा और दर्शनीय हो जाना । २ लावण्य- - सारे अङ्गोंमें कान्तिका हो जाना । ३ बल - बलका अधिक हो जाना । ( ५४५ )

पृष्ठ 583

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ४७ ४ वज्रसंहननत्वानि — शरीरके प्रत्येक अङ्गका वज्रके सदृश दृढ़ और पुष्ट हो जाना । यह कायसम्पत् कहलाती है । सङ्गति – ग्राह्य भूतोंमें संयम करनेकी विधि दिखलाकर अगले सूत्रोंमें ग्रहण इन्द्रियोंमें संयम दिखलाते हैं-ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ॥ ४७ ॥

शब्दार्थ — ग्रहण = ग्रहण; स्वरूप = स्वरूप; अस्मिता = अस्मिता; अन्वय = अन्वय; अर्थवत्त्व = अर्थवत्त्वमें; संयमात् = संयम करनेसे; इन्द्रिय - जय: - इन्द्रियजय होता है । = अन्वयार्थ — ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्वमें संयम करनेसे इन्द्रियजय होता है । व्याख्या – इन्द्रियोंके निम्न पाँच रूप हैं । इन पाँचों रूपोंमें क्रमसे साक्षात्पर्यन्त संयम करनेसे इन्द्रिय - जय - सामार्थ्य प्राप्त होती है । १ ग्रहण - - इन्द्रियोंकी विषयाभिमुखी वृत्ति ग्रहण कहलाती है । २ स्वरूप – सामान्य रूपसे इन्द्रियोंका प्रकाशकत्त्व, जैसे नेत्रोंका नेत्रत्व आदि स्वरूप कहलाता है । ३ अस्मिता - इन्द्रियोंका कारण अहंकार, जिसका इन्द्रियाँ विशेष परिणाम हैं । ४ अन्वय — सत्त्व, रजस् और तमस् तीनों गुण, जो अपने प्रकाश, क्रिया, स्थिति धर्मसे इन्द्रियोंमें अन्वयीभावसे अनुगत हैं I

५ अर्थवत्त्व — इनका प्रयोजन पुरुषको भोग– अपवर्ग दिलाना ।

टिप्पणी- व्यासभाष्यका भाषानुवाद । सूत्र ४७ ॥

सूत्रकी उपर्युक्त सरल और संक्षिप्त व्याख्या कर दी गयी है । यहाँ व्यासभाष्यका स्पष्टीकरणके साथ अनुवाद किया जाता है । पाँच ज्ञानेन्द्रियोंमें एक - एक इन्द्रियके पाँच - पाँच रूप हैं-( १ ) इनमें सामान्य - विशेष रूप जो शब्दादि ग्राह्य विषय और श्रोत्रादि इन्द्रियोंकी जो विषयाकार परिणामरूप वृत्ति है, वह ग्रहण पदका अर्थ है । यह इन्द्रियोंकी वृत्ति केवल सामान्यमात्रविषयक नहीं होती है, किंतु सामान्य - विशेष दोनों विषयवाली होती है । I यदि विशेषविषयक इन्द्रियोंकी वृत्ति न मानी जाय तो इन्द्रियोंसे अनुगृहीत होनेके कारण वह विशेष मनसे निश्चित न किया जा सकेगा; क्योंकि बाह्य इन्द्रियोंके अधीन होकर ही मन बाह्य विषयोंमें अनुव्यवसायवाला होता है, स्वतन्त्र नहीं होता है; इसलिये प - -1 विशेषरूप विषयाकार ही इन्द्रियोंकी वृत्ति होती है । यह सूत्रमें ग्रहणपदसे कथन किया हुआ सामान्य इन्द्रियोंका प्रथम रूप है । ( २ ) प्रकाशात्मक महत्तत्त्वका परिणाम जो अयुतसिद्ध अवयव सात्त्विक अहंकार है, उसमें कार्यरूपसे अनुगत जो सामान्य- विशेष रूप द्रव्य है, वह इन्द्रियोंका स्वरूप है अर्थात् सात्त्विक अहंकारका कार्य जो प्रकाशस्वरूप द्रव्य ' इन्द्रिय ' है, वह इन्द्रियोंका ' स्वरूप नामक ' दूसरा रूप है । ( ३ ) इन्द्रियोंका कारण जो अहंकार है, वह इन्द्रियोंका अस्मिता नामक तीसरा रूप है । इस सामान्य रूप अहंकारके इन्द्रियाँ विशेष परिणाम हैं । ( ४ ) व्यवसायात्मक ( निश्चयात्मक ) महत्तत्त्वके आकारसे परिणामको प्राप्त हुए जो प्रकाश-पा ० यो ० प्र ०१ ९- ( ५४६ )

पृष्ठ 584

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सूत्र ४८-४९ ] * सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च * [ विभूतिपाद प्रवृत्ति - स्थितिशील गुण हैं, वह अन्वय नामक इन्द्रियोंका चौथा रूप है अर्थात् अहंकारके साथ इन्द्रियोंको महत्तत्त्वका परिणामहोनेसे और महत्तत्त्वको गुणोंका परिणाम होनेसे तीनों गुण इन्द्रियोंमें अनुगत हैं; इसलिये गुणोंको अन्वयरूप कहा जाता है I ( ५ ) गुणोंमें अनुगत जो पुरुषके भोग अपवर्ग - सम्पादनकी सामर्थ्य है, वह अर्थवत्त्व नामक इन्द्रियोंका पाँचवाँ रूप है । इन पाँचों इन्द्रियोंके रूपमें क्रमसे संयम करनेसे उस - उस रूपके जयद्वारा पाँचों रूपोंका जय होनेसे योगीको इन्द्रियजय प्राप्त होता है । सङ्गति — इन्द्रिय - जयका फल बताते हैं-ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥ ४८ ॥

शब्दार्थ – ततः = उससे ( इन्द्रियजयसे ); मनोजवित्वं = मनोजवित्व; विकरणभावः - विकरणभाव; प्रधान - जयः च = और प्रधानका जय होता है । अन्वयार्थ – इन्द्रियजयसे मनोजवित्व, विकरणभाव और प्रधानका जय होता है । व्याख्या — उपर्युक्त इन्द्रियजयसे निम्न फल प्राप्त होते हैं- -१ मनोजवित्व — मनके समान शरीरका वेगवाला होना ( ग्रहणके संयमसे ) । २ विकरणभाव — शरीरकी अपेक्षाके बिना इन्द्रियोंका वृत्तिलाभ अर्थात् बिना शरीरकी परवाके इन्द्रियोंमें काम करनेकी शक्ति आ जाना । दूरके और बाहरके अर्थोंका जान लेना ( स्वरूपमें संयम करनेसे ) । : - प्रकृतिके सब विकारोंका वशीकार ( अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्वमें संयमसे ) । ३ प्रधानजय-सिद्धियाँ जितेन्द्रिय पुरुषसे ही प्राप्त की जा सकती हैं । योगशास्त्रमें ये तीनों सिद्धियाँ मधुप्रतीका कहलाती हैं; क्योंकि इन सिद्धियोंके प्राप्त होनेपर योगीको प्रत्येक सिद्धिमें मधु - समान स्वाद प्रतीत होता है अथवा योगसे उत्पन्न ऋतम्भरा प्रज्ञाका नाम ' मधु ' है; उस मधुका प्रतीक अर्थात् कारण जिससे प्रत्यक्ष किया जाय, वह मधुप्रतीक है । सङ्गति – ग्राह्य और ग्रहणके पश्चात् ग्रहीतृ ( चित्त ) में संयमका फल बतलाते हैं अर्थात् जिस विवेकख्यातिके लिये यह सब संयम निरूपण किये हैं, उसका अवान्तर फल बतलाते हैं-सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥ ४ ९ ॥ शब्दार्थ – सत्त्व - पुरुष - अन्यता- ख्यातिमात्रस्य = चित्त और पुरुषके भेद जाननेवालेको; सर्व - भाव-[ = सारे भावोंका मालिक अधिष्ठातृत्वम् = I होना; च - सर्व - ज्ञातृत्वम् - और सर्वज्ञ ( सबका जाननेवाला प्राप्त होता है । ) होन अन्वयार्थ - चित्त और पुरुषके भेद जाननेवालेको सारे भावोंका मालिक होना और सर्वज्ञ व्याख्या – सर्वभाव - अधिष्ठातृत्वम् — गुणोंका कर्तृत्व - अभिमान शिथिल होनेपर उनके होना प्राप्त होता है । और भावोंको पुरुषके प्रति स्वामीके समान बर्तना है सब परिणामों सर्वज्ञातृत्व - वे गुण जो अतीत, अनागत और वर्तमानकालमें धर्मीभावसे यथार्थ विवेकपूर्ण ज्ञान सर्वज्ञातृत्व कहलाता है । सूत्र ( १ । अवस्थित रहते हैं, उनका प्रथम परिणाम महत्तत्त्व अर्थात् समष्टि चित्त है । इसीमें सृष्टिके २ ) सब में नियम बतला आये हैं कि गुणोंका सबसे बीजरूपसे रहते हैं । पुरुषोंके ( ५४७ ) ojp

पृष्ठ 585

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ४ ९ व्यष्टि चित्त ग्रहीतृरूप हैं, जिनके द्वारा गुणोंके परिणामोंका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके स्वरूप अवस्थित होते हैं । पुरुष चित्तका स्वामी, ज्ञानस्वरूप है पर अविवेकके कारण चित्तमें आत्माका अध्यारोप हो जाता है । यही सर्वक्लेशोंकी मूल अविद्या है । सात्त्विक चित्तके प्रकाशमें संयम करनेसे पुरुष और चित्तमें भेद करनेवाला विवेक - ज्ञान उत्पन्न होता है, जिसको विवेक - ख्याति कहते हैं । इस विवेक - ख्यातिके हो जानेपर पुरुष अपनेको चित्तसे पृथक् देखता हुआ गुणोंके परिणामोंका सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है और उनपर पूर्ण अधिकार रखते हुए उनका अधिष्ठाता होकर नियममें रखता है । श्रुति भी ऐसा ही बतलाती है ' आत्मनो वा अरे दर्शनेनेदं सर्वविदितम् ' अर्थात् पुरुष - दर्शन होनेपर सर्वज्ञातृत्व प्राप्त हो जाता है । इस सिद्धिका नाम विशोका है; क्योंकी इसकी प्राप्तिसे योगी क्लेशोंके बन्धनोंके क्षीण होनेसे सबका अधिष्ठाता और सर्वज्ञ होकर शोकसे रहित विचरता है । यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि वास्तवमें ' सर्वभावाधिष्ठातृत्व ' पाँचों क्लेशोंको दग्धबीज करके उनपर विजय प्राप्त कर लेना है, और ' सर्वज्ञातृत्व ' यह साक्षात् कर लेना है कि सारा व्यवहार ग्रहण और ग्राह्यरूप तीनों गुणोंमें चल रहा है अर्थात् सारा ही दृश्य त्रिगुणात्मक है, आत्मा इनका द्रष्टा इनसे सर्वथा भिन्न, असङ्ग, निर्लेप, अजर, अमर, अप्रसवधर्मी, निष्क्रिय, ज्ञानस्वरूप कूटस्थ - नित्य है । टिप्पणी- व्यासभाष्यका भाषानुवाद सूत्र ॥ ४ ९ ॥ जब बुद्धि सत्त्वके रज और तम धुल जाते हैं, वह परवैशारद्य परवशीकार अवस्थामें अवस्थित होता है । सत्त्व और पुरुषकी अन्यताख्याति - मात्ररूपमें प्रतिष्ठित होता है, तब बुद्धि सत्त्वको सर्वभावोंका अधिष्ठातृत्व हो जाता है । सर्वात्मक गुण व्यवसाय और व्यवसेयरूप गुण स्वामी क्षेत्रज्ञके प्रति अशेष दृश्यरूपसे उपस्थित हो जाते हैं । सर्वज्ञातृत्व - सर्वात्मकगुण जो शान्त, उदित और अव्यपदेश्य धर्मसे अवस्थित हैं, उनके विषयमें अक्रमोपारूढ ( क्रियारहित ) विवेकज ज्ञान होता है, यह विशोका नामकी सिद्धि है, जिसको प्राप्त करके योगी सर्वज्ञ क्षीणक्लेशबन्धन और वशी विहार करता रहता है I योगवार्तिकका भाषानुवाद सूत्र ॥ ४ ९ ॥ पूर्वोक्त प्रकारसे ग्राह्य और ग्रहण विषयके संयमोंकी सिद्धिको कहकर ग्रहीतृ संयमकी सिद्धिको कहते हैं । सूत्रमें मात्रशब्दसे संयमरूप ख्याति उपलब्ध होती है तथा सत्त्व और पुरुषकी अन्यताके संयमवाले ( धर्म - धर्मीके अभेदसे ) चित्तका सर्वभावोंमें प्रकृति और प्रकृतिके कार्यों और पुरुषके विषयमें अधिष्ठातृत्व स्वदेहके समान स्वेच्छया विनियोक्तृत्व हो जाता है । तथा प्रकृति और पुरुष आदिमें सर्वज्ञातृत्व हो जाता है । यहाँ भी साक्षात्कारतक ही समझना चाहिये; क्योंकि संयमकी सिद्धि ही अन्य सिद्धियोंका हेतु है । शङ्का – ‘ परार्थात् स्वार्थसंयमात् ' इस सूत्रोक्त संयमसे इस संयमका क्या भेद है, जिससे वहाँ पुरुषज्ञानरूप सिद्धि होती है और यहाँ दूसरी सिद्धि होती है । समाधान- – वहाँ सुखादिके अनुभवरूप परिच्छिन्नमें पौरुषेय प्रत्यय ही संयम कहा है और अपरिच्छिन्न पुरुषमें संयम नहीं कहा । यहाँ तो उस संयमसे परिपूर्ण पुरुषका ज्ञान हो जानेपर बुद्धि - विवेक संयम कहा है, यह विशेषता है । ( ५४८ )

पृष्ठ 586

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सूत्र ५० ] तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ' * * [ विभूतिपाद शङ्का — सत्त्व यह विशेष वचन अनुचित है, गुण पुरुषान्यता आदि कहना ही ठीक है 1 समाधान — यह शङ्का ठीक नहीं, क्योंकि रजस् और तमस्से पुरुषमें साक्षात् अविवेक हो नहीं सकता, बुद्धिसत्त्वके अविवेकद्वारा ही देह और इन्द्रियादिमें अविवेकसे स्वप्न और बाधिर्य ( बहरापन ) आदि अवस्थाओंमें चेतनमें देह और इन्द्रियादिके विवेकको योगके आरम्भकालमें ही साधारण पुरुष भी जानते हैं 1 इस सूत्रकी व्याख्या करते हैं— निर्धूतेति – परवैशारद्य - परम स्वच्छताको कहते हैं अर्थात् अतिसूक्ष्म वस्तुके प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेके सामर्थ्यका नाम है परम वशीकार संज्ञा । “ परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकार ” यह कहा है, ' रूपेण प्रतिष्ठस्य रूपप्रतिष्ठस्य ' यह तृतीया तत्पुरुष समास है । रूपसे प्रतिष्ठित अन्तःकरण बुद्धि सत्त्वका सर्वभावाधिष्ठातृत्व होता है, इसका विवरण करते हैं सर्वात्मान इति = इसका भी विवरण है व्यवसाय - व्यवसेयात्मक इन्द्रिय और इन्द्रिय - विषयात्मक गुण, अशेष दृश्येति = संकल्पमात्रसे पुरुषोंके साथ संयुक्त और असंयुक्त अशेष वस्तुओंके आकारसे परिणत होकर योगीको उपस्थित होते हैं । उसमें ‘ स्वामिनं क्षेत्रज्ञम् ' यह दो हेतुगर्भित विशेषण हैं, क्योंकि वह स्वामी क्षेत्रज्ञ भोक्ता होनेसे प्रेरक है । अतः जैसे अयस्कान्तमणिके पास लोहा खिंच आता है, वैसे ही गुण दृश्यरूप बनकर स्वामी क्षेत्रज्ञको उपस्थित हो जाते हैं । अथवा क्योंकि वह स्वामी क्षेत्रज्ञ गुणोंके परिणाम क्षेत्रादिको प्रेरित करता है, प्रवृत्त करता है या परिणमन प्रकारको जानता है, अतः उसके प्रति वे उपस्थित हो जाते हैं । यद्यपि सब पुरुष सब गुणोंके अशेषतया स्वामी हैं तथापि पापादिके प्रतिबन्धसे सब गुण सब समय सब पुरुषोंके आदि भोग्यरूपसे उपस्थित नहीं होते, यह भाव है I ऐसी श्रुति भी इस विषयमें प्रमाण है " स यदि पितृलोककामः संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्तीत्यादि " जब यह पुरुष पितरलोककी कामनावाला होता है, तब संकल्पमात्रसे ही उसको पितर उपस्थित हो जाते हैं इत्यादि । क्रियैश्वर्यरूप सिद्धिकी व्याख्या करके ज्ञानैश्वर्यरूप सिद्धिकी व्याख्या करते हैं । सर्व-ज्ञातृत्वमिति = सब आत्मा, सब पुरुष बद्ध, मुक्त और ईश्वरोंका और शान्त, उदित तथा अव्यपदेश्यरूप धर्मविशिष्ट गुणोंका ज्ञान सर्वज्ञातृत्व है । इसका नाम है विवेकज- ज्ञान - विवेकसे जायमान ज्ञान । यह संज्ञा सान्वय है । विशेष संज्ञाके अन्वर्थको कहते हैं ' याम्प्राप्येति ' । क्लेशबन्धनके क्षीण होनेसे विशोका नामकी सिद्धि है । जिसका अर्थ है शोकशून्यता । सङ्गति – विवेक - ख्याति भी चित्तकी ही अवस्था है, इसलिये उसमें भी वैराग्य बताते हैं अर्थात् विवेक - ख्यातिका अवान्तर फल कहकर अब उसके मुख्य फल कैवल्यको बतलाते हैं— तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥ ५० ॥

शब्दार्थ – तत् - वैराग्यात् - अपि - उसके ( विवेक - ख्यातिके ) वैराग्यसे भी; दोषबीजक्षये = दोषोंके बीज - क्षय होनेपर; कैवल्यम् = कैवल्य होता है । अन्वयार्थ — विवेक - ख्यातिसे भी वैराग्य होनेपर दोषोंके बीज व्याख्या — यह विवेक - ख्याति जिससे योगी सर्वभाव - अधिष्ठातृत्व - क्षय और होनेपर सर्वज्ञातृत्व कैवल्य होता है । जिससे अपने शुद्ध, अपरिणामी और ज्ञान - स्वरूपको त्रिगुणात्मक प्राप्त करता और करके देखता है, चित्तहीका एक धर्म है, उसीका एक परिणाम है, अपना , परिणामी वास्तविक और स्वरूप जड चित्तसे अलग नहीं । इसलिये ( ५४ ९ )

पृष्ठ 587

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र ५१ अपने वास्तविक शुद्ध स्वरूपमें अवस्थित होनेके लिये इस विवेक - ख्यातिसे भी विरक्त हो जाता है । इसीको परवैराग्य कहते हैं । जब परवैराग्य पूर्ण तथा परिपक्व हो जाता है, तब चित्तको बनानेवाले गुण पुरुषको भोग - अपवर्ग दिलानेके कार्यको पूर्ण करके अपने कारणमें लीन हो जाते हैं । उनके साथ ही अविद्या आदि क्लेशोंके संस्कार भी विवेकख्यातिद्वारा दग्धबीजके सदृश उत्पत्तिके अयोग्य होकर लीन हो जाते हैं, तब आत्माके सामने कोई दृश्य नहीं रहता । यह पुरुषका गुणोंसे अत्यन्त पृथक् होकर अपने

केवलीस्वरूपमें अवस्थित होना कैवल्य है ।

टिप्पणी-- व्यासभाष्यका भाषानुवाद सूत्र ॥ ५० ॥

क्लेश और कर्मोंके क्षय होनेपर जब इस योगीका ऐसा भाव होता है कि विवेक प्रत्यय बुद्धिरूप सत्त्वका धर्म है और बुद्धि अनात्म होनेसे हेय ( त्याज्य ) पक्षमें मानी गयी है और शुद्ध स्वरूप अपरिणामी पुरुष बुद्धिसे भिन्न है, तब इस प्रकारके विवेकसे विवेकख्यातिमें भी वैराग्य उदय हो जाता है । उस परवैराग्यवाले पुरुषके चित्तमें जो क्लेश - बीज विद्यमान हैं वे शालि ( चावलों ) के दग्धबीजके सदृश अपने अङ्कुरोत्पादनमें असमर्थ हु जाते हैं । उन क्लेश आदिकोंके प्रलीन होनेपर पुरुष मनके सहित ही नष्ट हो आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक — इन तीनों तापोंको नहीं भोगता है और कर्म, क्लेश विपाकरूपसे चित्तमें विद्यमान चरितार्थ हुए गुणोंका प्रतिप्रसव अर्थात् मनके सहित ही स्वकारणमें लय हो जाता है । यह पुरुषका आत्यन्तिक गुण - वियोग ( गुणोंसे अत्यन्त पृथक् हो जाना ) कैवल्य है । इस दशामें चितिशक्तिरूप पुरुष स्वरूपप्रतिष्ठित होता है ॥ ५ ॥

सङ्गति – योगके मार्गमें मनुष्य ज्यों - ज्यों आगे बढ़ता है, त्यों - त्यों उसके सामने बड़े - बड़े प्रलोभन, दिव्य विषय और विभूतियाँ उपस्थित होती हैं । उनसे सावधान रखनेके लिये अगला सूत्र है- — स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ॥ ५१ ॥

शब्दार्थ – स्थानि - उपनिमन्त्रणे = स्थानवालोंके आदर - भाव करनेपर; सङ्गस्मय - अकरणम् = लगाव और घमंड नहीं करना चाहिये; पुनः अनिष्ट - प्रसङ्गात् = फिर अनिष्टके प्रसङ्गसे ( अनिष्टके लगनेके भयसे ) । अन्वयार्थ – स्थानवालोंके आदर - भाव करनेपर लगाव एवं घमंड नहीं करना चाहिये; क्योंकि ( इसमें ) फिर अनिष्टके प्रसङ्गका भय है । व्याख्या — योगियोंको भूमियोंके अनुसार चार श्रेणियोंमें विभक्त कर सकते हैं, जो निम्न प्रकार हैं-१ प्रथम काल्पिक – आरम्भिक अभ्यासवाले जो सवितर्क समाधिका अभ्यास कर रहे हैं । ( १–४२ ) २ मधु - भूमिका – जो निर्वितर्क समाधि नामी ऋतम्भरा प्रज्ञाको प्राप्त करके भूत और इन्द्रियोंके जीतनेका अभ्यास कर रहे हैं । ( १-४३ ), ( ३–४४–४७ ) ३ प्रज्ञा - ज्योति — जिन्होंने सविचार समाधिद्वारा भूत - इन्द्रियोंको जीत लिया है और स्वार्थ - संयमद्वारा विशोका - भूमिका अभ्यास कर रहे हैं । ( ३१, ३५, ४ ९ ) ४ अतिक्रान्तभावनीय — जो निर्विचार समाधिद्वारा मधु - प्रतीका और विशोका - भूमियोंको प्राप्त करके उनसे विरक्त हो गये हैं, जिनको अब कुछ साधना शेष नहीं रहा केवल असम्प्रज्ञात - समाधिद्वारा चित्तका है । जो सात प्रकारकी प्रान्त - -भूमि I प्रज्ञावाले हैं । ( २ । २७ ) लय करना बाकी उपर्युक्त श्रेणियाँ भाष्योंके आधारपर लिखी गयी हैं । सुगमताके लिये निम्न श्रेणियोंमें भूमियोंको ( ५५० )

पृष्ठ 588

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सूत्र ५२ ] * क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् * - विभूतिपाद विभक्त किया जा सकता है । ( १ ) वितर्कानुगत भूमि, ( २ ) विचारानुगत भूमि, ( ३ ) आनन्दानुगत और अस्मितानुगत भूमि ( ४ ) विवेकख्यातिकी भूमि । अपनी - अपनी भूमियोंके स्थानपति देवता बड़े आदरसे नाना प्रकारके भोगों और ऐश्वर्योंका योगियोंको प्रलोभन देते हैं, अर्थात् इन भूमियोंमें नाना प्रकारके भोग, ऐश्वर्य, दिव्य विषय और विभूतियोंके प्रलोभन आते हैं । इनसे योगियोंको सदा सावधान और सचेत रहना चाहिये । इनमें यदि फँसा तो सब किया हुआ परिश्रम व्यर्थ जायगा । इस कारण इनसे सदा अलग रहना चाहिये । परंतु इन प्रलोभनोंको देखकर और अपनेमें उनको हटानेकी सामर्थ्य समझकर अभिमान भी न करना चाहिये; क्योंकि अभिमानसे उन्नति रुक जाती है और पतन होने लगता है । प्रथम भूमिवाला अभ्यासी इस योग्य ही नहीं होता कि उसके लिये ये प्रलोभन आवें, तीसरे और चौथे भूमिके अभ्यासी इतनी योग्यता प्राप्त कर लेते हैं, कि आसानीसे इनके फंदेमें नहीं आ सकते । दूसरी भूमिवालोंके गिरनेकी बहुत सम्भावना है, इस कारण उनको सबसे अधिक सावधान रहनेकी आवश्यकता है 1 सङ्गति — सूत्र ४ ९ में जो फलरूप विवेक ज्ञान कहा है, उसीके विषयमें पूर्वोक्त संयमसे भिन्न दूसरा उपाय बतलाते हैं-क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥ ५२ ॥

शब्दार्थ – क्षण - तत् - क्रमयोः क्षण और उसके क्रमोंमें; संयमात् - संयम करनेसे, विवेकजम्-ज्ञानम् - विवेकज ज्ञान उत्पन्न होता है । अन्वयार्थ - क्षण और इसके क्रमोंमें संयम करनेसे विवेकज - ज्ञान उत्पन्न होता है । व्याख्या- -जिस प्रकार द्रव्यका सबसे छोटा विभाग जो भागरहित है, वह परमाणु है, वैसे ही समयकी सबसे छोटी विभागरहित गति क्षण है । अथवा जितने समयमें चलाया हुआ परमाणु पूर्वदेशको छोड़कर उत्तरदेशको प्राप्त होवे वह कालकी मात्रा क्षण है । उन क्षणोंके प्रवाहका विच्छेद न होना अर्थात् बने रहना क्रम कहलाता है । क्षण और उसका क्रम दोनों एक वस्तु नहीं हैं । ये बुद्धिके निर्माण किये हुए मुहूर्त, दिन, रात, मास आदि होते हैं । अथवा इसको यों समझना चाहिये कि काल वास्तवमें वस्तुसे शून्य है, केवल बुद्धिहीकी निर्माण की हुई वस्तु है । वस्तुसे शून्य होते हुए भी कालको शब्द - ज्ञानके पीछे विकल्प ( १ । ९ ) से व्यवहारदशामें लोग वस्तुके समान जानते हैं । क्षण, क्रमाश्रित होनेसे कोई वस्तु नहीं है । एक क्षणके पीछे दूसरे क्षणका कहलाता है । योगीजन इसीको काल कहते हैं । दो क्षण एक साथ नहीं हो सकते और क्रमसे भी आना क्रम साथ नहीं हो सकते; क्योंकि पूर्ववाले क्षणसे उत्तरवाले क्षणका अन्त न होना ही क्षणोंका क्रम दो क्षण एक वर्तमान ही एक क्षण है, पूर्व और उत्तर क्षण नहीं हैं । इसलिये इन दोनोंका एकत्व है । इसलिये अनागत क्षण वर्तमान क्षणके ही परिणाम कहने योग्य हैं । उस एक वर्तमान भी नहीं है । अतीत और परिणामको प्राप्त होते हैं । सब धर्म उस एक क्षणके ही आश्रित हैं । इसलिये क्षणसे ही सम्पूर्ण लोक करनेसे इन दोनोंका साक्षात्कारपर्यन्त विवेकज - ज्ञान उत्पन्न होता है क्षण और उसके क्रममें संयम । भाव यह है कि जैसे नैयायिक सबसे छोटे निर्विभाग पदार्थको सत्त्वादिके एक परिणाम - विशेषकों द्रव्यरूप क्षण मानते हैं । क्षणोंके परमाणु मानते हैं वैसे ही योगाचार्य प्रवाहका अविच्छेद अर्थात् ( ५५१ )

पृष्ठ 589

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 589 का मूल पृष्ठ
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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ५३ पूर्वापरभाव होना क्रम कहलाता है । पर यह क्रम वास्तवमें सत्य नहीं है, कल्पित है; क्योंकि दो अगले पिछले क्षणोंका एक समयमें समाहार होना असम्भव है । इसलिये घटिका, मुहूर्त, प्रहर, दिन, रात, मास वर्ष आदि रूप काल भी वास्तवमें वस्तुशून्य हैं । इनमें विकल्पसे व्यवहार हो रहा है । वास्तवमें एक, वर्तमान क्षण ही सत्य है । उसी एक वर्तमान क्षणका परिणाम यह सारा ब्रह्माण्ड है । ऐसा जो एक वर्तमान क्षण है और उसका जो यह कल्पित क्रम है, उसमें संयम करनेसे विवेकज - ज्ञान उत्पन्न होता है । विवेकज - ज्ञान – विवेकसे उत्पन्न ज्ञान योगका पारिभाषिक शब्द है, जिसका लक्षण सूत्र ५४ में

बतलाया जायगा ।

टिप्पणी- भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ ५२ ॥

पूर्व जो फलरूप विवेकज- ज्ञान कहा है उसीके विषयमें पूर्वोक्त संयमसे भिन्न उपाय कहते हैं-सबके अन्तका, कालका ऐसा अवयव, जिसके फिर हिस्से न हो सकें वह क्षण कहलाता है । उस प्रकारके कालक्षणोंका जो क्रम अर्थात् पूर्वापरभावसे परिणाम है, उनमें संयम करनेसे भी पूर्वोक्त विवेकज - ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । तात्पर्य यह है कि यह क्षण इस क्षणसे पूर्व और इस क्षणसे उत्तर है, इस प्रकार काल - क्रममें संयम करनेवालेको जब अत्यन्त सूक्ष्म क्षण - क्रमका प्रत्यक्ष होता है तो अन्य बुद्धि आदि सूक्ष्म पदार्थोंका भी प्रत्यक्ष हो जाता है ऐसे विवेकज्ञानसे ज्ञानान्तर होते हैं । 1 सङ्गति — इस विवेकज - ज्ञानका मुख्य फल बतलानेसे पूर्व अवान्तर फल अगले सूत्रमें बतलाते हैं- -जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥ ५३ ॥

शब्दार्थ - जाति- लक्षण - देशैः = जाति, लक्षण, देशसे; अन्यता- अनवच्छेदात् = भेदका निश्चय न होनेसे, तुल्ययोः = दो तुल्य वस्तुओंका; ततः - उस विवेकज - ज्ञानसे; प्रतिपत्तिः = निश्चय होता है । अन्वयार्थ — एक - दूसरेसे जाति, लक्षण, देशसे भेदका निश्चय न होनेसे दो तुल्य वस्तुओंका, विवेकज - ज्ञानसे निश्चय होता है । व्याख्या- –जातिः - अनेक व्यक्तियोंमें जो अनुगत सामान्य धर्म है वह जाति है I । जैसे गायोंमें गोत्व; भैंसोंमें महिषत्वादि । लक्षण – जातिसे समान वस्तुओंको पृथक् करनेवाले असाधारण धर्मका नाम लक्षण है । जैसे लाल गाय, काली गाय इत्यादि । देश — देश नाम पूर्वत्व तथा परत्वका है । पदार्थोंके, एक - दूसरेसे, भेद निश्चित करानेके कारण जाति, लक्षण और देश होते हैं । जैसे एक देशमें समान लक्षण अर्थात् काले रङ्गकी एक गौ और एक भैंस हो तो उन दोनोंमें जातिसे भेद होता है । जाति और देश समान होनेपर जैसे एक चितकबरी गाय और एक लाल गाय हो, उनका भेद लक्षणसे होता है । जाति और लक्षण समान होनेपर जैसे दो आँवले समान जाति और लक्षणके हों तो उनका पूर्व व उत्तर देशसे भेद जाना जाता है । जिसने इन दोनों आँवलोंको पहले देखा है, उसकी दृष्टि बचाकर यदि कोई पूर्व देशके आँवलेको उत्तर देशमें और उत्तर देशके आँवलेको पूर्व देशमें रख दे तो तुल्य देश होनेपर इन दोनोंमें संशयरहित यथार्थ ज्ञानद्वारा यह विभाग निश्चय नहीं हो सकता कि यह पूर्ववाला है, यह उत्तरवाला । इसका निश्चय विवेकज - ज्ञानसे हो सकता है । यह ज्ञान योगीको विवेकज - ज्ञानसे किस प्रकार ( ५५२ )

पृष्ठ 590

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ, पृष्ठ 590 का मूल पृष्ठ
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सूत्र ५४-५५ ] सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति [ विभूतिपाद * * होता है? इसका उत्तर भाष्यकारने इस प्रकार दिया है— कि उत्तर आँवलेके क्षण - सहित देशसे पूर्व आँवलेका क्षण - सहित देश भिन्न है । जब वे आँवले अपने देश - क्षण अनुभवमें भिन्न हैं तब उन दोनोंके देश - क्षणका अनुभव उन दोनोंके भेदका कारण हैं । इसी दृष्टान्तके समानजाति, लक्षण, देशके परमाणुओंमें पूर्व देशवाले परमाणुके देश, क्षणोंसहित, साक्षात् करनेसे उस उत्तर देशवाले परमाणुका वह देश निश्चय न होनेपर उत्तरवालेके देशका भिन्न अनुभव क्षणोंसहित भेदसे होता है । उन दोनों देश - क्षण - सहित परमाणुओंके ज्ञानमें समर्थ योगीहीको उन दोनोंके भेदका ज्ञान होता है । वैशेषिक सिद्धान्तवाले जो यह कहते हैं कि छः पदार्थों ( द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय ) में जो विशेष पदार्थ है वही द्रव्योंका भेदक है । सो उन विशेषोंमें भी ( १ ) देश, ( २ ) लक्षण, ( ३ ) मूर्ति ( अवयव संनिवेशविशेष ), ( ४ ) व्यवधि ( व्यवधान - विशेष ) और ( ५ ) जाति, भेद- ज्ञानका कारण होते हैं । यहाँ यह और जान लेना चाहिये कि जाति आदिके भेदसे पदार्थोंका भेद - ज्ञान होना तो साधारण है, किन्तु क्षण - भेदसे भेद - ज्ञान होना केवल योगीके ही बुद्धिगम्य है । इससे ही वार्षगण्याचार्यने कहा है ‘ मूर्तिव्यवधिजातिभेदाभावान्नास्ति मूलपृथक्त्वमिति ' मूल प्रकृतिमें भेद नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें मूर्ति, व्यवधि, जाति आदि जो भेदके कारण हैं इनका अभाव है । सङ्गति — इस प्रकार विवेकज - ज्ञानका अवान्तर फल दिखलाकर अब लक्षणद्वारा उसका मुख्य फल बतलाते हैं— तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥ ५४ ॥

शब्दार्थ– तारकम् = बिना निमित्तके अपनी प्रभासे स्वयं उत्पन्न होनेवाला; सर्वविषयम् = सबको विषय करनेवाला; सर्वथाविषयम् = सब प्रकारसे विषय करनेवाला; अक्रमम् = बिना क्रमके ( एक साथ ज्ञानको ); विवेकजं ज्ञानम् - विवेकज - ज्ञान कहते हैं 1 अन्वयार्थ — बिना निमित्तके अपनी प्रभासे स्वयं उत्पन्न होनेवाला, सबको विषय करनेवाला, सब प्रकारसे विषय करनेवाला, बिना क्रमके एक साथ ज्ञानको विवेकज- ज्ञान कहते हैं । व्याख्या– विवेकज - ज्ञान चार लक्षणोंवाला होता है । १ तारकम् — बिना बाह्य निमित्तके अपनी प्रभासे स्वयं उत्पन्न होनेवाला और संसारसागरसे तारनेवाला । २ सर्वविषयम् — महदादिपर्यन्त सब तत्त्वोंका विषय करनेवाला । ३ सर्वथाविषयम् —– सब तत्त्वोंको सब अवस्थामें स्थूल, सूक्ष्म आदि भेदसे उनके तीनों परिणामोंसहित सब प्रकारसे विषय करनेवाला । ४ अक्रमम् – क्रमकी अपेक्षारहित होकर सबको एक क्षणमें सब प्रकारसे विषय करनेवाला ये सम्पूर्ण विवेक - ज्ञान हैं । इक्यावनवें सूत्रमें बतलायी हुई ऋतम्भरा । एक अंश है । उससे ज्ञानकी वृद्धि करता हुआ योगी इस अवस्थातक प्रज्ञावाली मधुमती भूमि इसका पहुँचता है । यह ज्ञानकी अन्तिम गति है; क्योंकि इसमें कोई वस्तु इसका सङ्गति — योगीको उपर्युक्त प्रकारसे विवेकज - ज्ञान उत्पन्न हो अथवा अविषय नहीं रहती । समान शुद्धि ही कैवल्यका कारण है— न हो, चित्त और पुरुष दोनोंकी सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥ ५५ ॥

( ५५३ )