पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 571–580

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३ ९ हैं । योगी जब धारणा, ध्यान, समाधिके अभ्याससे सकाम कर्मोंको छोड़कर है तो इन बन्धोंके कारणोंको ढीला कर देता है और नाड़ियोंमें संयम करके चित्त निष्काम कर्मोंका आसरा लेता आने - जानेका मार्ग प्रत्यक्ष कर लेता है । इस प्रकार जब बन्धके कारण शिथिल हो ( सूक्ष्म जाते - शरीर ) के उनमें चित्त ( सूक्ष्म - शरीर ) के घूमनेके मार्गका पूरा - पूरा ज्ञान हो जाता है तब योगीमें यह सामर्थ्य हैं और नाड़ियोंमें हो जाती है कि वह अपने शरीरसे चित्त ( सूक्ष्म शरीर ) को निकालकर किसी दूसरे शरीरमें डाल अनुसार ही इन्द्रियाँ भी यथास्थान आवेश कर जाती हैं । सके । चित्तके टिप्पणी- भोजवृत्तिका भाषार्थ — । सूत्र ३८ । अन्य सिद्धि कहते हैं-आत्मा और चित्त व्यापक है, पर नियत कर्मों ( भले - बुरे कर्मों ) के वशसे ही शरीरके भीतर रहते हैं । उनका जो भोक्ता ( आत्मा ) और भोग्य ( चित्त ) बनकर बँध जाना है वह ही शरीरका बन्धनहै । इस बन्धनका कारण धर्म और अधर्म जब समाधिसे शिथिल अर्थात् कृश हो जाता है तब हृदयसे लेकर इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंके सम्मुख जो चित्तका प्रचार ( फैलाव वा गमनागमनका मार्ग ) है उसका ज्ञान जाता है कि यह चित्तको बहानेवाली ( चित्तके गमनागमनकी ) नाड़ी है । इससे चित्त बहता है अर्थात् हो विषयोंमें जाता है । और यह नाड़ी रस और प्राणादिको बहानेवाली नाड़ियोंसे भिन्न है । जब अपने और दूसरोंके शरीरमें चित्तके संचारको जान जाता है तब दूसरेके मृतक शरीरमें वा जीते हुए शरीरमें चित्तके संचारद्वारा प्रवेश करता है । दूसरेके शरीरमें प्रवेश होनेपर चित्तके पीछे अन्य सब इन्द्रियाँ भी साथ हो लेती हैं, जैसे रानी मक्खीके पीछे अन्य मक्खियाँ । दूसरेके शरीरमें घुसा हुआ योगी अपने शरीरकी तरह उस शरीरमें बर्तता है, क्योंकि चित्त और पुरुष दोनों व्यापक हैं इसलिये भोगोंके संकोचका कारणरूप कर्म ( क्रिया ) यदि समाधिसे हट गया तो स्वतन्त्रताके कारण सर्वत्र ही भोग - सम्पादन हो सकता । उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥ ३ ९ ॥ शब्दार्थ — उदान - जयात् - संयमद्वारा उदानके जीतनेसे; जल - जल; पङ्क - कीचड़; कण्टक-आदिषु - काँटों आदिमें; असङ्गः = असङ्ग रहना होता है; उत्क्रान्ति: -च- और ऊर्ध्व गति होती है । अन्वयार्थ— ( संयमद्वारा ) उदानके जीतनेसे जल, कीचड़, काँटों आदिमें असङ्ग रहना और ऊर्ध्व गति होती है । व्याख्या — शरीरमें समस्त इन्द्रियोंमें बर्तनेवाले जीवनका आधार प्राणवायु है । उसके क्रियाभेदसे पाँच मुख्य नाम हैं— १ प्राण — यह इन पाँचोंमें सबसे प्रथम है । यह मुख और नासिकाद्वारा गति करनेवाला है । नासिकाके अग्रभागसे लेकर हृदय - पर्यन्त बर्तता है । — नीचेको गति करनेवाला है । मूत्र, पुरीष और गर्भ आदिको नीचे ले जानेका हेतु है । २ अपान-नाभिसे लेकर पादतलतक अवस्थित है । ३ समान — खान - पानके रसको सम्पूर्ण शरीरमें अपने - अपने स्थानपर समानरूपसे पहुँचानेका हेतु । हृदयसे लेकर नाभितक बर्तता है । ४ व्यान - सारे शरीरमें व्यापक होकर गति करनेवाला है । ५ उदान — ऊपरकी गतिका हेतु है । कण्ठमें रहता हुआ शिर- पर्यन्त बर्तनेवाला है । इसीके द्वारा ( ५३४ )

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उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च * [ विभूतिपाद सूत्र ३ ९ ] * **** शरीरके व्यष्टि प्राणका समष्टि प्राणसे सम्बन्ध है । मृत्युके समय सूक्ष्म - शरीर इसी उदानद्वारा स्थूल - शरीरसे बाहर निकलता है । जब योगी संयमद्वारा उदानको जीत लेता है तो उसका शरीर रूईकी तरह हलका हो जाता है । वह पानीपर पैर रखते हुए उसमें नहीं डूबता । कीचड़ - काँटोंमें उसके पैर नहीं फँसते; क्योंकि वह अपने शरीरको हलका किये ऊपर उठाये रखता है । और मरण समयमें उसकी ब्रह्मरन्ध्रद्वारा प्राणोंके निकलनेसे ऊर्ध्व गति ( शुक्ल गति ) उत्तर - मार्गसे होती है । विशेष वक्तव्य सं ॰ १ । सूत्र ३ ९ ।— अन्तःकरणकी दो प्रकारकी वृत्तियाँ होती हैं-( १ ) बुद्धिका निश्चय, चित्तकी स्मृति, अहङ्कारका अभिमान, मनका संकल्प करना — यह इन सबका अलग - अलग काम बाह्य - वृत्ति है । ( २ ) इन सबका साधारण साझा ( मिश्रित ) काम आभ्यन्तर - वृत्ति है । जैसे सूखे हुए तृणोंमें अग्नि लगानेसे एकदम अग्नि प्रज्वलित हो जाती है अथवा जैसे एक कबूतर पिंजरेको नहीं हिला सकता और बहुत - से मिलकर एक साथ चला सकते हैं इसी प्रकार शरीर - धारणरूपी कार्य जो अन्तःकरणकी मिश्रित आभ्यन्तर वृत्तिसे चल रहा है, इसीका नाम जीवन है । यह जीवनरूप प्रयत्न शरीरमें उपगृहीत वायुकी क्रियाओंके भेदका कारण है । इस जीवनरूप प्रयत्नसे पाँच प्रकारके वायुकी क्रिया होती है । उन क्रियाओं और स्थानोंके भेदसे वायुके प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान पाँच मुख्य नाम हैं ।

स्वालक्षण्यं वृत्तिस्त्रयस्य सैषा भवत्यसामान्या ।

सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च ॥

( सांख्यकारिका २ ९ ) अपना - अपना लक्षण तीनों ( अन्तःकरणों ) का काम है । सो यह साझा ( काम ) नहीं है, अन्तःकरणोंका साझा ( काम ) प्राण आदि पाँच वायु हैं अर्थात् बुद्धिका निश्चय, अहंकारका अभिमान और मनका संकल्प- -यह तीनों अन्तःकरणोंका अपना - अपना काम है । साझा काम नहीं है । प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान – यह पाँच वायु इनका साझा काम है । यह पाँच प्रकारका जीवन - कार्य मन, अहंकार और बुद्धिके आश्रित है, इनके होते हुए होता है विशेष वक्तव्य सं ॰ २ । सूत्र ३ ९ । मृत्युके समय लिङ्ग ( सूक्ष्म ) शरीरकी चार अवस्थाएँ– अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ( प्रश्नोप ० ३--७ ) अब उदान जो ऊपरको जानेवाला है वह एक नाड़ी, ( सुषुम्ना ) के द्वारा ( लिङ्ग - शरीरको ) पुण्यसे पुण्यलोक ( आदित्यलोक वा चन्द्रलोक ) को ले जाता है ( इन दोनों लोकोंमें अन्तर्मुख होकर जाना होता है ) । पापसे पापलोक ( पशु - पक्षी, कीट - पतङ्गादिकी योनिको ) और दोनों ( मिले हुए पुण्य - पाप ) से मनुष्यलोकको ले जाता है । वे मनुष्य जिनकी रुचि सदा पापमें रहती है, जो स्वार्थसिद्धि अथवा बिना स्वार्थके भी दूसरोंको पहुँचाने तथा नाना प्रकारसे हिंसात्मक और नीच कर्मोंमें लगे रहते हैं, उनका लिङ्ग ( सूक्ष्म हानि समय वर्तमान स्थूल - शरीरको छोड़कर कीट, पशु, पक्षी आदि तिर्यक् - योनियोंको प्राप्त ) होता शरीर मृत्युके पाप - पुण्य, शुभ - अशुभ, हिंसात्मक और अहिंसात्मक इन दोनों प्रकारके मिश्रित कर्म करनेवाला है । जीव और ( ५३५ )

पृष्ठ 573

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३ ९ मनुष्ययोनिको प्राप्त होता है । इन दोनों प्रकारके मनुष्योंके लिङ्ग - शरीरकी मृत्युके गति स्थूल लोकोंमें बाहरकी ओरसे होती है । समय अधः तथा मध्यम पितृयाण एवं देवयान पुण्यात्माओंके लिङ्ग ( सूक्ष्म ) शरीरोंकी कृष्ण और शुक्ल गतियोंका पितृयाण और देवयान वेदों, उपनिषदों और गीतामें सविस्तर वर्णन किया गया I नामसे

यथा-द्वे सृती अशृण्वं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् ।

ताभ्यामिदं विश्वमेजत् समेति यदन्तरा पितरं मातरं च ॥

( यजुर्वेद १ ९ । ४७; ऋग्वेद १० । ८८ । १५ ) ( अन्तरिक्षलोक और पृथ्वीलोकके बीचमें ) मनुष्योंके जानेके लिये मैंने दो मार्ग सुने हैं । जिनमेंसे एकका नाम देवयान और दूसरेका नाम पितृयाण है । इन्हीं दोनों मार्गोंसे समस्त संसारी पुण्यात्माओंके लिङ्ग - शरीर जाते हैं । यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ ( गीता ८।२३ ) और हे अर्जुन! जिस काल ( मार्ग ) में शरीर त्यागकर गये हुए योगीजन लौटकर न आनेवाली गतिको और लौटकर आनेवाली गतिको भी प्राप्त होते हैं, उस काल ( मार्ग ) को कहूँगा । शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते एकया पुनः ॥ ( गीता ८।२६ ) क्योंकि जगत्के ये दो प्रकारके शुक्ल और कृष्ण अर्थात् देवयान और पितृयाण मार्ग सनातन माने गये हैं । ( इनमें ) एकके द्वारा ( गया हुआ ) पीछे न आनेवाली गतिको प्राप्त होता है और दूसरेके द्वारा ( गया हुआ ) पीछे आता है अर्थात् जन्म - मृत्युको प्राप्त होता है । पितृयाण – सकामी पुण्यात्माओं ( तथा सम्प्रज्ञात -समाधिकी नीची भूमियोंमें आसक्त योगियों ) का लिङ्ग ( सूक्ष्म ) शरीर पितृयाण मार्गद्वारा चन्द्रलोक ( स्वर्गलोकमें ) जाकर अपने सुकृत कर्मोंको भोगनेके पश्चात् उसी मार्गसे लौटकर मनुष्यलोकमें मनुष्य - शरीर धारण करता है । “ सकाम कर्म ” अविद्या और अज्ञानरूपी अन्धकारसे मिश्रित होते हैं । इसलिये ऐसे लिङ्ग - शरीरोंकी गति निष्काम कर्मयोगियोंकी अपेक्षा रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन - जैसे अन्धकारके समय ( मार्ग ) तथा अन्धकारके लोकोंमें होकर बतलायी गयी है ।

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।

चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥

( गीता ८।२५ ) तत्र धूम, रात्रि तथा कृष्णपक्ष ( जब चन्द्रमाका कृष्ण भाग पृथ्वीके सामने रहता है, जो कृष्ण प्रतिपदासे अमावास्यातक अथवा कृष्ण पञ्चमीसे शुक्लपक्ष पञ्चमीतक अथवा कृष्ण अष्टमीसे शुक्ल अष्टमीतक माना गया है ) और दक्षिणायनके छः महीने ( जब उत्तर ध्रुव - स्थानपर रात होती है अथवा सूर्यके कर्कमें संक्रमणसे लेकर छः मास ) आषाढ़ शुक्लपक्ष, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष ( ५३६ )

पृष्ठ 574

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उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च * [ विभूतिपाद सूत्र ३ ९ ] * ******* कृष्णपक्ष अर्थात् वर्षा - ऋतु, शरद् ऋतु और हेमन्त ऋतु । उस काल ( मार्ग ) में मरकर गया हुआ सकाम कर्मयोगीका लिङ्ग - शरीर चन्द्रलोक ( स्वर्गलोक ) को प्राप्त होकर ( वहाँ अपने शुभकर्मोंका फल भोगकर ) फिर लौटता है ( मनुष्य - शरीर धारण करता है ) । ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद्वात्रिं रात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद् यान् षड् दक्षिणैति मासास्तान, नैते संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ॥ ३ ॥

मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाचन्द्रमसमेष सोमो राजा तद देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४ ॥

तस्मिन् यावत्संपातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते ॥ ५ ॥

( छान्दोग्य उप ० ५ । १० ) उनके लिङ्ग ( सूक्ष्म ) शरीर धूमको अपना मार्ग बनाते हैं । धूमसे रात्रिके अन्धकारको, रात्रिसे कृष्णपक्षके अन्धकारको, कृष्णपक्षसे छः मास दक्षिणायनके अन्धकारको जिनमें सूर्य दक्षिणको जाता है, मार्ग बनाते हुए आगे जाते हैं । वे संवत्सर ( कल्प ) को प्राप्त नहीं होते । दक्षिणायनके छः महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको मार्ग बनाते हैं । आकाशसे चन्द्रलोकको प्राप्त होते हैं । यह सोम राजा ( चन्द्रमा अर्थात् चन्द्रलोक ' स्वर्गलोक ' ) है । यह पितरोंका अन्न ( शुभ कर्मोक फलोंका भोगस्थान ) है, इसको पितर भक्षण करते हैं अर्थात् चन्द्रलोकमें अपने अमृतरूपी सूक्ष्म फलोंको भोगते हैं । वे वहाँ ( चन्द्रलोकमें ) उतनी देर रहते हैं जबतक उनके कर्म क्षीण नहीं होते । तब वे उसी मार्गको फिर लौटते हैं, जैसे गये थे । उपनिषदोंमें लिङ्ग - शरीरका वृष्टिद्वारा पृथ्वीलोकमें आना इत्यादि जो बतलाया गया है, वह केवल -कर्मोंकी अधोगतिका सूचक है और कई एक भाष्यकारोंने स्थूलदृष्टिवाले सकाम - कर्मियोंके सकाम-निःसारता दिखलाकर उनसे आसक्ति छुड़ानेके लिये इस अधोगतिको और अधिक स्थूलरूपसे वर्णन किया है । यथा — लिङ्ग - शरीरका ओषधियों आदिमें जाकर मनुष्योंसे खाये जाना और वीर्यद्वारा रजसे मिलकर जन्म लेना इत्यादि । वास्तवमें लिङ्ग - शरीरका इस भाँति स्थूल - पदार्थों - जैसा व्यवहार नहीं है । लिङ्ग - शरीरकी गति स्थूल शरीर तथा स्थूल - पदार्थोंसे अति विलक्षण है । जैसा ( सूत्र १ । २८ एवं ४।१० की ) व्याख्यामें विस्तारपूर्वक बतलाया गया है I यहाँ चन्द्रसे अभिप्राय यह भौतिक चन्द्र नहीं है, जो आकाशमें हमें दीखता है । यह तो हमारी पृथिवीके सदृश एक स्थूल जगत् है । हमारे मर्त्यलोक पृथिवीकी अपेक्षासे चन्द्र शब्द अमृतके अर्थमें सारे सूक्ष्म लोकोंके लिये प्रयोग हुआ है जिनको द्युलोक, स्वर्गलोक और कहीं - कहीं ब्रह्मलोक भी कहा जाता है ( वि ० पा ० सूत्र २६ का वि ० व ० ) I । ये सूक्ष्म लोकतो भूः और भुवः अर्थात् पृथ्वीलोक और सारे स्थूल अन्तरिक्षलोकोंके अंदर है, न कि बाहर । ऊपर बतला आये हैं कि सूक्ष्म लोकोंमें अन्तर्मुख होकर जाना होता है । उसीके उलटे क्रमसे सूक्ष्म लोकोंसे मनुष्यलोकमें बहिर्मुख होना होता है । इसलिये लिङ्ग - शरीरोंका वृष्टिद्वारा पृथिवी - लोकमें गिरना औषधियों आदिद्वारा मनुष्यों आदिसे खाये जानेकी कल्पना भ्रममूलक है । देवस्थानसे पशु - पक्षी आदि नीची योनियोंमें जानेकी बात भी अयुक्त है, क्योंकि ( ५३७ )

पृष्ठ 575

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ३ ९ सूक्ष्म लोकोंमें दिव्य शरीरको देनेवाले नियत विपाकके प्रधान कर्माशयोंकी निचली देनेवाले नियत विपाकके कर्माशय ही हो सकते हैं । भूमिमें मनुष्य - शरीरको छान्दोग्योपनिषद् ६। १० में अधोगति दिखलानेके लिये उस स्थूल गर्भका वर्णन है, जिसमें सकामियोंको चन्द्रलोकके आनन्द भोगनेके पश्चात् मनुष्यलोकमें प्रवेश करना होता है अर्थात् “ अभ्र होकर बरसता है, उससे चावल, ओषधियाँ, तिल आदि उत्पन्न होते हैं । इनसे बड़ी कठिनाईसे वीर्य बनता मेघ है अर्थात् जब मनुष्य उनको खाता है, तब उनका अति सूक्ष्म अंश वीर्य बनता है । उस वीर्यको जब वह ( स्त्रीकी योनिमें ) सींचता है, तब रजसे मिलकर गर्भ बनता है । उस गर्भमें सकामियोंका सूक्ष्म - शरीर चन्द्रलोकसे ( वृत्तिरूपसे ) प्रवेश करता है । " सूक्ष्म - शरीरका वीर्यद्वारा प्रवेश करना श्रुतिके विरुद्ध भी है । श्रुतिमें ब्रह्मरन्ध्रद्वारा प्रवेश होना बतलाया है । यथा — " स एतमेव सीमानं विदार्येतया द्वारा प्रापद्यत " ( ऐतरेय अध्याय १ खण्ड ३ । १२ ) तब उसने इसी सीमा ब्रह्मरन्ध्रको फोड़ा और वह इस द्वारसे प्रविष्ट हुआ । और मन्त्र ७ में इस बातको दर्शाया गया है कि इस लोकमें अच्छे कर्मवाले अच्छे गर्भोमें और बुरे कर्मोंवाला बुरे गर्भोमें अर्थात् वे जो इस लोकमें शुभ आचरणवाले हैं तत्काल ही शुभ जन्मको पाते हैं— जैसे ब्राह्मण - जन्म, क्षत्रिय - जन्म, वैश्य - जन्म और जो इस लोकमें निन्दित आचरणवाले हैं, वे शीघ्र ही नीच जन्मको पाते हैं जैसे कुत्तेके जन्म, सूकरके जन्म तथा चाण्डालके जन्म । देवयान — निष्कामकर्मी ( तथा असम्प्रज्ञात - समाधिकी भूमिको प्राप्त किये योगी ) पुण्यात्माओंका लिङ्ग - शरीर देवयान मार्गद्वारा आदित्यलोकमें आकर मुक्तिको प्राप्त होता है । उसकी पुनरावृत्ति नहीं होती है । निष्कामकर्म विद्या और ज्ञानके प्रकाशसे युक्त होते हैं; इसीलिये निष्कामकर्मियोंकी गति सकामकर्मियोंकी अपेक्षा दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण- ग - जैसे प्रकाशके समय ( मार्ग ) तथा प्रकाशके लोकोंमें होकर बतलायी गयी है । यथा—

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।

तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥

( गीता ८। २४ ) अग्नि ज्योति दिन शुक्लपक्ष ( जब चन्द्रमाका शुक्ल - भाग पृथ्वीके सामने रहता है अर्थात् शुक्ल प्रतिपदासे पूर्णिमातक अथवा शुक्ल पञ्चमीसे कृष्ण पञ्चमीतक अथवा शुक्ल अष्टमीसे कृष्णपक्ष अष्टमीतक ) उत्तरायणके छः मास ( जब उत्तर ध्रुव स्थानपर दिन होता है अथवा सूर्यके मकरमें संक्रमणसे लेकर छः मास ) पौष शुक्ल, माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ कृष्ण अर्थात् शिशिर ऋतु, वसन्त ऋतु, और ग्रीष्म ऋतु । इस प्रकारके समय ( मार्ग ) में मरकर गये हुए योगीजन आदित्यलोकको प्राप्त होते हैं । अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च न, अर्चिषमेवाभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुदङ्ङेति मासास्तान्, मासेभ्यः संवत्सर संवत्सरा-दादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान् ब्रह्म गमयत्येव देवपथो नावर्तन्ते नावर्तन्ते ॥ ( छान्दोग्य ०४ । १५ ब्रह्मपथः । एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्त । ५ ) ( ५३८ )

पृष्ठ 576

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सूत्र ३ ९ ] उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च * * [ विभूतिपाद अब चाहे वे ( ऋत्विज् ) उनके लिये शवकर्म ( अन्त्येष्टि - संस्कार ) करते हैं, चाहे न, सर्वथा वे ( उपासक ) किरण अर्चिको प्राप्त होते हैं । अर्चिसे दिनको, दिनसे शुक्लपक्षको, शुक्लपक्षसे उन छः महीनोंको जिनमें सूर्य उत्तरको जाता है । महीनोंसे बरसको, बरससे सूर्यको, सूर्यसे चन्द्रमाको, चन्द्रमासे बिजलीको! वहाँ एक अमानव ( जो मानुषी सृष्टिका नहीं ) पुरुष ( अर्थात् पुरुषविशेष = ईश्वर = अपरब्रह्म ) है वह इनको परब्रह्मको पहुँचाता है । यह देवपथ ( देवताओंका मार्ग है ), ब्रह्मपथ है ( वह मार्ग जो पर - ब्रह्मको पहुँचाता है ) । वे जो इस मार्गसे जाते हैं, इस मानवचक्र ( मानुषी जीवन ) को वापिस नहीं आते हैं । हाँ, वापिस नहीं आते हैं उपर्युक्त सारे प्रकाशमय मार्गोंके वर्णनसे सकामकर्मियोंकी अपेक्षा निष्कामकर्मियोंकी केवल ऊर्ध्व तथा शुक्ल गतिका ही निर्देश समझना चाहिये । वास्तवमें तो-स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छति । एतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ( छान्दोग्य ॰ ८ । ६ । ५ ) वह जितनी देरमें मन फेंका जाता है, उतनी देरमें आदित्यलोकमें पहुँच जाता है; क्योंकि यह आदित्यलोक पर - ब्रह्मका द्वार है । ज्ञानियोंके लिये यह खुला हुआ है और अज्ञानियोंके लिये बंद है । इसी ऊर्ध्व गतिको योगदर्शनके सूत्रमें ' उत्क्रान्तिः ' शब्दसे बतलाया गया है । यथा— शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्त्युत्क्रमणे भवन्ति ॥ ( छान्दोग्य ॰ ८ | ६ | ६; कठ ॰ २ । ३ । १६ ) एक सौ एक हृदयकी नाड़ियाँ हैं । उनमेंसे एक मूर्धाकी ओर निकलती है । उस नाड़ीसे ऊपर चढ़ता हुआ ( ज्ञानी ) अमृतत्व ( ब्रह्मलोक ) को प्राप्त होता है । दूसरी ( नाड़ियाँ ) निकलनेमें भिन्न - भिन्न गति ( देने ) वाली होती हैं । हाँ, निकलनेमें भिन्न - भिन्न गति देनेवाली होती हैं । मुक्तिके दो भेद वेदान्तमें मुख्यतया मुक्तिके दो भेद माने हैं-१ क्रममुक्ति — जिसमें निष्कार्मकर्मयोगी जो शबल - ब्रह्मको तो साक्षात् कर चुके, किंतु शुद्ध ब्रह्मको साक्षात् करनेसे पूर्व ही इस लोकसे चल देते हैं । वे उपर्युक्त देवयानद्वारा आदित्यलोकमें पहुँचकर वहाँ शुद्ध ब्रह्मको साक्षात् करके मुक्त होते हैं । ( तथा असम्प्रज्ञात - समाधिकी भूमिको प्राप्त किये हुए वे योगी जो निरोधके संस्कारोंद्वारा बहुत अंशमें व्युत्थानके संस्कारोंको नष्ट कर चुके हैं, कुछ शेष रह गये हैं, जिस अवस्थामें उन्होंने स्थूल शरीरको त्यागा है वे आदित्यलोकको अर्थात् विशुद्ध सत्त्वमयचित्तको प्राप्त होते हैं । वहाँ ईश्वरके अनुग्रहसे उनके व्युत्थानके शेष संस्कार निवृत्त हो जानेपर कैवल्य अर्थात् परब्रह्मको प्राप्त होते हैं । ) यथा— कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात् । ( वेदान्तदर्शन ४ । ३ । १० ) आदित्यलोकमें पहुँचकर वह कार्य ( शबल - ब्रह्म ) को उलाँघकर उस कार्यसे परे जो उसका अध्यक्ष परब्रह्म है, उसके साथ ऐश्वर्यको भोगता है । ( आदित्यलोक यहाँ आकाशमें दिखलायी देनेवाले भौतिक सूर्यका बोधक नहीं है, जो हमारी पृथिवीके सदृश एक भौतिक स्थूललोक है । सत्त्वमयचित्त है, जिसका वर्णन हमने कई स्थानोंमें ईश्वरके चित्तके रूपमें किया है इससे । जो सारे अभिप्राय सूक्ष्मलोकों विशुद्ध से ( ५३ ९ )

पृष्ठ 577

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विभूतिपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ४०–४२ सूक्ष्मतम, कारण लोक अर्थात् कारण जगत् है । ) २ सद्योमुक्ति – वे निष्काम कर्मयोगी जो शुद्ध ब्रह्मको पूर्णतया असम्प्रज्ञात - समाधिकी भूमिको प्राप्त किये हुए वे योगी जो व्युत्थानके साक्षात् कर चुके हैं ( तथा हैं ), उनको आदित्यलोकमें जानेकी अपेक्षा नहीं है 1 । वे सारे संस्कारोंको निवृत्त कर चुके योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो देहको न तस्य छोड़ते प्राणा ही मुक्त उत्क्रामन्ति हो जाते हैं । यथा— ब्रह्माप्येति । ब्रह्मैव सन् ( बृह ॰ उप ॰ ४ । ४ । ६ ) ‘ जो कामनाओंसे रहित है, जो कामनाओंसे बाहर निकल गया है, जिसको केवल आत्माकी कामना है उसके प्राण नहीं निकलते हैं; वह जिसकी कामनाएँ पूरी हो गयी हैं या ब्रह्मके शबल - स्वरूपकी उपासना और उसका साक्षात्कार कारणशरीर ब्रह्म ही हुआ ब्रह्मको पहुँचता है । ' चेतनतत्त्वमें कारणशरीर तथा कारण - जगत् परे रह जाते हैं । यथा- ( चित्त ) से होता है, शुद्ध यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह, आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन । ( तै ० उप ० ) ‘ जहाँसे वाणियाँ ( इन्द्रियाँ ) मनके साथ बिना पहुँचे लौटती हैं । ब्रह्मके उस आनन्दको करता हुआ ( शुद्ध परमात्मस्वरूपमें एकीभावको प्राप्त करता हुआ ) सर्वतो अभयं हो जाता है अनुभव । ' समानजयाज्ज्वलनम् ॥ ४० ॥

शब्दार्थ – समान - जयात् = ( संयमद्वारा ) समानके जीतनेसे; ज्वलनम् = योगीका दीप्तिमान् होना होता है । अन्वयार्थ—– ( संयमद्वारा ) समानके जीतनेसे योगीका दीप्तिमान् होना होता है । व्याख्या — जब संयमद्वारा योगी समानवायुको वशमें कर लेता है, तब समान प्राणके अधीन जो शारीरिक अग्नि है, उसके उत्तेजित होनेसे उसका शरीर अग्निके समान चमकता हुआ दिखायी देता है । सङ्गति — छत्तीसवें सूत्रमें स्वार्थसंयमके अवान्तर फलरूप श्रावणसिद्धिको बतलाया है, अब श्रावणसिद्धिवाले संयमको बतलाते हैं— श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम् ॥ ४१ ॥

शब्दार्थ – श्रोत्र- आकाशयोः = श्रोत्र और आकाशके; सम्बन्ध - संयमात् - सम्बन्धमें संयम करनेसे; दिव्यं श्रोत्रम् - दिव्य श्रोत्र होता है । अन्वयार्थ — श्रोत्र और आकाशके सम्बन्धमें संयम करनेसे दिव्य श्रोत्र होता है । व्याख्या – शब्दकी ग्राहक श्रोत्रेन्द्रिय अहंकारसे उत्पन्न हुई है और अहंकारसे उत्पन्न हुए शब्दतन्मात्राका कार्य आकाश है । इन दोनोंका सम्बन्ध देश - देशी आश्रयाश्रयिभावसे है । इस सम्बन्धमें संयम करनेसे योगीको दिव्य श्रोत्र प्राप्त होता है, जिससे वह दिव्य, सूक्ष्म, व्यवहित ( आवृत्त ) और विप्रकृष्ट अर्थात् दूरस्थ शब्दोंको सुन सकता है । इसी प्रकार ( त्वचा - वायु, चक्षु - तेज, रसना -जल, घ्राण - पृथ्वी ) के सम्बन्धमें संयम करनेसे दिव्य त्वचा, दिव्य नेत्र, दिव्य रसना और दिव्य घ्राण प्राप्त होता

है । ये सब सिद्धियाँ सूत्र छत्तीसमें पुरुष - ज्ञानसे पूर्व भी बतलायी गयी हैं ।

कायाकाशयोःसम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ॥ ४२ ॥

( ५४० )

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, सूत्र ४३-४४ ] स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजयः * * [ विभूतिपाद शब्दार्थ – काय - आकाशयोः - शरीर और आकाशके; सम्बन्ध - संयमात् - सम्बन्धमें संयम करनेसे; लघु - तूलसमापत्तेः च = और हलके रूई आदिमें समापत्ति करनेसे; आकाशगमनम् = आकाश - गमन ( सिद्धि प्राप्त होती है ) । अन्वयार्थ — शरीर और आकाशके सम्बन्धमें संयम करनेसे और हलके रूई आदिमें समापत्ति करनेसे आकाश - गमन - सिद्धि प्राप्त होती है व्याख्या – जहाँ शरीर है वहीं उसको अवकाश देनेवाला आकाश है, इस प्रकार इन दोनोंमें. आधेय - आधार व्याप्य - व्यापक भावका सम्बन्ध है । इस सम्बन्धमें संयम करनेसे अथवा रूई -सदृश हलकी वस्तुओंमें समापत्ति ( १-४१ ) करनेसे ( तदाकार होनेसे ) योगीका शरीर लघुताको प्राप्त करता है । इसलिये जलपर पाँव रखता हुआ चल सकता है । इसके पश्चात् मकड़ीके जाले - सदृश सूक्ष्म तारोंपर चलनेकी सामर्थ्य आ जाती है । अन्तमें शरीरके अति सूक्ष्म हो जानेसे आकाशगमनकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ॥ ४३ ॥

शब्दार्थ — बहिः - अकल्पिता = शरीरसे बाहर कल्पना न की हुई; वृत्तिः = वृत्ति; महाविदेहा = महाविदेहा कहलाती है; ततः - उससे; प्रकाश - आवरण - क्षयः - प्रकाशके आवरणका नाश होता है । अन्वयार्थ — शरीरसे बाहर कल्पना न की हुई वृत्ति महाविदेहा है, उससे प्रकाशके आवरणका नाश होता है । व्याख्या – मनको शरीरसे बाहर धारण करना " विदेहा - वृत्ति " तथा मनकी " विदेहा धारणा ” कहलाती है । जबतक मन शरीरके अंदर ही स्थित रहे पर उसको वृत्तिमात्रसे बाहर ही धारण किया जाय तबतक वह “ कल्पिता " कहलाती है । अभ्यासके परिपक्व हो जानेपर बिना कल्पनाके मन शरीरसे बाहर यथार्थ रूपसे स्थित हो जाता है; तब विदेहा - वृत्ति अकल्पिता कहलाती है । इसीको महाविदेहा कहते हैं । यह योगीको पर - शरीर - आवेश तथा लोक - लोकान्तरोंमें सूक्ष्म - शरीरसे भ्रमण करनेमें सहायक होती । इन दोनोंमें कल्पित - विदेहा - धारणा साधन है और अकल्पित - विदेहा - धारणा साध्य है; क्योंकि पहले कल्पित - विदेहाका अभ्यास किया जाता है, उसके पश्चात् अकल्पित - विदेहाको साधा जाता है । इसके अभ्याससे चित्तके प्रकाशको रोकनेवाले अविद्यादि क्लेश, कर्मविपाक आदि मल जो रजस्के मूलक हैं, नाश हो जाते हैं और चित्तमें निरावरण होनेके कारण यथेच्छ विचरनेकी सामर्थ्य हो जाती है । सङ्गति – सोलहवें सूत्रसे लेकर तैंतालीसवें सूत्रतक समाधिमें श्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये भिन्न - भिन्न संयम और उसकी सिद्धियाँ वर्णन करके अब अपने दर्शनके उपयोगी सबीज और निर्बीज - समाधिकी सिद्धिमें विविध उपाय दिखाते हैं । अगले सूत्रमें ग्राह्य पाँचों भूतोंका संयम बताया है-स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजयः ॥ ४४ ॥

शब्दार्थ – स्थूल = ( पाँचों भूतोंके ) स्थूल; स्वरूप = स्वरूप; सूक्ष्म = सूक्ष्म; अन्वय = अन्वय; अर्थवत्त्व - अर्थवत्त्वमें; संयमात् = संयम करनेसे; भूतजयः = भूतोंका जय होता है I अन्वयार्थ – पाँचों भूतोंके स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्वमें संयम करनेसे भूतोंका जय होता है । या - पृथ्वी आदि पाँच भूतोंके पाँच - पाँच रूप हैं-व्याख्या-( ५४१ )

पृष्ठ 579

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विभूतिपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र ४४ १ स्थूल – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाशका अपना - अपना विशिष्ट आकार स्थूल रूप २ स्वरूप- - उपर्युक्त पाँच भूतोंका अपना - अपना नियत धर्म, जिनसे ये जाने जाते हैं — जैसे पृथ्वीकी है । मूर्ति और गन्ध, जलका स्नेह, अग्निकी उष्णता, वायुकी गति या कम्पन और आकाशका अवकाश स्वरूप है । देना ३ सूक्ष्म - स्थूल भूतोंके कारण गन्ध - तन्मात्रा, रस - तन्मात्रा, रूप - तन्मात्रा, स्पर्श - तन्मात्रा और शब्द- तन्मात्रा सूक्ष्म रूप हैं । ४ अन्वय रूप — सत्त्व, रजस् तथा तमस् जो तीनों गुण अपने प्रकाश, क्रिया और स्थिति धर्मसे पाँचों भूतोंमें अन्वयीभावसे मिले रहते हैं, अन्वयी रूप हैं । अर्थवत्त्व – पुरुषका भोग अपवर्ग । जिस प्रयोजनको लेकर ये पाँचों भूत कार्योंमें लगे हुए हैं वह अर्थवत्त्वरूप है । इस प्रकार पाँचों भूतोंके धर्म, लक्षण और अवस्था भेदोंसे पचीसों रूपोंमें क्रमसे साक्षात्पर्यन्त संयम करनेसे पाँचों भूतोंका सम्यक्ज्ञान और उनपर पूरा वशीकार होता है । इस प्रकार भूतोंके स्वाधीन होनेपर जैसे गाय बछड़ोंके अनुकूल होती है, वैसे ही सब भूतोंकी प्रकृतियाँ योगीके संकल्पानुसार हो जाती हैं । टिप्पणी — व्यासभाष्य व्याख्या सूत्र ४४ – पाँचों भूतोंके जो अपने - अपने धर्मों शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध नामवाले विशेष और आकार आदिसहित जो एक - एक रूप हैं, वे स्थूल रूप हैं । जैसे पृथ्वीके गोत्वादि आकार ( अवयवोंका संनिवेश विशेष ), गुरुत्व ( भारीपन ), रूक्षता ( रूखाई ), आच्छादन ( ढाँपना ), स्थिरता, सर्वभूताधारता, भेद ( विदारण ), सहनशीलता ( सहिष्णुता ), कृशता, मूर्त्ति ( कठोरता ), सर्वयोग्यतारूप धर्मोंसहित शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध हैं, यह पृथ्वीका एक रूप है; और जलके जो स्नेह ( चिकनापन ), सूक्ष्मता, प्रभा ( कान्ति ), शुक्लता, मृदुता, गुरुत्व ( भारीपन ), शीतल स्पर्श, रूक्षता, पवित्रता, सम्मेलनसहित शब्द, स्पर्श, रूप, रस हैं — यह जलका एक रूप है; अग्निके जो उष्णता, ऊर्ध्वगति, पवित्रता, दाहशीलता, लघुता, भास्वरता, प्रध्वंसन, बलशीलता रूप धर्मोंसहित शब्द स्पर्शरूप हैं — यह अग्निका एक रूप है; वायुके जो वहनशीलता ( तिर्यग्गति ), पवित्रता, आक्षेप ( गिरा देना ), कम्पन, बल, चञ्चलता, अनाच्छादन ( आच्छादनका अभाव ), रूक्षतारूप धर्मोंसहित शब्द - स्पर्श हैं - यह वायुका एक रूप है; और आकाशके जो व्यापकता, विभाग करना, अवकाश देना आदि रूप धर्मोंसहित जो शब्द है - वह आकाशका एक रूप है । इस प्रकार पाँचों भूतोंके अपने - अपने धर्मोंसहित जो शब्दादि हैं, वे सूत्रमें ' स्थूल ' पदसे कहे हुए पाँच भूतोंके एक रूप हैं । पाँचों भूतोंका जो स्व - स्व सामान्य धर्म है, वह सूत्रमें ' स्वरूप ' पदसे कहे हुए भूतोंका द्वितीय रूप है । अर्थात् मूर्ति ( कठिनता ), स्निग्धता ( चिकनापन ), उष्णता, वहनशीलता और सर्वत्र विद्यमानता, क्रमसे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशके जो द्वितीय रूप हैं, वे स्वरूप हैं । ये मूर्ति ( कठिनता ) आदि धर्म ही स्व - स्व सामान्य पदके वाच्य हैं । इन कठिनतादि सामान्य धर्मवाले पृथ्वी आदिकोंके परस्पर भेद करनेवाले शब्दादि हैं । इसलिये शब्दादिको विशेष कहा जाता है । जैसे स्निग्ध, उष्णादि रूप जल, अग्नि आदिकोंसे कठिन पृथ्वीका भेदक ( भिन्नताका ज्ञापक ) मूर्ति ( कठिनता ) धर्म है; और कठिन, उष्णादिरूप पृथ्वी, अग्नि आदिकोंसे जलका भेदक स्नेह है; और कठिन, स्निग्ध आदि रूप पृथ्वी, जल आदिकोंसे अग्निकी भिन्नताका ज्ञापक उष्णता धर्म है । इस प्रकार भूतोंके परस्पर भेदक होनेसे मूर्ति ( ५४२ )

पृष्ठ 580

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सूत्र ४४ ] * स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजयः * * [ विभूतिपाद ( कठिनता ) आदि - आदि धर्म विशेष कहलाते हैं । ऐसे ही पञ्चशिखाचार्यजीने कहा है-' एकजातिसमन्वितानामेषां धर्ममात्रव्यावृत्तिः ' अर्थात् एक जातिवाले पृथ्वी आदिकोंकी अम्ल, मधुरादि धर्ममात्रसे व्यावृत्ति होती है । यद्यपि कठिनतादि धर्म भी पृथ्वी आदिकोंके परस्पर भेदक हैं तथापि नीबूरूप पृथ्वीसे अंगूररूप पृथ्वीका जो भेद है, उसका करनेवाला केवल खट्टा - मीठा रस ही कहा जायगा । इससे रस आदिको विशेष जानना अर्थात् पृथ्वीका जल आदिकोंसे जो भेद है वह तो कठिनतादिरूप असाधारण धर्मोंसे परिज्ञात हो सकता है, परंतु पृथ्वीसे अन्य पृथ्वीका भेदक रस आदि हैं । इस अभिप्रायसे ' एकजातिसमन्वितानाम् ' इन दोनों सामान्य और विशेषका जो समुदाय है, वही योगमतमें द्रव्य कहा जाता है । प्रसङ्गसे समुदायका निरूपण करते हैं । समुदाय दो प्रकारका होता है - एक ' प्रत्यस्तमितभेदावयवानुगत ', दूसरा ' शब्देनोपात्त-भेदावयवानुगत ' अर्थात् अवान्तर विभागके बोधक शब्दसे जिन अवयवोंका विभाग बोधन न किया गया हो उन अवयवोंमें अनुगत जो द्रव्य है, वह ' प्रत्यस्तमितभेदावयवानुगत ' कहलाता है; जैसे शरीर, वृक्ष, यूथ, वन ये समुदाय हैं । इनके अवान्तर विभागके बोधक शब्दका उच्चारण नहीं किया गया है अर्थात् हस्तादि अवयवोंका समुदाय शरीर पदका वाच्य है, शाखादि अवयवोंका समुदाय वृक्ष पदका वाच्य है, वृक्षादिका समुदाय वन पदका वाच्य है, किंतु इन सब समुदायोंमें अवान्तर विभागका बोधक कोई शब्द नहीं उच्चारण किया गया है, केवल समुदायमात्र उच्चारण किया गया है; इसलिये यह ‘ प्रत्यस्तमितभेदावयवानुगत ' समुदाय कहा जाता है । जहाँ अवान्तर विभागके बोधक शब्दका उच्चारण किया जाता है, वह ' शब्देनोपात्तभेदावयवानुगत ' समुदाय कहा जाता है । ‘ उभये देवमनुष्याः ' ( देवता और मनुष्य दोनों हैं ) यह समुदाय है । इस आकाङ्क्षापर कि वे दो अवयव कौन हैं जिनके लिये शब्दका अर्थ है- कहते हैं देव और मनुष्य अर्थात् इस समूहका एक भाग देव है और दूसरा अवयव मनुष्य है । ये दोनों ' देवमनुष्याः ' इस शब्दसे उच्चारण किये गये हैं; इसलिये यह समुदाय ‘ शब्देनोपात्तभेदावयवानुगत ' कहा जाता है । यह शब्द ' शब्देनोपात्तभेदावयवानुगत ' समुदाय भेद - विवक्षा और अभेद - विवक्षासे दो प्रकारका है । जैसे ' आम्राणां वनम् ' आमोंका वन है और ' ब्राह्मणानां संघः ' ब्राह्मणोंका समूह है । यह भेद - विवक्षासे दो प्रकारका समूह है और अभेद - विवक्षासे ' आम्रवनम् ' आम ही वह वन है और ' ब्राह्मणसंघः ' ब्राह्मण ही संघ है । ये दो समूह हैं । इस प्रकार समूह - समूहकी अभेद - विवक्षासे यहाँ समानाधिकरण है । पुनः यह समुदाय दो प्रकारका है — एक ‘ युतसिद्धावयव ', दूसरा ' अयुतसिद्धावयव ' । ' युतसिद्धावयव ' समुदाय वह है, जिसके अवयव विरले अर्थात् जुदा - जुदा हों; जैसे वृक्ष और संघरूप समुदायमें वनके अवयव वृक्ष जुदे - जुदे और विरले प्रतीत होते हैं तथा यूथके समुदाय गाय, बैल आदि भी पृथक् - पृथक् प्रतीत होते हैं । ‘ अयुतसिद्धावयव समुदाय ' वह है, जिसके अवयव पृथक् प्रतीतिसे रहित निरन्तर मिले हुए हों, जैसे शरीर, वृक्ष, परमाणु आदि । यहाँ त्वक्, रुधिर, मांस, मज्जादिकोंका समुदाय जो शरीर है, उसके ये अवयव मिले हुए होते हैं और मूल शाखादिकोंका समुदाय जो वृक्ष है, उसके भी ये अवयव मिले हुए होते हैं । यह ‘ अयुतसिद्धावयव समुदाय ' ही पतञ्जलि मुनिके मतमें द्रव्य कहलाता है । यही भूतोंका द्वितीय रूप है और यही स्वरूप पदका अर्थ है । अर्थात् मूर्ति ( कठिन ) रूप सामान्यका और कठोरता आदि धर्मोसहित शब्दादिरूप विशेषोंका ' अयुतसिद्धावयव समुदाय ' रूप पृथ्वी द्रव्य है । स्निग्ध( चिकना ) रूप ( ५४३ )