पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 601–610

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 601–610

पृष्ठ 601

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कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १० अर्थ - आशिषके नित्य होनेसे उन वासनाओंका अनादित्व ‘ ऐसा न हो कि मैं न होऊँ ' किंतु ' बना रहूँ ' यह आशिष अर्थात् अपने पाया जाता है । ' मा न भुवं भूयासम् ' हर - एक प्राणधारीमें पायी जाती है । यह स्वाभाविक नहीं सदा बने रहनेकी प्रार्थना ( इच्छा ) और जिसने इस जन्ममें किसी भी प्रमाणसे मरनेके दुःखको है; क्योंकि वह जन्तु जो अभी उत्पन्न हुआ है अनुभवसे पीछे होनेवाले स्मृतिके निमित्त मरण - त्राससे द्वेष करता अनुभव है । स्वाभाविक नहीं किया है, वह भी दुःख नहीं होती इस कारण यह चित्त अनादि वासनाओंसे बँधा हुआ निमित्तके वस्तु निमित्तके आश्रय करके पुरुषके भोग आयु प्राप्त कराता है 1 वशसे किसी वासनाको लब्ध अर्थात् यद्यपि चित्त अनादि अनेक जन्मोंकी विलक्षण वासनाओंसे अनुविद्ध वासनाएँ अभिव्यक्त ( प्रकट ) नहीं होतीं । किंतु जो कर्म फल देनेको उन्मुख हुआ ( युक्त ) है तथापि सब व्यञ्जक होता है, वे वासनाएँ उदित होकर पुरुषके भोगमें निमित्त होती हैं, अन्य वासनाएँ है वही कर्म जिनका प्रसङ्गसे भाष्यकार चित्तके परिमाणके सम्बन्धमें अन्य तथा योगदर्शनके सूत्रकारके विचार दबी बतलाते रहती हैं । यहाँ हैं— ' घटप्रासाद ' ' ' ' युक्त इति ' = कई एक दर्शनोंका मत है कि जिस प्रकार दीपकका प्रकाश, दीपकको घटमें रखनेसे संकुचित हो जाता है और महलमें रखनेसे विकसित हो जाता है, इसी हाथी, चींटी आदि ) जिस शरीरमें जाता है उस परिमाण आकार - मात्र हो जाता प्रकार है; इसलिये चित्त ( मनुष्य, ( सूक्ष्म - शरीरमें रहते हुए ) मृत्युके समय ' अन्तराभाव ' परलोकगमन अर्थात् एक स्थूल शरीरका उसकी छोड़ना और ( उसी सूक्ष्म शरीरमें रहते हुए जन्म लेनेके समय ) ' संसार ' परलोकसे आगमन अर्थात् दूसरे स्थूल शरीरमें प्रवेश करना ‘ युक्त ' सिद्ध होता है । ‘ वृत्तिरेव ` ` आचार्यः ’ = आचार्य अर्थात् योगदर्शनके सूत्रकार श्रीपतञ्जलि महाराजका यह सिद्धान्त है कि इस विभु चित्तकी वृत्ति ही सङ्कोच - विकासवाली है ( चित्त सङ्कोच - विकासवाला नहीं है, क्योंकि वह विभु है ) “ और यह ( चित्तका वृत्तिमात्रसे शरीरमात्रमें ) सङ्कोच - विकास धर्मादि ( धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य ) निमित्तकी अपेक्षासे होता है । यह निमित्त दो प्रकारके होते हैं — बाह्य और आध्यात्मिक । शरीर ( इन्द्रिय, धन आदि ) की अपेक्षा रखनेवाले स्तुति, दान, अभिवादन आदि बाह्य निमित्त हैं | और चित्तमात्रके अधीन अर्थात् चित्तमात्रसे ही होनेवाले श्रद्धा आदि ( श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा, वैराग्य आदि ) आध्यात्मिक निमित्त हैं । और ऐसा ही पूर्व आचार्य ( पञ्चशिखाचार्य ) ने कहा है — यह जो योगियोंके मैत्री आदि तथा श्रद्धा आदि विहार ( प्रयत्नसाध्य व्यापार ) हैं वे बाह्य साधन ( शरीर आदि ) की अपेक्षासे रहित हैं और अति प्रकृष्ट ( अति उत्तमशुक्ल ) धर्मको उत्पन्न करते हैं । इन दोनों ( बाह्य और आध्यात्मिक साधनों ) मेंसे मानस ( आध्यात्मिक ) बलवान् है; क्योंकि ज्ञान- - वैराग्य जो मानव - धर्म हैं, उनसे अधिक प्रबल कोई बाह्य साधन नहीं है । चित्त - बलके बिना ( केवल ) शारीरिक - बलसे कौन दण्डक वनको ( खरदूषणादि चौदह हजार राक्षसोंका क्षय करके राक्षसोंसे ) शून्य करनेका उत्साह ( श्रीरामचन्द्रजीके सदृश ) कर सकता है ( तथा ) कौन अगस्त्य मुनिके समान समुद्रको पी सकता है । ” भाष्यका स्पष्टीकरण-१ तासाम् ं ं‘दृश्यते । आशिषके नित्य होनेसे वासनाओंका तथा जन्मोंका प्रवाहसे नित्य होना सिद्ध किया है । ( ५६४ )

पृष्ठ 602

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सूत्र १० ] * तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् * * [ कैवल्यपाद २ सा न स्वाभाविकी मुपादत्ते ॥ नास्तिकोंके इस तर्कका कि तत्काल उत्पन्न हुए जन्तुका इष्ट वस्तुओंके देखनेमें हर्ष और अहितकर वस्तुओंके देखनेमें शोक प्रकट करना कमल - पुष्पके खिलने और मुरझानेके सदृश स्वाभाविक है । इस युक्तिसे खण्डन किया है कि कमलका खिलना और मुरझाना भी स्वाभाविक नहीं, किंतु सूर्यकी किरणोंके निमित्तसे है; क्योंकि स्वाभाविक वस्तुएँ सदा एक - सी रहती हैं — जैसे अग्निकी उष्णता । इसी प्रकार तत्काल उत्पन्न हुए बच्चेका हर्ष, शोक स्वाभाविक नहीं किंतु पूर्व जन्मोंमें सुख - दुःखके अनुभवोंकी स्मृति उसका निमित्त है । ३ तस्मादनादि वा ं... — इति ॥ चित्तका अनादि अनेक जन्मोंकी वासनाओंसे चित्रित होना और पुरुषके भोगका सम्पादन कराना सिद्ध किया है । ( यह सिद्धान्त सब दर्शनकारोंको अभिमत है ) । ४ घटप्रासाद ंयुक्त इति ॥ नैयायिकों तथा वैशेषिकोंका मत दिखलाते हैं, न्याय और वैशेषिकने पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुके उन सूक्ष्म परमाणुओंको जिनका कोई विभाग न हो सके और मनको अणु ( सूक्ष्म ) परिमाण माना है । दिशा, काल, आकाश तथा आत्माको विभु ( व्यापक ) महत् परिमाण माना है । अणु और विभु दोनों नित्य होते हैं । अनेक परमाणुओंसे मिलकर जो पदार्थ बनते हैं वे मध्यम परिमाणवाले होते हैं, जैसे पृथ्वी, जल आदि । ये अनित्य हैं; क्योंकि संयोगका विभाग होना आवश्यक है । यह मध्यम परिमाणवाले पदार्थ वास्तवमें न अणु हैं न विभु । परंतु एक - दूसरेकी अपेक्षासे परस्पर अणु और महत् भी कहलाते हैं, जैसे पृथ्वीकी अपेक्षासे घट अणु है और घटकी अपेक्षा पृथ्वी महत् परिमाणवाली है ( ६ । ११ वैशेषिक ) । इन दोनों दर्शनोंमें चित्तकी संज्ञा मनकी है जिसमें सब जन्मोंके वासनारूप संस्कार रहते हैं । मन दीपकके तुल्य प्रकाशवाला है । जिस प्रकार एक काँचकी चिमनीमें प्रकाशमान ज्योतिका प्रकाश घटमें रखनेसे उसके परिमाणके अनुसार संकुचित और बड़े मकानमें रखनेसे उसके परिमाणके अनुसार विकसित होता है । इसी प्रकार अणु परिमाण मन संकोच - विकासवाला है, सूक्ष्म शरीररूपी चिमनीमें प्रकाशमान जब वह किसी छोटे चींटी आदिके स्थूल शरीरमें जाता है तो उसका प्रकाश उसके शरीरके परिमाणके अनुसार संकुचित हो जाता है और जब मनुष्य हाथी आदि जैसे बड़े स्थूल शरीरमें होता है तो उसके परिमाणके अनुसार विकसित हो जाता है । ( ७। १ । २३ वैशेषिक ) तदभावादणु मनः । उसके अर्थात् विभुत्वके अभावसे मन अणु है । यथोक्तहेतुत्वाच्चाणु । ( ३ । २ । ६३ न्याय ) उक्त हेतु अर्थात् युगपत् ज्ञानके न होनेसे मन अणु है । यहाँ यह भी जान लेना चाहिये कि इस न्याय और वैशेषिकमें बतलाये हुए मनकी संज्ञा सांख्य और योगमें अहंकार है । ५ वृत्तिरेवास्य ` त्याचार्यः ॥ इससे भाष्यकारने योगदर्शनके सूत्रकारका सिद्धान्त बतलाया है अर्थात् चित्त धर्मी विभु है, उसमें संकोच विकास नहीं होता, उसके धर्म - वृत्तियोंमें ही संकोच - विकास होता है । वृत्तियोंका लाभ जन्म है और उनके छिप जानेका नाम मृत्यु है । ये वृत्तियाँ नैयायिकोंके गुण नहीं हैं किंतु द्रव्य हैं । शङ्का – चित्त प्रधान प्रकृतिका कार्य होनेसे विभु अर्थात् महत् परिमाणवाला नहीं हो सकता । और यह सांख्य तथा योग - सिद्धान्तके विरुद्ध भी है । ( ५६५ )

पृष्ठ 603

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कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १० हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकाश्रितं लिङ्गम् ॥ ( १ । १२४ सांख्यदर्शन ) कारणवाला अर्थात् कार्य, अनित्य, अव्यापी, क्रियावाला अनेक आश्रयवाला ( जो कारण प्रकृतिको बतलाते हैं ) ।; ये कार्यके लिङ्ग हैं हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रितं लिङ्गम् । सावयवं विपरीतमव्यक्तम् । ( १० सांख्यकारिका ) परतन्त्रं व्यक्तं कारणवाला, अनित्य, अव्यापी, क्रियावाला, अनेक आश्रित, चिह्न, अवयववाला, पराधीन, व्यक्त होता है और इससे उलटा अव्यक्त । समाधान — उपर्युक्त सांख्यसूत्र तथा कारिकामें प्रकृति और विकृतिके लक्षण योगने अणुत्व और विभुत्वको न्याय और वैशेषिकके ( परिमाणु आदिकी अपेक्षासे बताये ) पारिभाषिक हैं । सांख्य और नहीं प्रयोग किया है, किंतु ( गुणोंके परिणामकी अपेक्षासे ) अव्यक्त और व्यापी अर्थमें अर्थमें उन्होंने आठ प्रकृतियाँ, मूलप्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ और १६ केवल प्रयोग किया है । स्थूलभूत और मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ मानी हैं । मूलप्रकृति निरपेक्ष प्रकृति है, अन्य विकृतियाँ सात, पाँच सापेक्ष अर्थात् अपनी प्रकृतियोंकी अपेक्षा विकृति और विकृतियोंकी अपेक्षा प्रकृति हैं प्रकृतियाँ अपनी विकृतिमें व्यापी होनेसे उसकी अपेक्षा विभु है और उसमें अव्यक्त ( सूक्ष्म अप्रकट । प्रत्येक प्रकृति अनुगत रहनेके कारण उसकी अपेक्षा अणु ( सूक्ष्म ) है । और विकृतिरूपसे अव्यापी और ) रूपसे व्यक्त ( प्रकट ) होती है । इसी प्रकार ( मूल प्रकृतिके अतिरिक्त सातों प्रकृतियोंमेंसे ) हरेक प्रकृतिके प्रकृति और विकृति होनेकी अपेक्षासे उपर्युक्त लक्षण जानना चाहिये । मूल प्रकृति अपने प्रकृति रूपसे अव्यक्त तथा गुणोंके साम्य परिणामवाली होनेसे परोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष करनेयोग्य नहीं है, केवल उसकी व्यक्त विकृतियोंसे और गुणोंके विषम परिणामोंसे उसकी सत्ता अनुमानगम्य है । गुणोंके साम्य परिणामवाली होनेसे पुरुषके भोग अपवर्ग सम्पादनमें भी निष्प्रयोजन है । भाव यह है कि प्रकृति केवल विकृतिरूपसे ही अपनेको व्यक्त कर सकती है, प्रकृतिरूपसे नहीं । मूल प्रकृति केवल प्रकृति है, स्वयं किसीकी विकृति नहीं है । इसलिये अव्यक्त रूपसे प्रत्यक्ष करने योग्य नहीं है, केवल सत्तामात्र अनुमानगम्य और आगमगम्य है । योगीजन जो विवेक - ख्यातिमें तीनों गुणोंके अलग - अलग परिणामोंको साक्षात् करते हैं, उससे गुणोंके साम्य परिणामकी सत्ताका अनुमान करते हैं । अर्थात् महत्तत्त्वके साक्षात्कारसे मूलप्रकृति अनुमेय है । और यदि उस साक्षात्कारको मूल प्रकृति ही मान लिया जाय तो वह व्यक्त होनेसे किसी और अव्यक्त प्रकृतिकी अपेक्षावाली होगी । इस प्रकार अनवस्था दोष आ जायगा । इसलिये चित्त यद्यपि प्रधान प्रकृतिकी अपेक्षा अव्यापी लिङ्ग और विषम परिणामवाला है, तथापि अन्य सब विकृतियोंकी प्रकृति होनेसे सारी सृष्टिकी अपेक्षा व्यापी अर्थात् विभु है । इसलिये इसकी संज्ञा महत्तत्त्व अर्थात् विभु परिणामवाला तत्त्व की गयी है । चित्तमें ‘ अहम् ' भाव पैदा करके भिन्नता करनेवाली महत्तत्त्वकी विकृति अहंकार है । सांख्य तथा योगकी परिभाषामें प्रकृति उपादान कारण और धर्मी तथा विकृति कार्य, धर्म, परिणाम और वृत्ति एकार्थक शब्द है । इसलिये वृत्ति शब्द चित्तके धर्म अहंकारके लिये प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् विभु चित्तका संकोच - विकास उसके धर्म अहंकाररूपसे होता है । इसी कारण सांख्यने अहंकारमें ही कर्तापन बतलाया ( ५६६ )

पृष्ठ 604

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सूत्र ११ ] * हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः * [ कैवल्यपाद है । यथा ‘ अहंकारः कर्ता न पुरुष: ' इस सम्बन्धमें अगले सूत्रोंमें विशेष व्याख्या की जायगी । शंका - मन न अणु है न विभु है, किंतु मध्यम परिमाणवाला है । जैसे— न व्यापकत्वं मनसः करणत्वादिन्द्रियत्वाद्वा ॥ सक्रियत्वाद् गतिश्रुतेः ॥ ( ५ । ६ ९ –५ । ७० सां ० द ० ) मनको व्यापकता नहीं है करण होनेसे, इन्द्रिय होनेसे, क्रियावाला होनेसे और ( परलोकमें ) गति सुननेसे इससे मनके विभु होनेका खण्डन है । ( ५।७१ सां ० द ० ) न निर्मागत्वं तद्योगाद्घटवत् ॥ वह निरवयव भी नहीं है, क्योंकि उसका घटके समान योग है । इससे अणु होनेका खण्डन किया है । एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ॥ ( मुण्डक ० २ । १ । ३ ) इस ( परमात्मा ) से प्राण, मन और सारी इन्द्रियाँ उत्पन्न होते हैं । इससे चित्तका मध्यम परिमाण होना सिद्ध है । समाधान — सांख्यने आठ प्रकृतियाँ और १६ विकृतियाँ मानी हैं जैसा ऊपर बतला आये हैं । यहाँ ‘ मन ' शब्दका ‘ महत्तत्त्व ' प्रकृतिके लिये नहीं प्रयोग हुआ किन्तु सोलह विकृतियोंमें जो ग्यारह इन्द्रियाँ हैं, उस मन इन्द्रियके लिये ( ५, ६ ९, ७०, ७१ सांख्यदर्शन ) प्रयोग हुआ है । वह केवल विकृति होनेसे न विभु है, न अणु है; किंतु मध्यम परिमाणवाला है और ( मुण्डक उप ० २ । १ । ३ ) में पुरुषके शुद्ध स्वरूप अर्थात् परब्रह्मको अक्षर, अव्यक्त, प्रकृतिसे परे तथा सब कार्य - जगत्का निमित्त कारण बतलाया है । प्राण, मन, इन्द्रियादिमें परस्पर भिन्नता अथवा उपादान कार्य - भाव नहीं बतलाया गया है । श्रुतिमें मनको चित्त अर्थमें विभु ही बतलाया है । जैसे— अनन्तं वै मनः ॥ ( बृ ० उप ० ) चित्त अनन्त ( विभु ) है । सारांश – ' वृत्तिरेवास्य विभुनश्चित्तस्य संकोचविकासिनी ' का थोड़े - से शब्दोंमें इस प्रकार स्पष्टीकरण समझ लेना चाहिये कि वृत्ति, परिणाम, धर्म और विकृति तथा प्रकृति, उपादान कारण और धर्मी एकार्थक शब्द हैं । प्रकृति अपनी विकृतिकी अपेक्षा विभु अर्थात् व्यापक होती है । इसलिये पाँचों तन्मात्राएँ तथा ११ इन्द्रियाँ विभु अहंकारकी वृत्तिरूप हैं और अहंकार भी विभु चित्तका वृत्तिरूप ही है । सङ्गति — जब वासनाएँ अनादि हैं तो उनका अभाव भी नहीं हो सकता और उनके अभाव न होनेसे मुक्ति असम्भव है । उत्तर— हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥ ११ ॥

शब्दार्थ – हेतु - फल - आश्रय - आलम्बनैः = हेतु, फल, आश्रय और आलम्बनसे ( वासनाओंका ); संगृहीतत्वात् - संगृहीत होनेसे; एषाम् = इनके ( हेतु, फल, आश्रय और आलम्बनके ); अभावे = अभावमें; तद् - अभावः = उनका ( वासनाओंका ) अभाव होता है । अन्वयार्थ – हेतु, फल, आश्रय और आलम्बनमें वासनाओंके संगृहीत होनेसे इनके ( हेतु, फल, आश्रय और आलम्बनके ) अभावसे उन ( वासनाओं ) का अभाव होता है । व्याख्या –१ वासनाओंका हेतु - अविद्या आदि क्लेश, शुक्ल, कृष्ण तथा दोनों मिश्रित सकाम कर्म हैं । ( ५६७ )

पृष्ठ 605

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कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १२ २ वासनाओंका फल – जाति, आयु और भोगहैं । ३ वासनाओंका आश्रय- - अधिकारसहित चित्त है ४ वासनाओंका आलम्बन - इन्द्रियोंके विषयहैं । यद्यपि वासनाएँ अनादि हैं और अनन्त हैं तथापि वे सब सहारे रहती हैं । इनकी स्थितिमें वासनाओं की उत्पत्ति होती इन्हीं हेतु - फल - आश्रय और आलम्बनके तत्त्वज्ञानसे अविद्या आदि क्लेशोंका उनके फल आश्रय और है और अभावमें नाश । विवेक - ख्यातिद्वारा नाश होनेपर वासनाओंका भी अभाव हो जाता है । आलम्बनसहित अभाव हो जाता है, उनके व्यासभाष्यका भाषानुवाद ॥ सूत्र ११ ॥ हेतु आदिके उदाहरण ये हैं । यथा - धर्मसे सुख, अधर्मसे दुःख, सुखमें है । इन राग और द्वेषसे प्रयत्न होता है । उस प्रयत्नसे, मन, वाणी और शरीरसे राग और दुःखमें द्वेष होता अनुग्रह करता है और किसीकी हानि । ऐसा करनेसे फिर धर्म - अधर्म, सुख चेष्टा - दुःख करता हुआ किसीपर इस प्रकार यह छ: अरोंवाला संसार - चक्र चलता है । इस प्रतिक्षण घूमते हुए चक्रको, राग - द्वेष होते हैं । है । वही सब क्लेशोंका मूल होनेसे अनन्त - अनादि वासनाओंका हेतु ( कारण ) है । चलानेवाली अविद्या जो उत्पन्न होता है वह उसका फल है तथा धर्म - अधर्मके सुख - दुःख भोग फल जिसके आश्रय होकर चित्त वासनाओंका आश्रय है, क्योंकि जिस चित्तकी फलभोगरूप सामर्थ्य समाप्त हो हैं । अधिकारसंयुक्त गयी है उसमें ये वासनाएँ निराश्रय होकर नहीं ठहर सकतीं । जिसके सम्मुख होनेसे जो वासना प्रकट होती है आलम्बन है ( वे रूप; रस आदि इन्द्रियके विषय हैं ) । इस प्रकार सब वासनाएँ हेतु, फल, वही आश्रय उसका और आलम्बनसे संगृहीत हैं ( इसलिये यद्यपि ये वासनाएँ अनादि और अनन्त हैं तथापि ) इन हेतु आदि चारोंके

अभाव होनेपर उनके आश्रय रहनेवाली वासनाओंका अभाव हो जाता है ।

भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र ११ ॥

उन वासनाओंके अनन्त होनेसे उनका नाश कैसे होता है? इस आशङ्काको करके नाशका उपाय कहते हैं— वासनाओंका समीपवर्ती ( वर्तमान ) ज्ञान कारण है । उस सुख - दुःखादिके ज्ञानके राग - द्वेषादि कारण हैं । उन राग - द्वेषादिकोंका कारण अविद्या है । इस प्रकार वासनाओंका कारण साक्षात् अथवा परम्परासे अविद्या है । वासनाओंके फल शरीरादि और स्मृत्यादि हैं । वासनाओंका स्थान चित्त है । जो ज्ञानका विषय है, वही वासनाओं ( संस्कारों ) का विषय है । इससे उन हेत्वादिकोंसे अनेक वासनाओंका भी संग्रह व्यापन हो रहा है अर्थात् अनेक वासनाएँ व्याप्त हैं । जब वासनाओंके हेत्वादिकोंका नाश हो जाय अर्थात् ज्ञान और योगसे उन हेत्वादिकोंको जले हुए बीजके बराबर कर दिया जाय तो जड़के न रहनेसे वासनाएँ नहीं उगतीं अर्थात् शरीरादिको नहीं आरम्भ करतीं । इस प्रकार अनन्त वासनाओंका नाश हो जाता है । सङ्गति — अभावका कभी भाव नहीं होता और भावका कभी अभाव ( नाश ) नहीं होता । इस कारण वासनाओंका और उनके हेतु, अविद्या आदि क्लेशोंका जो भावरूप हैं अभाव कैसे सम्भव है? उत्तर— अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥ १२ ॥

शब्दार्थ - अतीत - अनागतम् = भूत और भविष्यत्; स्वरूपतः अस्ति = स्वरूपसे रहते हैं क्योंकि; -( ५६८ )

पृष्ठ 606

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सूत्र १२ ] * अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् * [ कैवल्यपाद अध्व - भेदात् = कालसे भेद होता है; धर्माणाम् = धर्मोंका । अन्वयार्थ — अतीत और अनागत स्वरूपसे रहते हैं, क्योंकि धर्मोंका कालसे भेद होता है व्याख्या – वासनाएँ और उनके हेतु आदिका अभाव कहनेसे यह अभिप्राय नहीं है कि उनका अत्यन्ताभाव हो जाता है । अभिप्राय यह है कि वे वर्तमान अवस्थाको छोड़कर भूत अवस्थामें चले जाते हैं । जितने धर्म हैं वे सदा धर्मीमें बने रहते हैं । जबतक भविष्यत् अवस्थामें रहते हैं तबतक वे अपना कार्य प्रकट नहीं करते हैं । केवल वर्तमान अवस्थामें अपना कार्य दिखाते हैं । फिर जब वे अपना कार्य बंद कर देते हैं तो वर्तमान अवस्थासे भूत अवस्थामें चले जाते हैं । इसका विस्तारपूर्वक वर्णन ३।९ वें सूत्रकी संगतिमें तथा ३ । १३ वें सूत्रकी व्याख्यामें कर दिया है । विशेष वक्तव्य— ॥ सूत्र १२ ॥ नैयायिकों तथा वैशेषिकोंने अभावको भी एक अलग पदार्थ निरूपण करके पाँच प्रकारका माना है । १ प्रागभाव — उत्पत्तिसे पहले अभाव, जैसे घटकी उत्पत्तिसे पहले घटका अभाव होता है २ प्रध्वंसाभाव — विद्यमान वस्तुका अभाव, जैसे घटका मुद्दर आदिके प्रहारसे टूट जाना । ३ अन्योन्याभाव – एक - दूसरेमें भेदरूप अभाव - जैसे घटका वस्त्रमें अभाव और वस्त्रका घटमें अभाव है । ४ अत्यन्ताभाव- - जो न उत्पन्न हुआ हो और न उत्पन्न हो सके, जैसे बन्ध्याका पुत्र । ५ सामयिकाभाव — जो समय - समयपर उत्पन्न होकर नाशको प्राप्त हो । जैसे घटके एक स्थानसे दूसरे स्थानपर चले जानेसे उसका अभाव । वेदान्त, योग और सांख्यका सिद्धान्त सत्कार्यवाद है । इसके यह अर्थ हैं कि कोई भी कार्य पैदा नहीं होता है किन्तु कार्यकी अभिव्यक्ति होती है । कारणमें कार्य पहले ही विद्यमान होता है । केवल संस्थानादि विशेषसे उसका आविर्भाव होता है । जैसे गीतामें बतलाया गया है - ' नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ' असत् वस्तुका ' भाव ' उत्पत्ति नहीं होती और सत् वस्तुका ' अभाव ' नाश नहीं होता अर्थात् कार्य सत् है, अपनी सत्ता रखता है, उसका न कभी अभाव था न आगे होगा । कार्य-कारण और धर्म - धर्मी पर्यायवाचक हैं, कार्य ( धर्म ) सदा अपने कारण ( धर्मी ) में सत् - भावसे अपने स्वरूपसे बना रहता है । भेद केवल इतना ही है कि वर्तमानकालमें व्यक्त, स्थूल प्रकटरूपसे और भविष्यत् तथा भूतकालमें अव्यक्त ( सूक्ष्म - अप्रकट ) रूपसे रहता है । जिसकी अभिव्यक्ति आगे होनेवाली है वह अनागत ( भविष्य ), जिसकी अभिव्यक्ति पीछे हो चुकी वह अतीत ( भूत ) और जो व्यापारमें उपारूढ़ हुआ अभिव्यक्त हो रहा है वह उदित ( वर्तमान ) रूपसे रहता है । इसी कारण योगीको त्रैकालिक पदार्थ-विषयक योगज़ ज्ञान हो सकता है । इसलिये उपर्युक्त पाँचों अभावोंमेंसे ( ३ ) ' अन्योन्याभाव ' में वस्त्रमें घटका पहलेसे अभाव था । उस अभावसे ही अभाव घटकी उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार ( ४ ) ' अत्यन्त अभाव ' में बन्ध्याके पुत्रका पहलेसे अभाव था उस अभावसे ही अभावकीउत्पत्ति होती है । ( ५ ) ' सामयिक अभाव ' में घटके एक • स्थानसे दूसरे स्थानमें जानेमें उसका नाश नहीं होता है; क्योंकि वह दूसरे स्थानपर अपने स्वरूपसे विद्यमान है इसलिये भावसे अभाव नहीं होता । ( १ ) ' प्रागभाव ' उत्पत्तिसे पूर्व अनागत कालमें घट अपने कारण ( ५६ ९ )

पृष्ठ 607

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कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * * [ सूत्र १३ ( धर्मी ) मिट्टीमें अव्यक्त ( सूक्ष्म ) रूपसे विद्यमान था, इसलिये अभावसे ( २ ) ‘ प्रध्वंसाभाव ' में घटके टूटनेसे वह अपने वर्तमान मार्गको छोड़कर अपने भावकी उत्पत्ति नहीं हुई । अव्यक्त ( सूक्ष्म ) रूपसे छिप गया, इसलिये भावसे अभाव नहीं हुआ । कारण ( धर्मी ) मिट्टीमें नहीं होता; किंतु वे भूतावस्थामें ( अव्यक्त ) हो जाती हैं अर्थात् छिप जाती इसी हैं । प्रकार और वासनाओंका नाश आयु और भोग आगेके लिये बंद कर देती हैं I अपना कार्य जाति, टिप्पणी- भोजवृत्तिका भाषानुवाद । सूत्र १२॥ शङ्का यह है कि चित्तमें रहनेवाली वासनाएँ और वासनाओंके स्मृत्यादिरूप फल एक कालमें नहीं होते, इससे वासनाओंका और उनके फलोंका भेद है, तो कैसे माना कार्य - कारण भावसे धर्मी, अपने धर्मोंके साथ एकरूप हैं? इस शंकाका उत्तर देते हुए धर्म - धर्मीकी एकरूपताका जाय कि प्रतिपादन चित्तरूपी करते हैं-इस दर्शनमें सर्वथा न रहनेवाली वस्तुओंकी उत्पत्ति युक्तियुक्त नहीं समझी जाती, क्योंकि सत् और असत् पदार्थोंका मेल हो ही नहीं सकता । शश - शृङ्गादि ( खरगोशके सींग आदि ) जो सर्वथा असत् हैं, उनका किसी सद्वस्तुके साथ सम्बन्ध नहीं देखा गया है । यदि कार्यको निरुपाख्य ( असत्, तुच्छ ) माना जाय तो किसको उद्देश्य करके कारण प्रवृत होते हैं, जो वस्तु नहीं है उसको समझकर कोई भी प्रवृत्त नहीं होता । सद्वस्तुओंका असद्वस्तुओंके साथ विरोध है । इसलिये सत् और असत्का कोई सम्बन्ध नहीं और जो वस्तु अपने स्वरूप अनागतादिको लाभ किये हुए है, वह क्योंकर निरुपाख्य और अभावरूप हो सकती है । स्वरूपको प्राप्त हुई वस्तु अपने विरुद्ध रूपको नहीं ग्रहण करती, इससे जो चीज है उसका नाश नहीं हो सकता और जो चीज नहीं है उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती तो उन - उन धर्मसे बदलनेवाला ( धर्मी ) चित्तादि सदा एकरूप ही रहता है । उसमें तीनों कालोंमें रहनेवाले धर्म अधिक रूपसे रहते हैं । वे धर्म अपने कालमें स्थित हुए स्वरूपको नहीं छोड़ते और जब केवल वर्तमान कालमें रहते हैं तो भोगके योग्य बन जाते हैं । इससे धर्मोंका ही भूत, भविष्यत् आदि रूपसे काल ( मार्ग ) भेद है । उस रूपसे ही कार्य - कारण भाव इस दर्शनमें माना जाता है, इससे मोक्षपर्यन्त एक ही चित्त धर्मी रूपमें बना रहता है जिसको मोक्षतक अलग नहीं कर सकते । सङ्गति — धर्मोंका स्वरूप बताते हैं— व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥ १३ ॥

शब्दार्थ — ते = वे ( धर्म ), व्यक्तसूक्ष्माः = प्रकट और सूक्ष्म; गुणात्मानः = गुणस्वरूप हैं । अन्वयार्थ — वे धर्म प्रकट और सूक्ष्म गुणस्वरूप हैं । व्याख्या — सब धर्म तीनों मार्गोंवाले हैं । वर्तमान मार्गमें व्यक्त ( स्थूल ) अर्थात् प्रकट होनेवाले होते हैं, और अतीत तथा अनागत मार्गमें अव्यक्त = सूक्ष्म अर्थात् छिपे रहते हैं । ये सारे धर्म महत्तत्त्वसे लेकर स्थूलभूतों - पर्यन्त तीनों गुणोंके ही परिणामविशेष हैं । वास्तवमें देखा जाय तो सब पदार्थ महत्तत्त्वसे लेकर भूत - भौतिकतक गुणोंका संनिवेश ( तरकीब ) मात्र होनेसे गुणस्वरूप ही हैं । अर्थात् पृथ्वी आदि पाँचों स्थूलभूत पञ्चतन्मात्रा - स्वरूप हैं । पञ्चतन्मात्रा तथा एकादश इन्द्रियाँ अहंकार - स्वरूप हैं । अहंकार महत्तत्त्व स्वरूप है । महत्तत्त्व प्रधान ( मूलप्रकृति ) स्वरूप है और प्रधान गुण - त्रय स्वरूप है । इस प्रकार परम्परासे ( ५७० )

पृष्ठ 608

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सूत्र १४ ] परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम्* * [ कैवल्यपाद यह सारा प्रपञ्च गुणस्वरूप ही है । यद्यपि गुणोंका असली स्वरूप हमारी दृष्टिगोचर नहीं होता, जैसा कि भगवान् वार्षगण्यका वचन है—

गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति ।

यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायेव सुतुच्छकम् ॥

गुणोंका असली रूप दिखायी नहीं देता और जो दृष्टिगोचर होता है वह माया - सा है और विनाशी है । अर्थात् कारणरूप गुण देखनेमें नहीं आते हैं और जो दीखते हैं, वे माया अथवा इन्द्रजालकी तरह तुच्छ हैं । भाव यह है कि यह सब कार्य गुणत्रयात्मक रूप अपने कारण प्रधान स्वरूप ही हैं । संगति- - जब तीनों गुण ही सम्पूर्ण पदार्थोंके कारण हैं तो पदार्थोंको अलग - अलग धर्मीरूप कैसे कह सकते हैं? उत्तर— परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥ १४ ॥

शब्दार्थ – परिणाम- एकत्वात् = परिणामके एक होनेसे; वस्तु - तत्त्वम् = वस्तुकी एकता होती है । अन्वयार्थ — परिणामके एक होनेसे वस्तुकी एकता होती है । व्याख्या — यह ठीक है कि तीनों गुण ही सब पदार्थोंके कारण हैं, पर वे अपने प्रकाश, क्रिया, स्थिति, स्वभावसे अङ्ग - अङ्गीभावसे गति कर रहे हैं । कहीं सत्त्वगुण अङ्गी है अर्थात् प्रधान है और रज, तम उसके अङ्ग अर्थात् गौण हैं । इसी प्रकार कहीं रज अङ्गी है और कहीं तम अङ्गी है और शेष गुण उसके अङ्ग हैं । इस कारण उनकी परिणामकी एकतासे वस्तु एक ही कही जाती है । इन गुणोंके अङ्ग - अङ्गीभावमें भी नाना प्रकारके भेद होते हैं । इस कारण उनके परिणाम भी भिन्न - भिन्न होते हैं । परिणामकी भिन्नतासे वस्तुएँ भिन्न - भिन्न धर्मोंवाली होती हैं— जैसे यह महत्तत्त्व है, यह अहङ्कार है, यह इन्द्रियाँ हैं, यह पृथ्वीं

है इत्यादि ।

विशेष वक्तव्य ॥ सूत्र १४ ॥

सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रजः ।

गुरु वरणकमेव तमः प्रदीपवच्चार्थतो वृत्तिः ॥

( सांख्यकारिका १३ ). सत्त्व हलका और प्रकाशक माना गया है, रजस् उत्तेजक और चल और तम भारी और रोकनेवाला है और दीपकसदृश एक उद्देश्य ( पुरुषके भोग अपवर्ग ) से इनकी वृत्ति ( काम ) है । १ सत्त्व, रजस् और तमस्का साम्य परिणाम ' प्रधान ' मूल प्रकृति है । २ सत्त्वमें रजस्, तमस्का लिङ्गमात्र विषम परिणाम महत्तत्त्व है । ३ सत्त्व महत्तत्त्वमें अहम् वृत्तिसे भेद उत्पन्न करनेवाला रजस् - तमस्का किञ्चित् अधिक विषम - परिणाम अहंकार है । ४ अहंकारके सत्त्वप्रधान अंशमें रजस् - तमस्का विषम - परिणाम ग्यारह इन्द्रियाँ हैं । इसमें भी सत्त्वप्रधान अंशसे मन, रजःप्रधान अंशसे ज्ञानेन्द्रियाँ और तमःप्रधान अंशसे कर्मेन्द्रियाँ — इन इन्द्रियोंमें भी परस्पर भेद करनेवाली गुणोंकी न्यूनाधिकता है । ५ अहङ्कारके तमःप्रधान अंशमें रजस् - तमस्का परिणाम पाँचों तन्मात्राएँ हैं । इन पाँचोंमें भी गुणोंकी ( ५७१ )

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कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १५ न्यून - अधिकता परस्पर भेदक है । ६ इन तन्मात्राओंमें भी रजस् - तमस्के न्यून - अधिक विषम - परिणामरूपपाँचों स्थूल भूत परस्पर भेदवाले हैं इन पाँचों स्थूल भूतोंके धर्म सब भौतिक पदार्थ सत्त्वगुणकी प्रधानतामें प्रकाशवाले देनेवाले, रजस्की प्रधानतामें उत्तेजक, प्रवृत्त करानेवाले और दुःख देनेवाले, हलके, सुख भारी, रोकनेवाले और प्रमाद तथा मोह उत्पन्न करनेवाले होते हैं । इसलिये तथा तमस्की प्रधानतामें जैसे बत्ती, तेल और अग्नि मिलकर एक - दूसरेको सहायता देते हुए प्रकाशका यद्यपि गुण तीन हैं; तथापि तीनों गुण मिलकर पुरुषके उपयोग अलग - अलग वस्तुओंको भिन्न - भिन्न रूपमें काम उत्पन्न देते करते हैं; इसी हैं प्रकार । संगति — शंका — जिस प्रकार स्वप्नमें चित्तके अतिरिक्त और कोई वस्तु भावरूपसे नहीं उसीसे सब कल्पित होते हैं । इसी प्रकार जाग्रत् अवस्थामें भी चित्तसे भिन्न कोई वस्तु नहीं होती है, चित्तकी ही रची हुई हैं । चित्त अनादि वासनाओंसे चित्रित है । इस कारण उसको अपनी है - अपनी । सब वासनाओंके अनुसार भिन्न - भिन्न वस्तुएँ प्रतीत होती हैं । वास्तवमें चित्तसे भिन्न कोई बाहर वस्तु नहीं है । समाधान-वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥ १५ ॥

शब्दार्थ – वस्तु - साम्ये = वस्तुके एक होनेपर ( भी ); चित्त - भेदात् - चित्तके भेदसे; तयोः -विभक्तः पन्थाः = उन दोनोंका ( चित्त और वस्तुका ) अलग - अलग मार्ग है । अन्वयार्थ – वस्तुके एक होनेपर भी चित्तके भेदसे उन दोनों ( चित्त और वस्तु ) का अलग - अलग मार्ग है | व्याख्या – प्रत्येक वस्तु अपने - अपने स्वरूपमें ही स्थिर है और बहुत - से चित्तोंका विषय बन सकती है । पर वह न एक चित्तकी कल्पना की हुई होती है, न अनेक चित्तोंकी । क्योंकि एक ही वस्तुको देखकर चित्तके अवस्था - भेदसे किसीको सुख होता है, किसीको दुःख; किसीको मोह और किसीको उदासीनता । यदि चित्तसे भिन्न वह वस्तु न होती तो इतने चित्तोंका विषय न बन सकती । फिर वही वस्तु अनेक चित्तोंको नाना प्रकारके भावोंसे प्रतीत हो रही है । इस कारण वस्तुएँ चित्तकी कल्पनासे नहीं होती हैं;

बल्कि चित्तसे भिन्न और उससे बाहर अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखती हैं ।

भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र १५ ॥

यदि कोई शंका करे कि ज्ञानसे भिन्न घटादि पदार्थ हों, तो एक अथवा अनेक वस्तु कहना चाहिये । जब कि एक विज्ञान ( चित्त ) ही संस्कारवशसे कार्य - कारण- भावको प्राप्त हुआ घटपटादिरूपसे भासता है तो यह कैसे कह सकते हैं कि एक अथवा अनेक वस्तु हैं? इसका उत्तर देते हैं-ज्ञान और ज्ञेय ( जानने योग्य पदार्थ घटादि ) का भिन्न मार्ग है अर्थात् ये दोनों भिन्न ही हैं । क्योंकि एक वस्तुमें चित्तों ( विज्ञानों ) का भेद रहता है । अर्थात् स्त्री आदि एक पदार्थके मिलनेपर स्त्रीकी सुन्दरतामें अनेक देखनेवालोंके चित्तकी भिन्नता सुख - दुःख - मोहरूपसे प्रतीत होती है । जैसे एक सुन्दर रूपवाली स्त्री मिल जाय तो कामीका चित्त सुखी होता है । उस स्त्रीकी सपत्नी ( सौत ) का चित्त उससे दुःखी होता है । और संन्यासीका चित्त उससे उदासीनता अर्थात् उपेक्षा करता है । जब एक ही वस्तुमें ( ५७२ )

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सूत्र १५ ] वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः * * [ कैवल्यपाद अनेक प्रकारकी चित्तवृत्तियाँ होती हैं तो स्त्री आदि चित्तके कार्य नहीं हैं । यदि एक चित्तके ही कार्य हों तो, एक ही रूपसे ज्ञान हो । और दूसरी बात यह है कि यदि वस्तुको चित्तका कार्य माना जाय तो जिस कोई पुरुषके चित्तका कार्य, वह वस्तु है उसके चित्तके दूसरी वस्तुमें लग जानेपर, वह वस्तु वस्तु ही न रहे? यदि कहो कि वह वस्तु नहीं रहती, तो अन्य पुरुषोंको वह कैसे मालूम होती है? प्रतीत होनेसे, वस्तु चित्तका कार्य नहीं है । यदि यह माना जाय कि बहुत - से चित्त मिलकर एक वस्तुको उत्पन्न करते हैं तो बहुतोंकी बनायी हुई चीजोंसे एक चित्तकी बनायी हुई चीज विलक्षण होनी चाहिये । यदि विलक्षण नहीं मानते तो कारणोंसे भिन्न - भिन्न होनेपर भी कार्यका भेद न रहनेसे जगत्को बिना कारणके अथवा एकरूप मानना होगा | बात यह है कि यदि कारणोंके भिन्न होनेपर भी कार्य भिन्न - भिन्न न माने जायँ, तो सब जगत् जो कि अनेक कारणोंसे उत्पन्न हुआ है वह एकाकार होना चाहिये । अथवा कारण विशेषका सम्बन्ध न रहनेसे स्वतन्त्रतासे कारणशून्य होना चाहिये । शङ्का – यदि एक चित्त ( विज्ञानात्मक ) से अनेक वस्तु नहीं होती ( तो ) तुम्हारे मतमें एक त्रिगुणात्मक चित्तसे एक ही पुरुषको सुख - दुःख मोहरूप अनेक ज्ञान कैसे हो जाते हैं? अर्थात् जैसे तुम्हारे मतमें एक चित्त अनेक रूपसे परिणत होता है, वैसे हमारे मतमें विज्ञान भी अनेक कार्य - कारणभावसे अवस्थित है उत्तर — हमारे मतमें त्रिगुण यथार्थ हैं । जब चित्तसे अर्थ ( घटादि ) ज्ञान होता है तो धर्माधर्मसहकारी ( साथ रहनेवाले ) कारण होते हैं । उन धर्मादिकोंके प्रकाश और तिरोभावसे चित्तका तत्तद्रूपसे प्रकाश होता है । जैसे कामेच्छु पतिके पास स्त्री हो तो धर्म - सहकारी चित्त - सत्त्वप्रधान होकर सुखमय परिणत होता है । और अधर्मके साथ रहनेसे सौतका रजः प्रधान चित्त दुःखरूपसे परिणत होता है । अधिक अधर्मका सम्बन्ध होनेसे क्रुद्ध सौतका तमःप्रधान चित्त मोहमय ( अज्ञानमय ) होता है I । इससे सिद्ध हुआ कि विज्ञान ( चित्त ) से भिन्न बाह्य ग्राह्य अर्थ होता है । तो विज्ञान ( चित्त ) और अर्थके स्वरूपका भेद होनेसे कार्य - कारणभाव ( विज्ञान और अर्थका ) नहीं है । कारणके भेद न होनेसे भी यदि कार्यभेद माना जाय तो दण्डसे भीति आदि भी होने चाहिये । इससे अर्थका ज्ञानसे भेद ही है । विशेष वक्तव्य ॥ सूत्र १५ ॥ बुद्धि, चित्त, विज्ञान ये एकार्थक हैं । यहाँ उन क्षणिक विज्ञानवादियोंकी शंकाओंका समाधान किया गया है जो क्षणिक विज्ञानसे अतिरिक्त वस्तुकी सत्ताको अनुमानद्वारा नहीं मानते । उनका अनुमान है कि जो ज्ञेय है वह विज्ञानसे भिन्न नहीं है; क्योंकि विज्ञानसे भिन्न दशामें उसकी उपलब्धि ( विषयका ज्ञान ) नहीं होती । जैसे विज्ञानसे विज्ञान अभिन्न है वैसे ही घटादि ज्ञेय भी विज्ञानसे अभिन्न हैं । उनकी शंकाका समाधान इस प्रकार किया गया है कि वस्तु एक होनेपर भी चित्त ( विज्ञान ) का भेद दिखलायी देता है, जैसे स्त्रीरूप वस्तु एक दशामें बनी रहती है किन्तु उसको देखकर पतिको सुख, सपत्नीको दुःख, कामीको मोह और निष्काम संन्यासीको उसमें उपेक्षा विज्ञान होता है । इस प्रकार विज्ञान ( चित्तवृत्ति ) चार हैं किन्तु वस्तु एक ही बनी रहती है । जो एक है वह अनेकोंसे भिन्न है । जैसे एक नीलका ज्ञान अनेक पीतादि ज्ञानोंसे भिन्न है वैसे ही एक स्त्रीरूप वस्तु अपने अनेकों विज्ञानोंसे भिन्न है । इसलिये ज्ञान और ज्ञेय एक नहीं हो सकते । ज्ञान विषयी है और ज्ञेय विषय है । एक प्रकृतिरूप वस्तुसे चित्त अनेक प्रकारका क्यों होता है? इसका उत्तर यह है कि चित्त और घटादि पदार्थ दोनों त्रिगुणात्मक हैं । जबतक चित्तमें धर्म, अधर्म, अविद्याका सम्बन्ध रहता है तबतक ( ५७३ )