पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 611–620
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 611–620
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कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र १६-१७ सत्त्व, रजस् और तमस्की क्रमशः अधिकता होनेसे सुख, दुःख और मोह उन त्रिगुणात्मक वस्तुओंमें उपेक्षा हो जाती है । इसलिये अर्थ विज्ञानसे भिन्न हुआ करते हैं । तत्त्वज्ञान होनेसे जगत् स्वप्नवाद, दृष्टि सृष्टिवाद ( ज्ञानके साथ ही वस्तुका होना ) के भ्रमोंका है समाधान । इसीसे ही जगत् मिथ्यावाद, सङ्गति — शङ्का — वस्तुकी सत्ता सत्त्वचित्तोंके ही अधीन ठहरती है; क्योंकि समझना चाहिये । ही वस्तु उनके भावके अनुसार ही भिन्न - भिन्नरूपसे प्रतीत होती है । भिन्न - भिन्न चित्तको एक समाधान-न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥ १६॥
शब्दार्थ – न - च = नहीं और; एक -चित्त - तन्त्रम् - एक चित्तके अधीन है; वस्तु ( वस्तु ); अप्रमाणकम् = बिना प्रमाणके अर्थात् बिना चित्तके; तदा - उस समय, किं स्यात् - वस्तु -क्या ; तत् = वह अन्वयार्थ - ग्राह्य वस्तु एक चित्तके अधीन नहीं है; क्योंकि वह ( वस्तु ) बिना प्रमाण ( चित्त होगी ) के । उस समय क्या होगी? व्याख्या – यदि एक चित्तके ही अधीन वस्तुको माना जाय तो जब वह चित्त किसी दूसरे विषयमें लगा हो तो अथवा निरुद्ध हो गया हो तो उस समय उसका अभाव होना चाहिये । लेकिन हम देखते हैं कि वह विद्यमान रहती है । इसको स्पष्ट रूपसे यों समझो कि शरीरका जो भाग पीठ या हाथ आदि जिस समय दिखलायी न दे तो उसको उस समय चित्तका विषय न होनेसे अविद्यमान नहीं कह सकते ।
इस कारण वस्तुकी सत्ता स्वतन्त्र है, चित्तके अधीन नहीं ।
व्यासभाष्यका भाषानुवाद ॥ १६ ॥
यदि वस्तु एक चित्त ( विज्ञान ) के ही अधीन हो अर्थात् ज्ञानके साथ ही वह वस्तु उत्पन्न हो तो चित्तके अन्य विषयमें लगनेपर अथवा निरुद्ध होने ( रुकने ) पर वह वस्तु अप्रमाणक हो जाय अर्थात् उसके स्वरूपका ग्रहण करनेवाला कोई न रहे, ऐसी होगी तो फिर वह होगी ही क्या? क्योंकि वह दूसरेका विषय नहीं बनी और एक चित्तसे उसके स्वरूपका सम्बन्ध नहीं अथवा चित्तके साथ सम्बद्ध हुई भी वह वस्तु कहाँसे उत्पन्न होगी? और जो इसके अनुपस्थित भाग हैं वे भी न होंगे और पीठके न ग्रहण होनेसे पेट भी ग्रहण न किया जायगा । इससे अर्थ ( वस्तु ) स्वतन्त्र है और सब पुरुषोंके लिये साधारण है, और चित्त ( विज्ञान ) भी प्रत्येक पुरुषमें स्वतन्त्र है । उन वस्तु और चित्त ( विज्ञान ) के सम्बन्धसे जो उपलब्धि है वह पुरुषका भोग है । सङ्गति – शङ्का – यदि वस्तुकी सत्ता स्वतन्त्र होती तो वह सदा चित्तको ज्ञात रहती, लेकिन कभी ज्ञात
होती है, कभी नहीं । यह बात सिद्ध करती है कि वह चित्तके अधीन है ।
समाधान-तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ॥ १७ ॥
शब्दार्थ – तत् - उपराग - अपेक्षित्वात् = उस पदार्थके उपराग ( विषयका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़ना ) की अपेक्षवाला होनेसे, चित्तस्य - चित्तको; वस्तु - वस्तु; ज्ञात - अज्ञातम् = ज्ञात और अज्ञात होती है । अन्वयार्थ – चित्तको वस्तुके जाननेमें उसके उपराग ( विषयका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़ना ) की अपेक्षा होती है इसलिये उसको ( चित्तको ) वस्तु ज्ञात और अज्ञात होती है । ( ५७४ )
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सूत्र १८ ] * सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात्* [ कैवल्यपाद व्याख्या — उपराग = इन्द्रिय - सन्निकर्षद्वारा जो विषयका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़ता है उसको उपराग कहते हैं । विषय अयस्कान्तमणि ( चुम्बक पत्थर ) के समान है और चित्त लोहेके समान है । विषय इन्द्रिय - सन्निकर्षद्वारा अपनी ओर आकर्षित कर अपने आकारसे चित्तको चित्रित कर देता है । इस प्रकार जिस विषयसे चित्त उपरक्त होता है अर्थात् जिस विषयका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़ता है वह विषय उसे ज्ञात होता है । वस्तुके ज्ञात - अज्ञात - स्वरूप होनेसे चित्त परिणामी है न कि वस्तुको स्वयं उत्पन्न करनेवाला 1 यहाँ यह भी बतला देना उचित प्रतीत होता है कि जब इन्द्रियद्वारा चित्तके साथ जिस वस्तुका सम्बन्ध होता है अर्थात् जब जैसा विषयाकार चित्त होता है तब उसमें चेतन प्रतिबिम्बरूप स्फुरण होता है ( यह स्फुरण या उपलब्धि वृत्तिसे भिन्न है ) तो उसी वस्तुको अथवा चित्तवृत्तिको अपने प्रतिबिम्बद्वारा पुरुष जानता है, अन्य वस्तुको नहीं । घटादिके सम्बन्धसे चित्तकी घटादि ज्ञानरूप वृत्ति होती है, अन्यथा नहीं । इससे चित्तके विषय ज्ञात और अज्ञात हैं इसीसे यह परिणामी है । पौरुषेय - बोध भिन्न है और मानसिक
बोध भिन्न ।
भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र १७ ॥
यदि ज्ञान प्रकाशक होनेसे ग्रहणरूप है और घटादि वस्तु ग्राह्यरूप अर्थात् ग्रहण करनेयोग्यरूप है, तो एक बार ही सब वस्तुओंका ग्रहण क्यों नहीं होता? अथवा सबका स्मरण क्यों नहीं होता? इस आशङ्काको हटाते हैं-घटादि वस्तुओंके उपरागकी अर्थात् अपने आकारको चित्तके लिये समर्पणरूप प्रतिबिम्ब - सम्बन्धकी अपेक्षा होनेसे ( इन्द्रिय - संनिकर्षद्वारा विषयका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़नेसे ) चित्तमें बाहरकी वस्तु ज्ञात और अज्ञात कहलाती है । तात्पर्य यह है कि सब पदार्थोंको अपना स्वरूपलाभ करानेमें चित्तकी और सामग्रीकी अपेक्षा है ( अथवा चित्तरूप सामग्रीकी अपेक्षा है ) । नीलादि ज्ञान, अपनी उत्पत्तिमें इन्द्रिय प्रणालीद्वार चित्तमें समाये हुए अर्थ - सम्बन्धकी, सहकारिकारणरूपसे अपेक्षा करता है । क्योंकि चित्तसे भिन्न अर्थका बिना किसी सम्बन्धके ग्रहण नहीं हो सकता । इस कारण जो वस्तु अपने प्रतिबिम्बस्वरूपको चित्तके लिये देती है उसी वस्तुको उस वस्तुका ज्ञान व्यवहारके योग्य बनाता है । इससे वह वस्तु ज्ञात कहाती है और जिसने अपना स्वरूप नहीं दिया वह ' अज्ञात ' रूपसे बोली जाती है । जिस जानी हुई वस्तुमें सादृश्यादि किसी पदार्थका ज्ञान, संस्कारोंको जगाता हुआ यदि सहकारी कारण मिल जाय तो उसी वस्तुका स्मरण होता है । इससे न सब जगह ज्ञान हो सकता है और न सर्वत्र स्मृति । इसलिये ज्ञानको ग्रहणरूप होनेपर और घटादिकोंको ग्राह्य माननेसे कोई विरोध नहीं आता । सङ्गति – बाह्य जगत्को चित्तसे भिन्न सिद्ध करके अब आत्माको चित्तसे भिन्न दिखाते हैं । शङ्का – यदि यह मान लिया जाय कि चित्तसे अलग वस्तुएँ हैं और चित्तको उनके उपरागसे ज्ञात और अज्ञात होती हैं तो फिर आत्मा ( पुरुष ) को चित्तसे अलग माननेकी आवश्यकता नहीं और यदि माना भी जाय तो पुरुष भी चित्तके सदृश परिणामी होता है । I समाधान-सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात् ॥ १८ ॥
शब्दार्थ- – सदा ज्ञाताः सदा ज्ञात रहती हैं; चित्त - वृत्तयः - चित्तकी वृत्तियाँ; तत् - प्रभोः: -उस चित्तके E ( ५७५ )
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कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र १ ९ स्वामी; पुरुषस्य = पुरुषके; अपरिणामित्वात् - परिणामी न होनेसे । अन्वयार्थ – चित्तका स्वामी पुरुष परिणामी नहीं है, इसलिये व्याख्या - चित्तका जब बाहरके विषयके साथ सम्बन्ध होता चित्तकी है वृत्तियाँ उसे सदा ज्ञात रहती हैं । जब सम्बन्ध नहीं होता तो अज्ञात होता है, इसलिये वह कभी बाहरके तो वह उसको ज्ञात होता है और है । वह जानने न जानने - इन दोनों अवस्थाओंमें बदलता विषयको जानता है, कभी नहीं जानता रहता है । यह उसमें परिणाम होता इसलिये वह परिणामी है । पर पुरुषमें यह परिणाम नहीं होता । वह रहता है, उसमें कोई विषय हो या न हो, चित्तका कार्य केवल इतना ही है कि वह सदा चित्तकी वृत्तियोंका साक्षी है । चाहे आकारमें परिणत होकर उसके स्वरूपको अपने स्वामी चिति ( पुरुष ) के जिस विषयसे सम्बन्ध रखता हो उसके परिणामका सदा ही ज्ञान बना रहता है । इस ज्ञानसे पुरुषमें चित्तकी भाँति सामने कोई रख दे । पुरुषको चित्तके ऐसे चित्तके विषय घटादि हैं और पुरुषका विषय वृत्तिसहित चित्त है । विषयोंके होते परिणाम नहीं होता । अर्थात् जानता है, कभी नहीं, पर पुरुष अपने चित्तको वृत्तिसहित सर्वदा जानता है । कभी हुए न जानता चित्त कभी उन विषयोंको तो परिणामी होता । अपने काममें सदा जानी हुई भोग्यरूप चित्तवृत्तियाँ ही भोक्ता पुरुषको परिणामशून्य ज्ञानमें अर्थाकारतारूप सम्बन्धकी आवश्यकता है, पर पौरुषेय ज्ञानमें पुरुष अर्थाकार जतलाती हैं । मानसिक परिणत ) नहीं होता, किंतु प्रतिबिम्ब - सम्बन्धसे ज्ञातामात्र होता है । यद्यपि चित्त जड़ है, ( इससे वस्तुके आकारमें ( बोध ) नहीं हो सकता, तथापि जैसे लोहपिण्डमें अग्निके प्रवेश होनेसे लोह भी प्रकाशरूप होता उसमें ज्ञान है, वैसे ही ज्ञानरूप पुरुषके साथ भोग्यता - सम्बन्ध होनेसे चित्तमें ज्ञान कहा जाता है । चित्तको जो जहाँ - तहाँ प्रकाशरूप कहा है वह इसलिये कि शुद्धतासे प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेकी इसमें शक्ति है । एक बात और भी है कि चित्तका सर्वदा ज्ञाता पुरुष न हो तो ' मैं सुखी हूँ अथवा नहीं, इत्यादि संशय भी होना चाहिये, सो होता नहीं ।
इससे भी पुरुष परिणामी नहीं है ।
भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र १८ ॥
प्रमाता ( जाननेवाला ) पुरुष भी जिस समय नील पदार्थको जानता है, उस समय पीतादिसे सम्बन्ध रखनेवाले चित्तके आकारका ग्रहण न करनेसे कदाचित् परिणामी हो जायगा, इस आशङ्काको हटाते हैं-जो प्रमाण - विपर्ययादिरूप चित्तकी वृत्तियाँ होती हैं, उनको ग्रहण करनेवाला चित्तका अधिष्ठाता पुरुष सब कालमें ही जानता है; क्योंकि पुरुषका परिणाम नहीं होता । यदि वह पुरुष परिणामी हो तो परिणामके कभी - कभी होनेसे चित्तकी वृत्तियोंको सदा जाननेवाला नहीं बन सकता । तात्पर्य यह है कि चैतन्यरूप पुरुष, चित्तका सर्वदा स्वामी है और निर्मल अन्तःकरण भी उसके साथ सदैव रहता है । वह चित्त जिस पदार्थके साथ सम्बन्ध करता है, उसी पदार्थका ज्ञाता पुरुष कहलाता है; क्योंकि घटाद्याकार वृत्तियोंमें चेतनका प्रतिबिम्ब - सा पड़ता है । इससे पुरुषमें परिणामिताकी शङ्का कभी नहीं हो सकती । सङ्गति — शङ्का — अग्निकी भाँति चित्त ही वस्तुका भी प्रकाशक है और अपना भी, इसलिये चित्तसे
अतिरिक्त किसी अन्य पुरुषके माननेकी आवश्यकता नहीं रहती ।
समाधान-न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥ १ ९ ॥
शब्दार्थ — न = नहीं; तत् = वह चित्त; स्व - आभासम् = स्वप्रकाश ( अपनेको आप ही प्रकाश ( ५७६ )
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सूत्र २० ] एकसमये चोभयानवधारणम् * * [ कैवल्यपाद करनेवाला अर्थात् जाननेवाला ) है; दृश्यत्वात् - दृश्य होनेसे । अन्वयार्थ – चित्त स्वप्रकाश नहीं है; क्योंकि वह दृश्य है । व्याख्या – जिस प्रकार दूसरी इन्द्रियाँ और शब्द आदि विषय दृश्य होनेसे स्वप्रकाश ( अपनेको आप ही प्रकाश करनेवाले अर्थात् जाननेवाले ) नहीं हैं, उसी प्रकार चित्त भी दृश्य होनेसे स्वप्रकाश नहीं है, किंतु पुरुषसे प्रकाश्य और जानने योग्य है । अग्निका दिया हुआ दृष्टान्त भी यहाँ लागू नहीं हो सकता । अग्नि जड है, उसको स्वयं अपना ज्ञान नहीं होता, उसको जाननेके लिये किसी अन्य ज्ञानवालेकी आवश्यकता होती है । इसी प्रकार चित्त भी जड है, उसे जाननेके हेतु उससे अलग चिति ( पुरुष ) को मानना पड़ेगा । चित्तके दृश्य होनेमें एक प्रमाण यह भी है कि उसमें सुख, दुःख, भय, क्रोध आदिके जो परिणाम होते हैं वे दूसरेसे देखे जाते हैं; जैसे — मैं सुखी हूँ, मैं क्रोधमें था इत्यादि । इससे सिद्ध है कि चित्तकी इस अवस्थाको देखनेवाला उससे अतिरिक्त चेतन पुरुष है भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र १ ९ ॥ यदि सत्त्वगुणकी प्रधानतासे चित्तको ही प्रकाशक मान लिया जाय तो उसको ही अर्थका और अपने स्वरूपका प्रकाशक माननेसे ' यह घट है ' इत्यादि व्यवहार हो जायँगे, पुरुषको माननेकी क्या आवश्यकता है । इस शङ्काको हटानेके लिये यह सूत्र है वह चित्त, स्वभास अर्थात् अपने स्वरूपका स्वयं प्रकाशक नहीं है, किंतु पुरुषसे प्रकाश्य है । क्योंकि वह दृश्य ( देखनेके योग्य अथवा प्रकाशके योग्य ) है । जो - जो दृश्य है, वह वह द्रष्टासे प्रकाश्य है, यह व्याप्ति है । जैसे घटादि दृश्य हैं और द्रष्टासे प्रकाश्य हैं । चित्त भी दृश्य है, इससे स्वयं प्रकाशक नहीं हो सकता । सङ्गति — शङ्का – यदि यह मान लिया जाय कि चित्त ही विषयका ज्ञान करता है और चित्त ही अपना ज्ञान भी करता है । तो उपर्युक्त दोषकी निवृत्ति हो जाती है । इसका उत्तर देते हैं— एकसमये चोभयानवधारणम् ॥ २० ॥
शब्दार्थ – एक - समये च = एक समयमें और; उभय - अनवधारणम् - दोनोंका विषय और चित्तका ज्ञान नहीं हो सकता । अन्वयार्थ — और एक समयमें दोनों विषय और चित्तका ज्ञान नहीं हो सकता । व्याख्या – यदि यह कहा जाय कि चित्त ही विषयका ज्ञान प्राप्त करता है और चित्तको ही अपना ज्ञान होता है तो इसमें यह दोष आता है कि एक समयमें दो ज्ञान नहीं हो सकते अर्थात् एक विषय-ज्ञान, दूसरा विषयवाले चित्तका ज्ञान । इस कारण चित्तसे अतिरिक्त इसका साक्षी अन्य चेतन पुरुषका
मानना अनिवार्य है ।
भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र २० ॥
उक्तार्थमें एक शङ्का तो यह है कि चित्तका दृश्यत्व सिद्ध नहीं हुआ, इससे दृश्यत्व साध्यके तुल्य है, इसलिये ‘ दृश्यत्व ’ हेतु ' साध्यसम ' हेत्वाभास है । और दूसरी शङ्का यह है कि पुरुषकी बुद्धिके व्यापारको जानकर ही हित - प्राप्ति और अहित - निवृत्तिके लिये वृत्तियाँ होती हैं तथापि ‘ क्रुद्धोऽहम् ', ' अत्र ( ५७७ )
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कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २१ मे रागः ' ‘ मैं क्रोधी हूँ ', ' मेरी इसमें प्रीति है ', इत्यादि प्रवृत्तियाँ बिना बुद्धिकी फिर बुद्धिको ही स्वप्रकाशक क्यों न माना जाय? इन दोनों शङ्काओं का उत्तर वृत्तिके इस नहीं सूत्रमें हो दिया सकतीं, तो है-' यह वस्तु सुखका हेतु अथवा दुःखका हेतु है ', इस प्रकार व्यवहारकी योग्यता करनेवाला वस्तु - सम्बन्धी बुद्धिका वृत्तिरूप व्यापार है । और ' मैं सुखी हूँ ' इस प्रकार व्यवहारका एक वृत्तिरूप व्यापार दूसरा है । अर्थज्ञान - कालमें ऐसे दो विरोधी व्यापारोंका होना असम्भव सम्पादक बुद्धिका कालमें चित्त अपने स्वरूपको और वस्तुओंको निश्चित नहीं कर सकता, इससे चित्त है अर्थात् एक किन्तु उक्त प्रकारके दो व्यापारोंको करनेके बाद ही दो प्रकारके स्फूर्तिरूप ( प्रकाशरूप स्वप्रकाशक उपलब्धि नहीं है; भिन्न है । फलोंका भान होता है अर्थात् फलरूप भान होता है, इसलिये बहिर्मुखरूपसे ही वृत्तियोंसे अपनेमें रहनेवाले चित्तको पुरुष स्वयं जानता है, इससे पुरुषमें ही वह फल है, चित्तमें नहीं । वृत्तिका तात्पर्य — घट और चित्त दोनोंका चित्तको एक ही क्षणमें ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिये इन दोनोंका साक्षी पुरुष है । अर्थात् ' घटमहमद्राक्षम् ' ' घटको मैंने देखा ' इस प्रकारका जो स्मृतिज्ञान होता है वह चित्त और घटके अनुभवसे उत्पन्न होता है । एक चित्तके क्षणमें ही नहीं हो सकता, इसलिये इन दोनोंका अनुभवकर्ता इनसे पृथक् पुरुष है । सङ्गति — शङ्का – यदि ऐसा मान लिया जाय कि एक चित्तसे विषय ग्रहण किया जाता है और उस विषयसहित चित्तको दूसरा चित्त ग्रहण करता है तो विषय और चित्त दोनोंका ज्ञान हो सकता है । इसका उत्तर-चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च ॥ २१ ॥
शब्दार्थ - चित्त - अन्तर- दृश्ये - एक चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य माननेमें; बुद्धिबुद्धेः - चित्तका चित्त होना; अतिप्रसङ्गः = अनवस्था दोष होगा; स्मृति - सङ्करः च = और स्मृतियोंका गड़बड़ हो जाना भी । अन्वयार्थ – यदि पहले चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य माना जाय तो चित्त ( ज्ञान ) के चित्त ( ज्ञान ) का अनवस्था दोष होगा और स्मृतियोंका संकर भी हो जायगा । व्याख्या – यदि यह माना जाय कि क्षण - क्षणमें चित्त बदलता रहता है, अर्थात् एक चित्तने एक विषय ग्रहण किया और उस विषयसहित चित्तको दूसरे चित्तने । इसी प्रकार उसको तीसरेने, तीसरेको चौथेने, तो यह क्रम बराबर चलता रहेगा -कभी समाप्त न हो सकेगा, इसमें अनवस्था दोष आ जायगा, अर्थात् पहले एक वस्तुका ज्ञान, फिर उस वस्तुके ज्ञानके ज्ञानका ज्ञान, इस प्रकार कभी एक ज्ञान भी समाप्त न होने पायेगा । दूसरा दोष स्मृतिसंकरका है । जितनी बुद्धियोंका अनुभव है, उतनी ही स्मृति होगी । अनुभव अनन्त हैं, जब उन सबकी स्मृति होने लगे तो उनके संकर होनेसे यह स्मृति किसकी है? यह धारणा न हो सकेगी अर्थात् उनमें गड़बड़ी हो जायगी । कुछ पता न चल सकेगा कि किसकी कौन - सी
स्मृति है । इस कारण चित्तसे अतिरिक्त द्रष्टा पुरुषको मानना ही पड़ता है ।
भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र २१ ॥
बुद्धिका स्वयं ग्रहण न हो, पर एक बुद्धिका द्वितीय बुद्धिसे ग्रहण हो जायगा ( फिर पुरुषान्तर क्यों मानना? ) इस आशङ्काका उत्तर देते हैं-यदि बुद्धिको जाननेवाली द्वितीय बुद्धि मानेंगे तो वह दूसरी बुद्धि भी अपने स्वरूपको न जानकर ( ५७८ ) पा ० यो ० प्र०२०-
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सूत्र २२ ] चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् * * [ कैवल्यपाद अन्य बुद्धिको प्रकाशित करनेमें असमर्थ है, इससे उस द्वितीय बुद्धिको ग्रहण करनेवाली तृतीय बुद्धि कल्पित करनी चाहिये और उसकी भी ग्राहिका अन्य, इस प्रकारकी अनवस्था हो जायेगी तो बिना पुरुषके अर्थज्ञान नहीं होगा; क्योंकि बिना बुद्धिके ज्ञान हुए अर्थज्ञान होता नहीं ( इससे बुद्धिसे भिन्न पुरुष मानना चाहिये ) । दूसरा दोष यह होगा कि स्मृतियोंका मेल हो जायगा । रूप और रसमें जो बुद्धि उत्पन्न हुई है उस बुद्धिको ग्रहण करनेवाली अनन्त बुद्धियोंके उत्पन्न होनेसे, उन बुद्धियोंसे उत्पन्न संस्कार भी अनेक होंगे । उन अनेक संस्कारोंसे जब एक बार ही बहुत - से स्मृतिज्ञान किये जायँगे तो बुद्धिके समाप्त न होनेसे बहुत - सी बुद्धि स्मृतियोंकी एक बार ही उत्पत्ति होगी । एक बार ही उत्पत्ति माननेसे किस विषयमें यह स्मृति हुई है, यह ज्ञान न हो सकेगा तो स्मृतियोंका मेल हो जायगा । इस गड़बड़ीसे यह रूपविषयमें स्मृति है, यह रसविषयमें, इस प्रकारका विभक्त ज्ञान न हो सकेगा । संगति – पुरुष क्रियारहित और अपरिणामी है और ज्ञान प्राप्त करने अथवा किसी विषयको ग्रहण करनेमें क्रिया और परिणाम दोनों होते हैं । फिर पुरुष चित्तके विषयका ज्ञान किस प्रकार कर सकता है? समाधान-चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥ २२ ॥
शब्दार्थ – चितेः - चिति अर्थात् चेतन पुरुषको, अ - प्रति - संक्रमाया: = जो क्रिया अथवा परिणाम - रहित है; तद् - आकार - आपत्तौ = स्वप्रतिबिम्बित चित्तके आकारकी तरह आकारकी प्राप्ति होनेपर, स्व - बुद्धि - संवेदनम् - अपने विषयभूत बुद्धि ( चित्त ) का ज्ञान होता है । अन्वयार्थ – पुरुषको, जो क्रिया अथवा परिणामरहित है, स्वप्रतिबिम्बित चित्तके आकारकी प्राप्ति होनेपर अपने विषयभूत चित्तका ज्ञान होता है । व्याख्या — यद्यपि अपरिणामी भोक्तृशक्ति पुरुष अप्रतिसंक्रम अर्थात् किसी विषयसे सम्बद्ध न होनेसे निर्लेप है तथापि विषयाकार परिणामी बुद्धि ( चित्त ) में प्रतिबिम्बित हुआ तदाकार होनेसे वह उस बुद्धि ( चित्त ) की वृत्तिका अनुपाती ( अनुसारी ) हो जाता है । इस प्रकार चैतन्य प्रतिबिम्बित ग्राहिणी बुद्धि - वृत्ति ( चित्त - वृत्ति ) के अनुकारमात्र होनेसे ही बुद्धिवृत्तिमें अभिन्न हुआ वह चेतन ज्ञान - वृत्ति कहा जाता है । परमार्थमें वह चेतन ज्ञाता नहीं है । क्योंकि चेतनके प्रतिबिम्बिका आधार होनेसे जो चित्तका चेतनाकार हो जाना है वह तदाकारापत्ति है । इस तदाकारापत्तिके होनेसे जो चित्तमें दर्शन -कर्तृत्व है उसको लेकर ही चेतनको द्रष्टा कहा जाता है, वास्तवमें तो यह दृशिमात्र ही है । ( २ । २० ) अर्थात् निर्विकार पुरुषमें दर्शनकर्तृत्व ज्ञातृत्व स्वाभाविक नहीं है, किंतु जैसे निर्मल जलमें प्रतिबिम्बित हुए चन्द्रमामें अपनी चञ्चलताके बिना ही जलरूप उपाधिकी चञ्चलतासे चञ्चलता भासती है वैसे ही चित्त - प्रति - बिम्बित जो चेतन है वह भी स्वाभाविक ज्ञातृत्व और भोक्तृत्वके बिना ही केवल प्रति - बिम्बाधार चित्तके विषयाकार होनेसे तदाकार भासता है । अथवा चेतन पुरुषका प्रतिबिम्ब पड़नेसे चित्तका जो चेतनवत् आकार होना है वह तदाकारापत्ति है । ऐसी तदाकारापत्ति हुए चित्तमें जो ज्ञातृत्व है उसीका निर्विकार पुरुषमें आरोप होता है । इस प्रकार चैतन्य - प्रतिबिम्बित चित्त ही चिदाकार हुआ अपने दृश्य और चेतनको द्रष्टा कर देता है । वास्तवमें पुरुष द्रष्टा नहीं है केवल ज्ञानस्वरूप है, चित्त और चेतनका अभिन्न रूपसे भान होनेसे ( ५७ ९ )
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कैवल्यपाद ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ सूत्र २३ ही ऐसा कहा गया है । निम्न वाक्यसे चेतनको बुद्धिवृत्यविशिष्ट कहा गया है । न पातालं न च विवरं गिरीणां नैवान्धकारं कुक्षया नोदधीनाम् गुहां यस्यां निहितं ब्रह्म शाश्वतं बुद्धिवृत्तिमविशिष्टां कवयो वेदयन्ते । ॥ जिस गुफामें शाश्वत ( नित्य ) ब्रह्म निहित है वह गुफा न तो पाताल है, न पर्वतोंकी अन्धकार है, न समुद्रोंकी खाड़ी है, किंतु प्रतिबिम्बित चेतनसे अभिन्न - सी जो बुद्धिवृत्ति ( चित्तवृत्ति गुफा है, न उसीको कवि ( ब्रह्मज्ञानी ) ब्रह्मगुहा कहते हैं । ) है टिप्पणी — उपर्युक्त व्याख्या व्यासभाष्यानुसार है । यह सूत्र अधिक महत्त्वका है इसलिये भोज-वृत्तिका भाषार्थ भी यहाँ देते हैं— भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र २२ ॥ यदि बुद्धि स्वयं प्रकाश नहीं और भिन्न बुद्धिसे उसका ग्रहण नहीं होता तो बुद्धि - ज्ञानरूप व्यवहार कैसे होता है? इस आशङ्काको करके अपना सिद्धान्त कहते हैं- -पुरुष जो कि चैतन्यरूप है, वह किसीसे मिला हुआ नहीं अर्थात् जैसे सत्त्व, रजस् आदि गुणोंका जब अङ्गाङ्गिभाव लक्षण परिणाम होता है तो वे गुण अपने प्रधान गुणके - से रूपको धारण कर लेते हैं । अथवा जैसे लोकमें फैलते हुए परमाणु एक विषय ( घटादि ) को बना देते हैं, वैसे चैतन्य शक्ति नहीं है, क्योंकि वह सर्वदा एकरूप सुप्रतिष्ठित रहती है, उस चैतन्यशक्तिके सङ्ग होनेसे जब बुद्धि चैतन्य - सी हो जाती है, और जब चेतन शक्ति बुद्धिवृत्तिमें प्रतिफलित हुई बुद्धिवृत्तिसे मिली हुई जानी जाती है, तब ( चितिको ) बुद्धिमें अपने स्वरूपका ज्ञान होता है । वृत्तिका तात्पर्य यह है कि यद्यपि जैसे बुद्धिका क्रियाद्वारा घटादि सम्बन्ध होता है, वैसे चितिका बुद्धिके साथ संयोग नहीं है; क्योंकि चिति परिणामशून्य है । तथापि जैसे सूर्यका जलमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे चितिका बुद्धिमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, इससे बुद्धिको चिदाकारता होनेसे चितिको बुद्धिवृत्तिसहित बुद्धिका भान होता है । सङ्गति — पिछले आठ सूत्रोंमें यह सिद्ध करके कि बाह्य - जगत् और पुरुष चित्तसे भिन्न है, अब यह बताते हैं कि चित्तको ही बाह्य वस्तु और आत्मा मानने और उससे अतिरिक्त इन दोनोंका अस्तित्व न माननेमें क्यों भ्रान्ति होती है? द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥ २३ ॥
शब्दार्थ – द्रष्टृ - दृश्य - उपरक्तम् = द्रष्टा और दृश्यसे रँगा हुआ; चित्तम् - चित्त; सर्वार्थम् = सारे अर्थोंवाला ( आकारवाला ) होता है । अन्वयार्थ —– द्रष्टा और दृश्यसे रँगा हुआ चित्त सारे अर्थोंवाला होता है । व्याख्या - १ चित्त, गुणोंका प्रथम सात्त्विक विषम परिणाम, प्रसवधर्मी ( क्रियावाला ), परिणामी और अचेतन ( जड ) है । यह उसका अपना ग्रहण स्वरूप है । २ पुरुषसे प्रतिबिम्बित होकर चित्त चेतन अर्थात् ज्ञानवाला प्रतीत होता है । यह उसका द्रष्टासे उपरक्त हुआ गृहीता स्वरूप है । इसीसे ही चित्तको चेतन और उससे अन्य किसी पुरुषके न होनेकी भ्रान्ति होती है ( ५८० )
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सूत्र २३ ] द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ** * [ कैवल्यपाद ३ बाह्य विषयोंसे प्रतिबिम्बित होकर चित्त उन - जैसा भासने लगता है । यह उसका दृश्य उपरक्त ग्राह्य स्वरूप है । इसीसे यह भ्रान्ति होती है कि चित्तसे अतिरिक्त कोई बाह्य विषय और बाह्य जगत् नहीं है । वास्तवमें चित्त, बाह्य जगत् और वस्तुएँ और पुरुष तीनों अलग - अलग हैं और अपनी अलग - अलग सत्ता रखते हैं । चित्त केवल दृश्य ( अर्थ ) से ही उपरक्त ( सम्बद्ध ) नहीं होता है, किंतु अपनी वृत्ति ( प्रतिबिम्ब ) द्वारा विषयी पुरुष ( प्रतिबिम्बित चेतन ) भी उसके साथ सम्बन्धवाला है । इसीसे ' घटमहं जानामि ' ( मैं घटको जानता हूँ ) यह जो प्रत्यक्षरूप ज्ञान है वह विषय और विषयी इन दोनोंका उपस्थापक होता है, केवल दृश्य अर्थका ही उपस्थापक नहीं होता है । इस प्रकार चित्त अचेतन विषयरूप होते हुए भी चेतन और विषयीके सदृश होनेसे चेतनाचेतन स्वरूप तथा विषय - विषयी अर्थात् दृश्य - द्रष्टारूपसे भासता हुआ स्फटिकमणि ( बिल्लौर ) के संदृश अनेक रूपवाला है 1 जिस प्रकार एक स्फटिकमणि ( बिल्लौर ) के पास एक नीला पुष्प और एक लाल पुष्प रख दें तो वह एक बिल्लौर ही नीले फूल और लाल फूलके प्रतिबिम्बसे और तीसरे अपने निज रूपसे तीन रूपवाला प्रतीत होता है, इसी प्रकार एक ही चित्त विषय और पुरुषके प्रतिबिम्बसे और तीसरे अपने रूपसे ग्राह्य, गृहीता और ग्रहणस्वरूप होकर तीन रूपवाला हो जाता है अर्थात् अपने रूपसे ग्रहणाकार, विषयके प्रतिबिम्बसे ग्राह्याकार और पुरुषके प्रतिबिम्बसे ग्राहकाकार होनेसे चित्त सर्वार्थ है । अथवा सिनेमाके साधारण श्वेत रङ्गकी चादर ( पर्दा ) के सदृश चित्तका अपना ग्रहणाकार रूप है । विद्युत्से प्रकाशित चादरके समान उसका आत्मासे प्रकाशित द्रष्टृ उपरक्तरूप है और चित्रोंसे युक्त चादर-जैसा विषयसहित चित्तका ग्राह्याकार दृश्य उपरक्त रूप है । इस प्रकार चित्त सर्वार्थ है । चित्तकी इस सर्वार्थताके ही कारण किन्हीं - किन्हीं अभ्यासियोंको चित्तको पुरुषके प्रतिबिम्बसे भासते हुए उसके गृहीत्राकार स्वरूपको देखकर यह भ्रान्ति उत्पन्न होती है कि चित्तके अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष ( आत्मा ) नहीं है तथा उसके दृश्यके प्रतिबिम्बसे भासते हुए ग्राह्याकार स्वरूपको देखकर किसी - किसीको यह भ्रम होता है कि चित्तसे भिन्न कोई ग्राह्य वस्तु नहीं है । * उनका यह भ्रम समाधिद्वारा आत्माके साक्षात्कारसे दूर हो सकता है । अर्थात् समाधिकालमें जो * जैसा कि कहा गया है - चित्तं प्रवर्तते चित्तं चित्तमेव विमुच्यते । चित्तं हि जायते नान्यच्चित्तमेव निरुध्यते ॥ लंकावतार सूत्र । चित्तकी ही प्रवृत्ति होती है और चित्तकी ही विमुक्ति होती है । चित्तको छोड़कर दूसरी वस्तु उत्पन्न नहीं होती और न उसका नाश होता है । चित्त ही एकमात्र तत्त्व है ॥ दृश्यं न विद्यते बाह्यं चित्तं चित्तं हि दृश्यते । देहभोगप्रतिष्ठानं चित्तमात्रं वदाम्यहम् ॥ अर्थात् बाहरी दृश्य जगत् बिलकुल विद्यमान नहीं है । चित्त एकाकार है । परंतु वही.इस जगत्में विचित्र रूपसे दीख पड़ता है । कभी वह देहके रूपमें और कभी भोग ( वस्तुओंके उपभोग ) के रूपमें प्रतिष्ठित रहता है, अतः चित्तहीकी वास्तवमें सत्ता है । जगत् उसीका परिणाम है । चित्तमात्रं न दृश्योऽस्ति द्विधा चित्तं हि दृश्यते । ग्राह्यग्राहकभावेन शाश्वतोच्छेदवर्जितम् ॥ लंकावतार ३ । ६५ । अविभागो हि बुद्ध्यात्मा विपर्यासितदर्शनैः । ग्राह्यग्राहकसंवित्तिभेदवानिव लक्ष्यते ॥ —स ० सि ० सं ० पृ ० १२ । अर्थात् चित्त ही द्विविध रूपसे प्रतीयमान होता है— ( १ ) ग्राह्य विषय, ( २ ) ग्राहक विषयी ॥ भ्रान्त दृष्टिवाला व्यक्ति ही अभिन्न बुद्धिमें ग्राह्य, ग्राहक, ग्रहण — इस त्रिपुटीकी कल्पना कर उसे भेदवती बनाता है ॥ ( ५८१ )
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कैवल्यपाद ] पातञ्जलयोगप्रदीप* [ सूत्र २३ सविकल्प प्रज्ञा होती है, उस प्रज्ञामें प्रतिबिम्बित अर्थ भिन्न है और जिसमें विषयका प्रतिबिम्ब पड़ता है वह प्रज्ञा भिन्न है तथा प्रतिबिम्बित पदार्थयुक्त प्रज्ञाको अवधारण करनेवाला जो पुरुष है वह भिन्न है । चित्त ही सब कुछ नहीं हो सकता; क्योंकि गृहीता, ग्रहण और ग्राह्य सब भिन्न - भिन्न हैं, एक नहीं हैं । भोजवृत्तिका भाषानुवाद ॥ सूत्र २३ ॥ इस प्रकार पुरुषसे जाना हुआ चित्त, सब वस्तुओंके ग्रहण करनेकी शक्तिके कारण, सब व्यवहारोंके निर्वाह - योग्य होगा, यह कहते हैं-द्रष्टा पुरुष है, उसके साथ चित्त भी चेतन - सा हो जाता है और जब दृश्य विषयोंके साथ सम्बन्ध करता है अर्थात् विषयाकाररूपी परिणामको प्राप्त होता है, तब वही चित्त सब वस्तुओंको ग्रहण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न होता है । जैसे निर्मल स्फटिक ( बिल्लौर ) दर्पण ( शीशा ) आदि ही प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेमें समर्थ होता है वैसे रजोगुण और तमोगुणसे अनाक्रान्त, शुद्ध चित्त सत्त्व ही, चेतन प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेमें समर्थ होता है । रज और तम, दोनों अशुद्ध होनेके कारण प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेमें असमर्थ हैं ॥ वह चित्त रज और तमको दबाता हुआ सत्त्वप्रधान बनकर स्थिर दीपककी शिखा ( चोटी ) के आकार - सा चेतन प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेकी शक्तिके कारण सदा एक रूपसे परिणत होता हुआ मोक्षतक रहता है । जैसे चुम्बकके निकट होनेपर लोहेका चलना प्रकट होता है । ऐसे ही चैतन्य रूप पुरुषके निकट सत्त्वका अभिव्यंग्य चैतन्य प्रकट हो जाता है । इसीसे इस शास्त्रमें दो प्रकारकी चिच्छक्ति ( ज्ञानशक्ति ) मानी जाती है । एक नित्योदिता ( नित्य उदित ), द्वितीय अभिव्यंग्य ( प्रकाश होने योग्य ) नित्योदिता । चेतन शक्ति पुरुष है । उसीकी निकटतासे प्रकाशनीय है चैतन्य, जिसका ऐसा सत्त्व प्रकटित होता है, वही अभिव्यंग्य चिच्छक्ति है । वह अत्यन्त समीप होनेसे पुरुषका भोग्य है । अर्थात् नित्योदित कूटस्थ चिच्छक्तिका सुखादिकी समानरूपताको प्राप्त हुई, चित्प्रतिबिम्बरूप चिच्छक्ति भोग है । वही सत्त्व, शान्त ब्रह्मवादी सांख्यों ( योगाचार्यों ) से परमात्माद्वारा अधिष्ठेय अर्थात् कर्मानुकूल सुख - दुःखका भोक्ता कहा जाता है । तीनों गुणोंवाले, सुख - दुःखादिरूप ( घटादि ) जो कि बिना किसी विशेषताके, किसी गुणके प्रधान होनेसे प्रतिक्षण परिणत होते रहते हैं, वे कर्मानुसारी ( चित् प्रतिबिम्बयुक्त ) शुद्ध सत्त्वमें, अपने आकारको समर्पण करनेसे ज्ञेय बन जाते हैं । जिसमें चेतनका प्रतिबिम्ब पड़ता है, जिसका विशिष्ट आकार विषयोंके आकारको ग्रहण करनेसे बनता है और जो वस्तुतः चेतन न होनेपर भी चित् प्रतिबिम्बके बलसे चेतन - सा प्रतीत होता है वह पहला चित्त सत्त्व ही सुख - दुःखरूप भोगका अनुभव करता है । वही भोग पुरुषके भी अत्यन्त निकट होनेसे भेद - ज्ञान न होनेसे अभोक्ता पुरुषका भी भोग कहा जाता है । इसी अभिप्रायसे विन्ध्यवासी ( किसी आचार्य ) ने कहा है कि - चित्त सत्त्वका दुःखादि ही पुरुषका दुःखादि है और अन्यत्र भी लिखा है कि ' बिम्बके रहते हुए, प्रतिबिम्बित छायाके सदृश छायाका प्रकट होना प्रतिबिम्ब ' प्रतिसंक्रान्ति शब्दसे ' कहा जाता है ' । वैसे ही चित्त सत्त्वमें भी पुरुषके प्रतिबिम्बके तुल्य चैतन्यका प्रकट होना शब्दका अर्थ है । तात्पर्य यह है कि दो प्रकारका भोग है, एक चिदवसानतारूप और हुआ दूसरा है परिणामलक्षण । प्रतिबिम्बित चिच्छक्तिरूप पुरुषका चिदावसानतारूप भोग है और प्रतिबिम्बित भोग है । चैतन्य जिसमें ऐसी सुखादि आकारसे परिणत होनेवाली बुद्धि ( चित्त ) का परिणामलक्षण ( ५८२ )
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सूत्र २३ ] द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् * * [ कैवल्यपाद शङ्का यह है कि जिसका परिणाम नियत अर्थात् परिच्छिन्न हो ऐसी निर्मल वस्तुका, निर्मल ( शुद्ध ) वस्तुमें प्रतिबिम्ब पड़ता है; जैसे मुखका शीशेमें । परंतु अत्यन्त निर्मल पुरुषकी अपेक्षा, जो अशुद्ध सत्त्व है, उसमें अत्यन्त निर्मल, व्यापक, अपरिणामी ( परिणामशून्य ) पुरुषका प्रतिबिम्ब कैसे पड़ता है? उत्तर यह है कि — प्रतिबिम्बके स्वरूपको न जानकर शङ्काकारने यह कहा है – क्योंकि सत्त्वमें प्रकाशनीय चैतन्य शक्तिका पुरुषकी निकटतासे प्रकटित हो जाना ही प्रतिबिम्ब है, और पुरुषमें जैसी चेतनशक्ति है उसीकी छाया भी इसमें प्रकट होती है । यह कहना कि अत्यन्त निर्मल पुरुष, अशुद्ध सत्त्वमें कैसे प्रतिबिम्बित होता है, यह भी व्यभिचरित है अर्थात् अत्यन्त शुद्ध वस्तुका भी अपनेसे अशुद्ध वस्तुमें प्रतिबिम्ब पड़ता है । जैसे निर्मलतासे निकृष्ट जलादिमें अत्यन्त निर्मल सूर्यादि प्रतिबिम्बित हुए मालूम होते हैं । यह कहना कि व्यापकका प्रतिबिम्ब नहीं होता, यह भी ठीक नहीं, क्योंकि व्यापक आकाशका शीशेमें प्रतिबिम्ब मालूम होता है । ऐसे प्रतिबिम्ब माननेमें कोई दोष नहीं । द्वितीय शङ्का यह है कि सत्त्वगुणके परिणामरूप बुद्धि सत्त्व ( अन्तःकरण ) में पुरुषकी निकटतासे प्रकाशित चिच्छक्तिका जो बाह्य वस्तुओंके सम्बन्ध होनेपर भोग है, वही पुरुषका भोग है, यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि यदि प्रकृति परिणाम रहित है तो चित्त सत्त्व कैसे हो सकता है? और यदि प्रकृतिमें परिणाम होता है तो वह परिणाम उसका क्यों होता है? यह कहना कि पुरुषार्थ कर्तव्यताको अर्थात् पुरुषको सुख - दुःखादि देनेके लिये प्रकृतिका परिणाम होता है ठीक नहीं, क्योंकि ' पुरुषार्थ मुझे करना चाहिये ' इस प्रकारकी इच्छाको ' पुरुषार्थकर्तव्यता ' कहते हैं । प्रकृति जड है । उसमें ऐसी इच्छा पहले कहाँसे आयी? यदि वैसी इच्छा है तो प्रकृतिको जड क्यों कहा जाता है? ( उत्तर ) प्रकृतिमें अनुलोम और प्रतिलोम – दो प्रकारके स्वाभाविक परिणाम होते हैं । वे ही परिणाम ' पुरुषार्थकर्तव्यता ' कहलाते हैं । वह परिणामरूप शक्ति, जड प्रकृतिमें भी स्वाभाविक है । इस प्रकृतिका बहिर्मुख रूपसे महत् - आदिसे लेकर पञ्चमहाभूतपर्यन्त अनुलोम परिणाम होता है; फिर अपने - अपने कारणमें प्रवेशद्वारा ( अर्थात् पृथ्वीका जलमें, जलका तेजमें, तेजका वायुमें, वायुका आकाशमें इत्यादि रूपसे ) अस्मितातक प्रतिलोम परिणाम होता है । इस तरह जब पुरुषके भोगोंकी समाप्ति हो जानेसे प्रकृतिकी स्वाभाविक उक्त दोनों शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं, तब मुक्त पुरुषके प्रति प्रकृति कृतार्थ हुई ( अपने कामको समाप्त करनेवाली ) ( उस मुक्त पुरुषके लिये ) फिर परिणामको नहीं आरम्भ करती । जड प्रकृतिको ऐसी पुरुषार्थ - कर्तव्यता माननेसे कोई दोष नहीं । शङ्का – यदि ऐसी स्वाभाविक शक्ति प्रकृतिमें है तो मुमुक्षु पुरुष मोक्षके लिये क्यों प्रयत्न करता है? यदि मोक्ष इष्ट न हो तो मोक्षका उपदेशक शास्त्र व्यर्थ ही हो जाय । अर्थात् जब इच्छादि प्रकृतिमें ही है तो मुक्ति और बन्धन प्रकृतिके ही अधीन हुए, फिर पुरुष क्यों यत्न करता है? और भोग्य - भोक्तारूप सम्बन्ध अनादिसे है, उसके उत्तर- -प्रकृति पुरुषका रहते हुए प्रकटित हुआ है चैतन्य जिसमें ऐसी प्रकृतिको ' कर्तृत्वाभिमान ' ' मैं करता हूँ ' इस प्रकारका अभिमान होता है, उस अभिमानसे दुःखका अनुभव होता है । दुःखके अनुभव होनेसे ( पुरुष ) यह चाहता है कि मुझे यह अत्यन्त दुःखनिवृत्ति कैसे हो, तो दुःखनिवृत्तिके उपायके उपदेशक शास्त्रकी अपेक्षा प्रकृतिको होती है । दुःख - निवृत्तिका इच्छुक कर्माधिकारी अन्तःकरण शास्त्रोपदेशका विषय है । अन्य दर्शनोंमें भी प्रकारका ही अविवेकी शास्त्रमें अधिकारी है । वही अधिकारी मोक्षके लिये यत्न करता हुआ, इस ऐसे ( ५८३ )