पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 651–660

पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 651–660

पृष्ठ 651

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पातञ्जलयोगप्रदीप ] * शब्दानुक्रमणी * [ परिशिष्ट ३ पृष्ठ पृष्ठ ( ह ) २२- अपान २२८, २२ ९, ५३४, ५३५ १- हस्त .... ७८ २३- अवतार १८६, २७३ .... २- हान ( दुःखका नितान्त २४- अविशेष ३१५ .... अभाव ).... २, १०, १२, ६१, १०८, १३३२५- अविद्या २८६, २८७, ३४५,३४७ ३ - हानोपाय ( हानका साधन ) २६ - अभिनिवेश ( क्लेश ) २, १०, १३, .... .... २८ ९ -२ ९ ० ६१, १०८, १३३ २७- अभिव्यञ्जक २ ९ ३ ४ - हिरण्यगर्भ १४, १२८ २८ - अभ्यास १६७, १६ ९ ५ - हेतु .... ५८ २ ९- अमृतधारा ( नुस्खा ) ४६१ ६- हेय ( त्याज्य - दुःख ) २, १०, १०७, १२६ ३०- अम्ल- पित्त - नाशक ( ओषधि ) .... ४६३ ७ - हेय हेतु ( हेयका कारण ) ३१ - अरण्डीपाक ( ओषधि ) २, १० .... ४६३ ३२- अरिष्ट ६१, १०८, १२६ ५२०, ५२१ ८- हेत्वाभास २१ ३३- अर्श ( बवासीर ) ४७१-४७२ ३४ - अलब्धभूमिकत्व २१८ .... ( ज्ञ ) १ - ज्ञान ६१ | ३५ - अलिङ्ग २६०, २६२, ३१५, ३१६, ३२४, ३२५ पातञ्जलयोगप्रदीप ३६ - अविरति .... २१८ ३७- अशुचि ( अ ) २८६ .... १- अक्लिष्ट १५५, १५६ | ३८ - अश्विनी मुद्रा ४२५ .... २ - अङ्गमेजयत्व २१ ९ ३ ९ - अष्टक गोली ( नुस्खा ) ४६२ ३ - अजीर्णनाशक ( ओषधियाँ ) ४६२ ४० - असम्प्रज्ञात - समाधि १३ ९, १७२, १७६ .... .... ४ - अदृष्टजन्मवेदनीय १८०, १८१, १८५, २६८, २६ ९ २ ९ २, २ ९ ३ २६५ | ४१ - अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात १७३, १७४, ५- अध्यात्मप्रसाद ... ६- अनवस्थितत्व १७६, १७७, १८५, २६१, २६४ २१८ .... ४२ - अस्मिता क्लेश ७- अनन्त समापत्ति २८२, २८५, २८८, .... ४४० .... .... २८६ | ४३ - अस्तेय ३६८, ३७०, ३७१, ३८३, ४१७ ८- अनात्म. २३ ९ | ४४ - अहिंसा ३६८, ३६ ९, ४१६, ४१७ ९- अनाहत चक्र .... १० अनियत विपाक. २ ९ ३ | ४५ - अहङ्कार ... १५१, १५३, १७५, १८४ .... ( आ ) ११- अनित्य २८६ .... १ - आकर्ण धनुषासन १५६, १५७, १५ ९, १६० ... ४२८ १२- अनुमान .... २६६ २- आकाशगमन ५४० १३- अनुमानप्रज्ञा .... ३- आँखके रोग ( ओषधियाँ ) .... ४७४, ४७५ २१६, २१७ १४- अन्तराय ४ - आगम १५६, १५७, १६० ५२० १५- अन्तर्धान ५- आदित्यलोक .... १८६, २७३ १६- अन्यता- ख्याति ५४७ ६ - आधे सिरका दर्द ( ओषधियाँ ) ४६४ १५० १७- अन्तःकरण चतुष्टय .... .... ५ ९ ४, ५ ९ ८ ७- आत्मा १७८, १७ ९ १८- अन्नमय कोश ८ - आनन्त्य - समापत्ति ४३ ९, ४४० ५२०, ५२१ .... १ ९- अपरान्त ज्ञान .... १७३, १७४, १७६, ९- आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात २०- अपवर्ग ३०६, ३०७, ३१३, ३१४ .... १८४, २५०, २६१, २६४ ३६८, ३७२, ३८४, ४१८ २१- अपरिग्रह ( ६१४ )

पृष्ठ 652

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परिशिष्ट ३ ] * शब्दानुक्रमणी * [ पातञ्जलयोगप्रदीप ******* पृष्ठ पृष्ठ १०- आनन्दमय कोश १३ ९, १४६, १४८ ३ - एकाग्रावस्था १७८, १७ ९ ११ - आनन्दभैरों रस ( ओषधि ) ४ - एकतत्त्वाभ्यास .... ४६२ २१ ९ ५- एकेन्द्रिय वैराग्य १२ - आभ्यन्तर वृत्ति ४४१, ४४३ २७२ ( ओ ) १३- आलस्य २१८ १ - ओ ३ म् १४- आशिष २०६, २१६ ५६३ .... ( क ) १५- आशय १ ९९ १- कपालभाति १६ - आँव - नाशक ( ओषधियाँ ) २२५, ३ ९ २ ४५ ९ २ - कफनाशक ( ओषधियाँ ) .... ४५८ १७ - आसन ४२०-४३८ .... ३ - कमरके अंदरके फोड़ेकी दवा १८- आक्षेपी ... ४५२, ४५४ .... ४७० ४- करुणा भावना २२२, २२४ १ ९- आज्ञा चक्र २४०, २४१ ५ - कर्णपीड़ासन २० - आर्य सत्य ४३१, ४३७ .. ३५१ ( इ ) ६ - कण्ठकूप ५२ ९ .... १ - इन्द्रियाँ १५१, १५२, १७४ ७- क्रम ५०७, ५५१ .... ८- क्रम - मुक्ति २- इडानाडी ... २३०, २३१ ५३ ९ ( 5 ) ९ - कर्म ( ई ) १ ९ ८, १ ९९, ५८ ९, ५ ९ ० १ - ईश्वरप्रणिधान १०- कवि प्राणायाम १ ९ ८, २१६, २७५, ३८५ .... ४४८ ११ - कर्माशय २ ९ २ ( e ) ( उ ) ५३४ १२ - काकी प्राणायाम १ - उत्क्रान्ति .... ४४८ .... १३ - कानका दर्द ( ओषधि ) २- उज्जाई प्राणायाम ४७६ .... ४४७ ३ - उड्डीयान बन्ध १४- कारण काम.... ३५४ .... ४२३ १५ - कारण शरीर ४२ ९, ४३६ | १७८, १७ ९, २१४, २१६ ४- उत्तानपादासन ५- उत्थित पद्मासन १६ - काल परिदृष्ट .... ४३५ ... ४४१ .... २२८, २३२, ५३४, ५३५ १७ - कायव्यूहज्ञान ६- उदान .... ५२ ९ ५३४, ५३५ | १८ - क्रियायोग ७- उदानजय .... २७५ ८ - उदार ( क्लेश ) २८४ | १ ९ - क्रियाफलाश्रय .... ४१७ .... ९ - उपसर्जन कर्माशय २ ९ ३ २० - कुक्कुटासन .... ४३५ .... १०- उपसंहार .... २७४, ४५६, ५५४, ५ ९ ८ २१- कुम्भक ४४४, ४५२ २२ - कूर्मासन ११- उपाय प्रत्यय १८ ९ .... ४३५ .... १२ - उपेक्षा भावना २२२, २२४ | २३ - कूर्म नाड़ी ५२ ९, ५३० ४३३, ४३७ | २४ - कृतार्थ १३- उष्ट्रासन ... ३३७ ( ऊ ) २५ - कृत्रिमनिद्रा ४०४, ४०६ .... १ - ऊर्ध्वपद्मासन .... ४३४ | २६ - कैवल्य ३४८, ५५३ २ - ऊर्ध्वसर्वाङ्गासन _४३०, ४३६ | २७ - कैवल्यपाद ... ५५५ ( FFE ) २८- कोणासन .... ४३६ १ ऋतम्भरा प्रज्ञा २६५ २ ९ - कोश १७८, १७ ९ ३० - कोष्ठबद्धनाशक ( ओषधियाँ ) .... ४५७ ( ए ) •.. • ४७८ | ३१ - क्लिष्ट १- एकतानता १५५, १६२ २ - एकपादाङ्गुष्ठासन ४३४ | ३२ - क्लेश १ ९ ८, १ ९९, २८२, २८३, २८८, ( ६१५ )

पृष्ठ 653

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पातञ्जलयोगप्रदीप ] * शब्दानुक्रमणी* [ परिशिष्ट ३ पृष्ठ पृष्ठ २ ९ ०, २ ९ २, ५८ ९, ५ ९ ० २ - तन्मात्राएँ १५१, १७४, १७५ ( ख ) ३ - तनु ( क्लेश ) २८३ .... १ - खाँसी - नाशक ( ओषधियाँ ) ४ - तनुकरण ४६० .... .... २८२ २- खुश्की ५ - तमोगुण ४६०, ४६१ १५०, २५३ " ३ - खेचरी मुद्रा .... ४२४ ६ - तप २७७, २७ ९, ३८५, ४१ ९ ४- ख्याति ७ - तड़ागी मुद्रा ५४७ ४२६ ( ग ) ८ - ताप दुःख २ ९९ १- गठिया - नाशक ( ओषधियाँ ) ९ - ताड़ासन .... ४७४ ४२६ २ - गरुडासन ४३५ १० - तालयुक्त प्राणायाम ४४६ .... ३- गर्भासन .... ४३१ ११- तारक ५५३ १२- तिल्लीकी ओषधि ४ - गुण १५०, ३०६, ३३८, ५ ९ ३, ५ ९ ७ ४७२ .... ५ - गुण - वृत्ति - विरोध ( दुःख ) १३ - तोलाङ्गुलासन २ ९ ८, २ ९९ ४३५ .... ६ - गुणपर्वणि ३१५, ३१७, ३२५ १४- त्राटक ३८७, ४००, ४०३ ७- गोरक्षासन १५ - त्रिवेणी ( युक्त ) ४३४ २४१ .... १६ - त्रिवेणी ( मुक्त ) ( च ) २३७ २३७, २४१ | १७ - त्रिबन्धासन १ - चक्र ( पद्म ) ४३५. .... २ - चक्र - भेदन ( द ) २४४, २४५ १ - दमा - नाशक ( ओषधियाँ ) ३ - चक्रासन ४३१ ४६०, ४६१ .... .... ४ - चन्द्रप्रभावटी ( नुस्खा ) २ - दन्तरोगनाशक ( ओषधियाँ ) ४६४ ४६८, ४६ ९ ५ - चन्द्रलोक ३- दर्शन - शक्ति १८३, ५३७ २८७ .... ६ - चन्द्रभेदी प्राणायाम ४४७ ४- द्रष्टा १५३, ३२ ९, ३३६, ५८० .... .... ७ - चतुर्थ प्राणायाम ४५२, ४५३ ३०१, ३०२, ३३६, ५८०, ५८५ ५ - द्रष्ट ६ - दस्त - नाशक ( ओषधियाँ ) ८- चितिशक्ति १५२, ५७ ९, ५ ९ ३ ४६१ ७ - दाद - नाशक ( ओषधियाँ ) ९ - चित्त १४६, १५०, १५२, ५६५, ५८७, ५ ९ ३ .... ४६ ९ .... ८- दिलकी धड़कन ( ओषधि ) १० - चित्त - वृत्ति १५२, १५३, १५५ .... ४७६ ९ - दिव्य श्रोत्र ११ - चित्तकी अवस्थाएँ १४७, १४८ ५४० .... १२- चित्तविक्षेप २१८ | १० - दुःख १५०, २१८, २८६, २८८, २ ९ ० ११ - दृश्य ३०१, ३३६, ५८०, ५८५ ( ज ) ३ ९ ४ | १२ - दृशिमात्र ३३०, ३३६ १ - जल- चिकित्सा .... २१४ | १३ - दृशेः ३४८ .... २- जाग्रत् - अवस्था वेदनीय २ ९ २, २ ९ ३ .... ४२८, ४३६ | १४ - दृष्टजन्म ३ - जानुशिरासन ५५६ | १५ - दृक्शक्ति १५४, २८७ ४- जात्यन्तर परिणाम .... १६ - देवयान १८६, ५३६, ५३ ९ ४२३ ५- जालन्धर - बन्ध २७५ | १७ - देशपरिदृष्ट ४४१-४४३ ६- जीवन्मुक्त .... ४५८, ४५ ९ १८ - दौर्मनस्य .... २१८ ७ - जुकाम - नाशक ( ओषधियाँ ) ... ४४० १ ९ - द्वन्द्व-( त ) २३२-२३८ | २० - द्विपाद मध्यशीर्षासन ४३६ .... १- तत्त्व ( ६१६ )

पृष्ठ 654

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परिशिष्ट ३ ] शब्दानुक्रमणी* * [ पातञ्जलयोगप्रदीप पृष्ठ पृष्ठ ११ - पागलपनकी ओषधि २१ - द्वेष ( क्लेश ) २८२, २८ ९ ४७६ १२- पादहस्तासन ४३६, ४३७ ( ध ) १३ - पादाङ्गुष्ठ - नासाग्रस्पर्शासन .... ४३३, ४३७ १ - धनुरासन ४२७ .... १४ - पारा बाँधना २ - धर्म ५०१-५०८ .... ४७७ १५- पार्वती - आसन ४८५ ३ - धर्म - परिणाम ४३४ .... .... - ४८६-५०८ | १६- पितृयाण ४ - धर्मी. ५३६, ५३ ९ १७- पिंगला नाड़ी २३०, २३१, २४१ ३५५-३५६, ४७८, ४७ ९ ५- धारणा ६ - धौति ( षट्कर्म ) ३८७-३८८ | १८- पुरुष १५३, ५५३ .... .... १ ९- पुरुष - विशेष १५१, १ ९ ८, २०० ३५५, ३५६, ४७८-४८० ७- ध्यान ८ - ध्यानहेया २० - पुरुष - ज्ञान २ ९ १ | ५३१ .... २१ - पुरुषार्थ ४७८ ५ ९ ३ ९- ध्यातृ .... .... १०- ध्येय २२- पूरक .... ४७८-४८० ४४४-४५१ २३ - पूर्ववत् अनुमान प्रमाण ( न ) १५ ९ ४३२, ४३७ | २४- पूर्व - जाति - ज्ञान १- नाभ्यासन ५१८ .... ४५२ | २५ - पेटके कीड़े ( ओषधि ) २ - नाड़ीशोधन - प्राणायाम ४७३ .... १५६, १६३ २६ - पेशाबमें शक्कर आना ( ओषधि ) ३ - निद्रा ४६६ .... ३५५, ३५६, ३८५, ४१४२७ - पौरुषेय ज्ञान ( बोध ) ४ - नियम .... १५६ ५ - नियतविपाक २ ९ ३ | २८ - प्रकृति १५०, १५१, ५५७, ५५८ .... २०२ | २ ९ - प्रकृतिलय ६- निरतिशय १८७, १८८, १ ९ २ .... ७- निरुद्ध - अवस्था १३ ९, १४८-१४९ ३० - प्रकृत्यापूर ५५६ .... ८ - निरोध १४६, १५३, २६७, २७१ | ३१ - प्रकाशावरण ५४१ .... ९ - निर्वितर्क ३२- प्रत्यक्ष वृत्ति १५७ .... २५७, २५ ९, २६३ .... १०- निर्विचार ( समापत्ति ) २५ ९, २६०, २६३, २६५ ३३ - प्रतिपक्षभावना ४१५, ४१६ ११- निर्बीज समाधि २६७-२६८ | ३४ - प्रत्यय ३२ ९, ४७८ १२- निर्माण चित्त ५५ ९ -५६० ३५ - प्रत्यय - अनुपश्य ३२ ९, ३३० ३६- प्रत्यय - अविशेष १३-३ ९ १ .... ५३१ १४ - नौली ( षट्कर्म ) ३५५, ३५६, ४५५, ४५६ ३ ९ १ ३७ - प्रत्याहार .... ३८- प्रच्छर्दन ( प ) २२३ .... ४२१, ४३४ १- पद्मासन ३ ९ प्रमा १५६-१५७ .... २- परमवश्यता ४५५ ४० प्रमाद २१८ .... ३- पञ्च - शील ३५७ | ४१- प्रमाण - वृत्ति ( प्रमाण ) १५६, १५८ .... .... ४- परचित्त - ज्ञान ५१ ९ ४२ - प्रसंख्यान २ ९ १, २ ९ २, ५८८ .... ५- परशरीरावेश ५३३, ५३४ | ४३- प्रसुप्त ( क्लेश ) २८४, २८५ .... .... ६ - पर - वैराग्य १७२, १७४ ४४ - प्रणव २०६, २० ९ .... ७- परिणाम १४ ९, १५७, ४८५, ५०१ ४५ - प्रतिप्रसवहेया २ ९ १, २ ९ २ .... ८- परिणाम दुःख २ ९९, ३०० ३०७, ३०८, ३१२, ५४७ .... ४६ - प्रधान ९ - पश्चिमोत्तानासन ४२८, ४३६ ४७ - प्रधान कर्माशय २ ९ ३ .... ४३०, ४३६ | ४८- प्रमेह नाशक ( ओषधि ) १०- पवनमुक्तासन ४६४, ४६५ ( ६१७ )

पृष्ठ 655

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पातञ्जलयोगप्रदीप ] * शब्दानुक्रमणी* [ परिशिष्ट ३ पृष्ठ पृष्ठ ४ ९ - प्रयत्न - शैथिल्य ४३ ९ | १०- भोग ३०६, ३१६ ५० - प्रश्वास २१ ९, ४४० ११- भ्रान्ति - दर्शन .... २१८ ५१ - प्रज्ञा १२- भ्रामरी प्राणायाम १ ९ ५, २६७ ४४४, ४४ ९ .... ५२- प्रज्ञालोक ४८० ( म ) ५३- प्रातिभ ५३० १- मधुभूमिका ... ५५० २२४, २२८, ५३४, ५३५ ५४ - प्राण २- मणिपूरकचक्र २३८ ५५ - प्राण ( सूक्ष्म ) २२८, २२ ९ .... ३- मत्स्यासन ४३५, ४३७ ५६ - प्राणायाम ३५५, ४४०, ४५४ ४- मत्स्येन्द्रासन ४३३ ५७ - प्राणमय कोश १७८, १७ ९ ५ - मन १५१, ५६७, ५६८ ५८- प्रान्त भूमि ६ - मनोजवित्व ३५२ ५४७ .... ४ ९ - प्लावनी प्राणायाम ४५० ७- मनोमय कोश .... १७८, १७ ९ ८ - मयूरासन ४३२, ४३६ ( ब ) १- बकासन ९ - मरोड़ ४३४ ४५ ९ .... २- बज्रोली मुद्रा ४२७ | १० - मस्तक - पादाङ्गुष्ठासन .... ४३१ ..... .... ४२२ ३- बज्रासन १५१, ५६७ ११- महत्तत्त्व ४- बदहजमीकी ओषधि ४६१ १२- महामुद्रा ४२५ ५- बद्ध पद्मासन ४२१ ४२४ १३- महाबन्ध .... ६- बंद पेशाब खोलना १४- महावेध ४७३ .... ४२४ .... ७ - बन्ध ४२३, ४२४ १५- महाव्रत ३७३ .... ८- बहुमूत्र- नाशक ( ओषधि ) १६ - महाविदेहा वृत्ति ४६६ .... ५४१ .... १७ - मार्जन क्रिया ४४१, ४४३ | ९ - बाह्य - वृत्ति .... ४०२ .... १०- बुखार नाशक ( ओषधियाँ ) ४६६ १८- माया ३०५, ३२१, ३२ ९ .... .... ११- बुद्धि २६५, ३०१, ३०२ ४२४-४२७ १ ९- मुद्रा .... २० - मुँहके छाले ( ओषधि ) ४२४ १२- बेध ४७६ .... .... १३ - बौद्धदर्शन .... ३५२, ३५७| २१ - मुदिता भावना २२२, २२४ २२ - मुक्ति ३६८, ३८४, ४१८| १४ - ब्रह्मचर्य २७३ .... २३- मूढ़ - अवस्था ४६५ १३ ९, १४८, १४ ९, १५२ १५- ब्राह्मी घृत २४- मूलबन्ध ४२३ ( भ ) .... .... २३७ २५- मूलाधार चक्र १ - भव प्रत्यय ( योगी ) १८७, १८८ .... २६ - मूर्च्छा प्राणायाम ४४४, ४५० ४४४, ४४८ २- भस्त्रिका प्राणायाम .... १७२, १७६२७ - मूर्धाज्योति ५३० .... ३- भावना .... २८ - मैत्री - भावना २२२-२२४, ५२१ ४३२, ४३६ ४ - भुजङ्गासन ४४८ | २ ९ - मृत्युजय रस ( ओषधि ) .... ४६७ ५- भुजङ्गी प्राणायाम .... ( य ) .... ५२२ ६- भुवनज्ञान ३५५, ३५६, ३६८, ३८४ १- यम ५२२, ५२७ ७- भुवः लोक ५४१ २- यतमान वैराग्य १७१ .... .... ८ - भूतजय ३ - योग १३ ९, १४६, १५२, १४ ९ ५२२, ५२७ – ९ - भूः लोक .... ( ६१८ )

पृष्ठ 656

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परिशिष्ट ३ ] [ पातञ्जलयोगप्रदीप शब्दानुक्रमणी* * पृष्ठ ******** पृष्ठ ४ - योगाङ्ग २५ - विषम परिणाम ३५४, ३५५ .... १५० ५- योगमुद्रा २६ - विक्षिप्त अवस्था ४२६ १३ ९, १४ ९ ६- योनिमुद्रा ४२६ | २७ - विक्षेप २१८, २१ ९ २८ - वीरासन ( र ) ४२१ २ ९- विज्ञानमय कोश १- रजोगुण १५१, २५३ १७८, १७ ९ .... .... ३० - वीत्राग - विषय - चित्त २- रक्तविकार ( फोड़े - फुंसी - आदि नाशक २५३ .... ओषधियाँ ) ३१ - वीर्य .... ४७ ९ १ ९ ५, ४२४ २८५, २८८, २ ९ ० | ३२ - वृत्ति ३ - राग ( क्लेश ) १४६, १५४, १६ ९ .... .... ४ - रुक - रुककर पेशाब आना ( ओषधियाँ ) ४७३ ३३- वृत्तिसारूप्य १५४ .... .... ४४१, ४५२ | ३४ - वृश्चिकासन ५ - रेचक ( प्राणायाम ) .... ४३३ ३५ - वैनाशिक ( क्षणिक विज्ञानवादी ) ( ल ) २२०, २२२ .... ३६ - वैराग्य १ - लिङ्ग १६७, १६८, १७०, १७१ .३१५, ३१६ .... ४३४ | ३७ - वैशारद्य २- लोलासन २६४ २२८, २२ ९, ५३५ ( व ) ३८ - व्यान .... १- वस्ति ( षटकर्म ) ३ ९ - व्याधि ३८७, ३ ९ १ २१७ .... १७१ ४० - व्यतिरेक संज्ञा वैराग्य २- वशीकार संज्ञा ( वैराग्य ) १७१ ३ - वातविकारनाशक ( ओषधियाँ ) ४५८, ४६३ | ४१- व्युत्थान ४८६, ४८७ .... .... ४- वातारि गूगल ( ओषधियाँ ) ४६३ ( श ) .... ५- वासना १ ९ ८, १ ९९, ५६२, ५६७, ५६८ १ - शब्दप्रमाण १५ ९ .... ६ - विकल्प - वृत्ति १५६, १६२, १६३, १६४ २- शवासन ४३१ .... ७- विकरणभाव ५४७ ३- शलभासन ४३२, ४३६ ८- विकृति ४ - शक्तिचालनी मुद्रा ३१७ .... ४२६ .... ९- विचारानुगत सम्प्रज्ञात ५ - शाम्भवी मुद्रा १७४, १७७, १८२ .... ४२६ .... १०- विच्छिन्न ( क्लेश ) ६. - शीतकारी प्राणायाम २८३ .... ४४८ ११ - वितर्क ७- शीतली प्राणायाम ४१४-४१५ .... ४४७ १२ - वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात ८- शीर्षासन १७४-१७७, १८१ ४२६, ४३६ १३ - विधारण २२५, २२६ ९- शीर्षपादासन ४२ ९, ४३७ .... १४ - विपरीतकरणी मुद्रा ४२६, ४३६ | १० - शेषवत् - अनुमानप्रमाण .... .... १५ ९ १५ - विदेह १८५, १८७, १ ९ ४ | ११ - शौच ... ३८५, ३८६ १६- विपाक १ ९ ८, २ ९ ३ १७०, १ ९ ५, १ ९ ६ १२- श्रद्धा १७- विपर्यय - वृत्ति १५६, १६०, १६१ १३- श्रुत- प्रज्ञा .... २६६ .... १८- विराम १८० १४- श्वास २१ ९, ४४०, ४४१ १ ९ - विवेकख्याति १८०, १८५, ३५२, ३५३, ३५४ .... २०- विवेकजज्ञान ( स ) ५५१-५५३ .... ३६८, ३७०, ३७६, ३८६, ४१७ १- सत्य .... २१ - विशुद्ध सत्त्वमय चित्त २०१, २०२, २७३, ५३ ९ १४ ९, १५०, २५३ २ - सत्त्वगुण २२- विशुद्ध चक्र २३ ९ ३- सत्त्वपुरुष- अन्यता- ख्याति .... .... ५४७ २३ - विशेष ४- सद्यो मुक्ति ३१८, ३१ ९ ५३ ९ २४ - विशोका ज्योतिष्मती प्रवृत्ति २५०, २५२ .... • ३ ९ ४ ५ - सन बाथ ( ६१ ९ )

पृष्ठ 657

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पातञ्जलयोगप्रदीप ] शब्दानुक्रमणी * [ परिशिष्ट ३ पृष्ठ पृष्ठ ६- संतोष ३८५, ३८६ | ४२ - सिट्स बाथ ३ ९ ४ .... ३ ९ ८, २ ७- संकल्प शक्ति ४०७, ४१३ | ४३ - सिद्धासन ४२१ ८- संग्रहणी ( ओषधि ) ४६२ ४४ - सिंहासन .... ४३४ ९ - संख्या परिदृष्ट ४४१, ४५२ ४५ - सुप्तवज्रासन .... ४३३ १० - सञ्जीवनीवटी ( नुस्खा ) .... ४६२ | ४६ - सुषुम्ना नाड़ी २३०, २३४, २३६ .... २६६-२६८ | ४७ - सुषुप्ति - अवस्था ११ - संस्कार १६४, २१६ १२ - संस्कारशेष १८०, १८१, २६८ | ४८ - सूचनाएँ .... ४०२ १३ - संस्कारदुःख २ ९ ८, २ ९९ | ४ ९ - सूर्यचिकित्सा ३ ९ ५ १४ - संशय २१८ | ५० - सूर्यप्रभा वटी .... ४६४ १५ - संयोग ३०१, ३०४, ३३७, ३४८५१ - सूर्यभेदी प्राणायाम ४४४, ४४७ ४८०-४८३ | ५२ - सूर्यभेदी व्यायाम १६ - संयम ४३७ .... १७ - सफेद कोढ़ - नाशक ओषधि ४७ ९ || ५३ - सूक्ष्म विषय २६०, २६१ ..... १८ - सबीज समाधि २६३ ५४ - सूक्ष्म शरीर .... २१०, २१२, २१३ १ ९ - समाधि १३ ९, १ ९ ७, २६३, २८१, ४२०, ४७८ ५५ - सोते समय पेशाब निकल जाना २० - समाधिस्थ २७१, २७२ ( ओषधि ) .... ४६६ २१ - सम्प्रज्ञात समाधि १३ ९, १४६, १४८, ५६ - स्टीम बाथ ३ ९ ४ .... १६६, १८०, २१४ | ५७ - स्तम्भ वृत्ति ४४१ .... ४२८, ४३७ २२ - सम्प्रसारण - भू - नमनासन .... .... २१८ ५८ - स्त्यान २२८, २२ ९, ५३५ २३- समान ( प्राण ) ५ ९ - स्थूल भूत १५१ .... २४ - समापत्ति २५५, २५७ | ६० - स्थूल शरीर २१०, २१२ .... ४२१ | ६१ - स्थितप्रज्ञ २५- समासन २७१, २७३ .... २६ - सम्मोहन - शक्ति ३ ९ ८, ३ ९९, ४०६ ६२- स्थिति १६८, २१ ९ २७ - संवेग १ ९ ७, १ ९ ८ ६३ - स्नायु - संचालनासन ४३० .... २८ - सर्वाङ्गासन ४३१, ४३७ ६४ - स्फोटवाद ५१०, ५१८ .... २०२ | ६५ - स्मृति २ ९ - सर्वज्ञ बीज १६४, १ ९ ५, २५५ २५६, २५७ .... ५४७-५४८ | ६६ - स्मृति वृत्ति ३० - सर्वज्ञातृत्वम् १६६ .... ३१ - सर्वभावाधिष्ठातृत्वम् ५४७ १६७, २१४ ६७ - स्वप्न अवस्था .... ३२ - सर्वभूतरुतज्ञान ५० ९ ६८ - स्वप्न - निद्रा - ज्ञानालम्बन २५३, २५४ .... २५०, २५१ | ६ ९ - स्वरसाधन २३१-२३२ ३३ - सविचार समापत्ति .... २५५, २५७ ७० - स्वः लोक ३४- सवितर्क समापत्ति ' ५२७, ५२८ .... .... २४०७१ - स्वबुद्धि - संवेदन ५७ ९ .... .... ३५ सहस्रार चक्र ४५१७२ - स्वाधिष्ठान चक्र २३७ ३६ - सहित कुम्भक .... .... २७५ ७३ - स्वरूपावस्थिति १५३, २६७, २७० ३७ - साधन पाद २३७ ७४ - स्वरूप - उपलब्धि ३३८, ३४२ .... ३८ - साधारण .... ४४५, ४४६ ७५ - स्वरूपस्थिति २६७, २७० ३ ९ - साधारणसहित कुम्भक ३३८ ७६ - स्वशक्ति .... ...... १५०, १५१, १५३ ४० - साम्य परिणाम ३३८ १५ ९ ७७ - स्वामीशक्ति ४१ - सामान्यतोदृष्ट ( ६२० )

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परिशिष्ट ३ ] शब्दानुक्रमणी ** * [ पातञ्जलयोगप्रदीप ७८- स्वाध्याय ७ ९ - स्वस्तिकासन १ - हस्तपादाङ्गुष्ठासन २- हान ३ - हानोपाय ४ - हिप बाथ ५ - हिंसा ६- हिरण्यगर्भ ७ - हेय पृष्ठ २७५, ३८५, ४२० .... ४२१ ( ह ) ४३६ FB .... ३४८ .... ३४ ९ ३ ९ ४ ४१५, ४१६ .... .... १४०, १४१, २१२, २१६ ३०० ८- हेयहेतु M ९- हैजा ( ओषधि ) १०- हृदयस्तम्भासन १- क्षणक्रम २ - क्षिप्तावस्था ३- क्षेत्र १ - ज्ञानदीप्ति ( क्ष ) .... ( ज्ञ ) पृष्ठ ३०२ ४६३ ४२ ९, ४३७ ५५१ १३ ९, १४८, १४ ९ २८३ ... ३५४ ( ६२१ ) जागर कोड-

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पातञ्जलयोगप्रदीप ] विषयसूची * * [ परिशिष्ट ४ ******************* विषयसूची विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ षड्दर्शनसमन्वय स्वरूप, शबल स्वरूपके ३ भेद - विराट्, हिरण्य-( १ ) पहिला प्रकरण-गर्भ और ईश्वर १३ १- वेद - मूल मन्त्रोंकी ४ संहिताएँ । ब्राह्मण १४- व्यष्टि और समष्टिरूपसे ब्रह्मकी उपासना । ग्रन्थ । उपनिषद् । दर्शन – प्राणिमात्रकी अन्यादेश, अहंकारदेश, आत्मादेश । दुःखनिवृत्तिकी ओर प्रवृत्ति १ उपलक्षणसे ब्रह्मका वर्णन १४ .... २ - दर्शनोंके ४ प्रतिपाद्य विषय – हेय, हेयहेतु, १५ - चेतन तत्त्वका शुद्ध स्वरूप १५ हान, हान- उपाय । तीन मुख्य तत्त्व ( १ ) १६ - ब्रह्मसूत्रोंमें योगसाधनकी शिक्षा १८ .... चेतनतत्त्व पुरुष ( जीव ), ( २ ) जडतत्त्व १७- दोनों मीमांसाओंके ग्रन्थकार आचार्योंका समय प्रकृति, ( ३ ) चेतनतत्त्व पुरुषविशेष और उनसे पूर्व आचार्योंकि नाम २० ( ईश्वर ) २ १८- वेदान्तर आचार्यों क नवीन भाष्यकार ३- षड्दर्शन - वेदोंके छः अङ्ग और छः सम्प्रदाय २१ उपाङ्ग १ ९- ब्रह्मसूत्रपर भाष्यकार श्रीस्वामी शंकराचार्यका ३ अद्वैतसिद्धान्त ( २ ) दूसरा प्रकरण-२१ १ - पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा । कर्मकाण्ड, २०- सांख्ययोगका द्वैतसिद्धान्त २३ उपासनाकाण्ड, ज्ञानकाण्ड मीमांसाके अर्थ.. ४ २१ - शंकरके निर्विशेष अद्वैतसिद्धान्त और सांख्य-योगके द्वैत - सिद्धान्तमें तुलना २- पूर्वमीमांसायज्ञ, महायज्ञ । वेदके ५ प्रकारके २५ .... विषय ५ २२ - ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीरामानुजाचार्यका ३ - स्वर्गकामो यजेत । श्रीमद्भगवद्गीतामें यज्ञका विशिष्टाद्वैत - सिद्धान्त २७ २३- ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीमध्वाचार्यका द्वैत-वर्णन ५ सिद्धान्त ४ - ‘ मीमांसामें तीसरे चेतन तत्त्व ईश्वरको ही व्यष्टि-२७ दयानन्द सरस्वतीका द्वैत-रूपसे प्रत्येक यज्ञका अधिष्ठातृदेव मानकर २४- श्रीस्वामी सिद्धान्त २८ विशेष यज्ञोंमें उपासना ' इसमें प्रमाण ७ २५ - ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीवल्लभाचार्यका शुद्धा-८ ५- हान- उपाय, हान ६- जैमिनि मुनि, औडुलोमि आचार्य तथा द्वैत - सिद्धान्त । ब्रह्मसूत्रके भाष्यकार श्रीनिम्बार्का - ` चार्यका द्वैताद्वैत - सिद्धान्त । ब्रह्मसूत्रोंमें अन्य व्यासजीका मुक्तिविषयक मत । जैमिनि ईश्वरवादी वैदिक दर्शनोंका खण्डन नहीं है.... २ ९ थे— इसमें प्रमाण ८ २६ - ' जन्माद्यस्य यतः ' के तीन प्रकारसे अर्थ - जड ७- पूर्वमीमांसामें पशु - मांस - बलिका निषेध ९ अद्वैतवाद, चेतन अद्वैतवाद और चेतन जड ८- उत्तरमीमांसा - उत्तरमीमांसाके चारों अध्यायोंका अर्थात् आत्म - अनात्म - द्वैतवाद ३० संक्षिप्त वर्णन ९ २७- “ ईक्षतेर्नाशब्दम् ” ( ब्रह्म सू ० अ ० १ । १ । ५ ) ९ - अधिकरण, अधिकरणोंके विषय । हेय, हेयहेतु, का स्पष्टीकरण .... ३४ हान, हानोपाय १० २८- “ आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपक-१० - द्वैताद्वैत सिद्धान्तके भेद । परिणामवाद और विन्यस्तगृहीतेर्दर्शयति च ” ( ब्र ॰ सू ० १।४।१ ) .... ११ विवर्त्तवाद और " सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् " ( ब्र ० सू ० ११ - द्वैताद्वैत सिद्धान्तके भेदमें अविरोध १२ १।४।२ ) की व्याख्या.... ३ ९ १२ १२- हान, हानोपाथ २ ९- “ तदधीनत्वादर्थवत् " ( ब्र ० सू ० १।४ । ३ ) । १३ - वेदान्तकी चतुःसूत्री । ब्रह्मका शुद्ध और शबल ( ६२२ )

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परिशिष्ट ४ ] विषयसूची * * [ षड्दर्शनसमन्वय विषय विषय पृष्ठ पृष्ठ " वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ' ( ब्र सू ० साथ समन्वय ५२ .... पुरुषद्वारा १।४।५ ) । - " त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः य - वैशेषिकपर ५- अविवेकी न्याय-बुद्धिसे अलग आत्माको एक जड़ द्रव्य माननेके १।४।६ ) की प्रश्नश्च " ( ब्र ० सू ० आक्षेपका निवारण व्याख्या .... ४० ५२ .... ६ - कर्म - कर्मके पाँच भेद ३०- " महद्वच्च " ( ब्र ० सू ० १ । ४ । ७ ) । “ चमसव-५३ .... ७ - सामान्य, सामान्यके भेद, व्याख्या और दविशेषात् ” ( ब्र ० सू ० १ । ४ । ८ ) । ‘ ज्योतिरुप-लक्षणसहित, विशेषका विस्तृत व्याख्यासहित क्रमा तु तथा ह्यधीयत एके " ( ब्र ० सू ० १।४।९ ) “ कल्पनोपदेशाच्च, मध्वादिव-लक्षण .... ५३ ८ - समवायका व्याख्यासहित लक्षण । अभाव दविरोधः " ( ब्र ० सू ० १।४ । १० ).... ४१ पदार्थ — प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव ३१- " न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च " ( ब्र ० सू ० १। ४ । ११ ) । " प्राणादयो वाक्य-और अन्योन्याभाव ५४ ९- न्याय - दर्शन । न्यायका स्वरूप – न्यायके चार शेषात् ” ( ब्र ॰ सू ० १।४ । १२ ).... ४२ ३२ - ‘ “ ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ” ( ब्र ० सू ० १ । ४ । १३ ) । प्रमाण - प्रत्यक्ष - प्रमाण, अनुमान प्रमाण, उपमान- प्रमाण और आगम प्रमाण । इनका " रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् " ( ब्र ० सू ० विस्तृत वर्णन । न्यायके सोलह पदार्थ जिनके २ । २ । १ ) । " प्रवृत्तेश्च ” सू ० ( ब्र ० द्वारा तत्त्व - ज्ञानसे निःश्रेयस् होता है । प्रत्येकका २।२।२ ) । “ पयोऽम्बुवच्चेत्तत्रापि ” ( ब्र ॰ सू ॰ विस्तृत स्वरूप ( लक्षण ).... ५५ २ । २ । ३ ).... ४२ ३३- “ व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात् " ( ब्र ० सू ० १० - अनुमान - प्रमाण — उसके तीन भेद - पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्टं ५६ २।२।४ ) । ‘ अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ” ११ - न्यायके सोलह पदार्थ, जिनके न्यायद्वारा ( ब्र ० सू ० २।२।५ ) । " अभ्युपगमेऽप्यर्था-तत्त्वज्ञानसे निःश्रेयस् होता है । प्रत्येकका भावात् ” ( ब्र ॰ सू ० २ । २ । ६ ) । “ पुरुषाश्मव-दिति चेत्तथापि ” ( ब्र ० सू ० २।२।७ ) । विस्तृत स्वरूप ( लक्षण ).... ५७ “ अङ्गित्वानुपपतेश्च ” ( ब्र ० सू ० २।२ । ८ ) १२ - वैशेषिकके नौ द्रव्यों और न्यायके सोलह “ अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ” ( ब्र ॰ सू ० पदार्थोंमेंसे बारह प्रमेयमें समानता । बारह २ । २ । ९ ) । ‘ “ विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ” प्रमेयोंका लक्षण ६० १३ - इन दोनों दर्शनोंके अनुसार नित्य और अनित्य ( ब्र ॰ सू ० २ । २ । १० ).... ४३ ३४ - ‘ “ स्मृत्यनवकाशदोषप्रसंग इति चेन्नान्यस्मृत्यनव-पदार्थ । इन दोनों दर्शनोंका आस्तिक सिद्ध होना काशदोषप्रसंगात् ” ( ब्र ० सू ० २। १ । १ ) ४५ और परमात्मतत्त्वको अलग न वर्णन करनेका ३५ - ‘ “ इतरेषाञ्चानुपलब्धेः " ( ब्र ० सू ० २ ।१ । २ ) । ६१ कारण “ एतेन योगः प्रत्युक्तः ” १४- मुक्तिके स्वरूपका वर्णन ६२ सू ( ब्र ० २ । १ । ३ ) १५ - मुक्ति और कैवल्यका स्वरूप । कार्य - कारण— ४६ ( ३ ) तीसरा प्रकरण-तीन प्रकारके कारण ६३ १- न्यायवैशेषिक दर्शन । वैशेषिक दर्शन । वैशेषिक-१६ - न्यायवैशेषिकका सिद्धान्त । उसकी सांख्य और का अर्थ, वैशेषिक सूत्रोंकी संख्या योगके सिद्धान्तमें समानता । विभु - अणु और .... ४७ २ - वैशेषिकके नौ उनके सुबोध लक्षण तथा द्रव्य, मध्यम परिमाण । इन दोनों दर्शनोंका आस्तिक अवान्तरभेद .... ४८ सिद्ध होना तथा ईश्वरके वर्णन न करनेके कारण । ३ - वैशेषिकके चौबीस गुण ईश्वर - सिद्धि ६३ ५० ४- बुद्धिसम्बन्धी न्याय - वैशेषिकका सांख्य - योगके १७ - आत्माको जडतत्त्वसे भिन्न दिखलानेवाले चिह्न । ( ६२३ )