पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 81–90
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 81–90
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तीसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ न्याय दर्शन उसकी चिन्ता संशयसे लेकर निर्णयतक जिस कारण की गयी है वही निर्णयके लिये काममें लाया जाय तो दोनों पक्षोंकी समतासे प्रकरणसे आगे नहीं बढ़ता, इसलिये प्रकरणसम हुआ । जैसे किसीने कहा कि ‘ शब्द ' अनित्य है, तो नित्य धर्मका ज्ञान न होनेसे यह हेतु प्रकरणसम है । इससे दो पक्षोंमें किसी एक पक्षका निर्णय नहीं हो सकता, क्योंकि यदि शब्दमें नित्यत्वधर्मका ग्रहण होता तो प्रकरण ही नहीं बनता, अथवा अनित्यत्व धर्मका ज्ञान शब्दमें होता तो भी प्रकरण सिद्ध न होता । अर्थात् यदि दो धर्मोमेंसे एकका भी ज्ञान होता तो ' शब्द अनित्य है कि नित्य ' - -यह विचार ही क्यों प्रवृत्त होता । ( घ ) साध्यसम हेत्वाभास - स्वयं साधनीय होनेके कारण जो साध्यसे कोई विशेषता नहीं रखता वह साध्यसम है । जैसे ‘ छाया द्रव्य है ' यह साध्य है, ' गतिवाला ' होनेसे यह हेतु है, क्योंकि छायाका गतिमान् होना स्वयं साध्यकोटिमें है, इसलिये यह हेतु साध्यसे विशेष नहीं, इसलिये ' साध्य ' के ' सम ' हुआ; क्योंकि छायामें जैसे द्रव्यत्व साध्य है वैसे ही गति भी साध्य है ( ङ ) कालातीत हेत्वाभास - जिस अर्थका वर्णन समय चूककर किया गया हो उसे कालातीत कहते हैं । हेतुका काल वह है जब अर्थ संदिग्ध हो; किंतु जब अर्थ किसी प्रबल प्रमाणसे निश्चित हो, तो वहाँ हेतु उसे उलटकर कुछ सिद्ध नहीं कर सकता । जैसे कोई कहे कि ' अग्नि उष्ण नहीं है, क्योंकि द्रव्य है ' तो यह हेतु कालातीत है; क्योंकि जब अग्निका उष्ण होना प्रत्यक्षसे निश्चित है तो यहाँ उष्ण न होना सिद्ध करनेके लिये हेतुका काल ही नहीं; क्योंकि अग्निका उष्ण न होना प्रत्यक्षसे बाधित है । अतएव नवीन नैयायिक कालातीतको बाधित भी कहते हैं । १४- छल- -अर्थको बदल देनेसे वादीके वचनका विघात करना छल है । अर्थात् वादीके कहनेका जो अभिप्राय है उससे विरुद्ध अभिप्राय लेकर उसपर आक्षेप करना छल है । यह छल तीन प्रकारका है-( क ) वाक्छल — साधारणरूपसे कहे हुए अर्थमें वक्ताके अभिप्रायसे विरुद्ध अन्य अर्थकी कल्पनाको वाक्छल कहते हैं । जैसे किसीने कहा कि ' यह बालक नवकम्बलवान् है ' कहनेवालेका यहाँ आशय यह है कि ‘ इस बालकका कम्बल नया है '; पर छलवादी वक्ताके अभिप्रायसे विरुद्ध कहता है कि ‘ इस लड़केके पास तो केवल एक कम्बल है नौ कहाँ है ' -नव शब्दके नवीन और नौ — ये दो अर्थ हैं । इस छलवादीकी रोक यह है कि नवकम्बल शब्द जो दो विशेष अर्थोंका एक सामान्य शब्द है, उसमें जो तुमने एक अर्थकी कल्पना कर ली है, इसका क्या हेतु है; क्योंकि बिना निश्चय किये अर्थ - विशेषका निश्चय नहीं हो सकता है कि यह अर्थ इसको अभिप्रेत है और वह विशेष तुम्हारे अर्थमें नहीं है, इसलिये यह तुम्हारा दूषण नहीं सिद्ध होता । ( ख ) सामान्य छल- - जो बात बन सकती है उसके स्थानमें अति समानताको लेकर एक बनती बातकी कल्पना सामान्य छल है । जैसे किसीने कहा ' यह ब्रह्मचारी विद्याविनयसम्पन्न है ', इस वचनका खण्डन अर्थ - विकल्पसे ग्रहण तथा असम्भव अर्थकी कल्पनासे करना कि जैसे ब्रह्मचारीमें विद्याविनय - सम्पत्ति सम्भव है वैसा व्रात्य ( यज्ञोपवीतके संस्कारसे हीन ) में भी है तो व्रात्य भी ब्रह्मचारी है; क्योंकि वह भी विद्याविनयसम्पन्न है । इसका खण्डन यह है कि यह वाक्य प्रशंसार्थक है, इसलिये इससे असम्भव अर्थकी कल्पना नहीं हो सकती; ब्रह्मचारी सम्पत्तिका विषय है, इसका हेतु नहीं है । ( ५ ९ )
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तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ न्याय - दर्शन ( ग ) उपचार छल- -धर्मके अमुख्य प्रयोगमें मुख्य अर्थसे प्रतिषेध उपचार छल है । यहाँ ' धर्म ' से अभिप्राय ‘ वृत्ति’का है । शब्दकी वृत्ति दो प्रकारकी है- -मुख्य और अमुख्य । मुख्य अर्थमें मुख्य वृत्ति होती है; जैसे ‘ गङ्गायां स्नाति ' – यहाँ गङ्गा शब्द मुख्य वृत्तिसे प्रवाहका बोधक है । मुख्य वृत्तिको ‘ शक्ति ’ कहते हैं । और ‘ गङ्गायां घोष: ' यहाँ गङ्गा शब्द अमुख्य वृत्तिसे गङ्गातीरका बोधक है । अमुख्य वृत्तिको ‘ लक्षण ' कहते हैं । जब लक्षण वृत्तिसे प्रयोग किया गया हो और मुख्य वृत्तिको लेकर कोई निषेध करे, जैसे कहा है गङ्गामें घोष, घोष तो उसके किनारेपर है तो यह उपचार छल है । अथवा जैसे किसीने कहा ‘ मचान चिल्ला रहे हैं । ' इसका दूसरा खण्डन करता है कि मचानोंपर बैठे हुए पुरुष चिल्ला रहे हैं न कि मचान । मचान शब्दके मुख्य अर्थ लकड़ियोंसे बनी ऊँची बैठकके हैं, जो किसान खेतीकी रखवालीके लिये बना लेते हैं और उसमें शब्दकारिता असम्भव है; इसलिये अमुख्य वृत्ति ( लक्षणा ) से मञ्चपर बैठे पुरुष बोलते हैं यह वक्ताका अभिप्राय है । वादी इसके अभिप्रायको न लेकर शंका करता है कि मञ्चपर बैठे पुरुष बोलते हैं न कि मञ्च । यह उपचार छल है । इसका खण्डन यह है कि यहाँ मचान शब्द मुख्य नहीं, गौण है, मञ्चस्थ पुरुषोंके अर्थमें ही प्रयुक्त हुआ है! प्रधान और गौण शब्दका प्रयोग वक्ताकी इच्छापर होता है और अर्थ उसीके अभिप्रायसे लिया जाता है । १५ – जाति — साधर्म्य और वैधर्म्यसे प्रतिषेध ( खण्डन ) करनेको जाति कहते हैं । असत् उत्तर जाति है, जब कोई सच्चा उत्तर न सूझे तो साधर्म्य - वैधर्म्यको लेकर ही जो समय टाला जाता है वह जात्युत्तर होता है । जातिके चौबीस भेद हैं जो स्थानाभावसे यहाँ नहीं दिये जाते हैं । १६ – निग्रहस्थान ( हारकी जगह ) - विप्रतिपत्ति अर्थात् उलटा समझना या अप्रतिपत्ति अर्थात् प्रकरणके अज्ञानको निग्रहस्थान कहते हैं, अर्थात् विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्ति करनेसे पराजय होती है । प्रतिपत्तिका अर्थ प्रवृत्ति है; विपरीत अथवा निन्दित प्रवृत्तिको विप्रतिपत्ति कहते हैं और दूसरेसे सिद्ध किये पक्षका खण्डन न करना अथवा अपने पक्षपर दिये हुए दोषका समाधान न करना अप्रतिपत्ति है । निग्रहस्थान बाईस प्रकारका है । स्थानाभावसे उन भेदोंका यहाँ वर्णन नहीं किया जासकता । निग्रहस्थानका साधारण लक्षण उत्तरका स्फुरण या उलटा स्फुरण समझ लेना चाहिये । वैशेषिकदर्शनके नौ द्रव्योंके सदृश न्यायदर्शनके इन सोलह पदार्थोंमेंसे वास्तवमें ही हैं, जो प्रमाणद्वारा जानने योग्य हैं । अन्य सब पदार्थ प्रमेयका प्रमाणद्वारा ज्ञान करानेमें मुख्य सहायक बारह प्रमेय हैं । प्रमेय १ आत्मां — जिसके पहचानके लिये इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, ज्ञान और भोगता है । प्रयत्न लिङ्ग हैं । यही २ शरीर – जो चेष्टा, इन्द्रियों और अर्थोंका आश्रय और भोगका स्थानहै ३ इन्द्रियाँ — घ्राण, रसना, चक्षु, त्वचा, श्रोत्र – जिनके उपादान कारण क्रमसे वायु और आकाश हैं । ये भोगके साधन ( करण ) हैं । पृथ्वी, जल, अग्नि, ४ अर्थ – गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द- -जो पाँचों इन्द्रियोंके यथाक्रम भोगनेयोग्य विषय और -पाँचों भूतोंके यथायोग्य गुण हैं । ( ६० )
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तीसरा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय * [ न्याय - दर्शन ५ बुद्धि, ज्ञान, उपलब्धि — ये तीनों पर्याय शब्द हैं । अर्थोंका भोगना अर्थात् अनुभव करना बुद्धि है है । ६ मन- - जिसका लिङ्ग एकसे अधिक ज्ञानेन्द्रियोंसे एक समयमें ज्ञान न होना है, जो सारी इन्द्रियोंका सहायक और सुख - दुःखादिका अनुभव करानेवाला है । ७ प्रवृत्ति — मन, वाणी और शरीरसे कार्यका आरम्भ होना प्रवृत्ति है । ८ दोष – प्रवृत्त करना जिनका लक्षण है वे राग, द्वेष और मोह तीन दोष हैं । ९ प्रेतभाव — पुनर्जन्म अर्थात् सूक्ष्म शरीरका एक स्थूल शरीर छोड़कर दूसरा धारण करना प्रेत-भाव है । १० फल- -प्रवृत्ति और दोषसे जो अर्थ उत्पन्न हो उसे फल कहते हैं । फल दो प्रकारका होता है, मुख्य और गौण । मुख्य फल सुख - दुःखका अनुभव है और सुख - दुःखके साधन शरीर, इन्द्रियाँ, विषय आदि गौण फल हैं । यहाँ दोनों फलोंके ग्रहण करनेके लिये अर्थ कहा है । राग, द्वेष और मोह जो दोष हैं, उनमेंसेमोह राग- -द्वेषका कारण है और प्रवृत्ति फलकी उत्पादक है । ११ दुःख – जिसका लक्षण पीड़ा है । सुख भी दुःखके अन्तर्गत है; क्योंकि सुख बिना दुःखके नहीं रह सकता । १२ अपवर्ग – दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति अर्थात् ब्रह्मप्राप्ति अपवर्ग है । इन दोनों दर्शनोंके अनुसार आत्मा, आकाश, काल, दिशा, मन और ( वायु, अग्नि, जल और पृथिवीके ) परमाणु नित्य हैं; और शरीर, इन्द्रियाँ, चारों स्थूलभूत अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और इनसे बनी हुई सारी सृष्टि अनित्य है । नित्य द्रव्य निरवयव होना चाहिये । आत्मा, आकाश, काल और दिशा विभु अर्थात् व्यापक होनेके कारण और मन तथा चारों भूतोंके परमाणु जो अणु हैं, अति सूक्ष्म होनेके कारण निरवयव होनेसे नित्य हैं । इस अंशमें विभु और अणु द्रव्य समान हैं किंतु अणु परिच्छिन्न, एकदेशीय होनेसे सक्रिय होते हैं और विभु व्यापक होनेसे निष्क्रिय । इस अंशमें अणु और विभु एक - दूसरेसे विरोधी धर्मवाले हैं । पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, शरीर, इन्द्रियाँ तथा भूमण्डल आदि समस्त मूर्तिमान् पदार्थ अवयववाले, सक्रिय और अनित्य हैं । इन दोनों दर्शनोंने सांख्यके सदृश परमात्मतत्त्वको आत्मतत्त्वमें सम्मिलित कर दिया है अर्थात् उसका अलग वर्णन नहीं किया है । इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि इन्होंने उसके अस्तित्वको अस्वीकार किया है । ईश्वरीय ज्ञान वेदको दोनों दर्शनोंने आगम ( शब्द ) प्रमाण माना है । इस प्रकार परमात्मतत्त्वका अलग वर्णन न करनेका कारण यह है कि इन दोनों दर्शनोंने वेदान्तके समान ‘ हेयहेतु ’ अर्थात् दुःखका कारण अविद्या, मिथ्या - ज्ञान या अविवेक माना है । ' हान ' अर्थात् दुःखका अत्यन्त अभाव स्वरूप - अवस्थिति, अपवर्ग, निःश्रेय या ब्रह्म - प्राप्ति बतलाया है, किंतु ' हानोपाय ' अर्थात् दुःख - निवृत्तिका साधन जहाँ वेदान्तने ब्रह्मज्ञान बतलाया है वहाँ इन दोनों दर्शनोंने जड और चेतनतत्त्वका विवेक अर्थात् तत्त्वज्ञान माना है 1 दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावादपवर्गः । ( न्याय १ । १ । २ ) सोलह पदार्थोंके तत्त्वज्ञानसे मिथ्या - ज्ञान अर्थात् अविद्याका नाश होता है । मिथ्या - ज्ञानके नाशसे ( ६१ )
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तीसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ न्याय दर्शन दोषों ( राग, द्वेष, मोह ) का नाश होता है । दोषोंके नाशसे प्रवृत्तिका नाश होता है । प्रवृत्तिके नाशसे जन्मका न मिलना और जन्मके न मिलनेसे सब दुःखोंका अभाव होता है । सब दुःखोंका अभाव ही अपवर्ग है । आत्मेन्द्रियमनोऽर्थसन्निकर्षात् सुखदुःखे । ( वैशेषिक ५। २।१५ ) आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थके सम्बन्धसे सुख - दुःख होते हैं । * तदनारम्भ आत्मस्थे मनसि शरीरस्य दुःखाभावः स योगः । ( वैशे ० ५। २ । १६ ) मनका आत्मामें स्थित होनेपर उसका ( मनके कार्यका ) जो अनारम्भ ( कार्यका बंद कर देना ) है, वह योग है, जो शरीरके दुःखके अभावका हेतु है । अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगाः कार्यान्तरसंयोगाश्चेत्यदृष्टकारितानि । ( वैशे ० ५।२।१७ ) ( यह जो मरनेके समय मनका पूर्वदेहसे ) निकलना और ( दूसरे देहमें ) प्रवेश करना है तथा ( जन्मसे ही ) जो खाने - पीनेकी वस्तुओंके संयोग हैं तथा दूसरे शरीरका जो संयोग है, ये ( सब मनुष्यके ) अदृष्टसे कराये जाते हैं । यहाँ अदृष्ट ( धर्म - अधर्म ) मीमांसकोंके अपूर्व और सांख्ययोगके कर्माशयके अर्थमें प्रयोग हुआ है । तदभावे संयोगाभावोऽप्रादुर्भावश्च मोक्षः । ( वैशे ० ५।२ । १८ ) ( तत्त्वज्ञानसे ) उस ( अदृष्ट ) का अभाव हो जानेपर ( पूर्व शरीरसे ) संयोगका अभाव और नयेका प्रकट न होना मोक्ष है । न्यायमञ्जरीमें मुक्तिके स्वरूपका इस प्रकारका वर्णन किया गया है-स्वरूपैकप्रतिष्ठानः परित्यक्तोऽखिलैर्गुणैः । ऊर्मिषट्कातिगं रूपं तदस्याहुर्मनीषिणः ॥ संसारबन्धनाधीनं दुःखक्लेशाद्यदूषितम् । मुक्त दशामें आत्मा अपने विशुद्ध ( ज्ञान ) स्वरूपमें प्रतिष्ठित और अखिल गुणोंसे विरहित रहता है । ऊर्मिका अर्थ क्लेशविशेष है । भूख - प्यास प्राणके, लोभ - मोह चित्तके, शीत और तप शरीरके क्लेशदायक होनेसे ऊर्मि कहे जाते हैं । मुक्त आत्मा इन छः ऊर्मियोंके प्रभावको पार कर लेता है और दुःख - क्लेशादि सांसारिक बन्धनोंसे विमुक्त होता है । मुक्त अवस्थामें बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, ज्ञान प्रयत्न, धर्म, अधर्म तथा संस्कारका मूलोच्छेद हो जाता है । आत्माके इस शुद्ध स्वरूपको वेदान्तमें, बतलाया गया है।‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० २ । १ । १ ) परब्रह्म सत्य ज्ञानस्वरूप और अनन्त है । यही सांख्य और योगका कैवल्य है और वेदान्तकी शुद्ध, निर्गुण, निर्विशेष ब्रह्मके स्वरूपमेंअवस्थिति है । सुख, दुःख, ज्ञान, प्रयत्न, धर्म, अधर्म आदि सांख्यमें बुद्धिके धर्म बतलाये गये हैं । किंतु न्याय * ऐसा ही उपनिषदोंमें बतलाया गया है-आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः । ( कठोप ० ) इन्द्रिय और मनसे युक्त आत्माको बुद्धिमान् भोक्ता कहते हैं । ( ६२ )
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तीसरा प्रकरण ] • षड्दर्शनसमन्वय * * * [ न्याय और वैशेषिकका सिद्धान्त ( सूत्र १। १० ) और वैशेषिक ( सूत्र ३ । २८ ) में बुद्धिको आत्मामें सम्मिलित करके आत्माके शबल स्वरूपको जड पदार्थोंसे भिन्न पहचान करनेके लिये उसके लिङ्ग ( चिह्न ) के रूपमें वर्णन किये गये हैं । यह भ्रममूलक शंका नहीं होनी चाहिये कि मुक्त अवस्थामें ज्ञानके न रहनेसे आत्मा एक जड पदार्थ रह जायगा; क्योंकि बुद्धिका धर्मरूप ज्ञान तो त्रिगुणात्मक जड प्रकृतिके तीनों गुणोंमें सत्त्वगुणका सात्त्विक प्रकाशरूप है; और आत्माका ज्ञान उससे अति विलक्षण चेतनरूप है; क्योंकि आत्मा स्वयं चैतन्यस्वरूप है । उससे प्रकाशित होनेके कारण बुद्धिमें चेतनताकी प्रतीति होती है । मुक्त अवस्थामें दुःख - सुख दोनोंका अभाव होता है, क्योंकि वास्तवमें तो दुःख - निवृत्तिका ही नाम सुख है । सुखके साथ राग लगा रहता है और वह बन्धनका कारण है । तथा— ' परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ' ( यो ॰ सा ॰ पा ॰ १५ ) क्योंकि ( विषयसुखके भोगकालमें भी ) परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कारदुःख बना रहता है और गुणोंके स्वभावमें भी विरोध है, इसलिये विवेकी पुरुषके लिये सब कुछ ( सुख भी जो विषयजन्य है ) दुःख ही है । त्रिगुणात्मक प्रकृतिके रजसमें दुःख है और सत्त्वमें सुख है । इसलिये सुखके बने रहनेमें गुणातीत अवस्था नहीं रह सकती । सुख विषय और विषयभोक्ता दोनोंकी अपेक्षा रखता है । इस कारण मुक्त अवस्थामें सुखके माननेसे निर्विशेष, निर्गुण, शुद्ध अद्वैतकी सिद्धि न हो सकेगी । उपनिषदोंमें जहाँ ब्रह्मके साथ आनन्दका शब्द आया है वह ज्ञानके अर्थमें है । अथवा वे श्रुतियाँ शबल ब्रह्म अर्थात् अपर ब्रह्मकी सूचक हैं । और वह मुक्तिकी अवस्था शबल ब्रह्मकी प्राप्ति है जो पुनरावर्तिनी है और ब्रह्मलोकतक सूक्ष्म लोकोंके आनन्दको भोगना है । और जो सांख्य और योगके अनुसार सम्प्रज्ञातसमाधिका अन्तिम ध्येय है । इसलिये कैवल्यरूप और पुनरावर्तिनी रूप दो प्रकारकी मुक्ति है । जो जिसको अभिमत हो वह उसकी इच्छा करे और उसकी प्राप्तिके लिये यत्न करे । कार्यकारण प्रत्येक संहत्यकारी अर्थात् किसी प्रयोजनके लिये बनी हुई वस्तु, जैसे वस्त्र कार्य कहलाता है । बिना कारणके कोई कार्य नहीं हो सकता । यह कारण तीन प्रकारका होता है-– जिससे वह वस्तु बनी हो, जैसे तन्तु जिससे वह वस्त्र बना है । यहाँ तन्तु ( १ ) उपादान कारण -1 वस्त्रका उपादान कारण है । ( २ ) निमित्त कारण – तन्तुओं का संयोग - विशेष करनेवाला जुलाहा निमित्त कारण है । ( ३ ) साधारण कारण – तन्तुओंका ओतप्रोतरूपमें संयोग - विशेष तथा कर्घा आदि साधारण कारण हैं । न्याय और वैशेषिकका सिद्धान्त इन दोनों दर्शनोंका सिद्धान्त आरम्भिक उपादान कारण अर्थात् परमाणु - वाद है । इनके सिद्धान्तानुसार सारे स्थूल पदार्थोंके मूल उपादान कारण निरवयव सूक्ष्म परमाणु हैं । ऐसे दो परमाणुओंके आपसमें संयुक्त हो जानेसे द्यणुककी उत्पत्ति होती है, जो अणु परमाणुविशिष्ट होनेसे स्वयं अतीन्द्रिय होते हैं । ऐसे तीन द्यणुकोंके संयोगसे त्र्यणुक ( त्रसरेणु या त्रुटि ) की उत्पत्ति होती है, जो महत्परमाणुसे संयुक्त होनेसे जन्य पदार्थोंका उत्पादक तथा इन्द्रियगोचर होता है । घरके छतके छेदसे जब सूर्यकिरणें प्रवेश करती हैं, तब ( ६३ )
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तीसरा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ न्याय और वैशेषिकका सिद्धान्त उनमें नाचते हुए जो छोटे - छोटे कण नेत्र - गोचर होते हैं, वे ही त्रसरेणु हैं । यथा—
जालान्तरगते भानौ यत् सूक्ष्मं दृश्यते रजः । तस्य षष्ठतमो भागः परमाणुः स उच्यते ॥
त्र्यणुकका महत्त्व द्यणुकोंकी संख्याके कारण उत्पन्न हुआ माना जाता है, न कि उनके अणुपरिमाणसे, चार त्रसरेणुओंके योगसे चतुरणुककी उत्पत्ति होती है, फिर स्थूल पदार्थोंकी इत्यादि । इस प्रकार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और उनके सारे स्थूल पदार्थोंकी उत्पत्ति होती है । ये परमाणु उपादान कारण हैं और इनका विशेष रूपसे संयोग होना साधारण कारण है; और ईश्वर, जिसके ज्ञान और प्रेरणासे यह परमाणु विशेष रूपसे संयुक्त हो रहे हैं, वह और अदृष्ट ( पुरुषका भोग और अपवर्ग अथवा कर्माशय ) इनका निमित्त कारण है । इस प्रकार न्याय और वैशेषिकने सांख्यकी प्रकृति और महत्तत्त्वको जडतत्त्वके वर्णन करनेकी आवश्यकता न देखी । जिस प्रकार सांख्यने पाँच तन्मात्राओं और अहंकारको स्थूलभूतों और इन्द्रियों आदिका प्रकृति ( उपादान कारण ) माना है, इसी प्रकार न्याय और वैशेषिकने परमाणुओंको स्थूलभूत, शरीर और इन्द्रियोंका उपादान कारण माना है । किंतु जहाँ सांख्यने अहंकार और तन्मात्राओंको महत्तत्त्वकी विकृति ( कार्य ) माना है, वहाँ न्याय और वैशेषिकने मन और परमाणुओंको निरवयव होनेके कारण इनके अतिरिक्त इनके अन्य किसी कारण ( प्रकृति ) की खोज करनेकी आवश्यकता न समझी । जिस प्रकार सांख्य और योगने स्थूलभूत और इन्द्रियोंको केवल विकृति ( विकार ) माना है, वैसे ही इन दोनों दर्शनकारोंने स्थूलभूत और इन्द्रियोंको मध्यम परिमाणवाला और अनित्य माना है । सांख्यके तीनों गुणोंके परिणामके स्थानपर इन्होंने परमाणुओंका विशेष रूपसे संयोग ही साधारण ( असमवायी ) कारण माना है । तीसरा निमित्त कारण ईश्वर, चारों दर्शनकारों ( न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग ) को समान - रूपसे अभिमत है । यद्यपि उसको विशेष रूपसे वर्णन करनेकी आवश्यकता नहीं समझी है— जिस प्रकार सुवर्णसे बने हुए आभूषणकी परीक्षाके समय सुवर्णकारकी परीक्षा करनी बुद्धिमत्ता नहीं है । किंतु ईश्वरके अस्तित्वको तो सभी दर्शनकारोंने माना है यथा-' क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटवत् ' जिस प्रकार कुम्हार घटका बनानेवाला है उसी प्रकार ईश्वर जगत्का बनानेवाला है । ईश्वरः कारणं पुरुषकर्माफल्यदर्शनात् ' ( न्याय ० ४ । १ । १ ९ ) मनुष्योंके कर्मोंक फल जिसके हाथमें हैं वही ईश्वर है । ' संज्ञा कर्म त्वस्मद्विशिष्टानां लिङ्गम् । प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात् संज्ञा कर्मणः । ' ( वैशेषिक २ । १ । १८ ) इन सूत्रोंकी शंकर मिश्रने इस प्रकार व्याख्या की है— संज्ञा नाम कर्म कार्यक्षित्यादि तदुभयम्, अस्मद्विशिष्टानामीश्वरमहर्षीणां सत्त्वेऽपि लिङ्गम् । घटपटादिसंज्ञानिवेशनमपि ईश्वरसंकेताधीनमेव । यः शब्दो संकेतितः स तत्र साधुः । तथा च सिद्धं संज्ञाया ईश्वरलिङ्गत्वम् । एवं यत्र ईश्वरेण लिङ्गम् । तथा हि क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटवदिति । कर्मापि ईश्वरे ( ६४ )
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तीसरा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ न्याय और वैशेषिकका सिद्धान्त संज्ञा अर्थात् नाम और कर्म अर्थात् पृथ्वी आदि कार्य ये दो चीजें हमसे बढ़कर एक विशिष्ट ईश्वर और महर्षि आदिके अस्तित्वको प्रमाणित करती हैं । घट, पट आदि नामसे वे ही पदार्थ किस प्रकार समझे जाते हैं । ईश्वरके संकेतसे । पृथ्वी, जल जब कार्य हैं, तब इनका कर्ता भी अवश्य होना चाहिये; वही ईश्वर है | तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् । ( कै १ । १ । ३ ) में तद् शब्द ईश्वरका बोधक है । इन सूक्ष्म परमाणुओंको अवकाश देनेवाला एक व्यापक जडतत्त्व चाहिये था । उसके लिये न्याय और वैशेषिकने आकाश महान् परिमाणवाला मूल प्रकृति ( प्रधान ) के स्थानपर माना है । आकाशसे अतिरिक्त इन दोनों दर्शनकारोंने परमाणुओंके संयोगक्रम तथा परत्व - अपरत्व दिखलानेके लिये दिशा और कालको भी महत्परिमाणवाला माना है, जिनको सांख्य और योगने बुद्धिका निर्माण किया हुआ मानकर चौबीस तत्त्वोंमें सम्मिलित नहीं किया है । सांख्य तथा योगके सदृश ये दोनों दर्शन भी आत्माको विभु और शरीर, इन्द्रिय तथा मनसे पृथक् चेतन तत्त्व मानते हैं । आत्माको जड -तत्त्वसे भिन्न दिखलानेवाले चिह्न निम्न प्रकार बतलाये हैं— प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो-लिङ्गानि । ( वैशे ० ३।२।४ ) प्राण, अपान, पलक मींचना - खोलना, जीवन, मनकी गति, एक इन्द्रियके प्रत्यक्षसे दूसरे इन्द्रियमें विकार उत्पन्न होना, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न आत्माके लिङ्ग ( चिह्न ) हैं । इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम् । ( न्याय १ । १० ) इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान आत्माके लिङ्ग ( चिह्न, साधक ) हैं । आत्मा शरीरसे भिन्न एक चेतन तत्त्व है; क्योंकि श्वासको बाहर निकालना, अंदर ले जाना, पलक झपकाना आदि क्रियाएँ उसी समयतक रहती हैं, जबतक उसका आत्मासे संयोग रहता है । आत्मासे संयोग छूटनेपर मृतक शरीरमें क्रियाएँ नहीं होतीं । इसलिये जहाँ ये क्रियाएँ हों, वहाँ आत्माका होना सिद्ध होता है । योग और सांख्यने बुद्धि अर्थात् चित्तको पृथक् तत्त्व माना है, किंतु न्याय और वैशेषिकने इसको आत्मामें ही सम्मिलित करके आत्माके शबल स्वरूपके धर्म, ज्ञान, प्रयत्न आदि बतलाये हैं । इसलिये जहाँ सांख्य और योगने आत्माको ज्ञान अथवा चेतनस्वरूप माना है वहाँ न्याय और वैशेषिकने ज्ञान और प्रयत्न आदि धर्मवाला माना है; क्योंकि ज्ञान और प्रयत्न आदिको आत्माका धर्म माने बिना वैशेषिकके लक्षणानुसार ( शुद्ध ) आत्माका अस्तित्व इनके प्रमाण और लक्षणसे सिद्ध नहीं हो सकता था; क्योंकि उनके लक्षणानुसार द्रव्य या तो समवायीकरण हो, जैसे परमाणु स्थूल भूतोंके; या क्रियावाला हो जैसे मन तथा परमाणु; या गुणवाला हो जैसे आकाश शब्दगुणवाला है चेतन स्वरूप आत्मामें ये तीनों धर्म न होनेसे वैशेषिक और न्यायके लक्षणानुसार जो केवल भौतिक पदार्थोंके वास्तविक स्वरूपको बतलाते हैं, आत्माका वास्तविक स्वरूप नहीं सिद्ध हो सकता था । इसलिये इन्होंने बुद्धि ( चित्त ) को आत्मामें सम्मिलित करके उसके ( बुद्धिके ) धर्म, ज्ञान, प्रयत्न आदिसे आत्माके । शबल स्वरूपका अस्तित्व बुद्धिके साथ सिद्ध किया है ( ६५ )
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तीसरा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप* [ न्याय और वैशेषिकका सिद्धान्त वैशेषिक सूत्र ( ३।२।४ ) और न्याय सूत्र ( १ । १० ) में बतलाये हुए लिङ्ग आत्माके धर्म नहीं हैं और न इनका आत्माके साथ समवाय सम्बन्ध है । यह आत्माका शरीरके साथ अस्तित्व बतलानेके लिये केवल चिह्नमात्र हैं । जैसे रामके मकानको निर्देश करनेके लिये यह कहा जाय ' जिस मकानमें आमका वृक्ष है वही रामका मकान है ' इन दोनों सूत्रोंमें आत्माके सगुण अर्थात् शबल स्वरूपको बतलाया है । जिसकी संज्ञा जीव है । क्योंकि प्राण, अपान, पलक मींचना, पलक खोलना, जीवन, यह सब प्राणके धर्म हैं । मनकी गति मनका धर्म है । इन्द्रियोंका विकार इन्द्रियोंका धर्म है । इच्छा, द्वेष, दुःख, सुख, प्रयत्न और ज्ञान बुद्धिके धर्म हैं । ये सब तीनों गुणोंके कार्योंके धर्म गुणरूप ही हैं । इसी बातको गीता अध्याय ५ के ८ वें तथा ९ वें श्लोकोंमें बताया गया है ।
नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन् स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन् गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥
प्रलपन् विसृजन् गृह्णत्रुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखोंको खोलता हुआ और मींचता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने - अपने अर्थोंमें बर्त रही हैं । इस प्रकार समझता हुआ निःसंदेह ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ । आत्माका शुद्ध स्वरूप वैशेषिकके सूत्र ( ७।१ । २२ ) में बताया गया है । विभवान्महानाकाशस्तथा चात्मा । विभु धर्मवान् महान् है, आकाश वैसे ( ज्ञानस्वरूप ) आत्मा है । वैशेषिकके इस सूत्रके अनुसार ही श्रुति - स्मृतियोंमें आत्माके शुद्ध ज्ञानस्वरूपको व्यापक और निष्क्रिय ही माना है । यथा— आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः । ( छान्दोग्य ॰ ३ । १४ । ३ ) आकाशके समान आत्मा व्यापक और नित्य है । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः । ( गीता २ । २४ ) यह आत्मा नित्य व्यापक स्थाणु तथा निष्क्रिय और सनातन है I यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति ॥ भारत ॥ ( गीता १३ । ३२-३३ ) जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त हुआ आकाश ( भी ) सूक्ष्म होनेसे लिपायमान नहीं होता देहमें स्थित हुआ ( भी ) आत्मा गुणातीत होनेके कारण देहके गुणोंसे लिपायमान नहीं है, वैसे ही सर्वत्र होता है । हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशितकरता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है आत्माके शबल स्वरूपकी पिण्डरूप व्यष्टि शरीरोंमें सिद्धिसे सामान्यतोदृष्टप्रमाणद्वारा परमात्माके ( ६६ )
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तीसरा प्रकरण षड्दर्शनसमन्वय * * [ योगसाधनकी शिक्षा शबल स्वरूपकी ब्रह्माण्डरूप समष्टि जगत् में सिद्धि होती है । वैशेषिक और न्यायमें योगसाधनकी शिक्षा आत्मा तथा परमात्माका अस्तित्व प्रमाण और लक्षणसे सिद्ध करनेके पश्चात् इन दोनों दर्शनकारोंने न केवल आत्मा और परमात्माका, किंतु अतीन्द्रिय जड पदार्थोंका भी वास्तविक स्वरूप जाननेके लिये योग - साधनाका ही सहारा बतलाया है । यथा— आत्मन्यात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मप्रत्यक्षम् । ( वैशेषिक ९ । १ । ११ ) आत्मामें आत्मा और मनके संयोगविशेषसे आत्माका प्रत्यक्ष होता है । अर्थात् आत्मा और मनका योग - समाधिद्वारा जब संयोग प्रत्यक्ष होता है, तब उस संयोगविशेषसे आत्माका प्रत्यक्ष होता है । तथा द्रव्यान्तरेषु प्रत्यक्षम् । ( वैशे ० ९ । १ । १२ ) इसी प्रकार अन्य ( सूक्ष्म अतीन्द्रिय ) द्रव्योंका प्रत्यक्ष होता है । असमाहितान्तःकरण उपसंहृतसमाधयस्तेषां च । ( वैशे ॰ ९ ।१ । १३ ) युक्त योगी जो समाधिको समाप्त कर चुके हैं उनके लिये ( अतीन्द्रिय द्रव्योंका ) बिना समाधिके भी प्रत्यक्ष होता है तत्समवायात् कर्मगुणेषु । ( वैशे ० ९ । १ । १४ ) उन ( द्रव्यों ) में समवेत होनेसे कर्म गुणोंमें ( युक्त और युञ्जान दोनों प्रकारके योगियोंको भी प्रत्यक्ष होता है ) । आत्मसमवायात्मगुणेषु । ( वैशे ॰ ९ । १ । १५ ) आत्मामें समवेत होनेसे आत्माके गुणोंका प्रत्यक्ष होता है । समाधिविशेषाभ्यासात् । ( न्याय ० ४ । २ । ३८ ) समाधिविशेषके अभ्याससे ( तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है ) । अरण्यगुहापुलिनादिषु योगाभ्यासोपदेशः । ( न्याय ० ४ । २ । ४२ ) वन, गुहा और नदी - तीर आदि स्थानोंमें योगाभ्यासका उपदेश ( किया जाता है ) । तदभावश्चापवर्गे । ( न्याय ० ४। २ । ४५ ) और मोक्षमें उसका ( इन्द्रिय और अर्थके आश्रयभूत शरीरका ) अभाव होता है 1 तदर्थं यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारो योगाच्चाध्यात्मविध्युपायैः । ( न्याय ० ४ । २ । ४६ ) उस मोक्षके लिये यम और नियमोंसे तथा अभ्यासविधिके उपायोंद्वारा योगसे आत्माका संस्कार करना चाहिये अर्थात् योगके प्रतिबन्धक मल - विक्षेप और अवतरणको हटाना चाहिये । ( ६७ )
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चौथा प्रकरण सांख्य और योगदर्शन सांख्य और योग भारतवर्षकी प्राचीन प्रसिद्ध वैदिक तथा वेदान्त फ़िलासफ़ी है, जिसने सारे भूमण्डलके विद्वानोंको विस्मित कर दिया है । परमात्मा ( चेतनतत्त्व ) के निर्गुण शुद्ध स्वरूपका वर्णन उपनिषदोंमें विस्तारपूर्वक किया गया है, इसलिये उपनिषदोंको वेदान्त कहते हैं । ज्ञानका अन्त अर्थात् जिसके जाननेके पश्चात् कुछ जानना शेष न रहे । योग और सांख्यमें उसके जाननेके साधन विशेषरूपसे बतलाये गये हैं । इसलिये सांख्य और योग ही प्राचीन वेदान्त फ़िलासफ़ी है । यथा — नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ( श्वेता ॰ ६ | १३ ) नित्योंका नित्य, चेतनोंका चेतन जो अकेला ही बहुतोंकी कामनाओंको पूरा करता है, उस देवको जो ( सृष्टि आदिका निमित्त ) कारण है और जो सांख्य और योगद्वारा ही जाना जा सकता है जानकर ( मनुष्य ) सारी फाँसोंसे छूट जाता है ।
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥
( मु ० ३ खं ॰ २ मं ० ६ ) वेदान्तके विज्ञानका उद्देश्य जिन्होंने ठीक - ठीक निश्चय कर लिया है और जो यतिजन संन्यास ( सांख्य ) और योगसे शुद्ध अन्तःकरणवाले हैं, वे लोग सबसे उत्तम अमृतको भोगते हु मरनेके समय ब्रह्मलोकोंमें स्वतन्त्र हो जाते हैं । तथा— नास्ति सांख्यसमं ज्ञानं नास्ति योगसमंबलम् । सांख्यके समान और कोई दूसरा ज्ञान नहीं है और योगके समान और कोई दूसरा बल नहीं है । द्वौ क्रमौ चित्तनाशाय योगो ज्ञानं च राघव । योगो वृत्तिनिरोधो हि ज्ञानं सम्यगवेक्षणम् ॥ असाध्यः कस्यचिद्योगो ज्ञानं कस्यचिदेव च । प्रकारौ द्वौ ततः साक्षाज्जगाद परमः शिवः ॥ ( योगवासिष्ठ ) हे राम! चित्तका नाश करनेके लिये केवल दो निष्ठाएँ बतलायी गयी हैं — योग और सांख्य चित्तवृत्तिनिरोधसे प्राप्त किया जाता है और सांख्य सम्यग् ज्ञानसे । किसी - किसीके लिये योग कठिन । योग है और किसी - किसीको सांख्य । इस कारण परम शिवने योग और सांख्य होता दोनों ही मार्गोंको बतलाया है । ( ६८ )