पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ — पृष्ठ 91–100
पातञ्जल योगप्रदीप - स्वामी ओमानन्द तीर्थ · Gita Press · पृष्ठ 91–100
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चौथा प्रकरण षड्दर्शनसमन्वय* [ सांख्य और योगदर्शन लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् । ( गीता ३ ( ३ ) हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्यलोकमें मैंने पुरातन कालमें ( कपिल मुनि और हिरण्यगर्भरूपसे ) दो निष्ठाएँ बतलायी हैं । ( कपिल मुनिद्वारा बतलायी हुई ) सांख्ययोगियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे होती है और ( हिरण्यगर्भरूपसे बतलायी हुई ) योगियोंकी निष्ठा निष्काम कर्मयोगसे ( और भक्तियोगसे ) होती है । यथा-सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यो पुरातनः ॥ ( महाभारत ) सांख्यके वक्ता परम ऋषि कपिल हैं और योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं । इनसे पुरातन इनका वक्ता और कोई नहीं । यद्यपि ये दोनों फ़िलासफ़ी अलग - अलग नामसे वर्णन की गयी हैं, किन्तु वास्तवमें दोनों एक ही हैं । यथा— सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥ यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ( गीता ५।४-५ ) सांख्य और योगको पृथक् - पृथक् अविवेकी लोग ही जानते हैं न कि पण्डित लोग । इन दोनोंमेंसे एकका भी ठीक अनुष्ठान कर लेनेपर दोनोंका फल मिल जाता है । सांख्ययोगी जिस शुद्ध परमात्मस्वरूपका लाभ करते हैं योगी भी उसीको पाते हैं । जो सांख्य और योगको एक जानता है, वही तत्त्ववेत्ता है । किंतु इन दोनोंमें सांख्य किंचित् कठिन है । यथा—
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्नुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥
( गीता ५। ६ ) किन्तु हे अर्जुन! बिना योगके सांख्य साधनरूपमें कठिन है । योगसे युक्त होकर मुनि शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेते हैं । जिस प्रकार सत्त्व, रजस् और तमस् - इन तीनोंमेंसे प्रत्येक गुण बिना अन्य दोकी सहायताके अपना कोई भी कार्य स्वतन्त्ररूपसे प्रारम्भ नहीं कर सकते उसी प्रकार ज्ञान, कर्म और उपासना भी अपने - अपने कार्यमें परस्पर एक - दूसरेके सहयोगकी अपेक्षा रखते हैं । सांख्यनिष्ठामें ज्ञान प्रधान है तथा कर्म और उपासना गौण एवं योगनिष्ठामें कर्म और उपासनाकी प्रधानता है । सांख्य और योग दोनों आरम्भमें एक ही स्थानसे चलते हैं और अन्तमें एक ही स्थानपर मिल जाते हैं, किंतु योग बीचमें थोड़ेसे मार्गसे घुमाववाली पक्की सड़कसे चलता है और सांख्य सीधा कठिन रास्तेसे जाता है सांख्य और योगमें बहिर्मुख होकर संसारचक्रमें घूमनेके कारण अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, क्लेश तथा सकाम कर्म बतलाये गये हैं और इसी क्रमानुसार अन्तर्मुख होनेके साधन अष्टाङ्गयोग अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि है । ( ६ ९ )
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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ सांख्य और योगदर्शन योगद्वारा अन्तर्मुख होना - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार- -ये पाँच बहिरङ्ग साधन हैं और धारणा, ध्यान, समाधि अन्तरङ्ग साधन हैं । ये तीनों धारणा, ध्यान, समाधि भी असम्प्रज्ञात समाधि ( स्वरूपावस्थिति ) के बहिरङ्ग साधन हैं । उसका अन्तरङ्ग साधन नेति नेतिरूप पर - वैराग्य है, जिसके द्वारा चित्तसे अलग आत्माको साक्षात्कार करानेवाली विवेकख्यातिरूप सात्त्विक वृत्तिका भी निरोध होकर ( शुद्ध चैतन्य ) स्वरूपावस्थितिका लाभ होता है । सांख्यद्वारा अन्तर्मुख होना — अष्टाङ्ग योगके पहले पाँच बहिरङ्ग साधन सांख्य और योगमें समान हैं, किंतु जहाँ योगमें सालम्बन अर्थात् धारणा, ध्यान, समाधिद्वारा किसी विषयको ध्येय बनाकर अन्तर्मुख होते हैं, वहाँ सांख्यमें निरालम्ब अर्थात् बिना किसी विषयको ध्येय बनाकर अन्तर्मुख होते हैं । उसमें धारणा, ध्यान और समाधिके स्थानमें चित्त और उसकी वृत्तियाँ दोनों ही त्रिगुणात्मक हैं, इसलिये ' गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ' इस भावनासे आत्माको चित्तसे पृथक् अकर्त्ता केवल शुद्ध स्वरूपमें देखना होता है । ‘ यह आत्मसाक्षात्कार करानेवाली विवेकख्यातिरूप एक गुणोंकी ही सात्त्विक वृत्ति है । ' इस प्रकार पर - वैराग्यद्वारा इस वृत्तिके निरोध होनेपर ( शुद्ध चैतन्य ) स्वरूपावस्थितिको प्राप्त होते हैं । योगमें उत्तम अधिकारियोंके लिये असम्प्रज्ञात समाधि - लाभका विशेष उपाय ईश्वर - प्रणिधान — यह ओ ३ म्की मात्राओंद्वारा उपासना है अर्थात् ओ ३ म्के अर्थोंकी भावना करते हुए वाणीसे जाप करना एक मात्रावाले अकार ओ ३ म्की उपासना है । इसमें स्थूल शरीरका अभिमान रहता है, इसलिये स्थूल शरीरके सम्बन्धसे जो आत्माकी संज्ञा विश्व है; वह उपासक होता है और स्थूल जगत् के सम्बन्धसे जो परमात्माकी संज्ञा विराट् है, वह उपास्य होता है । ओ ३ म्के मानसिक जापमें अकार, उकार दो मात्रावाले ओ ३ म्की उपासना होती है । इसमें सूक्ष्म शरीरका अभिमान रहता है, इसीलिये सूक्ष्म शरीरके सम्बन्धसे जो आत्माकी संज्ञा तैजस है, वह उपासक होता है और सूक्ष्म जगत्के सम्बन्धसे जो परमात्माकी संज्ञा हिरण्यगर्भ है, वह उपास्य होता है । जब मानसिक जाप भी सूक्ष्म होकर केवल ओ ३ म्का ध्यान ( ध्वनि ) ही रह जाय तो यह अकार, उकार, मकार तीनों मात्रावाले पूरे ओ ३ म्की उपासना है । इसमें कारण - शरीरका अभिमान रहता है । इसलिये कारण - शरीरके सम्बन्धसे आत्माकी जो संज्ञा प्राज्ञ है, वह उपासक होता है और कारण - जगत्के सम्बन्धसे जो परमात्माकी संज्ञा ईश्वर है, वह उपास्य होता है । जब यह तीन मात्रावाली ध्यानरूप वृत्ति भी सूक्ष्म होते - होते निरुद्ध हो जाय तो अमात्र विरामरह जाता है । यह कारण - शरीर और कारण ग - - जगत् दोनोंसे परे शुद्ध परमात्मप्राप्तिरूप स्वरूपावस्थिति है, जो प्राणिमात्रका अन्तिम ध्येय है 1 सांख्यमें उत्तम अधिकारियोंके लिये असम्प्रज्ञात समाधि - लाभका विशेष उपाय ' ध्यानं निर्विषयं मनः ', -इसके द्वारा जो वृत्ति आये उसको हटाना होता है । अन्तमें सब वृत्तियाँ रुक जानेपर निरोध करनेवाली वृत्तिका भी निरोध करके स्वरूपावस्थितिको प्राप्त करना होता है । योगका, भक्तिका लम्बा मार्ग सुगम है । यह सांख्यके ज्ञानका छोटा मार्ग उससे कठिन है कार्यक्षेत्रमें सांख्य और योगका व्यवहार-कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् । ( योगद ० ४। ७ ) ( ७० )
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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ सांख्य और योगदर्शन योगियोंका कर्म न पापमय होता है न पुण्यमय; क्योंकि योगीके लिये तो पापकर्म सर्वथा त्याज्य ही है और कर्त्तव्यरूप पुण्यकर्म वह आसक्ति, लगाव, ममता और अहंताको छोड़कर निष्कामभावसे करता है । इसलिये बन्धनरूप न होनेसे अकर्मरूप ही है । साधारण अयोगी लोगोंके कर्म पाप, पुण्य और पाप - पुण्यसे मिश्रित तीन प्रकारके होते हैं । यह सूत्र सांख्य और योग दोनोंके लिये समान है; किंतु योगी कर्म और उसके फलको ईश्वरके समर्पण करके आसक्तिको त्यागते हैं और सांख्ययोगी गुण गुणोंमें बरत रहे हैं, आत्मा अकर्त्ता है, इस प्रकार इसके लगावसे मुक्त रहते हैं । योगकी उपासना अर्थात् भक्तिका मार्ग लम्बा किंतु सुगम है । सांख्यके ज्ञानका मार्ग छोटा किंतु कठिन है योगियोंका कार्यक्षेत्रमें व्यवहार-ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये ॥ युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ ( गीता ५ । १० – १२ ) कर्मोंको ईश्वरके समर्पण करके और आसक्तिको छोड़कर जो कर्म करता है, वह पानीमें पद्मके पत्तेके सदृश पापसे लिप्त नहीं होता ॥ १० ॥ योगी फलकी कामना और कर्तापनके अभिमानको छोड़कर
अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे कर्म करते हैं ॥ ११ ॥ योगी कर्मके
फलको त्यागकर परमात्मप्राप्तिरूप शान्तिको लाभ करते हैं । अयोगी कामनाके अधीन होकर फलमें आसक्त हुआ बँधता है ॥ १२ ॥
सांख्ययोगियोंका कार्यक्षेत्रमें व्यवहार— तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति न सज्जते ॥ मत्वा ( गीता ३।२८ ) नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नगच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥ प्रलपन्विसृजन्नगृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ( गीता ५। ८ - ९ ) ' हे महाबाहो! गुणविभाग ( अर्थात् सत्त्व, रज और तम ) – तीनों गुणोंके जो बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियादि ग्रहण और पाँचों विषयादि ग्राह्यरूप हैं और कर्मविभाग ( अर्थात् उनकी परस्परकी चेष्टाएँ ) को तत्त्वसे जाननेवाला गुण गुणोंमें बरत रहे हैं ( अर्थात् ग्रहण और ग्राह्यरूप तीनों गुणोंके परिणामोंमें ही व्यवहार हो रहा है, आत्मा अकर्त्ता है ) ऐसा जानकर कर्म और उनके फलोंमें आसक्तं नहीं होता ' ॥ २८ ॥ ` तत्त्ववेत्ता सांख्ययोगी देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ,
• चलता हुआ, सोता हुआ, साँस लेता हुआ, बोलता हुआ, छोड़ता हुआ, पकड़ता हुआ, आँख खोलता हुआ और मीचता हुआ भी ऐसा ही समझता है कि मैं कुछ भी नहीं करता । सब चेष्टाओंमें केवल इन्द्रियाँ ही अपने - अपने विषयोंमें प्रवृत्त हो रही हैं । ( आत्मा इनका द्रष्टा, इनसे पृथक् निर्लेप है ) ॥ ८ - ९ ॥ सांख्य और योगकी उपासना - परमात्माका शुद्ध स्वरूप तीनों पुरुषों और तीनों लिङ्गोंसे परे है; किंतु ( ७१ )
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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ सांख्य और योगदर्शन व्यवहार - दशामें उसका संकेत किसी - न - किसी लिङ्ग और पुरुषद्वारा ही हो सकता है । योगद्वारा उपासना – योगद्वारा उसकी उपासना अन्य आदेश अर्थात् प्रथम और मध्यम पुरुषद्वारा की जाती है । यथा— प्रथम पुरुषद्वारा-ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ ( ईशोप ० १ । १, यजु ० ४० । १ ) यह जो कुछ स्थावर और जङ्गम जगत् है, वह ईश्वरसे आच्छादनीय है अर्थात् सबमें ईश्वरको व्यापक समझना चाहिये । उसका त्यागभावसे भोग करना चाहिये अर्थात् ईश्वरसमर्पण करके व्यवहार करे । लालच न करे, अर्थात् आसक्ति न होने दे । धन किसका है? अर्थात् किसीका नहीं ।
तजति तन्नैजति तदूरे तद्वन्ति ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥
( ईशा ० ५ ) वह हिलता है, वह नहीं हिलता है । वह दूर है, वह निश्चयसे समीप है । वह इस सबके अंदर है, वह निश्चय ही इस सबके बाहर है । मध्यम पुरुषद्वारा-उत वाप पिताऽसि न उत भ्रातोत नः सखा सनो जीवात वे कृधि । ( ऋग्वेद १० । १८६ ) हे परमात्मन्! तू हमारा पिता है, तू भ्राता है, तू ही सखा है । हे प्रभो! हमारा आयुष्य बढ़ाओ ।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥
आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बन्धु हैं और आप ही सखा हैं । आप ही विद्या हैं, आप ही द्रव्य हैं, हे देवोंके देव! आप ही मेरे सब कुछ हैं । तत्त्वमसि । “ वह तू है ” यहाँ “ त्वम् " मध्यम पुरुष उस शुद्ध परमात्मतत्त्वका निर्देश करता है, जो सबके अंदर व्यापक हो रहा है और जहाँतक पहुँचना प्राणी - मात्रका अन्तिम ध्येय है सांख्यद्वारा उपासना – सांख्यद्वारा उसकी उपासना अहंकारादेश अर्थात् उत्तम पुरुषद्वारा और आत्मादेश अर्थात् आत्माद्वारा की जाती है । यथा-उत्तम पुरुषद्वारा-अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्तएव च ॥ हे अर्जुन! मैं सब भूतोंके हृदयमें स्थित आत्मा हूँ । मैं ही सब भूतोंकी उत्पत्ति ( गीता १०।२० ) , स्थिति और संहाररूप हूँ । ( ७२ )
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चौथा प्रकरण ] * षड्दर्शनसमन्वय [ सांख्य और योगदर्शन * अहं ब्रह्मास्मि । “ मैं ब्रह्म हूँ ” यहाँ “ अहम् ' उत्तम पुरुष उस त्रिगुणात्मक अहंकारको नहीं बतला रहा है, जो त्रिगुणात्मक महत्तत्त्वकी विकृति है और न उसके साथ चेतन तत्त्वके सम्मिश्रणको जिसकी संज्ञा जीव किंतु शुद्ध परमात्मतत्त्वका निर्देश कर रहा है, जो हमारे सबके अंदर व्यापक हो रहा है है; समाधि तथा कैवल्यकी अवस्थामें शेष रह जाता है, जो हमारा अन्तिम लक्ष्य है । अर्थात्, जहाँतक जो असम्प्रज्ञात हमको पहुँचना है, वही हमारा वास्तविक स्वरूप हो सकता है । किंतु हमारा सारा व्यवहार त्रिगुणात्मक अहंकारद्वारा ही किया जा सकता है । रज और तम बन्धनमें डालनेवाले होते हैं और केवल सत्त्व बन्धनसे छुड़ानेवाला है । इसलिये यहाँ सात्त्विक अहंकारके राजसी, तामसी अंशको हटाया जा रहा है । राजसी, तामसी अहंकार नष्ट होनेके पश्चात् केवल सात्त्विक अहंकार शेष रह जाता है । यह एक प्रकारसे विवेक - ख्यातिकी अवस्था है । जिस प्रकार विवेक - ख्याति अन्य सब वृत्तियोंके निरोधपूर्वक स्वयं भी निरुद्ध हो जाती है, इसी प्रकार यहाँ भी सात्त्विक अहंकार राजसी, तामसी अहंकारको नष्ट करनेके पश्चात् स्वयं भी निवृत्त हो जाता है । इस अहंकारके सर्वथा अभावरूप असम्प्रज्ञात समाधि अथवा कैवल्यकी अवस्थामें जो शुद्ध परमात्मतत्त्व शेष रह जाता है उसीको निर्देश करानेके लिये यह अहंकारादेश है ।
आत्माद्वारा--अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥
( कठ ० २।५।६, १०-११ ) जिस प्रकार एक ही अग्नि नाना भुवनोंमें प्रविष्ट होकर उनके प्रतिरूप ( उन - जैसा रूपवाला ) हो रही है, इसी प्रकार एक ही सब भूतोंका अन्तरात्मा नाना प्रकारके रूपोंमें उन जैसा रूपवाला हो रहा है और उनसे बाहर भी है । जिस प्रकार एक ही वायु नाना भुवनोंमें प्रविष्ट होकर उनके प्रतिरूप अर्थात् उन - जैसा रूपवाला हो रहा है, उसी प्रकार एक ही सब भूतोंका अन्तरात्मा नाना प्रकारके रूपोंमें प्रतिरूप ( उन - जैसा रूपवाला ) हो रहा है और उनसे बाहर भी है । जिस प्रकार सूर्य सब लोकोंका चक्षु होकर भी आँखोंके बाह्य दोषसे लिप्त नहीं होता । इसी प्रकार एक ही सब भूतोंका अन्तरात्मा लोकके बाह्य दुःखोंसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि वह उनसे बाहर है । अयमात्मा ब्रह्म । “ यह आत्मा ब्रह्म है ” यहाँ " आत्मा " शब्द जीवात्माके लिये नहीं है बल्कि त्रिगुणात्मक तीनों शरीरोंके परित्यागपूर्वक, शुद्धं आत्मतत्त्वका निर्देश करता है । प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष, उत्तम पुरुष और आत्मा क्रमशः एक - दूसरोंसे अधिक समीपताके सूचक हैं; किंतु कर्म और भक्तिप्रधान योग साधारण मनुष्योंको ज्ञानप्रधान सांख्यसे अधिक आकर्षक और सुगम ( ७३ )
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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ सांख्यदर्शन प्रतीत होता है । पर भक्ति और कर्म भी अपनी अन्तिम सीमापर पहुँचकर ज्ञानका रूप ही धारण कर लेते हैं1
यथा-यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वाघास्या अहम् । स्युष्टे सत्या इहाशिषः ॥
( ऋ ० ६ । ३ अ ० ४० वर्ग २३ ) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन्! यदि मैं तू हो जाऊँ और तू मैं हो जाय अर्थात् द्वैतभाव मिटकर एकत्वभाव उत्पन्न हो जाये तो तेरा आशीर्वाद संसारमें सत् हो जाय ।
यथा--जब मैं था तब तू न था तू पायो मैं नाय ।
प्रेम गली अति सांकरी, तामें द्वै न समाय ॥
इस प्रकार सांख्य और योगमें बीचके मार्गमें थोड़ा - सा ही अन्तर है । सांख्यदर्शन गीतामें सांख्यको ज्ञानयोग तथा संन्यासयोगके नामसे भी वर्णन किया गया है । सांख्य नाम रखनेका यह भी कारण हो सकता है कि इसमें गिने हुए पच्चीस तत्त्व माने गये हैं । सांख्य नामकरणका रहस्य इसके एक विशिष्ट सिद्धान्त ' प्रकृतिपुरुषान्यताख्याति ' में भी छिपा हुआ है, क्योंकि ' प्रकृतिपुरुषान्यताख्याति ' या ' प्रकृतिपुरुषविवेक ' का ही दूसरा नाम ' संख्या = सम्यक् ख्याति = सम्यक् ज्ञान = विवेकज्ञान ' है । किसी वस्तुके विषयमें तद्गत दोषों तथा गुणोंकी छानबीन करना भी ' संख्या ' कहलाता है ।
यथा--दोषाणां च गुणानां च प्रमाणं प्रविभागतः ।
कञ्चिदर्थमभिप्रेत्य सा संख्येत्युपधार्यताम् ॥
( महाभारत ) संख्याका अर्थ आत्माके विशुद्ध रूपका ज्ञान भी किया गया है । यथा— शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं सांख्यमित्यभिधीयते । ( शङ्करविष्णुसहस्रनाम - भाष्य ) सांख्य - प्रवर्तक- -कपिलमुनि सांख्यके प्रवर्तक श्रीकपिलमुनि हुए हैं और योगदर्शनके निर्माता श्रीपतञ्जलिमुनि । कपिलमुनि आदि विद्वान् और प्रथम दर्शनकार हैं । यथा— सिद्धानां कपिलो मुनिः । ( गीता १० | २६ ) सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ । ( ७४ )
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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय [ सांख्यके मुख्य ग्रन्थ * * ऋषिप्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्विभर्ति । ( श्वेता ० उप ० ) जो पहले उत्पन्न हुए कपिल मुनिको ज्ञानसे भर देता है तथा— आदिविद्वान् निर्माणचित्तमधिष्ठाय कारुण्याद् भगवान् परमर्षिरासुरये जिज्ञासमानाय तन्त्रं प्रोवाच । ( पञ्चशिखाचार्य ) आदिविद्वान् ( पहले दर्शनकार ) भगवान् परम ऋषि ( कपिल ) ने निर्माणचित्त ( सांसारिक संस्कारोंसे शून्य ) के अधिष्ठाता होकर जिज्ञासा करते हुए आसुरिको दयाभावसे ( सांख्य ) शास्त्रका उपदेश दिया । सर्गादावादिविद्वानत्र भगवान् कपिलो महामुनिर्धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यसम्पन्नः प्रादुर्बभूव । ( वाचस्पति मिश्र ) सृष्टिके आदिमें आदिविद्वान् पूजनीय महामुनि कपिल धर्म - ज्ञान - वैराग्य और ऐश्वर्यसे सम्पन्न प्रकट हुए । सांख्यके प्रसिद्ध प्राचीन आचार्य आदिविद्वान् भगवान् कपिल मुनिके पश्चात् विज्ञानभिक्षुके समयतक सांख्यके निम्नलिखित प्रसिद्ध आचार्यहुए हैं-आसुरिमुनि, पञ्चशिखाचार्य, पतञ्जलि, जैगीषव्याचार्य, वार्षगण्याचार्य, विन्ध्यवासी ( रुद्रिल ) जनक, पराशर ( बादरी ), व्यास, ईश्वरकृष्ण आर्य । कई लेखकोंने निम्नलिखित नामोंको भी सांख्य आचार्यों में सम्मिलित किया है-भार्गव, उलूक, वाल्मीकि, हारीत, देवल ( माठर वृत्तिका ० ७१ ), बाद्धलि, कैरात, पौरिक, ऋषभेश्वर, पञ्चाधिकरण, कौण्डिन्य, मूक ( युक्तिदीपिका का ० ७ १ ) गर्ग, गौतम, ( जयमङ्गला ) । सांख्यके मुख्य ग्रन्थ सांख्यके बहुत - से प्राचीन ग्रन्थ इस समय लुप्त हैं । कई एकके केवल नाम ही मिलते हैं । ( १ ) परम ऋषि कपिल मुनिप्रणीत ' तत्त्वसमास ' – इसके वर्त्तमान समयमें केवल बाईस सूत्र मिलते हैं । वास्तवमें इसीको सांख्यदर्शन कहना चाहिये । इसका उपदेश भगवान् कपिलने आसुरि जिज्ञासुको किया था और भगवान् कपिल - जैसे आदिविद्वान्द्वारा आसुरि - जैसे जिज्ञासुके लिये साक्षात्कारपर्यन्त इन्हीं सूत्रोंका उपदेश परमार्थक हो सकता है । आसुरिके बनाये हुए किसी विशेष ग्रन्थका तो पता नहीं चलता, किंतु उनके सिद्धान्तका वर्णन प्राचीन ग्रन्थोंमें उपलब्ध होता है । स्याद्वादमञ्जरीमें आसुरिका एक श्लोक ( पंद्रहवाँ श्लोक ) उद्धृत किया गया है । तत्त्वसमासपर विज्ञानभिक्षुके शिष्य भावागणेशकृत ' सांख्यतत्त्वयाथार्थ्यदीपन ' टीका प्रसिद्ध है । तथा शिवानन्दकृत ‘ सांख्यतत्त्वविवेचन ', ' सर्वोपकारिणी टीका ', ' सांख्यसूत्रविवरण ' आदि टीकाएँ भी हैं । ( २ ) पञ्चशिखाचार्यके सूत्र – आसुरिने कपिल मुनिसे प्राप्त की हुई सांख्यकी शिक्षाका -पञ्चशिखाचार्यको उपदेश किया, जिसने इस शास्त्रका विस्तार किया । इस प्रकारका वर्णन सांख्यकारिकामें आता है । इन सूत्रोंका ग्रन्थ लुप्त है । व्यासजीने अपने योगदर्शनके भाष्यमें लगभग इक्कीस पञ्चशिखाचार्यके सूत्रोंको कई स्थानोंमें उद्धृत किया है । ( ७५ )
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चौथा प्रकरण ] पातञ्जलयोगप्रदीप* * [ सांख्यके मुख्य ग्रन्थ ( ३ ) वार्षगण्याचार्यप्रणीत षष्टितन्त्र - यह ग्रन्थ भी नहीं मिलता है । साठ प्रधान विषयोंकी व्याख्या होनेके कारण अथवा साठ परिच्छेद होनेके कारण इसका नाम षष्टितन्त्र रखा गया था । ईश्वरकृष्ण आर्यने अपनी सांख्यसप्ततिको षष्टितन्त्रके आधारपर ही बनाया है । वे बहत्तरवीं कारिकामें लिखते हैं कि षष्टितन्त्रके सविस्तर विषयको सांख्यसप्ततिमें संक्षिप्त किया गया है और उसकी आख्यायिकाएँ आदि छोड़ दी गयी हैं । श्रीव्यासजी महाराजने योगदर्शनके भाष्यमें वार्षगण्याचार्यके वचनोंको कई स्थानोंमें लिखा है । * ( ४ ) सांख्यसप्तति — सांख्यसप्तति अथवा सांख्यकारिका ' षष्टितन्त्र ' के आधारपर आर्य मुनि ईश्वरकृष्णद्वारा लिखा गया है । इसमें मुख्य सत्तर कारिकाएँ हैं, इस कारण इसका नाम सांख्यसप्तति रखा गया है । इसपर वाचस्पति मिश्रद्वारा की हुई टीका ( १ ) ' सांख्यतत्त्वकौमुदी ' कहलाती है, ( २ ) ' गौड़पादभाष्य ' भी प्राचीन और प्रामाणिक है, किंतु ( ३ ) ' माठरवृत्ति ' सबसे प्राचीन मानी जाती है । ( ४ ) ' युक्ति दीपिका ', ( ५ ) ' जयमङ्गला ', ( ६ ) ' चन्द्रिका ' भी प्रसिद्ध टीकाएँ हैं । ( ५ ) सांख्यसूत्र — ये पाँच सौ सत्ताईस सांख्यसूत्र छः अध्यायोंमें विभक्त हैं । पहले अध्यायमें विषयका प्रतिपादन, दूसरेमें प्रधानके कार्योंका निरूपण, तीसरेमें वैराग्य, चौथेमें सांख्यतत्त्वोंके सुगम बोधके लिये रोचक आख्यायिकाएँ, पाँचवेंमें परपक्षका निरास और छठेमें सिद्धान्तोंका संक्षिप्त परिचय है । इसपर विज्ञानभिक्षुने ' सांख्यप्रवचनभाष्य ' लिखा है । सामान्यतया ये कपिल मुनिके बनाये हुए सूत्र माने जाते हैं और षडध्यायी सांख्यदर्शनके नामसे प्रसिद्ध हैं । इनके सम्बन्धमें कई आधुनिक विद्वानोंका विचार है कि ‘ यह सांख्यसप्तति ' के आधारपर लिखा हुआ उसके पिछले समयका ग्रन्थ है; क्योंकि इसमें बहुत - से सूत्र सांख्यकारिकासे लिये हुए प्रतीत होते हैं । शंकराचार्यने सांख्यकारिकाके अतिरिक्त इसके सूत्रोंको कहीं भी प्रमाणमें उद्धृत नहीं किया है । वाचस्पति मिश्रने, जिन्होंने अन्य सब दर्शनों और सांख्यकारिकाकी भी टीका की है, इस ग्रन्थमेंसे एक भी सूत्रको प्रमाणरूपमें नहीं दिया है । इससे सिद्ध होता है कि इन सूत्रोंके संग्रहकर्ता विज्ञानभिक्षु हैं और सम्भव है उनमेंसे बहुत - से सूत्र स्वयं उनके बनाये हुए हों, जैसा कि ‘ सांख्यप्रवचनभाष्य ' की भूमिकासे प्रतीत होता है । कालार्कभक्षितं सांख्यशास्त्रं ज्ञानसुधाकरम् । कलावशिष्टं भूयोऽपि पूरयिष्ये वचोऽमृतैः ॥ ( सा ० प्र ० भा ० भू ० ५ ) सांख्यज्ञान - चन्द्रमाको कालरूपी राहुने निगल लिया है । उसकी एक कला शेष रह गयी है, उसको फिर मैं अमृतरूपी वचनसे पूरा करूँगा । स्वयं विज्ञानभिक्षुने भी तत्त्वसमासको ही अपने सांख्यप्रवचनभाष्यका आधार माना है । जैसा कि उन्होंने अपनी भूमिकामें लिखा है— तत्त्वसमासाख्यं हि यत् संक्षिप्तं सांख्यदर्शनम् । तस्यैव प्रकर्षेणास्यां निर्वचनम् ॥ ‘ तत्त्वसमास नामी जो संक्षिप्त सांख्यदर्शन है, उसीको इस ( षडध्यायी दर्शन) में खोलकर बतलाया * कई विद्वानोका ऐसा विचार है कि षष्टितन्त्रके रचयिता व्यासभाष्यमें विशेषरूपसे उद्धृत हैं तथा षष्टितन्त्रका एक पञ्चशिखाचार्य हैं । किंतु पञ्चशिखाचार्यके सूत्र
श्लोक वार्षगण्याचार्यके नामसे भी मिलता है ।
( ७६ )
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चौथा प्रकरण ] षड्दर्शनसमन्वय * * [ सांख्यके मुख्य ग्रन्थ ] गया है । ' इसके विपरीत कई विद्वानोंने इसको प्रामाणिक और प्राचीन सांख्यदर्शन माना है । उनके विचारानुसार सांख्यसप्ततिसे इसमें सूत्र लिये गये हों, इस सम्बन्धमें कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता । हो सकता है कि इसी सांख्यसप्ततिसे वे सूत्र लिये गये हों- -अथवा किसी अन्य सांख्यग्रन्थसे इन दोनोंमें लिये गये हों । सांख्यसप्ततिको इनकी अपेक्षा अधिक प्रसिद्धि और लोक - प्रियता प्राप्त होनेका कारण इसके सरल और आर्या छन्दोंमें श्लोकबद्ध होना हो सकता है । इन सूत्रोंपर ' अनिरुद्धवृत्ति ' विज्ञानभिक्षुसे पूर्व समयकी मानी जाती है । सां ॰ प्र ० भा ० भू ० ५ से अभिप्राय इन सूत्रोंपर ' प्रवचनभाष्य ' लिखना ही हो सकता है, जिनका संकेत उनके शिष्य भावागणेशने अपने ' तत्त्वयाथार्थ्यदीपन ' में स्थान - स्थानपर किया है । वैसे भी विज्ञानभिक्षुको सांख्ययोगको पुनः प्रतिष्ठित करनेका सुयश प्राप्त है । इनके योगदर्शन व्यासभाष्यपर ‘ योग - वार्तिक ' और सांख्ययोगके आधारपर ब्रह्मसूत्रपर ' विज्ञानामृत ' भाष्य अति उत्तम और प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं । इनके अतिरिक्त इन्होंने ' सांख्य - सार ' तथा ' योग - सार ' में इन दर्शनोंके सिद्धान्तोंको संक्षिप्त और सरल ढंगसे प्रतिपादन किया है । किंतु इन सूत्रोंको कपिलमुनिप्रणीत कहना अत्यन्त भूल है; क्योंकि आधेयशक्तियोग इति पञ्चशिखि ( अ ० ५ सूत्र ३२ ) से इनका पञ्चशिखाचार्यके पश्चात् तथा अ ० ५ सूत्र ७ ९ में बौद्धोंका शून्यवाद, अ ० ५ सूत्र ८५ में वैशेषिकोंके ६ पदार्थ और अ ० ५ सूत्र ८६ में न्यायके १६ पदार्थोंका वर्णन होनेसे इनका वैशेषिक, न्याय और बौद्ध धर्मके पीछे बनाया जाना सिद्ध होता है I ( ६ ) श्वेताश्वतर - उपनिषद् और श्रीमद्भगवद्गीता भी सांख्य और योगके ही ग्रन्थ हैं । श्वेताश्वतरमें उसके आभ्यन्तररूप और गीतामें उसके आभ्यन्तररूप और सिद्धान्तोंके अतिरिक्त कार्यक्षेत्रमें व्यावहारिक रूपको विशेषताके साथ दर्शाया है । गीतामें योग और सांख्य इन ही दो निष्ठाओंका विशेष रूपसे वर्णन है । योगकी निष्ठामें गुणोंका किसी - न - किसी अंशमें सम्बन्ध रहता है । सांख्यकी निष्ठा तीनों गुणोंके सर्वथा परित्यागपूर्वक होती है । यथा निष्काम कर्मयोगमें, योगनिष्ठामें सारे कर्मों और उनके फलोंको ईश्वर ( जो त्रिगुणात्मक ब्रह्माण्डके सम्बन्धसे ब्रह्मकी संज्ञा है ) के समर्पण करके फलोंकी वासनाओंसे मुक्त कराया जाता है और सांख्यनिष्ठामें ' तीनों गुण ही ग्रहण और ग्राह्यरूपसे बर्त रहे हैं, आत्मा अकर्त्ता हैं ' इस भावनासे कर्तापनका अभिमान हटाया जाता है तथा योगनिष्ठामें अन्यादेशसे और सांख्यनिष्ठामें अहंकारादेश तथा आत्मादेशसे ब्रह्मका निर्देश किया जाता है इत्यादि । श्रीमद्भागवतके तीसरे स्कन्धमें जो भगवान् कपिलने अपनी माताको उपदेश दिया है, वह भी सांख्यकी उच्चकोटिकी शिक्षा है ।
कपिलमुनिप्रणीत तत्त्वसमास ( प्राचीन सांख्य दर्शन ) की व्याख्या ।
अथातस्तत्त्वसमासः ॥ १ ॥
अब ( ( दुःखोंकी निवृत्तिका साधन तत्त्वोंका यथार्थ ज्ञान है ) इसलिये तत्त्वोंको संक्षेपसे वर्णन करते हैं । व्याख्या – संसारमें प्रत्येक प्राणीकी यह प्रबल इच्छा पायी जाती है कि ' मैं सुखी होऊँ, दुःखी कभी न होऊँ । ' किंतु सुखकी प्राप्ति बिना दुःखकी निवृत्ति असम्भव है; क्योंकि दुःखकी निवृत्तिका नाम ही सुख ( ७७ )
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चौथा प्रकरण ] * पातञ्जलयोगप्रदीप * [ तत्त्वसमास जडतत्त्व है । इसलिये सुखके अभिलाषियोंको दुःखकी जड़ काट देनी चाहिये । दुःखकी जड़ अज्ञान है । जितना अधिक अज्ञान होगा, उतना ही अधिक दुःख होगा । जितना कम अज्ञान होगा, उतना ही कम दुःख होगा । ज्ञान और अज्ञान तत्त्वोंके सम्बन्धसे हैं । जिस तत्त्वका अज्ञान होगा, उसीसे दुःख होगा । जिस तत्त्वका जितना यथार्थज्ञान होता जायगा, उससे उतनी ही दुःखनिवृत्तिरूप सुखकी प्राप्ति होती जायगी । जब सारे तत्त्वोंका यथार्थ ज्ञान हो जायगा तो सारे तत्त्वोंसे अभयरूप सुखका लाभ होगा । इसलिये सारे तत्त्वोंका यथार्थ ज्ञान ही सारे दुःखोंकी जड़का काटना है । अतः सारे तत्त्वोंका संक्षेपसे विचार आरम्भ किया जाता है । जडतत्त्व संगति — दुःख - निवृत्तिकी इच्छा और प्रयत्न करनेवालेका दुःख स्वाभाविक धर्म नहीं हो सकता, क्योंकि यदि ऐसा होता तो वह उसकी निवृत्तिका यत्न ही नहीं करता । इससे सिद्ध होता है कि दुःख - निवृत्तिकी इच्छा करनेवालेसे भिन्न उससे विपरीत धर्मवाला कोई दूसरा तत्त्व है, जिसका स्वाभाविक धर्म दुःख और जडता है । यदि यह कहा जाय कि दुःखनिवृत्तिकी इच्छा और प्रयत्न करनेवाला ही एक अकेला चेतनतत्त्व है । उससे भिन्न कोई दूसरा तत्त्व नहीं है । दुःखकी प्रतीति अविद्या, अज्ञान, भ्रम अथवा मायासे होती है तो ये अविद्या, अज्ञान, भ्रम और माया भी स्वयं किसी भिन्न तत्त्वके अस्तित्वको सिद्ध करते हैं जिसके ये स्वाभाविक धर्म हैं । यदि यह कहा जाय कि यह चेतन तत्त्वसे अतिरिक्त और कुछ नहीं है, तो यह स्वाभाविक धर्म होनेसे दुःखकी कभी भी निवृत्ति नहीं हो सकेगी और उसके लिये किसी भी प्रकारका यत्न करना व्यर्थ होगा । यदि ऐसा माना जाय कि उस चेतनतत्त्वको ठीक - ठीक न जाननेसे यह भ्रम इत्यादि हो रहा है । यथार्थरूप जाननेसे सब भ्रम और दुःखोंकी निवृत्ति हो जाती है, तो इससे भी किसी भिन्न तत्त्वकी सिद्धि होती है; क्योंकि जानना किसी दूसरी वस्तुका होता है । सबके जाननेवालेको किससे जाना जा सकता है । यथा ' विज्ञातारमरे केन विजानीयात् । ' इससे सिद्ध होता है कि चेतनतत्त्वसे भिन्न एक जडतत्त्व है । उसका यथार्थरूप समझानेके लिये
अगले दो सूत्रोंमें उसको चौबीस अवान्तर भेदोंमें विभक्त करके दिखलाते हैं ।
अष्टौ प्रकृतयः ॥ २ ॥
षोडश विकाराः ॥ ३ ॥
( जडतत्त्वके प्रथम दो भेद प्रकृति और विकृति हैं, उनमेंसे ) आठ प्रकृतियाँ हैं — प्रधान अर्थात् मूल प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार और पाँच तन्मात्राएँ अर्थात् शब्द - तन्मात्रा, स्पर्श - तन्मात्रा, रूप - तन्मात्रा, रस - तन्मात्रा और गन्ध - तन्मात्रा; और सोलह विकृतियाँ हैं — पाँच स्थूलभूत आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी और ग्यारह इन्द्रियाँ अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ — श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण और कर्मेन्द्रियाँ — वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा और ग्यारहवाँ मन । व्याख्या – जिसके आगे कोई नया तत्त्व उत्पन्न हो उसको प्रकृति कहते हैं, अर्थात् जो किसी तत्त्वका उपादान कारण हो और जिसके आगे जो कोई नया तत्त्व उत्पन्न हो उसको विकृति - विकार अर्थात् नये ( ७८ )