प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 101–110
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 101–110
पृष्ठ 101
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्व संयोगविभाग-परत्वापरत्यबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेष प्रयत्नाश्चेति कण्ठोक्ताः सप्तदश । स्वयं सूत्रकार के द्वारा कथित ये सत्रह गुण हैं-( १ ) रूप, ( २ ) रस, ( ३ ) गन्ध, ( ४ ) स्पर्श ( ५ ) संख्या, ( ६ ) परिमाण, ( ७ ) पृथक्त्व ( ८ ) संयोग, ( ६ ) विभाग, ( १० ) परत्व ( ११ ) अपरत्व, ( १२ ) बुद्धि, ( १३ ) सुख, ( १४ ) दुःख ( १५ ) इच्छा, ( १६ ) द्वेष और ( १७ ) प्रयत्न । न्यायकन्दली चक्षुषः सामर्थ्यम्, तद्भावभावित्वात् यथालोकाभाव एव त्वन्मते । नन्वेवं तहि सूत्रविरोधः " द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधर्म्याद्भाभावस्तमः " इति? न विरोधः, भाभावे सति तमसः प्रतीतेर्भाभावस्तम इत्युक्तम् । ईश्वरोऽपि बुद्धिगुणत्वादात्मैव न तु षड्गुणाधिकरणश्चतुर्द्दशगुणाधि-करणाद् गुणभेदेन भिद्यते, मुक्तात्मभिर्व्यभिचारात् । गुणा रूपादयः कण्ठोक्ता सूत्रकारेण कथिता रूपरसेत्यादिना । मानते हुए भी तेज के अभावरूप अन्धकार के प्रत्यक्ष में आलोक से निरपेक्ष चक्षु को ही कारण मानते हैं । ( प्र ० ) अन्धकार को अगर तेज का अभाव न मानें तो सूत्र का विरोध होगा, क्योंकि उसमें कहा है कि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों के उत्पत्तिक्रम से अन्धकार की उत्पत्ति का क्रम भिन्न है, अतः भा ' अर्थात् तेज का अभाव ही ' तम ' है । ( उ ० ) तेज का अभाव होने पर हो अन्धकार की प्रतीति होती है अतः सूत्रकार ने ' भामावस्तमः ' ऐसा औपचारिक प्रयोग किया है । ईश्वर भी बुद्धियुक्त होने के कारण आत्मा ही है । बुद्धि प्रभृति छः गुणों से युक्त परमात्मा चौदह गुणों से युक्त जीवाश्मा से गुणभेद के कारण भिन्नजातीय द्रव्य नहीं हैं. क्योंकि ऐसा ( नियम ) मानने पर मुक्त जीव में व्यभिचार होगा? । ' गुणा: ' अर्थात् रूपादि गुण ' कण्ठोक्ताः ' अर्थात् सूत्रकार महर्षि कणाद के द्वारा " रूप-रसगन्धस्पर्शाः, संख्याः, परिमाणानि पृथक्त्वम्, संयोगविभागौ, परत्वापरत्वे, बुद्धयः, सुख-१. ' आयुवै घृतम्, ' ' लाङ्गलम् ' ' जीवनम्, इत्यादि प्रयोग जैसे कारण और कार्य्यं को एक समझकर लक्षणा के द्वारा होते हैं, वैसे ही प्रकृत में भी तेज के अभाव की प्रतीति के कारण में अन्धकार के अभेद का आरोप कर अन्धकार पद की ' भाभाव ' में लक्षणा के द्वारा सूत्रकार ने ' भाभाव ' अर्थात् तेज के अभाव को ' तम ' कहा है । २. अभिप्राय यह है प्रयोग है । किन्तु जीव और कि पहिले " नवैव द्रव्याणि " ऐसा अवधारणात्मक ईश्वर के परस्पर भिन्न द्रव्य होने के कारण द्रव्य दश हो For Private And Personal
पृष्ठ 102
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] चशब्दसमुच्चिताश्च सप्तैवेत्येवं चतुर्विंशतिर्गुणाः । भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् २७ गुरुत्वद्रवत्व स्नेहसंस्कारादृष्टशब्दाः एवं ( १ ) गुरुत्व, ( २ ) द्रवत्व, ( ३ ) स्नेह, ( ४ ) संस्कार, अदृष्ट ( अर्थात् ( ५ ) धर्म्म, ( ६ ) अधर्म्म ) और ( ७ ) शब्द, ये सात गुण सूत्रस्थ ' च ' शब्द से संग्राह्य हैं । इस प्रकार मिलाकर गुण चौबीस प्रकार के हैं । न्यायकन्दली ' च ' शब्देनात्रानुक्ता गुणत्वेन लोके प्रसिद्धा गुरुत्वादयः सप्त समुच्चिताः । एवं चतुर्विंशतिरेव गुणाः । ये तु शौय्यौदाकारुण्यदाक्षिण्यौग्र्यादयः, तेऽत्रैवान्त-भवन्ति । शौर्यो बलवतोऽपि परस्य पराजयाय प्रत्युत्साहः । स च प्रयत्नविशेष एव । सततं सन्मार्गवर्तिनी बुद्धिरौदार्य्यम् । परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् । दु: खे, इच्छाद्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणा: " ( १ | १ | ६ ) इस सूत्र की रचना के द्वारा रूपादि सत्रह गुण ही रूपादि ' ' शब्दों के द्वारा सष्ट रूप से कहे गये हैं । जो गुण इस सूत्र के द्वारा साक्षात् नहीं कहे गये हैं और लोक से गुणत्व के नाम से व्यवहृत हैं, वे सूत्र के ' च ' शब्द से सूचित किये गये हैं । इस प्रकार कण्ठोक्त १७ और ' च ' शब्द से समुचित सात, दोनों को मिलाकर गुण चौबीस ही हैं । शौर्य, औदार्य कारुण्य, दाक्षिण्य, ओग्य प्रभृति जितने भी गुणशब्द से लोक में व्यवहृत हैं, वे सभी इन्हीं गुणों में अन्तर्भूत हो जाते हैं । अपने से अधिक बलशाली शत्रु को पराजित करने के उत्साह को ' शौर्य ' कहते हैं, जो वस्तुतः प्रयत्न विशेष ही है । बराबर सन्मार्ग में रहनेवाली ' बुद्धि ' ही औदार्य्यं कही जाती है । दूसरों के दुःख को नाश जाते हैं । आत्मत्वरूप से जीव और ईश्वर को एक द्रव्य नहीं मान सकते, क्योंकि जीव में चौदह गुण हैं एवं ईश्वर में केवल छः । तस्मात् द्रव्यविभागवाक्य का ' आत्मा ' शब्द जीव या ईश्वर किसी एक का ही बोधक हो सकता है । जिससे कि उक्त अवधारण का प्रयोग असङ्गत हो जाता है । इसी आक्षेप का समाधान " ईश्वरेऽपि " इत्यादि सन्दर्भ से देते हैं । समाधान ग्रन्थ का अभिप्राय है कि चौदह गुण जीव के लक्षण नहीं हैं, क्योंकि इतने गुण मुक्त आत्माओं में नहीं रहते । आत्मा के सभी विशेष गुणों का अत्यन्त विनाश हो मुक्ति है । तस्मात् मुक्त जीवों में संख्या, परिणाम, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व और अपरत्व ये सात सामान्य गुण ही रहेंगे, क्योंकि मुक्ति के समय बुद्धि सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न और भावनाख्य संस्कार जीव के ये सात विशेष गुण नष्ट हो जाते हैं । अतः द्रव्यविभागवाक्य का ' आत्मा ' शब्द चौदह गुणों से युक्त केवल जीव का ही बोधक नहीं है । किन्तु आत्मत्वजाति से युक्त द्रव्य का बोधक है! यह जाति बुद्धि से युक्त जीव और ईश्वर दोनों में है, क्योंकि आत्मत्वरूप से दोनों अभिन्न हैं । अत: “ नवैव द्रव्याणि " यह अवधारण ठीक है । For Private And Personal
पृष्ठ 103
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २८ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-उत्क्षेपणापक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि पञ्चैव कर्माणि । गमनग्रहणाद् भ्रमणरेचनस्यन्दनोद्वज्वरनतिक पतननमनोअमनादयो गमनविशेषा न जात्यन्तराणि । ( १ ) उत्क्षेपण, ( २ ) अपक्षेपण ( ) आकुञ्चन, ( ४ ) प्रसारण और ( ५ ) गमन ये पाँच ही कर्म्म हैं । गमन पद से यह कहना है कि भ्रमण, रेचन, स्यन्दन, ऊर्ध्वज्वलन, तिर्य्यक्पतन, नमन और उन्नमन प्रभृति कर्म्म भी गमनविशेष ही हैं, दूसरी जाति के नहीं । न्यायकन्दली तत्त्वाभिनिवेशिनी बुद्धिर्दाक्षिण्यम् । औग्र्यमात्मन्युत्कर्षप्रत्यय इत्येवमादिः । अदृष्टशब्देन धर्माधर्म्मयोरुपसङ्ग्रहः । संस्कार इति । स च वेगस्य भावनायाः स्थितिस्थापकस्य चाभिधानम् । नन्वेवं तर्ह्याधिक्यम्? न, संस्कारत्वजात्यपेक्षया वेगभावनास्थितिस्थापकानामेकत्वात् । एवं तहि न चतुविंशतित्वम्? अदृष्टत्वजात्यपेक्षया धर्माधर्म्मयोरेकत्वात् । न, अदृष्टत्वजात्यभावात् । निर्गु -णेष्वपि गुणेष्वसाधारणधर्म्मयोगित्वेनोपचाराच्चतुर्विंशतिरिति व्यवहारः । कर्माणि विभजते- उत्क्षेपणोति । कियन्ति तानि? तत्राह - पञ्चैवेति । ननु भ्रमणादयोऽपि सन्ति? कथं पञ्चैवेत्यवधारणमत आह - गमनग्रहणादिति । करने की ' इच्छा ' ही कारुण्य है । यथार्थं वस्तु को ग्रहण करनेवाली ' बुद्धि ' ही दाक्षिण्य है । अपने में उत्कर्ष की बुद्धि ही ओग्य है । ' अदृष्ट ' शब्द से धर्म और अधर्म - दोनों अभिप्रेत हैं । ' संस्कार ' शब्द से वेग, भावना और स्थितिस्थापक तीनों संग्राह्य हैं । ( प्र ० ) इस प्रकार गुण तो चौबीस से अधिक हो जायेंगे? ( उ ) नहीं, संस्कारत्व जाति है और इस रूप से वेगादि तीनों संस्कार एक ही हैं । ( प्र ० ) इस प्रकार भी गुण चौबीस ही नहीं होंगे, क्योंकि ( वेगादि की तरह ) अष्टत्वजाति रूप से धर्म और अधर्म्म ये दोनों भी एक हो जाएँगे? ( उ ० ) नहीं, क्योंकि अदृष्टत्व नाम की कोई जाति नहीं है । गुणों में गुण के न रहने पर भी ' गुण चोबीस हैं ' यह गौण व्यवहार होता है । जैसे कि पृथिवीत्वादि नौ धम्मों के सम्बन्ध से " द्रव्य पृथिव्यादि भेद से नो हैं " यह व्यवहार होता है, उसी प्रकार रूपादिगत असाधारण धर्मस्वरूप रूपत्वादि चौबीस धर्मों के सम्बन्ध से रूपादि गुणों में चौबीस संख्या का गोण व्यवहार होता है । ( इससे रूपादि गुणों में संख्या गुण की सत्ता की सम्भावना नहीं है । ) " उत्क्षेपण " इत्यादि से कर्म पदार्थ का विभाग किया गया है । वे कितने हैं? इस प्रश्न का उत्तर है ' पञ्चैव ', अर्थात् कर्म्म पाँच ही हैं । ( प्र ० ) भ्रमणादि और For Private And Personal
पृष्ठ 104
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् २६ सामान्य प्रशस्तपादभाष्यम् द्विविधं परमपरञ्चानुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । तत्र परं सत्ता, महाविषयत्वात् । सा चानुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव । ( १ ) पर और ( २ ) अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का है । वे ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' अर्थात् विभिन्न वस्तुओं में एक आकार की प्रतीति के कारण हैं । उनमें ‘ सत्ता ' पर सामान्य ही है, क्योंकि वह ' महाविषय ' अर्थात् और सभी सामान्यों से अधिक आश्रयों में विद्यमान है । सत्ता केवल सामान्य ही है ( विशेष नहीं ), क्योंकि वह केवल अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है, अर्थात् परस्पर भिन्न अपने न्यायकन्दली गमनग्रहणात् पञ्चैव कर्माणि । अत्रोपपत्तिमाह - भ्रमणरेचनस्यन्दनेत्यादि । यस्माद् भ्रमणादयोऽपि गमनविशेषा गमनप्रभेदा न जात्यन्तराणि तस्माद् गमन-ग्रहणेनैतेषामपि ग्रह्णात् पञ्चैवेत्यवधारणं सिद्धयतीत्यर्थः । सामान्यं कथयति - सामान्यं द्विविधमिति । द्वैविध्यमेव कथयति - परम-परं चेति । चोऽवधारणे, परमपरमेवेत्यर्थः । तस्य रूपं कथयति - अनुवृत्ति प्रत्ययकारणमिति । अत्यन्तव्यावृत्तानां पिण्डानां यतः कारणादन्योन्य-स्वरूपानुगमः प्रतीयते तत्सामान्यम् । किं तत्परं सामान्यमित्याह - परं सत्तेति । भी तो कर्म हैं? फिर ' कर्म्म पाँच ही हैं यह अवधारण असङ्गत है । इसी प्रश्न का समाधान ' गमनग्रहणात् ' इत्यादि से करते हैं । अर्थात् चूंकि गमनरूप कर्म का ग्रहण किया गया है, इसलिए कर्म्म पाँच ही हैं । ' भ्रमणरेचन ' इत्यादि से इसी में युक्ति देते हैं । चूँकि भ्रमणादि गमनत्व जाति के ही हैं, दूसरी जाति के कम्मं नहीं हैं, अतः ' गमन ' पद से भ्रमणादि कम्मों का भी संग्रह हो जाने से ' कम्मं पाँच ही हैं ' यह अवधारण ठीक है । " सामान्यं द्विविधम् " इत्यादि पक्तियों से अब ( अवसर प्राप्त ) सामान्य का निरूपण ' परमपरव ' इस वाक्य से करते हैं । ( १ ) पर और ( २ ) अपर ये दो प्रकार सामान्य के कहे गये हैं । इस वाक्य के ' च ' शब्द से इस ' अवधारण ' का बोध होता है कि सामान्य के पर और अपर भेद से दो ही प्रकार हैं । ' अनुवृत्तिप्रत्ययकारणम् ' इत्यादि से सामान्य पदार्थ का लक्षण कहते हैं ( अर्थात् ) अत्यन्त विभिन्न दो वस्तुओं में जिस एक वस्तु के रहने से एक आकार की प्रतीति होती है, उसी को ' सामान्य ' कहते हैं । वह ' पर ' सामान्य कौन सा १. जैसे कि एक घट दूसरे घट से भिन्न है, फिर भी उन दोनों में ये घट हैं ' एक आकार की प्रतीति होती है और पट में यह प्रतीति नहीं होती । इसका कारण सभी घटों में घटत्व नाम के सामान्य का रहना ही है । एवं घट और For Private And Personal
पृष्ठ 105
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३० न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-द्रव्यत्वाद्यपरम्, अल्पविषयत्वात् । तच्च व्यावृत्तेरपि हेतुत्वात् सामान्यं सद्विशेषाख्यामपि लभते । आश्रयों में एकाकारप्रतीति को उत्पन्न करती है । किसी भी प्रकार की व्यावृत्तिबुद्धि अर्थात् अपने विभिन्न आश्रयों में परस्पर भेदबुद्धि को उत्पन्न नहीं करती । द्रव्यत्वादि सामान्य सत्ता की अपेक्षा थोड़े आश्रयों में रहने के कारण ' अपर सामान्य ' हैं I ' द्रव्यत्वादि अनुवृत्तिप्रत्यय की तरह व्यावृत्तिप्रत्यय के भी कारण हैं, अत: वे सामान्य होते हुए ' विशेष ' भी कहलाते हैं । न्यायकन्दली अत्र युक्तिमाह - महाविषयत्वादिति । द्रव्यत्वाद्यपेक्षया बहुविषयत्वादित्यर्थः । सा चानुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव । द्रव्यत्वादिकं तु स्वाश्रयस्य विजाती-येभ्योऽपि व्यावृत्तेरपि हेतुत्वाद्विशेषोऽपि भवति । सत्ता तु स्वाश्रयस्यानुवृत्तेरेव हेतुस्तेन सामान्यमेव । यद्यप्येषा सामान्यादिभ्यो व्यावर्त्तते तथापि न तेभ्यः है? इस प्रश्न का समाधान ' परं सत्ता ' इस वाक्य से देते हैं । सत्ता ' पर ' सामान्य ही क्यों है? इसका हेतु ' महाविषयत्वात् ' इस ( पञ्चम्यन्त ) पद से दिखलाया है । अर्थात् ' सत्ता ' जाति द्रव्यत्वादि और जातियों से अधिक आश्रयों में रहती है । यह ( सत्ता रूप सामान्य ) केवल अनुवृत्ति- बुद्धि ( अनेक वस्तुओं में एकाकारता की बुद्धि ) का ही कारण है, अतः वह केवल ' सामान्य ' ही है ( विशेष नहीं ) । द्रव्यत्वादिरूप सामान्य ( विभिन्न द्रव्यों में एकाकारता-रूप अनुवृत्तिबुद्धि की तरह ) अपने आश्रयीभूत द्रव्यादि में गुणादि से व्यावृत्तिबुद्धि, अर्थात् द्रव्य गुणादि से भिन्न हैं, इस प्रकार की विभिन्नाकारता प्रतीति का भी कारण हैं, अतः द्रव्यत्वादि जातियाँ विशेष ' भी हैं । सत्ता तो अपने आश्रयीभूत द्रव्य, गुण और कर्म में " ये सत् हैं " इस प्रकार के अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है ( किसी भी व्यावृत्तिबुद्धि का नहीं ), अतः वह ' सामान्य ' ही है । ( प्र ० ) यद्यपि यह कह सकते हैं कि सत्ता जाति सामान्यादि पदार्थों में नहीं है ( क्योंकि उनमें कोई भी सामान्य नहीं है ), अतः ' सत्ता जाति ' द्रव्य, गुण, और कर्म इन तीनों में ' ये सत् हैं ' इस अनुवृत्तिबुद्धि की तरह ( सत्ताजातियुक्त ) द्रव्यादि-पदार्थ ( सत्ताशून्य ) सामान्यादि पदार्थों से भिन्न हैं, इस व्यावृत्तिबुद्धि के भी कारण हैं । ( इस युक्ति से सत्ता भी द्रव्यत्वादि सामान्य की तरह ' विशेष ' कहला सकती है ) तथापि सामान्यादि पदार्थों में भी भावत्व, अस्तित्वादि रूप सत्ता तो है ही, जिससे सामान्यादि पदार्थों में भी " ये सत् हैं " इस प्रकार की प्रतीति होती है । अतः सामान्यादि में जातिरूप सत्ता को सम्बन्ध न भी रहे, तथापि द्रव्यादि से सामान्यादि पदार्थों से भिन्नत्व प्रतीति का पट दोनों परस्पर भिन्न होते हुए भी दोनों में ' ये द्रव्य हैं ' । इस एक आकार की प्रतीति होती है । इसका भी कारण घट और पट में द्रव्यत्व नामक सामान्य का रहना ही है । For Private And Personal
पृष्ठ 106
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३१ स्वाश्रयं व्यावर्त्तयितुं शक्नोति । तेषामपि स्वरूपसत्तासम्बुद्धिसंवेद्यत्वात् । वस्त्वपेक्षया चानुवृत्तिहेतुत्वं विवक्षितम् तेनाभावाद्वयावृत्तिहेतुत्वेऽपि न दोषः । यत्प्रमाणेन प्रतीयते तत्रास्ति व्यवहारो लोकानां विपर्य्यये तु नास्तीति । तेन प्रमाणम्यैव सत्तेति केचित् । तदयुक्तम्, प्रमाणोत्पत्तेः प्राग् वस्तुनोऽसत्त्व-प्रसङ्गादसतश्च खरविषाणस्येव ग्राह्यत्वाभावादन्योन्यसंश्रयापत्तेश्च । सतः प्रमाणस्य ग्राहकत्वे सत्तायाः प्रमाणग्राह्यतालक्षणत्वे च ग्राहकस्य प्रमाणस्यापि ग्राहकान्तरानुसरणेनानवस्थापाताच्च । वह कारण नहीं हो सकती, ( क्योंकि सत्ता के सम्बन्ध से जिस प्रकार द्रव्य, गुण और कम्मं में ' ये सत् हैं ' यह प्रतीति होती है, उसी प्रकार सामान्यादि भावपदार्थों से ' भावत्व ' रूप सता के बल से ' ये सत् हैं ' इस प्रकार की भी प्रतीति होती है । अतः द्रव्यादिधम्मिक सत्त्व की प्रतीति में और सामान्यादिधम्मिक सत्त्व की प्रतीति में आकारगत कोई भेद नहीं है ) । ( प्र ० ) अभावों में किसी भी प्रकार की ' सत्त्व ' बुद्धि ( सत्ताजातिमूलक, या भावत्वमूलक ) नहीं होती है, अतः सत्ता जाति और किसी को न सही अपने आश्रयीभूत द्रव्यादि में अभाव-भिन्नत्वरूप व्यावृत्ति के बोध को तो उत्पन्न कर ही सकती है । अतः सत्ता जाति भी द्रव्य-स्वादि जातियों की तरह सामान्य और विशेष दोनों हो सकती हैं । ( उ ० ) नहीं, उक्त ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' शब्द का अर्थ है अनेक विभिन्न भावपदार्थों में एकाकारता की प्रतीति एवं ' व्यावृत्तिबुद्धि ' शब्द का अर्थ है एक या अनेक भावों में दूसरे भावपदार्थ से भिन्नत्व की बुद्धि | इसी व्यावृत्तिबुद्धि का कारण है ' विशेष ' । विशेष का यह लक्षण सत्ता जाति में नहीं है | अतः द्रव्यादि में अभावभिन्नत्व बुद्धि की प्रयोजक होने पर भी सत्ता सामान्य ही है, ' विशेष ' नहीं | ( प्र ० ) कोई कहते हैं कि वस्तुत: ' अस्तित्व ' ही ' सत्ता ' है । प्रमाण के द्वारा ज्ञात अर्थ में ही अस्तित्व की प्रतीति होती है । जिस वस्तु की प्रतीति प्रमाण के द्वारा नहीं होती, उसमें अस्तित्व की बुद्धि भी नहीं होती है । अतः ' प्रमाणगम्यत्व ' ( अर्थात् प्रमाण से ज्ञात होना ) ही ' सत्ता ' है । इस नाम की कोई अतिरिक्त जाति नहीं है । ( उ ० ) यह उक्ति असङ्गत है, क्योंकि इससे तो प्रमाण की प्रवृत्ति से पहले गदहे के सींग की तरह वस्तुओं की असत्ता माननी पड़ेगी । दूसरी बात यह है कि गदहे को सींग प्रभृति असत् वस्तुओं में प्रमाणों को प्रवृत्ति नहीं होती है । ' सत् ' घटादि वस्तुओं में ही प्रमाणों की प्रवृत्ति होती है । ( इससे यह for निकलता है कि ) वस्तु ' सत् ' तभी होगी, जब उसमें प्रमाण की प्रवृत्ति होगी । एवं. प्रमाणों की प्रवृत्ति सद्विषयों में ही होगी । अतः सत्व को प्रमाणगम्यत्वमूलक और प्रमाणों की प्रवृत्ति को सत्वमूलक मानना पड़ेगा, जिससे कि परस्पराश्रयत्व होगा । तीसरी बात है कि ' सत् ' प्रमाण ही वस्तुओं का ज्ञापक है, ' असत् ' प्रमाण नहीं । एवं ' सत्त्व ' को आपने For Private And Personal
पृष्ठ 107
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ उद्देश-अथ मतं न ब्रूमः प्रमाणसम्बन्धः सत्तेति, किन्तु प्रमाणसम्बन्धयोग्यं वस्तुस्वरूपमेव सत्ता । योऽपि सत्तासामान्यमिच्छति, तेनापि पदार्थस्वरूप-मभ्युपेयम्, नि: स्वभावे शशविषाणादौ सत्ताया असमवायात् । एवं चेत् तदेवास्तु, कि सत्तयेति । अत्रोच्यते, प्रत्येकं पदार्थस्वरूपाणि भिन्नानि कथं तेष्वेकाकारप्रतीति:? एकशब्दप्रवृत्तिश्च? अनन्तेषु सम्बन्धग्रहणाभावात् । अथ तेष्वेकं निमित्त-मस्ति? सिद्धं नः समीहितम् । यथा दृष्टैकगोपिण्डस्य पिण्डान्तरे पूर्व-रूपानुकारिणी बुद्धिरुदेति, नैवं महीधरमुपलभ्य सर्षपमुपलभमानस्य पूर्वाकारा-प्रमाणगम्यत्वरूप माना है, अत: ग्राहकीभूत प्रमाणों में सत्त्वसम्पादन के लिए दूसरे प्रमाण का अलवम्बन करना पड़ेगा । इस पक्ष में अनवस्था दोष भी अनिवार्य होगा । ( प्र ० ) प्रमाणों के सम्बन्ध को ही हम सत्ता नहीं कहते, किन्तु प्रमाणसम्बन्ध के योग्य वस्तु के ' स्वरूप ' अर्थात् असाधारण धर्म को ही उस वस्तु की ' सत्ता ' कहते हैं । जो कोई ' सत्ता ' नाम की अतिरिक्त जाति मानने की इच्छा रखते हैं, वे भी वस्तुओं के असाधारण-स्वभावरूप सत्त्व से शून्य खरगोश के सींग प्रभृति वस्तुओं में सत्ता जाति का समवाय नहीं मानते । अतः उस असाधारण धम्मं को छोड़कर सत्ता नाम की कोई जाति हो नहीं है । ( उ ० ) यह कहना भी कुछ ठीक नहीं है, क्योंकि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों के परस्पर भिन्न होते हुए भी तीनो में जो ' ये सत् हैं ' इस एक आकार की प्रतीति होती है, वह अनुपपन्न हो जाएगी, चूंकि द्रव्यादि तीनों व्यक्तियों के ' स्वरूप ' अर्थात् असा-धारण धर्म भिन्न भिन्न हैं । यह सत्त्व अपने अपने अभय को छोड़कर किसी दूसरे में नहीं रह सकते । फिर द्रव्यादि तीनों में रहनेवाली किसी एक वस्तु से उक्त एक आकार की प्रतीति होगी, एवं द्रव्यादि तीनों को समझाने के लिए जिस एक ही ' सत् ' शब्द की प्रवृत्ति होती है, वह भी अनुपपन्न हो जाएगी, क्योंकि व्यक्ति अनन्त हैं, उन सभी व्यक्तियों में शक्ति का ग्रहण ही असम्भव है । अगर उक्त अनुवृत्तिप्रत्यय के लिए अथवा शब्द के उक्त प्रयोग के लिए द्रव्यादि तीनों में रहनेवाले किसी एक कारण की कल्पना की जाय तो फिर इससे हमारा ही अभीष्ट सिद्ध होगा ( फलतः सत्ता जाति माननी ही पड़ेगी ) । प्रकार एक ( प्र ० ) जिस गाय को देखने के बाद दूसरी गाय को देखने पर इस दूसरी गाय में भी ' यह गाय है ' इस प्रकार की बुद्धि होती है, अतः सभी गायों में रहनेवाली एक गोत्व जाति की कल्पना करते हैं, उसी प्रकार से पर्वत को देखने के बाद सरसों को देखने पर दोनों में किसी एक आकार की बुद्धि नहीं होती, अतः इन दोनों में से किसी एक का धर्म्म दूसरे में नहीं है । For Private And Personal
पृष्ठ 108
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३३ वभासोऽस्तीति कुतोऽत्र सामान्यकल्पनेति चेत्? कि महीधरादिषु निखिल -रूपानुगमो नास्ति? उत मात्रयाऽपि न विद्यते? यदि निखिलरूपानुगमा-भावात् तेषु सामान्थप्रत्याख्यानम्? तर्हि गोत्वमपि प्रत्याख्येयम्, तयोः शाब-बाहुलेययोः सर्वथा साधर्म्याभावात् । अथ मात्रयाऽपि स्वरूपानुगमो नास्ति? तदसिद्धम्, सर्वेषामपि तेषामभावविलक्षणेन रूपेण तुल्यताप्रतिभासनात् । इयांस्तु विशेष: - गोपिण्डेषु झटिति तज्जातीयताबुद्धिः, भूयोऽवयवसामान्यानुगमात् । महीधरादिषु तु विलम्बिनी, स्तोकावयवसामान्यानुगमेन जातेरनुद्भूतत्वात्, यथा मणिकदर्शनाच्छरावे मृज्जातिबुद्धिः । एतेनार्थक्रियाकारित्वमपि सत्त्वं प्रत्युक्तम् असतोऽर्थक्रियाया अभा-अर्थक्रियायाश्चार्थक्रियापेक्षया वात्, अर्थक्रियायाञ्च सत्यां तस्य सत्त्वात्, सत्त्वेनानवस्थाने सर्वस्यासत्त्वप्रसङ्गाच्च । ( उ ० ) ( इस आक्षेप के समाधानार्थं यह पूछना है कि ) ( १ ) क्या पर्वतादि के सभी धर्म्म एक दूसरे में नहीं हैं? ( २ ) या पर्वतादि के कुछ धर्म एक दूसरे में नहीं है? अगर पहिला पक्ष मानें तो फिर गायों में भी " ये गायें हैं " इस प्रकार का अनुवृत्तिप्रत्यय नहीं होगा, क्योंकि प्रत्येक गाय में रहनेवाले शाबलेयत्वादि धर्म्म दूसरी गायों में नहीं हैं । अगर दूसरा पक्ष मानें तो हम कहेंगे कि यह असत्य है, क्योंकि अन्ततः भावभिन्नत्वरूप धर्मं तो पर्वत और सरसों दोनों में अवश्य ही प्रतीत होता है । इतना अन्तर अवश्य है कि एक गाय को देखने के बाद दूसरी गाय को देखने पर सादृश्य की बुद्धि शीघ्र उत्पन्न होती है । क्योंकि दोनों गायों के अवयवों में बहुत से सादृश्य हैं । किन्तु पर्वत और सर्षप के अवयवों में उतने सादृश्य नहीं हैं । अतः पर्वत को देखने के बाद सर्षप में सादृश्य की बुद्धि देर से उत्पन्न होती है । इससे इतना ही सिद्ध होता है कि पर्वत और सर्षप दोनों में रहनेवाली जाति परिस्फुट नहीं है । जैसे हड़िया को देखने के बाद पुरवे में मिट्टी में रहनेवाली पृथिवीत्व जाति की उप-लब्धि होती है । कोई ( बौद्ध ) कहते हैं कि ' अर्थक्रियाकारित्व ' ही ' सत्त्व ' है । किन्तु ' परस्पराश्रयत्व ' दोष से ग्रसित होने के कारण यह पक्ष भी असङ्गत ही है । शशविषाणादि असत् पदार्थों में सत्त्व इसलिए नहीं है कि उनमें अर्थक्रियाकारित्व नहीं है 1 । और उनमें अर्थक्रियाकारित्व इसलिए नहीं है कि वे ' सत् ' नहीं हैं । दूसरी बात है कि घटादि पदार्थों की सत्ता जिस अर्थक्रिया के अधीन है, उस अर्थक्रिया के सत्त्व की प्रयोजिका कोई दूसरी अर्थक्रिया नहीं है | अतः ( घटादि वस्तुओं के सत्त्व की प्रयोजिका ) अर्थक्रिया के असत् होने के कारण घटादि वस्तुओं की सत्ता ही उठ जाएगी । ५ For Private And Personal
पृष्ठ 109
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ उद्द ेश-द्रव्यत्वाद्यपरम्, द्रव्यत्वं गुणत्वं कर्म्मत्वञ्चापरम्, सत्तापेक्षयाल्प-विषयत्वादित्यर्थः, तथा द्रव्यत्वाद्यपेक्षया पृथिवीत्वादिकमपरम्, तदपेक्षया घटत्वादिकमपरम्, गुणत्वाद्यपेक्षया रूपत्वादिकमपरम्, कर्म्मत्वाद्यपेक्षया चोत्क्षेप-णत्वादिकं व्याख्येयम् । जलमुपलभ्य वह्निमुपलभमानस्य तदित्यनुगमाभावाद् द्रव्यत्वं नास्तीति केचित् । तदसारम् द्वयोरपि तयोः स्वप्राधान्येन प्रतीतिसम्भवात् स्वप्राधान्यप्रतीतिरेव द्रव्यत्वप्रतीतिः । उत्क्षेपणादिष्वपि चलनात्मकताप्रतीति-रस्ति, सैव च कर्म्मत्वप्रतीति: । रूपादिषु तु कृतसमयस्यानुवृत्तिप्रत्ययसम्भ-वाद् गुणत्वस्याप्रत्याख्यानम् । व्यक्तिग्रहणमिव समयग्रहणमपि तस्य प्रतीति-कारणम्, ब्राह्मणत्वस्येव योनिसम्बन्धज्ञानम् । तत्रापि विशुद्धब्राह्मणसन्ततिजस्यो-त्पत्तिमात्रानुबद्धमपि ब्राह्मणत्वमिन्द्रियपातमात्रेण क्षत्रियादिविलक्षणतया न गृह्यते, अत्यन्त व्यक्तिसौसादृश्येनानुद्भूतत्वात् । यदा तु मातापित्रोस्तत्पूर्वेषाञ्च वृद्धपरम्परया विशुद्धब्राह्मणत्वमवसितम्, तदा ब्राह्मणोऽयमिति प्रत्यक्षेणैव प्रतीयते । " द्रव्यत्वाद्यपरम् ” द्रव्यत्वादि जातियाँ अपर हैं । अर्थात् द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्व इत्यादि जातियाँ सत्ता की अपेक्षा ' अपर ' हैं । इसी प्रकार यह व्याख्या भी करनी चाहिए कि द्रव्यत्वादि जातियों की अपेक्षा पृथिवीत्वादि जातियाँ अपर ' हैं । पृथिवीत्वादि की अपेक्षा घटत्वादि जातियाँ अपर हैं । एवं गुणत्वादि सामान्यों की अपेक्षा रूपत्वादि सामान्य अपर हैं और कर्म्मत्वादि सामान्यों की अपेक्षा उत्क्षेपणत्वादि सामान्य अपर हैं । कोई कहते हैं कि जल की उपलब्धि के बाद वह्नि की उपलब्धि होने पर " यह वही है " इस प्रकार की ( प्रत्यभिज्ञात्मक ) प्रतीति नहीं होती है | अतः जलवह्नयादि साधारण द्रव्यत्व नाम की कोई जाति नहीं है । किन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि स्वतन्त्र-रूप से प्रतोति का विषय ही द्रव्य है । जल एवं वह्नि दोनों की ही स्वतन्त्ररूप से प्रतीति होती है । अतः अवश्य ही दोनों में रहनेवाली एक द्रव्यत्व जाति है । उत्क्षेप-णादि सभी क्रियाओं में चलनरूपत्व की प्रतीति होती है । चलनरूपत्व की प्रतीति हां वस्तुतः कर्मत्व की प्रतीति है ( अतः कर्मत्व जाति भी अवश्य है ) । रूपादि चौबीस गुणों में जिस व्यक्ति को ' गुण ' पद की शक्ति गृहीत है, उस व्यक्ति को रूपादि में भी अवश्य ही गुणत्व की प्रतीति होती है । अतः गुणत्व जाति का भी खण्डन नहीं कर सकते । सामान्य ( जाति ) की प्रतीति के लिए व्यक्ति के ज्ञान की तरह सामान्यवाचक शब्द की ( व्यक्ति में ) शक्ति का ज्ञान भी कारण है । जैसे ब्राह्मणत्व जाति के ज्ञान में योनिसम्बन्ध का ज्ञान कारण है । ब्राह्मणत्व जाति भी ब्राह्मणजातीय माता पिता से उत्पन्न व्यक्ति में उत्पत्ति के समय से ही सम्बद्ध रहती है, किन्तु क्षत्रियादि व्यक्तियों के अवयवों के साथ ब्राह्मण जातीय व्यक्तियों के अवयवों का अत्यन्त सादृश्य होने के कारण For Private And Personal
पृष्ठ 110
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३५ यथा हि सुविदितरत्नपरीक्षाशास्त्री रत्नजातिभेदं प्रत्यक्षतः प्रत्येति, नापरः । न च तावता रत्नजातिभेदो नास्ति, न च तत्प्रत्यक्षमप्रत्यक्षम् । यच्चोक्तम् - स्त्रीणां स्वभावचपलानां विशुद्धिर्दुरवबोधैवेति । तदसत् अभियुक्तैः सुरक्षितानां सुकर-स्तदवबोधः कथितश्च तासां बहुविधो रक्षणोपाय इत्यास्तां तावत्प्रसक्तानुप्रसङ्गः । तच्च द्रव्यत्वादिकं स्वविषयस्य विजातीयेभ्यो व्यावृत्तेरपि हेतुत्वा-द्विशेषाख्यां विशेषसंज्ञामपि लभते न केवलमनुवृत्तिप्रत्यय हेतुत्वात् सामान्यसंज्ञां लभते, व्यावृत्तेरपि हेतुत्वाद्विशेषसंज्ञामपि लभत इत्यपिशब्दयोरर्थः । किमुक्तं स्यात्? द्रव्यत्वादिषु सामान्य शब्दो मुख्यः, अनुवृत्तिहेतुत्वस्य सामान्यलक्षणस्य सम्भवात्, विशेषशब्दश्च भाक्तः, स्वाश्रयो विशिष्यते सर्वतो व्यवच्छिद्यते येन स विशेष इति लक्षणस्यात्राभावात् । इदन्तु लक्षणमन्त्य विशेषेष्वस्ति । केवल प्रथम दर्शन में ही क्षत्रियादि व्यक्तियों से विलक्षण रूप से ब्राह्मणों की प्रतीति नहीं होती है । क्योंकि ब्राह्मणत्व जाति व्यक्ति में सम्बद्ध रहने पर भी उद्भूत नहीं है । जब यह ज्ञान हो जाता है कि यह व्यक्ति ब्राह्मण माता पिता से उत्पन्न है, तब उस व्यक्ति के प्रत्यक्ष के साथ ही ब्राह्मणत्व जाति का भी प्रत्यक्ष हो जाता है । जैसे कि रत्नों की परीक्षा में निपुण व्यक्ति रत्नों की जातियों को प्रत्यक्ष ही देखता है । एवं उस परीक्षा से अनभिज्ञ व्यक्ति रत्नों की जातियों को समझाने पर भी नहीं समझ पाता है । किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि रत्नों की भिन्न जातियाँ ही नहीं हैं या उस निपुण पुरुष का प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष ही नहीं है । ( प्र ० ) कोई कहते हैं कि स्त्रियाँ चञ्चल होती हैं, अतः तन्मूलक वंशविशुद्धि का ज्ञान दुर्लभ है । ( उ ० ) किन्तु यह सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि आयों से सुरक्षित स्त्रियों की सन्तानों में विशुद्धि का बोध कठिन नहीं है । स्त्रियों की रक्षा के बहुत से उपाय शास्त्रों में कहे गये हैं । अब इस प्रसङ्ग से आये विषय को यहीं छोड़ देना चाहिये । द्रव्यत्वादि जातियाँ अपने आश्रयों को भिन्नजातीय वस्तुओं से पृथक् रूप से भी समझाती हैं, अतः वे ' विशेष ' नाम से भी कही जाती हैं । अपने विभिन्न आश्रयों में एका-कारप्रतीतिरूप अनुवृत्तिप्रत्यय - जनक होने से केवल ' सामान्य ' शब्द से ही व्यवहृत नहीं होती हैं । यही दोनों ( व्यावृत्तेरपि विशेषाख्यामपि ) ' अपि ' शब्दों का अभिप्राय है । इससे frond क्या निकला? यही कि द्रव्यत्वादि जातियाँ ' सामान्य ' शब्द के मुख्य अर्थ हैं । क्योंकि " अनुवृत्तिप्रत्यय हेतुत्व " रूप सामान्य का सम्पूर्ण लक्षण उनमें है । विशेष ' शब्द का उनमें लाक्षणिक प्रयोग होता है, क्योंकि जो अपने आश्रय व्यक्ति को और सभी पदार्थों से भिन्न रूप से समझावे वही ' विशेष ' है ", विशेष का यह सम्पूर्ण लक्षण उनमें नहीं है, किन्तु वह अन्त्य विशेषों में ( ही ) है । For Private And Personal