प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 111–120

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 111–120

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषाः । ते खल्वत्यन्तव्यावृत्ति-हेतुत्वाद्विशेषा एव । सभी नित्य द्रव्यों में रहनेवाले ' अन्त्य ' ही ' विशेष ' हैं । वे ( अपने आश्रय को और पदार्थों से भिन्नत्व बुद्धिरूप ) व्यावृत्ति के ही कारण हैं । अतः वे ' विशेष ' ही हैं ( ' अपने आश्रयों को परस्पर समानरूप से न समझाने के कारण ' सामान्य ' शब्द के गौण अर्थ भी नहीं हैं ) । न्यायकन्दली नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषा इति । नित्यद्रव्येष्वेव वर्त्तन्त एव ये विशेषा इति । नित्यद्रव्येष्वेवेति द्रव्यगुणकर्मसामान्यानां व्यवच्छेदः । द्रव्यगुणकर्माणि द्रव्येष्वेव वर्त्तन्ते, न नित्येष्वेवेति । सामान्यानि तु न द्रव्ये-bda | न नित्येष्वेव वर्त्तन्त एवेति बुद्धिशब्दादीनां व्यवच्छेदः, तेषां समस्त-नित्यद्रव्यप्राप्त्यभावात् । ननु कि विशेषा एव किं वा द्रव्यत्वादिवदुभयरूपा? इति । तत्राह - ते खल्विति । खलुशब्दो निश्चये, नित्यद्रव्यवृत्तयो ये विशेषास्ते विशेषा एव निश्चिता न तु सामान्यान्यपि भवन्तीत्यर्थः । अत्यन्तं सर्वदा, व्यावृत्ते-रेव स्वाश्रयस्येतरस्माद्वयवच्छेदस्यैव हेतुत्वात् कारणत्वादिति । यथा चेदं तथोपरिष्टादुपपादनीयम् । जो ( पदार्थ ) केवल सभी नित्य द्रव्यों में रहें और अवश्य ही रहें वे ही ' विशेष ' हैं । ' नित्य द्रव्यों में ही रहें ' ( नित्यद्रव्येष्वेव ) इस अंश से द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों में विशेष के लक्षण की अतिव्याप्ति की शङ्का मिट जाती है, क्योंकि वे यद्यपि द्रव्यों में ही रहते हैं, तथापि नित्य द्रव्यों में ही नहीं रहते ( किन्तु अनित्य द्रव्यों में भी रहते हैं ) । सामान्य पदार्थ केवल द्रव्य में ही नहीं रहता है, ( गुणादि में भी रहता है, अतः सामान्य एव ' इस वाक्य से शब्द में विशेष लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है ) । ' नित्यद्रव्येष्वेव वर्त्तत और बुद्धि इन दोनों में विशेष लक्षण की अतिव्याप्ति वारित होती है; क्योंकि शब्दादि यद्यपि नित्य द्रव्यों में ही रहते हैं, किन्तु सभी नित्य द्रव्यों में नहीं रहते । क्या ये ' विशेष ' ही हैं? या द्रव्यत्यादि की तरह सामान्य और विशेष दोनों ही हैं? इस संशय को ' ते खलु ' इत्यादि वाक्य से हटाते हैं । यहाँ ' खलु ' शब्द ' निश्चय ' अर्थ का बोधक है । अभिप्राय यह है कि नित्य द्रव्यों में रहनेवाले ये ' विशेष ' निश्चित रूप से केवल ' विशेष ' ही हैं, ये कभी सामान्य नहीं होते । क्योंकि ये बराबर अपने आश्रय को और पदार्थों से भिन्न रूप में ही समझाते हैं । यह जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह आगे दिखाया जाएगा । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३७ अयुत सिद्धाना माघार्याधारभूतानां यः सम्बध इहप्रत्ययहेतुः स समवायः । आधार और आधेयरूप अयुत सिद्धों के ' इहप्रत्यय ' अर्थात् इस आधार में यह आधेय है, इस बुद्धि का कारण जो सम्बन्ध वही समावाय है न्यायकन्दली समवायस्वरूपं निरूपयति - अयुतसिद्धानामिति । युतसिद्धिः पृथक्सिद्धिः, पृथगवस्थितिरुभयोरपि सम्बन्धिनो: परस्परपरिहारेण पृथगाश्रयाश्रयित्वम्, सा ययोर्नास्ति तावयुतसिद्धौ तयोः सम्बन्धः समवायः । यथा तन्तुपटयो: । यद्यपि तन्तवः पटव्यतिरिक्ताश्रये समवयन्ति तथाप्युभयोः परस्पर-परिहारेण पृथगाश्रयाश्रयित्वं नास्ति, पटस्य तन्तुब्वेवाश्रयित्वात् । यत्र तु द्वयोरपि सम्बन्धिनो: परस्परपरिहारेण व्यतिरिक्ताश्रयाश्रयित्वम्, तत्र युतसिद्धिः, यथा त्वगिन्द्रियशरीरयोः । शरीरं हि त्वगिन्द्रियपरिहारेण पृथगाश्रये स्वावयवे समाश्रितम्, तेनानयोः संयोगो न समवाय: । नित्यानान्तु युतसिद्धिः पृथग-' अयुत सिद्धानाम् ' इत्यादि पङ्क्तियों से ' समवाय ' के स्वरूप का निरूपण करते हैं । ' युतसिद्धि ' शब्द से पृथक्सद्धि अर्थात् अलग अलग स्वतन्त्र रूप से रहना अभिप्रेत है | कहने का तात्पर्य है कि जिन दो सम्बन्धियों का आश्रयत्व या आश्रितत्व एक दूसरे को छोड़कर किसी तीसरी की स्वतन्त्ररूप से विद्यमानता ही “ युतसिद्धि " है । वस्तु में भी रहे उन दो वस्तुओं इस प्रकार की युतसिद्धि जिन दो वस्तुओं की न रहे वे दोनों वस्तु ' अयुतसिद्ध ' हैं । इसी प्रकार की ( अयुत सिद्धि ) दो वस्तुओं का सम्बन्ध समवाय है । जैसे सूत और कपड़े का । द्यपि तन्तु पट से भिन्न अपने अंशु नाम के अवययों के साथ भी सम्बद्ध है । फिर भी परस्पर एक दूसरे को छोड़कर वे न कहीं आश्रित हैं एवं न कोई उनमें आश्रित हैं । जिन दो वस्तुओं में परस्पर एक दूसरे से असम्बद्ध होकर स्वतन्त्र रीति से किसी तीसरी वस्तु का आश्रयत्व या आश्रितत्व है, उन दो वस्तुओं की स्वतन्त्र रूप से विद्य-मानता ही ' युतसिद्धि ' है, जैसे कि त्वगिन्द्रिय और शरीर की विद्यमानता । शरीर त्वगिन्द्रिय को छोड़कर स्वतन्त्र रूप से अपने अवयवों में रहता है, अतः त्वगिन्द्रिय और शरीर का सम्बन्ध संयोग ही है, समवाय नहीं । नित्य दो पदार्थों की ' युतसिद्धि ' १. अभिप्राय यह है कि यद्यपि तन्तु पट से भिन्न अपने अंशु नाम के अवयवों में भी सम्बद्ध है, अतः तन्तु और पट में युतसिद्धि की शङ्का ठीक है । किन्तु पट चूँकि तन्तुओं में ही आश्रित है | अतः पट का आश्रयरूप तन्तु अंशु प्रभृति अन्य पदार्थों में सम्बद्ध भी हों तथापि पट को छोड़कर कहीं सम्बद्ध नहीं हो सकते । अतः पट समवाय से युत तन्तुओं की स्वतन्त्र सिद्धि सम्भव नहीं है । For Private And Personal

पृष्ठ 113

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १५ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ उद्देश-स्थितिः, पृथग्गमनयोग्यता, सा ययोर्नास्ति तावयुतसिद्धौ तयोर्यः सम्बन्धः स समवायः, यथाकाशद्रव्यत्वयोरिति । अयुतसिद्धयोः सम्बन्ध इत्युच्यमाने धर्मस्य सुखस्य च यः कार्य्यकारणभावलक्षणः सम्बन्धः, सोऽपि समवायः प्राप्नोति तयोरात्मैकाश्रितयोर्युतसिद्ध्यभावात् । तदर्थमाघार्य्याधारभूतानामिति पदम्, न त्वाकाशशकुनि सम्बन्धनिवृत्त्यर्थम्, अयुतसिद्धपदेनैव तस्य निर्वात्ततत्वात् । एवमप्याकाशस्याकाशपदस्य च वाच्यवाचकभावः समवायः स्यात्, तन्निवृत्त्यर्थ-हिप्रत्यय हेतुरिति । वाच्यवाचकभावे हि तस्माच्छब्दात् तदर्थो ज्ञायते न त्विहेद-मिति । आधाधारभूतानामिह प्रत्ययहेतुरिति कुण्डबदरसम्बन्धो न व्यवच्छिद्यते, तदर्थमयुतसिद्धानामिति । अत्र केचिदयुतसिद्धिपदं विकल्पयन्ति - किं युतौ न सिद्धौ? आहो-raayat सिद्धौ? यदि युतौ न सिद्धौ कस्तयोः सम्बन्धः, धम्मणोरभावात् । अर्थात् पृथक् सिद्धि का अर्थ है दोनों में परस्पर एक दूसरे को छोड़कर जाने को यह ' योग्यता ' । यह जिन नित्य दो वस्तुओं में नहीं है, उनका सम्बन्ध भी समवाय है, जैसे आकाश और द्रव्यत्व का अगर इतना ही कहें कि " अयुतसिद्ध दो वस्तुओं का सम्बन्ध ही समवाय है " तो पुण्य और सुख इन दोनों का जो कार्यकारणभाव सम्बन्ध है, उसमें समवाय लक्षण को अतिव्याप्ति होगी, क्योंकि वे दोनों केवल आत्मा में ही रहने के कारण युतसिद्ध नहीं हैं, अतः समवाय के लक्षणवाक्य में " आधाधारभूतानाम् ” यह पद देना आवश्यक है । किन्तु बाज पक्षी और आकाश के संयोग में अतिव्याप्ति वारण के लिए " आधार्थ्याधारभूतानाम् ” यह पद नहीं है । क्योंकि इस अतिव्याप्ति का वारण ' अयुत सिद्ध ' पद से ही हो जाता है । इसी प्रकार आकाश पद और आकाशरूप अर्थ इन दोनों के वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध में अतिव्याप्ति वारण के लिए प्रकृत समवाय लक्षण में इहप्रत्ययहेतुः यह पद दिया गया है । क्योंकि आकाश पद से आकाशरूप अर्थ को हो प्रतीति होती है । इससे यह प्रतीति नहीं होती कि ' आकाशरूप अर्थ में आकाश पद है ' या ' आकाशपद में आकाशरूप अर्थ है । ( प्रकृत समवाय लक्षण में ) ' आधार्य्याधारभूतानाम् ' एवं ' इहप्रत्ययहेतु: ' इन दोनों पदों का प्रयोग करने पर भी कुण्ड और बदर के संयोग सम्बन्ध में अतिव्याप्ति नहीं हटती है, अतः ' अयुत सिद्धानाम् ' यह पद है । यहाँ कुछ लोग अयुतसिद्ध पद के अर्थ के प्रसङ्ग में इन विरुद्ध पक्षों को उठाते हैं कि अयुतसिद्ध पद का ( १ ) ' युती न सिद्धी ' एवं ' अयुतो सिद्धौ ' इन दोनों में कौन सा विग्रह प्रकृत में इष्ट? इनमें प्रथम पक्ष तो इस लिए ठीक नहीं है कि प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों अगर असिद्ध हैं तो फिर यह समवाय सम्बन्ध For Private And Personal

पृष्ठ 114

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३६ अथात सिद्ध, तथापि कः सम्बन्धोऽपृथक् सिद्धत्वादेव । भिन्नयोहि सम्बन्धो यथा कुण्डबदरयोरिति । तदपरे न मृषन्ति । नह्यस्यायमर्थो युतौ न सिद्धौ न निष्पन्नाविति, असतो: समवायानभ्युपगमात् । नाप्यस्यायमर्थः - अयुतौ सिद्धाविति, ह्येकमेव वस्तु स्यानोभयम्, परस्परात्मकत्वाभावलक्षणत्वादुभयरूपतायाः । न च तदेकं वस्तु परमार्थतः परस्परविलक्षणेन रूपेण तयोराकारयोः प्रतिभासनात् । विलक्षणाकारबुद्धिवेद्यत्वस्यैव भेदलक्षणत्वात्, अन्यथा भेदाभेदव्यवस्थानुपपत्तेः । तस्मान्न स्वरूपाभेदोऽप्ययुतसिद्धिः, किन्तु अयुत सिद्धानामिति परस्परपरिहारेण पृथगाश्रयानाश्रितानामित्यर्थः । तथा च सति सम्बन्धो नानुपपन्नः, स्वरूपभेदस्य सम्भवात्, भिन्नयोश्च परस्परोपश्लेषस्य दहनाय: पिण्डयोरिव विना सम्बन्धेनास-म्भवात् । इयांस्तु विशेष: -- वह्निरुत्पत्तेः पश्चादयः पिण्डेन सह सम्बद्ध्यते, इह तु स्वकारणसामर्थ्यादुपजायमानमेव तत्र सम्बद्ध्यते, यथा छिदिक्रिया छेद्येनेत्यलम् । किसके साथ किसका होगा? ( क्योंकि सम्बन्ध से पहिले सम्बन्धियों की सिद्धि आव-श्यक है ), अगर " जिन दोनों की पृथक् सिद्धि न हो वे अयुतसिद्ध हैं ' यह दूसरा पक्ष मानें तो भी असङ्गति है ही क्योंकि जिन दो वस्तुओं की अलग अलग सिद्धि न हो, पृथक् सत्ता न रहे, उन दोनों का सम्बन्ध कैसा? दो भिन्न वस्तुओं का ही सम्बन्ध होता है, जैसे कुण्ड और बैर का । इन दोनों ही आक्षेपों को दूसरे सम्प्रदाय नहीं मानते । इन लोगों का कहना है कि ' युती न सिद्धौ ” इस विग्रह वाक्य का यह अर्थ नहीं है कि " जिन दो वस्तुओं की ( पृथक् ) सत्ता न रहे, वे प्रयुतसिद्ध हैं ", क्योंकि हम लोग असत् वस्तुओं का समवाय नहीं मानते । “ अयुतौ न सिद्धौ ” इस विग्रहवाक्य के अनुसार यह अर्थ भी नहीं है कि * जिन दो वस्तुओं की अभिन्नरूप से सिद्धि हो वे अयुतसिद्ध हैं ", क्योंकि एक स्वरूप की वस्तु एक ही होगी, दो नहीं । दो वस्तुओं के दोनों असाधारण धर्मों का एक दूसरे में अभाव ही ' उभयरूपत्व ' शब्द का अर्थ है । समवाय सम्बन्ध के अनुयोगी और प्रतियोगी रूप वे दोनों अयुतसिद्ध अभिन्न भी नहीं हैं, क्योंकि परस्पर विलक्षण रूप से दोनों की यथार्थ प्रतीति होती है । विलक्षण रूप से ज्ञात होना ही वस्तुओं का ( परस्पर ) भेद है । अगर विलक्षण रूप से ज्ञात होने पर भी वस्तुओं में भेद न मानें तो संसार से भेद और अभेद की बात ही उठ जाएगी । अयुतसिद्ध शब्द का अर्थ यह है कि जो अनेक वस्तुएँ परस्पर एक दूसरे को छोड़कर न रहें वे ' अयुत सिद्ध ' हैं । ( अयुत सिद्ध शब्द के ) इस प्रकार के अर्थ में सम्बन्ध की कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि इस प्रकार के अयुत सिद्धों के स्वरूप For Private And Personal

पृष्ठ 115

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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् ४० प्रशस्तपादभाष्यम् एवं धम्मैर्विना धर्मिणामुद्देशः कृतः । न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir [ उद्देश-ग्रन्थेन कहे जा सकते | अतः गये? इस प्रश्न का इस प्रकार धर्मों को छोड़ कर केवल धम्मियों के नामों का उल्लेख किया गया है । ननु किमर्थं षडेव पदार्था उद्दिष्टा नापरे? तेषामेव भावात् तदन्येषा-मभावाच्च । तदभावश्च सर्वैः प्रमाणैरनुपलभ्यमानत्वाच्छाविषाणवत् । षण्णां सामान्यलक्षणं विधिप्रत्ययविषयत्वम् । व्यावृत्तन्तु लक्षणम् - यथा गुणाश्रयो द्रव्यम् । सामान्यवानगुणः संयोगविभागयोरनपेक्षो न कारणं गुणः । एक-द्रव्यमगुणं संयोगविभागयोरनपेक्षकारणं कर्म । अनुवृत्तिप्रत्ययकारणं सामान्यम् । अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतुविशेषः । अयुतसिद्धयोराश्रयाश्रयिभावः समवाय इति । अनुद्दिष्टेषु धम्म धर्मा न शक्यन्ते वक्तुम्, अतो धर्माणामुद्देशं प्रक्रम-यितुं सङ्गत प्रदर्शयति - एवमिति । एवं पूर्वोक्तेन भी भिन्न भिन्न हो सकते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड का परस्पर सम्मिलन बिना संयोग रूप सम्बन्ध के असम्भव है, उसी प्रकार किन्हीं भी विभिन्न दो पदार्थों का बिना किसी सम्बन्ध के परस्पर सम्मिलन असम्भव है । अन्तर केवल इतना ही है कि उत्पन्न होने के बाद वह्नि अयःपिण्ड के साथ सम्बद्ध होता है, किन्तु समवाय का प्रतियोगी अपने कारणों के बल से अपने अनुयोगी में सम्बद्ध ही उत्पन्न होता है जैसे कि काटने की क्रिया काटे जानेवाली वस्तु के साथ सम्बद्ध ही उत्पन्न होती है । इस विषय में इतना ही विचार पर्याप्त है । ( प्र ० ) छः पदार्थों का ही प्रतिपादन क्यों किया? और पदार्थों का क्यों नहीं? ( उ ० ) इसलिए कि पदार्थ उतने ही हैं, उससे अधिक नहीं इन छ: पदार्थों से भिन्न पदार्थों का अभाव इसलिए है कि वे किसी भी स्वीकृत प्रमाण से उपलब्ध नहीं हैं । जैसे कि खरहे की सींग । छ: पदार्थों का सामान्य लक्षण यह है कि किसी प्रतियोगी की अपेक्षा के बिना भावत्वरूप से ज्ञात होना! प्रत्येक पदार्थ का औरों में न रहनेवाला लक्षण इस प्रकार है— ( १ ) गुणों का आश्रय द्रव्य है । ( २ ) जो सामान्य ( जाति ) से युक्त हो, गुणों से सर्वथा रहित हो, संयोग और विभाग का स्वतन्त्र कारण न हो वही गुण है । ( ३ ) जो एक समय में एक ही द्रव्य में रहे, गुणों से सर्वथा शून्य हो, एवं संयोग और विभाग का स्वतन्त्र कारण हो वही कर्म है । ( ४ ) अपने विभिन्न आश्रयों में एकाकारता प्रतीतिरूप अनुवृत्तिप्रत्यय का कारण ' जाति ' है । ( ५ ) अपने आश्रय में औरों से भिन्नत्व बुद्धिरूप व्यावृत्तिप्रत्यय का कारण ' विशेष ' है । ( ३ ) अयुत सिद्धों के आधाराधेयभाव का नियामक सम्बन्ध ' समवाय ' है । जब तक धम्म न कहे जायें तब तक उनके धर्म नहीं पदार्थों के उद्देश के बाद पदार्थ के धर्म्म अर्थात् साधर्म्य क्यों कहे

पृष्ठ 116

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 116 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् षण्णामपि पदार्थानामस्तित्वाभिधेयत्वज्ञेयत्वानि । ४.१ ( द्रव्यादि ) छहों पदार्थों का ( १ ) अस्तित्व, ( २ ) अभिधेयत्व और ( ३ ) ज्ञेयत्व ये तीन साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली धर्मान् परित्यज्य धर्मिणामुद्देशः कृतः, धम्मणां संज्ञामात्रेण सङ्कीर्त्तनं कृतमिदानीं धर्मा उद्दिश्यन्त इति भावः । यद्यपि पूर्वं द्रव्यादीनां विभागः कृतस्तथाप्युद्देशः कृत इत्युक्तम्, विभागस्य नामधेयसङ्कीर्त्तनमात्रेणोद्देशेऽन्तर्भावात् । धर्माः षट्पदार्थेभ्यो न व्यतिरिच्यन्ते, किन्तु त एव अन्योन्यापेक्षया धर्मा धम्मिणश्च भवन्तीति । तथापि तेषां धम्मिरूपतया परिज्ञानार्थं पृथगुद्देशं करोति षण्णामपीति । अस्तित्वं स्वरूपवत्त्वम्, षण्णामपि साधर्म्यम्, यस्य वस्तुनो यत् स्वरूपं तदेव तस्यास्तित्वम् 1 । अभिधेयत्व-मप्यभिधानप्रतिपादनयोग्यत्वम्, तच्च वस्तुनः स्वरूपमेव । भावस्वरूपमेवावस्था-भेदेन ज्ञेयत्वमभिधेयत्वञ्चोच्यते । आश्रितत्वञ्च परतन्त्रतयोपलब्धि:, न समवायलक्षणा वृत्तिः समवाये तदभावात् । इदञ्चाश्रितत्वं चतुर्विधेषु परमाणुषु आकाशकाल -समाधान सङ्गति प्रदर्शन के द्वारा ' एवम् ' इत्यादि पङ्क्ति से दिखलाते हैं । ' एवम् ' पहिले कहे हुये सन्दर्भ से. ' धर्मैविना ' धर्मों को छोड़कर ' धम्मिणामुद्देशः कृतः ' अर्थात् धर्मियों को ही केवल उनके नाम के द्वारा कहा है, अब उनके धर्मों को उनके नाम से कहते हैं । यद्यपि पहिले के ग्रन्थों से पदार्थों का विभाग भी किया है, फिर भी ' उद्देशः कृतः ' यही वाक्य कहा है, क्योंकि नामों के द्वारा पदार्थों के कथन रूप उद्देश में ही विभाग का भी अन्तर्भाव हो जाता है । यद्यपि धर्म भी इन छः पदार्थों के ही अन्तर्गत हैं, तथापि वे ही यथासम्भव अपने में एक दूसरे के धम्मं और धर्मी कहलाते हैं, फिर भी धर्मी रूप से उनको समझाने के लिए ‘ षण्णाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अलग से उनको कहते हैं । ' अस्तित्व ' शब्द का अर्थ है ' स्वरूप ', अर्थात् वस्तुओं का अपना असाधारण रूप ही अस्तित्व है । यह ' अस्तित्व ' द्रव्याणि छहों पदार्थों में रहनेवाला धर्म है । ' अभिधेयत्व ' है अभिधान, अर्थात् शब्द से कहे जाने की क्षमता, वह भी वस्तुओं का वस्तुओं का यह स्वरूप ही अवस्थाओं के भेद से अभिधेयत्व कहा जाता परतन्त्र रूप से ज्ञात होना ही ' आश्रितत्व ' कहीं रहना ( आश्रितत्व शब्द का अर्थ ) नहीं है, शब्द का अर्थ स्वरूप ही है । ज्ञयत्व प्रभृति शब्दों से शब्द का अर्थ है । समवाय सम्बन्ध से क्योंकि समवाय कहीं पर भी समवाय सम्बन्ध से नहीं रहता है । पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों पदार्थों के परमाणुओं ६ For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्य वैधर्म्य -प्रशस्तपादभाष्यम् आश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः । द्रव्यादीनां पञ्चानां समवायित्वमनेकत्वञ्च । नित्य द्रव्यों को छोड़कर और सभी पदार्थों का आश्रितत्व साधर्म्य है । द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन पाँच पदार्थों के समवायित्व और अनेकत्व ये दो साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली इ - अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति । दिगात्ममन: सु नास्तीत्याह-ये तु धर्मान् व्यतिरिक्तानिच्छन्ति तेषामेकस्मिन् समस्तवस्तुव्यापिन्य-स्तीतिप्रत्यय हेतावस्तित्वे कल्पिते द्रव्यादिषु सत्तावैयर्थ्यम् । अथास्तित्वं प्रतिवस्तु भिद्यते तदा तत्कल्पनावैयर्थ्यम्, सत्तायाः स्वरूपसत्तायाश्च सदिति प्रत्ययोपपत्तेः येषान्तु भावस्वरूपमेवास्तित्वं न तेषां व्यर्था सत्ता, स्वरूपस्यानुवृत्तिप्रत्यय हेतुत्वा-भावात् । नाप्यस्तित्वमनर्थकं निःस्वरूपे सत्तायाः समवायाभावादित्युभयमुपपद्यते । द्रव्यादीनां विशेषान्तानां साधर्म्य । समवायित्वं साधयति समवायलक्षणा वृत्तिः । अनेकत्वं परस्परविभिन्नत्वमितरेतरव्यावृत्तं स्वरूपमेव । में, तथा आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन इन नौ नित्य द्रव्यों में ( इतने ही द्रव्य नित्य हैं ) यह ' आभितत्व ' नहीं है, अतः ' अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः " यह वाक्य कहा गया है । जो समुदाय व्यक्तिभेद से धम्मों को भिन्न ही मानना चाहते हैं ( वे भी अनेक किन्तु ) सभी वस्तुओ में एक प्रकार की नाम का धर्म उन्हें भी मानना ही पड़ेगा, सत्त्व प्रतीति के लिए सत्ता ' जाति की वस्तुओं में रहनेवाले और धर्मों को न भी मानें, ' अस्ति ' प्रतोति को उत्पन्न करनेवाला ' अस्तित्व ' किन्तु ऐसा मानने पर द्रव्यादि तीन पदार्थों में ही कल्पना व्यर्थ हो जाएगी । अगर अस्तित्व धम्मं को प्रतिव्यक्ति भिन्न मानें तो फिर इस प्रकार के अस्तित्व की कल्पना ही व्यर्थ हो जाती है, क्योंकि सत्ता ' जाति एवं तत्तद्व्यक्तिगत तद्वयक्तित्व ( रूप स्वरूपसत्ता ) से ही ' सत्प्रतीति ' उपपन्न हो जाएगी । जो कोई ' अस्तित्व ' को वस्तुओं का स्वरूप ही मानते हैं, उनके मत में भी ' सत्ता ' जाति की कल्पना व्यर्थ नहीं है, क्योंकि ( बिना सत्ता जाति माने ) भिन्न रूप से प्रतीत होनेवाले द्रव्यादि तीन पदार्थों में एक आकार की सत्त्व की प्रतीति नहीं हो सकेगी । अस्तित्व की कल्पना भी व्यर्थ नहीं है, क्योंकि अपने अपने व्यक्तिगत स्वरूप ( अस्तित्व ) से शून्य वस्तुओं में सत्ता जाति का समवाय भी सम्भव नहीं है, अतः सत्ता जाति और सभी प्रकार की वस्तुओं में ' अस्ति ' प्रतीति का कारण अस्तित्व, इन दोनों को ही मानना आवश्यक है । 1 द्रव्य से लेकर विशेष तक के पाँच पदार्थों के साधर्म्य का उपपादन करते हैं । ' समवायित्व ' शब्द का अर्थ है समवाम रूप सम्बन्ध, ( अर्थात् ) समवाय सम्बन्ध से कहीं For Private And Personal

पृष्ठ 118

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 118 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् गुणादीनां पञ्चानामपि निर्गुणत्वनिष्क्रियत्वे । ४३ द्रव्यादीनां त्रयाणामपि सत्तासम्बन्धः, सामान्य विशेष-गुण से लेकर समवाय तक अर्थात् गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इन पाँच पदार्थों के निर्गुणत्व और निष्क्रियत्व साधर्म्य हैं । द्रव्यादि तीन वस्तुओं के अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीन पदार्थों के ये पाँच साधर्म्य हैं - ( १ ) सत्ता का सम्बन्ध, ( २ ) सामन्यवत्त्व, ( ३ ) विशेष-वत्त्व ( अर्थात् पर और अपर दोनों जातियों का सम्बन्ध ), ( ४ ) इस शास्त्र के सङ्केत न्यायकन्दली द्रव्यादीनामित्युक्ते समवायोऽपि गृह्येत, तदर्थं पञ्चानामित्युक्तम् । पञ्चाना-मित्युक्ते च केषामिति न ज्ञायते तदर्थं द्रव्यादीनामिति । गुणादीनां समवायान्तानां साधर्म्यमाह - गुणादीनामिति । निर्गुणत्वं गुणाभावविशिष्टत्वम्, निष्क्रियत्वं क्रियाभावविशिष्टत्वम्, यथा भावोऽभावस्य विशेषणं स्वविशिष्टप्रत्ययजनना देवमभावोऽपि । तथा चोपनिबद्धमघटं भूतलमिति । भावाभावयोरसम्बन्धात् कथमभावो विशेषणमिति चेदस्ति तावदयं विशिष्ट-प्रत्ययः, तद्दर्शनात् सम्बन्धमपि कल्पयिष्यामः । यदि सम्बद्धमेव विशेषणं मन्यसे । रहना । ' अनेकत्व ' शब्द का अर्थ है विभिन्नत्व, वह परस्पर एक दूसरे में न रहनेवाला उन वस्तुओं का स्वरूप ही है । ' द्रव्यादीनाम् ' केवल इतना कह देने से समवाय का भी ग्रहण हो जाता, अतः ' पञ्चानाम् ' यह पद है । केवल ' पञ्चानाम् ' इतना ही कहने से ' कौन पाँच ' यह समझ में नहीं आता, अतः द्रव्यादीनाम् ' यह पद है । ' गुणादीनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ से गुण से लेकर समवाय तक के पाँच पदार्थों का साधर्म्य कहते हैं । ' निर्गुणत्व ' शब्द का अर्थ है गुणों का अभाव और ' निष्क्रियत्व ' शब्द का अर्थ हैं । क्रियाओं का अभाव । जिस प्रकार भाव ' अपने से युक्त अभाव प्रतीति का जनक होने से अभाव का विशेषण होता है, उसी प्रकार एवं उसी हेतु से अभाव भी भाव का विशेषण हो सकता है | एवं उसी के अनुकूल ' अघटं भूतलम् ' इत्यादि विशिष्टप्रतीति के जनक प्रयोग भी होते हैं । ( प्र ० ) भाव और अभाव दोनों ही परस्पर विरोधी हैं, अतः उन दोनों में परस्पर सम्बन्ध असम्भव है, एवं दोनों में परस्पर सम्बन्ध न रहने से विशेष्यविशेषणभाव सुतराम् असम्भव है । ( उ ० ) उक्त कथन ठीक नहीं है, क्योंकि भाव विशिष्ट अभाव की, एवं अभाव विशिष्ट, भाव की दोनों ही प्रतीतियाँ अवश्य हैं । अगर परस्पर सम्बद्ध दो वस्तुओं में से ही एक को विशेष्य और दूसरे को विशेषण मानना हो तो फिर उक्त विशिष्ट प्रतीतियों के बल से भाव और अभाव इन दोनों में भी किसी अनुकूल सम्बन्ध की कल्पना करनी ही पड़ेगी । For Private And Personal

पृष्ठ 119

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 119 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् ववम्, स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वम्, धर्माधर्मकत्वञ्च । [ साधम्यंवैध रूप अभिधावृत्ति के द्वारा ' अर्थ ' शब्द के द्वारा समझा जाना और ( ५ ) धर्मा-धर्म्मकर्तृत्व । न्यायकन्दली द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तासम्बन्धः सत्तया सामान्येन सबन्ध: समवायरूपो द्रव्यगुणकर्म्मणां साधर्म्यम् । यथा चैतेषु सत्तासम्बन्धस्तथोपपादितम् । इदन्त्विह निरूप्यते - कि सत्तासम्बन्धः सतोऽसतो वा? सतश्चेत् प्राक् सत्तासम्बन्धात् नेवासावर्थ इति व्यर्था सत्ता? अथासतः सम्बन्धः? खरविषाणादिष्वपि सत्ता स्यात् । नित्येषु तावत्पूर्वापरभावानभ्युपगमः । अनित्येषु प्रागसत एव सत्ता, कारणसामर्थ्यात् । न च खरविषाणादिष्वतिप्रसङ्गः, तदुत्पत्तौ कस्यचित् साम-र्थ्याभावात् । अन्यदपि साधर्म्यं द्रव्यादीनां त्रयाणां कथयति - सामान्य-विशेषवत्त्वञ्चेति । अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यविशेषा द्रव्यत्वादयस्तैः सह सम्बन्धो द्रव्यादीनाम्, स च समवाय एव । " द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तासम्बन्धः " अर्थात् सत्ता नाम की जाति के साथ समवाय नाम का सम्बन्ध द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों का साधर्म्य है । इन तीनों में सत्ता जाति का सम्बन्ध किस प्रकार है? यह कह चुके हैं ( प्र ० ) अब यहाँ विचार करना है कि सत्ता जाति ' सत् ' अर्थात् पहिले से विद्यमान वस्तुओं के साथ सम्बद्ध होती है? या असद्वस्तुओं के साथ? अगर सत्ता सद्वस्तुओं के साथ सम्बद्ध होती है तो फिर सत्ता जाति की कल्पना ही व्यर्थ हो जाती है, क्योंकि सत्ता सम्बन्ध के बिना भी वे सत् हैं ही । अगर असत् वस्तुओं के साथ सत्ता सम्बद्ध होती है तो फिर गदहे के सींग प्रभृति पदार्थों की भी सत्ता माननी पड़ेगी । ( उ ० ) नित्य वस्तुओं में तो पहिले पीछे की कोई बात ही नहीं उठती है । अनित्य वस्तुओं के प्रसङ्ग में यह कहना है कि पहिले से अविद्यमान वस्तुओं के साथ ही कारणों के ( विशिष्ट ) बल से सत्ता सम्बद्ध होती है । गदहे के सींग प्रभृति अलीक पदार्थों की आपत्ति का भी प्रसङ्ग नहीं आता है, क्योंकि किसी भी वस्तु में उनके उत्पादन का बल ही नहीं है । ' सामान्यविशेषवत्त्वश्व ' इत्यादि से द्रव्यादि तोन पदार्थों के और भी साधर्म्य कहते हैं । द्रव्यत्वादि जातियाँ अपने विभिन्न आश्रयों में ' द्रव्यम् ' इस एक आकार की ( अनुवृत्ति ) बुद्धि का कारण होने से ' सामान्य ' हैं एवं अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप में समझाने के कारण ' विशेष ' भी हैं । सामान्य एवं विशेष इन दोनों शब्दों से समझी जानेवाली द्रव्यत्वादि जातियों के साथ द्रव्यत्वादि तीनों वस्तुओं का सम्बन्ध है । वह सम्बन्ध समवाय ही है । For Private And Personal

पृष्ठ 120

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली II स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वञ्चेति । वैशेषिकैः स्वयं व्यवहाराय यः सङ्केतः कृतोऽस्मिन् शास्त्रे ' अर्थशब्दाद् द्रव्यगुणकर्माणि प्रतिपत्तव्यानि ' इति, तेन द्रव्यादीनि त्रीणि निरुपपदेनार्थशब्देनोच्यन्ते । धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वञ्चेति । धर्माधर्मोत्पत्तिनिमित्तत्वं त्रयाणाम्, यथा हि भूमिरेकैव दीयमानापहियमाणा च धर्माधर्म्मयोः कारणम् । एकः संयोगो द्वयोः कारणम्, यथा कपिलास्पर्शो नरास्थिस्पर्शश्च । एवं कम्प्युभयकारणम्, यथा तीर्थगमनं शौण्डिकगृहगमनञ्च, एवमन्यदप्यूह्यम् । धर्माधर्म्म कर्तृत्वमिति त्वप्रत्ययेन धर्माधर्म्मजननं प्रति तेषां निजा शक्तिरुच्यते । ननु जातिरपि तयोः कारणम्? न तस्याः स्वाश्रयव्यवच्छेदमात्रेण चरितार्थत्वात् । स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वञ्च ' अर्थात् वैशेषिक शास्त्र के आचार्यों ने सङ्केत किया है कि ' अर्थ ' शब्द से द्रव्यादि समझे जायँ । इस सङ्केत के बल से विशेषण से शून्य केवल ' अर्थ ' शब्द से द्रव्यादि तीन ही समझे जाते हैं । ( इस प्रकार वैशेषिक शास्त्र के सङ्केत सम्बन्ध से ' अर्थ ' शब्दवत्ता द्रव्यादि तीन पदार्थों में है ) अतः स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्व द्रव्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य है । ' धर्माधर्मकर्तृत्वच ' अर्थात् द्रव्यादि तीनों पदार्थों में धर्म और अधर्म्म दोनों की कारणता है, एक ही भूमि जब किसी को दी जाती है, तब वह धर्म का कारण होती है, वही भूमि जब किसी से छीनी जाती है, तब अधर्म का कारण होती है - इसी तरह कपिला गो का स्पर्श ( गुण ) धर्म का एवं मनुष्य की अस्थि का स्पर्श ( गुण ) अधर्म का कारण है । इसी प्रकार तीर्थगमन क्रिया से धर्म और मद्य बेचनेवाले के गृह में जाने की क्रिया से अधर्म होता है । इसी प्रकार और स्थलों में भी कल्पना करनी चाहिए । ' धर्माधर्मकर्तृत्वश्च ' इस वाक्य प्रयुक्त ' व ' प्रत्यय से द्रव्यादि तीनों वस्तुओं में धर्म और अधर्म के उत्पादन करने की अपनी शक्ति कही गई है । ( प्र ० ) ' जाति भी तो उन दोनों का कारण है? ( उ ० ) जाति धर्म और अधर्म का कारण नहीं है, क्योंकि वह अपने आश्रय को विजातीय वस्तुओं से भिन्न समझाकर ही चरितार्थं हो जाती है, ( अर्थात् ) उक्त शब्द से धर्म और अधर्म का साक्षात् कारणत्व ही विवक्षित है, ( उक्त धर्माधर्म्म ) के तो ब्राह्म-दि व्यक्ति ही कारण हैं । जाति का काम वहाँ इतना ही है कि ब्राह्मणादि से भिन्न-जातीय व्यक्तियों से प्रकृत धम्मं और अधर्म की उत्पत्ति का प्रतिषेध करे, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है । १. प्रश्न का अभिप्राय है कि द्रव्यादि तीनों पदार्थों की तरह जाति भी धर्म और अधर्म का कारण है, क्योंकि ब्राह्मणों के लिए विहित क्रिया के अनुष्ठान से क्षत्रि-For Private And Personal