प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 91–100

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 91–100

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ उद्देश-यस्य वस्तुनो यो भावस्तत् तस्य तत्त्वम् । साधारणो धर्म्मः साधर्म्यम्, असाधारण धम्म वैधर्म्यम् । साधर्म्यवैधयें एव तत्त्वं साधर्म्यवैधर्म्यतत्त्वम्, तस्य ज्ञानं निःश्रेयसहेतुः । विषयसम्भोगजं सुखं तावत् क्षणिकविनाशि दुःखबहुलं स्वर्गादिपदप्राप्यमपि सप्रक्षयं सातिशयश्च । तथा च कस्यचित् स्वर्गमात्रमपरस्य स्वर्गराज्यम् । अतस्तदपि सततं प्रच्युतिशङ्कया परसमुत्कर्षोपतापाच्च दुःखाक्रान्तं न निश्चितं श्रेयः । आत्यन्तिकी दु: खनिवृत्तिरसह्यसंवेदन निखिलदुःखोपरमरूपत्वा-दपरावृत्तेश्च निश्चितं श्रेयः । तस्य कारणं द्रव्यादिस्वरूपज्ञानम् । एतेन तत्प्रयुक्तं यदुक्तं मण्डनेन - " विशेषगुणनिवृत्तिलक्षणा मुक्तिरुच्छेदपक्षान्न जिस वस्तु का जो ' भाव ' है वही उसका ' तत्त्व ' है । ( अनेक वस्तुओं में रहनेवाले एक ) साधारण धर्म्म को ' साधर्म्य ' कहते हैं । ( प्रत्येक पदार्थ में ही रहनेवाले ) असाधारण धर्म्म को ' वैधर्म्य ' कहते हैं । साधर्म्य और वैधर्म्य रूप जो तत्त्व है. वही इस ' साधर्म्य वैधर्म्यतत्त्व ' शब्द का अर्थ है । इसी का तत्त्वज्ञान निःश्रेयस का कारण है । सांसारिक विषयों के उपभोग से होनेवाला सुख क्षणमात्र में विनष्ट हो सकता है और अपनी अपेक्षा बहुत अधिक दुःखों से घिरा हुआ है । स्वर्गपद से व्यवहृत होनेवाला सुख भी विनाशशील है और न्यूनाधिक भाव-युक्त है । जैसे किसी को स्वर्ग मिलता है और किसी को उसका अधिपत्य ( स्वाराज्य ) । अतः वह ( स्वर्गरूप ) सुख भी स्वर्ग से गिरने की आशङ्का से उत्पन्न दुःख और दूसरे के उत्कर्ष से उत्पन्न क्षोभ से आक्रमण होने के कारण निश्चित कल्याण नहीं है । दुःखों की अत्यन्तिक निवृत्तिरूप मोक्ष असह्य होनेवाले दुःखों के अत्यन्त विनाश-रूप होने के कारण और इसलिए भी कि एक बार उस अवस्था की प्राप्ति हो जानेपर फिर दुख की अवस्था नहीं लौटती है, परम कल्याणमय अतः जीवों को परम अभीष्ट है । उसका कारण द्रव्यादि पदार्थों का तत्त्वज्ञान है । इसी से आचार्य मण्डन की यह उक्ति भी खण्डित हो जाती है कि - " ( आत्मा के ) सभी विशेष गुणों का नाश ही मोक्ष है, यह पक्ष ' ज्ञानस्वरूप आत्मा का अत्यन्त उच्छेद ही मुक्ति है " बौद्धों के इस उच्छेद-अतः धर्मज्ञान में मुक्तिजनकता कहने से ही धम्मसहित धम्मंज्ञान में मुक्तिजनकता कथित हो जाती है । तस्मात् कोई असामञ्जस्य नहीं है । १. अभिप्राय यह है कि भाष्य में स्थित " साधर्म्यवैधम्र्म्यतत्त्वज्ञानम् " इस वाक्य का " साधर्म्यश्च वैधर्म्यश्व साधर्म्यवैधर्म्ये, ते एव तत्थं साधर्म्यवैधम्यं तत्वम् " इस द्वन्द्वान्त कर्मधारय के बाद ' तस्य ज्ञानम् ' यह षष्ठी समास है । किन्तु उक्त द्वन्द्वान्त पद का ' तत्त्वम् ' इस पद के साथ षष्ठीतत्पुरुष समास नहीं है, क्योंकि इससे साधर्म्यवैधर्म्यरूप तत्त्व के ज्ञान में मुक्तिजनकता सिद्ध न होकर उस साधर्म्यवैधर्म्य में रहनेवाले धम्र्मों के ज्ञान में ही मुक्ति-जनकता कही जायगी, किन्तु यह असङ्गत है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ३ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १७ For Private And Personal भिद्यते " इति । विशेषगुणोच्छेदे हि सत्यात्मनः स्वरूपेणावस्थानं नोच्छेद:, नित्यत्वात् । न चायमपुरुषार्थः, समस्तदुःखोपरमस्य परमपुरुषार्थत्वात् । समस्त-सुखाभावादपुरुषार्थत्वमिति चेत्? न, सुखस्यापि क्षयितया बहुलप्रत्यनीकतया च साधनप्रार्थनाशतपरिक्लिष्टतया च सदा दुःखाक्रान्तस्य विषमिश्रस्येव मधुनो दुःख-पक्षे निक्षेपात् । केषां साधर्म्यवैधर्म्यतत्वपरिज्ञानमपवर्गकारणमित्यपेक्षायां द्रव्या-दीनामिति सम्बन्धः । द्रव्याणि च गुणाश्च कर्माणि च सामान्यञ्च, विशेषाश्च, समवायश्चेति विभागवचनानुसारेण विग्रहः, उद्देशस्य विभागवचनेन समानविषयत्वात् । आदौ द्रव्यस्योद्देशः, सर्वाश्रयत्वेन प्राधान्यात् । गुणानाञ्च कर्मापेक्षया भूयस्त्वाद् द्रव्यानन्तरमभिधानम् । नियमेन गुणानुविधायित्वात् कर्म्मणां गुणानन्तरमुद्देशः । कर्मान्वितत्वात् सामान्यस्य कर्मानन्तरमभिधानम् । पञ्च पदार्थवृत्तेः समवायस्य सर्वशेषेणाभिधाने प्राप्ते विशेषाणां मध्ये कथनम् । पक्ष से भिन्न नहीं है । " क्योंकि विशेष गुणों के नष्ट हो जाने पर आत्मा का अपने स्वरूप में रहना आत्मा का नाश नहीं है । ( और उसका नाश हो भी नहीं सकता है, क्योंकि ) वह नित्य है । यह आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष जीवों का अकाम्य भी नहीं है, क्योंकि यह दुःखों का अत्यन्त विनाशरूप है, अतः जीवों का परम अभीष्ट है । ( प्र ० ) यह ( मोक्ष ) सभी सुखों का भी निवृत्तिरूप होने के कारण जीवों का काम्य नहीं है? ( उ ० ) नहीं, क्योंकि सुख भी विनाशशील अनेक विघ्नों से ओतप्रोत, अनेक कठिन उपायों से उत्पन्न होने के कारण अनेक दुःखों से आक्रान्त होने से त्याज्य ही है । जैसे विष से मिला हुआ मधु भी ग्राह्य नहीं होता । ( प्र ० ) किन पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्यरूप तत्त्व का ज्ञान मोक्ष का कारण है? इस आकाङ्क्षा की पूर्ति के लिए " द्रव्यगुणकर्म्म -सामान्य विशेषसमवायानां षण्णां पदार्थानाम् " इस वाक्य का उपादान है । पदार्थों के विभागवाक्य के अनुसार उक्त द्वन्द्व समासान्त वाक्य का विग्रह " द्रव्याणि च गुणाश्च " कर्माणि च सामान्यञ्च विशेषाश्च समवायश्च " इस प्रकार का है । क्योंकि ' उद्देश ' वाक्य में प्रयुक्त पदार्थबोधक पद की विभक्ति का वचन विभाग-वाक्य के अनुसार होना चाहिए । द्रव्य सभी पदार्थों का आश्रय है, अतः सर्वप्रधान है । इस कारण उसका उल्लेख सबसे पहिले है । गुण कर्म से संख्या में अधिक हैं, अतः द्रव्य के बाद और कर्म से पहिले गुणों का उल्लेख है । कर्म्म नियमतः गुणों के साथ ही रहता है, अतः गुण के बाद कर्म का निरूपण है । कर्म के साथ रहने के कारण कर्म के बाद सामान्य का निरूपण किया है । समवाय द्रव्यादि पाच पदार्थों में रहता है, सुतरां उसका निरूपण सबसे पीछे होना उचित है । अतः सामान्य निरूपण के बाद और समवाय से पहिले बीच में ' विशेष ' का निरूपण किया है ।

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir .१८ न्यायकन्दली संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् तच्चेश्वर चोदनाभिव्यक्ताद्धम्मदेव । [ उद्देश-उस ' निःश्रेयस ' ( या अपवर्ग ) की प्राप्ति ईश्वर की विशेष प्रकार की इच्छा से कार्य करने में उन्मुख हुए धर्म से ही होती है । न्यायकन्दली अभावस्य पृथगनुपदेशो भावपारतन्त्र्यात्, न त्वभावात् । द्रव्याणामिति सम्बन्धे root | अत्रापि साधर्म्यादिज्ञानस्य निःश्रेयसहेतुत्वे कथिते द्रव्यादिज्ञानस्य कथितम्, साधर्म्यवैधर्म्ययोः स्वातन्त्र्येण ज्ञानाभावात् । ननु यदि तत्त्वज्ञानं निःश्रेयसहेतुस्तर्हि धम्र्मो न कारणम्? ततः सूत्रविरोधः– “ यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्म्मः ” इति, तत आह - " तच्चेश्वर-चोदनाभिव्यक्ताद्धर्म्मादेवेति । तन्निःश्रेयसं धर्म्मादेव भवति, द्रव्यादितत्त्वज्ञानं तस्य कारणत्वेन निःश्रेयससाधनमित्यभिप्रायः । तत्त्वतो ज्ञातेषु बाह्याध्यात्मिकेषु विषयेषु दोषदर्शनाद्विरक्तस्य समीहानिवृत्तावात्मज्ञस्य तदर्थानि कर्माण्यकुर्व्वत-स्तत्परित्यागसाधनानि च श्रुतिस्मृत्युदितान्यसङ्कल्पितफलान्युपाददानस्यात्मज्ञान-अभावों को स्वतन्त्र रूप से न कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि वे हैं ही नहीं, न कहने का अभिप्राय केवल इतना ही है कि अभाव भावपरतन्त्र हैं । ( अर्थात् " द्रव्य-गुणकर्म्म सामान्य विशेषसमवायानाम् ” इस समस्त वाक्यघटक पदरूप ) ' द्रव्याणाम् ' इत्यादिपदों में सम्बन्धसामान्य में षष्ठी विभक्ति है । " साधर्म्यवैधर्म्यतत्त्वज्ञानं निःश्रे-यसहेतुः " इस वाक्य से यद्यपि द्रव्यादि पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्यरूप तत्त्व के ज्ञान में ही मुक्ति की कारणता कही गयी है, तथापि द्रव्यादिविषयक ज्ञानों में भी मुक्ति की कारणता उसी वाक्य कथित जाती है, क्योंकि द्रव्यादि रूप धर्मियों के ज्ञान के बिना उनके साधर्म्य और वैधर्म्यरूप तत्त्वों का ज्ञान असम्भव है । अगर मोक्ष का कारण ( साधर्म्यवैधर्म्यरूप ) तत्त्व का ज्ञान ही है, तो फिर ' धर्म ' उसका कारण नहीं है । किन्तु ऐसा मान लेने पर सूत्र का विरोध होता है । क्योंकि सूत्रकार ने कहा है कि - " यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः " । इसी विरोध को मिटाने के लिये • भाष्यकार ने " तच्चेश्वर चोदनाभिव्यक्ताद्धम्र्म्मादेव " यह वाक्य कहा है 1 । अभिप्राय यह है कि ' तत् ' अर्थात् मोक्ष, धर्म से ही ( उत्पन्न ) होता है । किन्तु द्रव्यादि तत्त्वज्ञान धर्म का कारण है, अतः परम्परा से मोक्ष का भी कारण है । पदार्थों के यथार्थज्ञान से बाह्य और आभ्यन्तर सभी वस्तुओं में ( ‘ ये सभी दुःख के कारण हैं ' इस प्रकार की ) दोष- बुद्धि उत्पन्न होती है । इस दोष- बुद्धि से वैराग्य की उत्पत्ति होती है और वैराग्य से उस पुरुष की सारी अभिलाषायें निवृत्त हो जाती हैं । फिर वह व्यक्ति अभिलाषाओं के पोषक सभी उपायरूप कम्मों को छोड़ देता है तथा अभिलाषा से पिण्ड छुड़ानेवाले वेद धर्मशास्त्रादि ग्रन्थों में कथित For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकवली १६ मभ्यस्यतः प्रकृष्टविनिवर्त्तकधम्र्मोपचये सति परिपक्वात्मज्ञानस्यात्यन्तिकशरीर-वियोगस्य भावात् । दृष्टो विषयिणामहिकण्टकादीनां परित्यागो विशेषदोषदर्शन-पूर्वकाभिसन्धिकृत निवर्त्तकात् मविशेषगुणात् प्रयत्नात् । तेन शरीरादीनामात्य-न्तिकः परित्यागो विषयदोषदर्शन पूर्वकाभिसन्धिकृतनिवर्त्त कात्म विशेषगुणनिमित्तो विज्ञात इति मोक्षाधिकारे वक्ष्यामः । धर्मोऽपि तावन्न निःश्रेयसं करोति यावदीश्वरेच्छया नानुगृह्यते । तेनेद-मुक्तम् - ईश्वरचोदनाभिव्यक्ताद्धर्म्मादेवेति । चोद्यन्ते प्रेर्य्यन्ते स्वकार्येषु प्रवर्त्य -न्तेऽनया भावा इति चोदना ईश्वरचोदना ईश्वरेच्छाविशेषः । अभिव्यक्तिः कार्य्या-रम्भं प्रत्याभिमुख्यम् । ईश्वरचोदनयाभिव्यक्तादीश्वर चोदनाभिव्यक्ताद् ईश्वरे-च्छाविशेषेण कार्य्यारम्भाभिमुखीकृताद्धम्र्म्मादेव निःश्रेयसं भवतीति वाक्ययोजना | तच्चेति चकारो द्रव्यादिसाधर्म्यज्ञानेन सह धर्मस्य निःश्रेयसहेतुत्वं समुच्चिनोति । निष्काम कम्मों का अनुष्ठान करता हुआ आत्म - ज्ञान का अभ्यास करता है । इन आचरणों से निवृत्तिजनक धर्म की वृद्धि होने पर जब आत्मज्ञान परिपक्व हो जाता है, तब उससे ( आत्मा का ) शरीर के साथ अत्यन्त वियोग ( मोक्ष ) की उत्पत्ति होती है । यह देखा जाता है कि सर्प और कण्टकादि पदार्थों में पहिले इस प्रकार के दोष का ज्ञान होता है कि ये सभी दुःखजनक हैं । फिर उन्हें त्यागने की इच्छा होती है । इस इच्छा से निवृत्तिजनक ( निवर्त्तक ) प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । आत्मा के विशेषगुण इस प्रयत्न से जीव उन दुष्ट ( सर्पादि ) पदार्थों को छोड़ देता है । यही बात हम मोक्ष निरूपण में कहेंगे । धर्म भी तब तक अकेला मोक्ष का सम्पादन नहीं कर सकता, जबतक उसे ईश्वर की इच्छा की सहायता न मिले । इसीलिए प्रशस्तपाद ने " तच्चेश्वरचोदना-भिव्यक्ताद्धर्म्मादेव " यह वाक्य लिखा है । " चोद्यन्ते स्वकार्येषु प्रेर्य्यन्तेऽनया भावाः ” इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस ' इच्छा ' से ( कारणरूप वस्तु आपने कार्यों में उसके उत्पादन के लिए प्रेरणा प्राप्त करे ) वही ' इच्छा ' प्रकृत ' चोदना ' शब्द का अर्थ है । ' ईश्वरस्य चोदनां ' इस विग्रह के अनुसार ' ईश्वर की इच्छा ' ही ' ईश्वरचोदना ' शब्द का अर्थ है । प्रकृत ' अभिव्यक्ति ' शब्द से कारणों की कार्य करने की उन्मुखता इष्ट है । " ईश्वर-चोदनाभिव्यक्तात् " यह पञ्चम्यन्त पद " ईश्वरचोदनयाऽभिव्यक्तात् " इस तृतीया समास से बना है । उपर्युक्त व्युत्पत्तियों के अनुसार ' तच्च ' इत्यादि वाक्य का फलित अर्थ यह है कि ईश्वर के इच्छाविशेष से कार्य के प्रति उन्मुख धर्म से ही ' मुक्ति ' होती है । ' तच्च ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' च ' शब्द इस समुच्चय का बोधक है कि पदार्थों के साधर्म्यादिरूप तत्त्वविषयक ज्ञान के साथ मिलकर ही धर्म में मोक्ष की साधनता है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २० न्यायकन्दली संव लिप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-अथ के द्रव्यादयः पदार्थाः, किञ्च तेषां साधन्यं वैधर्म्मञ्चेति । तत्र द्रव्याणि पृथव्यप्तेजोवाय्वाकाशकाल दिगात्ममनांसि सामान्यविशेषसंज्ञयोक्तानि नवैवेति । तद्व्यतिरेकेणान्यस्य संज्ञा-नभिधानात् । द्रव्यादि कौन - कौन पदार्थ हैं? एवं उनके साधर्म्म और वैधर्म्य क्या हैं? उन पदार्थों में ( १ ) पृथिवी, ( २ ) जल, ( ३ ) तेज, ( ४ ) वायु, ( ५ ) आकाश ( ६ ) काल, ( ७ ) दिक्, ( ८ ) आत्मा और ( ६ ) मन ये नौ ही द्रव्य सूत्र -कार के द्वारा सामान्य ( द्रव्यसंज्ञा ) और विशेष ( पृथिव्यादिसंज्ञा ) संज्ञाओं से कहे गये हैं । क्योंकि पदार्थों के उपदेश के लिये सर्वज्ञ महर्षि ने इन नवों को छोड़ कर और किसी द्रव्य का नाम नहीं लिया है । न्यायकन्दली एवं षट्पदार्थज्ञानस्य पुरुषार्थोपायत्वं प्रतीत्य तेषां प्रत्येकं भेदजिज्ञासार्थं परिपृच्छति - अथ के द्रव्यादय इति । कानि द्रव्याणि? के गुणाः? कानि कर्माणीत्यादि योजनीयम् । नावश्यं धम्र्माणि ज्ञाते धर्म्मा ज्ञायन्त इति, तेन धर्मेषु पृथक् प्रश्नः - किञ्च तेषामित्यादि । अत्रापि चः समुच्यये । उत्तरमाह - तत्रेत्यादि । तेषु द्रव्यादिषु मध्ये, द्रव्याणि पृथिव्यादीनि, सामान्यविशेषसंज्ञया सामान्यसंज्ञया द्रव्यसंज्ञया, विशेषसंज्ञया प्रत्येकमसा-इस प्रकार द्रब्यादि छः पदार्थों में मुक्ति की कारणता को समझाकर, उन पदार्थों में से प्रत्येक की जिज्ञासा के लिये प्रशस्तदेव " अथ के द्रव्यादयः " इत्यादि प्रश्नभाष्य लिखते हैं-' अथ के द्रव्यादयः ' इत्यादि प्रश्नभाष्य की व्याख्या ' ' - द्रव्य कितने हैं? ' ' गुण कितने हैं? ' इत्यादि रीति से करनी चाहिए । धर्म्मो के ज्ञात हो जाने पर यह आवश्यक नहीं है कि धर्म्म भी ज्ञात ही हो जाएँ । अतः " किञ्च तेषाम् " इत्यादि से धर्म के विषय में अलग प्रश्न करते हैं । यहाँ भी ' च ' शब्द समुच्चय का ही बोधक है । ( कथित दोनों प्रश्नों का समाधान क्रमशः करते हैं ) ' तत्र ' अर्थात् उन छः पदार्थों में, ‘ द्रव्याणि ' अर्थात् पृथिव्यादि नौ द्रव्य, " सामान्यविशेषसंज्ञया ” सामान्यसंज्ञा से अर्थात् द्रव्य नाम से, विशेषसंज्ञा से अर्थात् पृथिव्यादि विशेष नामों से - पृथिवीत्व, जलत्व, १. अभिप्राय यह है कि द्रव्यादिभाग वाक्य के पहिले का ' तत्र के द्रव्यादयः '? इत्यादि प्रश्नवाक्य केवल यहाँ के लिये ही नहीं है, किन्तु गुणादि के विभाग वाक्य For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २१ धारणसंज्ञया पृथिव्यप्तेजस्त्वादिरूपया उक्तानि सूत्रकारेण प्रतिपादितानि । किमेतावन्त्या होस्विदपराण्यपि सन्तीत्याह नवैवेति । ननु नवानां लक्षणाभिधाने सामर्थ्यादपरेषामभावो ज्ञातव्यः, व्यर्थं नवैवेति । न, नवसु लक्षितेषु किमपरेषाम-सत्त्वादुत सतामप्यनुपयोगित्वान्न लक्षणं कृतमिति संशयो न निवर्त्तेत । लक्षणस्य व्यवहारमात्रसारतया समानासमानजातीयव्यवच्छेदमात्रसाधनत्वेन चान्याभाव-प्रतिपादिनासामर्थ्यात् तदर्थमवधारणं कृतम् । इदमेव सामान्योद्दिष्टानां विशेष-संज्ञाभिधानं तन्त्रान्तरे विभाग इति निर्देश इति च कथ्यते । कथमेतदवगतं नवैवेति? अत आह - तद्वयतिरेकेणेत्यादि । तेभ्यो नवभ्यो व्यतिरेकेण सर्वज्ञेन महर्षिणा सर्वार्थोपदेशाय प्रवृत्तेनान्यस्य संज्ञानभिधानात् । तमो नाम रूप - संख्या - परिमाण - पृथक्त्व- परत्वापरत्व - संयोग - विभागवद् द्रव्यान्तरमस्तीति चेत्? अत्र कश्चिदाह - यदि तमो द्रव्यम्, रूपवद्द्रव्यस्य स्पर्शाव्यभि-तेजस्त्वादि विशेषरूप से सूत्रकार ने द्रव्यों का प्रतिपादन किया है । ( प्र ० ) नौ प्रकार के द्रव्यों का लक्षण कह देने भर से सामर्थ्यवश यह ज्ञात हो ही जाएगा कि नौ से अधिक द्रव्य नहीं हैं, अतः ( अवधारणार्थक ) ' नवैव ' शब्द का प्रयोग व्यर्थ है । ( उ ० ) उक्त प्रश्न ठीक नहीं है, क्योंकि नौ द्रव्यों का केवल लक्षण कह देने भर से यह सन्देह रह ही जाता है – “ नौ द्रव्यों का ही लक्षण इस लिए किया गया है कि नौ से अधिक द्रव्यों की सत्ता ही नहीं है? " या " नौ से अधिक भी द्रव्य हैं, किन्तु प्रकृत में उनका कोई उपयोग नहीं है । अतः केवल नौ ही ( उपयोगी ) द्रव्य के लक्षण कहे गये हैं । " लक्ष्य का व्यवहार ही लक्षण का मुख्य प्रयोजन है । अतः लक्षणवाक्य केवल ( व्यवहार के लिए ) अपने लक्ष्यों को उनके सजातीय और विजातीय वस्तुओं के भिन्न रूप में केवल समझा सकते हैं । उनमें ( अवधारणादि ) किसी और अर्थ को समझाने की क्षमता नहीं है अतः ( अवधारणार्थक ) ' एव ' शब्दघटित ' नवैव ' शब्द का प्रयोग ( भाष्य ) में है । सामान्य नामों से कहे हुए पदार्थों का विशेष नामों से यह कथन ही और शास्त्रों में ' विभाग ' और ' निर्देश ' शब्द से कहा गया है । यह कैसे समझा गया है कि नौ से अधिक द्रव्य नहीं है? इसी प्रश्न का समाधान ' तद्व्यतिरेकेणान्यस्य " इत्यादि सन्दर्भ से कहते हैं । अभिप्राय यह है कि सभी पदार्थों का उपदेश करने के लिये प्रवृत्त सर्वज्ञ महर्षि कणाद ) ने इन नौ द्रव्यों से भिन्न किसी का भी उल्लेख द्रव्य नाम से नहीं किया है । ( प्र ० ) रूप, संख्या, परिमाण, पृथकत्व, परत्व, अपरत्व, संयोग और विभाग, के पहिले भी ' के गुणाः ' इत्यादि प्रश्न वाक्यों का ऊह करना चाहिए । अन्यथा उत्तररूप सभी विभागवाक्य विना आकाङ्क्षा के ही कहे जाने के कारण उपेक्ष्य हो जायेंगे । १. अभिप्राय यह है कि द्रव्य का सामान्यलक्षण गुण ही है । अन्धकार में कथित रूपादि आठ गुणों की उपलब्धि सार्वजनीन है । अतः वह द्रव्य अवश्य है, किन्तु कथित पृथिव्यादि नौ For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ उद्देश— चारात् स्पर्शवद्रव्यस्य महतः प्रतिघातधर्म्मत्वात् तमसि सञ्चरतः प्रतिबन्धः स्यात्, महान्धकारे च भूगोलकस्येव तदवयवभूतानि खण्डावयविद्रव्याणि प्रतीये-रन्निति । तदयुक्तम्, यथा प्रदीपान्निर्गतैरवयवैरदृष्टवशादनुद्भूतस्पर्शमनिबिडाव-यवमप्रतीयमानखण्डावयविद्रव्यप्रविभागमप्रतिघातिप्रभामण्डलमारभ्यते, तथा तमः परमाणुभिरपि तमो द्रव्यम् । तस्मादन्यथा समाधीयते । तमः परमाणवः स्पर्शवन्तस्तद्रहिता वा? न तावत् स्पर्शवन्तः, स्पर्शवतस्तत्कार्य्यस्य क्वचिदनुपल-म्भात् । अदृष्टव्यापाराभावात् स्पर्शवद्द्रव्यानारम्भका इति चेत्? रूपवन्तो वायु-इन आठ गुणों से युक्त एवं इन नौ द्रव्यों से भिन्न ' तम ' ( अन्धकार ) नाम का द्रव्य है? इस प्रश्न का समाधान ( १ ) कोई यह देते हैं कि यह निश्चित है कि जहाँ रूप रहे वहां स्पर्श भी अवश्य रहे | एवं स्पर्शवाले महान् द्रव्य का यह स्वभाव है कि वह प्रतिघात करे । अगर अन्धकार ( रूपयुक्त ) द्रव्य है ( फिर स्पर्शयुक्त भी अवश्य ही है ), तो उसका प्रतिघातधर्म्मक होना भी अनिवार्य है । अगर ऐसी बात है तो ) अन्धकार में चलते हुए मनुष्य उससे टकरा कर अवश्य ही रुक जाते । ( तस्मात् अन्धकार कोई द्रव्य नहीं है । अतः नवैव द्रव्याणि ' यह अवधारण ठीक है ) । ( २ ) कोई ( यह दूसरा समाधान करते हैं कि जैसे ) किसी महाभूखण्ड की प्रतीति होने पर उसके अवयवों की भी प्रतीति अवश्य होती है । ( वैसे ही ) अन्धकार अगर कोई महान् द्रव्य होता तो ( उसकी प्रतीति की तरह ) उसके अवयवों की भी प्रतीति अवश्य होती । ( किन्तु अन्धकार के अवयवों की प्रतांति नहीं होती है ), अतः अन्धकार कोई द्रव्य नहीं और इसीलिए वह महान् भी नहीं है । किन्तु ये दोनों ही समाधान असङ्गत है, क्योंकि जैसे प्रदीप से निकले हुए तेज के अवयवों से अदृष्टवश अनुद्भूत स्र्श से युक्त अनिविड़ ( पतले ) प्रभामण्डलरूप प्रकाश नाम के द्रव्य की उत्पत्ति होती है । एवं इस महान् द्रव्य के अवयवों की उपलब्धि नहीं होती है और उस ( आलोक ) में चलते हुए मनुष्य की गति रुकती भी नहीं है । इसी प्रकार अन्धकार के परमाणुओं से अन्धकार की उत्पत्ति होगी । ( इसमें अन्धकार के अवयवों की अनुपलब्धि और उससे मनुष्यों कान टकराना, ये दोनों बाधक नहीं हो सकते ) अतः इसका दूसरी रीति से समाधान करना चाहिए । ( समाधान के लिए यह पूछना है कि ) ( प्र ० ) अन्धकार के परमाणुओं में स्पर्श है या नहीं? ( उ ० ) नहीं है, क्योंकि उनके किसी भी कार्य में स्पर्श की उपलब्धि नहीं होती । ( प्र ० ) अन्धकार के परमाणुओं में स्पर्श है, किन्तु उससे स्थूल अन्धकार में अदृष्टरूप कारण के अभाव से स्पर्श की उत्पत्ति नहीं होती । अतः अन्धा-कार के परमाणु स्वयं स्पर्शयुक्त होते हुए भी स्पर्शयुक्त स्थूल अन्धकार को उत्पन्न नहीं करते । द्रव्यों में से वह किसी में भी अन्तर्भूत नहीं है । क्योंकि गन्ध की उपलब्धि न होने से वह पृथिवी नहीं है । स्पर्श की प्रतीति न होने के कारण वह जल, तेज और वायु भी नहीं है । उसमें रूप का प्रत्यक्ष होता है, अतः वह आकाश, काल, दिग्, आत्मा और मन भी नहीं है । इस प्रकार कथित नौ द्रव्यों में उसका अन्तर्भाव नहीं है । गुण प्रतीति के कारण द्रव्य अवश्य ही हैं । तस्मात् ' तम ' कोई दशवां स्वतन्त्र द्रव्य ही है । किन्तु तब " नवैव द्रव्याणि " यह अवधारण असङ्गत हो जाता है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २३ परमाणवोऽदृष्टव्यापार वैगुण्याद्रूपवत्कार्य्यं नारभन्त इति किं न कल्प्येत । किं वा न कल्पितमेतदेकजातीयादेव परमाणोरदृष्टोपग्रहाच्चतुर्धा कार्याणि जायन्त इति । काय्यैकसमधिगम्याः परमाणवो यथाकार्य्यमुन्नीयन्ते न तद्विलक्षणाः, प्रमाणा-भावादिति चेत्? एवं तर्हि तामसाः परमाणवोऽप्यस्पर्शवन्तः कथं तमोद्रव्यमारभेरन्? अस्पर्शवत्त्वस्य कार्य्यद्रव्यानारम्भकत्वेनाव्यभिचारोपलम्भात् । कार्यदर्शनात् तदनुगुणं कारणं कल्प्यते, न तु कारणवैगुण्येन दृष्टकार्य्यविपर्य्यासो युज्यत इति चेत्, न वयमन्धकारस्य प्रत्यर्थिनः किन्त्वारम्भकानुपपत्तेर्नीलिममात्रप्रतीतेश्च द्रव्यमिदं न भवतीति ब्रूमः । तहि भासामभाव एवायं प्रतीयेत? न तस्य नीलाकारेण ( किन्तु स्र्ष्टाशून्य स्थूल अन्धकार को ही उत्पन्न करते हैं ) । ( उ ० ) अगर ऐसी बात है तो फिर " वायु केाणुओं में रूप है, किन्तु अनुकूल अदृष्ट के न रहने से स्थूल वायु में रूप की उत्पत्ति नहीं होती है " ऐसी कल्पना भी क्यों नहीं कर लेते? अथवा यही कल्पना क्यों नहीं करते कि किसी एकजातीय परमाणुओं से ही पृथ्वी, जल, तेज और वायु ये तारों उत्पन्न होते हैं और अदृष्ट की विचित्रता से इनमें परस्पर वैचित्र्य है । ( प्र ० ) परमाणु प्रत्यक्ष-सिद्ध वस्तु नहीं हैं, किन्तु पृथिव्यादि स्थूल कार्यों से ही उनका अनुमान होता है । स्थूल पृथिवी - जलादि द्रव्य परस्पर भिन्नरूपों से प्रत्यक्ष होते हैं, अतः उनके मूल-कारण परमाणुओं को भी परस्पर विलक्षण मानना पड़ेगा । क्योंकि कार्य्य से समान-जातीय कारण का अनुमान होता है । ( उ ० ) फिर स्पर्शशून्य रूप से प्रत्यक्ष होनेवाले अन्धकार के परमाणुओं में स्पर्श की कल्पना कैसी? तस्मात् ( स्पर्शशून्य ) अन्धकार का परमाणु स्थूल अन्धकार को उत्पन्न कर ही नहीं सकता । क्योंकि यह अव्यभिचरित नियम है कि स्पर्शविशिष्ट द्रव्य ही द्रव्य का उत्पादक होता है । ( प्र ० ) कार्य जिस रूप में देखे जाते हैं उनके अनुरूप कारणों की कल्पना की जाता है । यह तो नहीं होता कि एक विशेष प्रकार के कारण की कल्पना कर ली जाए और उसके अनुरोध से काव्यों को प्रत्यक्षसिद्ध अपने रूपों से भिन्न रूपों से माना ए । ( उ ० ) हम अन्धकार के विरोधी नहीं हैं । ( अर्थात् प्रत्यक्षसिद्ध अन्धकार की सत्ता तो हम मानते हैं ) किन्तु मेरा कहना है कि दृष्ट अन्धकार में स्पर्श की उपलब्धि नहीं होती । एवं कार्य और कारण दोनों को समान गुण का ही होना उचित है । अतः अन्धकार् के मूल-कारण परमाणु में स्पर्श नहीं है । ' एवं स्पर्शयुक्त द्रव्य ही द्रव्य का उत्पादक है ' इस नियम में कहीं व्यभिचार भी नहीं है । तस्मात् प्रत्यक्ष से सिद्ध अन्धकार ' द्रव्य ' नहीं है । किन्तु अन्धकार को द्रव्य मानना सम्भव न होने पर भी उसको केवल तेज का अभाव ही मान लें यह पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि नील रूप से ही अन्ध-१. अभिप्राय यह है कि अन्धकार के प्रत्यक्ष में नीलरूप का भान होता है, स्पर्श का नहीं । अतः यह मानना पड़ेगा कि दृष्ट अन्धकार के मूलकारण For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २४ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ उद्देश-प्रतिभासायोगात्, मध्यन्दिनेऽपि दूरगगना भोगव्यापिनो नीलिम्नश्च प्रतीते-किश्व गृह्यमाणे प्रतियोगिनि संयुक्तविशेषणतया तदन्यप्रतिषेधमुखेनाभावो गृह्यते, न स्वतन्त्रः । तमसि च गृह्यमाणे नान्यस्य ग्रहणमस्ति । न च प्रतिषेधमुख: प्रत्ययः । तस्मान्नाभावोऽयम् । न चालोकादर्शनमात्र मेवैतत्, बहिर्मुखतया तम इति, छायेति च कृष्णाकार प्रतिभासनात् । तस्माद्रूपविशेषोऽयमत्यन्तं तेजो-भावे सति सर्व्वतः समारोपितस्तम इति प्रतीयते । दिवा चोर्ध्वं नयनगोलकस्य नीलिमावभास इति वक्ष्यामः । यदा तु नियतदेशाधिकरणो भासामभावस्तदा तद्देशसमारोपिते नीलिम्नि छायेत्यवगमः । अत एव दीर्घा, ह्रस्वा, महती, अल्पीयसी कार का प्रत्यक्ष होता है । ( अभाव में किसी भी रूप की मुख्य प्रतीति नहीं हो सकती ) । एवं दिन में दोपहर को ( सूर्य्य का पूर्ण प्रकाश रहते हुए भी ) गगनमण्डलव्यापी नीलिमा की प्रतीति होती है । धर्म्मो की प्रतीति होने पर ( उस समय या किसी भी समय न रहनेवाले ) उससे भिन्न वस्तु को ' स्वसंयुक्तविशेषणता ' नाम के सम्बन्ध से प्रतिषेधरूप से प्रतीति ही अभाव - प्रतीति है । किन्तु अन्धकार - ज्ञान के उत्पन्न होने पर प्रतियोगिरूप से किसी अन्य वस्तु का ज्ञान नहीं होता । तस्मात् अन्धकार तेज का अभाव ही है । ( प्र ० ) ' तेज ' का न देखना ही अन्धकार की प्रतीति है? ( उ ० ) नहीं, बाहर की तरफ " यह अन्धकार है, यह छाया है " इत्यादि नीलाकार की प्रतीतियाँ होती हैं, ( तस्मात् तेज की अप्रतीति ही ' तम ' नहीं है । ), अतः ( अन्धकार नाम की ) यह वस्तु ' रूप ' विशेष है, जो तेज का अत्यन्ताभाव रहने पर सभी ओर ' समारोपित ' होकर ' तम ' कहलाती है । दिन में भी ऊपर की तरफ ( आकाशमण्डल में ) जो नीलिमा की प्रतीति होती है, वह नयनगोलक की ही नीलिमा है, यह हम आगे कहेंगे । जब जिस नियत देशरूप अधिकरण में तेज का अत्यन्ताभाव रहता है, उस देश में आरोपित नीलरूपाभिन्नतम ' छाया ' कहलाती है । अत एव " यह छाया बड़ी है या छोटी है, यहाँ अधिक छाया है वहाँ कम " इत्यादि प्रतीतियाँ होती हैं । क्योंकि उन देशों में आरोपित नीलिमा की प्रतीति ही परमाणुओं में रूप है, स्पर्श नहीं है । पृथिव्यादि द्रव्यों में रूप और स्पर्श को नियमित रूप के साथ देखना, या स्पर्शयुक्त द्रव्य ही द्रव्य को उत्पन्न करते हैं, यह नियम स्पर्श से शून्य अन्धकार के परमाणुओं में द्रव्यारम्भकत्व का बाधक नहीं हो सकता । १. अभिप्राय यह है कि चक्षु के संयोग से जब भूतल का ज्ञान होता है और घट नहीं दिखाई देता, तभी भूतल में " यहाँ घट नहीं है " इस आकार की प्रतीति होती है । फलतः निषिद्ध रूप से घट की यह प्रतीति ही ' घटाभाव ' प्रतीति है । उससे भिन्न स्वतन्त्र घटाभाव की कोई प्रतीति नहीं है । प्रत्यक्ष इन्द्रियसम्बन्धमूलक होता है । प्रकृत में वह सम्बन्ध ' स्वसंयुक्त विशेषणता ' नाम का है । ' स्व ' शब्द से चक्षु, तत्संयुक्त मूतल, वहाँ विशेषण है - निषेधविशिष्ट घट । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषावादसहितम् न्यायकन्दली २५ छायेत्यभिमानः, तद्देशव्यापिनो नीलिम्नः प्रतीतेः, अभावपक्षे च भावधर्मा-ध्यारोपोऽपि दुरुपपादः । तदुक्तम्-न च भासामभावस्य तमस्त्वं वृद्धसम्मतम् । छायायाः कार्ष्यमित्येवं पुराणे भूगुणश्रुतेः । दूरासन्न प्रदेशादि महदल्प- चलाचला 1 देहानुर्वात्नी छाया न वस्तुत्वाद्विना भवेत् ॥ इति । दुरुपपादश्च क्वचिच्छायायां कृष्णसर्पभ्रमः, चलतिप्रत्ययोऽपि गच्छत्यावरक-द्रव्ये यत्र यत्र तेजसोऽभावस्तत्र तत्र रूपोपलब्धिकृतः । एवं परत्वादयोऽप्यन्यथा-सिद्धाः । तत्र चालोकाभावव्यञ्जनीयरूपविशेषे तमस्यालोकानपेक्षस्यैव तो अन्धकार की प्रतीति है? तम को अभाव रूप मान लेने से तो नील ' रूप ' का आरोप कठिन होगा, क्योंकि ' रूप ' भाव का धर्म है ( उसका आरोप भी अभाव में नहीं हो सकता । ) जैसा कहा है कि - ( १ ) तेज के अभाव में अन्धकार का व्यवहार वृद्धों से अनुमोदित नहीं है, क्योंकि पुराणों में कहा गया है कि छाया में पृथ्वी का कृष्ण वर्ण वर्तमान है । ( २ ) छाया को भावस्वरूप माने बिना छाया देह के साथ चलती है, छाया अभी बहुत दूर है, अब समीप आई, यह छाया बहुत बड़ी है, या यह बहुत छोटी है, यह अब चल रही है और वह अब खड़ी हो गयी, इन प्रतीतियों की उपपत्ति नहीं हो सकती । छाया में काले साँप का भ्रम तो बिलकुल ही असम्भव होगा । ( प्र ० ) अन्धकार को रूपविशेष मान लेने पर भी " अन्धकार चलता है ", अन्धकार में गमन की यह प्रतीति अनुपपन्न ही रहेगी । ( उ ० ) इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि गमन को उक्त प्रतीति आलोक को ढँकनेवाले द्रव्य के चलने से जहाँ जहाँ तेज का अभाव हो जाता है, उन सभी जगहों में आरोपित रूप की उपलब्धि ही है । इसी प्रकार अन्धकार में प्रतीत होनेवाले परत्वादि गुणों की प्रतीति की उपपत्ति भी दूसरे प्रकार से की जा सकती है । ( प्र ० ) रूपों का प्रत्यक्ष आलोक में ही चक्षु से होता है, अन्धकार की प्रतीति आलोक के न रहने से ही चक्षु से होती है, अतः अन्धकार ' नीलरूप ' नहीं है । ( उ ० ) यह आपत्ति भी व्यर्थ है, क्योंकि वस्तुओं के स्वभाव के अनुसार ही कार्य्यकारणभाव की कल्पना की जाती है । अगर आलोक के न रहने से ही अन्धकार का प्रत्यक्ष चक्षु से होता है तो फिर और रूपों के प्रत्यक्ष में आलोकसहकृत चक्षु को ( ही ) कारण मानते हुए भी अन्धकारस्वरूप रूप के प्रत्यक्ष में आलोक से निरपेक्ष चक्षु को ही कारण मानना पड़ेगा । जैसे कि आप घटाभावादि के प्रत्यक्ष में आलोकसहकृत चक्षु को कारण १. जैसे की चलते हुए मनुष्यादि के शरीर से या स्थावर वृक्षादि से भूतल के जो अंश सौर तेज क े संयोग से बच जाते हैं, उनमें ही ' छाया ' की प्रतीति होती है । एवं शरीरादि आवरक द्रव्यों का परिमाण जितना होता है, उतने ही परिमाण के अनुसार वे देशों को आवृत करते हैं । तदनुसार ही अन्धकाररूप छाया की प्रतीतियाँ होती हैं । × For Private And Personal