प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 21–30
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 21–30
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( = ) पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक, आत्मा और मन ये द्रव्य के नौ सकता प्रकार ( द ) हैं । इन सभी द्रव्यों को नित्य और अनित्य भेद से दो भागों में बाँटा जा है । पृथिवी, जल, तेज, वायु इन चार द्रव्यों के परमाणु और आकाश, काल, दिक्, द्रव्य आत्मा के और मन ये सभी द्रव्य नित्य हैं । एवं कथित परमाणुओं से भिन्न पृथिव्यादि चारों सभी प्रभेद उत्पत्तिशील होने के कारण अनित्य हैं । अनित्य द्रव्यों में से पृथिव्यादि तीन द्रव्यों को शरीर, इन्द्रिय और विषय इन तीन भागों में विभक्त किय गया है । किन्तु वायु का इन तीनों से भिन्न ' प्राण ' नाम का एक चौथा भेद भी है । आत्मा विभु है, अतः सभी मूर्त्त द्रव्यों के साथ उसका संयोग है, किन्तु सुख दुःखों का अनुभव, अर्थात् भोग वह शरीर में ही करता है अतः शरीर के साथ उसका और मूर्त्त द्रव्यों से विलक्षण प्रकार का अवच्छेदकत्व नाम का सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध के ही कारण शरीर को आत्मा के भोग करने का ' आयतन ' कहा जाता है । फलतः आत्मा के भोग का आयतन ही ' शरीर ' है । यह शरीर भी पार्थिव, जलीय, तैजस और वायवीय भेद से चार प्रकार का है । इनमें मानव शरीर पार्थिव है, क्योंकि इस शरीर का उपादान पृथिवी रूप द्रव्य ही है । यद्यपि जलादि और द्रव्यों का भी सम्बन्ध इसमें प्रतीत होता है, फिर भी वे इसके उपादान या समवायिकारण नहीं है, निमित्तकारण हैं । पृथिवी से लेकर आकाशपर्यन्त सभी भूतद्रव्य शरीर के बनने में हेतु हैं, अतः यह शरीर पाञ्चभौतिक भी कहलाता है । अस्मदादि के शरीर का उपादान कारण या समवायिकारण पृथिवी रूप द्रव्य ही है, अतः उसे पार्थिव कहा जाता है । वैशेषिक सिद्धान्त के अनुसार शरीर का समवायिकारण पृथिवी, जल ।, अतः तेज, वायु इन चारों में से कोई एक ही है, शेष चार उसके निमित्तकारण हैं के ( १ ) पृथिवी रूप उपादान से उत्पन्न हम लोगों का शरीर पार्थिव है । पार्थिव शरीर योनिज ओर ( २ ) अयोनिज दो भेद हैं । योनिज शरीर के भी दो भेद हैं ( १ ) के जरायुज शरीर और ( २ ) अण्डज । जरायुज मानुषादि के शरीर हैं, और पशुपक्षी आदि कृमि प्रभृति अण्डज हैं । स्वेदज और उद्भिज्जादि के शरीर अयोनिज हैं । जल स्वेदज रूप हैं समवायिकारण और उद्भिज्ज हैं वृक्षादि । नारकीय शरीर भी अयोनिज ही है । है, जो और शेष चार भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से उत्पन्न शरीर जलीय शरीर निमित्त-' वरुणलोक ' में प्रसिद्ध है । तेज रूप समवायिकारण और शेष चार भूत द्रव्य रूप है | कारणों से उत्पन्न शरीर ' तैजस शरीर ' कहलाता है, जो ' सूर्यलोक ' में प्रसिद्ध शरीर का वायु रूप समवायिकारण और शेष चारों भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से जिस शरीर है । निर्माण होता है, वह वायवीय शरीर कहलाता है । पिशाचादि का शरीर वायवीय प्रभृति शरीर के घ्राण, रसना, चक्षुः, त्वचा, श्रोत्र और मन ये छः इन्द्रियाँ हैं । हाथ, पैर है । और मन अवयव मात्र हैं, इन्द्रिय नहीं । इनमें श्रोत्र आकाश रूप है, अतः नित्य तेज परमाणु रूप है, अतः नित्य है । चक्षुरादि शेष चार इन्द्रियाँ क्रमशः पृथिवी जलीय , जल है,, चक्षु और वायु रूप द्रव्य से उत्पन्न होती हैं । इनमें घ्राण पार्थिव है, रसना है, चक्षु तेज तेजस है और त्वचा वायवीय है । फलतः घ्राण पृथिवी है, रसना जल है और त्वचा वायु है । इस प्रकार घ्राण प्रभृति चार इन्द्रियाँ पृथिवी प्रभृति चार For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( & ) भूतों से उत्पन्न होने के कारण ' भौतिक ' हैं । श्रवणेन्द्रिय आकाश रूप है आकाश से उत्पन्न नहीं, क्योंकि आकाश नित्य है । नित्य द्रव्य किसी द्रव्य का समवायिकारण नहीं हो सकता, अतः ' श्रवणेन्द्रिय ' स्वयं भूत - द्रव्य होने के कारण ही ' भौतिक ' कहलाता है । मन भौतिक नहीं है । मिट्टी प्रभृति ' विषय ' रूप पृथिवी हैं, सरिता, समुद्रादि ' विषय ' रूप जल हैं । वह्नि एवं सुवर्णादि ' विषय ' रूप तेज हैं । जिससे आँधी प्रभृति होती हैं, वे सभी वायु विषय रूप हैं । शरीरादि तीनों प्रकारों से भिन्न वायु का ' प्राण ' नाम का चौथा प्रकार भी है । शरीर के भीतर चलनेवाली वायु को ' प्राण ' कहते हैं । किन्तु कार्य - भेद से और स्थान- भेद से उसके प्राण, अपान, समान और व्यान ये चार नाम प्रसिद्ध हैं । शाखादि के कम्प से वायु का केवल अनुमान ही होता है, प्रत्यक्ष नहीं । क्योंकि रूपी द्रव्य का ही प्रत्यक्ष होता है । किसी का मत है कि वायु का भी स्पार्शनप्रत्यक्ष होता है । द्रव्य के चाक्षुषप्रत्यक्ष के लिए ही द्रव्य में रूप का रहना आवश्यक है । नित्य द्रव्यों में पृथिव्यादि चारों प्रकार के परमाणुओं का उल्लेख कर चुके हैं । वैशेषिकों का कहना है कि घटादि कार्यद्रव्यों का नाश प्रत्यक्षसिद्ध है । विनाश की परम्परा का विश्राम कहीं पर मानना आवश्यक है । ऐसा न मानने पर राई और पर्वत दोनों को एक परिमाण का मानना पड़ेगा । क्योंकि राई का विनाश भी अनन्त खण्डों में होगा और पहाड़ का भी विनाश अनन्त खण्डों में होगा । अतः दोनों अनन्त खण्डों से निर्मित होने के कारण समान परिमाण के होंगे । किन्तु यह प्रत्यक्ष विरुद्ध है, अतः विनाश - परम्परा का कहीं विश्राम मानना आवश्यक है । जहाँ पर उसका विश्राम होगा उसको ही ' परमाणु ' कहते हैं । इसे मान लेने पर राई और पर्वत के समान परिमाण का प्रसङ्ग उपस्थित नहीं होता है, क्योंकि दोनों के परमाणुओं में संख्या का तारतम्य ही दोनों के परिमाण में भी न्यूनाधिक का ज्ञापक होगा । परमाणु को नित्य मानना भी आवश्यक है, क्योंकि परमाणुओं को अनित्य मानने पर ऐसे द्रव्य रूप कार्यों को भी मानना पड़ेगा, जिनके होने के कारण उचित नहीं है । इस प्रकार दो अवयव नहीं हैं । किन्तु यह प्रत्यक्ष विरुद्ध परमाणुओं से द्वयणुक और तीन द्वणुकों व्यसरेणु में महत्त्व आ जाता है । फिर सेव्यसरेणु वा त्र्यणुक की उत्पत्ति होती है । आगे की सृष्टि होती है । वैशेषिकमत के अनुसार अवयवों से जिस अवयवी की उत्पत्ति होती है, वह अवयवों से सर्वथा भिन्न वस्तु है, और उत्पत्ति से पूर्व उसकी और किसी रूप में सत्ता नहीं रहती है । इसी को ' असत्कार्यवाद ' या ' आरम्भवाद ' कहते हैं । आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन इन पाँच द्रव्यों का प्रत्यक्ष नहीं होता है । अतः इनके विवरण से पहिले इनकी सत्ता में अनुमान को प्रमाण रूप में उपस्थित करने की आवश्यकता होती है । क्योंकि सभी शब्दप्रमाणों में सबों की आस्था नहीं होती । किसी वस्तु की सत्ता को जहाँ अनुमान के द्वारा स्थापित करना होता है, वहाँ थोड़ा कौशल का अवलम्बन आवश्यक होता है । क्योंकि सीधे विवादास्पद वस्तु को पक्ष For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( १० ) बनाकर अनुमान की उपस्थित नहीं किया जा सकता । जैसे कि ' आकाशः अस्ति शब्दाश्र यत्वात् ' यह अनुमान नहीं हो सकता, क्योंकि पक्ष को अपने स्वरूप ( पक्षतावच्छेदक ) से युक्त होकर पहिले से सिद्ध रहना चाहिए । जैसे ' पर्वतो बह्निमान् धूमात् ' इत्यादि स्थलों में पर्वतत्वादि से युक्त पर्वतादि पहिले प्रत्यक्ष के द्वारा सिद्ध रहता है । अतः इस प्रकार के स्थलों में परिशेषानुमान का अवलम्बन करना पड़ता है । I आकाश नाम के एक स्वतन्त्र द्रव्य के साधक परिशेषानुमानों की परम्परा इस प्रकार है कि चक्षु से न दीखनेवाले, अथ च रखनादि और बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होनेवाले गुण सामान्यगुण नहीं होते, विशेषगुण ही होते हैं - यह बात स्पर्श को दृष्टान्त मानकर अच्छी तरह समझा जा सकता है, क्योंकि स्पर्शगुण का चक्षु से ग्रहण नहीं हो सकता, अथ च वह त्वचा रूप बहिरिन्यि से गृहीत होता है, अतः वह विशेषगुण है । इसी प्रकार शब्द भी विशेषगुण ही है, क्योंकि उसका ग्रहण चक्षु से नहीं हो सकता, अथ च श्रोत्र रूप बहिरिन्द्रिय से उसका ग्रहण होता है । अतः शब्द विशेषगुण ही है, सामान्य गुण नहीं । यह पहिले सिद्धवत् समझ लेना चाहिए कि दिक; काल और मन इन तीन द्रव्यों में विशेषगुण नहीं रहते, अतः शब्द कालादि के गुण नहीं हो सकते । आकाश अभी विवादास्पद है । अतः आकाश को न मानने की स्थिति में शब्द अगर विशेष गुण है तो फिर पृथिवी, जल, तेज, वायु और आत्मा इन्हीं में से किसी का वह विशेष गुण होगा । इनमें से पृथिवी, जल, तेज और वायु ये चार स्पर्श से युक्त हैं । स्पर्श से युक्त द्रव्यों के जितने प्रत्यक्ष दीखनेवाले विशेष गुण है उनका यह स्वभाव है किया तो वे अग्नि के संयोग से उत्पन्न हों, जैसे कि पके हुए घट का रक्त रूप या फिर कारण के गुण से उत्पन्न हो, जैसे कि पट का रक्त रूप तन्तु के रक्त रूप से उत्पन्न होता है । अगर शब्द को स्पर्श से युक्त द्रव्य का विशेषगुण मानेंगे तो फिर शब्द की उत्पत्ति भी अग्नि के संयोग से या उपादान कारणों में रहनेवाले गुणों से ही माननी होगी, किन्तु दोनों में से कोई भी सम्भव नहीं है, क्योकि संयोग और विभाग से शब्द की उत्पत्ति प्रत्यक्ष से सिद्ध है । जिस प्रकार सुख रूप विशेष गुण कारणगुण-पूर्वक और अग्निसंयोगासमवायिकारणक न होने से स्पर्श से युक्त पृथिव्यादि चार द्रव्यों का विशेष गुण नहीं हो सकता, उसी प्रकार शब्द भी स्पर्श से युक्त पृथिव्यादि चार द्रव्यों का विशेष गुण नहीं हो सकता । क्योंकि आत्मा के विशेष गुण ग्रहीत नहीं होते, शब्द का ग्रहण क्षेत्र रूप बाह्य इन्द्रिय से होता है, अतः वह आत्मा का विशेष गुण नहीं हो सकता । तस्मात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, काल, दिक, आत्मा और मन इन आठ द्रव्यों से भिन्न कोई द्रव्य मानना होगा, जो शब्द का उपादान या समवायिकरण हो । इसी द्रव्य का नाम ' आकाश ' है । आकाश स्वरूप श्रोत्रेन्द्रिय की चर्चा कर चुके हैं । यह ( श्रोत्रेन्द्रिय ) नित्य, विभु, आकाश स्वरूप के उपाधि होने के के कारण एक ही है । किन्तु प्राणियों के अङ्ग विशेष ( कर्णशष्कुली ) भेद से श्रोत्रेन्द्रिय परस्पर भिन्न प्रतीत कारण भिन्न- भिन्न हैं । अव उनके होते हैं और एक के अवणेन्द्रिय से दूसरे की आत्मा में शब्द का प्रत्यक्ष नहीं होता । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ११ ) ' इदानीं घटः, तदानीं घटः ' इत्यादि प्रतीतियों की उपपत्ति के लिए ' काल ' नाम के एक द्रव्य की सत्ता माननी पड़ती है । क्योंकि ' इदानीम्, तदानीम् ' इत्यादि प्रतीतियों का विषय यद्यपि सूर्य नक्षत्रादि की क्रियायें प्रतीत होती हैं, किन्तु सूर्यादि नक्षत्रों का साक्षात् सम्बन्ध घटादि विषयों के साथ नहीं है, अतः एक काल रूप अतिरिक्त द्रव्य मानकर उसके द्वारा सूर्यादि नक्षत्रों की क्रिया द्वारा उक्त प्रतीतियों की उपपत्ति होती है । अतः काल नाम का एक स्वतन्त्र द्रव्य अवश्य है । उत्पन्न होनेवाले सभी पदार्थों के साथ इसका सम्बन्ध एवं अन्वय है, अतः वह सभी जन्यों का कारण भी है और आश्रय भी । यद्यपि क्षण मूहूर्त्तादि से लेकर मन्वन्तरादि अनेक रूपों में इसका व्यवहार होता है, फिर भी वे विभिन्न प्रतीतियों औपाधिक ही हैं । काल वस्तुतः एक ही है । काल के द्वारा हो नये और पुराने का व्यवहार या ज्येष्ठत्व कनिष्ठत्व का व्यवहार, अर्थात् कालिक परत्व और कालिक अपरत्व का व्यवहार भी होता है । पाटलिपुत्र से काशी की अपेक्षा प्रयाग दूर है एवं प्रयाग की अपेक्षा पाटलिपुत्र से काशी समीप है -- इस दूरत्व और समीपत्व की प्रतीति के लिए ' दिकू ' नाम का एक द्रव्य माना जाता है । इसी कारण उक्त प्रतीतियाँ होती हैं । यह भी एकही ही है और नित्य भी है । पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर प्रभृति के जो विभिन्न व्यवहार होते हैं वे सभी उपाधिमूलक हैं । अगर दिशा के प्राच्यादि भेद वास्तविक होते हो तो पूर्व में सदा पूर्वत्व का ही व्यवहार होता और पश्चिम में सदा पश्चिमत्व का ही । किन्तु सो नहीं होता, क्योंकि जिसमें एक की अपेक्षा पूर्वत्व का व्यवहार होता है, उसीमें उस से भी पूर्व में रहनेवाले की अपेक्षा पश्चिमत्व का व्यवहार होता है । इसी प्रकार पश्चिम में भी किसी पश्चिमेतर की अपेक्षा पूर्वत्व का व्यवहार होता है, अतः दिशा के पूर्वपश्चिमादि भेद औषाधिक हैं, वास्तविक नहीं । अतः दिक् भी एक ही है । ‘ अहं सुखी, अहं दु: खी, अहं जानामि ' इत्यादि प्रत्यक्षात्मक प्रतीति सार्वजनीन हैं । इन प्रत्यक्षों के द्वारा ही सुखदुःखादि के आश्रय रूप आत्मा की सिद्धि होती है, फिर भी सुखदुःखादि के आश्रय शरीर या इन्द्रिय अथवा मन क्यों नहीं हैं? ये प्रश्न रह जाते हैं । इन प्रश्नों के उत्तर के बिना आत्मा तत्त्वतः ज्ञात नहीं हो सकता । अतः ' शरीरादि आत्मा नहीं हैं ' यह समझना आवश्यक है 1 शरीर को ही आत्मा माननेवालों का कहना है कि आत्मा कोई प्रत्यक्षदृष्ट वस्तु नहीं है । जो सम्प्रदाय आत्मा को स्वीकार करते हैं वे भी सुखादि प्रत्यक्ष के लिए आत्मा में शरीर का सम्बन्ध आवश्यक मानते हैं । अत एव वे शरीर को आत्मा के भोग का ' आयतन ' कहते हैं । ऐसी स्थिति में शरीर के साथ जब सुखादि का अन्वय और व्यतिरेक सर्वसिद्ध है, अतब शरीर को सुखादि का कारण सभी को मानना आव-इयक है | अतः शरीर का ही समवायिकारण क्यों न स्वीकार कर लें? सुतराम् ' अहं सुखी ' इत्यादि वाक्य का ' अहम् ' शब्द का अर्थ शरीर ही है, फलतः शरीर ही आत्मा है । आत्मा नाम का कोई अतिरिक्त स्वतन्त्र द्रव्य नहीं है । यह पक्ष सांसारिक साधारण जनों से स्वीकृत होने के कारण अधिक सरल है । वस्तुतः हम सभी सांसारिक For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( १२ ) प्राणि शरीरात्मवादी ही हैं । इसी पक्ष के अनुसार हमारे सभी व्यवहार चलते हैं । अतः इसकी विशेष रूप से समीक्षा आवश्यक है । ज्ञान ही वस्तुतः चैतन्य है । चैतन्य से युक्त वस्तु ही चेतन कहलाता है । शरीर पाञ्चभौतिक है, पाँच भूतों में से कोई भी चेतन नहीं है । फिर भी उनकी समष्टि में चैतन्य की उत्पत्ति शरीरात्मवादी इस प्रकार करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में जो धर्म नहीं भी रहता है, समूह में वह धर्म रह सकता है । जैसे कि मदिरा के उपादानों में से किसी एक मैं मादक शक्ति न रहने पर भी उस समूह से निर्मित मदिरा में मादक शक्ति रहती है, उसी प्रकार पृथिवी प्रभृति पाँच भूतों में से प्रत्येक में चैतन्य के न रहने पर भी उन पाँचों से निर्मित शरीर में चैतन्य रह सकता है । शरीर को आत्मा न माननेवाले या शरीर में चैतन्य न माननेवालों का कहना हैं कि शरीर को अगर चैतन्यस्वभाव का माना जाय तो फिर मृत शरीर में भी चैतन्य मानना पड़ेगा क्योंकि मृतशरीर भी तो शरीर ही हैं । अतः शरीर में चैतन्य नहीं माना जा सकता । शरीर को चेतन मानने के पक्ष में दूसरी बाधा यह उपस्थित होती है कि इस पक्ष में शरीर के प्रत्येक अवयव में चैतन्य मानना पड़ेगा! या फिर सम्पूर्ण शरीर में? इन दोनों में से पहिला पक्ष इसलिए नहीं मान सकते कि शरीर के हाथ रूप अवयव के द्वारा अनुभूत विषय का उसके कट जाने पर स्मरण नहीं हो सकेगा, क्योंकि स्मरण के प्रति जो पूर्वानुभव कारण है उसमें समानतृ कत्व भी आवश्यक है । अर्थात् जिस पुरुष को जिस विषय का पूर्व में अनुभव रहेगा उसी पुरुष को उस अनुभवजनित उपयुक्त संस्कार के द्वारा समय आने पर उस विषय का स्मरण होगा, किसी अन्य पुरुष को नहीं जैसा कि देवदत्त के पूर्वानुभव से यज्ञदत्त को स्मरण नहीं हो सकता । इस कार्यकारणभाव के अनुसार शरीर के हाथ रूप अवयव के द्वारा अनुभव के बाद उस हाथ रूप अनुभविता के नष्ट हो जाने पर उस विषय का अगर स्मरण मानेंगे तो एक के द्वारा अनुभूत विषय का स्मरण दूसरे से मानना पड़ेगा, अतः शरीर के प्रत्येक अवयव में चैतन्य या ज्ञान नहीं माना जा सकता । एवं शरीर रूप अवयवी में भी चैतन्य नहीं माना जा सकता । क्योंकि प्रत्येक अवयवी एक क्षण में उत्पन्न होकर दूसरे क्षण में रहकर तीसरे क्षण में नष्ट हो जाता है । आगे फिर इसी प्रकार उत्पत्ति और विनाश का क्रम चलता है । ( बौद्धों के क्षणिकत्व सिद्धान्त में और वैशेषिकों के क्षणिकत्व सिद्धान्त में यही अन्तर है कि वैशेषिक लोग कुछ पदार्थों को नित्य भी मानते हैं । और एक क्षण में उत्पत्ति दूसरे क्षण में स्थिति और तीसरे क्षण में नष्ट हो जाने को क्षणिकत्व कहते हैं । बौद्धलोग सभी पदार्थो को क्षणिक ही मानते हैं किसी पदार्थ को नित्य नहीं मानते और क्षणिक उस उत्पत्ति विनाश की परम्परा को कहते हैं जिसमें पदार्थ एक क्षण में उत्पन्न होकर दूसरे ही क्षण में विनाश को प्राप्त होता है ) वैशे-त्रिक लोग अवयवियों को क्षणिक इसलिए मानते हैं कि उत्पन्न होने के बाद उसमें ह्रास और वृद्धि देखी जाती है । एक ही मनुष्यशरीर कभी दुबला और मोटा कभी छोटा और कभी बड़ा देखा जाता है । किन्तु एकही आदमी छोटे और बड़े परिमाण का आश्रय नहीं हो सकता । क्योंकि अवयव के परिणाम और अवयवों की संख्या ही अवयवी में रहने For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( १३ ) वाले परिमाण के कारण हैं । कुछ नियमित संख्या के अवयवों से निर्मित होनेवाले अवयवियों में अवयवों के एक प्रकार की संख्या और एक परिमाणों से अवयवी में विभिन्न प्रकार के परिमाणों की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अतः यही मानना पड़ेगा कि विभिन्न प्रकार के परिमाणवाले अवयविओं की उत्पत्ति एक प्रकार की संख्यावाले और एक समान परिमाणवाले अवयवों से नहीं हो सकती, अतः देवदत्तादि एक ही नाम से प्रत्यभिज्ञात होने पर भी विभिन्न परिमाण के देवदत्तादि के शरीर विभिन्न संख्यक और विभिन्न परिमाणवाले अवयवों से ही उत्पन्न होते हैं । विभिन्न संख्यक अवयवों से निर्मित अवयवी कभी एक नहीं हो सकते । अतः देवदत्तादि के मोटे और पतले शरीर रूप अवयवी भी विभिन्न ही हैं, क्योंकि विभिन्न परिमाणों के होने के कारण विभिन्न संख्यकों और विभिन्न परिमाण के अवयवों से उत्पन्न हैं । उत्पत्ति और विनाश का या शरीर के छोटे बड़े होने का या मोटा और दुबला होने का यह क्रम इतना सूक्ष्म है कि उसे परख नहीं सकते । यह तो प्रत्यक्ष है कि एक पाँच साल का लड़का जिस ऊँचाई पर की वस्तु को छू नहीं सकता था वही दश वर्ष का होने पर उसे आसानी से ' छू सकता है । किन्तु उसकी ऊँचाई में यह वृद्धि कब हुई? यह कोई देख नहीं सकता । ऐसा तो होता नहीं कि एक रात पहिले जिस उँचाई की वस्तु को छूने में पाँच अङ्गल की कमी थी, वह प्रातः होते ही छूट जाती है और वह उस वस्तु को छू लेता है । तस्मात् यह वृद्धि और नाश प्रतिक्षण होता है अतः प्रत्येक वृद्धि को या प्रत्येक विनाश क्योंकि क्षण अत्यन्त सूक्ष्म है । को देखा नहीं जा सकता, इत्यादि प्रतीतियों के वाचक ' अहम् ' शब्द से शरीर का बोध अतः ' अहं गौर: ' लाक्षणिक ही है । शरीर आत्मशब्द का मुख्यार्थ नहीं है । उसका मुख्यार्थ कोई अतिरिक्त द्रव्य ही है, जिसके सम्बन्ध के कारण आत्मा शब्द से शरीर का भी गौणव्यवहार होता है । तस्मात् शरीर आत्मा नहीं है । किसी सम्प्रदाय का कहना है कि जिस प्रकार ' अहं गौर: ' इस प्रकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार ' अहं काणः ' ' अहं बधिरः ' इत्यादि प्रतीतियाँ भी होती हैं, काणत्व बधिरत्वादि चक्षुरादि इन्द्रियों के ही धर्म हैं, अतः उन प्रतीतियों में अहम् शब्द से चक्षुरादि इन्द्रियों का ही भान उचित है । अतः इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं । सभी ज्ञानों में इन्द्रियाँ किसी न किसी प्रकार अपेक्षित हैं ही । उन्हें आत्मा मान लेने में केवल इतना अधिक होता है कि उन्हें ज्ञानों का निमित्तकारण न मानकर समवायिकारण मानते हैं । अतः इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं । वे ही अपने अपने से उत्पन्न ज्ञानों के आश्रय हैं । अतः इन्द्रियों से अतिरिक्त आत्मा नाम का कोई अतिरिक्त द्रव्य नहीं है । आत्मा को इन्द्रियों से भिन्न अतिरिक्त पदार्थ माननेवाले सिद्धान्तियों का कहना है कि शरीर को आत्मा मानने में जो स्मरणानुपपत्ति प्रभृति दोष दिखला आये हैं, वे सभी अनित्य इन्द्रियों को आत्मा मान लेने के पक्ष में भी हैं । उसकी रीति यह है कि आँखों के रहते जिसने जिन वस्तुओं को देखा है, अन्धा हो जाने पर भी उस व्यक्ति को उन वस्तुओं का स्मरण होता है । किन्तु इन्द्रियों को आत्मा मान लेने के पक्ष में यह स्मरण For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( १४ ) सम्भव नहीं है । क्योंकि इस स्मरण का आश्रय ( समवायिकारण ) चक्षु रूप इन्द्रिय सर्वदा के लिए नष्ट हो चुका है । अतः यह मानना पड़ता है कि इन्द्रियों से होनेवाले ज्ञानों का आश्रय कोई और ही द्रव्य है, जो इन्द्रियों के नष्ट होने पर भी विद्यमान रहता है । वही आत्मा है । इन्द्रियात्मवाद के पक्ष में कोई कहते हैं कि ये सभी आपत्तियाँ इन्द्रियों के अनित्य होने के कारण उठती हैं । भोत्रेन्द्रिय आकाश रूप होने पर भी पूर्ण नित्य नहीं है, क्योंकि निरुपाधिक आकाश इन्द्रिय नहीं है । कर्णशष्कुली प्रभृति उपाधि से युक्त आकाश ही इन्द्रिय है, अतः उपाधि में दोष आ जाने से स्वरूपतः आकाश रूप क्षेत्र का नाश न होने पर भी उसका इन्द्रियत्व नष्ट हो जाता है । अतः श्रोत्रेन्द्रिय भी फलतः अनित्य ही है । ऐसी स्थिति में मन रूप इन्द्रिय को आत्मा मान लेने से उक्त सभी आपत्तियाँ हट जाती हैं । क्योंकि मन नित्य है एवं सभी ज्ञानों में मन की अपेक्षा भी है ही । तस्मात् सभी ज्ञानों के प्रति मन को ही समवायिकारण मान लें । तद्भिन्न आत्मा नाम के किसी द्रव्य को मानने की आवश्यकता नहीं है । इस प्रसन में सिद्धान्तियों का कहना है कि मन की सिद्धि जिस हेतु से की जाती है, वही उसको अतीन्द्रिय भी सिद्ध करता है । मन को अगर विभु मान लिया जाय तो फिर उसका कुछ भी प्रयोजन नहीं रह जाता । क्योंकि एक समय एक आश्रय में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं होती है । किन्तु चक्षुषाणादि इन्द्रियों का अपने विषयों के साथ एक ही समय सम्बन्ध हो सकते हैं । ज्ञान के समवायिकारण को जो लोग विभु मानते हैं उनके मत में एक ही साथ अनेक विषयों के साथ उसका सम्बन्ध होना कोई बड़ी बात नहीं है । अतः मध्यवर्ती एक ऐसे इन्द्रिय की कल्पना करनी पड़ती है जो अपनी सूक्ष्मता के कारण एक समय एक ही वहिरिन्द्रिय के साथ सम्बद्ध हो सके वही इन्द्रिय ' मन ' है । फलतः जिस बहिरिन्द्रिय के साथ जिस समय मन रूप इन्द्रिय का सम्बन्ध रहेगा, उस समय उसी बहिरिन्द्रिय के विषय का ग्रहण होगा, और इन्द्रियों के विषयों का नहीं । अगर मन को विभु मान लें तो फिर एक ही समय अनेक बहिरिन्द्रियों के साथ वह सम्बद्ध हो सकता है । अतः एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की ( ज्ञानयोगपद्य की ) आपत्ति जैसी की तैसी रहेगी । अतः मन की सत्ता के साधक प्रमाण ( धमिंग्राहक प्रमाण ) के द्वारा ही मन काअणुत्व भी सिद्ध है ॥ मन के इस अणुत्व अव के कारण ही ज्ञान का आश्रय मन नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मान लेने पर ज्ञान - सुखादि का प्रत्यक्ष न हो सकेगा । क्योंकि गुणप्रत्यक्ष के प्रति आश्रय का महत्त्व भी कारण है चूँकि मन अणु है, अतः उसमें रहनेवाले ज्ञान - सुखादि का प्रत्यक्ष संभव नहीं होगा । तस्मात् मन भी आत्मा नहीं है । अतः पृथिव्यादि आठों द्रव्यों से अतिरिक्त आत्मा नाम का एक स्वतन्त्र द्रव्य मानना आवश्यक है । यह आत्मा ईश्वर और जीव मेद से दो प्रकार का है । ईश्वर एक ही है और सर्वत्यादि गुणों से विभूषित है । जीव अदृष्टादि गुणों के द्वारा बद है और प्रत्येक शरीर में अलग अलग होने के कारण अनन्त है । मन रूप नवम द्रव्य के प्रसङ्ग में जानने योग्य सभी बातें आत्मनिरूपण के प्रसङ्ग में अधिकतर कह दी गयी हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( १५ ) गुण रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथकत्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरस्य, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, वस्तु, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म, अधर्म, और शब्द ये चौबीस गुण हैं । रूप केवल आँखों से ही दीखने वाला गुण ' रूप ' है । द्रव्य भी वही आँखों से देखा जाता है जिसमें कि रूप हो । आकाशादि में रूप नहीं है, ) अतः वे नहीं देखे जाते । सुतराम् द्रव्य के चाक्षुन प्रत्यक्ष में भी रूप सहायककारण है । केवल द्रव्य ही नहीं जिस किसी का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष हो - रूप किसी न किसी प्रकार अपेक्षित होगा ही । फलतः चक्षु से सभी ज्ञानकार्यों के सम्पादन में रूप सहायककारण है । यह शुक्ल, नील, पीत, हरित, रक्त, कपिश, और चित्र मेद से सात प्रकार का है । चित्र रूप के प्रसङ्ग में कुछ विवाद है । कुछ लोग कथित नीलादि रूपों से भिन्न चित्र नाम का कोई अतिरिक्त रूप नहीं मानते । सिद्धान्तियों का कहना है कि संयोग की तरह रूप अपने किसी आश्रय के एक अंश में रहे और दूसरे भंश में नहीं ऐसा नहीं होता ( रूप अव्याप्यवृत्ति नहीं है ) किन्तु रूप अपने आश्रय के सभी अंशों में रहता है ( अतः वह व्याप्यवृत्ति है ) इस नियम के अनुसार जो छींट प्रभृति अनेक रङ्गों के कपड़े हैं, उनमें कोई रूप सभी अंशों में नहीं है । किन्तु वे भी रूपवाले द्रव्य हैं क्योंकि उनका चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है । तस्मात् उनमें नीलादि से भिन्न कोई रूप मानना पड़ेगा । वही चित्र रूप है । पृथिवी में ये सभी रूप रहते हैं । जल और तेज इन दोनों में केवल शुक्ल रूप । शुक्ल रूप को छोड़कर और किसी रूप के आवान्तर वास्तविक भेद नहीं हैं । शुक्ल रूप भास्वर और अभास्वर भेद से दो प्रकार का है । जल में अभास्वर शुक्लरूप है, और तेज में भास्वर शुक्ल रूप है । रस केवल रसनेन्द्रिय से ज्ञात होनेवाले गुण को रस कहते हैं । यह मधुर अम्ल लवण कटु कपाय और तिक्त भेद से छः प्रकार का है । यह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में ही रहता है । पृथिवी में सभी प्रकार के रस रहते हैं, और जल में केवल मधुर रस ही रहता है । गन्ध प्राण से ज्ञात होनेवाले गुण को ' गन्ध ' कहते हैं । यह सुगन्ध और दुर्गन्ध भेद से दो प्रकार का है, एवं यह केवल पृथिवो में ही रहता है । स्पर्ध केवल त्वचा रूप इन्द्रिय से शांत हो सकनेवाले गुण को स्पर्श कहते हैं । यह पृथिवो, जल, तेज, ओर वायु इन चार द्रव्यों में रहता है । शीत उष्ण और अनुष्णाशीत For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( १६ ) भेद से यह चार प्रकार का है । शीतस्पर्श जल में, उष्णस्पर्श तेज में, अनुष्णाशीत स्पर्श पृथिवी और वायु में रहता है । अनुष्णाशीत स्पर्श भी पाकज और अपाकज भेद से दो प्रकार का है । इनमें पाकज अनुष्णाशीत स्पर्श पृथिवी में ( पाक से पृथिवी का अनुष्णाशीतस्पर्श परिवर्तित हो सकता है ) और अपाकज अनुष्णाशीत स्पर्श वायु रहता है । इनमें से जल के परमाणुओं में रहनेवाले रूप रस और स्पर्श एवं तेज के परमाणुओं में रहनेवाले रूप और स्पर्श और वायु के परमाणुओं में रहनेवाले स्पर्श नित्य हैं । एवं कार्य रूप जलादि में रहनेवाले रूपादि अनित्य हैं । किन्तु पृथिवी के परमाणुओं में रहनेवाले रूप रस गन्ध और स्पर्श भी अनित्य ही हैं । कार्य रूप पृथिवी में रहनेवाले रूपादि तो अनित्य हैं ही । इसका यह हेतु है कि का परिवर्तित होना प्रत्यक्ष से सिद्ध है । वयव परमाणुओं में रूपादि परिवर्तन के पाक के द्वारा पृथिवी में अवयवियों के बिना संभव रहनेवाले रूप रस गन्ध और स्पर्श रूपादि का यह परिवर्तन परमा-नहीं है । अतः पार्थिव परमाणुओं के रूपादि को अनित्य मानना पड़ता है । यह वैशेषिक दर्शन का खास विषय है, अतः इस विषय का विवरण कुछ विस्तृत रूप से देता हूँ । पाकजरूपादि समवायिकारणों में रहनेवाले गुण ही जन्यद्रव्यों में रहनेवाले गुणों का असमवायि-कारण है । शतशः देखी हुई यह व्याप्ति ही ' कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते ' इस न्याय में पर्यवसित हुई है । जब तक सूत लाल न हों तब तक कपड़े लाल नहीं होते । श्याम कपालों से श्याम घट ही उत्पन्न होते हैं । किन्तु श्यामकपाल से उत्पन्न श्यामघट ह आग में पकने पर लाल हो जाता है । अतः प्रत्यक्ष दृष्ट रक्तघट की उत्पत्ति उक्त न्याय से रक्तकपालों से ही माननी पड़ेगी । फलतः कपालों का रक्त रूप ही घट में दीखनेवाले रक्त रूप का असमवायिकारण है । रक्त रूप की उत्पत्ति की यह प्रणाली घटक उत्पादक व्यसरेणु तक अबाधित गति से चलेगी । उक्त रीति के अनुसार घट के उत्पादक द्वय्णुक में रहनेवाले रक्त रूप की उत्पत्ति द्वणुक के उत्पादक दोनों परमाणुओं में रहनेवाले रेक्त रूप से होगी । किन्तु प्रश्न यह है कि उन परमाणुओं में रक्त रूप आया कहाँ से? क्योंकि श्यामघट के उत्पादक परमाणु ही इस रक्त घट के भी उत्पादक हैं । उन परमाणुओं में श्याम रूप का अनुमान घट की श्यामता से निरबाध है 1 अतः यही एक कल्पना अवशिष्ट रह जाती है कि अग्नि के विशेष प्रकार के संयोग ( पाक ) से उन परमाणुओं की श्यामता नष्ट हो जाती है, और उनमें रक्त रूप की उत्पत्ति होती है । किन्तु घट के बन जाने पर घट के उत्पादक परमाणुओं की स्वतन्त्र सत्ता है कहाँ? वे तो अपने कार्य द्वणुकों को अपने में समेट कर अपनी स्वतन्त्रता खो चुके हैं । अ: द्व्यणुकों में समवेतत्व सम्बन्ध से विद्यमान परमाणुओं में रहनेवाले श्याम रूप का नाश पाक नहीं हो सकता । अतः उन परमाणुओं में रक्त रूप की उत्पत्ति की सम्भावना ही नहीं है । अतः यह कल्पना करनी पड़ती है कि जिन अवयवियों की परम्परा से श्याम घट का For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( १७ ) निर्माण हुआ था, द्वयणुक पर्यन्त के वे सभी अवयवी अग्नि के संयोग से बिनष्ट जाते हैं । नित्य होने के कारण परमाणु विनष्ट नहीं होते । इस प्रकार उक्त श्याम घट के आरम्भक सभी परमाणुओं के अलग हो जाने पर उनमें से प्रत्येक परमाणु में पाक से श्याम रूप का नाश हो जाता है । और पाक से ही उनमें रक्त रूप की उत्पत्ति होती है 1 ।. इसी प्रकार पहिले के रस गन्ध और स्पर्श भी नष्ट हो जाते हैं और उनमें दूसरे रसादि की उत्पत्ति होती है । इन दूसरे रूप रस गन्ध और स्पर्श से युक्त परमाणुओं के द्वारा पुनः द्वयणुकादि के क्रम से दूसरे पक्व घट की उत्पत्ति होती है । उसमें कथित कारणगुण क्रम से ही रक्तरूपादि की उत्पत्ति होती है । इस पके हुए घट में ' यही वही घट है जिसे पकने के लिए दिया गया था ' इस प्रकार की जो प्रत्यभिज्ञा होती है, उसका कारण पके हुए और बिना पके हुए दोनों घटों का ऐक्य नहीं है । ऐक्य न रहने पर भी सादृश्य के कारण प्रत्यभिज्ञा होती है । जैसे कि ' सेयं दीपज्वाला ' इत्यादि स्थलों में होती है । वैशेषिकों का यह सिद्धान्त ' पिलुपाकवाद के ' नाम से प्रख्यात है । ' पिल ' परमाणुओं का ही दूसरा नाम 1 किन्तु नैयायिक लोग इस बात को नहीं मानते । उन लोगों का कहना है कि पका हुआ घट और बिना पका हुआ घट - दोनों एक ही हैं । इस ऐक्य से ही ‘ सोऽयं घट: ’ इत्यादि प्रत्यभिज्ञायें होती हैं । सम्भव होने पर किसी प्रतोति का गौणार्थक मानना उचित नहीं है । अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा वस्तुतः ऐक्यमूलक ही है, सादृश्य - मूलक नहीं । तदनुसार सम्पूर्ण घट रूप अवयवी में ही पाक होता है भट्ठी में डाले गये घट का छिद्र से देखने पर प्रत्यक्ष भी होता है । अतः उक्त स्थल में घट का विनाश मानना प्रत्यक्षविरुद्ध भी है । उक्त प्रत्यभिज्ञा स विरुद्ध होने के कारण ' कारणगुणाः कार्य-गुणानारभन्ते ' इस नियम को पाकज रूपादि से अतिरिक्त विषय के लिए सङ्कुचित करना पड़ेगा । प्रत्येक अवयवी अनन्तछिद्रों से युक्त है, अतः उन छिद्रों के द्वारा अति तीक्ष्ण तेज भीतर प्रविष्ट होकर अवयवी को बाहर और भीतर पका देता है । अतः अनुभव से विरुद्ध कच्चे घट का विनाश और पके घट की उत्पत्ति मानने की कोई आवश्यकता नहीं है । संख्या ‘ यह एक है, ये दो हैं, ये तीन हैं ' इत्यादि व्यवहार जिस गुण से उत्पन्न हों, वहीं ' संख्या ' है । यह एकत्व और द्वित्वादि से लेकर परार्द्ध पर्यन्त अनन्त प्रकार की है । इनमें एकत्त्र संख्या की नित्यता और अनित्यता उसके आश्रय की नित्यता और अनित्यता के अनुसार होती है घट अनित्य है अतः उसमें रहनेवाली एकत्व संख्या भी अनित्य है, आकाश नित्य है, अतः उसमें रहनेवाली एकत्व संख्या भी नित्य हैं, किन्तु द्वित्वादि सभी संख्यायें अनित्य ही हैं, चाहे उनके आश्रय नित्य हों या अनित्य । क्योंकि इन संख्याओं के व्यवहार करनेवाले पुरुषों की बुद्धि से इसकी उत्पत्ति होती है । जिस घट में पट को साथ लेकर कोई पुरुष द्वित्व का व्यवहार करता है, उसी घट में पट और दण्ड को For Private And Personal