प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 121–130

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 121–130

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ४६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दली संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य -कार्य्यत्वानित्यत्वे कारणवतामेव । कारणों से उत्पन्न पदार्थों के कार्यत्व और अनित्यत्व ये दो साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली कार्य्यत्वानित्यत्वे कारणवतामेव । येषां द्रव्यादीनामुत्पत्तिकारण-मस्ति तेषां कार्य्यत्वमनित्यत्वञ्च धर्मो न सर्वेषामित्यर्थः । स्वकारणे सम-वायः, प्रागसतः सत्तासमवायो वा कार्यत्वमित्येके । तदयुक्तम्, प्रध्वंसे तद-भावात् । तस्मात् कारणाधीनः स्वात्मलाभः काय्र्यत्वमिति लक्षणम्, व्याप-कत्वात् । प्राक्प्रध्वंसाभावोपलक्षिता वस्तुनः सत्त्वानित्यत्वमिति केचित् । तद-युक्तम्, अप्रतीतेः । अनित्य इति विनाशीत्येवं लोकः प्रत्येति, न तु सत्ता-विशिष्टताम् । उत्पत्तिविनाशयोगित्वमित्यपरः ।, प्रागभावे तदप्यसारम् उत्पत्तेरभावात्, तस्याप्यनित्यत्वेन लोके सम्प्रतिपत्तेः । तस्मात् स्वरूपविनाश एवानित्यत्वमिति । यथोक्तम् - " अनित्यत्वं विनाशाख्यं क्रियासामान्ययमुच्यते " इति । ' कार्य्यत्वानित्यत्वे कारणवतामेव ' अभिप्राय यह है कि कारणों से जिन द्रव्यादि वस्तुओं की उत्पत्ति होती है: कारणत्व और अनित्यत्व उन्हीं पदार्थों के साधर्म्य हैं, सभी पदार्थों के नहीं । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) कारणों में कार्यों का समवाय ही उनका ' कार्यत्व ' है या पहिले से अविद्यमान कार्यों में ' सत्ता ' ( जाति ) का समवाय सम्बन्ध ही ' कार्यत्व ' है । ( उ ० ) किन्तु ये दोनों ही पक्ष अयुक्त हैं, क्योंकि ध्वंसात्मक कार्य्यं में इन दोनों में से एक प्रकार का भी कार्यत्व नहीं है, अतः कार्यत्व लक्षण के सभी लक्ष्यों में रहने के कारण " कारणों से अपने स्वरूप का लाभ हो " काय्र्यत्व का लक्षण है । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) जिन वस्तुओं का कभी प्रागभाव रहे और कभी जिनका ध्वंस भी हो उनमें रहनेवाली ' सत्ता ' हो ' अनित्यत्व ' है । ( उ ० ) किन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि अनित्यत्व की प्रतीति इस आकार को नहीं होती है । ' अनित्यत्व ' शब्द से विनाशशीलत्व की ही प्रतीति होती है, किसी प्रकार की सत्ता की नहीं । ( प्र ० ) कोई कहते हैं कि उत्पत्ति और विनाश दोनों का सम्बन्ध ही ' अनित्यत्व ' है । ( उ ० ) किन्तु यह पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रागभाव में अनित्यत्व की सार्वजनीन अबाधित प्रतीति होती है, किन्तु उसमें उत्पत्ति का सम्बन्ध नहीं है । अतः वस्तुओं के स्वरूप का नाश हो अनित्यत्व है । जैसा कहा भी है कि विनाश नाम की सामान्य क्रिया ही ' अनित्यत्व ' शब्द से कही जाती है । ( प्र ० ) यद्यपि वस्तुओं की वर्तमान यादि को पुण्य नहीं होता, एवं अधर्म नहीं होता, अतः यह कथन तीन के हो साधम्यं हैं । ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध सुरापानादि से शूद्रादि को असङ्गत है कि उक्त धर्माधर्मकत्व केवल द्रव्यादि For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् कारणत्वञ्चान्यत्र पारिमाण्डल्यादिभ्यः । ४७ पारिमाण्डत्य प्रभृति पदार्थों को छोड़कर और सभी पदार्थों का कारणत्व साधर्म्य है । यद्यपि विनाशो वस्तुकाले न्यायकन्दली नास्ति, तथापि प्रमाणान्तरसिद्धसद्भावो भवत्येव विशेषणम्, अनित्यो घट इति प्रत्येतुरेकत्वात् । तथा लोके विनाशि शरीरमध्रुवा विषया इति । कारणत्वञ्चान्यत्र पारिमाण्डल्यादिभ्य इति । पारिमाण्डल्यमिति परमाणुपरिमाणम्, आदिशब्दाद् द्वयणुकपरिमाणम्, आकाशकालदिगात्मनां विभुत्वमन्त्यशब्दमनः परिमाणं परत्वापरत्वे द्विपृथक्त्वमत्यावयविपरिमाणञ्चेत्यादि दशा में विनाश नहीं रहता है । ( उ ० ) तथापि जिसकी सत्ता प्रमाण सिद्ध से है, वह भी अवश्य विशेषण ही होता है । साधारण जनों को भी इस प्रकार की स्वारसिक प्रतीतियाँ होती हैं कि शरीर विनाशशील है, सभी वस्तु चिरकाल तक रहनेवाली नहीं हैं । ' पारिमाण्डल्य ' शब्द का अर्थ है परमाणुओं का परिमाण । ( पारिमाण्डल्यादि पद में प्रयुक्त ) ' आदि ' पद से आकाश काल, दिशा और आत्मा इन चार पदार्थों का ' विभुत्व ' अर्थात् परममहत्परिमाण अन्तिम शब्द मन का परिमाण तथा उसी का परत्व और अपरत्व, द्विपृथक्त्व, अन्त्यावयवी द्रव्य ( जो अवयवी किसी दूसरे अवयवी का अवयव न हो, जैसे घट ) का परिमाण, ये सभी अभिप्रेत हैं । इनसे भिन्न द्रव्यादि तीन १. पूर्वपक्षी का आशय है कि विनाश ही अगर अनित्यत्व हो तो ' घटोऽनित्यः ' इस प्रकार की विशिष्ट प्रमाबुद्धि नहीं होगी, क्योंकि विशिष्ट प्रमा के लिए विशेष्य में विशेषण का रहना आवश्यक है । जब तक घटरूप विशेष्य रहेगा, तब तक उसमें विनाशरूप अनित्यत्व नहीं रहे । और जब घट विनष्ट हो जाएगा, तब अनित्यत्वरूप विशेषण रहेगा कहाँ? सुतरम् चूँकि विद्यमान वस्तु और विनाश दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः उनमें विशेष्यविशेषणभाव नहीं हो सकता । २. इस समाधान ग्रन्थ का आशय है कि विशेष्यविशेषणभाव के लिए दोनों का एक समय में रहना आवश्यक नहीं है, केवल इतना ही आवश्यक है कि दोनों प्रमाणसिद्ध हों एवं परस्पर सम्बद्ध हों । इसका भी कोई बन्धन नहीं है कि वह सम्बन्ध आधारा-घेयभाव का नियामक ही हो । अतः ' घटो विनष्ट: ' इत्यादि विशिष्ट प्रतीति के अनुरोध से घट और विनाश में भी प्रतियोगित्वादि सम्बन्ध की कल्पना करेंगे । अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ४८ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्य वैधर्म्य-द्रव्याश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः । नित्य द्रव्यों को छोड़कर और सभी पदार्थों का द्रव्य में आश्रित रहना साधर्म्य है | न्यायकन्दली ग्राह्यम् । एतानि परित्यज्यापरेषां द्रव्यादीनां त्रयाणां कारणत्वं समवाय्यसम-वायिकारणत्वम् । यद्यपि द्रव्यस्य नासमवायिकारणत्वम्, न च समवायिकारणत्वं गुणकर्मणोः, तथापि निमित्तकारणविलक्षणतयेदं साधर्म्यमुक्तम् । द्रव्याश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति । नन्वाश्रितत्वं षण्णा-मित्युक्तं तेनेदं पुनरुक्तम्? न पुनरुक्तम्, द्रव्योपलक्षितस्याश्रितत्वस्यात्र विवक्षितत्वादिति कश्चिद् । तदयुक्तम्, सामान्यादीनामपि द्रव्योपलक्षितस्या-श्रितत्वस्य सम्भवान्नेदं द्रव्यादित्रयसाधर्म्यकथनं स्यात् । तस्मादित्थं व्याख्येयम् । अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति द्रव्यग्रहणमुपलक्षणम्, तद्वृत्तयोऽन्त्या विशेषास्तेऽपि गृह्यन्ते । नित्यद्रव्याणि तद्गतांश्च विशेषान् परित्यज्य द्रव्य एवाश्रितत्वं द्रव्यादीनां त्रयाणां साधम्र्म्यं नापरेषामित्यर्थः । पदार्थों का ' कारणत्व ' साधर्म्य है । यहाँ कारणत्व शब्द से समवायिकारणत्व और असमवायिकारणत्व हो इष्ट है । यद्यपि द्रव्यों में असमवायिकारणत्व नहीं है, एवं गुण और कर्म्म में समवायिकारणत्व नहीं है, किन्तु यहाँ ' क रणत्व ' शब्द से ' निमित्तकारणभिन्नकारणत्व ' रूप साधर्म्य ही विवक्षित है । ( यह साधर्म्य द्रव्यादि तीनों वस्तुओं में समान रूप से है ) । " द्रव्याश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः " । ( प्र ० ) पहिले कह चुके हैं कि आश्रितत्व ( नित्य द्रव्यों को छोड़कर ) छः पदार्थों का साधर्म्य है । फिर वही बात कहते हैं, अतः इसमें पुनरुक्ति दोष है । ( उ ० ) इस दोष का परिहार कोई इस प्रकार करते हैं कि पहिले केवल ' आश्रितत्व ' साधर्म्य का उल्लेख है, अब ' द्रव्यादि तत्व ' साधर्म्य कहते हैं । दोनों में कुछ अन्तर अवश्य है, अतः पुनरुक्ति दोष नहीं है । किन्तु यह समाधान ठीक नहीं है, क्योंकि यह द्रव्यादि तीन वस्तुओं के साधर्म्य का प्रकरण है, अतः द्रव्याश्रितत्व रूप प्रकृत साधर्म्यं सामान्यादि पदार्थों में अतिप्रसक्त होगा, इसलिए प्रकृत पक्ति की व्याख्या इस प्रकार करनी चाहिए कि प्रकृत " अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः " इस वाक्य में प्रयुक्त द्रव्य ' पद उपलक्षण है ( ' द्रव्याश्रितत्व ' शब्द का अर्थ है, द्रव्यरूप समवायिकारण से उत्पन्न होना, तदनुसार ) नित्य द्रव्य और उनमें रहनेवाले ' विशेष ' अर्थात् नित्य गुणों को छोड़कर द्रव्यादि और कर्म्म तीन वस्तुओं का ( फलतः अनित्य द्रव्य, अनित्य गुण इन तीन वस्तुओं का ) ' द्रव्याश्रितत्व ' अर्थात् द्रव्यरूप समवायिकारण से उत्पन्न होना साधर्म्य है, औरो का नहीं । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ७ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् II प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal सामान्यादीनां त्रयाणां स्वात्मसचं बुद्धिलक्षणत्वमकार्यत्व-मकारणत्वमसामान्य विशेषवत्त्वं नित्यत्वमर्थशब्दानभिधेयत्वञ्श्चेति सामान्य प्रभृति तीन पदार्थों का अर्थात् सामान्य, विशेष, और समवाय इन तीन पदार्थों का ' स्वात्मसत्त्व ' अर्थात् सत्ता जाति के बिना सत्ता, बुद्धि-लक्षणत्व, अकार्य्यत्व, अकारणत्व, असामान्यविशेषवत्त्व, नित्यत्व और ' अर्थ ' शब्द IT अभिधेय न होना ये सात साधर्म्य हैं । सम्प्रति सामान्यादीनां साधर्म्यमाह - सामान्यादीनामिति । स्वात्मैव सत्त्वं स्वरूपं यत्सामान्यादीनां तदेव तेषां सत्त्वम्, न सत्तायोगः सत्त्वम् । एतेन सामान्या-दीनां त्रयाणां सामान्यरहितत्वं साधर्म्यमुक्तमित्यर्थः । कथमेतत्? बाधकसद्भावात्, सामान्ये सत्ता नास्ति, अनिष्टप्रसङ्गात् । विशेषेष्वपि सामान्य-सद्भावे संशयस्यापि सम्भवात् । निर्णयार्थं विशेषानुसरणेऽप्यनवस्थैव । समवायेऽपि सत्ताभ्युपगमे तद्वृत्त्यर्थं समवायाभ्युपगमादनिष्टापत्तिरेव दूषणम् । गोत्वादिष्वपरजातिमत्त्वेन व्याप्तस्य सत्तासम्बन्धस्य तन्निवृत्तौ निवृत्तिसिद्धिः । कुतस्तहि सामान्यादिषु सत्सदित्यनुगमः? स्वरूप सत्त्वसाधर्म्येण सत्ताध्यारो-द्रव्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य कहकर अब ' सामान्यादीनाम् ' इत्यादि से सामान्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्यं कहते हैं । अर्थात् सामान्यादि का ' आत्मा ' अर्थात् स्वरूप ही ' सत्त्व ' है । ( द्रव्यादि तीनों की तरह ) सत्ता जाति का सम्बन्ध उनकी ' सत्ता ' नहीं है । इससे सत्ता जाति से रहित होना सामान्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य कथित होता है | ( प्र ० ) सामान्यादि में सत्ता क्यों नहीं है? ( उ ० ) सामान्यादि तीन पदार्थों में सत्ता मानने में यह बाधा है कि इससे ' अनवस्था ' होगी । विशेषों में भी अगर सामान्य की सत्ता मानें तो वहाँ संशय हो सकता है कि ये विशेष एकजातीय हैं या विभिन्न जातीय? और तब फिर सभी नित्य द्रव्यों में यह संशय होगा । निश्चय करने के लिए अगर और विशेष निश्चयों के पीछे दौड़ेंगे तो अनवस्था होगी । समवाय में अगर सत्ता जाति मानेंगे तो उसके सम्बन्ध के लिये दूसरे समवाय की कल्पना करनी पड़ेगी । इस प्रकार इसमें भी अनवस्था होगी । और भी बात है, जहाँ जहाँ सत्ता जाति रहती है, उन सभी स्थानों में गोत्वादि अपर जातियों में से भी कोई जाति अवश्य ही रहती है । सत्ता और गोवादि अपर जातियों की यह व्याप्ति गोप्रभृति वस्तुओं में सिद्ध है । सामान्यादि में कोई भी अपरजाति नहीं है अतः सत्ता जाति भी उनमें नहीं है । ( प्र ० ) फिर सामान्यादि में ' ये सत् हैं ' इस प्रकार की प्रतीति क्यों होती है? ( उ ० ) सामान्यादि में रहनेवाली ' स्वरूपसत्ता ' और सत्ता जाति इन दोनों के सादृश्य से सामान्यादि पदार्थों में सत्ता जाति का आरोप

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५० न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ साधम्र्म्मवैधयं-पात् । तहि मिथ्याप्रत्ययोऽयम्? को नामाह नेति । भिन्नस्वभावेष्वेकानुगमो मिथ्यैव, स्वरूपग्रहणन्तु न मृषा, स्वरूपस्य यथार्थत्वात् । द्रव्यादिष्वपि सत्ता-ध्यारोपकृत एवास्तु प्रत्ययानुगमः? नैवम् सति मुख्येऽध्यारोपस्यासम्भवात् । न चेयं सामान्यादिष्वेव मुख्या, बाधकसम्भवाद् द्रव्यादिषु च तदभावात् । बुद्धिलक्षणत्वमिति । बुद्धिरेव लक्षणं प्रमाणं येषां ते बुद्धिलक्षणाः, विप्रतिपन्नसामान्यादिसद्भावे बुद्धिरेव लक्षणं नान्यत्, द्रव्यादिसद्भावे त्वन्यदपि तत्काय्यं प्रमाणं स्यादित्यर्थः । कश्चित् पुनरेवमाह - बुद्ध्या लक्ष्यन्ते प्रतीयन्त इति बुद्धिलक्षणाः । तदयुक्तम्, द्रव्यादेरपि स्वबुद्धिलक्षणत्वान्नेदं वैधर्म्यमुक्तं स्यात् । होता है । इसी आरोप से सामान्यादि पदार्थों में भी एक प्रकार की सत् है ' इस आकार की प्रतीति होती है । ( प्र ० ) तो फिर सामान्यादि में उक्त एक आकार की सत्त्व की प्रतीति भ्रमरूप है? ( उ ० ) कौन कहता है कि भ्रम रूप नहीं है? भिन्न स्वभाव की वस्तुओं में एक आकार की प्रतीति अवश्य ही भ्रम है । किन्तु उनके स्वरूपों का ज्ञान यथार्थ ही है, क्योंकि वे उनमें ठीक ही हैं । ( प्र ० ) फिर द्रव्यादि तीनों पदार्थों में भी ( सामान्यादि की तरह ) स्वरूपसत्व के आरोप से सत्ता की एक आकार की प्रतीति को भी मिथ्या क्यों नहीं मान लेते? ( उ ० ) इस लिए कि मुख्य प्रतीति के सम्भव होने पर आरोप मानना अनुचित है । यह भी सम्भव नहीं है कि सामान्यादि में ही सत्त्व को एक आकार की प्रतीति को ही मुख्य मान लें, क्योंकि ऐसा मानने में अनवस्था आ जाती है । द्रव्यादि तीनों पदार्थों में सत्त्व की एक आकार की प्रतीति को मुख्य मानने में इस प्रकार की कोई बाधा नहीं है । ' बुद्धिलक्षणत्वम् ', " बुद्धिरेव लक्षणं प्रमाणं येषां ते बुद्धिलक्षणा: " इस व्युत्पत्ति के अनुसार बुद्धि ही जिनका प्रमाण है, वे ही बुद्धिलक्षण कहे जाते हैं । अभिप्राय यह है कि द्रव्यादि के प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवालों को द्रव्यादि के कर्यों से भी समझाया जा सकता है । किन्तु सामान्यादि के प्रसङ्ग में विरुद्धमत रखनेवालों को समझाने के लिए बुद्धि ही एक अवलम्ब है । ( प्र ० ) किसी सम्प्रदाय के व्यक्ति ' बुद्धधा लक्ष्यन्ते प्रती-यन्ते इति बुद्धिलक्षणा: " इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत बुद्धिलक्षण ' शब्द की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि " जो बुद्धि से ही प्रतीत हों वे ही बुद्धिलक्षण हैं " । ( उ ० ) किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकार का बुद्धिलक्षणत्व तो द्रव्यादि में भी है, फिर यह ' बुद्धिलक्षणत्व ' रूप सामान्यादि तीन पदार्थों के साधर्म्य को द्रव्यादि पदार्थों का वैधर्म्य कहना सम्भव न होगा? । १. अभिप्राय यह है कि ग्रन्थ के आदि में पदार्थ एवं उनके साधर्म्यवैधर्म्य के निरूपण को प्रतिज्ञा कर चुके हैं । उसके बाद पदार्थ एवं उनके साधयों का विस्तार से निरूपण For Private And Personal

पृष्ठ 126

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 126 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषावादसहितम् न्यायकन्दली ५१ अकार्यत्वं कारणानपेक्षस्वभावत्वम्, तच्च सामान्ये तावद् व्यक्तेः पूर्वमूर्ध्वं व्यक्तिकाले चावस्थितिग्राहकेण कारणाभावोपलब्धिसहकारिणा भूयो -दर्शनजसंस्कारानुगृहीतेन प्रत्यक्षेणैव व्याप्तिवद् गृह्यते । समवायस्याप्य कार्य्य त्वं पूर्वापरसहभावानवक्लृप्तेः, यदि हि पटस्य समवायः पटात् पूर्वं सम्भवति, असति अकार्यत्व शब्द का अर्थ है अपनी ( स्वरूप ) सत्ता के लिए कारणों की अपेक्षा न रखना । सामान्यादि के आश्रय द्रव्यादि व्यक्तियों में तीनों कालों में हो सामान्य की सत्ता के ज्ञापक एवं सामान्यादि के कारणों के अभावज्ञान का सहायक तथा बार बार के देखने से उत्पन्न संस्कार के द्वारा विशेष बलप्राप्त प्रत्यक्ष के द्वारा ही व्याप्ति की तरह इस अकार्यत्व का ज्ञान होता है । समवाय में भी अकार्यत्व है ही, क्योंकि समवाय को कार्य मानने की कोई रीति उपपन्न नहीं होती है । समवाय को अगर कार्य मानें तो फिर उसकी किया है । वैषम्यनिरूपण के लिए साधम्र्म्यनिरूपण के अन्त में लिखा है कि " एवं सर्वत्र साधर्म्य विपर्ययाच्च वैधर्म्यम् ” अर्थात् इस प्रकार ये साधर्म्य हैं और ( ये हो साधम्र्म्य ) उनसे भिन्न वस्तुओं में न रहने के कारण उनके वैधर्म्य हैं । तदनुसार ' सामान्या-दीनाम् " इत्यादि प्रकृत पक्ति का एक यह भी अर्थ मानना पड़ेगा कि ' ये सभी स्वात्म-सत्त्वादि तीन पदार्थों से भिन्न पदार्थों के वैधर्म्य भी हैं । अगर बुद्धिलक्षणत्व शब्द को ऐसी व्याख्या करें जिसके अनुसार यह द्रव्यादि में भी रह सके तो फिर प्रकृत पक्ति से उक्त वैधर्म्य का आक्षेप सम्भव न हो सकेगा । १. अभिप्राय यह है कि एक घट व्यक्ति की उत्पत्ति के पहिले भी उससे पहिले के घट में घटत्व की प्रतीति होती है । एवं एक घट व्यक्ति के नष्ट हो जानेपर भी दूसरे अविनष्ट घट में घटत्व की प्रतीति होती है । वर्त्तमान घट में घटत्व की प्रतीति में तो कोई विवाद ही नहीं है, अतः यह समझते हैं कि व्यक्ति के तीनों कालों में ही जाति की सत्ता रहती है । ऐसी स्थिति में सामान्य को अगर किसी कारण का कार्य माने तो वह कारण उसके आश्रयीभूत व्यक्तियों के कारणों में से ही होगा या उसके सदृश ही कोई दूसरा होगा, किन्तु किसी भी प्रकार से सामान्य में कार्यत्व मान लेने से उसकी उक्त त्रैकालिक प्रतीति को उपपत्ति नहीं होगी, अतः उक्त त्रैकालिक प्रतोति के कारणभूत प्रमाणों से ही यह भी समझते हैं कि सामान्यादि का कोई कारण नहीं है, अतः जिस प्रकार धूम और वह्नि के सामानाधिकरण्य के सूयोदर्शनजनित-संस्कार से युक्त पुरुष को घूम को देखते हो उसकी व्याप्ति भी दीखती है, उसी प्रकार व्यक्तियों में सामान्य का प्रत्यक्ष होते ही उसी प्रत्यक्ष प्रमाण से उसमें रहनेवाले अकार्यस्व का भी ज्ञान हो जाता है । For Private And Personal

पृष्ठ 127

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 127 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५२ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ साधर्म्य वैधर्म्य -सम्बन्धिनि कस्यासौ सम्बन्धः स्याद् | अथ पटेन सहोत्पद्यते, तदा पटस्याना-धारत्वं प्राप्नोति । अथ पश्चाद्भवति, तथापि पटस्यानाधारत्वमेव न च कार्यत्वमनाधारं युक्तम्, तस्मादकृतकः समवायः | विशेषाणाञ्चाकाय्र्यत्वं वस्तुत्वे सति द्रव्यगुणकर्मान्यत्वात् सामान्यसमवायवत् सिद्धम् । अकारणत्वं - समवाय्यसमवायिकारणत्वाभावः, न तु निमित्तकारण-त्वप्रतिषेधः, बुद्धिनिमित्तत्वाभ्युपगमाद् । असामान्यविशेषवत्त्वम् अपर-जातिरहितत्वमित्यर्थः । सामान्येषु सामान्यनाम नापरं सामान्यमस्ति, अत्रापि सामान्यप्राप्त्याऽनवस्थानात् । विशेषसमवाययोस्तु सामान्याभावे कथित एव निम्नलिखित तीन ही गति हो सकती है कि ( १ ) समवाय अपने पटादिरूप प्रतियोगी से पूर्व ही उत्पन्न हो, या ( २ ) अपने प्रतियोगी से पीछे उत्पन्न हो ( ३ ) अथवा प्रतियोगी के साथ ही उत्पन्न हो । किन्तु इनमें से कोई भी प्रकार सम्भव नहीं है, ( १ ) क्योंकि सम्बन्ध बिना प्रतियोगी के नहीं होता है । अगर समवाय की उत्पत्ति से पूर्व पट को सत्ता नहीं रहेगी तो फिर पट से पूर्व उत्पन्न वह समवाय किसका सम्बन्ध होगा? अतः समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के पहिले उत्पन्न नहीं हो सकता । ( २ ) समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के साथ साथ भी उत्पन्न नहीं हो सकता है, क्योंकि इससे पटादि कार्य समवाय के आधार ही नहीं हो सकते, क्योंकि आधार को आधेय से पूर्व रहना आव-श्यक है । सुतरामु एक ही क्षण में उत्पन्न दो वस्तुओं में आधाराधेयभाव असम्भव है । ( ३ ) समवाय की उत्पत्ति अगर पटादि कार्यों की उत्पत्ति के बाद मानें फिर भी पटादि की अनाधार उत्पत्ति की आपत्ति रहेगी, क्योंकि पट की उत्पत्ति के समय अगर समवाय ही नहीं है तो फिर तन्तु में किस सम्बन्ध से पट की उत्पत्ति होगी? अतः समवाय अकार्य ही है । वह कारणों से उत्पन्न नहीं होता है । विशेष भी कार्य नहीं है, क्योंकि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों से भिन्न होने पर भी वह भाव पदार्थ है, जैसे कि सामान्य और समवाय । यहाँ अकारणत्व ' शब्द से समवायिकारणत्व और असमवायिकारणत्व इन दोनों का ही निषेध इष्ट है, निमित्तकारणत्व का नहीं, क्योंकि सामान्यादि में भी बुद्धि की निमित्तकारणता स्वीकृत है । ' असामान्यविशेषवत्त्व ' शब्द का अर्थ है अपरजातियों का न रहना । सामान्यों में सामान्यत्व नाम का कोई अपर सामान्य नहीं है, क्योंकि इससे अनवस्था होगी । समवायों और विशेषों में सामान्य के न रहने की युक्ति दिखला १. जातियों में जातित्व नाम का सामान्य मानने में अनवस्था इस प्रकार होती है कि द्रव्यत्व गुणत्वादि जितने सामान्य पहिले से स्वीकृत हैं उन सभी सामान्यों में जातित्व या सामान्यत्व नाम का एक और सामान्य मानना पड़ेगा, किन्तु यह For Private And Personal

पृष्ठ 128

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 128 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणं ] भाषानुवादसहितम् ५३ न्यायः । कथं तहि सामान्येषु प्रत्ययानुवृत्ति: सामान्यं सामान्यमिति? अनेक-व्यक्तिसमवायोपाधिवशाद् विशेषेष्वप्येकशब्दप्रवृत्तिः, अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धि-जनकत्वस्य सर्वत्र सम्भवात् । नित्यत्वं विनाशरहितत्वम्, तदपि सामान्यस्य व्यक्त्युत्पादविनाशयोरवस्थितिग्राहिणा भूयो भूयः प्रवृत्तेन निरुपाधिप्रत्यक्षेण व्याप्तिवन्निश्चीयते । समवायस्य तु सर्वत्र कार्य्योपलम्भादकृतकत्वाच्चानु-अर्थशब्दानभिधेयत्वञ्चेति । मीयते । साधर्म्यम् । चः समुच्चये । स्वसमयार्थशब्दानभिधेयत्वं चैतेषां चुके हैं । ( प्र ० ) फिर सभी सामान्यों में ' ये सामान्य हैं ' इस एक आकार की प्रतीति ( अनुवृत्तिप्रत्यय ) क्यों होती हैं? ( उ ० ) सभी सामान्य अनेक व्यक्तियों में रहते हैं, अतः यह " अनेक व्यक्तियों में रहना या अनेक व्यक्तिवृत्तित्व " रूप एक उपाधि सभी सामान्यों में है । इसी अनेक व्यक्तिवृत्तित्व - रूप उपाधि के कारण सभी सामान्यों में उक्त एक आकार की प्रतीति होती है । सभी विशेषों में भी ' ये विशेष हैं ' इस एक आकार की प्रतीति होती है । इसके लिए भी विशेषत्व नाम के सामान्य का मानना आवश्यक नहीं है । क्योंकि सभी विशेषों में जो अपने अपने आश्रय को विभिन्न पदार्थों से विलक्षण रूप से समझाने की क्षमता है, उसी क्षमता रूप एक उपाधि के बल से ही उक्त एकाकार की प्रतीति को उपपत्ति हो जाएगी । ' नित्यत्व ' शब्द का अर्थ है विनाश रहित होना । यह ( नित्यस्व ) भी व्यक्तियों की उत्पत्ति से पहिले और उनके नाश के बाद भी सामान्यों के वर्तमानता का ज्ञापक उनमें बार - बार प्रवृत्त प्रत्यक्ष प्रमाण से ही व्याप्ति की तरह ज्ञात होता है । समवाय से सभी स्थलों में ( सभी कालों में ) कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है, एवं समवाय किसी भी कारण से उत्पन्न हुआ नहीं दीखता है । इन्हीं दोनों हेतुओं से समवाय में नित्यत्व का अनुमान होता है । ' अर्थशब्दानभिधेयत्वश्व ' अर्थात् वैशेषिक शास्त्र में बिना विशेषण के केवल ' अर्थ ' शब्द से द्रव्य, गुण, कर्म इन तीनों के ही समकने का एक सङ्केत है । तदनुसार उक्त ' अर्थ ' शब्द का अभिधावृत्ति द्वारा न समझा जाना भी सामान्यादि तीनों का साधर्म्य है । ' च ' शब्द समुच्चय अर्थ का बोधक है । ' सामान्यत्व ' भी सामान्य ही होगा । यह सामान्यत्व - रूप सामान्य - द्रव्यत्वादि पहिले से स्वीकृत सामान्यों में तो रहेगा, किन्तु स्वाभिन्न सामान्यत्व - रूप सामान्य में न रहेगा, क्योंकि एक वस्तु में आधाराधेयभाव असम्भव है, अतः पूर्व स्वीकृत द्रव्यत्वादि सामान्य एवं अधुना स्वीकृत सामान्यत्व - रूप सामान्य एतत्साधारण एक दूसरे सामान्यत्व की कल्पना करनी पड़ेगी । इस प्रकार अनन्त सामान्यत्वों को कभी समाप्त न होनेवाली कल्पना की धारा चलेगी । यही अनवस्था है । For Private And Personal

पृष्ठ 129

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 129 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य -पृथिव्यादीनां नवानामपि द्रव्यत्वयोगः स्वात्मन्यारम्भकत्वं गुणवत्वं कार्यकारणाविरोधित्व मन्त्य विशेषवश्वम् । द्रव्यत्व जाति का सम्बन्ध, अपने में समवाय सम्बन्ध से कार्य को उत्पन्न करना, गुणवत्त्व, अपने कार्यों से या कारणों से विनष्ट न होना एवं अन्त्यविशेष ये पाँच साधर्म्य पृथिवी प्रभृति नौ द्रव्यों के हैं । न्यायकन्दली इदानी द्रव्याणामेव साधर्म्य निरूपयति - पृथिव्यादीनामिति । पृथिव्यादीनामेव द्रव्यत्वेन सामान्येन योग: सम्बन्धः । स कियतामत आह--नवानामपीति । अपिशब्दोऽभिव्याप्त्यर्थः । एतेन द्रव्यपदार्थस्येतरेभ्यो भेद-लक्षणमुक्तम् । द्रव्यशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तश्व चिन्तितम् । अत्र कश्चित् चोदयति- द्रव्यत्वयोगो द्रव्यत्वसमवायः, स च पश्वपदार्थधर्मत्वात् कथं द्रव्यलक्षणमिति । अपरः समाधत्ते -- यद्यपि सर्वत्राभिन्नः समवायः, तथापि द्रव्यत्वोपलक्षणभेदाद् द्रव्यस्य लक्षणम्, दृष्टो हि कल्पितभेदस्याप्याकाशस्य श्रोत्रभावेनार्थक्रियाभेद इति । द्वयमप्ये-' पृथिव्यादीनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ से अब केवल नौ द्रव्यों का ही साधर्म्यं कहते हैं । पृथिवी प्रभृति नो द्रव्यों का ही द्रव्यत्व जाति के साथ योग ' अर्थात् सम्बन्ध है । द्रव्यत्व जाति का यह सम्बन्ध पृथिव्यादि कितने द्रव्यों के साथ है? इसी प्रश्न का उत्तर ' नवानाम् ' इस पद से दिया है । ' नवानामपि ' इस वाक्य के ' अपि ' शब्द का अर्थ है ( सभी द्रव्यों में सम्बन्ध रूप ) ' अभिव्याप्ति ' । अर्थात् पृथिव्यादि नौ द्रव्यों में से किसी को न छोड़कर सभी द्रव्यों में रहना । इस अभिव्याप्ति से द्रव्य पदार्थ को गुणादि पदार्थों से भिन्न समझानेवाला स्वरूप कहा गया है । इससे ' द्रव्य ' शब्द का ' प्रवृत्तिनिमित्त ' भी निद्दिष्ट हो जाता है । इस प्रसङ्ग में कोई आक्षेप करते हैं कि प्रकृत ' द्रव्यत्वयोग ' शब्द का अर्थ है द्रव्यत्व का समवाय, वह द्रव्य से विशेष पर्यन्त पाँचों पदार्थों में समान रूप से है । फिर यह ' द्रव्यवयोग ' पृथिव्यादि नौ पदार्थों का हो ' साधर्म्य ' कैसे है? इस आक्षेप का समाधान कोई इस प्रकार कहते हैं कि यह ठीक है कि ( समवाय एक होने के कारण ) सभी स्थलों में एक ही है, किन्तु द्रव्यत्व रूप उपलक्षण ( प्रतियोगी ) के भेद से वह केवल द्रव्यों का ही लक्षण हो सकता है । एक हो वस्तु में उपलक्षण के भेद से विभिन्न कार्यों के सम्पादन की क्षमता देखी जाती है. जैसे एक ही आकाश के सर्वत्र रहने पर भी कर्णशष्कुली रूप उपाधि से श्रोत्र भावापन्न आकाश से ही शब्दश्रवण रूप कार्य्य होता है । किन्तु उक्त आक्षेप और उसका यह समाधान दोनों ही असङ्गत हैं, क्योंकि जिस प्रकार आकाश ही श्रोत्र है For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५५ तदसाधीय:, यथाकाशं श्रोत्रं नैवं योगो द्रव्यस्य लक्षणम्, किन्तु द्रव्य-त्वमेव तत्त्वसम्बद्धं लक्षणं न स्यादिति योगसङ्कीर्त्तनं लिङ्गस्य धर्मिण्यस्तित्वकथनम् । तथा चैवं प्रयोग: -- पृथिव्यादिकमितरेभ्यो भिद्यते द्रव्यत्वात्, येषामितरेभ्यो भेदो नास्ति तेषां द्रव्यत्वमपि नास्ति, यथा रूपादीना-मिति । तस्मादसच्चोद्यमसदुत्तरश्व । अन्यदपि द्रव्याणां साधर्म्यमाह - स्वात्मन्यारम्भकत्वमिति, स्वसमवेत-कार्य्यजनकत्वमित्यर्थः । गुणवत्त्वं गुणैः सह सम्बन्धः । एतदप्युभयं गुणादिभ्यो द्रव्याणां वैधर्म्यमन्यत्रासम्भवात् । कार्यकारणाविरोधित्वम् । गुणो हि क्वचित् कार्येण विनाश्यते, यथा आद्यः शब्दो द्वितीयशब्देन । क्वचित् कारणेन विनाश्यते, यथा अन्त्यः शब्द उपान्त्यशब्देन । कर्मापि कार्येण विनाश्यते, यथोत्तरसंयोगेन । द्रव्याणि तु न कार्येण विनाश्यन्ते नापि कारणेनेति कार्यकारणाविरोधीनि । नित्यानां कारणविनाशयोरभावादेव कारणेनाविनाशः, उसी प्रकार प्रकृत में ' योग ' अर्थात् द्रव्यत्व का समवाय रूप सम्बन्ध ही द्रव्यों का साधर्म्य या लक्षण नहीं है, किन्तु द्रव्यत्व ही द्रव्यों का लक्षण है । यह द्रव्यत्व बिना किसी असाधारण सम्बन्ध के लक्षण नहीं हो सकता, अतः ' योग ' शब्द का उल्लेख है । अर्थात् इस ' योग ' शब्द से ( इतरभेदानुमिति के पक्ष रूप ) धम्र्मी में ( उस अनुमिति के लक्षण रूप ) हेतु का अस्तित्व दिखलाया गया है । इससे अनुमान का यह रूप फलित होता है कि पृथिव्यादि नौ पदार्थ गृणादि और पदार्थों से भिन्न हैं, क्योंकि इनमें द्रव्यत्व है । जिनमें यह इतरभेद नहीं है, उनमें द्रव्यत्व भी नहीं है । अतः उक्त आक्षेप और उसका समाधान दोनों अशुद्ध हैं । ' सात्मन्यारम्भकत्वम् ' इत्यादि से द्रव्यों का और भी साधर्म्य कहते हैं, अर्थात् अपने में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले कार्यों का कारणत्व भी द्रव्यों का साधर्म्य है । ' गुणवत्त्व ' शब्द का अर्थ है गुण के साथ सम्बन्ध, ये दोनों ही गुणादि पदार्थों से द्रव्यों में असाधारण्य के सम्पादक हैं, क्योंकि द्रव्य से भिन्न किसी भी पदार्थ में इन दोनों की सम्भावना नहीं है । “ कार्य्यकारणाविरोधित्त्रम् " गुण कहीं अपने कार्य्यं से ही नष्ट होता है, जैसे कि पहिला शब्द दूसरे शब्द से, कहीं वह अपने कारण से भी नष्ट होता है, जैसे कि अन्तिम शब्द अपने अव्यवहितपूर्व के शब्द से । क्रिया भी अपने कार्य से नष्ट होती है, जैसे कि उत्तर देश के संयोग से; द्रव्य न अपने कार्यों से नष्ट होते हैं, न कारणों से ही, अतः द्रव्य कार्य और कारण दोनों के अविरोधी हैं । नित्य द्रव्यों का न कोई कारण हैं, न उनका विनाश ही होता है, अतः उनका विनाश कार्य और कारण किसी से भी नहीं होता है । अनित्य द्रव्यों का विनाश भी होता है, एवं उनके कारण भी होते हैं, किन्तु उनका विनाश अपने कारणों For Private And Personal