प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 131–140

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 131–140

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् अनाश्रितत्वनित्यत्वे चान्यत्रावयविद्रव्येभ्यः । [ साधर्म्य वैधर्म्य -पृथिव्युदकज्वलन पवनात्ममनसामनेकत्वापर जातिमन्वे । क्षितिजलज्योतिरनिलमनसां क्रियावश्व मूर्त्तत्वपरत्वापरत्व-अवयवी द्रव्यों को छोड़कर और सभी द्रव्यों के अनाश्रितत्व और नित्यत्व ये दो साधर्म्य हैं । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आत्मा और मन इन छः द्रव्यों के अनेकत्व और अपरजातिमत्त्व ये दो साधर्म्य हैं । पृथ्वी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों के क्रिया, मूर्त्तत्व, न्यायकन्दली अनित्यद्रव्याणां कारणविनाशयोः सम्भवेऽपि कारणेन न विनाशः, किन्त्वन्येनेति विवेकः । तथा अन्त्यविशेषवत्त्वमन्त्यविशेषयो गत्वमित्यर्थः ' । अनाश्रितत्वं क्वचिदप्यसमवेतत्वम्, नित्यत्वं विनाशरहितत्वश्व द्रव्याणां साधर्म्यम् । तत् किं सर्वेषां साधर्म्यमित्यत आह - अवयविद्रव्येभ्योऽन्यत्रेति । अवयविद्रव्याणि परित्यज्यान्त्यविशेषवत्त्वाना श्रितत्व नित्यत्वान्यन्यत्र सन्तीत्यर्थः । न केवलं पूर्वोक्ताः पृथिव्यादीनां धर्माः, किन्त्वनाश्रितत्वनित्यत्वे चेति चार्थः । द्रव्याणामेव परस्परसाधर्म्य वैधर्म्यश्व प्रतिपाद-यन्नाह —— पृथिव्युदकज्वलनपवनात्ममनसामिति । अनेकत्वं प्रत्येकं व्यक्तिभेदः । अपरजातिमत्त्वमिति पृथिवीत्वादिजातिसम्बन्धित्वम् । से नहीं होता है, अन्य वस्तुओं से होता है । इसी प्रकार ' अन्त्यविशेष ' शब्द का अर्थ है अन्त्यविशेष का सम्बन्ध । कभी भी समवाय सम्बन्ध से न रहना ही ' अनाश्रितत्व ' शब्द का अर्थ है । ' नित्यत्व ' शब्द का अर्थ है नाश को प्राप्त न होना, अनाश्रितत्व और नित्यत्व ये दोनों ही द्रव्य के साधर्म्य हैं । ये दोनों क्या सभी द्रव्यों के साधर्म्य हैं? इसी प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि " अवयविद्रव्येभ्योऽन्यत्र " अर्थात् अवयविद्रव्यों को छोड़कर और सभी द्रव्यों में अन्त्य विशेष, अना-श्रितत्व और अनित्यत्व ये तीनों रहते हैं । ' च ' शब्द से यह अभिप्रेत है कि पृथिवी प्रभृति द्रव्यों के पहिले कहे हुए साधम्यं ही नहीं है किन्तु प्रकृत अनाश्रितत्व और नित्यत्व भी उनके साधर्म्य हैं । पृथिव्यादि द्रव्यों में ही परस्पर साधम्यं और वैधर्म्य का निरूपण करते हुए “ पृथिव्युदकज्वलन मनसाम् " इत्यादि सन्दर्भ कहते हैं । प्रत्येक व्यक्ति में परस्पर भेद ही ' अनेकत्व ' शब्द का अर्थ है । ' अपरजातिमत्त्व ' शब्द से पृथिवीत्वादि जातियों को अधिकरणता अभिप्रेत है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ५७ araafa | परत्व, अपरत्व और वेगवत्त्व ये पाँच साधर्म्य हैं । क्षितिजलज्योतिरनिलमनसां न्यायकन्दली क्रियावत्त्वमूर्त्तत्वपरत्वापरत्ववेगवत्त्वा-नीति | क्रियावत्त्वमुत्क्षेपणादिक्रियायोगः । मूर्त्तत्वमवच्छिन्नपरिमाणयोगित्त्वम् । परत्वापरत्ववेगवत्त्वानि परत्वापरत्ववेगसमवायः । संयुक्त संयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वयोरेव परापरव्यवहारहेतुत्वात् परत्वापरत्वे नस्त इति केचित् न, भिन्नदिक्सम्बन्धिनो: सत्यपि संयुक्तसंयोगाल्पीयस्त्व-भूयस्त्वसद्भावे सत्यपि च द्रष्टुः शरीरापेक्षया सन्निकृष्ट विप्रकृष्टबुद्धयोरुत्पादे क्रिया, मूर्त्तत्व, परत्व, अपरत्व, और वेग ये पाँच पृथिवी. जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों के साधर्म्य हैं । ' क्रियावत्त्व ' शब्द का अर्थ है उत्क्षेपणादि क्रियाओं का सम्बन्ध । मूर्त्तत्व शब्द का अर्थ है किसी अल्प परिमाण का सम्बन्ध । परत्व, अपरत्व और वेग इन तीनों का समवाय ही परत्वापरत्ववेगवत्व ' शब्द का अर्थ है । ( प्र ० ) कुछ आचार्यों का कहना है कि परत्व और अपरत्व नाम के स्वतन्त्र गुण नहीं हैं । पाटलिपुत्र से काशी की अपेक्षा प्रयाग ' पर ' ( दूर ) है, एवं पाटलिपुत्र से प्रयाग की अपेक्षा काशी ' अपर ' ( समीप ) है, इसी प्रकार की प्रतीतियों से तो देशिक परत्व और अपरत्व स्वीकार किये जाते हैं । किन्तु यह ' परत्व ' और ' अपरत्व ' दूरस्व और समीपत्व को छोड़कर और कुछ नहीं है । एवं परत्व और अपरत्व इन प्रतीतियों से भी स्वीकार किये जाते हैं कि देवदत्त यज्ञदत्त से ' पर ' है, एवं यज्ञदत्त देव दत्त से ' अपर ' है, यह ( कालकृत ) परत्व और अपरत्व ज्येष्ठत्व और कनिष्ठत्व के ही दूसरे नाम हैं । किन्तु इन व्यवहारों के लिए परत्व और अपरत्व नाम के स्वतन्त्र गुणों की कल्पना व्यर्थ है, क्योंकि दूरत्व और समीपत्व रूप परत्व और अपरत्व के व्यवहार का नियामक देश के साथ संयोग की अधिकता और न्यूनता ही है । यह स्वीकार करना हो होगा कि पाटलिपुत्र से काशी में जितने दिग्देशों का सम्बन्ध है उससे प्रयाग में अधिक है । एवं पाटलिपुत्र से प्रयाग में जितने दिग्देशों का संयोग है उससे काशी में अल्प है । इसी प्रकार ज्येष्ठत्व और कनिष्ठत्व रूप परत्व एवं अपरत्व का व्यवहार भी सूर्य की अधिक क्रिया से युक्त काल के सम्बन्ध और सूर्य की अल्प क्रिया से युक्त काल के सम्बन्ध से ही होता है । सुतराम् सूर्यक्रियाओं की अधिकता और अल्पता से ही ( कालिक ) परत्वापरत्व के व्यवहार की उपपत्ति होगी । इन प्रतीतियों के लिए परत्व और अपरत्व नाम के स्वतन्त्र गुण की कल्पना आवश्यक नहीं है । ( उ ० ) किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकार से तो परस्पर विरुद्ध दो दिशाओं ८ For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् आकाशकालदिगात्मनां सर्वगतत्वं परममहत्वं [ साधम्यवैधभ्यं-सर्व संयोगि-आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन चार द्रव्यों के सर्वगतत्व, परममहत्त्व, और सर्वसंयोगिसमानदेशत्व ( सभी संयोगी द्रव्यों का समान रूप से न्यायकन्दली परापरप्रत्ययाभावात् । एकस्यां दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोस्तथा प्रत्यय इति चेत्? अस्ति तहि संयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वाभ्यां विषयान्तरम्, विषयवैलक्षण्य-मन्तरेण विलक्षणाया बुद्धेरनुत्पादात् । वेगोऽपि गुणान्तरम्, न क्रियासन्ततिमात्रम्, मन्दगतौ वेगप्रतीत्यभावात् । क्रियाक्षणानामाशूत्पादनिमित्तो वेगव्यवहार इति चेत्? न, अलातचक्रादिषु क्रियाक्षणानां निरन्तरोत्पादव्ययवतां प्रत्येकमन्तरा-ग्रहणेनाशुत्पादस्य प्रत्यक्षेणाप्रतीतेः, वेगप्रत्ययस्य च भावात् । व्यक्ता च लोके क्रियावेगयोर्भेदावगतिः, वेगेन गच्छतीति प्रतीतेः । आकाशकालदिगात्मनां सर्वगतत्वमित्यादि । सर्वशब्देनात्र प्रकृतापेक्ष-यानन्तरोक्तानि मूर्त्तद्रव्याणि परामृश्यन्ते । सर्वगतत्वं सर्वैर्मूतैः सह संयोग में विद्यमान वस्तुओं में भी परत्व और अपरत्व का व्यवहार होना चाहिए, किन्तु देखने-वाले के शरीर से उनमें सामीप्य की बुद्धि होने पर भी ( विरुद्ध ) दिशाओं में अवस्थित उन दोनों वस्तुओं में परस्पर की अपेक्षा परत्व या अपरत्व की बुद्धि नहीं होती है | ( प्र ० ) अगर इसमें इतना बढ़ा दें कि समान दिशा के देशों के संयोग के अल्पत्व और अधिकत्व ही ( अपरत्व एवं परत्व ) प्रतीतियों के नियामक हैं? ( उ ० ) तो भी परत्व और अपरत्व नाम का स्वतन्त्र गुण मानना ही पड़ेगा, क्योंकि विषयों में अन्तर हुए बिना प्रतीतियों में अन्तर नहीं हो सकता । वेग भी स्वतन्त्र गुण है, क्रियाओं का समूह नहीं, क्योंकि मन्द गतिवाली वस्तुओं में वेग की प्रतीति नहीं होती हैं । ( प्र ० ) क्रिया के कारणीभूत क्षणों का यह स्वभाव है कि वे अत्यन्त शीघ्र विनष्ट होते हैं । उनकी इस अत्यन्त शीघ्र विनाशशीलता से ही वेग का व्यवहार होता है ( अतः क्रियाओं का समूह ही वेग है, कोई स्वतन्त्र गुण नहीं ) | ( उ ० ) चूँकि अलातचक्रादि में होनेवाली क्रियाओं के कारणभूत क्षणों का बराबर उत्पाद और विनाश होता रहता है, किन्तु उत्पत्ति और विनाश की अत्यन्त शीघ्रता के कारण उन दोनों के बीच के समय गृहीत नहीं हो पाते, अत: उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है, किन्तु अलातचक्रादि में भी वेग की प्रतीति तो होती ही है । क्रिया और वेग की विभिन्न रीति से प्रतीति सर्वजन सिद्ध है । ' यह वेग से जा रहा है ' इस आकार की वेग की प्रतीति होती है । ( क्रियाओं की प्रतीति का यह आकार नहीं है ) । प्रकृत भाष्य के ' सर्वगतत्व ' ठीक पहिले कहे हुए सभी मृत्तं पद में प्रयुक्त ' सर्व ' शब्द से प्रकृत आकाशादि से द्रव्यों को समझना चाहिए । आकाशादि का सभी For Private And Personal

पृष्ठ 134

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] समानदेशत्वञ्च । पृथिव्यादीनां भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् पञ्चानामपि भूतत्वेन्द्रिय प्रकृतित्ववा-कै केन्द्रियग्राह्म विशेषगुणवश्वानि । आधार होना ) ये तीन साधर्म्य हैं । पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँच द्रव्यों के भूतत्व, इन्द्रिय प्रकृतित्व और एक एक बाह्येन्द्रिय से गृहीत होनेवाले विशेष गुण ये तीन साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली आकाशादीनाम्, न तु सर्वत्र गमनम्, तेषां निष्क्रियत्वात् । परममहत्त्वमियत्तान-वच्छिन्नपरिमाणयोगित्वम् । सर्वसंयोगिसमानदेशत्वं सर्वेषां संयोगिनां मूर्त्त-द्रव्याणामाकाशः समानो देश एक श्राधार इत्यर्थः । एवं दिगादिष्वपि व्याख्येयम् । यद्यप्याकाशादिकं सर्वेषां संयोगिनामाधारो न भवति, आधारभावेनानव-स्थानात्, तथापि सर्वसंयोगाधारत्वात् सर्वसंयोगिनामाधार इत्युच्यते, उपचारात् । अत एव सर्वगतत्वमित्यनेनापुनरुक्तता । तत्र हि सर्वैः सह संयोगोऽस्तीत्युक्तंम् । इह तु सर्वेषामाधार इत्युच्यते । पृथिव्यादीनामाकाशान्तानामितरवैधर्म्येण पृथिव्यादीनामिति । भूतत्वं भूतशब्दवाच्यत्वम् । साधम्यं कथयति-एकनिमित्तमन्तरेणानेकेषु मूत्तं द्रव्यों के साथ संयोग ही सर्वगतत्व है, आकाशादि का सभी मूर्त्त द्रव्यों में जाना नहीं, क्योंकि वे सभी क्रियाशून्य हैं । ' परममहत्त्व ' शब्द का अर्थ है इयत्ता से रहित परिमाण का ( सबसे बड़े परिमाण का ) सम्बन्ध | ' सर्वसंयोगिसमानदेशत्व ' अर्थात् आकाश संयोग से युक्त सभी मूर्त द्रव्यों का एक आधार है । इसी प्रकार दिशा में भी व्याख्या करनी चाहिये । यद्यपि आका-शादि संयोग से युक्त पदार्थों का आधार नहीं है, किन्तु उनके सभी संयोगों का आधार है, अतः उनमें ' सर्वाधार ' शब्द का लाक्षणिक प्रयोग होता है । अतएव ' सर्वगतत्व ' के बाद ' सर्वसंयोगिसमानदेशत्व ' के कथन से पुनरुक्ति की आपत्ति नहीं होती है, क्योंकि ' सर्वगतत्व ' शब्द से आकाशादि में सभी मूर्त्त द्रव्यों का संयोग प्रतिपादित होता है और ' सर्व संयोगि-समानदेशत्व ' शब्द से लक्षणा वृत्ति के द्वारा उनमें सर्वाधारत्व का प्रतिपादन होता है । पृथिवी से लेकर आकाश पर्य्यन्त पाँच द्रव्यों का साधर्म्य औरों से असाधारण्य दिखलाते हुए कहते हैं । ' भूत ' शब्द का अर्थ है ' भूत ' शब्द से अभिधावृत्ति के द्वारा कहा जाना । यद्यपि पृथिवी प्रभृति पाँच द्रव्यों में सभी को समझाने के लिए एक शब्द की प्रवृत्ति का नियामक कोई एक धम्मं नहीं है, किन्तु तब भी ' अक्ष ' शब्द For Private And Personal

पृष्ठ 135

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ साधम्यंवैधर्म्य-पृथिव्यादिष्वेकशब्दप्रवृत्तिरक्षशब्दवत् यथा देवनत्वेन्द्रियत्वबिभीतकत्वसामान्य-त्रययोगाद्देवनादिष्वक्षशब्दः सङ्केतितः, तथा पृथिवीत्वादिसामान्यवशात् पृथिव्यादिषु चतुर्षु भूतशब्दः सङ्केतितः । आकाशे तु व्यक्तिनिमित्त एव भूतं भूतमिति तच्छब्दानुविद्धः प्रत्ययस्तच्छब्दवाच्यतोपाधिकृतः, यथा देवनादिष्वेकोऽक्ष इति प्रत्ययः । इन्द्रिय प्रकृतित्वमिन्द्रियस्वभावत्वम् । न भूतस्वभावानीन्द्रियाणि, अप्राप्यका-रित्वात् प्राप्यकारित्वं हि भौतिको धर्मो यथा प्रदीपस्येति केचित् । तदयुक्तम्, व्यवहितानुपलब्धः, यदीन्द्रियमप्राप्यकारि कुड्यादिव्यवहितमप्यर्थं गृह्णीयादप्राप्तेर-विशेषात् । योग्यताभावाद् व्यवहितार्थाग्रहणमिति चेत्? इन्द्रियस्य तावद् योग्यता विषयग्रहणसामर्थ्यमस्त्येव तदानीमव्यवहितार्थग्रहणात् विषयस्यापि योग्यता की तरह ' भूत ' शब्द की प्रवृत्ति उनमें होती है । अर्थात् जैसे देवनत्व ( द्यूतत्व ) इन्द्रियत्व और विभीतकत्व इन तीन सामान्य के सम्बन्ध से जूये प्रभृति में ' अक्ष ' शब्द की प्रवृत्ति होती है, वैसे ही पृथिवीत्वादि चारों जातियों से पृथिवी जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों को समझाने के लिए ' भूत ' शब्द प्रवृत्त होता है । आकाश में आकाश रूप व्यक्ति-मूलक ' यह भूत है ' इत्यादि ' भूत ' शब्दमूलिका प्रतीति भूतशब्दबोध्यत्व रूप उपाधि से होती है । जैसे कि एक ही ' अक्ष ' शब्द देवनादि सभी अर्थों को समझाने के लिए प्रवृत्त होता है । ' इन्द्रिय प्रकृतित्व ' शब्द का अर्थ है इन्द्रियस्वभावत्व | यहाँ कोई शङ्का उठाते हैं । कि ( प्र ० ) भूत इन्द्रियों की प्रकृति ( समवायिकारण ) नहीं है, क्योंकि इन्द्रियाँ वस्तुओं के साथ असम्बद्ध होकर ही अपना काम करती हैं । भौतिक वस्तुओं का यही स्वभाव है कि अपने विषयों के साथ सम्बद्ध होकर ही अपना काम करें, जैसे कि प्रदीप | ( उ ० ) किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि व्यवहित वस्तुओं की इन्द्रियों से उपलब्धि नहीं होती । अगर इन्द्रियाँ अपने से असम्बद्ध विषयों को भी ग्रहण करें तो फिर दीवाल प्रभृति से ढके हुए अपने विषयों का भी वे ग्रहण कर सकती हैं । दीवाल से घिरे और न घिरे हुए वस्तुओं में तो कोई अन्तर नहीं है, और इन्द्रियों की असम्बद्धता तो दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान है | ( प्र ० ) व्यवहित वस्तुओं में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है, अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है? ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि व्यवहित विषयों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है? या इन्द्रियों में व्यवहित विषयों के प्रत्यक्ष के उत्पादन की योग्यता नहीं है? इन्द्रियों की योग्यता है विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य, सो उनमें है ही । क्योंकि उस समय भी अव्यवहित विषयों को वे ग्रहण करती For Private And Personal

पृष्ठ 136

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] मान लेना । www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ६१ न्यायकन्दली For Private And Personal महत्त्वानेकद्रव्यवत्त्वरूपविशेषाद्यात्मिका व्यवधानेऽपि न निवृत्तैव, आर्जवावस्थान-मपि तदवस्थमेव । अथ मतम् - आवरणाभावोऽप्यर्थप्रतीतिकारणं संयोगाभाव इव पतनकर्म्मणि, आवरणे सत्यावरणाभावो निवृत्त इति प्रतीतेरनुत्पत्तिः कारणाभावादिति । नैतत्सारम् आवरणस्य स्पर्शत्रद्द्रव्यप्राप्तिप्रतिषेधभावो-पलब्धः, छत्रादिकं हि पततो जलस्य सावित्रस्य च तेजसः प्रतिषेधति, न तु स्वस्याभावमात्रं निवर्त्तयति । तथा सति सुलभमेतदनुमानम् - प्राप्तप्रकाशकं चक्षुः, व्यवहितार्थाप्रकाशकत्वात् प्रदीपवत्, बाह्येन्द्रियत्वात् त्वगिन्द्रियवत् । नन्वेवं तहि विप्रकृष्टार्थग्रहणं कुतः? रश्म्यर्थसंनिकर्षादनुद्भूतरूपस्पर्शा नायना ही हैं । विषयों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता है महत्त्व, अनेकद्रव्यवत्त्वादि, सो दीवाल से घिर जाने पर भी विषयों से हट नहीं जाती । दीवाल से घिर जाने पर भी वे इन्द्रियों के सामने ही रहते हैं । ( प्र ० ) जिस प्रकार संयोग का अभाव भी पतन का कारण है, उसी प्रकार आवरण का अभाव भी प्रत्यक्ष का कारण है । आवरण के रहते हुए आवरण का अभाव नहीं रह सकता, अतः दीवाल से घिरी हुई वस्तुओं का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि वहाँ आवरणाभाव रूप कारण ही नहीं है । ( उ ० ) आवरण का इतना ही काम है कि स्पर्श से युक्त द्रव्यों के साथ संयोग न होने दे | जैसे छाता गिरते हुए पानी या धूप के साथ संयोग को नहीं होने देता । आवरण का इतना ही काम नहीं हैं कि अपने अभाव को हटाये । अतः ( १ ) यह अनुमान सुलभ है कि चक्षु अपने से सम्बद्ध वस्तुओं का ही प्रकाशक है, क्योंकि व्यवहित वस्तुओं का प्रकाश उससे नहीं होता, जैसे कि प्रदीप । ( २ ) अथवा चक्षुरादि ( इन्द्रियाँ ) अपने से सम्बद्ध वस्तुओं के ही प्रकाशक हैं, क्योंकि वे बाह्येन्द्रिय हैं, जैसे कि त्वगिन्द्रिय | ( प्र ० ) तो फिर चक्षु से कुछ दूर हटी हुई वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष ( क्यों ) और कैसे होता है? ( उ ० ) चक्षु की रश्मियों के साथ विषयों के संयोग से । ' अनुभूत रूप और अनुद्भूत स्पर्श से युक्त चक्षु की रश्मियाँ वहाँ विद्यमान वस्तुओं के प्रत्यक्ष को उत्पन्न १. चक्षु की रश्मियाँ दूर की वस्तुओं को ग्रहण करने के लिए अगर उनके देशों तक जाती हैं तो फिर सूर्य की रश्मियों की तरह उनके रूप और स्पर्श का भी प्रत्यक्ष होना चाहिए, किन्तु होता नहीं है । अतः ' चक्षु की रश्मियाँ दूर जाकर वस्तुओं को ग्रहण करती हैं " यह कहना ठीक नहीं है । इसी पूर्वपक्ष के समाधान की सूचना देने के लिए कन्दलीकार ने चक्षु की रश्मियों में अनुद्भूतरूप और अनुभूत स्पर्श, ये दो विशेषण लगाये हैं । कहने का तात्पर्य है कि अगर चक्षु की रश्मियों का विषय देश तक जाना युक्तियों से सिद्ध है तो फिर उनके रूप और स्पर्श की अनुपलब्धि से वह हट नहीं सकती । उनके प्रत्यक्षापत्तिवारण का यह उपाय सुलभ है कि रश्मियों के रूप और स्पर्श को अनुद्भूत

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६२ न्यायकन्वलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ सावयवैधम्र्म्य रश्मयो दूरे गत्वा सन्तमर्थं गृह्णन्ति, अत एव महदणुप्रकाशकत्वात् किमि -न्द्रियस्य भौतिकत्वं न सिद्धयति? प्रदीपस्येव रश्मिद्वारेण तदुपपत्तेः । यत्र च रश्मयो भूयोभिः स्वावयवैः सहार्थावयविना तदवयवैश्च सह सम्बद्धयन्ते, तत्राशेषविशेषास्कन्दितस्यार्थस्य ग्रहणात् स्पष्टं ग्रहणम् । यत्र त्ववयवमात्रेण सम्बन्धस्तत्र सामान्यमात्रविशिष्टस्य धम्मिणो ग्रहणादस्पष्टं ग्रहणम् । यद् गच्छति तत् संनिहितव्यवहितार्थो क्रमेण प्राप्नोति । तत् कथं शाखाचन्द्रमसोस्तुल्यकालोप-लब्धिरिति चेत्? इन्द्रियवृत्तेराशुसश्चारित्वात् पलाशशतव्यतिभेदवत् क्रमाग्रहण-निमित्तोऽयं भ्रमो न तु वास्तवं यौगपद्यम् । ननु प्राप्तिपक्षे सान्तरालोऽयमिति ग्रहणं न स्यात्? न, अन्यथा तदुपपत्तेः । इन्द्रियसम्बन्धस्यातीन्द्रियत्वान्न तदभावाभावकृतौ सान्तरनिरन्तरप्रत्ययौ, किन्तु शरीरसम्बन्धभावाभावकृतौ यत्र शरीरसम्बद्धस्यार्थस्य ग्रहणं तत्र निरन्तरोऽयमिति प्रत्ययः, यत्र तु तदसम्बद्धस्य ग्रहणं तत्र सान्तर इति । करती है । इन्द्रियाँ चूंकि छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की वस्तुओं को दिखलाती हैं, इससे भी उनमें भौतिकत्व की सिद्धि क्यों नहीं होगी? प्रदीप की तरह रश्मियों में भी भौतिकता सिद्ध हो सकती है । जहाँ पर रश्मियाँ अपने बहुत से अवयवों को लेकर अवयवी रूप वस्तु और उनके अवयवों के साथ सम्बद्ध होती हैं, वहाँ सभी विशेषों से युक्त अवयवी का ज्ञान होता है । अत एव वह ज्ञान ' स्पष्टग्रहण ' कहलाता है । जहाँ वे केवल वस्तुओं के किसी अवयव के साथ ही सम्बद्ध होती हैं, वहाँ सामान्यधम्मं से युक्त उस धर्मी का ज्ञान होता है, जिसे ' अस्पष्ट ग्रहण ' कहते हैं । ( प्र ० ) गतिशील वस्तु समीप की वस्तुओं के साथ पहिले सम्बद्ध होती है और दूर की वस्तुओं के साथ पीछे, तो फिर गतिशील इन्द्रियों से शाखा और चन्द्रमा का ग्रहण एक ही समय क्यों होता है? ( उ ० ) वस्तुतः एक समय में शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान नहीं होता है । दोनों के ज्ञान क्रमशः ही होते हैं, किन्तु इन्द्रियाँ इतनी शीघ्रता से चलती हैं कि उनकी गति के क्रम का ज्ञान नहीं हो पाता । अत एव यह भ्रम होता है कि शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान एक ही समय होता है । जैसे फूल के सौ पत्रों को सूई से छेदने पर उसका क्रम उपलब्ध नहीं होता और भ्रम होता है कि एक ही समय में सभी पत्रों का छेदन हुआ है । ( प्र ० ) इन्द्रियाँ अपने से सम्बद्ध वस्तुओं को ही ग्रहण करती हैं ' इस पक्ष में विषय और इन्द्रियों में सार्वजनीन व्यवधान की प्रतीति अनुपपन्न होगी? ( उ ० ) नहीं, क्योंकि दूसरी रीति से उसकी उपपत्ति हो सकती है । इन्द्रियों का सम्बन्ध अतीन्द्रिय है, अत: उसकी सत्ता से व्यवधान की प्रतीति और असत्ता से अव्यवधान की प्रतीति नहीं हो सकती, किन्तु शरीरसम्बन्ध की सत्ता और बसत्ता से ही उक्त दोनों प्रतीतियाँ For Private And Personal

पृष्ठ 138

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवच्वे । त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवच्चद्रवत्वानि । ६३ पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों का द्रव्य को उत्पन्न करना और स्पर्श से युक्त होना ये दो साधर्म्य हैं । पृथिवी, जल, और तेज इन तीन द्रव्यों का प्रत्यक्षत्व, रूपवत्त्व और द्रवत्व ये तीन साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली बाह्येन्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वानीति । बाह्येकै केन्द्रियेण चक्षुरादिना ग्राह्या ये विशेषगुणा रूपादयस्तैस्तद्वत्ता पृथिव्यादीनामिति । अन्तःकरण-ग्राह्यत्वमप्येषां गुणानामस्ति, ततश्चैकैकेन्द्रियग्राह्यत्वमसिद्धम्, तदर्थं बाह्य-ग्रहणम् । एकैकग्रहणं स्वरूपकथनार्थम् । चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवत्त्वे । चतुर्णां पृथिव्युदकानलानिलानाम् । द्रव्यारम्भकत्वं द्रव्यं प्रति समवायिकारणभावः । स च निजा शक्तिरेव । स्पर्शवत्त्वं स्पर्शसमवायः । त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवत्त्वद्रवत्वानि । त्रयाणां क्षित्युदकतेजसां प्रत्यक्षत्वमिन्द्रियजज्ञानप्रतिभासमानता, न तु महत्त्वादिकारणयोगः, रूपवत्त्व-होती हैं । जहाँ शरीर से सम्बद्ध अर्थ का ग्रहण होता है, उस अर्थ में यह व्यवधान रहित है ' इस प्रकार की बुद्धि होती है और जहाँ शरीर से असम्बद्ध अर्थ का ग्रहण होता है उस अर्थ में ' यह व्यवहित है ' इस प्रकार की प्रतीति होती है । बाह्य के केन्द्रियग्राह्यगुणवत्त्वानि ' अर्थात् चक्षुरादि एक एक बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होनेवाले जो रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द, ये पाँच विशेष गुण हैं, तद्वत्त्व ' पृथि व्यादि पांच द्रव्यों का साधर्म्य है । ये रूपादि मन रूप अन्तरिन्द्रिय से भी गृहीत होते हैं, अतः उनमें एकैकेन्द्रियग्राह्यत्व ' नहीं रह सकता, अतः ' बाह्य ' पद का प्रयोग है । ' एकैक ' पद केवल इस वस्तुस्थिति को समझाने के लिए है कि कथित रूपादि पाँच विशेष गुण एक एक बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होते हैं, संयोगादि की तरह दो इन्द्रियों से नहीं । ' चतुर्णाम् ' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों का ' द्रव्यारम्भकत्व ’ अर्थात् द्रव्य का समवायिकरणत्व साधर्म्य है । यह उनकी स्वाभाविक शक्ति है । ' स्पर्शवत्त्व ' शब्द का अर्थ है - स्पर्श का समवाय । ' त्रयाणाम् ' अर्थात् पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों का ' प्रत्यक्षत्व ' साधम्यं है । इस ' प्रत्यक्षत्व ' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान में प्रतिभासित For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६४ न्याय कन्दली संचलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् द्वयोर्गुरुत्वं रसवत्त्वञ्च । भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् । [ साधर्म्यवैधम्र्म्य -पृथिवी और जल इन दोनों के गुरुत्व और रसवत्त्व ये दो साधर्म्य हैं । भूत अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पाँच और आत्मा इन छः द्रव्यों का विशेषगुणवत्त्व साधर्म्य है । न्यायकन्दली मित्यस्य पुनरुक्तत्वप्रसङ्गात् । नन्वात्मनोऽपि प्रत्यक्षत्वमस्ति? सत्यम्, बाह्येन्द्रियापेक्षया त्रयाणामित्युक्तम् । तथा रूपवत्त्वं रूपसमवायः । द्रवत्वं द्रवत्वन्नाम गुणान्तरम् । द्वयोर्गुरुत्वम् । द्वयोः पृथिव्युदकयोः, गुरुत्वन्नाम गुणान्तरम्, तस्य भावात् पृथिव्यामुदके च गुरुशब्दनिवेशः । रसवत्त्वश्व रससमवायः, न केवलं तयोर्गुरुत्वं रसवत्त्वञ्चेति चार्थः । भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् । भूतानां पृथिव्यप्तेजोवायुनभसा-मात्मनां च वैशेषिकगुणयोगः । विशेषो व्यवच्छेद:, विशेषाय स्वाश्रयस्येतरेभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति वैशेषिका रूपादयस्तद्योगो भूतात्मनाम् । होना, महत्त्वादि प्रत्यक्ष के कारणों का सम्बन्ध नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर इन तीनों को रूपवत्त्व को साधर्म्य कहना पुनरुक्ति दुष्ट हो जाएगा । प्रत्यक्षत्व तो आत्मा में भी है? ( उ ० ) हाँ है, किन्तु यहाँ बाह्य इन्द्रियों से उत्पन्न प्रत्यक्ष का ही ग्रहण है । एवं ' रूपवत्त्व ' शब्द का अर्थ है रूप का समवाय और ' द्रवत्व ' शब्द से द्रवत्व नाम का स्वतन्त्र गुण त्रिवक्षित है । ' द्वयो: ' पृथिवी और जल इन दोनों का गुरुत्व ' अर्थात् गुरुत्व नाम का स्वतन्त्र गुण साधर्म्य है । इसी गुरुत्व नामक गुण के सम्बन्ध से पृथिवी और जल ये दोनों ' गुरु ' शब्द से व्यवहृत होते हैं: ' रसवत्त्व ' शब्द से रस का समवाय इष्ट है । गुरुत्व और रसवत्त्व इन दोनों में से केवल गुरुत्व ही या केवल रसवत्त्व ही पृथिवी और जल के साधर्म्य नहीं हैं, किन्तु दोनों मिलकर उनके साधर्म्यं हैं, यही ' च ' शब्द से सूचित होता है । ' भूतात्मनाम् ' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश एवं आत्मा इन छः द्रव्यों का वैशेषिकगुण का सम्बन्ध साधयं है । यहाँ ' विशेष ' शब्द का अर्थ है ' भेद ' ( व्यवच्छेद ) विशेषाय स्वाश्रयस्येतरभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति वैशेषिका: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अपने आश्रय को जो गुण भिन्न पदार्थों से अलग रूप से समझावे वही यहाँ ' वैशेषिक ' शब्द का अर्थ है । इन्हीं रूपादि विशेष गुणों का योग पृथिव्यादि पाँच भूत एवं आत्मां इन छः द्रव्यों का साधर्म्य है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६५ क्षित्युदकात्मनां चतुर्दशगुणवश्वम् । आकाशात्मनां क्षणिकैकदेशवृत्ति विशेषगुणवत्त्वम् । दिक्कालयोः पञ्चगुणवत्वं सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तकारणत्वञ्च । पृथिवी, जल और आत्मा इन तीन द्रव्यों का चौदह गुणों का सम्बन्ध साधर्म्य है | आकाश और आत्मा इन दो द्रव्यों का क्षणिक एवं अव्याप्यवृत्ति ( अर्थात् अपने आश्रय के किसी एक अंश में ही रहनेवाला ) विशेष गुण साधर्म्य है । दिशा और काल इन दो द्रव्यों का ( संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ) ये पाँच गुण और सभी उत्पत्तिशील पदार्थों का निमित्तकारणत्व ये दो साधर्म्य हैं: न्यायकन्दली क्षित्युदकात्मनां चतुर्दशगुणवत्त्वम् । क्षितेरुदकस्यात्मनां चतुर्दशगुणयोगः । आकाशात्मनाच क्षणिकैकदेश वृत्तिविशेषगुणैः सह योगो विद्यत इत्याह-आकाशात्मनामिति । विशेषगुणाः पृथिव्यादीनामपि सन्ति, तन्निवृत्त्यर्थमेकदेशवृत्ति-ग्रहणम् । ये च ते आकाशात्मनामव्याप्यवृत्तयो विशेषगुणास्तेषामाशुतर-विनाशित्वञ्च स्वरूपमस्तीति क्षणिकसङ्कीर्त्तनं कृतम् । सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः पञ्चैव गुणा दिशि काले च वर्त्तन्त इत्याह - दिक्कालयोरिति । न केवलमनयोः पञ्चगुणवत्त्वं साधर्म्यं सर्वोत्पत्तिमतां पृथिवी, जल और आत्मा, इन तीन द्रव्यों का चौदह गुणों का सम्बन्ध साधर्म्य है । ' आकाशात्मनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ से कहते हैं कि आकाश में और आत्माओं में क्षणिक एवं ' अव्याप्यवृत्ति ' ( अपने आश्रय के किसी एक देश में रहनेवाले ) विशेष गुणों का सम्बन्ध है । विशेषगुण पृथिवी प्रभृति द्रव्यों में भी हैं, अतः ' एकदेशवृत्ति ' यह पद है । ' क्षणिक ' पद का उपादान यह सूचना देने के लिए है जि आकाश और आत्माओं के जितने भी ' अव्याप्यवृत्ति ' अर्थात् अपने आश्रय को व्याप्त कर न रहनेवाले विशेष गुण हैं, अतिशीघ्न नष्ट हो जाना ही उनका स्वरूप है ' दिक्कालयोः ' इत्यादि से कहते हैं कि संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये ही पांच गुण दिशा और काल में रहते हैं । उक्त पाँच गुण ही इन दोनों के साधर्म्य १. रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व और वेगाख्य तथा स्थितिस्थापक संस्कार ये चौदह गुण पृथिवी के हैं । इन्हीं चौदह गुणों में गन्ध के स्थान में स्नेह को रख देने से जल के चौदह गुण हो Ε For Private And Personal