प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 141–150
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 141–150
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्य वैधर्म्य -निमित्तकारणत्वञ्च साधर्म्यम् । न्यायकन्दली ननु दिक्काल सर्वेषामुत्पत्तिमतां निमित्तमिति कुत एतत् प्रत्येतव्यम्? यदि सन्निधिमात्रेण? आकाशस्यापि कारणत्वं स्यात्, अथ तद्व्यपदेशात्? सोऽप्यनैकान्तिकः, गृहे जातो गोष्ठे जात इत्यनिमित्तेऽपि दर्शनात् । अत्रोच्यते - अस्ति तावत् तन्त्वादिप्रतिनियमात् पटाद्युत्पत्तिवद्देशविशेषनियमात् कालविशेषनियमाच्च सर्वेषामुत्पत्तिः, यदि देशकालविशेषावपि न कारणम्, अत्र क्वचन हेतवः काय्र्य्यं कुर्युरविशेषात् । सर्वदा सर्वत्र कारणाभावात् कार्य्यानुत्पत्तिरिति चेत्? यत्र देशे काले च कारणानि भवन्ति, तत्र तेषां जनकत्वं नान्यत्रेत्यभ्युपगन्तव्यं विशिष्ट देशस्य देश-कालयोरङ्गत्वम्, कार्य्यजननाय तयोः कारणैरपेक्षणीयत्वात् । इदमेव च कालस्य च निमित्तत्वम्, यदेकत्र कार्य्योत्पत्तिरन्यत्रानुत्पत्तिरिति । साधम्यं है । नहीं हैं, किन्तु सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं का निमित्तकारणत्व भी इन दोनों का के निमित्त-( प्र ० ) यह कैसे समझें कि दिशा और काल सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं के कारण ही कारण हैं? अगर सभी वस्तुओं की उत्पत्ति के पहिले नियत रूप से रहने में भी यह ये दोनों सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं के निमित्तकारण हैं, तो फिर आकाश में पट की उत्पत्ति कारणता रहनी चाहिए । ' अभी घट की उत्पत्ति हुई है ' या ' उस दिशा का मानना हुई है ' इत्यादि व्यवहारों से भी काल और दिशा में निमित्तकारणता की उत्पत्ति हुई सम्भव नहीं है, क्योकि निमित्तकारणता के बिना भी ' घर में घट उक्त व्यवहारों और गोष्ठ में पट की उत्पत्ति हुई ' इस प्रकार के व्यवहारों की तरह में कहना कि जिस की उपपत्ति हो सकती है । ( उ ० ) इस आक्षेप के उत्तर, उसी प्रकार पटादि कार्यों में यह नियम है कि वे तन्तु प्रभृति कारणों से ही उत्पन्न हों अगर ये प्रकार सभी कार्यों की उत्पत्ति में देश और काल का भी नियम है । दोनों अपेक्षित न हों तो फिर जहाँ - तहाँ विक्षिप्त कारणों से और भिन्नकालिक-कारणों से भी कार्यों की उत्पत्ति होनी चाहिए, क्योंकि नियमित देश और नियमित काल के कारणों में और अनियत देश और अनियत काल के कारणों में स्वरूपतः ( देश और काल के सम्बन्ध को छोड़कर ) कोई अन्तर नहीं है । ( १० ) सभी देशों और सभी कालों में कारणों की सत्ता न रहने से ही सभी देशों और सभी कालों में कार्यों की उत्पत्ति नहींहोती है । ( उ ० ) तो फिर यह मानना पड़ेगा कि जिस देश सम्मिलित होकर जो सब कारण कार्य को उत्पन्न कर सकें, और उसी देश में वे कारण हैं और कालों में नहीं और देशों में नहीं, में और जिस काल में उसी काल जाते हैं । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, भावनाख्य संस्कार, धर्म और अधर्म ये चौदह गुण आत्मा के हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६७ क्षितितेजसो नैमित्तिकद्रवत्वयोगः ः । पृथिवी और तेज इन दो द्रव्यों का नैमित्तिकं द्रवत्व का सम्बन्ध साधर्म्य है | न्यायकन्दली क्षितितेजसो मित्तिकद्रवत्वयोगः 1 निमित्तादुपजातं ( नैमित्तिकम् ), नैमित्तिकञ्च तद्द्द्रवत्वञ्चेति नमित्तिकद्रवत्वम्, तेन सह क्षितितेजसोर्योगः, पार्थि-वस्य सर्पिरादेस्तेजसस्य च सुवर्णरजतादेरग्निसंयोगेन विलयनात् । गुरुत्ववत्पार्थि-वमेव द्रवत्वं दह्यमानेषु सुवर्णादिषु संयुक्तसमवायात् प्रतीयत इति चेत्? न, पार्थि-वद्रवत्वस्यात्यन्ताग्निसंयोगेन भस्मीभावोपलब्धेः अस्य च तदभावात् । अत एव सुवर्णादिकमपि पार्थिवमेवेति कस्यचित् प्रवादोऽपि प्रत्युक्तः, पार्थिवत्वे सति सर्पि-रादिवदत्यन्तवह्निसंयोगेन द्रवत्वोच्छेदप्रसङ्गात् । यदपीदमुक्तं पार्थिव सुवर्णादिकम्, सांसिद्धिकद्रवत्वाभावे सति इस प्रकार यह स्वीकार करना पड़ेगा कि देश और काल भी कार्योत्पत्ति के अङ्ग हैं, क्योंकि कार्य के उत्पादक सभी कारण काल और दिशा की अपेक्षा रखते हैं । काल और दिशा में सभी कार्यों का यही निमित्तकारण है कि किसी कालविशेष और देशविशेष में ही कार्यों की उत्पत्ति होती है, सभी कालों और सभी देशों में नहीं । ' निमित्तादुपजातं नैमित्तकम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो कारण से उत्पन्न हो उसे ' नैमित्तिक ' कहते हैं । ' नैमित्तिकच तद्रवत्वञ्चेति ' इस कर्मधारय समास के बल से किसी निमित्त से उत्पन्न द्रवत्व ही नैमित्तिकद्रवत्व ' शब्द का अर्थ है । उसके साथ सम्बन्ध ही पृथिवी और तेज का साधर्म्य है क्योंकि घृतादि पार्थिव द्रव्य और सुवर्णादि तैजस द्रव्य आग के संयोग से विलीन होते ( पिघलते ) दीख पड़ते हैं, अत: उनमें अवश्य ही नैमित्तिक द्रवत्वं है | ( प्र ० ) जिस प्रकार सुवर्ण में पार्थिव गुरुत्व की ही उपलब्धि संयुक्तसमवाय संबन्ध से होती है, उसी प्रकार सुवर्ग में पृथिवीगत नैमित्तिक द्रवत्व की ही सयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उपलब्धि होती है । ( अर्थात् सुवर्ण में नैमित्तिक द्रवत्व नहीं है ) | ( उ ० ) घृतादि पार्थिव द्रव्यों में रहनेवाले नैमित्तिक द्रवत्व का यह स्वभाव है कि अग्नि के अत्यन्त संयोग से नष्ट हो जाना, सुवर्ण के द्रवत्व में यह बात नहीं है । इसी समाधान से स्वर्ण को पृथिवी होने का प्रवाद भी खण्डित हो जाता है, अगर सुवर्ण पार्थिव होता तो फिर घृतादि पार्थिव द्रव्यों के द्रवत्व की तरह सुवर्ण का द्रवत्व भी अग्नि के अत्यन्त संयोग से नष्ट हो जाता । ( प्र ० ) यह जो विरोधी अनुमान का प्रयोग किया जाता है कि सुवर्ण पार्थिव ही है, क्योंकि सांसिद्धिकद्रवत्व के न रहने पर भी उसमें गुरुल है, जैसे कि ढेले में ( उ ० ) इस For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६५ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशतपादभाष्यम् [ साधर्म्य बंधयं-एवं सर्वत्र साधर्म्यं विपर्य्ययाद्वैधर्म्यश्च वाच्यमिति द्रव्यासङ्करः । इसी प्रकार रहने के कारण साधर्म्य और नहीं रहने के कारण वैधर्म्य समझना चाहिए । अतः द्रव्यों में कोई साङ्कर्य नहीं है । न्यायकन्दली गुरुत्वाधिकरणत्वाल्लोष्टादिवत् तदप्यसारम्, किं तत्र गुरुत्वस्योपलब्धिस्तद्-गुणत्वादुतान्यगुणत्वेऽपि घृतादिष्वपि स्नेहवत् स्वाश्रयप्रत्यासत्तिनिमित्तादिति संशयस्यानिवृत्तेः । यदपि साधनान्तरं परप्रकाश्यमानत्वादिति, तदप्यनुद्भूतरूप-वत्त्वेनाप्युपपत्तेरसाधनम् । दिङ्मात्रमस्माभिरुपदिष्टम् । अनेनैव न्यायेन सर्वत्र पदार्थेऽन्यदपि साधर्म्यं स्वयं वाच्यम्, विपर्य्ययादितरव्यावृत्तेर्वैधर्म्यं वाच्यमिति शिष्यानाह - एवमिति । अनुद्दिष्टेषु पदार्थेषु न तेषां लक्षणानि प्रवर्त्तन्ते निर्विषयत्वात्, अलक्षितेषु च तत्त्वप्रतीत्यभावः कारणाभावात्, अतः पदार्थव्युत्पादनाय प्रवृत्तस्य शास्त्रस्योभयथा प्रवृत्तिः - उद्देशो लक्षणञ्च । परीक्षायास्त्वनियमः । यत्राभिहिते लक्षणे प्रवादान्तरव्याक्षेपात्तत्त्वनिश्चयो न भवति, तत्र परपक्षव्युदासार्थं अनुमान में भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि सुवर्ण में जिस गुरुत्व की उपलब्धि होती है वह उसका अपना गुण है, जैसे कि ढेले में, या उसमें संयुक्त किसी दूसरे द्रव्य का है, जैसे कि तेल में स्नेह का, इस संशय की निवृत्ति नहीं होती है । सुवणं तैजस नहीं है ' इसको सिद्ध करने के लिए कोई यह हेतु देते हैं कि सुवर्ण तैजस इसलिए नहीं है कि वह ( दीपादि ) दूसरे वस्तुओं से प्रकाशित होता है, किन्तु यह भी हेत्वाभास ही है, क्योंकि स्वर्ण को ( दीपादि ) दूसरे द्रव्यों से प्रकाशित होने की उपपत्तिं उसके भास्वर शुक्ल रूप को अनुभूत मान लेने से भी हो सकती है । सुवर्ण मे तैजसत्व की साधक और बाधक युक्तियों का यहाँ हम लोगों ने दिग्दर्शन मात्र किया है । इसी प्रकार सभी पदार्थों में और साधर्म्य की भी कल्पना स्वयं करनी चाहिए । एवं जो साधर्म्यं जिनमें न हो उसको उनका वैधर्म्य समझना चाहिए । इसी विषय को शिष्यों को समझाने के लिए आगे ' एवम् ' इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । जिन पदार्थों का उल्लेख नामतः नहीं होता है, उनमें लक्षण को प्रवृत्ति नहीं होती निर्दिष्ट नहीं रहता है । एवं बिना लक्षण के है, क्योंकि उस लक्षण का कोई लक्ष्य ही पदार्थों का बोध ही असम्भव है । अतः पदार्थों के प्रतिपादन प्रवृत्ति नियमत: ( १ ) उद्देश और ( २ ) लक्षण भेद से दो ही करनेवाले शास्त्रों की प्रकार की होती है, परीक्षा रूप शास्त्र की प्रवृत्ति के प्रसङ्ग में नियम नहीं है, ( अर्थात् ) जहाँ लक्षण कहे जाने के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६६ परीक्षाविधिरधिक्रियते । यत्र तु लक्षणाभिधानसामर्थ्यादेव तत्त्वनिश्चयः स्यात्, तत्रायं व्यर्थो नार्थ्यते । योऽपि हि त्रिविधां शास्त्रस्य प्रवृत्तिमिच्छति, तस्यापि प्रयोजनादीनां नास्ति परीक्षा, तत् कस्य हेतो:? लक्षणमात्रादेव ते प्रतीयन्त इति । एवञ्चेदर्थप्रतीत्यनुरोधाच्छास्त्रस्य प्रवृत्तिर्न त्रिधैव । नामधेयेन पदार्था-नामभिधानमुद्देशः । उद्दिष्टस्य स्वपरजातीयव्यावर्त्तको धर्मो लक्षणम् । लक्षितस्य यथालक्षणं विचारः परीक्षा । उद्दिष्टविभागस्तु न विधान्तरम्, उद्देश-लक्षणेनैव संगृहीतत्वात् । तथा हि पृथगुच्येत । एतान्येवेति नियमार्थं विशेष-लक्षण प्रवृत्त्यर्थश्च विभक्तेषु पदार्थेषु तेषां विशेषलक्षणानि भवन्ति, अन्यथा तानि निर्विषयाणि स्युः । तत्र द्रव्याणि द्रव्यगुणकर्मेत्युद्दिष्टानि पृथिव्यप्तेज इति विभक्तानि । सम्प्रति तेषां विशेषलक्षणार्थं प्रकरणमारभ्यते । बाद विरुद्ध मत के उपस्थित होने के कारण पदार्थों का तत्त्व ज्ञात नहीं होने पाता, वहीं विरुद्ध मत को खण्डित करने के लिए परीक्षा आरम्भ की जाती है । किन्तु जहाँ लक्षण के कहने से ही वस्तुओं का तत्त्वज्ञान हो जाता है, वहाँ व्यर्थ होने के कारण परीक्षा अपेक्षित नहीं होती है । जो कोई ( न्यायभाष्यकार वात्स्यायन ) शास्त्रों की प्रवृत्ति को ( १ ) उद्देश, ( २ ) लक्षण और ( ३ ) परीक्षा भेद से नियमतः तीन प्रकार का मानते हैं, उनके शास्त्र में भी प्रयोजनादि पदार्थों की परीक्षा नहीं है । इसका क्या कारण है? यही कि वे लक्षण कहने मात्र से तत्त्वतः ज्ञात हो जाते हैं । अगर प्रतीति के अनुरोध से ही शास्त्रों की प्रवृत्ति होती है तो फिर वह नियम से तीन हीप्रकार की नहीं होती है ( अधिक भी हो सकती है और अरूप भी ) पदार्थों को केवल उनके नामों से निर्दिष्ट करना ' उद्देश ' हैं । उद्दिष्ट पदार्थ को अपने से भिन्न सजातीय और विजातीय पदार्थों से भिन्न रूप से समझानेवाला धर्म ही ' लक्षण ' है । लक्षण के द्वारा समझाये गये वस्तु का लक्षण के अनुसार विचार ही ' परीक्षा ' है । ' उद्दिष्ट लक्षण ' नाम की शास्त्र की कोई अलग प्रवृत्ति नहीं है, क्योंकि कथित उद्देश के लक्षण से ही वह गतार्थ हो जाता है । ' उद्दिष्ट विभाग ' नाम की अलग शास्त्र की प्रवृत्ति ( १ ) पदार्थ इतने ही हैं ' इस नियम के लिए या ( २ ) विशेष लक्षणों की प्रवृत्ति के लिए इन्हीं दो प्रयोजनों से मानी जा सकती थी, क्योंकि विभाग किये हुए पदार्थों के ही विशेष लक्षण होते हैं । अगर ऐसा न हो तो फिर इन विशेष लक्षणों का कोई विषय ही नहीं रहेगा । यहाँ द्रव्यगुणेत्यादि ग्रन्थ से द्रव्यों का उद्देश हो गया है एवं पृथिव्यप्तेज ' इत्यादि ग्रन्थ से वे विभक्त हुए हैं । अब द्रव्यों के विशेष लक्षण के लिए आगे का प्रकरण आरम्भ करते हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७० न्याय कन्दलीसं वलित प्रशस्तपादभाष्यम् अथ द्रव्यपदार्थनिरूपणम् प्रशस्तपादभाष्यम् इहेदानीमेकैकशो वैधर्म्यमुच्यते । पृथिवीत्वामिसम्बन्धात् पृथिवी । [ द्रव्ये पृथिवी-अब तक कहे हुए पदार्थों में से प्रत्येक का वैधर्म्य, अर्थात् असाधारण धर्म रूप लक्षण कहते हैं । पृथिवी जाति के सम्बन्ध से यह पृथिवी है यह व्यवहार करना चाहिए । न्यायकन्दली इदानीमिति । पूर्वं द्वयोर्बहूनां परस्परापेक्षया वैधर्म्यमुक्तम् । इह वक्ष्यमाणे प्रकरणे सम्प्रत्येकैकस्य द्रव्यस्य व्यावर्त्तको धर्मः कथ्यते । एकैकश इति शस्प्रत्ययाद् वीप्सात्यन्तबहु व्याप्तिप्रदर्शनार्था । उद्देशक्रमेण पृथिव्याः प्रथमं वैधर्म्यमाह - पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवीति । यो हि पृथिवीं स्वरूपतो जानन्नपि कुतश्चिद् व्यामोहात् पृथिवीति न व्यवहरति तं प्रति विषय सम्बन्धाव्यभिचारेण व्यवहारसाधनार्थं मसाधारणो धर्मः कथ्यते -- पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवीति । इयं पृथिवीति व्यवहर्तव्या पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात्, यत् पुनः पृथिवीति न व्यवह्रियते, न तत् पृथिवीत्वेना-भिसम्बद्धम्, यथाबादिकम्, न चेयं पृथिवीत्वेन नाभिसम्बद्धा, तस्मात् पृथिवीति व्यवहर्तव्येति । यो वा पृथिवीति लोके शृणोति, न जानाति च तस्याः स्वरूपं कीदृगिति तं प्रति तस्याः स्वपरजातीयव्यावृत्तस्वरूपप्रतिपादनार्थमसाधारणो ( इससे ) पहिले दो या दो से अधिक पदार्थों में रहनेवाले एक दूसरे की अपेक्षा से जो असाधारण धर्म हैं — वे ही कहे गये हैं । अब प्रत्येक द्रव्य में रहनेवाले असाधारण धर्म ही कहे जाते हैं । ' एकैकशः ' इस पद में प्रयुक्त वीप्सा के बोधक ' शस् ' प्रत्यय के प्रयोग से इस बात की सूचना होती है कि लक्षण कहने के इस क्रम का दायरा बहुत दूर तक अर्थात् प्रत्येक द्रव्य के लक्षण कहने तक है । पृथिवीत्वादिसम्बन्धात् पृथिवी । जो कोई पृथिवी को स्वरूपतः जानते हुए भी उसमें ' पृथिवी ' शब्द का व्यवहार नहीं कर पाते पृथिवीत्व जाति और पृथिवीत्व जाति के अव्यभि-चरित सम्बन्ध इन दोनों के द्वारा पृथिवी में ' पृथिवी ' पद का उनके व्यवहार के लिए " पृथिवी-त्वाभिसम्बन्धात् पृथिवी " इस वाक्य से पृथिवी का असाधारण धर्म कहते हैं । इसका व्यवहार ' पृथिवी ' शब्द से करना चाहिए, क्योंकि इसमें पृथिवीत्व का सम्बन्ध है । जो पृथिवी शब्द से व्यवहृत नहीं होता है, उसमें पृथिवीत्व का सम्बन्ध नहीं है, जैसे कि जलादि में, यह पृथिवी से असम्बद्ध भी नहीं है, तस्मात् इसका व्यवहार ' पृथिवी ' शब्द से करना चाहिए । अथवा जो लोगों से ' पृथिवी ' शब्द को सुनता है, किन्तु पृथिवी के स्वरूप को नहीं जानता कि वह कैसी है? पृथिवी को सजातीयों से एवं विजातीयों से भिन्न समझानेवाले असाधारण धर्म्म For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir करणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७१ रूपरसगन्धस्पर्शसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्व संयोगविभागपरत्वाप रत्वगुरुत्वद्रवत्वसंस्कारवती । एते च गुणविनिवेशाधिकारे रूपादयो गुण-यह पृथिवी रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व गुरुत्व, द्रवत्व और संस्कार इन चौदह गुणों से युक्त है । ये रूपादि गुणविशेष न्यायकन्दली धर्मः कथ्यते, या लोके पृथिवीति व्यपदिश्यते सा पृथिवी, पृथिवीत्वाभि-सम्बन्धात् । यथाहोद्योतकरः -- “ समानासमानजातीयव्यवच्छेदो लक्षणार्थः ” ( न्या ० वा ० ) एतेनैतदपि प्रत्युक्तम्, प्रसिद्धाश्चेत् पदार्था न लक्षणीयाः, अप्रसिद्धा नितरामशक्यत्वात्, स्वरूपेणावगतस्यापि व्यवहारविशेषप्रति-पादनार्थं सामान्येन प्रसिद्धस्य विशेषावगमार्थञ्च लक्षणप्रवृत्तेः । नन्वेवं सत्यन-वस्था, लक्ष्यवल्लक्षणस्याप्यन्ततो लक्षणीयत्वादिति चेन्न, अप्रतीतौ लक्षणा-पेक्षित्वात् सर्वत्र चाप्रतीत्यभावात् तथा हि-- शिरसा पादेन गवामनुबध्नन्ति विद्वांसः, न पुनरेतावप्यन्यतः समीक्षन्ते । यस्तु सर्वथैवाप्रतिपन्नः, न तं प्रत्यु-पदेशः, तस्य बालमूकादिवदनधिकारात् । गन्धसहचरितचतुर्दशगुणवत्त्वमपि पृथिव्या इतरेभ्यो वैधर्म्यमिति प्रतिपादयन्नाह - - रूपरसगन्धेति । अत्र द्वन्द्वानन्तरं मतुप्प्रत्यययोगात् प्रत्येकं के द्वारा उसे समझाने के लिए ' पथिवीत्वाभिसम्बन्धात् ' इत्यादि वाक्य कहते हैं । जिसका व्यवहार लोक में ' पृथिवी ' शब्द से होता है, वही पृथिवी है, क्योंकि उसमें पृथिवीत्व का सम्बन्ध है । जैसा कि उद्योतकर ने कहा है कि लक्ष्य को उनके समानजातीयों से एवं असमान-जातीयों से भिन्न रूप में समझाना ही लक्षण का काम है । इससे यह आक्षेप भी खण्डित हो जाता है कि पदार्थं अगर प्रसिद्ध हैं तो फिर उनका लक्षण करना ही व्यर्थ है । अगर अप्रसिद्ध हैं तब तो और भी व्यर्थ है । स्वरूपतः ज्ञात वस्तुओं के विशेष व्यवहार के लिए एवं सामान्यतः प्रसिद्ध वस्तुओं के विशेष रूप से जानने के लिए ही लक्षण की प्रवृत्ति होती है । ( प्र ० ) इस प्रकार तो अनवस्था होगी क्योंकि उन लक्षणों को विशेष रूप से जानने के लिए भी दूसरे लक्षणों की आवश्यकता होगी, उनके विशेष ज्ञान के लिए फिर तीसरे की । ( उ ० ) सम्यक् प्रतीति न होने पर ही लक्षणों की अपेक्षा होती है, किन्तु सभी स्थलों में वस्तुओं की अप्रतीति नहीं होती । विद्वान् लोग शिर और पैर से गाय को समझते हैं, किन्तु शिर और पैर को किसी ओर से समझने की आवश्यकता नहीं होती । जो व्यक्ति इन सब बातों से सर्वथा अनजान है, उसके लिए उपदेश है ही नहीं, क्योंकि वह तो बालक और गूंगे की तरह उपदेश का सर्वथा अनधिकारी है । " गन्ध से युक्त चौदह गुणों का रहना भी औरों की अपेक्षा से पृथिवी का असाधारण For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ७२ यह सूत्रकार न कहते । www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir [ द्रव्ये पृथिवी-न्यायकन्दलो संवलितप्रशस्तपाद भाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal विशेषाः सिद्धाः । चाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । पतनोपदेशाद् गुरुत्वम् । ' गुणविनिवेशाधिकार ' अर्थात् कौन गुण किस द्रव्य में है? इसके प्रतिपादक वैशेषिक सूत्र के द्वितीय अध्याय के सूत्रों से पृथिवी में सिद्ध हैं । चाक्षुष् घटित सूत्र ( ४ - १ - ११ ) से पृथिवी में संख्या प्रभृति सात गुण सिद्ध हैं । महर्षि कणाद ने ( ५-१-७ से ) कहा है कि पृथिवी पतनशील रूपादीनां पृथिव्या सह सम्बन्धो लभ्यते । सूत्रकारस्याप्येते गुणाः पृथिव्या-मभिमता इत्याह-- एते चेति । गुणानां विनिवेशो द्रव्येषु वृत्तिः, सा प्रतिपाद्यते अनेनाधिक्रियतेऽस्मिन्निति गुणविनिवेशाधिकारो द्वितीयोऽध्यायः । तस्मिन् रूपरसगन्धस्पर्शाः पृथिव्यां सिद्धाः सूत्रकारेण प्रतिपादिताः -- रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवीति । चाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । “ सङ्ख्या परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे कर्म्म च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षुषाणि " ( ४-१ - - १ ) इति चाक्षुषवचनाद् रूपवत्यां पृथिव्यां सङ्ख्यादयः सप्त सिद्धाः । यदि ते रूपिद्रव्येषु न सन्ति तत्समवाये तेषां प्रत्यक्षत्वं सूत्रकारेण नोक्तं स्यादित्यर्थः । धर्म है ” यही समझाने के लिए " रूपरसगन्धस्पर्श संख्या " इत्यादि वाक्य है । इस वाक्य में द्वन्द्व समास के बाद मतुप् प्रत्यय है, अन: कथित रूपादि गुणों में से प्रत्येक का सम्बन्ध पृथिवी के साथ ज्ञात होता है । पृथिवी में ' इतने गुण है ' इस विषय में महर्षि कणाद की सम्मति " एते च " इत्यादि से दिखलाते हैं । ' गुणानां विनिवेशोऽधिक्रियते अस्मिन् ' इस व्युत्पत्ति के बल से द्रव्य में गुणों की विद्यमानता जिसमें कही गयी है, वह द्वितीय अध्याय हो यहाँ ' गुणविनिवेशाधिकार ' शब्द से कहा गया है । गुणविनिवेशाधिकार के " रूपरसगन्धस्पर्शवत्ती पृथिवी ” ( २ - १ - १ ) इस सूत्र से पृथिवी मे रूप, रस, गन्ध और स्पर्श की सत्ता सूत्रकार ने कही हैं । " संख्या परिमाणानि पृथकत्वं संयोगविभागो परत्वापरत्वे च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षुषाणि " ( ४ - १ - १ ) इस सूत्र से संख्यादि सात गुणों को रूप युक्त द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध के कारण ' चाक्षुष ' कहा है । जिससे रूपयुक्त पृथिवी में संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व और अपरत्व येसात गुण समझना चाहिए | अभिप्राय यह है कि संख्यादि सात गुण अगर रूपवाले द्रव्यों में न रहते तो ' रूपिद्रव्य के समवाय से इनका प्रत्यक्ष होता है '
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra भाषानुवादसहितम् प्रकरणम् ] प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली १. एक मात्र विजयनगरम् संस्कृत ग्रन्थमाला में मुद्रित १० For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७३ न्यायकन्दली को पुस्तक अद्भिः सामान्यवचनाद् द्रवत्वम् । उत्तरकर्मवचनात् संस्कारः । क्षितावेव गन्धः । रूपमनेकप्रकारं शुक्लादि । रसः षड् विधो मधुरादिः । गन्धो द्विविधः सुरभिरसुरभिश्च । स्पर्शोऽस्या अनुष्णाशीतत्वे सति पाकजः । है ' अतः ( समझना चाहिए कि ) गुरुत्व नाम का गुण भी पृथिवी में उन्हें अभीष्ट है । जल के साथ सादृश्य ( २-१-७ ) कहने से पृथिवी में द्रवत्व भी उन्हें अभीष्ट है । शर प्रभृति पार्थिव द्रव्य के उत्तर कर्म में संस्कार को कारण कहने ( ५–१–१७ ) से पृथिवी में ( वेग और स्थितिस्थापक ) संस्कार भी उन्हें अभिप्रेत हैं । गन्ध पृथिवी में ही है । शुक्लादि अनेक प्रकार के रूप भी पृथिवी में ही हैं । मधुरादि छः प्रकार के रस भी पृथिवी में ही हैं । सुरभि ( सुगन्ध ) और असुरभि ( दुर्गन्ध ) भेद से गन्ध दो प्रकार का है । पाकज अनुष्णाशीत स्पर्श भी पृथिवी में ही है । पतनोपदेशाद् गुरुत्वमिति । “ संयोग प्रतियत्नाभावे गुरुत्वात् पतनम् " ( ५ । १ । ७ ) इत्युपदेशात् सूत्रकारेण पतनसम्बन्धिन्यां पृथिव्यां गुरुत्वमस्तीत्यर्थात् कथितम्, व्यधिकरणस्याकरणत्वात् । अद्भिः सामान्य-वचनाद् द्रवत्वम्, “ सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानां पार्थिवानामग्निसंयोगाद् द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् " ( २ । १ । ७ ) वचनात् पृथिव्यां इति नैमित्तिकं ' पतनोपदेशाद् गुरुत्वम् ' अर्थात् ' ' संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ' ( ५ । १ । ७ ) इस सूत्र से महर्षि कणाद ने उपदेश किया है कि पतनशील पृथिवी में गुरुत्व है, क्योंकि एक आश्रय में विद्यमान वस्तु दूसरे आश्रय में कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकती । ' अद्भिः सामान्यवचनाद् द्रवत्वम् ' अर्थात् “ सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानां पार्थिवानामग्निसंयोगाद् द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् ” ( २ । १ । ७ ) अर्थात् घृत, लाह, मोम प्रभृति पार्थिव द्रव्यों में अग्नि के संयोग से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । यह ( नैमित्तिक द्रवत्व ) पृथिवी और जल दोनों में इस सूत्र का पाठ है " संयोगप्रतियत्नाभावे गुरुत्वात्पतनम् ' ( पृ ० २६ पं ० १४ ) । यद्यपि यह ठीक है कि विरुद्ध यत्न भी पतन का प्रतिबन्धक है, जिससे कि आकाश में उड़ते हुए पक्षी का पतन नहीं होता है । अतः पतन के लिए उसका भी अभाव अपेक्षित है । किन्तु ढेले को फेंकने पर कुछ दूर तक उसका भी पतन नहीं होता है, अतः वेग को भी पतन का प्रतिबन्धक कहना ही चाहिए । न कहने पर न्यूनता होगी । अतः प्रथमोपात्त संयोग पद को उपलक्षण मानकर उसे पतन के सभी प्रतिबन्धकों में लाक्षणिक
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra : ७४ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी-न्यायकन्दली द्रवत्वमस्तीत्युक्तम् । मधूच्छिष्टशब्देन सिक्थस्याभिधानम् । उत्तरकर्मवचनात् संस्कार इति । " नोदनादाद्यमिषोः कर्म, तत्कर्मकारिताच्च संस्कारात् तथोत्तरमुत्तरञ्च " ( ५ । १ । १७ ) इति सूत्रकारेण इषौ पार्थिवद्रव्ये कर्महेतुः संस्कार इति दर्शयता पृथिव्यां वेगोऽस्तीति ज्ञापितम्, ' अविद्यमानस्याहेतुत्वात् । यथा चैक एव संस्कार आपतनात् तथोपपादयिष्यामः । क्षितावेव गन्धः । अयमस्यार्थः -- केवल एवायमसाधारणधर्म इति । सुगन्धि सलिलम्, सुगन्धिः समीरण इति प्रत्ययाद् द्रव्यान्तरेऽपि गन्धोऽस्तीति चेन्न, पार्थिव द्रव्यसमवायेन तद्गुणोपलब्धः । कथमेष निश्चय इति चेत् तदभावेऽनुपलम्भात् । में समान रूप से है । ‘ मधूच्छिष्ट ' शब्द का अर्थ है ' सिक्थ ' अर्थात् मोम । इस सूत्र से महर्षि कणाद ने कहा है कि पृथिवी में नैमित्तिक द्रवत्व है । ' उत्तरकर्म्मवचनात् संस्कार: ' अर्थात् ' नोदनादाद्यमिषोः कर्म्म, तत्कर्म्मकारिताच्च संस्कारात् तथोत्तरमुत्तरञ्च ' ( ५-१-१७ ) | ( अर्थात् तीर की पहिली क्रिया नोदन से होती है, उस क्रिया से उत्पन्न संस्कारों के द्वारा शर के आगे आगे की क्रियायें होती हैं ) ' शर रूप पार्थिव द्रव्य में कर्म का कारण संस्कार है ' इस उक्ति के द्वारा महर्षि कणाद ने यह सूचित किया है कि ' पृथिवी में वेग है ', " क्योंकि किसी आश्रय में अविद्यमान कोई भी वस्तु उस आश्रय में कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकती । पतन पर्यन्त एक ही वेगाख्य संस्कार जिस प्रकार से रहता है, उसका प्रतिपादन हम आगे करेंगे । ' क्षितावेव गन्ध: ' इस वाक्य का अर्थ है कि गन्ध दूसरे की अपेक्षा न करते हुए केवल पृथिवी का असाधारण धर्म है । ( प्र ० ) ' जल में सुगन्धि है, वायु में सुगन्धि है ' इत्यादि प्रतीतियों से ओर द्रव्यों में भी गन्ध सूचित होता है? ( उ ० ) पार्थिव द्रव्य के ( संयुक्तसमवेत ) समवाय से ही जलादि द्रव्यों में गन्ध की उपलब्धि होती है | ( प्र ० ) यह कैसे समझते हैं? ( उ ० ) क्योंकि पार्थिव द्रव्य का सम्बन्ध न रहने से जलादि में गन्ध की उपलब्धि नहीं होती है । मानना पड़ेगा । तब ' प्रतियत्न ' पद की आवश्यकता नहीं रह जाती है । इसी अभिप्राय से वैशेषिक सूत्र के सर्वमान्य वृत्तिकार श्रीशङ्कर मिश्र ने भी इस सूत्र की व्याख्या की है ( वै ० उपस्कार पृ ० १ ९ ७ पं ० २३ गुजराती प्रे ० सं ० ) । किरणावली में मुद्रित सूत्र-पाठ में भी ' प्रतियत्न ' शब्द नहीं है । ( बनारस सं ० सिरीज में मुद्रित किरणावली सूत्र पाठ १० ६ पं ० १७ ) । अतः यहाँ पर ' संयोग प्रतियत्नाभावे गुरुत्वात्पतनम् ' यह पाठ न रखकर ' संयोगाभावे गुरुत्वात्पतनम् ' यही पाठ रखना उचित समझा गया । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ७५. यद्यपि रूपं त्रयाणाम्, तथाप्यवान्तरभेदापेक्षया तदपि पृथिव्या एव वैधर्म्यमाह -रूपमनेकप्रकारकमिति । अत्रापि क्षितावेवेत्यनुसन्धानीयम् । शुक्लपीताद्य-नेकविधं रूपं क्षितावेव नान्यत्रेत्यथः । एकस्यां पृथिवीत्वजातौ नानारूपाणि व्यक्तिभेदेन समवयन्ति । क्वचिदेकस्यामपि व्यक्तावनेकप्रकाररूपसमावेशः, यत्र नानाविधरूपसम्बन्धिभिरवयवैरवयव्यारभ्यते । कथमेतदिति चेत्? उच्यते, यथावयवैरवयव्यारब्धस्तथावयवरूपैरवर्यावनि रूपमारब्धव्यम्, अवयवेषु च न शुक्लमेव रूपमस्ति, नापि श्याममेव किन्तु श्यामशुक्लहरितादीनि । न च तेषामेकं रूपमेवारभते नापराणीत्यस्ति नियमः, प्रत्येकमन्यत्र सर्वेषामपि सामर्थ्य-दर्शनात् । न च परस्परं विरोधेन सर्वाण्यपि नारभन्त एवेति युक्तम् । चित्र-रूपस्यावयविन: प्रतीतेररूपस्य द्रव्यस्य प्रत्यक्षत्वाभावाच्च । न चावयवरूपाणि समुच्चितान्यत्र चित्रधिया प्रतीयन्ते तेनैवावयवी प्रत्यक्ष इति कल्पनायामन्यत्रापि तथाभावप्रसङ्गेनावयविरूपोच्छेदप्रसङ्गः, तस्मात् सम्भूय तैरारभ्यते । तच्चारभ्यमाणं यद्यपि रूप पृथिवी, जल और तेज इन तीनों द्रव्यों में है, किन्तु अगर विशेष रूप से देखा जाय तो अनेक प्रकार के रूप पृथिवी में ही हैं, इस प्रकार रूप भी पृथिवी का असाधारण धर्म हो सकता है । इसी अभिप्राय से " रूपमनेकप्रकारकम् ” यह वाक्य लिखा है । इस वाक्य में भी ' क्षितावेव ' इतना इस अभिप्राय से जोड़ देना चाहिए कि शुक्ल पीतादि अनेक प्रकार के रूप पृथिवी में ही हैं, और द्रव्यों में नहीं । एक ही पृथिवीत्व जाति के द्रव्यों में व्यक्तिभेद से अनेक प्रकार के रूप देखे जाते हैं । कहीं एक ही व्यक्ति में नाना प्रकार के रूपों का समावेश देखा जाता है, जहाँ कि नाना रूप के अवयवों से एक अवयवी की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) यह कैसे होता है? ( उ ० ) जिस तरह अवयवों से अवयवी की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार अवयवों के रूपों अ arat में रूप को उत्पत्ति होती है । ( कथित पट के ) अवयवों में न केवल शुक्ल रूप ही है, न केवल नील रूप ही, किन्तु श्याम शुक्ल, हरित प्रभृति अनेक रूप हैं । इसका कोई नियामक नहीं है कि उनमें से कोई एक ही रूप अवयवी में रूप को उत्पन्न करते हैं और रूप नहीं, क्योंकि उनमें से प्रत्येक रूप और जगह अवयवी में रूप को उत्पन्न करते हुए दीख पड़ते हैं । यह भी ठीक नहीं है कि यहाँ परस्पर विरोध के कारण कोई भी रूप अवयवी में रूप को उत्पन्न नहीं करते, क्योंकि चित्र रूप से युक्त अवयवी का प्रत्यक्ष होता है, एवं बिना रूप के द्रव्य का चाक्षुषप्रत्यक्ष हो भी नहीं सकता! यह भी सम्भव नहीं है कि अवयवों के ही रूप अवयवी में सम्मिलित होकर चित्रबुद्धि से प्रतीत होते हैं, एवं उसी चित्र रूप से अवयवी का भी प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि इस प्रकार की कल्पना से तो सभी अवयवी की यही दशा होगी, फलतः अवयवियों से रूप की सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् अवयवों For Private And Personal