प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 151–160
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 151–160
पृष्ठ 151
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७६ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये पृथिवी-विविध कारणस्वभावानुगमाच्छ्यामशुक्लहरितात्मकमेव स्यात्, चित्रमिति च व्यप-दिश्यते । विरोधादेकमनेकस्वभावमयुक्तमिति चेत्? तथा च प्रावादुकप्रवादः--“ एकञ्च चित्रञ्चेत्येतत्तच्च चित्रतरं ततः " इति । को विरोधो नीलादीनाम्, न तावदितरेतराभावात्मकः, भावस्वभावानुगमादन्योन्यसंश्रयापत्तेश्च । स्वरूपा-न्यत्वं विरोध इति चेत्? सत्यमस्त्येव । तथापि चित्रात्मनो रूपस्य नायुक्तता, विचित्रकारणसामर्थ्यभाविनस्तस्य सर्वलोकप्रसिद्धेन प्रत्यक्षेणैवोपपादितत्वात् । अचित्रे पार्श्वे पटस्येव तदाश्रयस्य चित्ररूपस्य ग्रहणप्रसङ्गस्तस्यैकत्वादिति चेन्न, अन्वयव्यति-रेकाभ्यां समधिगतसामर्थ्यस्यावयवनानारूप दर्शनस्यापि चित्ररूपग्रहणहेतुत्वात्, तस्थ च पाश्र्वान्तरेऽभावात् । नन्वेवं तहि नानारूपैर्द्वयणुकैरारब्धे द्रव्ये न चित्ररूप-ग्रहणम्, तदवयवरूपग्रहणाभावात्? को नामाह न तथेति नहि परमसूक्ष्मस्य वस्तुनो रूपं विविच्य गृह्यते, यस्य तु विविच्य गृह्यते तस्यावयवरूपाण्यपि गृह्यते । यस्त्वव्यापकानि बहूनि चित्ररूपाणीति मन्यते, तस्य नीलपीताभ्यामारब्धे के सभी रूप मिलकर ही उस अवयवी में रूप को उत्पन्न करते हैं । इस अवयवी में उत्पन्न होनेवाला वह एक रूप कारणों के अनेक स्वभाव से श्याम शुक्ल और हरित स्वरूप ही होगा जो ' चित्र ' शब्द से व्यवहृत होता है । ( प्र ० ) विरोध के कारण एक वस्तु को अनेक स्वभाव का मानना ठीक नहीं है । ( उ ० ) लोक में यह प्रसिद्ध है कि ' चित्र ' रूप एक है और यह उस चित्र रूप से चित्रतर ' है । फिर नीलादि रूपों में परस्पर विरोध ही क्या है? क्योंकि वे परस्पर अभाव स्वरूप नहीं हैं, क्योंकि उनमें से प्रत्येक में भावत्व की प्रतीति होती है एवं परस्पराभाव रूप मानने में अन्योन्याश्रय दोष भी होगा । ( प्र. ) एक में दूसरे की स्वरूपभिन्नता ही दोनों में विरोध है? ( उ ) यह विरोध ठीक है, किन्तु इससे चित्ररूप की अत्युक्तता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि विलक्षण कारणों से उत्पन्न चित्र रूप सर्वजनीन प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है । ( प्र. ) जिस पट के कुछ अंश बिलकुल सफेद हैं, और कुछ अंश चित्र रूप के हैं, उसमें शुक्ल रूप के ग्रहण से जैसेपट का ग्रहण होता है वैसे ही चित्र रूप का भी ग्रहण होना चाहिए, क्योंकि प्रकृत में शुक्लरूपाभय पट और चित्ररूपाश्रय पट दोनों एक ही हैं? ( उ ) कारणता अन्वय और व्यतिरेक इन दोनों के अधीन है, ये दोनों जिसे जिसका कारण सिद्ध करेंगे वही उसका कारण होगा । तदनुसार चित्र रूप के प्रत्यक्ष में उसके आश्रय के अवयवों का प्रत्यक्ष भी कारण है । वह सफेदवाले अंश में नहीं है ( इसी से वहाँ चित्र रूप का प्रत्यक्ष नहीं होता है ) । ( प्र. ) तो फिर नाना रूप के द्वद्यणुकों से बने हुए द्रव्य में चित्र रूप का प्रत्यक्ष नहीं होगा? क्योंकि उत्पन्न होनेवाले द्रव्य के द्वथणुक रूप अवयव अतीन्द्रिय हैं, अतः उनके रूपों का ज्ञान सम्भव नहीं है । ( उ ) कौन कहता है कि For Private And Personal
पृष्ठ 152
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ७७ द्वितन्तु रूपानुत्पत्तिरेकैकस्यावयवरूपस्यानारम्भकत्वात् । अथ मतम् - तत्रो -भाभ्यामेकं चित्रं रूपमारभ्यते, तदन्यत्रापि तथा स्यादविशेषात् । विवादाध्यासितं चित्रद्रव्यमेकरूपद्रव्यसम्बन्धि द्रव्यत्वादितरद्रव्यवत्, तद्गतं रूपमेकमवयविरूपत्वाद् इतरावयविद्रव्यरूपवत् । रसः षड्विध इत्यत्रापि पूर्ववद् व्याख्यानम् । यद् गन्धस्य भेदनिरूपणं तत् पारम्पर्येण पृथिव्या अपि स्वरूपकथनमित्यभिप्रायेणाह - गन्धो द्विविध इति । तदेव द्वैविध्यं दर्शयति - सुरभिरसुरभिश्चेति । असुरभिरिति सुरभिगन्धविरुद्धं प्रतिद्रव्यादिसमवेतं प्रतिकूलसंवेदनीयं गन्धान्तरम्, न तु तदभावमात्रम्, विधि-रूपेण सातिशयतया च संवेदनात् । उपेक्षणीयस्तु गन्धोऽनुद्भूतसुरभ्यसुरभिप्रभेद एवेति पृथनोच्यते । अथवा सोऽप्यसुरभिरेव, सुरभिगन्धादन्योऽसुरभिरिति व्युत्पादनात् । ऐसा नहीं होता है । परम सूक्ष्म वस्तु के रूप नहीं देखे जाते जिसका रूप अच्छी तरह देखा जाता है उसके अवयवों के रूप भी देखे हो जाते हैं । जो कोई ' एक ही अवयवी में रहनेवाले अव्याप्यवृत्ति अनेक रूप ही चित्र रूप है ' ऐसा मानते हैं उनके मत में नील और पीत रूप के दो तन्तुओं से भारब्ध पट में रूप की उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि अवयव का एक रूप तो कारण नहीं है ( प्र. ) वहाँ दोनों रूप मिलकर एक चित्र रूप का उत्पादन करते हैं । ( उ. ) तो फिर और स्थानों में भी वही होगा, क्योंकि स्थिति में कोई अन्तर नहीं है । ( १ ) विवाद का विषय यह चित्र द्रव्य एक रूप के द्रव्य का सम्बन्धी है, क्योंकि वह द्रव्य है । ( २ ) उसमें रहनेवाला रूप एक ही है, क्योंकि वह अवयवी का रूप है । जैसे कि और अवयवी द्रव्यों का रूप । वाक्य की व्याख्या भी ' रुपमनेकप्रकारकम् ' इस पहिले भेद का निरूपण परम्परा से पृथिवी के ही स्वरूप का गन्धो द्विविधः ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । यही दोनों वाक्य से लिखते हैं । ' असुरभि ' शब्द का अर्थ सुगन्ध ' रसः षड्विध: ' इस वाक्य की तरह है । गन्ध के निरूपण है, इसी अभिप्राय से प्रकार ' सुरभिरसुरभिश्च ' इस के विरोधी किसी विशेष द्रव्य में समवाय होनेवाला दूसरा गन्ध है, केवल सुरभि का सम्बन्ध से रहनेवाला अनभीष्ट रूप से ज्ञात अभाव नहीं, क्योंकि भावत्व रूप से और न्यूनाधिक भाव से उसका भान होता है । उपेक्षणीय गन्ध अनुभूत सुरभि और धनु -भूत असुरभि का ही प्रभेद है, अतः उसे अलग से नहीं कहा गया । अथवा उपे-क्षणीय गन्ध असुरभि ' शब्द का ही अर्थ है, क्योंकि ' असुरभि ' शब्द का ऐसा अर्थ है कि सुरभिगन्धादन्यो गन्ध: ' अर्थात् सुरभि गन्ध से भिन्न गन्ध ही ' असुरभि ' शब्द का अर्थ है । For Private And Personal
पृष्ठ 153
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी-सा च द्विविधा - नित्या चानित्या च । परमाणुलक्षणा नित्या, कालक्षणा त्वनित्या । सा च स्थैय्याद्यवयवसन्निवेशविशिष्टाऽपरजाति-बहुत्वोपेता शयनासनाद्यने कोपकारकरी च । ( १ ) परमाणुरूपा नित्य पृथिवी एवं ( २ ) कार्यरूपा अनित्य पृथिवी, इस भेद से पृथिवी के दो भेद हैं । इनमें कार्यरूपा पृथिवी स्थैर्यादि ( घनत्व शिथिलत्वादि ) अवयवों के विलक्षण संयोग से युक्त है और उसमें अनेक अपर जातियाँ रहती हैं । वह बिछावन और आसनादि द्वारा अनेक उपकारों का कारण है । न्यायकन्दली यथाभूतः स्पर्शो s स्या वैधर्म्यं तथा दर्शयति स्पर्शोऽस्या इति । पाकज: स्पर्शः पृथिव्या वैधर्म्यं तस्य स्वरूपकथनमनुष्णाशीतइति । यद्यपि स्पर्शवत्पाकजौ रूपरसावप्यस्याः वैधर्म्यम्, तथापि रूपरसयोः पाकजत्वानभिधानम्, अन्यथापि तयोर्वैधर्म्यस्य सम्भवात् वैधर्म्यमात्रप्रतिपादनस्यैव विवक्षितत्वात् । अप्रतीयमानपाकजेषु स्तम्भादिषु स्पर्शस्य पाकजत्वमनुमानात् । स्तम्भादिषु स्पर्शः पाकजः, पार्थिवस्पर्शत्वात् घटादिस्पर्शवत् । घटादिस्पर्शस्यापि पाकजत्वमेके-न्द्रियग्राह्यत्वे सति तद्गुणत्वात् तद्गतरूपवत् । अवान्तरभेदनिरूपणार्थमाह-- नित्या चानित्या चेति । प्रकारान्तरा-भावसंसूचनार्थी चशब्दौ । का नित्या का चानित्येत्याह-- परमाणुलक्षणा नित्या कार्यलक्षणा त्वनित्येति । उभयत्रापि लक्षणशब्दः स्वभावार्थः । परमाणु-' किस प्रकार का स्पर्श पृथिवी का असाधारण धर्म है ' यह ' स्पर्शोऽस्याः ' इत्यादि से दिखलाते हैं । पाकज स्पर्श ही पृथिवी का असाधारण धर्म है, ' अनुष्णाशीतः ' यह अंश उसी के स्वरूप का कथन है । यद्यपि स्पर्श की तरह पाकज रूप एवं पाकज रस भी पृथिवी के असाधारण धर्म हो सकते हैं, फिर भी असाधारण धर्म के लिए कथित रूप और रस में पाकजस्व इस लिए नहीं कहा कि वे और तरह से भी पृथिवी के वैधर्म्य हो सकते हैं । यहाँ केवल वैधम्यं प्रतिपादन ही इष्ट है । स्तम्भादि जिन पार्थिव द्रव्यों के स्पर्श में पाकजत्व का प्रत्यक्ष नहीं होता है, उन स्पर्शो में भी पाकजत्व का अनुमान करेंगे कि स्तम्भादि के स्पर्श पाकज हैं, क्योंकि वे पृथिवी के स्पर्श हैं, जैसे घटादि के स्पर्श । घट के स्पर्श में पाकजत्व का अनुमान इस प्रकार करेंगे कि वह पार्थिव होने के साथ साथ एक मात्र इन्द्रिय से गृहीत होता है, जैसे कि उसका रूप । ( अतः वह भी पाकज है ) । ' नित्या चानित्या च ' यह वाक्य पृथिवी के अवान्तर भेद के निरूपण के सिए लिखते हैं । ' पृथिवी के और प्रकार ' च ' शब्द लिखे गये हैं । इनमें कौन नहीं हैं ' इसकी सूचना देने के नित्य है? और कौन अनित्य? लिए ही दोनों यह समझाने के For Private And Personal
पृष्ठ 154
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ७६ स्वभावायाः पृथिव्याः सत्त्वे किं प्रमाणम्? अनुमानम्, अणुपरिमाणतारतम्यं क्वचिद् विश्रान्तं परिमाणतारतम्यत्वाद् महत्परिमाणतारतम्यवत्, यत्रेदं विश्रान्तं यतः परमाणुर्नास्ति स परमाणुः । अत एव नित्यो द्रव्यत्वे सत्यनवयवत्वादाकाशवत् अथायं सावयवो न तहि परमाणुः, कार्टापरिमाणापेक्षया तदवयवपरिमाणस्य लोकेऽल्पीयस्त्वप्रतीतेः, यश्च तस्यावयवः स परमाणुर्भविष्यति । अथ सोऽपि न भवति, अवयवान्तरसद्भावात्? एवं तर्ह्यनवस्था, ततश्चावयविनामल्पतर-तमादिभावो न स्यात्, सर्वेषामनन्तकारणजन्यत्वाविशेषेण परिमाण प्रकर्षाप्रकर्षहेतोः कारणसङ्ख्याभूयस्त्वाभूयस्त्वयोरसम्भवात् । अस्ति तावदयं परिमाणभेदः, तस्मादणु-परिमाणं क्वचिन्निरतिशयमिति सिद्धो नित्यः परमाणुः । स चैको नारम्भकः, लिए लिखते हैं कि परमाणुलक्षणा नित्या, कार्यलक्षणा त्वनित्या ' इस वाक्य के दोनों ही ' लक्षण ' शब्द स्वभाव ' ' के बोधक हैं । ( प्र ० ) परमाणु स्वभाव की पृथिवी की सत्ता में प्रमाण क्या है? ( उ ० ) यह अनुमान प्रमाण है कि अणुपरिमाण का न्यूनाधिक भाव भी कहीं समाप्त होता है, क्योंकि वह भी परिमाण का न्यूनाधिक भाव है, जैसे कि महत्परि-माण का न्यूनाधिक भाव । अणुपरिमाण का यह तारतम्य जहाँ समाप्त होता है, चूँकि उससे छोटा कोई और अणु नहीं है, अतः वही परमाणु है । अतएव वह नित्य भी है, क्योंकि वह द्रव्य होने पर भी सावयव नहीं है जैसे कि आकाश | अगर वह सावयव है तो फिर वह परमाणु नहीं है, क्योंकि यह लोक में सिद्ध है कि कार्य के परिमाण से कारण का परिमाण अल्प होता है । फिर वही कारणीभूत द्रव्य परमाणु कहलायेगा । यह परमाणु भी नहीं कहला सकता, अगर इसके छोटे अवयव हैं । इस प्रकार ( परमाणु को सावयव मानने में ) अनवस्था होगी, एवं इस अनवस्था से अवयवियों में परस्पर छोटे बड़े के भेद ही उठ जायेंगे । कोई अवयवी किसी दूसरे अवयवी से बड़ा इसलिए है कि उसका निर्माण उस छोठे अवयवी के निर्माणक अवयवों से अधिक संख्यक अवयवों से होता है । कोई अवयवी किसी अवयवी से छोटा इसलिए है कि उस अवयवी के निर्मापक अवयवों से अल्पसंख्यक अवयवों से उसका निर्माण होता है । अगर सभी को सावयव मान लें तो सभी अवयवियों को असंख्य अवयवों से निर्मित मानना पड़ेगा । फिर अवयवियों में परस्पर छोटे बड़े का व्यवहार ही किससे होगा? किन्तु अवयवियों में परस्पर छोटे बड़े का भेद सर्वजनीन अनुभव से सिद्ध है । तस्मात् अणुपरिमाण का न्यूनाधिक भाव अवश्य ही कहीं समाप्त होता है । जहाँ यह समाप्त होता है वही ' नित्य परमाणु ' है । उन परमाणुओं में से किसी एक से ही कार्य्यं की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि इससे सभी समय कार्योत्पत्ति की आपत्ति होगी, कारण कि उसे दूसरे को अपेक्षा नहीं है । अगर एक ही नित्य वस्तु For Private And Personal
पृष्ठ 155
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ८० न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये पृथिवी-एकस्य नित्यस्य चारम्भकत्वे कार्य्यस्य सततोत्पत्तिः स्यादपेक्षणीयाभावात्, अविना-शित्वश्च प्रसज्येत, आश्रयविनाशस्यावयविभागस्य च विनाशहेतोरभावात् । त्रयाणामप्यारम्भकत्वमयुक्तम्, इह महत्कार्य्यद्रव्यस्योत्पत्तौ स्वपरिमाणापेक्ष-या s पपरिमाणस्य कार्य्यद्रव्यस्यैव सामर्थ्यदर्शनात् । त्र्यणुकं कार्य्यद्रव्येणैव जन्यते, महत्परिमाणत्वात् घटवत् । एवं त्रयाणामेकस्य चारम्भकत्वे प्रतिक्षिप् द्वाभ्यामेव परमाणुभ्यामारभ्यते यत् तद्व्यणुकमिति सिद्धम् । द्वयणुकैर्बहुभिरारभ्यत इत्यपि नियमो न द्वाभ्यां तस्याणुपरिमाणोत्पत्तौ कारणसद्भावेनाणुत्वोत्पत्ता-वारम्भवैयर्थ्यात्, बहुषु त्वनियमः । कदाचित् त्रिभिरारभ्यत इति त्र्यणुकमित्युच्यते, कदाचिच्चतुभिरारभ्यते, कदाचित् पश्चभिरिति यथेष्टं कल्पना । न च कार्य्यस्य व्यर्थता, यथा यथा कारणसङ्ख्याबाहुल्यं तथा तथा महत्परिमाणतारतम्योपलम्भात् । न चैवं सति द्वयणुकानामेव घटारम्भकत्वप्रसक्तिः, घटस्य भङ्गेऽल्पतरतमादिभाग-दर्शनेन तथैवारम्भकल्पनात् तदेवं द्वयणुकादिप्रक्रमेण क्रियते कार्य्यलक्षणा पृथिवी । से कार्य की उत्पत्ति मानें तो कार्य का विनाश ही असम्भव होगा, क्योंकि कार्यों का नाश दो ही वस्तुओं से सम्भव है, एक तो आश्रय के नाश से ( समवायिकारण के नाश से ) दूसरे अवयवों के विभाग से ( फलतः असमवायिकारण के नाश से ), ये दोनों ही प्रकार नित्य वस्तु से कार्यों की उत्पत्ति मान लेने पर असम्भव हैं । तीन परमाणु भी मिलकर कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकते, क्योंकि तीन परमाणुओं से जो बनेगा वह अवश्य ही महान् होगा । महत्परिमाण के कार्यद्रव्य का यह स्वभाव सर्वत्र देखा जाता है कि उसकी उत्पत्ति उसके परिमाण से न्यून परिमाणवाले कार्यद्रव्यों से होती है । तस्मात् व्यसरेणु कार्यद्रव्यों से उत्पन्न होता है, क्योंकि उसमें महापरिमाण है, जैसे कि घटादि । इससे एक परमाणु से और तीन परमाणुओं से कार्य की उत्पत्ति खण्डित हो जाने पर यह सिद्ध होता है कि दो परमाणुओं से ही कार्य की उत्पत्ति होती है, एवं उस कार्य का नाम द्वणुक है । यह भी निश्चित ही है कि दो से अधिक द्वणुकों से ही कार्य की उत्पत्ति हो सकती है, दो द्वयणुकों से नहीं, क्योंकि दो द्वणुकों से उत्पन्न कार्य का परिमाण ' अणु ' ही होगा, क्योंकि उसके परिमाण अणुपरिमाण को ही उत्पन्न करने का सामथ्यं है । दो द्वथणुकों से जिस अणुपरि-माणवाले द्रव्य की उत्पत्ति होगी उसका उत्पन्न होना ही व्यर्थ है । दो से अधिक कितने द्वणुकों से कार्य को उत्पत्ति होती है, इसका कोई नियम नहीं है, कभी तीन द्वयणुकों से ही कार्योत्पत्ति होती है, कभी चार या पाँच द्वयणुकों से कार्योत्पत्ति की यथेच्छ कल्पना की जा सकती है । इस पक्ष में कार्य्योत्पत्ति की व्यर्थता नहीं है, क्योंकि जिस क्रम से कारणों की संख्या में अधिकता होगी, उसी क्रम से उनके कार्यों में परिमाण For Private And Personal
पृष्ठ 156
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ११ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ८१ प्रशस्तपादभाष्यम् For Private And Personal त्रिविधं चास्याः कार्य्यम् । शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् । इसके कार्य ( १ ) शरीर ( २ ) इन्द्रिय और ( ३ ) विषय भेद से तीन प्रकार के न्यायकन्दली सा चानित्या कारणविभागस्याश्रयविनाशस्य च हेतोः सम्भवात् । कार्यलक्षणायाः पृथिव्या अनित्यत्वेन सह धर्मान्तरं समुच्चिन्वन्नाह - सा चेति । स्थैय्यं नि fas त्वम् । आदिशब्दात् प्रशिथिलत्वादिपरिग्रहः । अवयवानां सन्नि-वेशोऽवयवसंयोगविभागविशेषः । स्थैर्य्यादयश्चावयवसन्निवेशाश्च तैर्विशिष्टा अपर-जातिबहुत्वोपेता गोत्वादिजातिभूयस्त्वयुक्तेत्यर्थः । परमाण्वादिष्वपरजात्यभावे-ऽप्यदृष्टवशात्तथा तथा तेषां व्यूहो यथा यथा तदारब्धेष्वपरजातयो व्यज्यन्ते । नन्वदृष्टकारिता सर्वभावानां सृष्टिः, कार्य्यलक्षणा पृथिवी कामर्थक्रियां पुरुषस्य जनयति येनेयमदृष्टेन क्रियत इत्यत आह- शयनासनेति । शयनासनादयोऽनेक उपकारास्तत्कारिणी कार्यलक्षणेति । तारतम्य भी बढ़ता जाएगा, किन्तु इसे द्वणुक में साक्षात् घट को उत्पादकता सिद्ध नहीं होती है, क्योंकि घट के नष्ट होने पर अन्य छोटे बड़े अवयव दीख पड़ते हैं । उसीके अनुसार द्वघणुक से उत्पन्न होनेवाले कार्य को कल्पना करते हैं । तस्मात् परमाणुओं से द्वयणुकादि क्रम से कार्य रूप पृथिवी की उत्पत्ति होती है । यह कार्य रूप पृथिवी अनित्य है, क्योंकि आश्रयविनाश एवं अवयवों के विभाग, कार्यविनाश के ये दोनों ही हेतु सम्भावित हैं । कार्य रूप पृथिवी में अनित्यत्व के साथ और धर्मों का समावेश कहते हुए ' सा च ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । ' स्थैर्य ' शब्द का अर्थ है निबिडत्व, कठोरता । ' आदि ' पद से प्रशिथिलत्व, कोमलत्व प्रभृति का संग्रह अभीष्ट है । ' अवयवसंनिवेश ' शब्द का अर्थ है अवयवों का विशेष प्रकार का संयोग । ( ' स्थैर्य्याद्यवयवसंनिवेशविशिष्टा ' ) इस वाक्य का विग्रह इस प्रकार है कि स्थैर्य्यादयश्च अवयवसंनिवेशाश्च स्थैर्य्याद्यवयवसंनिवेशा: ' तैः विशिष्टा स्थैर्य्याद्यवयव-संनिवेशविशिष्टा । ' अपरजाति बहुत्वोपेता ' अर्थात् गोत्वादि अनेक प्रकार की अपर जातियाँ उसमें रहतीं हैं । यद्यपि कार्य रूप पृथिवी के मूल कारण परमाणुओं में ये अपर जातियाँ नहीं हैं, किन्तु अदृष्टवश उनसे इस प्रकार से कार्यों की उत्पत्ति होती है कि उनमें ये गोत्वादि अपरजातियां अभिव्यक्त होती हैं । अगर सभी वस्तुओं की उत्पत्ति अदृष्ट से ही होती है तो फिर यह कार्य्यंरूपा पृथिवी जीवों के किन प्रयो-जनों का सम्पादन करती है कि उन्हें अदृष्ट से उत्पन्न मानें? इसी प्रश्न का समाधान ' शयनासन ' इत्यादि से देते हैं । अर्थात् शयन और आसन प्रभृति जीवों के अनेक उपकरण कार्यरूपा पृथिवी के द्वारा सम्पादित होते हैं ।
पृष्ठ 157
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्त पादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी-प्रशस्तपादभाष्यम् शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिजञ्च । तत्रायोनिजमनपेक्ष्य शुक्रशोणितं देवर्षीणां शरीरं धर्मविशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते । क्षुद्रजन्तूनां यातनाशरीराण्यधर्म विशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायन्ते । शुक्रशोणित-सन्निपात योनिजम् । तद् द्विविधं जरायुजमण्डजञ्च । मानुषपशुमृगाणां जरायुजम् । पक्षिसरीसृपाणामण्डजम् । हैं । इनमें शरीर ( १ ) योनिज और ( २ ) अयोनिज भेद से दो प्रकार का है । इनमें एक प्रकार के अयोनिज शरीर देवताओं और ऋषियों के हैं, जो शुक्र और शोणित की अपेक्षा न रखकर विशेष प्रकार के धर्म और परमाणुओं से ही उत्पन्न होते हैं । ( दूसरे प्रकार के ) अयोनिज शरीर ( मशकादि ) क्षुद्र जीवों के हैं जो ( शुक्र शोणित की अपेक्षा न रखकर ) अधर्म एवं परमाणुओं से उत्पन्न होते हैं । शुक्र और शोणित के संयोग से उत्पन्न शरीर को ही ' योनिज शरीर ' कहते हैं । योनिज शरीर भी ( १ ) जरायुज और ( २ ) अण्डज भेद से दो प्रकार का है । मनुष्य, पशु एवं मृगादि के शरीर ' जरायुज ' हैं, एवं चिड़ियों और साँप प्रभृति जीवों के शरीर ' अण्डज ' हैं । न्यायकन्दली कार्यान्तरं त्वस्याः समुच्चिनोति -- त्रिविधमिति । कार्य-त्रैविध्यमेव दर्शयति - शरीरेत्यादि । शरीरमिन्द्रियं विषय इति संज्ञा यस्य कार्यस्य तत्तथा । भोक्तुर्भोगायतनं शरीरम्, मृतशरीरे तद्योग्य-त्वात् तद्व्यपदेशः । शरीराश्रयं ज्ञातुरपरोक्षप्रतीतिसाधनं शरीरभेदं द्रव्यमिन्द्रियम् । शरीरेन्द्रियव्यतिरिक्तमात्मोपभोगसाधनं द्रव्यं विषयः । कथयति--योनिजमयोनिजञ्चेति । शुक्रशोणितसन्निपातो योनिः तस्माज्जातं योनिजम्, तद्विपरीतमयोनिजम् । तदेव दर्शयति-- तत्रायोनिजमिति । तयोर्योनिजायोनिजयो-पृथिवी के और कार्यों का सङ्कलन ' शरीर ' इत्यादि से करते हैं । अर्थात् शरीर, इन्द्रिय और विषय ये तीन नाम जिनके हैं वे ही ' शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञक, हैं । भोग करनेवाला ( जीव ) जिस आश्रय में भोग करे वही ' शरीर ' है । मृत शरीर में भोग की योग्यता के कारण शरीरत्व का व्यवहार होता है । शरीर में रहनेवाला एवं जीव के अपरोक्ष ज्ञान का सम्पादक द्रव्य ही इन्द्रिय है । शरीर और इन्द्रिय को छोड़-कर जीवों के भोग के सम्पादक जितने द्रव्य हैं वे सभी ' विषय ' हैं । ' योनिज-मयोनिजञ्च ' इत्यादि से शरीर का भेद दिखलाते हैं । प्रकृत में ' योनि ' शब्द का अर्थ है शुक्र और शोणित का मेल । उससे उत्पन्न होनेवाले ' योनिज ' कहलाते हैं, एवं इसके विपरीत जो कार्य शुक्र और शोणित के मेल के बिना ही उत्पन्न होता है, उसे ' अयोनिज ' कहते हैं । इस अर्थ को ' तत्रायोनिजम् ' इत्यादि वाक्य से समझाते हैं । For Private And Personal
पृष्ठ 158
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ८३ ध्येयोनिजं शरीरं शुक्रशोणितमनपेक्ष्य जायते । केषामित्यत आह-- देवर्षीणा-मिति । देवानाञ्च ऋषीणाञ्चेत्यर्थः । अन्वयव्यतिरेकावधारितकारणभावस्य शुक्रशोणितस्याभावे कथं शरीरस्योत्पत्तिरित्यत आह- धर्मविशेषसहितेभ्य इति । विशिष्यत इति विशेषः, धर्म एव विशेषो धर्मविशेषः, प्रकृष्टो धर्म्मः, तत्सहितेभ्यो-S णुभ्य इति । अयमभिसन्धिः -- शरीरारम्भे परमाणव एव कारणम्, न शुक्रशोणित-सन्निपातः क्रियाविभागादिन्यायेन तयोर्विनाशे सत्युत्पन्नपाकजैः परमाणुभिरार-म्भात् । न च शुक्रशोणितपरमाणूनां कश्चिद्विशेषः, पार्थिवत्वाविशेषात् । अत्रापि का जातिनियमस्या दृष्ट एव हेतुः एवञ्चेद्धर्म्मविशेषानुगृहीतेभ्यः परमाणुभ्योऽ-योनिजशरीरोत्पत्तिर्नानुपपन्ना । ननु दृष्टस्तावत् सर्वत्र शरीरोत्पत्तौ शुक्रशोणितयोः पूर्वकालतानियमः तेन यथा ग्रावोन्मज्जनाभ्युपगमस्तत्सदृशग्रावान्तरनिमज्जन-' तत्र ' अर्थात् योनिज और अयोनिज इन दोनों में अयोनिज शरीर अपनी उत्पत्ति में शुक्र एवं शोणित के मेल की अपेक्षा नहीं रखते । ये अयोनिज शरीर किनके हैं? इस प्रश्न का समाधान ' देवर्षीणाम् ' इत्यादि से देते हैं । अर्थात् देवताओं और ऋषियों शरीर अयोनिज हैं । शुक्र और शोणित में शरीर की कारणता अन्वय और व्यतिरेक से सिद्ध है, फिर देवताओं और ऋषियों के शरीर बिना शुक्रशोणित के ही कैसे उत्पन्न होते हैं? इसी आक्षेप का उत्तर ' धम्मं विशेष सहितेभ्यः ' इस वाक्य से दिया गया है । ' विशिष्यत इति विशेषः, धर्म एव विशेषो धर्म्मविशेष: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उत्कृष्ट धर्म ही इस ' धर्मविशेष ' शब्द से इष्ट है । इसकी सहायता से परमाणु ही देवादि शरीरों को उत्पन्न करते हैं । अर्थात् उन शरीरों की उत्पत्ति परमाणुओं से ही होती हैं शुक्र और शोणित के मेल से नहीं । क्रियाविभागादिक्रम से ' अर्थात् पहिले अवयवों में क्रिया उसके बाद अवयवों का विभाग, फिर आरम्भक संयोग का नाश, अनन्तर कार्य द्रव्य का नाश, इस क्रम से जब शुक्र और शोणित का परमाणु पर्यन्त विनाश हो जाता हैं, तब इन परमाणुओं में दूसरे रूप रसादि की उत्पत्ति होती है, एवं इन पाकज रूपरसादि गुणों से युक्त परमाणुओं से ही शरीर की उत्पत्ति होती है । शुक्र और शोणित के आरम्भक परमाणुओं में एवं अन्य पार्थिव परमाणुत्रों में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि दोनों में पार्थिवत्व समान रूप से है । योनिज - शरीर स्थलों में भी किसी विशेष प्रकार के शुक्रशोणित से किसी विशेष प्रकार के ( द्रव्य रूप शरीर ) को ही उत्पत्ति हो, इसमें अदृष्ट को ही ( नियामक ) कारण मानना पड़ता है । अगर ऐसी बात है तो फिर उत्कृष्ट धर्म से अनुगृहीत परमाणुओं के द्वारा अयोनिज शरीर की उत्पति में कोई अयुक्तता नहीं है | ( प्र ० ) जिस प्रकार किसी पत्थर के तैरने को स्वीकार करना उसी तरह के दूसरे पत्थर के डूबने के बाधक प्रमाण के द्वारा असम्भव होता है, उसी प्रकार सर्वत्र For Private And Personal
पृष्ठ 159
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ey न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये पृथिवी-ग्राहकप्रमाणान्तरविरोधादनुपपन्नस्तद्वदयोनिजशरीराभ्युपगमोऽपि नैवम्, शुक्रादि-निरपेक्षस्यापि शलभादिशरीरस्य दर्शनात् । विशिष्ट संस्थानस्य शरीरस्य शुक्रादिपूर्वं तावगतेति चेत्? सत्यम्, तथापि न नियमसिद्धिः, किमदृष्टविशेषा-भावादस्मदादिशरीरस्य शुक्रादिपूर्वता, किं वा विशिष्टसंस्थानमात्रानुबन्धकृति संदेहात् । एतेन बाधकानुमानमपि पर्युदस्तम्, तस्य व्याप्तिसंदेहात् । यच्चात्र वक्तव्यं तद्योगिप्रत्यक्षनिरूपणावसरे वक्ष्यामः । अधर्मविशेषेणाप्ययोनिजं शरीरं भवेतीत्याह -- क्षुद्रजन्तूनामिति । क्षुद्रजन्तवो दंशमशकादयस्तेषां यातना पीडा दु: खमिति यावत्, तदर्थं शरीरं यातनाशरीरम् । तदधर्मविशेषसहितेभ्योऽणुभ्यो जायते । इदन्त्विह लोकसिद्धमेव । योनिजं शरीरमाह-- शुक्रशोणितसन्निपातजमिति । शुक्रव शोणितश्व तयोः सन्निपातः संयोगविशेषः, तस्माज्जातं योनिज-देहोत्पत्ति से पहिले नियमतः शुक्रशोणित को देखने के कारण अयोनिज शरीर का मानना सम्भव नहीं है? ( उ ० ) नहीं, क्योंकि शुक्र और शोणित के विना भी कीड़े - मकोड़े प्रभृति के अनेक शरीर देखे जाते हैं । ( प्र ० ) फिर भी कुछ शरीर तो नियमतः शुक्र-शोणित से ही उत्पन्न होते हैं । ( उ ० ) तब भी यह सन्देह रह ही जाता है कि जिन शरीरों की उत्पत्ति के पहिले शुक्र शोणित का संनिपात नियमत: देखा जाता है, उस ( नियम ) का कारण ( शुक्रशोणित निरपेक्ष शलभादि शरीर के सम्पादक अदृष्ट के सदृश ) अदृष्ट का अभाव है? अथवा उस शरीर का ही यह स्वभाव है कि वह बिना शुक्रशोणित के उत्पन्न ही न हो । तस्मात् यह नियम ही नहीं हो सकता कि सभी शरीर शुक्र और शोणित से ही उत्पन्न हों । इससे यह बाधक अनुमान भी खण्डित हो जाता है कि देवादि शरीर भी शुक्रशोणितपूर्वक हैं, क्योंकि वे भी विशेष आकार के हैं जैसे कि मनुष्यशरीर, क्योंकि कथित युक्ति से इस अनुमान की व्याप्ति ही संदिग्ध है । इस विषय में और जो कुछ भी कहना है वह योगिप्रत्यक्ष के निरूपण में कहेंगे । ' क्षुद्रजन्तूनाम् ' इत्यादि पङ्क्ति से कहते हैं कि विशेष प्रकार के अधर्म से भी अयोनिज शरीर की उत्पत्ति होती है । ये ' क्षुद्रजन्तु ' हैं डांस, मच्छर प्रभृति । इनके शरीर ' यातनाशरीर ' कहलाते हैं, ' यातना ' शब्द का अर्थ है पीड़ा, दुःख । भोग करना ही जिस शरीर का प्रधान प्रयोजन हो वही है ' यातनाशरीर ' । वे विशेष प्रकार के अधर्मों से सहकृत परमाणुओं से ही उत्पन्न होते हैं । यह विषय आपामर प्रसिद्ध है । शुक्रशोणितसंनिपातजम् ' इत्यादि से योनिज शरीर का निरूपण करते हैं । शुक्र और शोणित इन दोनों का जो ' संनिवेश ' अर्थात् विशेष प्रकार का संयोग, उस संयोग से ' जात ' अर्थात् जन्म हो जिसका वही ' योनिज ' शब्द से व्यवहृत होता है । For Private And Personal
पृष्ठ 160
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् न्यायकन्दली ८५ मित्युच्यते । पितुः शुक्रं मातुः शोणितं तयोः सन्निपातानन्तरं जठरानलसम्बन्धा-च्छुक्रशोणितारम्भकेषु परमाणुषु पूर्वरूपादिविनाशे सति समानगुणान्तरोत्पत्तौ कादिक्रमेण कललशरीरोत्पत्तिस्तत्रान्तःकरणप्रवेशो न तु शुक्र-शोणितावस्थायाम्, शरीराश्रयत्वान्मनसः । तत्र मातुराहाररसो मात्रया संक्रा-मति, अदृष्टवशात् । तत्र पुनर्जठरानलसम्बन्धात् कललारम्भकपरमाणुत्रु क्रिया-विभागादिन्यायेन कललशरीरे नष्टे समुत्पन्नपाकजैः कललारम्भकपरमाणुभि-रदृष्टवशादुपजातक्रियैराहारपरमाणुभिः सह सम्भूय शरीरान्तरमारभ्यत इत्येषा कल्पना शरीरे प्रत्यहं द्रष्टव्या । शरीरभेदे किं प्रमाणम्? परिमाणभेदः, स्वल्पपरिमाणावच्छिन्ने आश्रये महत्परिमाणस्य परिसमाप्त्यभावात् । अवस्थान्तरा-पनं शरीरं तदाश्रयो भवतीति चेत्? अवस्थान्तरमाहारावयव सहकारिणः शरीरा-पिता का शुक्र एवं माता का शोणित इन दोनों के मेल के बाद माता के उदर सम्बन्धी तेज से शुक्र के और शोणित के आरम्भक परमाणुओं के पहिले के रूपादि का नाश एवं दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । परिवर्तित रूपादि से युक्त इस शुक्र और शोणित के परमाणुओं से कलल ' नाम के शरीर की उत्पत्ति होती है । इस शरीर में मन का सम्बन्ध होता है, शुक्रशोणितावस्था में नहीं, क्योंकि मन शरीर में ही रह सकता है । उस शरीर में माता से खायी हुई वस्तुओं के रस का कुछ अंश सम्बद्ध होता है । ' अदृष्टवश उस ' कलल ' नामक शरीर के आरम्भक परमाणुओं में क्रिया होती है, फिर विभाग होता है । इस प्रकार द्रव्य नाश के कथित क्रम से उस कलल शरीर का नाश हो जाता है । इस नाश के बाद कलल के आरम्भक परमाणुओं के पहिले रूपादि का उसी तेज के संयोग से नाश होता है और दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । पाकज रूपादि से युक्त कलल के आरम्भक ये परमाणु, अदृष्ट से उत्पन्न क्रिया से युक्त ( माता के ) आहार के परमाणुओं से मिलकर दूसरे शरीर को उत्पन्न करते हैं । शरीर के नाश और शरीरान्तर की उत्पत्ति की यह प्रक्रिया प्रतिदिन चलती है । अभिप्राय यह है कि अवस्था की वृद्धि के साथ हाथ पैर प्रभृति अङ्गों की लम्बाई चौड़ाई कुछ हद तक बढ़ती है, या शरीर ही कुछ दुबला पतला होता ही रहता है । यह ह्रास और वृद्धि पहिले शरीर के नाश के बाद अभिनव शरीर की उत्पत्ति मानने पर ही सम्भव है । इसी विषय को प्रश्नोत्तर रूप से समझाते ( प्र ० ) एक ही व्यक्ति के भिन्न भिन्न शरीर मानने में क्या प्रमाण है? ( उ ० ) परिमाण का भेद ( ही प्रमाण है ) । अल्प परिमाण के द्रव्य में उस बड़े परिमाण का समावेश नहीं हो सकता । ( प्र ० ) वही शरीर दूसरी अवस्था पाकर उस बड़े परिमाण का आश्रय होगा । ( उ ० ) इस दूसरी अवस्था का उत्पादक कौन है? आहार के अवयवों से साहाय्यप्राप्त शरीर के ही अवयव? या आहार के अवयवों For Private And Personal