प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 161–170
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 161–170
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ८६ न्यायकन्दली www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी-न्यायकन्दली वयवा आरभेरन् शरीरं वा तत्सहकृतम्, उभयथापि पटादिषु तन्त्वादिवदन्ते होना-freef रमाणवदनेकशरीरोपलम्भः स्यात्, न चैवम्, तस्मात् पूर्वं प्रनष्टमपरञ्च शरीरमुपजातम् । विवादाध्यासिते परिमाणे भिन्नाश्रये, हीनाधिकपरिमाणत्वात्, घटशरावपरिमाणवत्, विवादाध्यासितं परिमाणमाश्रयविनाशादेव विनश्यति परिमाणत्वात्, मुद्गराभिहतविनष्टघटपरिमाणवत् । प्रत्यभिज्ञानाच्छरीरैकत्व-सिद्धिरिति चेत्? न तस्य सादृश्यविषयत्वेनाप्युपपत्तेः । व्यक्तीनामव्यवधानो-त्पादनेनान्तराग्रहणस्यात्यन्तिकसादृश्यस्य च भ्रान्तिहेतोः सर्वदा सम्भवे ज्वालादि-व्यक्तिवन्नेदं तदिति बाधकानुदयेऽपि युक्तिद्वारेण बाधकसम्भवात् । तस्य प्रकारं दर्शयति- द्विविधमिति । द्वे विधे प्रकारौ यस्य तद् द्विविध-मिति व्याख्या । जरायुरिति गर्भाशयस्याभिधानम्, तेन वेष्टितं जायतइति से सहकृत शरीर ही? दोनों ही प्रकार से यह अनुपपन्न है, क्योंकि स्वल्प परिमाण के अवयवों से आरब्ध पट और उससे अधिक परिमाणवाले अवयवों से आरब्ध घट दोनों की उपलब्धि एक समय में हो सकती है, उसी प्रकार एक ही व्यक्ति में एक ही समय में मोटे और पतले दोनों शरीरों की उपलब्धि होनी चाहिए, किन्तु होतो नहीं है, अतः ऐसे स्थलों में एक शरीर का नाश और दूसरे शरीर की उत्पत्ति माननी ही पड़ेगी । ( उक्त विषय के साधक अनुमान ये हैं कि ) ( १ ) विवाद के विषय ( मोटे और पतले ) दोनों शरीरों के परिमाण दो विभिन्न व्यक्तियों में रहते हैं, क्योंकि उन दोनों में घड़े और पुरवे के परिमाणों की तरह एक न्यून है, दूसरा अधिक । ( २ ) विवाद के विषय ये परिमाण मुद्गर से विनष्ट घट के परिमाण की तरह आश्रय के नष्ट होने पर ही नष्ट होते हैं, क्योंकि ये भी ( जन्य ) परिमाण हैं, ( प्र ० ) एक ही व्यक्ति के मोटे और पतले दोनों शरीरों में परस्पर यह प्रत्यभिज्ञा होती है कि ' जिसको मैंने पहिले देखा था उसी को अभी देख रहा हूँ । इसी प्रत्यभिज्ञा से दोनों शरीरों में एकत्व की सिद्धि करेंगे | ( उ ० ) दो सदृश व्यक्तियों में भी प्रत्यभिज्ञा हो सकती है. जैसे कि दीपशिखाओं में । यह और बात है कि दीपशिखाओं के एकत्व का बाधक अत्यन्त परिस्फुट होने के कारण उस प्रत्यभिज्ञा में अयथार्थत्व शीघ्र गृहीत हो जाता है, शरीर बिना व्यवधान के बराबर उत्पन्न और विनष्ट होता रहता है, अतः व्यवधान का अज्ञान और अत्यन्त सादृश्य ये दोनों भ्रान्ति रूप प्रत्यभिज्ञा के कारण बराबर रहते हैं, किन्तु युक्ति के द्वारा विचार करने पर विलम्ब से ही सही उस प्रत्यभिज्ञा का बाध अवश्य होता है । ' द्विविधम् ' इत्यादि से योनिज शरीर का भेद दिखलाते हैं । ' द्वे विधे प्रकारौ यस्य दो प्रकार हों वही ' द्विविध ' शब्द उससे वेष्टित होकर जन्म होने के तद् द्विविधम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस वस्तु के का अर्थ है । ' जरायु ' शब्द का अर्थ है गर्भाशय, For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ८७ प्रशस्तपादभाष्यम् इन्द्रियं गन्धव्यञ्जकं सर्वप्राणिनां जलाद्यनभिभूतैः पार्थिवा-वयवैरारब्धं घ्राणम् । इन्द्रिय रूप पृथिवी वह है जिससे सभी प्राणियों को गन्ध का ज्ञान होता है । यह जलादि से अनभिभूत पार्थिव अवयवों से बनती है । इस इन्द्रिय का अन्वर्थ नाम है ' प्राण ' । न्यायकन्दली जरायुजम् । अण्डं बिम्बं तेन वेष्टितं जायते तदण्डजम् । केषां जरायुजं केषां चाण्डज-मित्यत्राह मानुषेत्यादि । मानुषा अस्मदादयः, पशवः छागाः, " अग्नीषोमीयं पशु-मालभेत ", " सप्तदश प्राजापत्यान् पशूनालभेत " इति दर्शनात् । मृगाः कृष्णसारादयः, तेषां जरायुजं शरीरम् । इदश्वोपलक्षणपरम्, अन्येषामपि चतुष्पदां जरायुज-त्वात् । पक्षिणः प्रसिद्धाः । सरीसृपाः सर्पास्तेषामण्डजं शरीरम् । एतदपि न नियमार्थमन्येषामपि मत्स्यादीनामण्डजत्वात् । इन्द्रियमाह - इन्द्रियमिति । सर्वप्राणिनां गन्धव्यञ्जकं गन्धोपलम्भकं यदिन्द्रियं तत् पार्थिवावयवैरारब्धम् । एतावता नियमो न लभ्यते यदेतदेव गन्धमभिव्यनक्ति नान्यत् पार्थिवं द्रव्यम्, तदर्थमाह-जलाद्यनभिभूतैः पार्थिवावयवैरारब्धं घ्राणम् । जलादिभिरनभिभूतै-प्रतिहत सामथ्यैरवयवैरदृष्टवशादितरविलक्षणमारब्धमेतत्, अतो विशिष्टोत्पादा-कारण ही ( मानुषादि ) शरीर जरायुज हैं । ' मानुष ' इत्यादि पक्तियों से समझाते हैं कि किन प्राणियों के शरीर जरायुज हैं और किन प्राणियों के अण्डज | ' मानुष ' हैं हम लोग, पशु शब्द का अर्थ है छाग, मेमना आदि । छाग रूप अर्थ में पशु शब्द के प्रयोग करने का यह अभिप्राय नहीं है कि ' जरायुज ' इतने ही हैं, क्योंकि सभी चौपाये भी जरायुज ही हैं । ' पक्षि ' शब्द का अर्थ प्रसिद्ध है । ' सर्प ' शब्द से साँप अभिप्रत है 1 इन सभी योनिजों के शरीर अण्डज हैं । इसका यह भी अभिप्राय नहीं कि अण्डज इतने ही हैं, क्योंकि माँ प्रभृति ओर भी अण्डज हैं । ' इन्द्रियम् ' इत्यादि से पार्थिव इन्द्रिय का निरूपण करते हैं । सभी प्राणियों के गन्धव्यञ्जक ' अर्थात् सभी प्राणियों के गन्ध प्रत्यक्ष की उत्पादक इन्द्रिय ही पार्थिव अवयवों से बनती है । किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि यह इन्द्रिय रूप पार्थिवद्रव्य ही गन्ध के प्रत्यक्ष का उत्पादक है और कोई पार्थिव द्रव्य नहीं । इसी नियम की सूचना के लिए लिखते हैं कि ' जलाद्यनभिभूतैः पार्थिवावयवैरारब्धं घ्राणम् ' अर्थात् जिन पार्थिव अवयवों का सामर्थ्य जलादिगत किसी विरोधी शक्ति से नष्ट नहीं है, अदृष्टवश उन पार्थिव अवयवों से आरब्ध यह घ्राणंन्द्रिय रूप पार्थिव द्रव्य और पार्थिव द्रव्यों से For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ ब्रव्ये पृथिवी-विषयस्तु द्वणुकादिक्रमेणारब्धस्त्रिविधो मृत्पाषाणस्थावरलक्षणः । विषय रूप पृथिवी परमाणुओं से द्वणुक, व्यसरेणु प्रभृति के क्रम से उत्पन्न होती है । विषय रूप पृथिवी भी ( १ ) मृत्तिका, ( २ ) पाषाण और ( ३ ) स्थावर न्यायकन्दली दिदमेव गन्धाभिव्यक्तिसमर्थम्, नान्यदित्यर्थ । घ्राणमिति तस्य संज्ञा । आत्मा जिघ्रति गन्धमुपादत्तेऽनेनेति कृत्वा तत्सद्भावे गन्धोपलब्धिरेव प्रमाणम्, क्रियायाः करणसाध्यत्वात्, चक्षुरादिव्यापारे च तस्या अनुत्पादात् । पार्थिवत्वेऽपि रूपादिषु मध्ये गन्धस्येवाभिव्यञ्जकत्वं प्रमाणम्, कुङ्कुमगन्धाभिव्यञ्जकघृतवत् । यथा घृतं स्वगन्धसहितमेव कुङ्कुमगन्धमभिव्यनक्ति, तथा घ्राणमपि स्वगन्धसहित-मेवेन्द्रियम्, अतो न स्वगन्धस्य ग्राहकम्, तेनैव तस्याग्रहणात् । यथा घ्राणस्य तथा रसनचक्षुस्त्वगिन्द्रियाणामपि वक्ष्यमाणेन दृष्टान्तबलेन रूपरसस्पर्शसह कृतानामेवेन्द्रि-यत्वानुमानान्न स्वगुणग्रहणम् । श्रोत्रन्तु शब्दगुणमिन्द्रियम्, अतस्तेनैव शब्दोपलम्भः । सर्वथा विलक्षण है । इन विलक्षण कारणों से उत्पन्न होने के हेतु ही और पार्थिव द्रव्यों में गन्ध की व्यञ्जकता नहीं है, घ्राण में ही है । घ्राण इस इन्द्रिय का नाम है । इस नाम की व्युत्पत्ति से ही घ्राणेन्द्रिय की सत्ता में प्रमाण भी सूचित होता है । ' आत्मा जिघ्रत्यनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिससे आत्मा को गन्ध का प्रत्यक्ष हो वही ' घ्राण ' है । फलतः यह अनुमान निकला कि गन्ध ग्रहण रूप क्रिया का कोई करण है, क्योंकि वह भी किया है, जैसे कि छेदन क्रिया । चक्षु प्रभृति और इन्द्रियों के व्यापार से गन्ध का ज्ञान नहीं होता है. तस्मात् चक्षुरादि इन्द्रियों से विलक्षण कोई इन्द्रिय अवश्य है, जिसका अन्वर्थं नाम ' घ्राण ' है । घ्राण में पार्थिवत्व इस अनुमान प्रमाण से सिद्ध है कि घ्राणेन्द्रिय पार्थिव है, क्योंकि रूपादि वस्तुओं में से वह केवल गन्ध के ही प्रत्यक्ष का उत्पादक है, जैसे कि कुङ्कुम के गन्ध को अभिव्यक्त करानेवाला घुत । जिस प्रकार घृत अपने गन्ध के साथ ही कुङ्कुम के गन्ध का अभिव्यञ्जक है, उसी प्रकार से घ्राण भी अपने गन्ध के साथ ही सभी गन्धों का अभिव्यञ्जक है । अत: घ्राण से स्वगत गन्ध का प्रत्यक्ष नहीं होता । प्रत्यक्ष होनेवाले गन्ध से भिन्न दूसरे गन्ध से युक्त घ्राण से ही प्रत्यक्ष होता अतः स्वगत गन्ध से युक्त घ्राण से प्राणगत गन्ध का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । इसी प्रकार आगे के दृष्टान्त से यह समझना चाहिए किरस से युक्त रसना रूप से युक्त चक्षु एवं स्पर्श से युक्त त्वचा में ही इन्द्रियत्व अर्थात् सादि प्रत्यक्ष का करणत्व है, अतः इन सबों से भी स्त्रगत रूपादि का प्रत्यक्ष नहीं होता है | श्रोत्र रूप इन्द्रिय का तो शब्द ही केवल विशेष गुण है, अतः उसीसे शब्द का प्रत्यक्ष होता है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् तत्र भूप्रदेशाः प्राकारेष्टकादयो मृत्प्रकाराः । पाषाणा ८६ उपल-मणिवज्रादयः । स्थावरास्तु णौषधिवृक्षलतावठान वनस्पतय इति । भेद से तीन प्रकार की है । भूमि रूप प्रदेश, दीवाल, ईंटें आदि मृत्तिका केही प्रभेद हैं । साधारण पत्थर से लेकर मणि एवं वज्र पर्यन्त सभी पत्थर पाषाण ही हैं । औषधि, वृक्ष, लता, अवतान, वनस्पति प्रभृति सभी स्थावर रूप पृथिवी हैं । न्यायकन्दली शरीरेन्द्रियाभ्यां विषयस्य स्वरूपविशेषं ' तु ' शब्देन दर्शयन् भेदं दर्शयति-विषयस्त्विति । द्व्यणुकादिप्रक्रमेणारब्ध इति साधारणरूपानुवादः । मृत्पाषाण-स्थावरलक्षण इति । मृत्पाषाणस्थावरादिस्वभाव इत्यर्थः । तेषां मध्ये मृदं स्वरूपेण निर्द्धारयन्नाह - तत्रेति । तत्र भूप्रदेशाः स्थलनिम्नादयः प्राकारेष्टकादयः सर्वे ते मृत्प्रकाराः, मृत्प्रभेदा इत्यर्थः । पाषाणभेदमाह- पाषाणा इति । उपलाः शिलाः, मणयः सूर्य्यकान्तादयः, वज्रोऽशनिर्होरश्च । तृणमुलपादिः, औषधयः फलपाकान्ता गोधूमादय:, ये सपुष्पफलास्ते वृक्षाः कोविदारप्रभृतयः, लता प्रसिद्धैव, अवतन्वन्ती-त्यवताना नाम विटपाः केतकी बीजपूरादयः, ये विना पुष्पं फलन्ति ते वनस्पतय औदु-म्बरादयः । ननु स्वेच्छाधीनचेष्टाविरहः स्थावरत्वम्, तत्तु मृत्पाषाणयोरप्यस्ति । सत्यम्, तयो रूपान्तरस्यापि सम्भवादनेन रूपेणाभिधानं न कृतम् । ' तु ' शब्द से शरीर और इन्द्रिय में परस्पर भेद दिखलाते हुए विषय रूप पृथिवी का भेद ' विषयस्तु ' इत्यादि से दिखलाते हैं । ' वह द्वघणुकादि क्रम से उत्पन्न होती है ' यह कहना केवल उसके साधारण धर्म का अनुवाद है । ' मृत्पाषाणस्थावरलक्षणः ' अर्थात् मिट्टी, पत्थर एवं स्थावर सभी वस्तु विषयरूपा पृथिवी हैं । इसमें मिट्टी को औरों से अलग करते हुए ' तत्र ' इत्यादि ग्रन्थ लिखते हैं । इनमें चौरस एवं नीची ऊँची सभी भूमि ' भूप्रदेश ' हैं । दीवाल, ईंटा प्रभृति सभी विषय मृत्तिका के ही प्रभेद हैं । ' पाषाणा: ' इत्यादि से पत्थर का भेद कहते हैं । उपल ' शब्द का अर्थ है शिला, अर्थात् साधारण पत्थर, ' मणि ' है सूर्यकान्त प्रभृति ' वज्र ' है अशनि ( इन्द्र का अस्त्र ) और हीरा । ' तृण ' है ' उलप ' प्रभृति, ' औषधि ' वह कहलाता है जो अपने फल के पकने तक ही रहे, जैसे गेहूँ प्रभृति । जिसमें फूल और फल दोनों ही लगे वह ' वृक्ष ' है, कोविदार प्रभृति । ' लता ' शब्द से माधवी लता प्रभृति प्रसिद्ध ही है । अवतन्वन्ति इति अवताना: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार बड़ा वृक्ष ही ' अवतात ' है, जिसे ' विटप ' कहते हैं ( पीपल आदि महावृक्ष ) | ( प्र ० ) जिसमें स्वाधीन चेष्टा न रहे वही स्थावर है । तदनुसार मिट्टी और पत्थर भी स्थावर के अन्तर्गत आ जाते हैं, फिर उनका अलग से निरूपण क्यों? ( उ ० ) ठीक है, किन्तु स्थावरत्व से १२ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्यायकन्दली संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् अप्त्वाभिसम्बन्धादापः । [ द्रव्ये जल-' यह जल है ' इस प्रकार का व्यवहार ' जलत्व ' जाति के सम्बन्ध से करना चाहिए । न्यायकन्दली अपां लक्षणमाह-- अपत्वाभिसम्बन्धादापः । अत्रापि व्यवहारसाधनं समानासमानजातीयव्यवच्छेदो वा लक्षणार्थ: पूर्ववत् । इदन्त्विह वक्तव्यम्--स्वयं प्रत्यक्षाधिगतपदार्थभेद: परस्य लक्षणेन प्रतिपादयेत्, अप्रतिपन्नस्याप्रतिपाद-कत्वात् । भेदच पदार्थानामन्योन्याभावलक्षणः । स च यस्याभावो यत्र चाभावस्त-दुभयग्रहणेन गृह्यते, अन्यथा तत्स्वरूपप्रतिनियमेन निषेधानुपपत्तिः, गौरश्वो न भवतीति । तत्र किं सङ्कीर्णयोरुभयोर्ग्रहणादन्योन्याभावग्रहणं परस्परविविक्तयोर्वा? सङ्कीर्णग्रहणे तावदयमयं न भवतीति प्रतीत्यसम्भव एव । परस्परविविक्तयोर्ग्रहणाद-भावप्रतीतावितरेतराश्रयत्वम्, विविक्तयोर्ग्रहणे सत्यभावग्रहणमभावग्रहणे च विविक्त-ग्रहणम्, अभाव एव विवेको यतः । अत्रोच्यते, भिन्नयोरितरेतराभावो नत्वितरेतरा-दूसरे रूप से भी वे कहे जा सकते हैं, अतः वे स्थावर वर्ग में नहीं कहे गये । ' अपूत्वाभिसम्बन्धादापः ' इत्यादि से जल का लक्षण कहते हैं । यहाँ भी ' यह जल है ' इस व्यवहार का साधन अथवा जल को उनके सजातीत एवं विजातीय वस्तुओं से पृथक् रूप से समझाना हो जल के लक्षण का प्रयोजन है । ( प्र ० ) यहाँ यह पूछना है कि जिस व्यक्ति को लक्ष्य और उसके सजातीय विजातीयों के भेद प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञात हैं, वही व्यक्ति लक्षण के द्वारा इस विषय को दूसरों को समझा सकता है अज्ञ t यक्ति किसी को भी नहीं समझा सकता । पदार्थों के भेद एवं अन्योन्याभाव दोनों ही एक वस्तु हैं । जिसमें जिस वस्तु का अन्योन्याभाव समझाना है, उन दोनों के ज्ञान से ही अन्योन्याभाव ज्ञात होता है । अन्यथा ' गो अश्व नहीं है ' इस निषेध के लिए नियमतः प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों का उल्लेख अनुपपन्न हो जाएगा । इस प्रसङ्ग में प्रष्टव्य है कि भेद - ज्ञान के लिए परस्पर सम्बद्ध अनुयोगी और प्रतियोगी इन दोनों का ज्ञान आवश्यक है या परस्पर असम्बद्ध अनुयोगी और प्रतियोगी का ज्ञान? इनमें परस्पर सम्बद्ध प्रतियोगी और अनुयोगी के ज्ञान से तो भेद का ज्ञान सम्भव नहीं है, क्योंकि ' यह ' ( घट ) ' यह ' ( पट ) नहीं है ' इस प्रकार की प्रतीति नहीं होती है । परस्पर विविक्त अनुयोगी और प्रतियोगी के ज्ञान से अगर भेद का ज्ञान मानें तो फिर अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य होगा, क्योंकि भेद का ज्ञान परस्पर विविक्त प्रतियोगी और अनुयोगी के ज्ञान से होगा, एवं भेद ज्ञान से परस्पर विवेक की वृद्धि होगी, क्योंकि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६१ रूपरसस्पर्शद्रवत्व स्नेह सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वा-परत्वगुरुत्व संस्कारवत्यः । पूर्ववदेषां सिद्धिः । यह ( जल ) रूप, रस, स्पर्श, द्रवत्व, स्नेह, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व और संस्कार इन चौदह गुणों ' युक्त है । पृथिवी की तरह सूत्र के वाक्यों से जल में ( भी ) गुणों की सिद्धि समझनी चाहिए । न्यायकन्दली भावो भेदः । यदेतद् वस्तुनः प्रात्यात्मिकं स्वरूपं स एव भेदः, तच्चापरदर्शनानपेक्ष-मिन्द्रियसन्निकर्षमात्रादेव प्रतीयमानं प्रत्येकं विलक्षणमेव संवेद्यते । तथा हि-गवार्थी नाश्वदर्शनात् प्रवर्त्तते, गोशब्दञ्च न स्मरति, तत्राश्वे गवि च स्वेन स्वे-नात्मना गृह्यमाणेन तत्स्वरूपनियमेनान्योन्याभावप्रतीतिर्नानुपपन्ना । न चैवं सति वाच्यं स्वरूपभेद एवास्तु किमन्योन्याभावेनेति, तस्यापि प्रतिषेधविषयस्य संवेदनात् । न केवलमपत्वमपां वैधर्म्यं स्नेहसहचरितं चतुर्दशगुणवत्त्वमपीतरेभ्यो वैधर्म्यमिति प्रतिपादयन्नाह - रूपरसेति । अत्र द्वन्द्वानन्तरं मतुप्प्रत्ययः करणीयः । पूर्ववदेषां सिद्धि: । यथा पूर्वं पृथिव्यां सूत्रकारवचनादेषां रूपादीनां गुणानां विवेक वस्तुतः भेद ही है । ( उ ० 1 ) इस प्रश्न के समाधान में हम यह कहते हैं कि परस्पर भिन्न दो वस्तुओं में अन्योन्याभाव रहता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि ( प्रकृत ) भेद और अन्योन्याभाव दोनों ( यहाँ ) एक ही वस्तु हैं । प्रत्येक वस्तु में रहनेवाला असाधारण धर्म ही यहाँ ( भेद ) है । यह भेद ( आश्रय में ) इन्द्रिय सम्बन्ध के होते ही और किसी के ज्ञान की अपेक्षा न करके और व्यक्तियों के असाधारण धर्म से विलक्षण रूप में प्रतिभासित होता है । गाय का प्रयोजन जिस व्यक्ति को है, वह अश्व के देखने से न प्रवृत्त होता है, न गो शब्द का स्मरण हो करता है । वहाँ गो और अश्व में असाधारण रूप से ज्ञात होनेवाले नियमित तत्तत् असाधारण धर्मों से दोनों में अन्योन्याभाव की प्रतीति में कोई अन्तर नहीं आता । इस लिए यह प्रश्न भी ठीक नहीं है । कि ( प्र ० ) वस्तुओं के तत्तत् असाधारण धर्म से अतिरिक्त भेद मानने की आवश्यकता नहीं है । ( 30 ) क्योंकि भेद की प्रतीति नञ् प्रभृति निषेधार्थक शब्दघटित वाक्यों से होती है । केवल जलत्व जाति ही इसका असाधारण धर्म नहीं है, किन्तु स्नेहादि चोदह गुणों का आश्रयत्व भी औरों से जल का वैधर्म्य है, यह उपपादन करते हुए रूप, रस, इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । यहाँ द्वन्द्व समास के बाद मतुप् प्रत्यय करना चाहिए । ' पूर्ववदेषां सिद्धि: ' जैसे कि पहिले अर्थात् पृथिवी में सूत्रकार के वाक्यों से रूपादि गुणों की सिद्धि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ९ २ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रध्ये जल-प्रशस्तपादभाष्यम् शुक्लमधुरशीता एव रूपरसस्पर्शाः । रूपों में शुक्ल रूप ही जल में है, रसों में मधुर रस ही एवं स्पर्शो में शीतस्पर्श ही है । न्यायकन्दली सिद्धिः प्रतिपत्तिस्तथाप्स्वपीत्यर्थः । तथा च सूत्रम् - " रूपरसस्पर्शवत्य आपो द्रवाः स्निग्धाश्च " इति । सङ्ख्यादिप्रतिपादकन्तु साधारणमेव सूत्रम् । वैधर्म्यनिरूपणा-वसरे पृथिव्यादिसाधारणानां रूपादीनामभिधानमयुक्तमित्याशङ्कयावान्तरभेदेनैषा-मसाधारणत्वं प्रतिपादयति - शुक्लेत्यादि । शुक्लमेव रूपमपाम्, मधुर एव रसः, शीत एव स्पर्शः । अप्सु रूपान्तरप्रतीतिराश्रयरूपभेदात् । कथमेतदिति चेत्? तासामेवोद्धृत्य वियति विक्षिप्तानां धवलिममात्रप्रतीतेः पुनर्नपतितानामाश्रय-रूपानुविधानात् । तासु न मधुरो रसो गुडादिवदप्रतिभासनादिति चेत्? न कटुकषायतिक्तलवणाम्लविलक्षणस्य रसस्य संवेदनात्, गुडादिवदप्रतिभासनन्तु माधुर्य्यातिशयाभावात् । अर्थात् ज्ञान होता है, उसी प्रकार जल में भी ( समझना चाहिए ) । जैसा कि सूत्र है -“ रूपरसस्पर्शवत्य आपो द्रवाः स्निग्धाश्च " ( २ । १ । २ ) । अर्थात् रूप, रस, स्पर्श ', द्रवत्व और स्नेह से युक्त वस्तु हो जल है । संख्यादि नौ गुणों के लिए वही साधारण ( ' सख्याः परिमाणानि ' इत्यादि ४ । १ । ११ ) सूत्र है । रूपादि जितने गुण पृथिवी प्रभृति और द्रव्यों में भी रहते हैं जल के वैधर्म्य के निरूपण के प्रसङ्ग में उनका निरूपण क्यों? इस प्रकार का प्रश्न अपने मन में रखकर ये रूपादि गुण भी जिस रीति से जल के वैधर्म्य हो सकते हैं वह रीति ' शुक्लमधुर ' इत्यादि से कहते हैं । ( रूपों में ) शुक्ल रूप ही ( जल में ) है, एवं ( रसों में ) मधुर रस ही जल में है, एवं ( स्पर्शो में ) शीत स्पर्श ही ( जल में ) है । आश्रय रूप उपाधि के भेद से ही जल में दूसरे रूपों की प्रतीति होती है । ( प्र ० ) यह कैसे समझते हैं? ( उ ० ) उसी जल को आकाश की ओर उछाल कर आश्रय से विच्छिन्न कर दिया जाय तो फिर उस ( जिस जल में नील - रूप का भान होता है ) में भी शुक्ल रूप की ही प्रतीति होती है । ( प्र ० ) जल में मधुर रस नहीं है, क्योंकि गुड़ प्रभृति द्रव्यों की तरह जल में मधुर रस की प्रतीति नहीं होती । ( उ ० ) यह स्वीकृत सत्य है कि ' जल में रस है ', किन्तु वह रस कटु, कषाय, तिक्त, लवण और अम्ल से भिन्न है, अतः जल का रस मधुर ही है, क्योंकि इनसे भिन्न कोई सातवाँ रस नहीं है । गुड़ प्रभृति द्रव्यों की तरह जल में मधुर रस का भान इसलिए नहीं होता कि इसमें गुड़ादि द्रव्यों की तरह उत्कट माधुर्य नहीं है । केवल इससे जल में मधुर रस के अभाव की सिद्धि नहीं हो सकती । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६३ स्नेहोऽम्भस्येव सांसिद्धिकञ्च द्रवत्वम् । स्नेह एवं सांसिद्धिक ( स्वाभाविक ) द्रवत्व केवल जल में ही रहते हैं । न्यायकन्दली निविशेष एव स्नेहोऽपां वैधर्म्यमिति ध्वनति - स्नेहोऽम्भस्येवेति । नन्वयं पृथिव्यामपि वर्त्तते, यथा क्षीरे तैले सर्पिषि च । न सर्वत्र, पाषाणेष्टका शुष्केन्धना-दिष्वसम्भवात् । यत्तु क्वचित् क्षीरादिषु दर्शनं तत्संयुक्तसमवायादुदक-गतस्यैव यथा सांसिद्धिकद्रवत्वस्य क्षीरतैलयोः । उदकधर्मत्वन्तु स्नेहस्य सर्वत्र तदन्वयव्यतिरेकानुविधानात् । तथा चानूपदेशप्रभवानां तरुतृणादीनां स्निग्धता, जाङ्गलप्रदेशप्रभवानाञ्च रूक्षता । तत्रापि सततं परिषिच्यमानमूलानां स्निग्धत्वं तद्विरहिणाञ्च तन्नास्तीति । सांसिद्धिकञ्च द्रवत्वमिति । न केवलं स्नेहः, स्वभावसिद्धञ्च द्रवत्व-मम्भस्येवेत्यर्थः । क्षीरतैलयोस्त्वाश्रयसन्निकर्षेण तदुपलम्भः, क्वचित् तयोघनत्वो-पलम्भात् । किसी और वस्तु को साथ में न लेकर भी स्वतन्त्र रूप से केवल स्नेह जल का असाधारण धर्म हो सकता है, यही बात ' स्नेहोऽम्भस्येव ' इस वाक्य से सूचित करते हैं | ( प्र ० ) स्नेह तो जल की तरह दूध, तेल, घी प्रभृति में भी है? ( उ ० ) नहीं, क्योंकि पत्थर, इंट, सूखे काठ प्रभृति पार्थिव द्रव्यों में स्नेह की उपलब्धि नहीं होती । दूध प्रभृति पार्थिव द्रव्यों में जल का स्नेह हो संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उपलब्ध होता है जैसे कि दूध प्रभृति में ही स्रांसिद्धिक द्रवत्व की उपलब्धि होती है । सभी जलों में स्नेह की उपलब्धि ( रूप अन्वय ) एवं जल से भिन्न सभी वस्तुओं में स्नेह की अनुपलब्धि ( रूप व्यतिरेक ) ये ही दोनों ' स्नेह जल के ही धम्मं है ' इसमें प्रमाण है | अतः ' अनूप ' देश में उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि और तिनके स्निग्ध, एवं " जाङ्गल ' प्रदेश में उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि रूक्ष देखे जाते हैं । जाङ्गल प्रदेश में भी बराबर सींचे जाने वाले वृक्षादि स्निग्ध देखे जाते हैं तथा बराबर न सींचे जानेवाले वृक्षादि रूक्ष देखे जाते हैं । ' सांसिद्धिकञ्च द्रवत्वम् ' अर्थात् बिना किसी की सहायता से स्वतन्त्र रूप से केवल स्नेह ही जल का बैधर्म्य नहीं है, किन्तु केवल ' सांसिद्धिक द्रवत्व ' भी उसी रूप से जल का वैधर्म्य है, क्योंकि वह भी केवल जल में ही है । दूध और तेल में आश्रय के सम्बन्ध से सांसिद्धिक द्रवत्व की प्रतीति होती है, क्योंकि उनमें कभी काठिन्य की प्रतीति भी होती है ।
१ ९. स्वल्पोदकतृणो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः ।
सज्ञेयो जाङ्गलो देशो बहुधान्यादिसंयुतः ॥
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये जल-नित्यानित्यभावात् । तासांतु प्रशस्तपादभाष्यम् ताश्च पूर्ववद् द्विविधाः, कार्यं त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् । तत्र शरीरमयोनिजमेब वरुणलोके, पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्चोपभोगसमर्थम् । यह भी पृथिवी की तरह नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का ह । शरीर, इन्द्रिय, और विषय भेद से कार्य रूप जल के तीन प्रकार हैं । जलीय शरीर अयोनिज ही होते हैं । वह शरीर केवल वरुण लोक में प्रसिद्ध है एवं पार्थिव अवयवों के सम्बन्ध से सुख और दुःख की अनुभूति की शक्ति प्राप्त करता है । पृथिव्या परमाणुस्वभावा न्यायकन्दली इवापामप्यवान्तरभेदेन द्वैविध्य मित्याह - ताश्चेति । आपो नित्याः, कार्य्यस्वभावास्त्वनित्याः । कार्य्यञ्च त्रिविधम् । अत्रापि पूर्ववदनुषङ्गः, यथा शरीरेन्द्रिय-विषयसंज्ञितं कार्यं त्रिविधमेवमपामपीति । तत्र शरीरमयोनिजमेव, पार्थिवं शरीरं योनिजमयोनिजञ्च, आप्यं शरीरमयोनिजमेवेति विशेष इत्यर्थः । ननु मानुषं शरीरं तावत् पार्थिवं गन्धगुणोपलब्धेः, आप्यं तु क्वास्तीत्याह - वरुणलोक इति । इदं शरीरमपामागमात् प्रत्येतव्यम् । द्रवत्वैकस्वभावत्वादपां तदारब्धं शरीरं जल-बुबुदप्रायं विशिष्टव्यवहारायोग्यं कथमुपभोगसमर्थं स्यादित्याह - पार्थिवा-वयवोपष्टम्भादुपभोगसमर्थम् । पार्थिवानामवयवानामुपष्टम्भात् संयोगविशेषा-' ताश्च ' इत्यादि से लिखते हैं कि पृथिवी की तरह जल के भी अपने अवान्तर भेद दो प्रकार के हैं । परमाणुरूप जल नित्य है, एवं कार्यरूप जल अनित्य है । " कार्यं त्रिविधम् " इस वाक्य में ' त्रिविधम् ' यह पद भी जोड़ देना चाहिए । ( तदनुसार इस वाक्य का यह अर्थ है कि ) जैसे पृथिवी के शरीर, इन्द्रिय और विषय भेद से तीन भेद हैं, वैसे ही उसी नाम से जल के भी तीन भेद हैं । ' तत्र शरीरमयोनिजमेव ' अर्थात् पार्थिव शरीर से जलीय शरीर में यह अन्तर है कि पार्थिव शरीर के योनिज और अयोनिज दोनों ही प्रकार हैं, किन्तु जलीय शरीर केवल अयोनिज ही होते हैं । मनुष्य के शरीर में गन्ध की उपलब्धि होती है, अतः समझते हैं कि वह पार्थिव है । किन्तु जलीय शरीर कहाँ है? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं कि ' वरुणलोके ', अर्थात् जलीय शरीर केवल वरुणलोक में प्रसिद्ध है । इस विषय को शास्त्र के द्वारा ही समझना चाहिए! जल प्रसरणशील द्रव्य हैं, इससे उत्पन्न शरीर तो जल के बुद्बुदे के समान होंगे, उनसे शरीर के प्रधान प्रयोजन उपभोग कासम्पादन असम्भव होगा । इसी असम्भावना को ' पार्थिवावयत्रोपष्टम्भाच्च ' इत्यादि से हटाते हैं । अर्थात् पार्थिव अवयवों के उपष्टम्भ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् न्यायकन्दली I दाप्यं शरीरमुपभोगाय समर्थं स्यात् । आप्यशरीरोत्पत्तौ पार्थिवावयवा निमित्त-कारणम्, तेषां संयोगादाप्यावयवानां द्रवत्वे प्रतिरुद्धे विशिष्टमेवेदं शरीरमुत्पद्यते, न जलबुद्बुदप्रायमित्यर्थः । ये तु पश्च भूतसमवायिकारणं शरीरमित्यास्थिषत, तेषामगन्धं शरीरं स्यात्, कारणगन्धस्यैकस्यानारम्भकत्वात् । चित्ररूपरसस्प-fa प्राप्नोति कारणेषु नानारूपरसस्पर्शसम्भवात् । न चैवं दृष्टम्, तस्मान्न पञ्च-भूतप्रकृतिकम् । भूजलप्रकृतिकमप्यत एव न स्यात्, अत एव भूजलानिलप्रकृतिकमपि न स्यात्, भूवाय्वाकाश प्रकृतिकत्वेऽरूपमरसमगन्धश्च स्यात्, अनलानिलाकाश-प्रकृतिकत्वे चागन्धमरसं चेत्यादि यथासम्भवं योजनीयम् । न च पञ्चभूतसमवायि कारणत्वे शरीरस्यैकत्वं प्राप्नोति स्वभावभेवेन भेदोपपत्तेः । मानुषं शरीरं पृथि-व्यात्मकं गन्धवत्त्वात् परमाणुलक्षणपृथिवीवत् । उदकादिधर्मोपलम्भः कथमत्रेति चेत्? संयुक्तसमवायादित्यलम् । अर्थात् विलक्षण संयोग से जलीय शरीर में उपभोग की क्षमता आएगी । कहने का तात्पर्य है कि जलीय शरीर के पार्थिव अवयव भी निमित्तकारण हैं । उनके संयोग से जल का द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है, अतः उसके बाद जलीच शरीर भी विशेष आकार का ही उत्पन्न होता है, जल के बुद्बुद की तरह नहीं । जो कोई ( प्र ० ) पृथिवी, जल, तेल, वायु और आकाश इन पाँचों द्रव्यों को सभी शरीरों का समवायिकारण मानते हैं, उनके मत में ( उ ० ) ( १ ) शरीर गन्ध से सर्वथा रहित होगा, क्योंकि समवायिकारणों में से किसी एकमात्र में रहनेवाला केवल एक गुण कार्य के गुण को उत्पन्न नहीं कर सकता । ( २ ) एवं पाँचों महाभूतों से उत्पन्न शरीर में चित्र रूप, चित्र रस, चित्र गन्ध और चित्र स्पर्शकी सत्ता माननी पड़ेगी, क्योंकि शरोर के समवायि-कारणों में नाना तरह के रूप, रस, गन्ध और स्पर्श हैं, किन्तु चित्र रूपरसादि-विशिष्ट शरीर की कहीं उपलब्धि नहीं होती । तस्मात् पाँचों महाभूत सम्मिलित होकर किसी भी एक शरीर के समवायिकारण नहीं हैं, इसी हेतु से पृथिवी और जल ये दोनों भी किसी एक शरीर के समवायिकारण नहीं हैं, एवं पृथिवी, जल और वायु ये तीनों भी किसी एक शरीर के समवायिकारण नहीं हैं । पृथिवी, वायु और आकाश इन तीनों को अगर किसी एक शरीर का समवायिकारण मानें तो इनसे उत्पन्न शरीर रूप, रस और गन्ध इन तीनों से रहित होगा । अगर तेज वायु और आकाश इन तीनों को एक शरीर का समवायिकारण मानें तो फिर इन तीनों कारणों से उत्पन्न शरीर गन्ध और रस से शून्य होगा । इस प्रकार और भी कल्पना करनी चाहिए । पञ्च महाभूत रूप अनेक समवायिकारणों से शरीररूप एक कार्य की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती, क्योंकि सभी के स्वभाव अलग अलग । भिन्न स्वभाव के व्यक्तियों से एक स्वभाव के कार्य For Private And Personal