प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 171–180

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 171–180

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये जल-इन्द्रियं सर्वप्राणिनां रसव्यञ्जकं विजात्यनभिभूतैर्जलावयवैरारब्धं रसनम् । विषयस्तु सरित्समुद्र हिमकरकादिः । जिससे प्राणियों को रस का प्रत्यक्ष होता है, वही जलीय इन्द्रिय है । यह विरोधी द्रव्यों की शक्ति से अपराजित जल के अवयवों से बनती है । इस इन्द्रिय का अन्वर्थ नाम है ' रसना ' । नदी, समृद्र, पाला, बरफ इत्यादि विषय रूप जल हैं । न्यायकन्दली इन्द्रियं रसव्यञ्जकं सर्वप्राणिनामिति । सर्वप्राणिनां रसव्यञ्जकं यदिन्द्रियं तज्जलावयवैरारब्धम् । तथापि कस्मात् तदेव रसव्यञ्जकं स्यात्, नान्य-दुदकद्रव्यमित्याह -- विजात्यनभिभूतैरिति । विजातिभिः पार्थिवावयवैर्येऽनभिभूता अप्रतिहतसामर्थ्य आप्यावयवास्तैरितरद्रव्यविलक्षणमारब्धमत इदं विशिष्टो-त्पादाद्रसव्यञ्जकमिन्द्रियं न द्रव्यान्तरम्, तस्येत्थमुत्पत्त्यभावादित्यर्थः । एतच्च नियमदर्शनादेव कल्प्यते । रसनेन्द्रियसद्भावे रसोपलब्धिरेव प्रमाणम्, क्रियायाः को उत्पत्ति नहीं हो सकती । मानव शरीर पार्थिव है, क्योंकि उसमें गन्ध को उपलब्धि होती है, जैसे कि पार्थिव परमाणु ( प्र ० ) मानव शरीरों में जलादि के धर्मों की उपलब्धि कैसे होती है? ( उ ० ) संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से । अब इस विषय में इतना ही पर्याप्त है । " इन्द्रियं रसव्यञ्जकं सर्वप्राणिनाम् " । यह तो ठीक है कि सभी प्राणियों के रस-प्रत्यक्ष का कारण रसनेन्द्रिय जल के अवयवों से बनती है फिर भी इन्द्रिय रूप जलीय द्रव्य ही क्यों रस का व्यञ्जक होगा? कोई और जलीय द्रव्य क्यों नहीं? ' विजात्यनभिभूतैः ' इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर देते हैं । ' विजाति ' अर्थात् पार्थिव अवयवों से, ' अनभि-भूत ' अर्थात् जिनका बल प्रतिरुद्ध नहीं हुआ है, इस प्रकार के जलीय श्रवयवों से यह ( इन्द्रिय रूप ) विलक्षण द्रव्य उत्पन्न होता है । इस प्रकार और जलीय द्रव्यों से विलक्षण रूप से उत्पन्न होने के कारण यह इन्द्रिय रूप जलीय द्रव्य ही रस का ब्यञ्जक है, और कोई जलीय द्रव्य नहीं । क्योंकि और जलीय द्रव्यों की उत्पत्ति इससे भिन्न रीति से होती है । " इस रसनेन्द्रिय रूप जलीय द्रव्य से ही रस को अभिव्यक्ति होती है, और द्रव्यों से नहीं " इस नियम से ही उक्त कल्पना करते हैं । रस की उपलब्धि ही रसनेन्द्रिय १. पार्थिव, जलीय, तेजस और वायवीय भेद से से प्रत्येक के क्रमशः पृथिवो, जल, तेज और वायु इनमें से चारों में से तीन और आकाश ये सभी निमित्तकारण हैं । का व्यवहार होता है । शरीर चार प्रकार के हैं । इनमें एक एक ही समवायिकारण हैं । इसीसे शरीरों में पाश्वभौतिकत्व For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] १३ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal तेजस्त्वाभिसम्बन्धात्तेजः । रूपस्पर्श सख्यापरिमाणपृथक्त्व-संयोगविभागपरत्वापरत्वद्रवत्वसंस्कारवत् । पूर्ववदेषां सिद्धिः । तत्र शुक्लं भास्वरश्च रूपम् । उष्ण एव स्पर्शः । तेज का व्यवहार तेजस्त्व जाति के सम्बन्ध से करना चाहिए । यह रूप, स्पर्श, सङ्ख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, द्रवत्व और संस्कार इन ग्यारह गुणों से युक्त है । इसमें भी गुणों की सिद्धि पृथिवी और जल की तरह सूत्रकार की उक्तियों से समझनी चाहिए । इसमें रूपों में से भास्वर शुक्ल रूप ही, एवं स्पर्शो में से उष्ण स्पर्श ही है । करणसाध्यत्वात् । आप्यत्वं रूपादिषु मध्ये रसव्यञ्जकत्वात् सुखशोषिणां कालादि-द्रव्यवत् । विषयनिरूपणार्थमाह-- विषयस्त्विति । सरित्समुद्रौ हिमं करको घनोप-लमित्यादिविषयो भोग्यत्वेन भोक्तुर्भोगसाधनत्वात् । तेजस्त्वाभिसम्बन्धात्तेज इति । व्याख्यानं पूर्ववत् । तेजस्त्वमिव रूपाद्येकादशगुणयोगोऽपि तस्य वैधर्म्यमिति दर्शयति-- रूपेत्यादि । पूर्ववत्तेषां सिद्धिरिति । यथा सूत्रकारवचनाद्रूपादीनां पृथिव्यां सिद्धस्तथा तेजस्यपीत्यर्थः । तथा च सूत्रम् -- " तेजोऽपि रूपस्पर्शवत् " ( २ - १ - ३ ) । सङ्ख्यादिप्रतिपादकन्तु की सत्ता में प्रमाण है, क्योंकि क्रिया करण से ही निष्पन्न होती है । रसनेन्द्रिय जलीय इस लिए है कि रूपादि गुणों में से वह रस को ही व्यक्त करती है, जैसे कि मुँह का तरल द्रव्य | विषयरूप जल को समझाने के लिए ' विषयस्तु ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । चूँकि नदी, समुद्र, पाला, बरफ प्रभृति द्रव्य जीव के सुखदुःखानुभव के साधन हैं, अतः ये विषयरूप जल हैं । ' पृथिवीश्वादिसम्बन्धात् पृथिवी ', अप्त्वाभिसम्बन्धादापः ' इत्यादि पहिले वाक्यों की तरह तेजस्त्वाभिसम्बन्धात्तेज: ' इस वाक्य की भी व्याख्या करनी चाहिए । ' रूपस्पर्श ' इत्यादि पति का तात्पर्य है कि तेजस्त्व जाति की तरह रूपादि ग्यारह गुणों का सम्बन्ध भी तेज का ' वैधर्म्य ' अर्थात् लक्षण है । ' पूर्ववत्तेषां सिद्धिः ' अर्थात् जैसे पृथिव्यादि द्रव्यों में ' सूत्ररूप वचनों से गुणों की सत्ता प्रमाणित की है, उसी प्रकार सौत्र वचनों से ही तेज में भी रूपादि ग्यारह गुणों को सिद्धि समझनी चाहिए । जैसा कि सूत्र है - " तेजोऽपि १. अभिप्राय यह है कि छेदनादि क्रिया कुठारादि करणों से ही निष्पन्न देखी जाती हैं । इस दृष्टान्त से यह अनुमान सुलभ है कि रस प्रत्यक्षरूप क्रिया का भी कोई करण

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रश्ये तेज: --तदपि द्विविधमणुकाभावात् । कार्यश्च शरीरादित्रयम् । यह भी परमाणु ( नित्य ) और कार्य के भेद से दो कार्यरूप तेज के शरीर, इन्द्रिय एवं विषय भेद से तीन । प्रकार का है, एवं प्रकार हैं । तैजस न्यायकन्दली साधारणमेवसूत्रम् । यादृशमस्य रूपं तद्दर्शयति-- शुक्लं भास्वरञ्चेति । शुक्लं रूपं पृथिव्युदकयोरप्यस्ति, किन्तु न भास्वरं रूपम्, स्वरूपप्रकाशकं शुक्लं रूपं तेजस्येवेति वैधर्म्यम् । यत् त्वस्य लोहितं कपिलं वा रूपं क्वचित् प्रतीयते तदाश्रयोपाधिकृतम्, निराश्रयस्य सर्वत्र शुक्लतामात्रप्रतीतेः, यथा प्रदीपप्रभा-मण्डलस्य सौरचन्द्राद्यालोकस्य च उष्ण एव स्पर्श इति । पृथिव्युदकमरुता-मनुष्णाशीतशीतानुष्णाशीतस्पर्शाः, उष्ण एव तेजसि स्पर्श इति वैधर्म्यम् । पृथिव्युदकवत् तेजसोऽपि द्वैविध्यम पिशब्देन सम्भावयन्नाह - तदपीति । अणु-भावात् कार्य्यभावात् तेजोऽपि द्विविधमिति । कार्य्यञ्च शरीरादित्रयम्, शरीरमिन्द्रियं रूपस्पर्शवत् ” २ - १ - ३ ) | ( अर्थात् भास्वर शुक्ल रूप एवं उष्ण स्पर्श से युक्त द्रव्य ही ' तेज ' है । तेज में संख्यादि गुणों का प्रतिपादक " संख्याः परिमाणानि ” ( ४ - १ - ११ ) इत्यादि सामान्य सूत्र ही है । तेज में किस प्रकार का रूप है? इसका उत्तर ' शुक्लं भास्वरञ्च ' इत्यादि से देते हैं । यद्यपि शुक्ल रूप पृथिवी और जल में भी है, तथापि उनका शुक्ल रूप ' भास्वर ' अर्थात् अपने रूप एवं पररूप दोनों का प्रकाशक नहीं है । इस प्रकार का शुक्ल रूप केवल तेज में ही है, अतः भास्वर शुक्ल रूप तेज का लक्षण है । कहीं कहीं तेज में जो लाल पीले प्रभृति रूपों के दर्शन होते हैं, वह आश्रयरूप उपाधिमूलक हैं, क्योंकि प्रदीप और सौर प्रकाश प्रभृति में सभी जगह शुक्लता की ही प्रतीति होती है । ' उष्ण एव स्पर्श: ' अर्थात् पृथिवी में अनुष्णाशीत स्पर्श, जल में शीत स्पर्श एवं वायु में अनुष्णाशीत स्पर्श हैं, किन्तु तेज में केवल उष्ण स्पर्श ही है, अर्थात् केवल उष्ण स्पर्श भी ' तेज ' का लक्षण है । ' तदपि ' इस वाक्य के ' अपि ' शब्द के द्वारा सूचित करते हैं कि पृथिवी एवं जल की तरह तेज के भी दो प्रकार हैं । अर्थात् परमाणु स्वरूप एवं कार्यं स्वरूप है, क्योंकि वह भी क्रिया है, जैसे कि छेदनादि क्रिया । इन्द्रियों में बाधित है, अतः इन सभी से भिन्न कोई जिसका अन्वर्थ नाम है ' रसना ' । रस प्रत्यक्ष का करणत्व चक्षुरादि इस क्रिया का करण मानना पड़ेगा, For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् Σε शरीरमयोनिजमेवादित्यलोके । पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्चोपभोगसमर्थम् । इन्द्रियं सर्वप्राणिनां रूपव्यञ्जक मन्यावयवानभिभूतैस्तेजोऽवयवै-रारब्धं चक्षुः । शरीर भी अयोनिज ही है एवं आदित्यलोक में प्रसिद्ध है । पार्थिव अवयवों के सम्बन्ध से यह सुख दुःख के अनुभव की क्षमता प्राप्त करता है । सभी प्राणियों को रूप का प्रत्यक्ष जिससे होता है, वही तैजस इन्द्रिय है । जिनकी शक्ति विजातीय द्रव्यों की शक्ति से पराभूत नहीं हुई है, उन तैजस अवयवों से तैजस इन्द्रिय की सृष्टि होती है । इस इन्द्रिय का नाम है ' चक्षु ' | न्यायकन्दली विषय इति त्रयं तेजसश्च कार्य्यम् । शरीरमयोनिजमेवादित्यलोके । ननु दहनात्म-त्वात् तेजसां तदारब्धं शरीरं वह्निपुञ्जप्रायं विशिष्टव्यवहारायोग्यत्वान्नोपभोगाय कल्प्यते, तत्राह -- पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्च इति । पार्थिवानामवयवानां निमित्तभूतानामुपष्टम्भात् संयोगविशेषात् तेजोऽवयवा उपभोगक्षमं विशिष्टमेव शरीरमारभन्ते, न वह्निपुञ्जप्रायमित्यभिप्रायः । इन्द्रियं रूपव्यञ्जकमिति । सर्वप्राणिनां रूपव्यञ्जकं यदिन्द्रियं तत् तेजोऽवयवैरारब्धम् । इदमेव कुतो रूपव्यञ्जकमिन्द्रियं स्याद्, नान्यत् तेजो-द्रव्यमित्यत्रोपपत्तिः - - अन्यावयवानभिभूतैरिति । ये पार्थिवोदकावयवैरप्रतिबद्ध-भेद से तेज के भी दो भेद हैं । " कार्यञ्च शरीरादित्रयम् " अर्थात् शरीर इन्द्रिय और विषय भेद से कार्यरूप तेज के तीन भेद हैं । तैजस शरीर अयोनिज ही है, जो कि आदित्यलोक में प्रसिद्ध है | तेज है अग्नि स्वरुप, उससे उत्पन्न द्रव्य अग्नि की तरह ही होगा, अत. शरीर से होनेवाले विशेष प्रकार के व्यवहार के अनुपयुक्त होगा । फलतः यह शरीर सुखदुःखानुभवरूप अपना प्रधान कार्य ही नहीं कर सकता? इसी प्रश्न का समाधान ' पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्च " इस वाक्य से किया गया है । अभिप्राय यह है कि पार्थिव अवयवों के ' उपष्टम्भ ' अर्थात् विशेष प्रकार के ( उपभोगक्षम ) एक विशेष प्रकार के शरीर को संयोग की सहायता से तेज के अवयव उत्पन्न करते हैं, वह्निसमूह की तरह नहीं । " इन्द्रियं रूपव्यञ्जकम् " सभी प्राणियों के रूप- प्रत्यक्ष की कारणीभूत इन्द्रिय तेज के अवयवों से ही उत्पन्न होती है । यही इन्द्रियरूप तैजस द्रव्य रूप के प्रत्यक्ष का कारण क्यों है? अन्य तैजस द्रव्य क्यों नहीं है? इसी प्रश्न का उत्तर ' अन्यानभिभूतैः ' इत्यादि से देते हैं । तेज के जिन अवयवों का सामर्थ्य पार्थिव और जलीय अवयवों For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १०० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम [ द्रव्ये तेज: -विषयसंज्ञकं चतुर्विधम् - भौमं दिव्यमुदर्य्यमाकरजञ्च । तत्र भौमं काष्ठेन्धनप्रभवमृज्वलनस्वभावं पचनदहनस्वेदनादिसमर्थम, दिव्यम-विषय नामक तेज के भौम, दिव्य, उदर्य और आकरज भेद से चार प्रकार हैं । इनमें लकड़ी प्रभृति से उत्पन्न तेज ' भौम ' है । ऊपर की ओर प्रज्वलित होना उसका स्वभाव है । भौम तेज पाक, दाह एवं वस्तुओं के काठिन्य को दूर कर कोमल बनाने की शक्ति रखता है । जिसमें ' अप्, अर्थात् जल ही लकड़ी का काम न्यायकन्दली सामर्थ्यास्तेजोऽवयवास्तैरारब्धं चक्षुः, अत इदं विशिष्टोत्पादाद्रूपाभिव्यञ्जक-मिन्द्रियं नान्यत् । तादृशं तदुत्पद्यत इत्यत्रादृष्टमेव कारणम्, कार्य्यनियम एव प्रमाणम् । तैजसत्वन्तु तस्य रूपादिषु मध्ये नियमेन रूपस्याभिव्यञ्जकत्वात् प्रदी-पवत् । इदं त्वदृष्टवशादनुद्भूतरूपस्पर्शम्, तेन न स्वाश्रयं दहति नाप्युपलभ्यते । विषयसंज्ञकं चतुर्विधम् । विषय इति संज्ञा यस्य तद्विषयसंज्ञकं तेजः कार्यं चतुर्विधम् । चातुविध्यमेव दर्शयति- भौममित्यादि । तत्रेति निर्धार -णार्थः । भूमौ भवं भौमं काष्ठेन्धनप्रभवं काष्ठस्वभावं यदिन्धनं तस्मात् प्रभवत्यु-से नष्ट नहीं हुआ है, उन तैजस अवययों से इस इन्द्रिय की सृष्टि होती है । चूँकि इसी तैजस द्रव्य की उत्पत्ति उक्त विशेष प्रकार से होती है, दूसरे तेजस द्रव्यों की नहीं, अतः यही तैजस द्रव्य रूप के प्रत्यक्ष का उत्पादक है, दूसरे तेजस विशेष प्रकार से इसी तैजस द्रव्य की उत्पत्ति क्यों द्रव्य नहीं । " उक्त होती है? " इस प्रश्न के उत्तर में अदृष्ट को ही इसका कारण कहना पड़ेगा । एवं इस प्रकार के अदृष्ट की सत्ता में इस नियम को ही प्रमाण मानना पड़ेगा कि इन्द्रिय-रूप तैजस द्रव्य से ही रूप का प्रत्यक्षरूप कार्य होता है, दूसरे द्रव्यों से नहीं । ( रूप-प्रत्यक्ष का उत्पादक ) यह द्रव्य तैजस इस लिए है कि रूपादि गुणों में से यह केवल रूप के ही प्रत्यक्ष का उत्पादन कर सकता है, जैसे कि प्रदीप | अदृष्टवश इसके रूप और स्पर्श अनुभूत हैं, अतः ( स्पर्श के अनुभूतत्व प्रयुक्त ) अपने आश्रय में दाह को एवं ( रूप के अनुभूतत्व प्रयुक्त ) अपने प्रत्यक्ष को उत्पन्न नहीं कर सकता । ' विषयसंज्ञकं चतुर्विधम् ' अर्थात् ' विषय इति संज्ञा यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' विषय ' नाम के तेज के कार्य चार प्रकार के हैं । यहीं चारों भेद ' भोमम् ' इत्यादि से कहते हैं । ' त ' इस पद के सप्तमी विभक्ति का अर्थ है निर्द्धारण । ' भौम ' अर्थात् पृथिवी से उत्पन्न विषयरूप तेज का नाम ' भौम ' है । ' काष्ठेन्धनप्रभवम् ' अर्थात् लकड़ी रूप For Private And Personal

पृष्ठ 176

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 176 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १०१ चिन्धनं सौरविद्युदादि, शुक्तस्याहारस्य रसादिपरिणामार्थमुदर्थ्यम्, आकरजञ्च सुवर्णादि । त्र संयुक्तसमवायाद्रसाद्युपलब्धिरिति । देवे, उसी विषय रूपी तेज को ' दिव्य ' कहते हैं, इसके अन्तर्गत सौर तेज और विद्युत् प्रभृति आते हैं । खाये हुये द्रव्य को पचानेवाला उदर का तेज ही ' उदय ' तेज है । सुवर्ण प्रभृति ' आकरज ' तेज हैं । उनमें रस की उपलब्धि संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से होती है । न्यायकन्दली त्पद्यते, निराश्रयस्यानुत्पत्तेः । काष्ठग्रहणमुपलक्षणार्थम्, तृणतुषादीनामपि कारण-त्वात्, ऊर्ध्वं ज्वलनं क्रियाविशेषः, तत्स्वभावकं तद्धर्मकम् । पचनस्वेदनादिसमर्थम्, पचनं पूर्वगुणविलक्षणं गुणान्तरोत्पादनम्, स्वेदनं स्तब्धत्वनाशनम्, आदिशब्दाद्वि-स्फोटादिजननलक्षणं दहनं तत्र समर्थमित्यर्थक्रियोपवर्णनम् । दिव्यमबिन्धनं सौरं विद्युदादिभवं तेजोऽबिन्धनम्, आप इन्धनं यस्येति व्युत्पत्त्या तत् सौरं विद्यु-दादि, आदिशब्दादुल्काया अवबोधः । भुक्तस्याहारस्य रसादिपरिणामार्थ-मुदर्यम्, उदरे भवं तेजो भुक्तस्याहारस्य रसमलधातुभावेन परिणामप्रयोजनम् । आकरजश्च सुवर्णादि । आकर: स्थानविशेष:, तस्मिन् सुवर्णरजतादि तैजसं द्रव्यं जायते । सुवर्णादीनां तैजसत्वे तावदागमः प्रमाणम् । न्यायश्चाभिहितः । इन्धन से जिसकी उत्पत्ति हो, वही तेज काष्ठेन्धनप्रभव ' है, क्योंकि बिना आश्रय के किसी वस्तु की उत्पत्ति नहीं हो सकती । ' काष्ठ ' पद उपलक्षण है, क्योंकि तिनके और भूसे आदि पृथिवी से भी अग्नि की उत्पत्ति होती है । ' ऊर्ध्वज्वलन ' ऊपर की तरफ उठनेवाली एक क्रिया है, वही ' स्वभाव ' अर्थात् धमं इस तेज का है । पचन-स्वेदनादिसमर्थम् ' पचन शब्द का अर्थ है- द्रव्य में पहिले से विद्यमान गुणों से दूसरे प्रकार के गुणों का उत्पादन | स्वेदन शब्द का अर्थ है - काठिन्य का नाश करना | ' आदि ' शब्द से ' विस्फोट ' आदि इसके कार्य सूचित किये गये हैं । यह ' भौम ' तेज से होनेवाले कार्यों का विवरण है । ' आप इन्धनं यस्य ' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न ' अबिन्धन ' शब्द से समझे जानेवाले सौर एवं विद्युत् प्रभृति एवं उससे उत्पन्न तेज ही ' दिव्य ' तेज है । प्रकृत आदि शब्द से उल्का प्रभृति तेजों का परिग्रह इस दिव्य तेज के अन्तर्गत करना चाहिए । ' भुक्तस्याहारस्य रसादिपरिणामार्थमुदर्यम् ' ' उदरे भवं तेज: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उदर्भ्य शब्द से खाये हुये अन्नादि को रस, मल, धातु प्रभृति रूपों में परिणत करनेवाला पेट का तेज हो अभीष्ट है । ' आकरजं सुवर्णादि ' विशेष प्रकार के स्थान ( खान ) को ' आकर ' कहते हैं । उसमें सोना चाँदी प्रभृति द्रव्य उत्पन्न होते हैं । सुवर्णादि के तैजस द्रव्य होने में ( " अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णम् " इत्यादि ) आगम भी प्रमाण हैं । सुवर्णादि द्रव्य के तैजस For Private And Personal

पृष्ठ 177

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 177 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १०२ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्य तेज: -कथं तहि गन्धरसयोरनुष्णाशीतस्पर्शस्य च गुणस्योपलब्धिरत आह - तत्रेति । भोगिनामदृष्टवन भूयसां पार्थिवानां पार्थिवावयवानामुपष्टम्भादनुद्भूत-रूपस्पर्श पिण्डीभावयोग्यं सुवर्णादिकमारभ्यते, तत्र पार्थिवद्रव्यसमवेता इमे रसादयो गृह्यन्ते । इतिशब्दः समाप्तौ । अनुद्भूतरूपस्पर्शं सुवर्णादिकमिति न मृष्यामहे, प्रतीयमानरूपस्पर्श-व्यतिरिक्तस्य द्रव्यान्तरस्याभावादिति चेन्न, स्तम्भोऽयं कुम्भोऽयमिति प्रत्येक विलक्षणसंस्थानसंवेदनाद्रूपादिस्वभावस्य सर्वत्राविशेषात् । वासना-भेदात् प्रतिसञ्चयं संवित्तिभेद इति चेत्? नीलादिसंवित्तिभेदोऽपि वासनाकृत एवास्तु नार्थो नीलादिभेदेन । असति बाह्यवस्तुनि स्वसन्तान -मात्राधीनजन्मनो वासनापरिपाकस्य कादाचित्कत्वानुपपत्तेस्तन्मात्र हेतोर्नीला-दिसंवेदनस्य कादाचित्कत्वासम्भवान्नीलादिभेदकल्पनेति चेत्? स्तम्भादि-होने में अनुमान प्रमाण का उल्लेख कर चुके हैं । ( प्र ० ) फिर सुवर्णादि में गन्ध, रस एवं अनुष्णाशीत स्वर्श प्रभृति की उपलब्धि कैसे होती है? इसी प्रश्न के उत्तर में ' तत्र ' इत्यादि पंङ्कि लिखी गयी है । भोग करनेवाले के अदृष्ट की सहायता से पार्थिव अवयवों के संयोग द्वारा ( पार्थिव वस्तुओं की तरह ) ठोस सुवर्णादि तैजस द्रव्यों की उत्पत्ति होती है | सुवर्णादि में निमित्त कारणरूप इन पार्थिव अवयवों के ही रसादि प्रतीत होते हैं । इस ' इति ' शब्द का अर्थ है समाप्ति । ( प्र ० ) हम लोगों को यह बात मान्य नहीं है कि अनुद्भूत रूप एवं अनुद्भूत स्पर्श से युक्त सुवर्ण नाम का कोई द्रव्य है, क्योंकि प्रतीत होनेवाले रूपरसादि को छोड़कर द्रव्य नाम की कोई दूसरी वस्तु नहीं है । ( उ ० ) नहीं क्योंकि " यह खूटा है, यह घट है " इन दोनों प्रतीतियों से दो विभिन्न आकार की वस्तुओं की सत्ता जनसाधारण ' अनुभव से सिद्ध है, किन्तु खूँटा और घट दोनों के रूपादि गुणसमूह तो समान ही हैं । ( प्र ० ) वासना ( मिथ्याज्ञानजनित संस्कार ) के भेद से प्रत्येक गुणसमूह की प्रतीतियाँ विभिन्न आकार की होती हैं? ( उ ० ) फिर ' यह नील है ', ' यह पीत है ' इत्यादि गुणविषयक प्रतीतियाँ भी वासना से ही मान ली जायें, नीलादि गुणों की भी सत्ता मानने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । ( प्र ० ) अगर ( नीलादि ) किसी बाह्य वस्तु की सत्ता न मानी जाय तो फिर नीलादि प्रतीतियाँ कभी होती हैं एवं कभी नहीं । उनका यह कादाचित्कत्व अनुपपन्न हो जाएगा, क्योंकि वासना के परिपाक से तो कादाचित्कत्व सम्भव नहीं है. चूंकि वह अपने पूर्ववर्ती समूहों से ही उत्पन्न होती है, अतः नीलादि गुणों की सत्ता अवश्य माननी पड़ती है, जिससे उनकी सत्ता से नीलादि प्रतीतियाँ होती हैं और १. अर्थात् प्रतीत होनेवाले गुणसमूह को ही विलक्षणता उत्पन्न नहीं होगी, क्योंकि विषयों के द्रव्य मानें तो दोनों प्रतीतियों में अन्तर हुए बिना ज्ञानों में अन्तर For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 178 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १०३ संवित्तिभेदस्यापि बाह्यवस्त्वननुरोधिनो न कादाचित्कत्वमुपपद्यत इति रूपादि-व्यतिरिक्तः प्रतिसञ्चयं वासनाविशेषबोधहेतुविलक्षणः संस्थानविशेषः कल्प-नीयः, येन दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणामपि सिद्ध्यति । रूपादिमात्रे वस्तुन्य-स्याप्यसम्भवः, तेषामेकै केन्द्रियग्रहण नियमात् । अपि च, रूपादयः परमाणु-स्वभावाः प्रत्येकमतीन्द्रियाः, तद्व्यतिरिक्तः सञ्चयो नास्तीति भवतां कोऽर्थो दर्शनस्पर्शनविषयः? प्रत्येकमतीन्द्रिया अपि परमाणवो मनस्कारेन्द्रियादिषु सत्सु समर्थोत्पन्ना ऐन्द्रियका भवन्तीति चेन्न, समर्थोत्पादे s पि परमसूक्ष्म-स्वरूपानतिवृत्तेः, समर्थोत्पत्तिमात्रेण च चाक्षुषत्वे मनस्कारेन्द्रिययोरपि प्रत्यक्षता स्यात्, अविशेषात् । अथ मतम्, प्रत्येकमस्थूला अपि परमाणवः केशसमूहवत् संहताः सत्ता न रहने से नहीं होती हैं । इस प्रकार प्रतीतियों का कादाचित्कत्व सम्भव होता है । ( उ ० ) उक्त स्तम्भादि प्रतीतियों में भी अगर बाह्य किसी वस्तु की सत्ता की अपेक्षा न मानें तो इन प्रतीतियों का भी कादाचित्कत्व अनुपपन्न ही रहेगा, अत: ( आप को यह भी ) मानना पड़ेगा कि रूपादि गुणों से भिन्न स्तम्भावि प्रत्येक समूह में विशेष प्रकार की वासना की उद्बोधक कोई विलक्षण आकार की वस्तु है । इसे मान लेने से चक्षु और त्वचा से एक ही वस्तु के ग्रहणरूप सर्वजनीन प्रतीति की भी उपपत्ति हो जाएगी । द्रव्य को रूपादि समूहरूप मान लेने में यह सम्भव नहीं है क्योंकि रूपादि प्रत्येक गुण एक - एक इन्द्रिय से ही गृहीत होते हैं, और यह बात भी है कि रूपादि प्रत्येक परमाणु - स्वभाव के हैं अत: प्रत्येक अतीन्द्रिय हैं । समूह नाम की कोई अतिरिक्त वस्तु नही है । अत: आपके मत में कौन - सी वस्तु त्वचा से गृहीत होगी? ( प्र ० ) उनमें से प्रत्येक अतीन्द्रिय है, किन्तु जिस क्षण में मन से सम्बद्ध उन्मुख इन्द्रि-यादि रूप प्रत्यक्ष की सामग्री का सम्बलन होता है, उससे आगे के क्षण में उस अती-न्द्रिय समुदाय से भी इन्द्रिय से ज्ञात होने योग्य समुदाय की उत्पत्ति होती है, अतः इस समुदाय का इन्द्रिय से ग्रहण होता है । ( उ ० ) ' अतीन्द्रिय वस्तुएँ भी चक्षु से गृहीत होने योग्य समुदाय को उत्पन्न करती हैं ' यह मान लेने पर भी वह चक्षु से गृहीत होनेवाला रामूही अपने सूक्ष्मत्वरूप स्वभाव को छोड़ नहीं सकता । अगर समर्थ के उत्पादन करने से ही उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष हो तो फिर मनोवृत्ति और इन्द्रियों का भी प्रत्यक्ष होना चाहिए, क्योंकि इनके रहने पर ही अतीन्द्रिय स्वभाव का समूह चाक्षुष प्रत्यक्ष योग्य समूह का उत्पादन करता है ), क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । ( प्र. ) यह ठीक है कि प्रत्येक परमाणु प्रतीन्द्रिय है, किन्तु समुदाय भावापन्न होने पर वह इन्द्रिय से गृहीत हो सकता है । जैसे कि एक केश दूर से नहीं देखा ताता, किन्तु उसका समूह नहीं आ सकता । अगर उक्त दोनों प्रतीतियों के विषय गुणसमूह ही हैं, तो फिर दोनों प्रतीतियों में अन्तर करना कठिन है । For Private And Personal

पृष्ठ 179

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १०४ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये तेज: -स्थूलावभासभाजो भवन्तश्चाक्षुषा जायन्ते निरन्तरतया चैकत्वेनाध्यवसीयन्ते, इति चेत्? किमेतेषु बहुषु तदानीमेकः स्थूलाकारो जायते? किं वा केशेष्वि-वाविद्यमानः समारोप्य प्रतीयते? यदि च जायते स नोऽवयवीति । अथाविद्य-मानः प्रतीयते, भ्रान्तिस्तहि । भ्रान्तिश्चाभ्रान्तिप्रतियोगिनी, क्वचिदेकः स्थूलः सत्योऽभ्युपेयः । न च विज्ञाने तस्य सत्यता युक्ता, स्थूलमहमस्मीति प्रतीत्यनुदया-दनेकद्रष्टृसाधारणत्वाभावप्रसङ्गाच्च । तस्माद्विषय एवायमेकः स्थूलः, सर्वदा भिन्नाकारेण प्रतिभासनादर्थक्रियासम्पादनाच्चेत्यवयविसिद्धिः । दूर से भी देखा जाता है । उस समूह के बीच व्यवधान न रहने के कारण केश अनेक होने पर भी एक दीखते हैं । ( उ ० ) ( १ ) उन परमाणुओं में एक स्थूलाकार वस्तु की उत्पत्ति होती है, जिसमें वस्तुतः विद्यमान एकत्व का भान होता है? ( २ ) या जैसे केशसमूह में वस्तुतः अविद्यमान भ्रमज्ञान विषय के एकत्व का भान होता है, वैसे ही उक्त परमाणुसमूह के स्थल में भी होता है? अगर पहिला पक्ष मानते हैं तो फिर वही ( परमाणुओं में उत्पन्न स्थूलाकार एक वस्तु ) हम लोगों का अभीष्ट अवयवी है । अगर दूसरा पक्ष माने तो फिर एकत्व की इन प्रतीतियों को भ्रान्तिरूप मानना पड़ेगा । भ्रान्ति अभ्रान्ति का प्रतियोगी है, इसकी प्रसिद्धि के लिए कहीं एक स्थूलाकार वस्तुकी यथार्थ सत्ता को स्वीकार्य करना अनिवार्य है । सभी वस्तुओं को विज्ञानस्वरूप मान लेने पर ( यद्यपि उक्त एकत्व प्रतीति के प्रमात्व की उपपत्ति हो जाती है, किन्तु यह विज्ञानवाद ' इसलिए अयुक्त है कि घटादि वस्तुओं में ) ' मैं स्थूल हूं ' इस प्रकार की प्रतीति नहीं होती । एवं घटादि वस्तुएं अनेक ज्ञाताओं से ज्ञात न हो सकेंगी । १. अगर सभी पदार्थ विज्ञान स्वरूप ही हैं तो फिर आत्मा और घटादि दोनों एक ही विज्ञान स्वभाव के हैं, अत दोनों को एक मानना पड़ेगा । फिर जैसे आत्मा की अभिव्यक्ति ' अहम् ' शब्द से होती है कि ' मैं जानता हूँ, ' वैसे हो ' घटादि स्थूल हैं ' इत्यादि प्रतीतियों का यह अभिलाप न होकर ' मै स्थूल हूँ ' इस प्रकार का होना चाहिए । इससे दो आपत्तियाँ आ जाती हैं - ( १ ) घटादि के लिए ' अहम् ' शब्द के प्रयोग को, एवं ( २ ) ' अहम् ' शब्द बोध्य में स्थूलत्व की, किन्तु जो अहम् ' शब्द से समझा जाता है, वह स्थूल नहीं हो सकता, एवं जो स्थूल है वह ' अहम् ' शब्द का अभिधेय नहीं हो सकता । २. ' अनेक प्रतिपत्त साधारणत्व ' की जो अनुपपत्ति दी गई है, उसका अभिप्राय है घटादि वस्तुएँ विज्ञान के आकार की हैं तो फिर यह मानना पड़ा कि मेरे विज्ञान से गृहीत होनेवाला घटविज्ञान आपके विज्ञान से गृहीत होनेवाले घटविज्ञान से भिन्न है, क्योंकि मेरा और आपका विज्ञान अवश्य ही भिन्न है । तस्मात् ' जिस घट को मैं देखता हूँ उसी को आप भी देखते हैं ' यह स्वारसिक प्रतीति नहीं हो सकेगी । अनेक ज्ञाताओं से किसी एक वस्तु का ज्ञात होना ही उस विषय का ' अनेकप्रतिपत्तसाधारणत्व ' है । यही अनुपपन्न होगा । For Private And Personal

पृष्ठ 180

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 180 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १०५ नवसति बाधके प्रतीतिसिद्धस्तथेति व्यवह्रियते, अवयविसद्भावे तु बाधकं प्रमाणमस्ति । तथा हि -- पाणौ कम्पवति तदाश्रितं शरीरं न कम्पते पादे वा कम्पमाने तद्गतं शरीरं न कम्पत इत्येकस्य विरुद्धधर्मताप्रसङ्गः । तदसङ्गतम्, पाणौ कम्पमाने शरीर कम्पा वश्यम्भावनियमाभावात् । यदा पाणिमात्रं चाल-यितुं कारणं भवति तदा तन्मात्रं चलति न शरीरम्, कारणाभवात् । यदा तु शरीरस्यापि चलनकारणं भवेत् तदा शरीरं चलत्येव । नास्याचलनमस्तीति कुतो विरोधः, यदि हस्तचलति न शरीरं तदाऽवयवावयविनोर्युतसिद्धिः? नैवम्, पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसिद्धि:, न चलाचलत्वम्, द्रव्ये चलति गुणस्था-तस्मात् उन प्रतीतियों के विषय गुणादि से भिन्न गुणादि के आश्रय एवं परमाणुसमूहों से भिन्न, किन्तु उनसे उत्पन्न, एवं विज्ञान से भिन्न अवयवो अवश्य ही हैं । प्र ० ) जिस प्रतीति का आगे किसी विरोधी प्रतीति से बाध न हो, वह प्रतीति वस्तु को जिस रूप में उपस्थित करे, वह वस्तु उसी रूप से व्यवहृत होती है । किन्तु ' अवयवों से भिन्न अवयवों में रहनेवाला कोई अवयवी नाम का द्रव्य है ' इस बुद्धि को बाधित करनेवाली बुद्धि है, क्योंकि हाथ में कम्पन होने पर भी उसमें रहनेवाला शरीर रूप अवयवी कम्पित नहीं होता । अथवा पैर में Marat कम्पित नहीं होता है । कम्पन होने पर भी उसमें रहनेवाला शरीररूप इस प्रकार एक ही अवयवी में अकम्पत्व और कम्पत्व रूप दो विरुद्ध धम्म की सत्ता माननी पड़ेगी । ( उ ० ) यह आपत्ति ठीक नहीं है, क्योंकि यह नियम नहीं है कि हाथ काँपने पर शरीर अवश्य ही काँपे । जिस समय केवल हाथ में ही कम्पन के कारण रहते हैं, तब केवल वही कम्पित होता है । जब उसमें रहनेवाले शरीर में भी कम्प होने की सामग्री रहती है, उस समय शरीर में भी कम्प होता है । वह भी तो कम्पनशून्य नहीं है, फिर विरोध क्या है? ( प्र ० ) अगर हाथ के चलने पर भी शरीर में क्रिया न हो तो अवयव और अवयवियों में ' युतसिद्धि ' की आपत्ति होगी । ( उ ० ) इससे ' युत सिद्धि ' को आपत्ति नहीं होगी । ( क्योंकि अयुत-सिद्धि उन दो वस्तुओं में होती है, जिनमें ) एक से असम्बद्ध होकर दूसरा न कहीं रहे, और न उनमें कोई रहे, यही वस्तुओं की अयुतसिद्धि है । ' भयुतसिद्धि ' शब्द का यह अर्थ नहीं है कि एक के चलने पर दूसरा भी चले, एवं एक के न चलने पर दूसरा भी न यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि ' इति न मृष्यामहे ' इत्यादि से जो आक्षेप किया गया है कि प्रतीत होनेवाले गुणसमूह से भिन्न कोई अतिरिक्त द्रव्य नहीं है, उसका समाधान ' भवती aisa दर्शनस्पर्शनविषयः ' इतनी पक्तियों से ही हो जाता है । रूपादिसमूह से अतिरिक्त द्रव्य अवश्य है । उसके बाद ' परमाणु- समूह ही अवयवी है ' या ' सभी विज्ञानस्वरूप हैं ' इत्यादि विषयों की चर्चा प्रासङ्गिक है । १४ For Private And Personal