प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 181–190

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 181–190

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १०६ न्यायकन्दली संचलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ ब्रव्ये तेज: -चलनेऽपि तयोर्युतसिद्ध्यभावात् । पृथगाश्रयाश्रयित्वं चावयवावयविनोभिन्नत्वेऽपि नास्तीति न युतसिद्धता । यदप्यन्यद् बाधकमुक्तम्, एकावयवावरणे तत्समवेत-स्यावयविनो न ग्रहणम्, अनावृतावयवग्रहणे च ग्रहणमित्येकस्य युगपद् ग्रहण-मग्रहणञ्च प्राप्नुत इति । तदप्यसारम् एकावयवावरणेऽवयव्यावरणस्याभावात् । स को s नेकेषु वाऽवयविषु वर्त्तमानः कतिपयावयवावरणेऽप्यनावृतेतर कति-पयावयवग्रहणेन गृह्यते, तस्य सर्वत्राभिन्नत्वात् । यत्तु बहुतरावयवग्रहणवत् स्थूलप्रतीतिर्न भवति, तद्भूयोऽवयवप्रचयग्रहणस्य परिमाण प्रकर्षप्रतीतिहेतोरभा-वात्। यत्र तु भूयसामवयवानामाव रणमल्पतरावयवग्रहणञ्च तत्रावयविनो न ग्रहणम्, यथा जलनिमग्नस्य शिरोमात्रदर्शनात् । एकस्मिन्नवयवे रक् तद्देशोऽवयवी रक्तोऽवयवान्तरे चारक्त इत्येकस्य रक्तारक्तत्वप्रसङ्ग इत्य-चले, क्योंकि द्रव्य के चलने पर भी गुण नहीं चलते, किन्तु वे दोनों ' अयुत सिद्ध ' हैं | rara और aarat इन दोनों में परस्पर भेद रहने पर भी एक को छोड़कर न दूसरा कहीं रहता है, न एक से असम्बद्ध एक - दूसरे में कोई रहता है । अतः इन दोनों में सिद्धि की आपत्ति नहीं है । ( अवयवों से भिन्न अवयवी के मानने में ) आपने जो दूसरा बाधक कहा है कि ( प्र ० ) जहाँ एक अवयवी के कुछ अवयव किसी दूसरी वस्तु से ढँके हुये हैं, और कुछ अवयव बिना ढँके हुये हैं, वहाँ ढँके हुए अवयवों में समवाय-सम्बन्ध से रहनेवाला अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होता है, और बिना ढके हुए अवयवों में समवायसम्बन्ध से रहनेवाले अवयवों का ग्रहण होता है, दोनों प्रकार के अवयवों में रहनेवाला अवयवी एक ही है । तस्मात् अवयवों से भिन्न एक अवयवी के मानने में एक ही वस्तु में एक ही समय में ग्रहणत्व और अग्रहणत्व रूप विरुद्ध दो धर्मों का समावेश मानना पड़ेगा । ( उ ० ) इसमें भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि एक या कुछ अवयवों के ढँके जाने पर भी अवयत्री नहीं ढँकता । यह अवयवी अनेक अवयवों में रहने के कारण कुछ अवयवों के ढँके रहने पर भी बिना ढके हुए अवयवों के ग्रहण से गृहीत होता है, क्योंकि सभी अवयवों में अवयवी तो एक ही है । यह ठीक है कि कुछ अवयवों के ग्रहण से जो अवयवी का ग्रहण होता है, वह सभी rana के ग्रहण से गृहीत होनेवाले अवयवी की प्रतीति को तरह ' स्थूल ' विषयक नहीं होता । उसका कारण यह है कि ' परिमाण प्रकर्ष ' रूप ' स्थूलता ' की प्रतीति के कारण बहुत से अवयवों की प्रतीति वहाँ नहीं है । जिस अवयवी के अधिक अवयव ढके रहते हैं और कुछ ही अवयव बिना ढके हुए रहते हैं, उस अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे कि पानी में डूबे हुए व्यक्ति का केवल शिर देखने पर भी प्रत्यक्ष नहीं होता । यह जो दूसरी आपत्ति ( अवयवी को अवयवों से अतिरिक्त मानने में बौद्ध लोग ) देते हैं कि ( प्र ० ) किसी अवयवी का एक अवयव रक्त रहे और दूसरा रक्त न रहे इनमें For Private And Personal

पृष्ठ 182

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १०७ दूषणम्, अविरोधात् । रागद्रव्यसंयोगो रक्तत्वम्, अरक्तत्वञ्च तदभावः । उभयं चैकत्र भवत्येव, संयोगस्याव्याप्यवृत्तिभावात् । इदमपरं बाधकम्, अवयविन: प्रत्यवयवमेकदेशेन वृत्तिः वा? प्रकारान्तराभावात् । न तावदेकदेशेन वृत्तिरवयवव्यतिरेकेणास्यैकदेशा-भावात् । कार्त्स्न्येन वृत्तौ वाऽवयवान्तरे वृत्त्यभावः, एकावयवसंसर्गावच्छिन्ने स्वरूपेऽवयवान्तराणामनवकाशात्, तत्स्वरूपव्यतिरेकेण चास्य स्वरूपान्तरा-भावात् । अत्रापि निरूप्यते - यद् वर्त्तते तदेकदेशेन वर्त्तते कात्स्न्येन वेति? किमिदं स्वसिद्धमभिधीयते परसिद्धं वा? स्वयं तावत् कस्यचित् क्वचिद् वृत्ति-रसिद्धा शाक्यानाम् परस्यापि नैकदेशकात्स्यभ्यां वृत्तिः सिद्धा, तयोरवृत्तित्वात्, वृत्ति प्रत्यकारणत्वाच्च । रक्त अवयवों में रहने वाले अवयवी को रक्त मानना पड़ेगा, और अरक्त अवयवों में रहने-वाले अवयवी को अरक्त मानना पड़ेगा, एवं दोनों प्रकार के अवयवों में रहनेवाला अवयवी एक ही है । अवयव समुदाय से भिन्न एक अवयवी के मानने में उक्त रीति से एक ही काल में एक ही वस्तु में रक्तत्व और अरक्तत्व इन दो विरुद्ध धर्मों का समावेश स्वीकार करना पड़ेगा । ( उ ० ) यह भी दोष नहीं है, क्योंकि ' रक्तत्व ' शब्द का अर्थ है लाल द्रव्य का संयोग, एवं अरक्तत्व शब्द का अर्थ है उसका अभाव । संयोग ' अव्याप्यवृत्ति ' अर्थात् एक ही समय में अपने आश्रय के किसी अंश में रहता है, एवं किसी में नहीं । तस्मात् रक्तत्व और अरक्तत्व दोनों का एक ही समय में एक अवयवी में रहना उनके परस्पर अविरोधी होने के कारण युक्तिविरुद्ध नहीं है । मानने में बौद्ध लोग एक आपत्ति और करते हैं अपने किसी एक अंश के द्वारा सम्बद्ध रहता है? भिन्न कोई तीसरा प्रकार नहीं है । किन्तु क्योंकि उन अवयवों को छोड़कर उसका अवयवों से भिन्न अवयवी के कि ( प्र ० ) प्रत्येक अवयव में अवयवी या अपने सम्पूर्ण रूप से? इन दोनों से किसी एक अंश से तो रह नहीं सकता, कोई एक अंश नहीं है । उसका अवयवों में अपने सम्पूर्ण रूप से रहना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि इस प्रकार वह अपने किसी एक ही अवयव में रहेगा और अवयवों में नहीं, क्योंकि एक अवयव में अपने सम्पूर्ण रूप से सम्बद्ध अवयवी की दूसरे अवयवों में सम्बद्ध होने की सम्भावना नहीं है । जिस रूप से वह एक अवयव में सम्बद्ध होगा, उसको छोड़कर अवयवी का कोई दूसरा रूप नहीं है । किन्तु इस रूप से तो वह एक अवयव में है ही । ( उ ० ) इस विषय में यह पूछना है कि अवयवी अवयवों में एक अंश से रहता है या सम्पूर्ण रूप से? यह प्रश्न आप ( बौद्ध ) अपने से कर रहे हैं? या दूसरों के सिद्धान्त के अनुसार? बौद्धों के यहाँ किसी वस्तु की वृत्तिता किसी वस्तु में है ही नहीं । दूसरों के मत में भी ' एक देश से या सम्पूर्ण रूप से वृत्तिता सिद्ध For Private And Personal

पृष्ठ 183

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १०८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये तेज: -न्यायकन्दली यद् वर्त्तते तत् स्वरूपेणाश्रयाश्रितभावलक्षणया वृत्या वर्त्तते । न चैक-स्यानेकसंसर्गो विरुद्धयते । दृष्टो हि चित्रज्ञाने नीलाकारावछिन्ने पीताद्याकार-संसर्गः । न च तस्य प्रत्याकारं भेदः, एकस्यानेकाकारग्रहणानुपपत्तौ भवतां चित्रप्रत्ययाभावप्रसङ्गात् । नापि ज्ञानैकत्वादाकाराणामप्येकत्वम्, चित्रानुभव-विरोधात् । यथैकावयवावच्छिन्ने एकावयविस्वभावेऽवयवान्तरसमावेशः प्रत्यक्षे-णाने कावयवसम्बद्धस्य तथैकस्य स्थूलात्मनः संवेदनादेकस्मिन्ननेकसंसर्गे दृष्टो नैस्यानेकेषु संसर्ग इति च वैधर्म्यमात्रम्, एकस्यानेकसंसर्गावच्छेदस्योभयत्रा-विशेषात् । एवं यदेकं तदेकत्रैव वर्त्तते, यथैकं रूपमेकश्चावयवीति, तथा यदनेकवृत्ति तदनेकम्, यथानेकभाजनगततालफलान्यनेकवृत्तिश्चावयवीति प्रसङ्ग-द्वयं प्रत्याख्यातम्, स्वतः परतश्च व्याप्त्यसिद्धेः, स्वतस्तावदेकं विज्ञानमनेकेषु विषयेन्द्रियमनस्कारेषु स्वरूपाभेदेन तदुत्पत्त्या वर्त्तते परस्याप्येकं सूत्रमभेदे-नानेकेषु मणिषु संयोगवृत्त्या वर्त्तते, तथाऽवयव्यवयवेषु समवायवृत्त्या वर्तिष्यते नहीं है, क्योंकि ' एकदेश ' या ' सम्पूर्णरूप ' इन दोनों में कोई भी ' वृत्ति ' अर्थात् सम्बन्ध नहीं है, एवं सम्बन्ध के कारण भी नहीं हैं । किसी में रहना, उन दोनों वस्तुओं के आधाराधेयभावसम्बन्ध से ' वस्तु का किसी वस्तु ही होता है । अनेक वस्तुओं में एक वस्तु का सम्बन्ध विरुद्ध भी नहीं है, क्योंकि चित्रज्ञानस्थल में नीलाकारविशिष्ट में पीताकार का सम्बन्ध सर्वजनीन अनुभव से सिद्ध है । चित्ररूप की प्रतीति में उसके आश्रय रूप से भासित होनेवाली वस्तु नीलादि आकारों के भेद से भिन्न - भिन्न भी नहीं हैं, क्योंकि फिर उसमें चित्र रूप की प्रतीति नहीं होगी । ( एक वस्तु में अनेक आकारों के रूप की प्रतीति ही चित्र की प्रतीति है ) एक ज्ञान में भासित होने के कारण ( नीलादि सभी ) आकारों को एक मानना भी सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) एक वस्तु एक ही आश्रय में रह सकती है, जैसे कि एक रूप । अवयवी भी एक ही है, ( तस्मात् अनेक अवयवों में रहनेवाला अवयवी एक नहीं हो सकता ), एवं जो वस्तु अनेक आश्रयों में रहता है वह स्वयं भी अनेकात्मक ही है, जैसे कि अनेक पात्रों में रक्खे हुए अनेक तालफल | ( तस्मात् अनेक अवयवों में रहनेवाला अवयवी अनेकात्मक ही हो सकता है, एकात्मक नहीं ) | ( उ ० ) किन्तु ये दोनों ही बाधक अनुमान अनादर के पात्र हैं, क्योंकि इनमें व्याप्तिन पूर्वपक्षवादी बौद्धों के मत से सिद्ध है, न हम लोगों के मत से । बौद्धों के मत में भी एक ही विज्ञान अपने उत्पत्तिरूप सम्बन्ध से और अपने स्वरूप के अभेद से विषय इन्द्रिय और मनोवृत्ति इन अनेकवस्तुओं में रहता है । हम लोगों के मत में भी एक डोरी अनेक मणियों में संयोग सम्बन्ध से रहती है । अतः एक अवयवी भी For Private And Personal

पृष्ठ 184

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir मकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १०६ नाना च न भविष्यति । सर्वश्चायं प्रसङ्गहेतुराश्रयं निघ्नन्नात्मानमपि हन्ति, अवयव्यभावे परमाणुमात्रे जगति धर्म्मधम्मदृष्टान्तादिप्रतीत्यसिद्धौ निराश्रयस्य वृत्त्यभावात् । अतो नानेन प्रत्यक्षसिद्धोऽवयवी शक्यो निराकर्तुम्, प्रत्यक्षसापेक्षस्य तस्य ततो दुर्बलत्वात् । भ्रान्तं प्रत्यक्षमिति चेत्? कुत एतत्? बाधकेनापाकरणा-दिति चेत्, प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वे बाधकस्य प्रमाणत्वं बाधकप्रामाण्ये च प्रत्य-क्षस्य भ्रान्तत्वमित्यन्योन्यापेक्षित्वम् । प्रत्यक्षे तु नायं न्यायः, तस्यानपेक्षत्वात् । न चार्थक्रियासंवादिसर्वलोकसिद्धं स्पष्टप्रतिभासं भ्रान्तमिति युक्तम्, नीलादि -प्रत्यक्षस्यापि भ्रान्तत्वप्रसङ्गादिति बाधकोद्धारः । परमाणवोऽवयव्यनुमेया अपि सन्तो व्यवहर्त्तव्याः । षट्केन युगपद्योग एकस्य परमाणोः षडंशत्वमापादयन् परमाणु-समवायसम्बन्ध से अनेक अवयवों में रहेगा, इसके लिए उसे नाना अवयवरूप मानने की आवश्यकता नहीं है । विरुद्ध अनुमानों के ये सभी हेतु अपने आश्रय का नाश करते हुए अपना भी नाश करते हैं, क्योंकि अगर अवयवी न रहे तो संसार परमाणुमात्र में परिणत हो जाय । फिर धर्म, धर्मी, दृष्टान्तादि की विलक्षण प्रतीतियों की उपपत्ति न होगी | और ये विरुद्ध अनुमान के हेतु बिना आश्रय के रह नहीं सकते ( अपना काम भी नहीं कर सकते ), अत: इससे प्रत्यक्षसिद्ध अवयवी नहीं हटाया जा सकता, क्योंकि अनुमान प्रत्यक्ष सापेक्ष है, अतः अनुमान प्रत्यक्ष से दुर्बल है । ( प्र ० ) प्रत्यक्ष भ्रान्त है? ( उ ० ) क्यों? ( प्र ० ) क्योंकि वह बाधक अनुमान से हटा दिया जाता है । ( उ ० ) प्रत्यक्ष जब भ्रान्तिरूप से निश्चित होगा तभी बाधक होगा, एवं बाधक अनुमान का प्रामाण्य जब तक निर्णीत नहीं है तब तक प्रत्यक्ष को भ्रान्ति रूप मानना सम्भव नहीं है, इस प्रकार इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य है । प्रत्यक्ष को बाधक मानने में यह अन्योन्याश्रय दोष नहीं है, क्योंकि उसे अपने प्रामाण्य के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं है । यह कहना भी ठीक नहीं है कि प्रवृत्ति की सफलता के लिए लोक में प्रसिद्ध स्पष्ट ज्ञानरूप प्रत्यक्ष भ्रान्त है: क्योंकि इस प्रकार नीलादि गुणसमूहों का प्रत्यक्ष भी भ्रान्त हो जाएगा । इस प्रकार सभी बाधकों का खण्डन हो गया । ( प्र ० ) छ: परमाणुओं के एक ही समय का संयोग एक एक परमाणु के छः अंशों को सिद्ध करता है, जिससे ( आप के अभिमत निरंश ) परमाणु की सत्ता ही उठ १. ' षट्केन युगपद्योग: ' इत्यादि कन्दलीकार का उठाया हुआ पूर्वपक्ष ' विज्ञप्ति -मात्रता सिद्धि ' को इस कारिका की ओर सङ्केत करता है-षट्केन युगपद्योगात् परमाणोः षडंशता । षण्णां समानदेशत्वात् पिण्डः स्यादणुमात्रकः ॥ For Private And Personal

पृष्ठ 185

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir I १० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये तेज: -सद्भावं बाधत इति चेत्? कोऽयं युगपद्योगो नाम? किमेकस्य परमाणोः षड्भिः परमाणुभिः सह युगपदुत्पाद:? किं वा युगपत्संयोगः? युगपदुत्पादस्तावत् कारणयौगपद्यादेव निरंशस्यापि यदि भवेत् को विरोधः, अथ युगपत्संयोग:, सोऽपि नानुपपन्नः, न ह्यंशविषयः संयोगो द्रव्याणाम्, निरंशस्याप्या-काशस्य तद्भावात्, अंशस्याप्यंशान्तरसद्भावे परमाणुमात्रे संयोगस्थितौ तस्या-जाती है | ( उ ० ) यह ' युगपद्योग ' क्या है? ( १ ) छ: परमाणुओं के साथ एक ही समय में एक परमाणु की उत्पत्ति ( ' युगपद्योग ' शब्द का अर्थ है? या ( २ ) एक परमाणु के साथ छः परमाणुओं का संयोग? ( इनमें प्रथम विकल्प के प्रसङ्ग में यह कहना है कि ) ( १ ) अगर अंशशून्य वस्तुओं के भी कारण हों तो फिर कथित सात परमाणु रूप निरंश वस्तुओं के कारणों का अगर एक समय में सम्बलन हो सके तो एक ही समय में सात परमाणुओं की सृष्टि में क्या बाधा है? इसमें कौन सा विरोध है? ( २ ) अगर प्रकृत युगपद्योग शब्द का दूसरा अर्थ है, तब भी कोई अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि यह नियम नहीं है कि संयोग अंशशून्य द्रव्यों का ही हो, क्योंकि अंशशून्य आकाश में भी संयोग मानते ही हैं । अगर संयोग केवल अंशों में ही माना जाय तो फिर सभी अंशों का भी अंश मानना पड़ेगा, फलतः संयोग केवल परमाणु में ही सीमित अर्थात् एक परमाणु एक ही समय में छः परमाणुओं के साथ संयुक्त होने के कारण ' षडंश: ' अर्थात् छः अंशों से युक्त है, क्योंकि एक ही स्थान में छः संयोग नहीं हो सकते । एक वस्तु के भिन्न - भिन्न अंशों में ही विभिन्न संयोगों की उत्पत्ति होती हैं । अगर आग्रहवश यह मान भी लें कि एक ही परमाणु के एक ही अंश में छः परमाणुओं के छः संयोग होते हैं तो फिर ' पिण्डः स्वादणुमात्रकः ' अर्थात् इस प्रकार सात परमाणुओं से जिस ' पिण्ड ' को उत्पत्ति होगी वह ' अणुमात्र ' अर्थात् परमाणुस्वभाव का ही होगा । इसमें स्थूलता नहीं आ सकती । कोई भी वस्तु अपने पहिले स्वरूप से अधिक लम्बी चौड़ी या अधिक वजन को इसलिए होती है कि उसके विभिन्न अंशों में विभिन्न द्रव्यों के विभिन्न संयोग होते हैं । अतः विना अंश के परमाणुओं से उत्पन्न वस्तु स्थूल नहीं हो सकती, परमाणु के एक प्रदेश में विभिन्न परमाणुओं के भिन्न - भिन्न संयोग मान लेने पर भी नहीं । एवं एक में अनेक संयोग हो भी नहीं सकते, अतः परमाणु के अनेक प्रदेश मानने होंगे । तस्मात् एक परमाणु के चार दिशाओं के चार अंशों में चार विभिन्न परमाणुओं के चार संयोग एवं परमाणु के नीचेवाले अंश में एक परमाणु का एक संयोग, एवं उसके ऊपर प्रदेश में एक परमाणु का एक संयोग, इस प्रकार छः दिशाओं से छः संयोग से ही स्थूल वस्तु को सृष्टि हो सकती है । फलतः एक परमाणु के उक्त छः दिशाओं से छ: परमाणु आकर संयुक्त होते हैं, तभी स्थूल सृष्टि होती है । तस्मात् जिसे आप परमाणु कहते हैं, वस्तुतः वह छः अंशवाली एक वस्तु है । फलतः निरवयव परमाणु की सत्ता ही अप्रामाणिक है । For Private And Personal

पृष्ठ 186

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 186 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १११ प्रशस्तपादभाष्यम् वायुत्वाभिसम्बन्धाद्वायुः । संयोगविभागपरत्वापरत्वसंस्कारवान् । स्पर्शसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्व-स्पर्शो s स्यानुष्णाशीतत्वे वायुत्व जाति के सम्बन्ध से वायु का व्यवहार करना चाहिए । यह स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व और संस्कार इन नौ गुणों युक्त है । इसमें अपाकज अनुष्णाशीत स्पर्श ही है ये सभी न्यायकन्दली प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गाच्च, किन्तु स्वरूपविषयः । एवञ्चेत्, सांशद्रव्यस्येव निरंशस्यापि परमाणोरेकस्य युगपत्कारणसम्भवे सत्यनेकसंयोगाधिकरणत्वमुपपद्यत एवे न तत्प्रतिक्षेपः । प्रत्यक्षं पृथिव्यादित्रयं व्याख्यायाप्रत्यक्षद्रव्यव्याख्यानावसरे नित्या-नित्योभयस्वभावद्रव्यनिरूपणस्य प्रकृतत्वाद्वायुं व्याचष्टे - वायुत्वाभिसम्बन्धा-द्वायुरिति । व्याख्यानं पूर्ववत् । तस्य गुणान् कथयति - स्पर्शेत्यादि । अत्रापि पूर्ववद् व्याख्या । यादृशः स्पर्शो वायौ वर्त्तते तं दर्शयति-- स्पर्श इति । पृथिवीस्पर्शः पाकजः परमाणुषु, तत्पूर्वकश्च स्वकार्येषु । अस्य तु स्पर्शोऽपाकज हो जाएगा, जो कि केवल अंश ही है ( उसका कोई अंश नहीं है ), अतः संयोग को अंश की अपेक्षा नहीं है द्रव्य के स्वरूप की अपेक्षा है । तस्मात् कारणों के रहने पर एक समय अंश से युक्त द्रव्यों की तरह अंशशून्य परमाणु में भी अनेक परमाणुओं के संयोग की अधि-करणता युक्तिविरुद्ध नहीं है, अतः अंशरहित परमाणु की सत्ता में कोई विवाद नहीं हैं । प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात होनेवाले पृथिवी, जल और तेज इन तीन पदार्थों के निरूपण के बाद प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात न होनेवाले द्रव्यों के निरूपण की बारी आती है, एवं पृथिवी प्रभृति कहे हुये द्रव्य नित्य और अनित्य दोनों ही प्रकार के हैं, अतः पूर्वागत होने के कारण नित्यानित्यस्वभाव के द्रव्य का ही निरूपण क्रम से प्राप्त है । अप्रत्यक्ष द्रव्यों में से नित्यानित्यस्वभाव के कारण वायु का निरूपण ही क्रमप्राप्त है । तदनुसार “ वायुत्वाभिसम्बन्धाद्वायुः " इत्यादि से वायु का निरूपण करते हैं । इस वाक्य की व्याख्या " पृथिवीत्वादिसम्बन्धात् पृथिवी " इत्यादि वाक्यों की तरह करनी चाहिए । ' स्पर्शः ' इत्यादि से वायु के गुणों का वर्णन करते हैं । इसकी भी व्याख्या पृथिवी प्रभृति द्रव्यों के गुण के बोधक वाक्यों की तरह करनी चाहिए । पार्थिव परमाणुओं में पाकज स्पर्श है, अतः उन परमाणुओं के कार्य और पार्थिव द्रव्यों में भी पाकज स्पर्श ही है, क्योंकि कार्य के गुण कारण के गुणों से उत्पन्न होते हैं । इस ( वायु ) का स्पर्श भी अपाकज ही है, अतः यह स्पर्श वायु का लक्षण है । यह स्पर्श अपाकज इसलिए है कि For Private And Personal

पृष्ठ 187

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 187 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ११२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशतपादभाष्यम् [ द्रव्ये वायु-सत्यपाकजः, गुणविनिवेशात् सिद्ध: । अरूपिष्वचाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । तृणकर्मवचनात् संस्कारः । स चायं द्विविधोऽणुकार्य्य-गुण ( कणाद के ) गुणविनिवेशाधिकार के सूत्रों से इसमें सिद्ध समझना चाहिए । ' अरूपिष्वचाक्षुषाण ' ( ४।१।१२ ) ' रूप शून्य द्रव्यों के संख्यादि सात गुण आँखों से नहीं देखे जाते ' सूत्रकार की इस उक्ति में वायु में संख्यादि सात गुणों की सत्ता समझनी चाहिए । ' तृणे कर्म्म वायुसंयोगात् ' ( ५।१।१४ ) ' वायु प्रभृति द्रव्यों के संयोग से तृण में क्रिया उत्पन्न होती है ' महर्षि कणाद की इस उक्ति से वायु में संस्कार नाम के गुण की सत्ता समझनी चाहिए । इसके भी ( १ ) अणु और ( २ ) न्यायकन्दली इत्यती वैधर्म्यम् । अपाकजत्वञ्चास्य पृथिव्यनधिकरणत्वादुदकतेजःस्पर्शवत् । अनुष्णाशीतत्वे सतीत्युदक तेजःस्पर्शाभ्यां वैधर्म्यमुक्तम् । अयञ्च द्वितीया-ध्यायात् - " वायुः स्पर्शवान् " ( २।११४ वै ० सू ० ) इति सूत्रेण वायौ सिद्ध इत्याह-गुणवनिवेशादिति । अरूपिष्वचाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । रूपरहितेषु द्रव्येषु सङ्ख्यादयश्चाक्षुषा न भवन्तीत्यभिधानाद-रूपषु सङख्यादीनां सद्भावः कथितः, अन्यथा तद्वतिनां तेषामप्रत्यक्षत्वाभि-धानमसम्बद्धं स्यात् । तृणकर्मवचनात् संस्कार इति । " तृणे कर्म वायोः संयो-गात् " ( ५।१।१४ वै ० सू ० ) इति वचनाद् वायौ संस्कारो दर्शितः, वेगरहितद्रव्य-संयोगस्य कर्महेतुत्वानुपलम्भात् । तस्य भेदनिरूपणार्थं माह - स चायमिति । स चेति स्मृत्युत्थापितो बुद्धिसन्निहितः पश्चादयमिति प्रत्यक्षवत् परामृश्यते । पृथिवी में वह नहीं है, जैसे कि जल और तेज का स्पर्श । अनुष्णाशीतत्वे सति ' इस पद से ( इस अनुष्णाशीत स्पर्श में ) तेज और जल के स्पर्श से ( अपाकजत्वरूप से ) समानता होने पर भी ( अनुष्णाशीतत्वरूप से ) विभिन्नता कही गई है । यह ' स्पर्शवान् वायुः " ( २।१ ४ ) इस सूत्र से सिद्ध है । यह विषय ' गुणविनिवेशात्सिद्ध: ' इस वाक्य से कहा गया है । रूप से रहित द्रव्य के संख्यादि सात गुणों को चूंकि सूत्रकार ने ' अचाक्षुष ' कहा है ( ४ | १ | ११ ), अतः इससे ही वायु में संख्यादि सात गुणों की सत्ता भी जाननी चाहिए । अगर ऐसा न हो तो रूपशुन्य द्रव्यों के संख्यादि गुणों की अचाक्षुषत्व की सूत्रकार की उक्ति असङ्गत हो जाएगी । ' तृणकर्मवचनात्संस्कारः ' अर्थात् सूत्रकार ने ' तृणे कर्म वायुसंयोगात् ( ५ | १ | १४ ) इस सूत्र के द्वारा वायु में संस्कार नाम के गुण की सत्ता कही है, क्योंकि वेग से रहित द्रव्य का संयोग कर्म को उत्पन्न करते नहीं देखा जाता । स चायम् ' इत्यादि वाक्य For Private And Personal

पृष्ठ 188

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] १५ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ११३ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal भावात् । तत्र कार्यलक्षणश्चतुर्विधः, शरीरमिन्द्रियं विषयः प्राण इति । तत्रायोनिजमेव शरीरं मरुतां लोके, पार्थिवावयवोपष्टम्भाच्चो-पभोगसमर्थम् । इन्द्रियं सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकम्, पृथिव्याद्यनभि-कार्य ये दो भेद हैं । इनमें कार्यरूप वायु ( १ ) शरीर ( २ ) इन्द्रिय ( ३ ) विषय और ( ४ ) प्राणभेद से चार प्रकार के हैं । इनके शरीर अयोनिज ही हैं, जो केवल वायुलोक में ही प्रसिद्ध हैं । इस शरीर में पार्थिव अवयवों के विलक्षण संयोग सेसुखऔर दुःख के अनुभव की क्षमता रहती है । सभी प्राणियों के स्पर्श के प्रत्यक्ष का साधन द्रव्य ही इन्द्रिय रूप वायु है । वायु के जिन अवयवों का बल पार्थिवादि न केवलं पृथिव्यादयो द्विविधाः, अयमपि द्विविध इति चार्थः । कार्य्यलक्षण-चतुविधः कार्य्यस्वभाव इत्यर्थः । चातुविध्यं कथमित्यत आह- शरीरमिन्द्रियं विषयः प्राण इति । तेषां मध्ये शरीरं जात्या निर्द्धारयति -- तत्र शरीरमिति । अयोनिजमेव न तु पार्थिवशरीरवद् योनिजमयोनिजमपीत्यर्थः । मरुतां लोक इति स्थानसङ्कीर्त्तनम् । भूयसां पार्थिवावयवानां निमित्तकारणभूतानामुपष्ट-म्भात् संयोगविशेषात् स्थिरं संहतस्वभावमुत्पन्नं पार्थिवशरीरवदुपभोगसमर्थम् । इन्द्रियं सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकमिति । यत् सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भक-वायु के प्रकारों का निरूपण करने के लिए लिखते हैं । ' सच ' इस शब्द से स्मृति के द्वारा बुद्धि के अत्यन्त निकट ले आने के बाद वायु प्रत्यक्ष वस्तु की तरह कहा गया है । केवल पृथिव्यादि ही दो दो प्रकार के नहीं हैं किन्तु यह वायु भी उन्हीं की तरह दो प्रकार का है, यही ( ' स च ' इस वाक्य में प्रयुक्त ) ' च ' शब्द से सूचित होता है । ' कार्य-लक्षणश्चतुर्विध: ' इस वाक्य में आनेवाले ' कार्यलक्षण ' शब्द का ' कार्यस्वभाव ' अर्थ है । यह चार प्रकार का कैसे है? इसी प्रश्न का उत्तर ' शरीरमिन्द्रियम् ' इत्यादि वाक्य से देते हैं । अर्थात् ( १ ) शरीर, ( २ ) इन्द्रिय, ( ३ ) विषय, और ( ४ ) प्राण इन भेदों से कार्यरूप वायु चार प्रकार का है । उनमें ' तत्र शरीरम् ' इत्यादि से शरीर रूप वायु को जाति के द्वारा निर्धारित करते हैं । अर्थात् वायवीय शरीर केवल अयोनिज ही है, पार्थिव शरीर की तरह योनिज और अयोनिज भेद से दो प्रकार का नहीं । ' मरुतां लोके ' यह वाक्त्र इस शरीर के स्थान का निर्देश करता है । निमित्तकारण-रूप बहुत से पार्थिव अवयवों के ' उपष्टम्भ ' अर्थात् विशेश प्रकार के संयोग से यह शरीर भी ठोस आकार का उत्पन्न होता है और इसी से पार्थिवादि शरीरों की तरह उपभोग कर सकता है । ' इन्द्रियं सर्वप्राणिनां स्पर्शोपलम्भकम् ' अभिप्राय यह है कि सभी प्राणियों

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ११४ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये वायु-भूतैर्वाय्वयवैरारब्धं सर्वशरीरव्यापि त्वगिन्द्रियम् । विषयस्तूपलम्य-विरोधी शक्तियों से नष्ट नहीं हुआ है, उन वायवीय अवयवों से इसकी सृष्टि होती है । यह शरीर के भी सभी अंशों में रहती है । इस इन्द्रिय का नाम है त्वचा । विषयरूप वायु प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात स्पर्श का आश्रय, एवं स्पर्श, शब्द, धृति और न्यायकन्दली मिन्द्रियं तत् पृथिव्याद्यनभिभूतैरप्रतिहतसामथ्र्यैव य्ववयवैरारब्धम्, अतो विशिष्टो-त्पादादिन्द्रयं स्यादित्यर्थः । तस्य सद्भावे तावत् स्पर्शोपलब्धिरेव प्रमाणम् । वायवीयत्वञ्चास्य रूपादिषु मध्ये स्पर्शस्येवाभिव्यञ्जकत्वादङ्गसङ्गिसलिल-शैत्याभिव्यञ्जक समीकरणवत् । तच्च सर्वशरीरव्यापि, सर्वत्र तत्कार्य्यस्य स्पर्शो-पलम्भस्य भावात् । त्वगिन्द्रियमिति समाख्या त्वचि स्थितमिन्द्रियं त्वगिन्द्रिय-मित्युच्यते, तत्स्थे तदुपचारात्, त्वचा सर्वेन्द्रियाधिष्ठानानि व्याप्तानि, सत्यां त्वचि रूपादिग्रहणमसत्यामग्रहणमिति त्वगिन्द्रियं सर्वार्थम्, न तु स्पर्शमात्र ग्राहकमिति केचित् तदयुक्तम्, अन्धाद्यभावप्रसङ्गात्, तत्तदधिष्ठानभेदेन शक्ति-भेदाभ्युपगमे प्रकारान्तरेणेन्द्रियभेदाभ्युपगमः । विषयब्यवस्थानियमनिरूपणार्थम् - विषयस्त्विति । उपलभ्यमान-स्पर्शस्याधिष्ठानभूत आश्रयो यः स विषय इति । किमस्यास्तित्वे प्रमाणम्? के प्रत्यक्ष का कारण यह इन्द्रिय, पार्थिव अवयवों से अनभिभूत है, अर्थात् जिन वायवीय अवयवों की शक्ति का पार्थिवादि विरोधी शक्तियों से नाश नहीं हुआ है, उनसे बनी हुई है, अतः यह इन्द्रिय है । स्पर्श के प्रत्यक्षरूप प्रमाण से ही इस इन्द्रिय की सत्ता समझी जाती है । यह इन्द्रिय चूँकि रूपादि गुणों में से केवल स्पर्श के प्रत्यक्ष का ही उत्पादक है, अतः पसीने की शीतता को व्यञ्जित करनेवाले समीर की भाँति यह ( इन्द्रिय ) भी वायवीय सिद्ध होती है । शरीर के सभी प्रदेशों में स्पर्श का प्रत्यक्ष होता है, अतः यह इन्द्रिय शरीर के सभी प्रदेशों में है । चूँकि यह इन्द्रिय त्वचा में रहती है, इसलिए इसका नाम ' त्वक् ' है । त्वचारूप अधिकरण में रहने के कारण ही लक्षणा वृत्ति के द्वारा उसके आधेयरूप इन्द्रिय में भी ' त्वक् ' शब्द का प्रयोग होता है । ( प्र ० ) त्वगिन्द्रिय अगर शरीर के सभी प्रदेशों में है तो फिर उसका अन्वय और व्यतिरेक स्पर्श की तरह रूपादि गुणों में भी है, अतः त्वगिन्द्रिय मात्र एक ही इन्द्रिय मान ली जाय, इससे ही रूपादि प्रत्यक्षों का भी निर्वाह हो सकेगा? ( उ ० ) उक्त कथन असङ्गत है क्योंकि इससे संसार से अन्धापन का मिट जाना मानना पड़ेगा | अगर अधिष्ठान के भेद से त्वचा में ही रूपादि प्रत्यक्ष की विभिन्न शक्तियाँ मानें तो फिर वह वस्तुतः दूसरे शब्दों में अनेक इन्द्रियों की सत्ता माननी जैसी ही होगी । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir करणम् ] भावानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ११५ मानस्पर्शाधिष्ठानभृतः मेघादिप्रेरणधारणादिसमर्थः । स्पर्शशब्दधृति कम्पलिङ्ग स्तिर्यग्गमनस्वभावो कम्प इन चार हेतुओं से अनुमेय, और कुटिल गति से चलनेवाला है । मेघ आदि वस्तुओं को इधर उधर जाने में प्रेरित करना और उनको गिरने न देना विषयरूप वायु के कार्य हैं । न्यायकन्दली प्रत्यक्षमेव, त्वगिन्द्रियव्यापारेण वायुर्वातीत्यपरोक्षज्ञानोत्पत्तेरिति कश्चित्, तन्न युक्तम्, स्पर्शव्यतिरिक्तस्य वस्त्वन्तरस्यासंवेदनात्, अपरोक्षज्ञाने तु स्पर्श एव प्रतिभाति नान्यत्, यदपि वायुर्वातीति ज्ञानं तदभ्यास-पाटवातिशयाद् व्याप्तिस्मरणाद्यनपेक्षं स्पर्शेनानुमानम्, चक्षुषेव वृक्षादि-गतिक्रियोपलम्भात् । शीतोष्णस्पर्शभेदप्रतीतौ वायुप्रत्यभिज्ञानमपि तदाश्रयोपनायक-द्रव्यानुमानादेव । त्वगिन्द्रियेण तु शीतोष्णस्पर्शाभ्यामन्यस्य न प्रतिभासोऽस्ति । स्पार्शनप्रत्यक्षो वायुरुपलभ्यमान स्पर्शाधिष्ठानत्वाद् घटवदित्यनुमानं शशादिषु विषयरूप वायु इतने ही हैं, इससे अधिक नहीं, इससे कम भी नहीं ' इस व्यवस्था के लिए ' विषयस्तु ' इत्यादि लिखते हैं । अर्थात् पृथिवी, जल और तेज के स्पर्श से विलक्षण जिस स्पर्श की उपलब्धि होती है, उस स्पर्श का आश्रय ही ' विषय ' रूप वायु है । ( प्र ० ) इस स्पर्श के आश्रयरूप द्रव्य की सत्ता में प्रमाण क्या प्रत्यक्ष ही प्रमाण है? ( उ ० ) कोई कहते हैं कि उसके अस्तित्व में है, क्योंकि गिन्द्रिय के व्यापार से ही ' वायु चल रही है ' इस प्रकार की अपरोक्ष प्रतीति होती है । किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि इस अपरोक्ष ज्ञान में स्वगिन्द्रिय के व्यापार के द्वारा स्पर्श से भिन्न कोई और पदार्थ भासित नहीं होते, अर्थात् उस अपरोक्ष ज्ञान में स्पर्श को छोड़कर ( उसके आश्रयादि ) और कोई वस्तु प्रतिभासित नहीं होती । ' हवा चलती है ' यह ज्ञान भी स्पर्शहेतुक अनुमिति ही है । यह और बात है कि बार बार स्पर्शहेतुक वायु की अनुमिति से उत्पन्न विशेष प्रकार की पटुता से उक्त अनुमिति में व्याप्ति की अपेक्षा नहीं होती, जैसे कि चक्षु से वृक्षादिगत क्रिया की अनुमिति में व्याप्ति को अपेक्षा नहीं होती । उस स्पर्श में शीत और उष्ण से वैलक्षण्य की प्रतीति के बाद जो यह प्रत्यभिज्ञा होती है कि ' यह स्पर्श वायु का है ' वह भी स्पर्श के आश्रयरूप द्रव्य के अनुमान से ही होती है । तस्मात् त्वगिन्द्रिय से शीतोष्णादि स्पर्शो से अतिरिक्त किसी और वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं होता है । ' बायु का स्पार्शन प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष स्पर्श का आश्रय है, जैसे कि For Private And Personal