प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 191–200

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 191–200

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ११६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये वायु-पशुत्वेन शृङ्गानुमानवदनुपलब्धिबाधितम् । द्रव्यस्य स्पार्शनत्वं चाक्षुषत्वेन व्याप्तमवगतं घटादिषु चाक्षुषत्वस्य च वायावभावस्तेनात्र शक्यं स्पार्शनत्व-निवृत्त्यनुमानमेतत्, अतस्तस्याप्रत्यक्षस्य सद्भावेऽनुमानमुपन्यस्यति - स्पर्शशब्द-धृतिकम्पलिङ्ग इति । स्पर्शश्च शब्दश्च धृतिश्च कम्पश्चेति ते लिङ्गानि यस्येति बहुव्रीहिः । योऽयं रूपादिरहितः स्पर्शः प्रतीयते स क्वचिदाश्रितः, स्पर्शत्वात्, इतरस्पर्शवत् । न चास्य पृथिव्यैवाश्रयो रूपविप्रयोगात् । अस्त्यत्राप्यनुद्भूतं रूपमिति चेन्न, उपलभ्यमानस्य पार्थिवस्य स्पर्शस्योपलभ्यमानरूपेणैव सहाव्य भिचारोपलम्भात्, न चेह रूपस्यास्त्युपलम्भस्तस्मान्नायं पार्थिवः स्पर्शः । न चोदकतेजसोरयमाश्रितोऽनुष्णाशीतत्वाद् घटादिस्पर्शवत् । नाव्यमूर्तेष्वाकाश-कालदिगात्मसु वर्त्तते, स्पर्शस्य मूर्त्ताव्यभिचारोपलम्भात् । मनसाञ्च स्पर्शवत्त्वे परमाणूनामिव तेषां सजातीयद्रव्यारम्भकत्वं स्यात्, न चैवम्, तस्मात् तेषामपि न भवति, अतो यत्रायमाश्रितः स वायुरिति परिशेषः । घटादि ' यह अनुमान शश ( खरहे ) में पशुत्व हेतु से सींग के अनुमान की तरह अनु-पलब्धिमूलक बाध दोष से युक्त है । एवं त्वगिन्द्रिय द्वारा वायु के प्रत्यक्ष होने में बाधक अनुमान भी है कि ' स्पार्शन प्रत्यक्ष उसी द्रव्य का होता है, जिसका कि चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है ' यह व्याप्ति घटादि में ज्ञात है एवं वायु में चाक्षुषत्व नहीं है, तस्मात् ' वायु का स्पार्शन प्रत्यक्ष नहीं होता है ' अतः प्रत्यक्ष न होनेवाले वायु की सत्ता में " स्पर्श-शब्दधृतिकम्पलिङ्गः ” इत्यादि से अनुमान प्रमाण दिखलाया गया है । ' स्पर्शश्च शब्दश्च धृतिश्च कम्पश्चेति ते लिङ्गानि यस्य ' इस विग्रह के अनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि स्पर्श, शब्द, धृति और कम्प ये चार जिसके ज्ञापक हैं, वही ' वायु ' है । ( १ ) ( सामानाधिकरण्य सम्बन्ध से ) रूपरहितत्व विशिष्ट जिस स्पर्श का प्रत्यक्ष होता है उसका कोई आश्रय अवश्य है, क्योंकि वह भी स्पर्श है, जैसे कि और वस्तुओं का स्पर्श । प्रतीयमान इस स्पर्श का आश्रय पृथिवी नहीं है, क्योंकि इस स्पर्श में रूप का ( सामानाधिकरण्य ) सम्बन्ध नहीं है । ( प्र ० ) इसमें भी रूप है ही, किन्तु अनुभूत है? ( उ ० ) नहीं, क्योंकि उपलब्धि के योग्य पृथिवी के स्पर्श का उपलब्धियोग्यरूप साथ ही नियत सम्बन्ध सभी जगहों में देखा जाता है, किन्तु इस स्पर्श के साथ रूप की उपलब्धि नहीं होती है, तस्मात् यह स्पर्श पार्थिव नहीं है । यह स्पर्श तेज और जल का भी नहीं है, क्योंकि यह अनुष्णाशीत है, जैसे कि घटादि का काल, दिकू और आत्मा इन अमूर्त द्रव्यों का भी नहीं है, स्पर्शं । यह स्पर्श आकाश, क्योंकि यह अव्यभिचरित नियम है कि स्पर्श मूर्त द्रव्यों में ही रहे । मन में अगर स्पर्श मानें तो फिर उनमें For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ११७ एवं शब्दोऽप्यस्य लिङ्गम्, योऽयं पर्णादिष्वकस्माच्छुकशुकाशब्दः श्रूयते तस्याद्यः शब्दः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगजः, अविभज्यमानावयवद्रव्य सम्बन्धित्वे सत्यादि-शब्दत्वाद् दण्डाहत भेरीशब्दवत्, यश्चासौ स्पर्शवान् स वायुः । आकाशादीनां स्पर्शाभावात् पृथिव्युदकतेजसां च रूपवतां तच्छब्दहेतुत्वे प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । विभागजशब्दव्यवच्छेदार्थमविभज्यमानावयवद्रव्यसम्बधित्वे सतीत्युक्तम् । एवमन्तरिक्षे पर्णादीनां धृतिरवस्थितिः स्पर्शव द्रव्यसंयोगकार्य्या प्रयत्नवेगादिकारणाभावे सति धृतित्वाज्जलोपरि स्थितपर्णादिवत् । यच्च तत् स्पर्शद्द्रव्यं न तत् पृथिव्यादित्रयमप्रत्यक्षत्वादेवेति द्रव्यान्तरसिद्धिः । इषोः पक्षिणाञ्च स्थितिव्यवच्छेदार्थ प्रयत्नादिकारणाभावः । तथा वृक्षादीनां कम्प विशेषः स्पर्शवद्रव्यसंयोगजो विशिष्ट-अपने सजातीय द्वयणुकरूप दूसरे द्रव्य की समवायिकारणता माननी पड़ेगी, किन्तु उनसे किसी द्वयणुकादि द्रव्यों की उत्पत्ति नहीं होती है । तस्मात् यह स्पर्श मन का भी गुण नहीं है, अतः परिशेषानुमान से यह सिद्ध होता है कि उक्त स्पर्श का आश्रय ही ' वायु ' है । ( २ ) इसी प्रकार शब्द भी वायु का ज्ञापक हेतु है । पत्तों में कभी कभी जो शुक शुक प्रभृति शब्द सुनते हैं, उनका पहिला शब्द स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य के संयोग से उत्पन्न होता है, क्योंकि द्रव्यों के विभाग से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है. और वह पहिला शब्द है, जैसे डंडे से पिटे हुए नगाड़े का शब्द | उक्त स्पर्श का आश्रय ही वायु है । क्योंकि आकाशादि में कोई भी स्पर्श नहीं है । पृथिवी, जल और तेज में से किसी को उसका आश्रय मानने से उसके प्रत्यक्ष की आपत्ति होगी । उस शब्द - श्रवणस्थल में पृथिव्यादि किसी द्रव्य का प्रत्यक्ष नहीं होता है विभागज शब्द में व्यभिचार के वारण के लिए ( ' द्रव्यों के विभाग से इसकी उत्पत्ति नहीं होती है ' हेतु के इस अंश का बोधक ) ' अविभज्यमानावयव-द्रव्यसम्बन्धित्वे सति ' यह वाक्य कहा है । ( ३ ) इसी तरह आकाश में पत्तों का ठहरना स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य के संयोग से ही होता है, क्योंकि ठहरने के प्रयत्न और वेग प्रभृति कारण वहाँ नहीं हैं । और वह भी ठहरना ही है, जैसे पानी के ऊपर ठहरे हुये पत्ते का ठहरना प्रभृति । इस स्पर्श का आश्रय पृथिवी, जल और तेज रूप द्रव्य भी नहीं हैं, क्योंकि कह चुके हैं कि ' फिर उनका प्रत्यक्ष चाहिए ' किन्तु उनमें स किसी का भी प्रत्यक्ष नहीं होता है, अतः पृथिव्यादि आठ द्रव्यों से भिन्न वायु नाम के द्रव्य की सिद्धि होती है । तीर और चिड़ियों की आकाश में जो स्थिति है, उसमें व्यभिचार वारण करने के लिए ( ' स्थिति के वेगादि और कारणों के न रहने पर भो ' इस अर्थ के बोधक ) हेतु में, प्रयत्नादिकारणाभाव ' का निवेश है । ( ४ ) वृक्षप्रभृति द्रव्यों का विशेष प्रकार का कम्प स्पर्श से संयोग से उत्पन्न होता है, क्योंकि वह भी विशेष प्रकार का कम्प है, युक्त किसी द्रव्य के जैसे कि नदी के वेग For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ११८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये वायु-तस्याप्रत्यक्षस्यापि नानात्वं सम्मूर्च्छनेनानुमीयते । सम्मूर्च्छनं पुनः । प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात न होने पर भी वायु में अनेकत्व का अनुमान ' समूर्च्छन ' से होता है । विरुद्ध दो दिशाओं में गतिशील समानवेग की दो वायुओं न्यायकन्दली कम्पत्वाद् नदीपूराहत वेतसादिवनकम्पवत् । भूकम्पेन व्यभिचार इति चेन्न, तस्यान्य-हेतुत्वावगमात् स्पर्शवद्रव्यसंयोगजे तु विशिष्ट कम्पत्वमेव प्रमाणमित्यव्यभि-चारः । नतु यदेव द्रव्यं स्पर्शेनानुमितं तदेव शब्दादिभिरप्यनुमीयते, न तु प्रतिलिङ्ग द्रव्यान्तरानुमिति, किमिह प्रमाणं येनैतदुच्यते स्पर्शशब्द धृतिकम्प-लिङ्गो वायुरिति? इदं प्रमाणम्, स्वर्शानुमितद्रव्य काय्र्यत्वेनैव शब्दादीनामुप-पत्तौ सम्भवन्त्यां द्रव्यान्तरकल्पना वैयर्थ्यमिति । एवं स्थिते वायौ तद्धमं दर्शयति- तिर्य्यग्गमनस्वभाव इति । तिर्य्यग्गमनं स्वभावो यस्येति । मेधादिप्रेरणं इतस्ततो नयने । धारणे गुरुत्वप्रतिबन्धे । आदि-शब्दाद् वर्षणे समर्थः । मेघादीत्यादिपदेन यानपात्रादिपरिग्रहः, तेषामपि वायुना प्रेमाणत्वात् । अनुमीयमानेष्वाकाशादिष्वेकानेकत्वोपलब्धौ संशये सति तद्व्युदासार्थमाह-से आहत किनारे के बेतवन का कम्पन । ( प्र ० ) यह हेतु तो भूकम्प में व्यभिचरित है? ( उ ० ) भूकम्प का कुछ और ही कारण समझा जाता है । भूकम्प की अपनी एक विशिष्टता है, जिससे समझा जाता कि भूकम्प स्पर्शयुक्त किसी द्रव्य के संयोग से ही उत्पन्न । ( प्र ० ) ' शब्द हेतु से जिस द्रव्य होता है । तस्मात् उक्त हेतु में कोई व्यभिचार नहीं है का अनुमान होता है, उसी द्रव्य का कम्पादि हेतुओं से भी अनुमान होता है, शब्दादि प्रत्येक हेतु से विभिन्न द्रव्य का अनुमान नहीं होता है ' इसमें क्या प्रमाण है? एवं क्या प्रमाण है कि कथित शब्दादि हेतुओं में से सभी वायु के ही ज्ञापक हैं? ( उ ० ) इसमें यही प्रमाण है कि स्पर्श से अनुमित वाय नाम के द्रव्य से ही उक्त शब्दादि कार्यों की उत्पत्ति होगी. उसके लिए और द्रव्यों की कल्पना व्यर्थ है । इस प्रकार वायु के सिद्ध हो जाने पर ' तिय्यंग्गमनस्वभावः ' इत्यादि से उसका धर्म दिखलाते हैं । तिर्य्यग्गमनं स्वभावो यस्य ' इस बहुव्रीहि समास से उक्त शब्द निष्पन्न है । मेघ आदि के ' प्रेरण ' में अर्थात् इधर - उधर ले जाने में, और ' धारण ' में, गुरुत्वके प्रतिरोध में, एवं ' आदि ' पद से उनको बरसाने में समर्थ है । ' मेघादि ' पद में आनेवाले ' आदि ' पद से सवारी वर्त्तन प्रभृति द्रव्यों का सङ्ग्रह समझना चाहिए । आकाशादि द्रव्यों में एकत्व और अनेकत्व दोनों ही उपलब्ध होते हैं ( इनमें आकाश, For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् ११६ प्रशस्तपादभाष्यम् सन्निपातः सोऽपि सावय-समानजवयोर्वावविरुद्ध दिकक्रिययोः विनोवोरूर्ध्वगमनेनानुमीयते तदपि तृणादिगमनेनेति । का मेल ही ( प्रकृत में ) ' सम्मूर्च्छन ' शब्द का अर्थ है । अवयवयुक्त दो वायुओं के ऊपर जाने की क्रिया से समूर्च्छन का भी अनुमान ही होता है । एवं तृणादि द्रव्यों के ऊपर जाने की क्रिया से ही सावयव वायुओं की ऊपर जाने की क्रिया का भी अनुमान ही होता है । न्यायकन्दली तस्याप्रत्यक्षस्यापीति । सम्मूर्च्छनमपि न ज्ञायते तदर्थमाह- सम्मूर्च्छनमिति । विरुद्धायां दिशि क्रिया ययोस्तयोः सन्निपातः परस्परगतिप्रतिबन्धहेतुः संयोगविशेषः सम्मूर्च्छनम्, तेन वायोर्नानात्वमनुमीयते एकस्य संयोगाभावात्, एकदिक्प्रस्थितयो -र्यथाक्रमं गच्छतोः सम्मूर्च्छनाभाव इति विरुद्ध दिविक्रययोभिन्नविविक्रययोरित्यर्थः । असमान वेगयोः सम्मूर्च्छनं न भवति, एकेनापरस्य विजयात् तदर्थं समानजव-योरिति । अप्रत्यक्षयोर्यथा नानात्वमप्रत्यक्षं तथा संयोगेऽपीति मत्वेदमाह -सोऽपीति । सोऽपि सन्निपातोऽपि । सावयविनोर्वाय्वोरूर्ध्वगमनेनानुमीयते वायो-रूद्र्ध्वगमनं परस्परव्याहतिपूर्वकमन्यकारणासम्भवे सति तिर्य्यग्गतिस्वभावद्रव्यो-दुर्ध्वगतित्वात् परस्पराहतजलतरङ्गोर्ध्वगमनवत् । अवयविनोरिति वक्तव्ये काल और दिक् ये तीनों एक एक ही हैं एवं आत्मा और मन अनेक हैं ), अतः ( प्रत्यक्ष क अविषय और अनुमान से सिद्ध ) वायु में संशय होता है कि वायु एक है या अनेक? इसी संशय को हटाने के लिए ' तस्याप्रत्यक्षस्यापि ' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । यह भी नहीं समझते कि ' संमूच्छेन ' क्या है? इसी को समझाने के लिए ' संमू-च्र्छनम् ' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । अर्थात् समानवेग की जिन दो वायुओं की गति दो विरुद्ध दिशाओं में हैं, उन दोनों का ' संनिपात ' अर्थात् दोनों की गति को प्रतिरुद्ध करने-वाला विशेष प्रकार का संयोग ही संमूच्र्छन ' है । न्यूनाधिक वेग की वायुओं का संमूच्र्छन नहीं हो सकता है, क्योंकि अधिक वेगवाली न्यून वेगवाली के ऊपर विजय पा जाती है, अतः लिखा है कि ' समानजवयोः ' । आँखों से न दीखनेवाली वस्तुओं के नानात्व का भी जैसे प्रत्यक्ष नहीं होता है, उसी प्रकार उन वस्तुओं में रहनेवाले संयोग का भी प्रत्यक्ष नहीं होता है । यही मानकर ' सोऽपि ' इत्यादि ग्रन्थ लिखते । ' सो-ऽपि ' अर्थात् उक्त संयोग विशेष रूप संनिपात भी अवयवों से युक्त दो वायुओं की ऊपर की गति से अनुमति होता है, अर्थात् दोनों वायुओं का ऊपर जाना उनके परस्पर-संघर्ष से उत्पन्न होता है, क्योंकि उनके ऊपर जाने का कोई दूसरा कारण सम्भावित नहीं है अथ च वह गति कुटिल स्वभाव के दो द्रव्यों की है, जैसे कि परस्पर संघर्ष से For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १२० न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये वायु-प्राणोऽन्तःशरीरे रसमलधातूनां प्रेरणादिहेतुरेकः सन् क्रियाभेदाद-पानादिसंज्ञां लभते । शरीर के अन्दर रहनेवाली एवं उसके रस मल और धातु के प्रेरणादि क्रियाओं का कारण वायु ही ' प्राण ' है । यह एक होते हुए भी क्रियाओं की भिन्नता के कारण ' अपान ' प्रभृति नामों से भी कही जाती है । न्यायकन्दली सावयविनोरित्युक्तम्, अवयवानामप्यवयवित्वविवक्षया स्थूलवायुपरिग्रहार्थम्, अणुपरिमाणस्य तृणादिप्रेरणसामर्थ्याभावात् । ऊर्ध्वगमनमपि तयोर प्रत्यक्षमिति तत्प्रतिपत्तावनुमानमाह - तृणादिगमनेनानुमीयत इति । लोके योगशास्त्रे च विषयवायोर्भेदेन प्रसिद्धस्य प्राणाख्यस्य स्वरूप-माह - प्राणोऽन्तः शरीर इति । अन्तःशरीरे यो वायुर्वर्त्तते स प्राण इत्युच्यते । तस्या-र्थक्रियां कथयति — रसमलघातूनां प्रेरणादिहेतुरिति । रस इति भुक्तवतामाहारेषु पाकजोत्पत्तिक्रमेणोत्पन्नस्य द्रव्यविशेषस्य ग्रहणम् । मल इति मूत्रपुरीषयोरभि-धानम् । धातवस्त्वङमांसास्थिशोणितादयः तेषां प्रेरणस्येतस्ततो नयनस्य, आदि-शब्दाद् व्यूहनस्य च हेतुः । तस्यैकत्वानेकत्वसंशये सत्याह – एकः सन्निति । प्राप्त जल के तरङ्गों की ऊपर की गति । परमाणु को छोड़कर सभी अवयव अवयवी भी हैं, इस अभिप्राय से स्थूल वायु के सङ्ग्रह के लिए ' अवयविनोः ' यह करने पर काम चलने की सम्भावना रहने पर भी ' सावयविनो: ' यह पद कहा है, क्योंकि अणु-परिमाणवाला द्रव्य तृणादि को इधर उधर नहीं ले जा सकता है । उन दोनों वायुओं की ऊर्ध्व गति भी अप्रत्यक्ष ही है, अतः उसके ज्ञान के लिए अनुमान का प्रयोग ' तृणादिगमनेनानुमीयते ' इस वाक्य से दिखलाये हैं । जनसाधारण में और योगशास्त्र में भी विषयरूप वायु से भिन्न रूप में प्रसिद्ध, प्राण नाम के वायु का स्वरूप ' प्राणोऽन्तः शरीरे ' इत्यादि से दिखलाते हैं । अर्थात् शरीर के अन्दर जो वायु है, उसे ही ' प्राण ' कहते हैं । ' रसमलधातूनाम् ' इत्यादि से प्राण वायु का कार्य दिखलाते | खाये हुए द्रव्यों में ( जाठर अग्निरूप तेज के संयोग रूप ) पाक से रूपरसादि परिवर्तित हो जाते हैं । परिवर्तित इन रूपरसादि से युक्त द्रव्य ही ' रस ' शब्द का अर्थ है । विष्ठा और मूत्र ही यहाँ ' मल ' शब्द के अर्थ हैं । त्वचा, मांस, शोणित प्रभृति यहाँ ' धातु ' शब्द से इष्ट हैं । इनके ' प्रेरण ' का अर्थात् इधर उधर ले जाने का एवं ' आदि ' शब्दसे ' व्यूहन ' का अर्थात् विशिष्ट प्रयोग में नियोग का भी कारण है । यह प्राण वायु एक है या अनेक? इस संशय में कहते हैं ' एक: सन् ' । सुना जाता है कि शरीर For Private And Personal

पृष्ठ 196

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १२१ इदानीं चतुर्णा महाभूतानां सृष्टिसंहारविधिरुच्यते । ब्राह्मण अब यहाँ पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों महाभूतों की सृष्टि और उनके संहार की रीति कहते हैं । ब्राह्म मान से सौ वर्ष के अन्त में जब वर्तमान न्यायकन्दली ननु पञ्च वायवः शारीराः श्रूयन्ते? तत्राह - - क्रियाभेदादिति । मूत्रपुरीषयो-रधोनयनादपानः, रसस्य गर्भनाडीवितननाद् व्यानः, अन्नपानादेरूर्ध्वं नयनादुदानः, मुखनासिकाभ्यां निष्क्रमणात् प्राणः, आहारेषु पाकार्थमुदय्र्यस्य वह्नेः समं सर्वत्र नयनात् समान इति न वास्तवमेतेषां पञ्चत्वमपि तु कल्पितम् । कथम्? एकस्मिन्नाश्रये मूर्त्तानां समावेशाभावात् । उत्पत्तिमन्ति चत्वारि द्रव्याण्याख्याय विस्तरात् । तेषां कर्त्ती परीक्षार्थमुद्यमः क्रियतेऽधुना ॥ पृथिव्यादीनां चतुर्णामुत्पत्तिविनाशौ निरूपणीयौ । तयोश्च प्रतिप्रकरणं निरूपणे ग्रन्थविस्तरः स्यादिति समानन्यायेनैकत्र निरूपणार्थं प्रकरणमारभ्यते-- चतुर्णा -मिति । सृष्टिसंहारयोर् उत्पत्तिविनाशयोः, विधिः प्रकारः कथ्यते । यद्य चतुर्णामपि सृष्टिसंहारौ कथ्येते, तथापि नेदं साधर्म्याभिधानम्, प्रत्येकं विलक्षणयो-पाँच वायु हैं ( फिर एक कैसे? ), इसी आक्षेप का समाधान ' क्रियाभेदात् ' इत्यादि से देते हैं । मूत्र और विष्ठा को नीचे ले जाने के कारण यही प्राणवायु ' अपान ' कहलाता है । यह व्यान इसलिए कहलाता है कि इसका काम गर्भनाडी में रस का विस्तार करना भी है । खायी और पीयी हुई वस्तुओं को ऊपर ले जाने के कारण वही ' उदान ' शब्द से भी अभिहित होता है । मुँह और नाक से निकलने के कारण ही वह प्राण कहलाता है । आहार द्रव्य को पचाने के लिए उदर्य तेज को उनमें समान रूप से पहुँचाने के कारण वही प्राण वायु ' समान ' कहलाता है । इस प्रकार पञ्चत्व उसमें कल्पित है, किन्तु वस्तुतः वह एक ही है । ( प्र ० ) वह एक हो क्यों है? ( उ ० ) चूँकि एक मूर्त द्रव्य में अनेक द्रव्यों का समावेश असम्भव है । उत्पत्तिशील चारों द्रव्यों की विस्तृत व्याख्या के बाद अब उनके कर्त्ता की परीक्षा का उद्योग करते हैं | पृथ्वी, जल, तेज और वायु इन चारों द्रव्यों की उत्पत्ति और विनाश इन दोनों का निरूपण करना है । इन दोनों का अगर प्रत्येक प्रकरण में अलग-अलग निरूपण किया जाय तो ग्रन्थ का व्यर्थं विस्तार होगा । अत: संक्षेप में एक ही जगह दोनों का निरूपण करने के लिए ' चतुर्णाम् ' इत्यादि सन्दर्भ को आरम्भ करते हैं । ' सृष्टि-संहारयोः ' अर्थात् उत्पत्ति और विनाश इन दोनों की ' विधि ' अर्थात् प्रकार कहते हैं । यद्यपि चारों भूतों को सृष्टि और संहार दोनों का निरूपण साथ ही किया जाता है, १६ For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १२२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये सृष्टिसंहार-प्रशस्तपादभाष्यम् मानेन वर्षशतान्ते वर्त्तमानस्य ब्रह्मणोऽपवर्गकाले संसारखिन्नानां सर्व-प्राणिनां निशि विश्रामार्थं सकलभुवनपतेर्महेश्वरस्य सजिहीर्पा समकाल ब्रह्मा के मोक्ष का समय होता है, उस समय कुछ काल तक प्राणियों के ( जन्म मृत्यु जनित ) खेद को मिटाने के लिए सभी भुवनों के अधिपति महेश्वर को संहार न्यायकन्दली रेतयोरुपवर्णनात् । महाभूतानामित्युक्ते त्रयाणामेव परिग्रहः, कपिञ्जला-नालभेतेतिवद् बहुत्वसंख्यायास्तावत्येव चरितार्थत्वात्, अतश्चतुर्णामित्युक्तम् । चतुर्णामित्युक्ते चानन्तरोक्तमेव वायुकार्य्यं शरीरमिन्द्रियं विषयः प्राण इति चतुष्टयं बुद्धौ निविशते, तन्निवृत्त्यर्थं महाभूतानामिति । नन्वेवं तहि द्वणु-कानामुत्पत्तिविनाशौ न प्रतिज्ञातौ स्यातां तेषामणुत्वात् । नैवम् विधिशब्दो-पादानात् । येन प्रकारेण महाभूतानामुत्पत्तिविनाशौ स प्रकारः कथ्यत इत्युक्तम् । तेषाञ्च द्वद्यणुकादिप्रक्रमेणोत्पत्तिरापरमाण्वन्तश्च विनाश इति । अतो द्वणुका-नामपि सृष्टिसंहारौ प्रतिज्ञातौ स्याताम् अर्थप्रतिपादनमात्रस्य विवक्षितत्वात् । की फिर भी यह चारों का साधर्म्य कथन नहीं है, क्योंकि पृथिव्यादि में से प्रत्येक से तीन सृष्टि और संहार का वर्णन अलग - अलग है । ' महाभूतानाम् ' केवल इतना कहने के बहु-महाभूतों का हो बोध होता, क्योंकि ' कपिञ्जलान् ' आलभेत ' इत्यादि वाक्यों संख्या उतने वचनान्त ' कपिञ्जलान् ' आदि पदों से त्रित्व का ही बोध होता है, बहुत्व सें भी चरितार्थ हो जाती है, अत: ' चतुर्णाम् ' यह पद कहा है । केवल ' चतुर्णाम् विषय ' इतना और मात्र कह देने से अव्यवहित पहिले कहे हुए वायु के ( शरीर, इन्द्रिय, प्राण रूप ) चारों भेद ही जल्दी से बुद्धि में आते हैं, उनको हटाने के लिए ' महाभूता-नाम ' यह पद है । प्र ० ) तो फिर इससे द्वयणुकों की उत्पत्ति और उनका । विनाश नहीं, इस प्रतिज्ञा के अन्दर नहीं आते हैं । क्योंकि वे अणु हैं, ( महान नहीं ) उत्पत्ति क्योंकि ' विधि ' शब्द का उपादान है । ( अर्थात् ) जिस प्रकार महाभूतों की से ही और विनाश होता है, वह प्रकार कहते हैं । उनकी उत्पत्ति द्वयणुकादिक्रम विनाश होती है और विनाश भी परमाणु पर्यन्त होता है अतः द्वद्यणुकों की उत्पत्ति और भी उक्त प्रतिज्ञा के अन्दर आ जाते हैं । १. श्रुति में ' वसन्ताय कपिञ्जलान् आलभेत ' यह वाक्य है । इस वाक्य में प्रयुक्त ' कपिञ्जलान् ' इस पद से तीन ही कपिञ्जल अभिप्रेत हैं, या तीन से लेकर आगे की संख्या में यथेच्छाचार है? क्योंकि बहुत्व तो तीन से लेकर आगे की सभी संख्याओं में समान है । इसी संशय के समाधान से कहा कि तीन हो कपिञ्जलों का For Private And Personal

पृष्ठ 198

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] पश्चादुक्तमपि भाषावादसहितम् न्यायकन्दली संहारं प्रथमं कथयति - ब्राह्मण १२३ मानेनेति । अस्माकं पञ्चदश निमेषा: काष्ठा 1 त्रिशतिः काष्ठाः कला । पञ्चदश कला नाडिका । त्रिंशत्कलो मुहूर्त्तः । त्रिशता मुहूर्तेरहोरात्रः । पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः । द्वौ पक्षौ मासः । द्वौ मासावृतुः । षड्ऋतवो द्वादश मासाः संवत्सरः । ऋतुत्रयेणोत्तरायणम्, ऋतुत्रयेण च दक्षि-णायनम् । उत्तरायणश्च देवानां दिनम्, दक्षिणायनव देवानां रात्रिः । इष्ट है. अतः पीछे कहे हुए हम लोगों के १५ निमेषों जिस किसी प्रकार पदार्थों का प्रतिपादन मात्र ही भी संहार को " ब्राह्मण मानेन ' इत्यादि से पहले कहते हैं । को एक काष्ठा होती है । ३० काष्ठाओं की एक कला और नाड़िका होती है । ३० १५ कलाओं को एक कलाओं का एक मुहूर्त होता है । ३० मुहूर्ती से एक दिन और एक रात होती है । १५ अहोरात्रों का एक पक्ष होता है । दो पक्षों का एक मास और दो मासों की एक ऋतु होती है । छः ऋतुओं एवं बारह मासों का एक वर्ष होता है । मकर राशि में जब सूर्य आते हैं तब से लेकर मिथुन राशि में उनकी स्थिति पर्यन्त के शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म इन तीन ऋतुओं का एक उत्तरायण होता है । एवं कर्क राशि में सूर्य की स्थिति से लेकर धनु राशि में उनकी स्थिति पर्यन्त के वर्षा, शरद् और हेमन्त इन तीन ऋतुओं का दक्षिणायन होता है । उत्तरायण देवताओं का दिन है, आलम्भन युक्त है, क्योंकि त्रित्व संख्या के ग्रहण से ही शास्त्रकृत्य सम्पन्न हो जाता है । एवं तीन संख्या से अधिक संख्या को ग्रहण करनेपर भी त्रिश्व को छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि चतुष्ट्वादि के अन्दर त्रित्व अवश्य ही है । जो कोई त्रित्व को ग्रहण करेगा वह चतुष्ट्वादि को छोड़ सकता है, क्योंकि चतुष्ट्वादि त्रित्व के अन्दर नहीं है, अतः उनके लिए त्रित्व को छोड़ना असम्भव है । त्रिश्व सब से पहिले उपस्थित है, एवं उसके ग्रहण में लाघव भी है । तस्मात् त्रित्व संख्या के ग्रहण से ही शास्त्रकृत्य सम्पन्न हो जाता है, फिर उससे अधिक कपिञ्जल के वध से तो प्रत्यवाय ही होगा । तस्मात् विना विशेषण के बहुवचन का अर्थ त्रित्व ही है । ( मीमांसासूत्र अ. ११ पा. १ अधि. ८ ) १. प्रतिज्ञावाक्य के विरुद्ध इस उलटफेर को किरणावली में इस प्रकार सुल-झाया गया है कि-:- सृष्टि और संहार इन दोनों में पहिले कौन? इस विप्रतिपत्त में वैशेषिकों का सिद्धान्त है कि कोई भी पहिले नहीं, क्योंकि संसार अनादि और अनन्त है । प्रत्येक सृष्टि के पहिले अनन्त संहार बीत चुके हैं, एवं हर एक संहार के पहिले अनन्त सृष्टियाँ बीत चुकी रहती हैं । इस विषय को सूचना देने के लिए ही प्रतिज्ञावाक्य में पीछे कथित भी संहार का ' ब्राह्मण मानेन ' इत्यादि से पहिले प्रतिपादन करते हैं । देखिये किरणावली - ( पृ ० ८६ पं ० १६ और पृ ० ६० पं ० ३ ) । For Private And Personal

पृष्ठ 199

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १२४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये सृष्टिसंहार-शरीरेन्द्रियमहाभूतोपनिबन्धकानां सर्वात्मगतानामदृष्टानां वृत्तिनिरोधे की इच्छा होती है । उसके बाद ही शरीर, इन्द्रिय, एवं और सभी महाभूतों के उत्पादक सभी आत्माओं के सभी अदृष्टों के कार्यों के उत्पन्न करने की शक्ति न्यायकन्दली तथाभूताहोरात्रशतत्रयेण षष्ट्यधिकेन वर्षम् । द्वादशसहस्त्रेश्च वर्षैश्चतुर्युगम् । चतुर्युगसहस्रेण ब्रह्मणो दिनमेकम् । इत्यनेन मानेन वर्षशतस्यान्तेऽवसाने, वर्तमानस्य ब्रह्मणोऽपवर्गकाले मुक्तिकाले, संसारे नानास्थानेषु भूयो भूयः शरीरादिपरिग्रहेण, खिन्नानां गर्भवासा-विविधदुःखेन दुःखितानां प्राणिनाम्, निशि विश्रामार्थं कियत्कालं दुःखोपश-मार्थम्, सकलभुवनपतेः सर्वत्राव्याहतप्रभावस्य महेश्वरस्य सञ्जिहीर्षा संहारेच्छा भवति । तत्समानकालं तदनन्तरं शरीरेन्द्रियमहाभूतोपनिबन्धकानां शरीरेन्द्रिय-महाभूतारम्भकाणां सर्वात्मगतानां सर्वेष्वात्मसु समवेतानामदृष्टानां वृत्तिनिरोधः शक्तिप्रतिबन्धः स्यात् । तस्मिन् सत्यनागतानां शरीरेन्द्रियमहाभूतानामनुत्पत्तिः । उत्पन्नानाञ्च विनाशार्थं महेश्वरेच्छात्माणुसंयोगेभ्यः कर्माणि जायन्ते । महेश्व-रेच्छा सजिहीर्षालक्षणा । अण्विति परमाणुपरिग्रहः । महेश्वरस्येच्छा चात्माणु-एवं दक्षिणायन उनकी रात है । इस प्रकार के ३६० अहोरात्रों से उनका एक वर्ष होता है । इस वर्ष से बारह हजार ( १२००० ) वर्षों का एक चतुर्युग होता है । एक हजार ( १००० ) चतुर्युग से ब्रह्मा का एक दिन होता है । उतने की ही एक रात होती है । इसी अहोरात्र से ३६० दिनों का एक वर्ष और इसी वर्ष से सो वर्षों की आयु ब्रह्मा की है । इसी ब्राह्ममान से सौ वर्ष बीत जाने पर ब्रह्मा के अपवर्ग के समय में संसार में अनेक स्थानों में बार - बार शरीरादि धारण से ' ' खन्न ' गभवासादि अनेक दुःखों से दुःखी जीवों को रात में विश्राम देने के लिए, अर्थात् कुछ समय तक उक्त दुःखों से उन्हें छुटकारा देने के लिए ' सकलभुवनपति ' सभी स्थानों में अबाधित शक्तिवाले महेश्वर को ' सजिहीर्षा ' अर्थात् नाश करने की इच्छा होती है । उसी के समान काल में अर्थात् उसके बाद शरीर, इन्द्रिय और महाभूतों के ' उपनिबन्धक ' अर्थात् उत्पादक सभी जीवों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अदृष्टों का ' वृत्तिनिरोध ' अर्थात् कार्यों को उत्पन्न करने का सामर्थ्य प्रतिरुद्ध हो जाता है । सामर्थ्य के उक्त प्रतिरोध से भविष्यत् शरीर, इन्द्रिय और अन्य महाभूतों की उत्पत्ति रुक जाती है, एवं उत्पन्न शरीरादि के विनाश के लिए महेश्वर की इच्छा, आत्मा एवं अणुओं के संयोग इन सबों से क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । महेश्वर की यह इच्छा ' सजिद्दीर्षा ' रूप है । कथित ' अणु ' For Private And Personal

पृष्ठ 200

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 200 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १२५ सति महेश्वरेच्छात्मानुसंयोगजकर्म्मभ्यः शरीररेन्द्रिय कारणाणुविभागेभ्य-स्तत्संयोग निवृत्तौ तेषामापरमाण्वन्तो विनाशः । तथा पृथिव्युदकज्वलन-कुण्ठित हो जाती है । उसके बाद महेश्वर की इच्छा, और आत्मा एवं परमाणुओं के संयोग से उत्पन्न क्रिया के द्वारा शरीर और इन्द्रिय के उत्पादक परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं । उन विभागों से ( शरीर और इन्द्रिय के आरम्भक परमाणुओं के ) संयोगों का नाश होता है । फिर ( शरीरादि ) कार्य द्रव्यों का परमाणु पर्यन्त विनाश हो जाता है । इसी प्रकार पृथिवी, जल, तेज और वायु इनमें आगे - आगे के रहते न्यायकन्दली संयोगाश्चेति विग्रह । तेभ्यो जातानि तेभ्यो महेश्वरेच्छात्माणुसंयोगजकर्म्मभ्यः । शरीराणामिन्द्रियाणां ये पारम्पर्येण कारणभूता अणवस्तेषु विभागा भवन्ति । विभागेभ्यस्तेषामणूनां संयोगनिवृत्तिः । संयोगनिवृत्तौ सत्यां तेषामापरमाण्वन्तो विनाशः । तेषां शरीरेन्द्रियाणां द्वयणुकादिविनाशप्रक्रमेण तावद्विनाशो यावत्पर-रिति । प्रजानामकाण्डे संहरन्नयमकारुणिको यत्केनचिदुक्तं तत्रेयं प्रतिक्रिया - प्राणिनां यदप्येतदुक्तम् - " अनन्तानामात्मनामनन्तेष्वदृष्टेषु यत्किञ्चनकारी च स्यादिति निशि विश्रामार्थमिति । क्रमेण परिपच्यमानेषु केचिददृष्टक्षयाद् भोगावुपरमन्ते भुज्यन्ते च केचित् । अपरे तु भोगाभिमुखा शब्द से परमाणु समझना चाहिए । ' महेश्वरेच्छात् माणुसंयोगेभ्यः ' इस समस्त वाक्य के विग्रह का यह स्वरूप है कि " महेश्वरस्येच्छा महेश्वरेच्छा, महेश्वरेच्छा चात्माणुसंयोगाश्च महेश्वरस्येच्छात्मा णुसंयोगाः, तेभ्यो जातानि कर्माणि महेश्वरेच्छा त्मानुसंयोग कम्र्माणि, तेभ्यो महेश्वरस्येच्छात् माणुसंयोगजकम्मभ्यः " अर्थात् महेश्वर की इच्छा एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन दोनों से उत्पन्न कर्मों के द्वारा शरीर और इन्द्रियों के कारण अणुओं में परस्पर विभाग उत्पन्न होते हैं । इन विभागों से परमाणुओं के ( द्वयणुका-रम्भक ) संयोग का नाश होता है । संयोग के नाश से शरीर और इन्द्रिय का ' आपरमाण्वन्त ' विनाश हो जाता है । अर्थात् शरीरादिनाश की यह क्रिया द्वयणुकनाश पर्यन्त चलती है । प्रजा के इस अकारण विनाश से कोई - कोई परमेश्वर में अकरुणा और स्वेच्छाचार का दोष लगाते हैं, उन्हीं को समझाने के लिए ' प्राणिनां निशि विश्रामार्थम् ' यह वाक्य है । किसी की आपत्ति थी कि संहार का उक्त क्रम ठीक नहीं है क्योंकि जीव अनन्त प्रत्येक जीव में अदृष्ट भी अनन्त हैं । वे सभी अदृष्ट क्रमशः ही भोगों को उत्पन्न करेंगे । अतः कोई जीव अदृष्टनाश के कारण अगर भोग से निवृत्त होगा ( अथत्रा एक ही जीव एक अदृष्ट के भोग से निरस्त होगा ), कोई जीव ( अथवा वही जीव ) वर्तमान For Private And Personal