प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 31–40
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( १८ ) साथ लेकर कोई तीसरा पुरुष त्रित्व का व्यवहार भी करता है । द्वित्व को दृष्टान्त रूप में लेकर समझने में सरलता होगी । जब किसी पुरुष को दो घंटों में से प्रत्येक में ' यह एक है, यह एक है ' इस प्रकार की बुद्धि उत्पन्न होती है, तभी दो एकत्वों की उक्त बुद्धि से उक्त दोनों घटों में द्वित्व संख्या की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार अनेक एकत्व विषयक बुद्धि की ' अपेक्षा ' द्वित्व की उत्पत्ति में है, अतः उक्त बुद्धि को ' अपेक्षा बुद्धि ' कहते हैं । सभी बुद्धियाँ क्षणिक हैं, अतः अपेक्षा बुद्धि भी क्षणिक ही है । अतः उनसे उत्पन्न होनेवाली द्वित्वादि सभी संख्यायें अनित्य हैं । पहिले कह चुके हैं कि एक क्षण में उत्पत्ति, द्वितीय क्षण में स्थिति और तृतीय क्षण में जिस वस्तु का नाश हो, उसे ही वैशेषिक लोग ' क्षणिक ' कहते हैं । किन्तु अपेक्षा -बुद्धि का क्षणिकत्व उक्त क्षणिकत्व से थोड़ा सा भिन्न है । अपेक्षाबुद्धि की एक क्षण में उत्पत्ति उसके बाद दो क्षणों तक उसकी स्थिति और चौथे क्षण में विनाश मानना होगा, अतः अपेक्षाबुद्धि का क्षणिकत्व चतुर्थ क्षण में नष्ट होना है । अगर ऐसा न मानें, अपेक्षा बुद्धि का भी और बुद्धियों की तरह तीसरे ही क्षण में विनाश मार्ने? तो उससे उत्पन्न होनेवाले द्वित्व का सविनल्पक प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा । क्योंकि वर्त्तमान विषयों का ही प्रत्यक्ष होता है । प्रत्यक्ष के प्रति विषय कारण हैं । तदनुसार द्वित्व विषयक प्रत्यक्ष के प्रति भी द्वित्व कारण है । अगर द्वित्व के कारणीभूत उक्त अपेक्षाबुद्धि की सत्ता तीन क्षणों तक न मानें तो द्वित्व जनित उक्त प्रत्यक्ष अनुप-पन्न हो जाएगा । द्वित्व प्रत्यक्ष की रीति यह है कि द्वित्व के आश्रयीभूत दोनों व्यक्तियों में अलग - अलग ' अयमेकः, अयमेकः ' इत्यादि आकार की अपेक्षाबुद्धि उत्पन्न होती है । इस अपेक्षाबुद्धि से द्वित्व की उत्पत्ति होती है फिर द्वित्व में विशेषणीभूत द्वित्वत्व विषयक निर्विकल्पक प्रत्यक्ष होता है । इसके बाद द्वित्व का विशिष्टप्रत्यक्ष होता है । उसके बाद के क्षण में द्वित्व का विनाश होता है । क्योंकि विशिष्टज्ञान के लिए पहिले विशेषण का ज्ञान आवश्यक है, अतः द्वित्वत्व विशिष्ट द्वित्व के प्रत्यक्ष के लिए द्वित्वत्व का निर्विकल्पक ज्ञान मानना आवश्यक है । अगर उक्त अपेक्षाबुद्धि की और साधरण ज्ञानों की तरह दूसरे क्षण तक ही स्थिति मानें, तो द्वित्व की उत्पत्ति के आगे के क्षण में ही अपेक्षा बुद्धि का विनाश हो जाएगा । अतः जिस क्षण में द्वित्वत्व का निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कहा गया है, उसी क्षण में अपेक्षा बुद्धि का विनाश होगा | फिर उसके आगे के क्षण में द्वित्व के सविकल्पक प्रत्यक्ष की अपेक्षा द्वित्व का ही नाश हो जाएगा । क्योंकि अपेक्षा बुद्धिका विनाश ही द्वित्व का विनाशक है । फिर द्वित्व विनाश के बाद द्वित्व का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष के अव्यवहित पूर्वक्षण में विषय का रहना आवश्यक है । अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश और बुद्धियों की तरह तीसरे क्षण में न मानकर उत्पत्ति के चौथे क्षण में मानना पड़ता है । परिमाण लम्बा और चौड़ा एवं भारी और हल्का ये व्यवहार जिस गुण के कारण हो उस गुण को ' परिमाण ' कहते हैं । दोनों में पहिले से लम्बाई चौड़ाई का For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( १ ) बोध होता है, और दूसरे से भारीपन और हलकापन का बोध होता है । इनमें पहिला भी दो प्रकार का है, एक दीर्घ और दूसरा ह्रस्व । दूसरे प्रकार का वह परि-माण है जिससे द्रव्य का भारीपन और हल्क पन प्रतीति हो । यह भी अणु और महत् भेद से दो प्रकार का है । इसकी भी नित्यता और अनित्यता अपने आश्रय की नित्यता और अनित्यता के अधीन है । अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाला परिमाण नित्य है और अनित्य द्रव्य में रहनेवाला परिमाण अनित्य है । अनित्यपरिमाण तीन कारणों से उत्पन्न होता है ( १ ) अवयवों के परिमाण से ( २ ) अवयवों की संख्या से और ( ३ ) ( अवयवों के प्रशिथिलसंयोगरूप ) प्रचय से । दोनों कलापों के परिमाण से घट में परिमाण की उत्पत्ति होती है । किन्तु उसी परिणाम के तीन कलापों से जिस घट की उत्पत्ति होगी, उस घट का परिमाण दो कलापों से उत्पन्न घट के परिमाण से भिन्न होगा । इस विलक्षण परिमाण का कारण तीनों कपालों का परिमाण नहीं हो सकता, क्योंकि इन तीनों कपालों का परिमाण भी पहिले घट के उत्पादक दोनों कपालों के समान ही है । अतः उक्त तीन कपालों से उत्पन्न घट में जो उक्त दोनों कपालों से उत्पन्न घट के परिमाण से विलक्षण परिमाण उपलब्ध होता है, उसका कारण व पालों की त्रित्व संख्या ही है । अतः संख्या भी परिमाण का कारण है । इस प्रकार संख्या में स्वीकृत परिमाण की कारणता के अनुसार ही अणुपरिमाणों में किसी भी वस्तु की कारणता का अस्वीकार करना वैशेषिकों के लिए संभव होता है । वैशेषिकों के सिद्धान्त के अनुसार अणुपरिमाण किसी के भी कारण नहीं हैं । परमाणुओं के परिमाण और द्वयणुकों के परिमाण ही अणुपरिमाण है । ये अगर कारण होंगे तो परमाणु के परिमाण द्वयगुणों के परिमाण के कारण होंगे, और द्वयणुकों के परिमाण व्यसरेणु के परिमाण के कारण होंगे । किन्तु सो संभव नहीं है, क्योंकि परिमाणों में यह नियम देखा जाता है कि वे अपने समान जाति के अपने से उत्कृष्ट परिमाण को ही उत्पन्न करते है । कपालों में महत् परिमाण हैं उसके परिमाणों से घट का जो परिमाण उत्पन्न होता है वह कपाल परिमाण से महत्तर होता है । अर्थात् कपाल परिमाण में रहनेवाली महत्त्व जाति भी उसमें है और कपाल परिमाण से वह बड़ा भी है । इस नियम के अनुसार परमाणुओं के परिमाणों से द्वणुकों के परिमाणों की उत्पत्ति मानने से द्वयगुणक के परिमाणों में अणुत्व जाति के साथ साथ परमाणुओं के परिणाम से न्यूनता भी माननी पड़ेगी । क्योंकि जिस प्रकार महत्परिमाण के उत्पन्न होववाले परिमाण महत्तर होते हैं उसी प्रकार अणुपरिमाण से उत्पन्न होनवाले परिमाण अणुतर होंगे । इसी प्रकार दणुकों में रहनेवाले अणुपरिमाणों से अगर व्यसरेणु परि-माण की उत्पत्ति मानें तो वह द्वणुक के परिमाण से छोटा होगा । फलतः व्यसरेणु का प्रत्यक्ष न हो सकेगा । जिससे आगे की प्रत्यक्ष धारा ही रुक जाएगी । जो जगत् के अप्रत्यक्ष में परिणत हो जाएगी । तस्मात् द्वयणुक परिमाण के उत्पादक दोनों परमाणुओं की द्वित्व संख्या ही है, एवं तीन द्वयणुकों से उत्पन्न होनवाले व्यसरेणु के परिमाण का उसके उपादानभूत तीनों द्वयणुकों की त्रित्व संख्या ही कारण है । घटादि के विशेष प्रकार के परिमाणों के लिए भी संख्या की अपेक्षा का उपपादन कर चुके हैं । अतः जन्य अणुपरिमाणों के लिए वह कोई नवीन कल्पना भी नहीं है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ' प्रचय ' भी परिमाण का कारण है । इसी से सेर भर लोहे की लम्बाई चौड़ाई और सेर भर रूई की लम्बाई चौड़ाई में अन्तर उपलब्ध होता है । यह अन्तर अवयवों के परिमाण या अवयवों की संख्या से उपपन्न नहीं हो सकते । कथित लौहखण्ड और तुलखण्डों के अवयवों की संख्या और परिमाण समान हैं । अतः उक्त अन्तर की उपपत्ति के लिए यही कल्पना करनी चाहिए कि लोहे के अवयवों के संयोग संघटित हैं और रूई के अवयवों के संयोग शिथिल ( ढीले ) हैं । अवयवों के इस शिथिल संयोग को ही ' प्रचय ' कहते हैं । पृथकृत्व घट पट से पृथक है ( अयमस्मात् पृथक् ) इस आकार की प्रतीति जिस गुण से हो उसे ' पृथक्त्व ' कहते हैं । यह भिन्न द्रव्यों में एक दो या इनसे अधिक द्रव्यों को अवधि मानकर शेष द्रव्यों में रहता है । इस प्रकार यह भेद या अन्योन्याभाव सा ही दीखता है । किन्तु अन्योन्याभाव की प्रतीति का आकार ' घटभिन्नः पटः इत्यादि प्रकार के होते हैं, अतः भेद से पृथक्त्व भिन्न है । अर्थात् भेद की प्रतोति के अभिलापक वाक्य में प्रयुक्त प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों के लिए प्रथमान्त पद का ही प्रयोग होता है । किन्तु पृथकत्व की प्रतीति के लिए उनमें से अवधिभूत एक अर्थ का पञ्चम्यन्त पद से उपादान किया जाता है । संयोग असम्बद्ध दो द्रव्यों के परस्पर सम्बन्ध को ही ' संयोग ' कहते हैं । यह तीन प्रकार का है । ( १ ) दोनों सम्बन्धियों में से एकमात्र की क्रिया से उत्पन्न । जैसे पहाड़ और पक्षी का संयोग केवल पक्षी की क्रिया से उत्पन्न होता है । ( २ ) दोनों सम्बन्धियों की क्रिया से उत्पन्न जैसे लड़ते हुए दो पहलवानों का संयोग ( ३ ) तीसरा संयोग संयोग से ही उत्पन्न होता है । जैसे हाथ और पुस्तक के संयोग से शरीर और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है । वैशेषिकों के सिद्धान्त में अवयव और अवयवी परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं । अतः शरीर रूप अवयवी और हाथ पैर प्रभृति अवयव परस्पर भिन्न हैं । अतः जिस प्रकार पट की क्रिया से भूतल और पट का सयोग उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार हाथ की क्रिया से शरीर और पुस्तक का संयोग भी उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु शरीर में क्रिया के न रहने पर भी हाथ की क्रिया से पुस्तक के साथ जो हाथ और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है, उसके बाद शरीर के साथ पुस्तक के संयोग की प्रतीति होती है । प्रतीति का अलाप नहीं किया जा सकता । अतः शरीर और पुस्तक में भी संयोग मानना पड़ेगा । किन्तु यह संयोग अगर क्रिया से उत्पन्न होगा तो पुस्तक की क्रिया या शरीर की क्रिया या फिर उन्हीं दोनों की क्रिया से उत्पन्न होगा, किन्तु न शरीर में और न पुस्तक में ही क्रिया है । अतः प्रकृत में शरीर और पुस्तक के संयोग का कारण क्रिया को नहीं माना जा सकता । किन्तु असमवायिकारण तो क्रिया या गुण इन दोनों में से ही कोई होगा । प्रकृत में किया For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २१ ) असमवायिकारण नहीं हो सकती, अतः उसके असमवायिकारण होने की बात ही नहीं उठती | सुतराम् प्रकृत में हाथ और शरीर इन दोनों के लिए गुण रूप किसी असमवायि-कारण की कल्पन आवश्यक है । यह गुण उक्त संयोग से अव्यवहित पूर्वेक्षण में नियत रूप से रहनेवाले हाथ और पुस्तक के संयोग को छोड़ कर दूसरा नहीं हो सकता । अतः हाथ और पुस्तक की क्रिया से उत्पन्न संयोग से ही शरीर और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है । सुतराम् संयोगजसंयोग का मानना आवश्यक है । ( १ ) नोदन और ( २ ) अभिघात संयोग के ये दो और प्रकार भी हैं । जिस संयोग से शब्द की उत्पत्ति न हो उसे ' नोदन ' कहते हैं । एवं इसके विपरीत जिस संयोग से शब्द की उत्पत्ति हो उसे ' अभिघात ' कहते हैं । विभाग संयोग को विनष्ट करनेवाले गुण का नाम ' विभाग ' है । संयोग की तरह यह भी ( १ ) एक क्रिया से उत्पन्न ( २ ) दो क्रियाओं से उत्पन्न और ( २ ) विभाग से उत्पन्न भेद से तीन प्रकार का है । पर्वत से पक्षी का विभाग केवल पक्षी में रहनेवाली क्रिया से ही उत्पन्न होता है । परस्पर गुथे हुए दो पहलवानों का विभाग दोनों पहल-वानों में से प्रत्येक में रहनेवाली अलग अलग दो क्रियाओं से उत्पन्न होता है । संयोगजसंयोग की तरह ' विभागजविभाग ' का भी मानना आवश्यक है । क्योंकि किसी व्यक्ति के हाथ का संयोग अगर किसी वृक्ष के साथ था, और हाथ की क्रिया से उस संयोग के छूट जाने पर वृक्ष से हाथ का विभाग हो जाता है ।हाथ और वृक्ष शरीर के विभाग की भी प्रतीति होती है । उत्पन्न होगा तो फिर शरीर की क्रिया से के इस विभाग के उत्पन्न होने पर वृक्ष से शरीर और वृक्ष का विभाग अगर क्रिया से या वृक्ष की क्रिया से अथवा दोनों की क्रिया से ही उत्पन्न हो सकता है । प्रकृत में क्रिया केवल हाथ में ही है, पूरे शरीर में नहीं वृक्ष में तो है ही नहीं हाथ अवयव है शरीर अवयवी, अतः दोनों भिन्न हैं । सुतराम् घट की क्रिया से जैसे कि पट और दण्ड का विभाग उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार हाथ को क्रिया से शरीर और वृक्ष का भी विभाग नहीं उत्पन्न हो सकता । अतः हाथ और वृक्ष का विभाग हो शरीर और वृक्ष के विभाग का कारण है । अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है । इसी हेतु से विभाग को संयोगध्वंस रूप न मानकर स्वतन्त्र गुणरूप भाव पदार्थ मानना पड़ता है । अगर ऐसा न मानें अर्थात् विभाग को संयोगध्वंस रूप ही मानें तो हाथ और तक के विभाग के बाद जो शरीर और तरु के वह न हो सकेगी, क्योंकि शरीर और तरु का विभाग विनाश रूप होगा । शरीर में किया है नहीं, किया है शरीर के संयोग का विनाश कैसे होगा? हाथ की क्रिया से विभाग की प्रतीति होती है, शरीर और तरु के संयोग का ही हाथ में हाथ की किया से जिस संयोगविनाश की उत्पत्ति होगी वह तो हाथ में ही रहेगी, शरीर में नहीं । अतः विभाग संयोग का अभाव रूप नहीं है, किन्तु गुण रूप भाव ही है । , विभाग को भाव रूप मान लेने से प्रतीतियों की उपपत्ति दिखलाया जा चुकी है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २२ ) विभागजविभाग भी दो प्रकार का है । ( १ ) कारणमात्रजन्य और ( २ ) कारणा-कारण विभागजन्य | जिस विभाग की उत्पत्ति होगी, उस विभाग के समवायि-कारणीभूत द्रव्यों के ही विभाग से जो विभाग उत्पन्न हो उसे ' कारणमात्रविभागजन्य विभाग ' कहते हैं । घट - नाश से लेकर उसके उत्पादक कर्मनाश पर्यन्त के पर्यालोचन से यहाँ की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी । उसका यह क्रम है कि पहिले घट के अवयव रूप दोनों कपालों में क्रिया ( हलचल ) की उत्पत्ति होती है । फिर घट के उत्पादक दोनों कपालों में विभाग उत्पन्न होता है । कपालों के इस विभाग से घट के उत्पादक कपालों के संयोग का नाश होता है । चूँकि कपालों का संयोग घट का असमवायिकारण है, अतः इसके नाश से घट का नाश होता है । तब तक कपालों में क्रिया रहती ही है । घट - नाश के बाद कर्म से युक्त उन कपालों का संयोग पहिले के जिस देश के आकाश के साथ था, उस देश से कपालों का विभाग उत्पन्न होता है । आकाश के साथ कपालों के इस विभाग का असमवायिकारण पहिले कहा गया दोनों कपालों का क्रियाजनित विभाग ही है । पूर्व देशों के आकाश से एक दूसरे से विभक्त दोनों कपालों का यह विभाग ही " कारणमात्र विभागजन्य विभागजविभाग " है । क्योंकि इस विभाग के समवायिकारण दोनों कपाल और पूर्वदेशों का आकाश है । अतः दोनों कपाल भी इस विभाग के समवायिकारण हैं । अतः प्रकृत विभाग के समवायिकारणीभूत केवल दोनों कपालों के विभाग से ही वह उत्पन्न होता है, किसी और द्रव्यों के विभाग से नहीं | इसके बाद विभागजविभाग से कपालों का जिस पूर्वदेश के साथ पहिले संयोग था, उस संयोग का नाश होता है । फिर दूसरे देशों के आकाश ( उत्तरदेश ) के साथ इन विभक्त कपालों का संयोग होता है । कालों को उस क्रिया का नाश होता है, जिससे दोनों कपालों का विभाग उत्पन्न हुआ था । इस प्रसङ्ग में इन दो विषयों को भी समझना आवश्यक है । ( १ ) जिस क्रिया से कपालों का परस्पर विभाग उत्पन्न होता है, उस क्रिया से ही विभक्त कपालों का पूर्वदेश के आकाश के साथ कथित विभाग को उत्पत्ति क्यों नहीं मानते? क्योंकि क्रिया में विभाग की हेतुता स्वीकृत है । एवं क्रिया को सत्ता इस विभाग के कई क्षणों बाद तक रहती है । फिर विभाग में विभाग की हेतुता की नयी कल्पना क्यों की जाती है? दूसरी बात यह है कि अगर उक्त दूसरे विभाग की उत्पत्ति विभाग से ही मान भी लें तो यह पहिला विभाग दूसरे विभाग का असमवायिकारण ही होगा । असमवायिकारण का संचलन हो जाने पर कार्य की उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं रह जाती है । फिर अवयवों के विभाग के बाद ही अवयवी के नाश से पूर्व ही उक्त दूसरे देश के साथ अवयवों का ( विभागज ) विभाग क्यों नहीं उत्पन्न हो जाता? इसके लिए घट के उत्पादक संयोग का विनाश और घट का विनाश इन दो कार्यों के लिए अपेक्षित दो क्षणों का विलम्ब सहने की क्या आवश्यकता है? इन दोनों में प्रथम प्रश्न का यह समाधान है कि अगर उक्त दूसरे विभाग को भी क्रियाजन्य मानें तो कमल खिलने की अपेक्षा विनष्ट ही हो जाएँगे । क्योंकि संयोग दो प्रकार के हैं । एक संयोग से अवयवी की उत्पत्ति होती है, जैसे दोनों कपाओं का For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २३ ) कथित संयोग । इसे ' आरम्भक ' संयोग कहते हैं । क्योंकि यह संयोग घट रूप अवयवी द्रव्य का ' आरम्भक ' अर्थात् ' उत्पादक ' है । दूसरा संयोग है अनारम्भक संयोग, जैसे विभक्त कपालों का दूसरे देश के आकाश के साथ संयोग । इससे किसी द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती है । अतः इसे ' अनारम्भक ' संयोग कहते हैं । फलतः वे दोनों संयोग परस्पर विरोधी हैं, अतः एक क्रिया रूप कारण से उन दोनों की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अगर इसे मानने का हठ करें तो फूलते हुए कमल के विनाश की उक्त आपत्ति होगी । क्योंकि कमल पत्रों का ऊपर की ओर जो परस्पर संयोग है, यह कमल का उत्पादक संयोग नहीं है । उस संयोग को नष्ट करनेवाला विभाग ही कमल का फूलना है । जो सूर्य किरणों के संयोग से उत्पन्न होनेवाली पत्रों की क्रिया से होती है । कमल के पत्रों काही नीचे की ओर डण्टी के ऊपर अंश में भी परस्पर संयोग है । जो कमल का उत्पादक संयोग है | इस संयोग का विनाश उन रविकिरणों के उक्त क्रियाजनित विभाग नहीं होता है । यदि आग्रहवश ऐसा मानें तो कमल का विनाश मानना पड़ेगा, क्योंकि अवयवों का विशेष प्रकार संयोग ही अवयवी का उत्पादक है । एवं उक्त संयोग का विनाश ही अवयवी का विनाशक है । तस्मात् अवयवियों के उत्पादक संयोग के विनाशक विभाग और उक्त संयोग के अविनाशक विभाग दोनों की उत्पत्ति एक क्रिया से नहीं हो सकती । अतः प्रकृत में कपालों के संयोग को नष्ट करनेवाले विभाग की उत्पत्ति क्रिया से मानते हैं । और उन्हीं विभक्त कपालों का पूर्वदेशसंयोग के विनाशक विभाग की उत्पत्ति कपालों के उक्त विभाग से मानते हैं । अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है । दूसरे प्रश्न का यह समाधान है कि कथित आरम्भक संयोग के विरोधी विभाग से युक्त अवयवों का दूसरे आकाशादि देशों के साथ तब तक संयोग नहीं हो सकता जब तक की अवयवी विनष्ट नहीं हो जाता । अतः क्रिया से विभाग विभाग से पूर्व ( आरम्भक ) संयोग का नाश, संयोग के इस नाश से घट का नाश जब हो जाएगा तभी घट के उत्पादक उक्त विभक्त कपालों का दूसरे देशों के साथ संयोग उत्पन्न हो सकता है । अतः उक्त रोति माननी पड़ती है । परत्व और अपरत्व परत्व और अपरत्व ये दोनों ही दैशिक और कालिक भेद से दो दो प्रकार के हैं । एक वस्तु से दूसरी वस्तु की दूरी दैशिक परत्व है और एक वस्तु का दूसरे वस्तु से समीप होना दैशिक अपरत्व है । ये दोनों ही आपेक्षिक हैं, अतः अपेक्षाबुद्धि ही इनके कारण हैं और तीसरे अवधि की भी अपेक्षा होती है । जैसे कि पटना से काशी की अपेक्षा प्रयाग दूर है । एवं पटना से प्रयाग की अपेक्षा काशी समीप है । कालिक परत्व का ही दूसरा नाम ज्येष्ठत्व है । एवं कालिक अपरत्व का ही दूसरा नाम कनिष्ठत्व है । कालिक परत्व और अपरत्व भी आपेक्षिक हैं । क्योंकि जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से ज्येष्ठ होता है, वही अपने से पूर्ववर्त्ती की अपेक्षा कनिष्ठ भी होता है । एवं जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से कनिष्ठ होता है वही अपने से ४ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २४ ) पश्चाद्वर्ती की अपेक्षा ज्येष्ठ भी होता है । अतः इनमें भी अपेक्षाबुद्धि की आवश्यकता होती है । अतः अपेक्षाबुद्धि के नाश से इनका नाश होता है । परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धिसापेक्ष हैं । अतः इनके निरूपण के बाद ही आकर ग्रन्थों में बुद्धि का निरूपण किया गया है । तदनुसार मैं भी अब बुद्धि का निरूपण प्रारम्भ करता हूँ । बुद्धि के निरूपण में नव्यन्याय की दृष्टि से भी कुछ विषयों को समझाने का मैंने प्रयास किया है । बुद्धि संसार के सभी व्यवहारों के मूल में बुद्धि ही काम करती है । संक्षेपतः ( १ ) प्रमा ( विद्या ) और ( २ ) अप्रमा ( अविद्या ) इसके दो भेद हैं । इनमें अप्रमा के ( १ ) संशय ( २ ) विपर्यय ( ३ अनध्यवसाय और ( ४ ) तर्क, ये चार भेद हैं । ज्ञान या बुद्धि को अच्छी तरह से समझने के लिए उसके विशिष्ट स्वरूप के प्रत्येक अंश को अच्छी तरह समझ लेना आवश्यक है । नैयायिकों और वैशेषिकों के मत में ज्ञान किसी विषय का ही होता है । बिना विषय के ज्ञान नहीं होते । ज्ञान में भासित होनेवाले विषय ( १ ) विशेषण ( २ ) विशेष्य और ( ३ ) उन दोनों के संसर्ग, ये तीन प्रकार के हैं । ' विषय ' का एक चौथा प्रकार भी है जो निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होता है । ' घवद्भूतलम् ' इस ज्ञान में मुख्यतः घट विशेषण है, और भूतल विशेष्य है, एवं संसर्ग वह संयोग । जिसके कारण भूतल में घट का रहना सम्भव होता है । वैसे तो इसी ज्ञान में घट में घटत्व भी भासित होता है । अतः घटत्व भी विशेषण है, और घट भी विशेष्य है, एवं इन दोनों का समवाय भी संसर्ग है । इसी प्रकार भूतल में भूतलत्व और संयोग में संयोगत्व के भान होने के कारण भूतलत्व संयोगत्वादि और भी विशेषण हैं एवं घट भूतलादि और भी विशेष्य हैं । किन्तु ये गौण हैं । विशेषण को ही ' प्रकार ' कहते हैं । ज्ञान के इन विषयों में ज्ञानीय ' विषयता ' नाम का एक धर्म भी है जो विषयों के प्रकारविशेष्यादि के विभेदों के कारण ( १ ) प्रकारता ( २ ) विशेष्यता और ( ३ ) संसर्गता भेद से तीन प्रकार का है । निर्विकल्प-ज्ञान के चौथे प्रकार के विषयों में रहनेवाली इन तीनों विषयताओं से भिन्न एक चौथी विषयता भी है । उक्त प्रकारता ही उस स्थिति में प्रायशः विधेयता कहलाती है जिसमें कि उसका आश्रय पहिले से ज्ञात न हो । विशेष्यता ही स्थिति विशेष में उद्देश्यता कहलाती है । ऊपर जिस संसर्ग की चर्चा की गयी है वह विभिन्न दो व्यक्तियों में क्रमशः विशेष्यविशेषणभाव का सम्पादक वस्तु विशेष रूप है, ' दण्डी पुरुषः ' इत्यादि स्थलों में चूँकि दण्ड का संयोग संसर्ग या सम्बन्ध पुरुष में है इसीलिए दण्ड विशेषण है और पुरुष विशेष्य है । सम्बन्ध ( १ ) साक्षात् और ( २ ) परम्परा भेद से दो प्रकार का है । साक्षात् सम्बन्ध संयोग समवाय स्वरूपादि भेद से अनेक प्रकार के हैं । जिस सम्बन्ध के निर्माण में दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता हो उसे परम्परा सम्बन्ध कहते हैं । यह For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २५. ) अनन्त प्रकार का हो सकता है । इसकी कोई संख्या निर्णित नहीं हो सकती । यह सम्बन्ध ऐसे दो वस्तुओं का भी हो सकता है, जिन्हें साधारण सम्बन्ध से कभी परस्पर सम्बद्ध होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती । ( १ ) वृत्तितानियामक और ( २ ) वृत्तिता का अनियामक भेद से सम्बन्ध दो प्रकार का है । जिस सम्बन्ध से आधार - आधेयभाव की प्रतीति हो उसे ' वृत्तिता का नियामक ' सम्बन्ध कहते हैं । ये संयोग समवायादि नियमित प्रकार के ही हैं । जिससे दो सम्बन्धियों में केवल सम्बद्ध मात्र होने की प्रतीति हो उसे वृत्तिता का अनियानक सम्बन्ध कहते हैं । जिस ज्ञान के विशेष्य में विक्षेषण की सत्ता वस्तुतः रहे उसी ज्ञान को ' प्रमा ' कहते हैं यथार्थ चाँदी में जो ' इदं रजतम् ' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है वह ' प्रमा ' ज्ञान है, क्योंकि ज्ञान का विशेष्य या उद्देश्य है चाँदी ( रजत ) उसमें रजतत्व रूप विशेषण की या प्रकार की वस्तुतः सत्ता है, अतः उक्त ज्ञान ' प्रमा ' है । किस वस्तु में किस वस्तु की यथार्थ सत्ता है? इस प्रश्न का यह समाधान यह है जिस विशेष्य में विशेषण के सम्बन्ध की सत्ता रहे, उसी विशेष्य विशेषण की यथार्थ सत्ता है । प्रकुत उदाहरण के रजत रूप विशेष्य में रजतत्व जाति का समवाय सम्बन्ध है अतः रजत्व की सत्ता रजत में है । शुक्तिका में जो इदं रजतम् ' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है वह ' प्रमा ' इस लिए नहीं है कि इस ज्ञान के विशेष्य शुक्तिका में रजतत्व का समवाय नहीं है । अतः शुक्तिका में रजत्व का ज्ञान प्रमा न होकर ' अप्रमा ' है । फलतः प्रमा के विपरोत अर्थात् जिस ज्ञान के विशेष्य में विशेषण की सत्ता न रहे उस ज्ञान को ही ' अप्रमा ' या अविद्या या भ्रम कहते हैं । अयथार्थ ज्ञान के भेदादि इस ग्रन्थ में विस्तृत रूप से वर्णित हैं । कथित प्रमाज्ञान या यथार्थज्ञान के दो भेद हैं ( १ ) प्रत्यक्ष और ( २ ) अनुमिति । शब्दादिजन्य जितने भी प्रमाज्ञान हैं वे सभी प्रायः अनुमिति में ही अन्तर्भूत हैं । फलतः प्रमाकरण भी अर्थात् प्रमाण भी ( १ ) प्रत्यक्ष और ( ३ ) अनुमान भेद से दो ही प्रकार के हैं, शब्दादि जितने भी प्रकार के प्रमाज्ञान हैं, वे सभी इन्हीं दोनों में से किसी करण से उत्पन्न होते हैं । प्रत्यक्ष शब्द ' प्रति ' शब्द और ' अक्ष ' शब्द से ' प्रतिगतम् अक्षि ' या ' अक्ष्याक्षिप्रति वर्त्तते ' इन दोनों व्युत्पत्तिओं के द्वारा निष्पन्न होता है । प्रकृत में अर्थ के साथ सम्बद्ध इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष शब्द से अभीष्ट है । अर्थात् विषय के साथ सम्बद्ध इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । इस प्रमाण के द्वारा उत्पन्नयथार्थ ज्ञान ही ' प्रत्यक्ष ' रूप प्रमिति है । फलतः इन्द्रिय ओर अर्थ के संनिकर्ष जो यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो वह है प्रत्यक्ष - प्रमिति और इस प्रमिति का कारण ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रत्यक्ष के प्रसङ्ग में और विशद विवेचन इस ग्रन्थ में देखना चाहिए । ' अनु ' पूर्वक ' मा ' धातु से अनुमान शब्द बना है । ' अनु ' शब्द का अर्थ है पश्चात् । ' पश्चात् ' शब्द अपने अर्थबोध के लिए किसी और अवधि की आकांक्षा रखता है । प्रकृत में वह अवधि है ' लिङ्गपरामर्श ' । अर्थात् लिङ्गपरामर्श के पश्चात् ही जो ज्ञान उत्पन्न हो उसे ‘ अनुमिति ' कहते हैं । इसी दृष्टी से ' परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः ' For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २६ ) इस प्रकार अनुमिति के लक्षण मिलते हैं । व्याप्तिज्ञान और पक्षधर्मताज्ञान इन दोनों परामर्श उत्पन्न होता है । हेतु के आश्रय में साध्य का नियमित से रहना ही व्याप्ति है । पक्ष में हेतु का रहना ही पक्षधर्मता है । ' साध्यव्याप्यो हेतुः ' यही व्याप्तिज्ञान का आकार है, और ' हेतुमान् पक्षः ' यह पक्षधर्मताज्ञान का आकार है । अतः मिलकर इन दोनों से उत्पन्न परामर्श का स्वभावतः ‘ साध्यव्याप्यहेतुमान् पक्षः ' यह आकार होता है । इस परामर्श को ही ' तृतीयलिङ्गपरामर्श ' भी कहते हैं । इस दृष्टि से पक्षधर्मता - ज्ञान हेतु का प्रथम ज्ञान है, और व्यातिविशिष्टहेतु का ज्ञान हेतु का दूसरा ज्ञान है, व्याप्ति और पक्षधर्मता इन दोनों रूपों से हेतु का परामर्श रूप तीसरा ज्ञान होता है, अतः उसे " तृतीय लिङ्गपरामर्श " कहते हैं । इसके बाद ही अनुमति की उत्पत्ति होती है । पक्षता इस प्रसङ्ग में एक विचार उठता है कि प्रायः सभी ज्ञान दो क्षणों तक रहते हैं, तीसरे क्षण में उनका विनाश होता है । कथित परामर्श भी ज्ञान है, अतः वह भी दो क्षणों तक रहेगा । जिस क्षण में वह उत्पन्न होगा, उसके अव्यवहित उत्तरक्षण में जिस प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा, इस अनुमिति के अगले क्षण में भी उसी प्रकार की अनुमिति को वह क्यों नहीं उत्पन्न करता? क्योंकि कथित दूसरी अनुमिति के अव्यवहित पूर्वक्षण में अर्थात् पहिली अनुमिति की उत्पत्तिक्षण में परामर्श की सत्ता है । एवं परामर्श अनुमिति का अन्यनिरपेक्ष कारण है । परामर्श संबलन के बाद अनुमिति के लिए और किसी की अपेक्षा नहीं रह जाती । सुतराम् परामर्श अगर अपनी उत्पत्तिक्षण के अव्यवहित उत्तरक्षण में जिस विषय की जिस आकार प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा, उसी आकार प्रकार की उसी विषय की दूसरी अनुमिति को भी अपने स्थितिक्षण के अव्यवहित उत्तरक्षण में फलतः पहिली अनुमिति के अव्यवहित उत्तरक्षण में उत्पन्न करने में कोई बाधा तो नहीं है? किन्तु ऐसी बात होती नहीं है । अनुमान को जितने माननेवाले दार्शनिक हैं, उनमें से कोई भी एक आकार प्रकार की अनुमिति के रहते हुए उसी आकार प्रकार की दूसरी अनुमिति की सत्ता को स्वीकार नहीं करते । किन्तु किसी की स्वीकृति और अस्वीकृति मात्र पर वस्तु के सामर्थ्य को अन्यथा नहीं किया जा सकता । फलतः एक अनुमिति रूप सिद्धि के रहते हुए परामर्श के रहने पर भी दूसरी अनुमिति न हो सके, इसके लिए परामर्श के सामान ही अनुमिति का एक और साक्षात् कारण माना गया है जिसका नाम है ' पक्षता ' । इसका ऐसा स्वरूप या लक्षण होना चाहिए, जिससे एक अनुमिति या अन्य किसी प्रकार की सिद्धि के रहते हुए कथित दूसरी अनुमिति की आपत्ति न हो सके । इसी प्रयोजन को सामने रखकर पक्षता के अनेक लक्षण किए गये हैं । जैसे कि ( १ ) सध्य का संशय ही पक्षता है । ( २ ) अनुमित्सा ही पक्षता है । ( ३ ) अथवा अनुमित्सा की योग्यता पक्षता है । ( ४ ) सिद्धि का अभाव ही पक्षता है । पक्षता के इन सभी लक्षण करनेवालों की यहीं दृष्टि रही है कि अनुमिति या अन्य किसी भी प्रकार की सिद्धि के रहते हुए उक्त प्रकार के लक्षणों से आक्रान्त किसी भी पक्षता रूप कारण का रहना संभव न हो । क्योंकि सभी के साथ सिद्धि का विरोध है । अतः For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २७ ) सिद्धि के रहते हुए पक्षता रूप कारण का संचलन संभव ही नहीं है । अतः एक अनुमिति बाद दूसरी अनुमिति की आपत्ति नहीं दी जा सकती । पक्षता के ये जितने भी लक्षण कहे गये हैं, उन सभी लक्षणों का तत्त्वचिन्तामणिकार ने खण्डन किया है । खण्डन की युक्तियों को विस्तृत रूप से चिन्तामणि के पक्षता प्रकरण में देखना चाहिए । संक्षेप में तत्त्वचिन्तामणिकार कहना है कि एक अनुमिति के रहते हुए परामर्शादि सभी कारणों के रहने पर भी जब दूसरी अनुमति नहीं होती है, तो पहली अनु-मिति या सिद्धि को दूसरी अनुमिति का प्रतिबन्धक मानना पड़ेगा । क्योंकि और सभी कारणों के रहने पर भो जिसके रहते कार्य उत्पन्न न हो सके, उसे ही कार्य का प्रतिबन्धक कहा जाता है । प्रतिबन्धक का अभाव भी कार्य का एक कारण ही है । अतः प्रकृत में सिद्धि का अभाव भी अनुमिति का एक कारण है । जिसके चलते एक अनुमिति के बाद तुरत दूसरी अनुमिति नहीं हो जाती । अतः सिद्धि का अभाव ही पक्षता है । किन्तु कभी-कभी एक सिद्धि के रहते हुए भी विषय को विशेष प्रकार की जानने की इच्छा से तुरत दूसरी अनुमति होती है । जैसे की आत्मा को विशेष प्रकार से सजाने की इच्छा से आत्मा के श्रवण रूप सिद्धि के बाद भी मनन ( अनुमिति ) का विधान ' आत्मा वारे श्रोतव्यो मन्तव्यः ' इत्यादि श्रुतियों के द्वारा किया गया है । अगर जिस किसी भी प्रकार की भी सिद्धि के रहने पर दूसरी अनुमिते रूप सिद्धि बिलकुल ही न हो, तो फिर उक्त विधान असङ्गत हो जाएगा । अतः इतना इसमें जोड़ना आवश्यक है कि विशेष प्रकार की अनुमिति या सिद्धि की इच्छा रहने पर एक सिद्धि के रहने पर भी दूसरी अनुमिति होती है । अतः सामान्य रूप से सभी सिद्धियाँ अनुमिति की विरोधिनी नहीं हैं, किन्तु अनुमिति की इच्छा से असंश्लिष्ट अथवा यों कहिये कि सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि की अनुमिति की विरोधिनी है । फलतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त जो सिद्धि, उसका अभाव हो अनुमिती का पक्षता रूप कारण है । इसको समझने के लिए अनुमिति की इन तीन स्थितियों को समझना आवश्यक है । ( १ ) जहां परामर्श के बाद केवल अनुमिति रूप सिद्धि रहेगी वहां उस सिद्धि के अव्यवहित उत्तर क्षण में अनुमिति नहीं होगी । क्योंकि यहां कथित पक्षता रूप कारण नहीं है । यह सिद्धि अनुमित्सा या सिषाधयिषा से युक्त नहीं है, सिषाधयिषा के विरह से युक्त है । अतः यह सिद्धि अनुमिति का प्रतिबन्धक है । सुतराम् प्रतिबन्धकाभाव रूप कारण या कथित पक्षता रूप कारण के न रहने से अनुमिति का प्रतिरोध होता है । ( २ ) जहाँ परामर्शादि कारणों के साथ अगर सिषाधयिषा भी है तो फिर उक्त परामर्शजनित अनुमिति रूप सिद्धि के बाद पुनः अनुमिति होगी । क्योंकि यह अनुमिति रूप सिद्धि सिषाधयिषा से युक्त है, सिषाधयिषा के विरह से युक्त नहीं है । अतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त न होने के कारण यह सिद्धि अनुमिति का प्रतिबन्धक नहीं है । अनुमिति का प्रतिबन्धक कोई दूसरी सिद्धि है, जिसमें सिषाध-विषा का सम्बन्ध नहीं है । उसका यहाँ अभाव है, अतः पक्षता रूप कारण के रहने से अनुमति होगी । ( ३ ) जहाँ सिद्धि नहीं है वहाँ सिषाधयिषा रहे या न रहे — दोनों ही स्थितियों में अनुमिति होगो ही । क्योंकि यहाँ कोई भी सिद्धि नहीं है, अतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि भी नहीं है । सुतराम् सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि का For Private And Personal