प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 251–260

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 251–260

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra १७६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-न्यायकन्दली सत्त्वमर्थक्रियाकारित्वम्, तच्च क्रमयौगपद्याभ्यां व्याप्तम्, क्रमाक्रमानात्मकस्य प्रकारान्तरस्यासम्भवात् । अनेकार्थक्रियाणामनेककालता हि क्रमः, यौगपद्यं चैक-कालता । न चैकाने काभ्यामन्यः प्रकारोऽस्ति, परस्परविरुद्धयोरेकप्रतिषेधस्येतर-विधिनान्तरीयकत्वात् । अक्षणिकत्वे तु न क्रमसम्भवः, समर्थस्य क्षेपायोगात् । हैं, क्षणिक वस्तुओं में आधाराधेयभाव सम्भव ही नहीं है । ( अभिप्राय यह है कि अर्थक्रियाकारित्व ही सत्य है, सत् वही है जो किसी कार्य का कारण हो ) अर्थक्रिया-कारिश्व क्रम और यौगपद्य का व्याप्य है । कार्यों की उत्पत्ति के क्रम एवं अक्रम ( यौगपद्य ) ये दो ही प्रकार हैं । इन दोनों को छोड़कर इसका कोई तीसरा प्रकार नहीं है । अनेक अर्थक्रियाओं ( कार्यों ) की एक काल में उत्पत्ति ही ' क्रम ' है । एक काल में अनेक कार्यों की उत्पत्ति ही ' अक्रम ' या यौगपद्य है, अतः इन दोनों को छोड़कर कार्योत्पति का कोई तीसरा प्रकार नहीं है । परस्पर विरुद्ध दो वस्तुओं में से एक प्रतिषेध के बिना दूसरे का विधान नहीं हो सकता । अगर वस्तुओं को क्षणिक न मानें तो कार्यों की यह क्रमशः उत्पत्ति सम्भव नहीं होगी, क्योंकि जिसमें जिस कार्य है या नहीं? '. इस विकल्प को अगर विधिकोटि मानें, अर्थात् यह कहें कि बीजों में अंकुर के उत्पादन की शक्ति है तो फिर बीज से सर्वदा - बीजों को कोठियों में रहने के समय भी - अंकुरों को उत्पत्ति होनी चाहिए । अगर निषेधकोटि मानें, अर्थात् यह कहें कि बीजों में अंकुरों के उत्पादन करने का सामर्थ्य नहीं है, तो फिर कभी भी खेत में बोने पर भी - बीजों से अंकुरों की उत्पत्ति नहीं होगी । अतः अंकुर के अव्यवहित पूर्वक्षण में बीज में एक विलक्षण धर्म की उत्पत्ति होती है, जिसका नाम है ' कुर्व्वद्रूपत्व ' । इस रूप से ही बीज अंकुर का कारण है, केवल बीजत्व रूप से नहीं, कोठियों के बीजों में बीजस्व के रहने पर भी यह ' अंकुरकुर्व्वद्रूपत्व ' धर्म नहीं है, अतः कोठी के बीजों से अंकुरों की उत्पत्ति नहीं होती है । इस प्रकार खेत में बोये हुए बीजों से कोठी के बीज भिन्न हैं, क्योंकि यह सम्भव नहीं है कि एक ही वस्तु में एक ही जाति रहे भी और न भी रहे । बीजों को यह विभिन्नता प्रत्येक क्षण में विभिन्न बीजों की उत्पत्ति के बिना सम्भव नहीं है, अतः यह समझना चाहिए कि किसी भी वस्तु को क्षणिक माने बिना उसमें अर्थक्रियाकारित्व सम्भव ही नहीं है । एवं सत्त्व अर्थक्रियाकारित्व रूप ही है, अतः यह उपसंहार कर सकते हैं कि जो भी सत् है वह अवश्य ही क्षणिक है, जैसे कि बीज, तस्मात् सभी वस्तुएँ क्षणिक हैं । आत्मा को अगर ज्ञान का समवायिकारण मानें तो उसे भो क्षणिक मानना हो पड़ेगा । अगर आत्मा क्षणिक है तो वह किसी का आश्रय नहीं हो सकता । अतः आत्मसिद्धि की कथित युक्तियां ठीक नहीं हैं । For Private And Personal

पृष्ठ 252

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] २३ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् १७७ न्यायकन्दली For Private And Personal असमर्थस्य कालान्तरेऽप्यजनकत्वस्वभावस्यानतिवृत्तेः । क्रमवत्सहकारिलाभात्क्रमेण करणं तस्येति चेत्? अत्र वदन्ति - यदि सहकारिणो भावातिशयं न जनयन्ति, नापेक्षणीयाः, अकञ्चित्किरत्वात् । जनयन्ति चेत्? स किं तावद्व्यतिरिक्तः? अव्य-तिरिक्तो वा? व्यतिरेकपक्षे तावदतिशया देवागन्तुकादन्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्योत्पत्तिरित्यक्षणिकस्य न हेतुत्वम्, सत्यपि तस्मिन्नभावात् । सहकारिकृताश-सहितस्य तस्य जनकत्वमिति चेत्? अतिशयस्यातिशयान्तरानारम्भे कीदृशी सहायता? आरम्भे चानवस्थायाः का प्रतिक्रिया? सहकारिजन्योऽतिशयः स चाक्षणिकस्येति सुभाषितम्, अनुपकार्य्यानुपकारकयोः सम्बन्धाभावात् । भावादभिन्नोऽतिशय: सहकारिभिः क्रियत इत्यपि न सुपेशलम्, भावस्य को करने का सामर्थ्य है, वह कभी नष्ट नहीं हो सकती है । एवं जो जिस कार्य को करने में असमर्थ है वह कभी उस काम को कर ही नहीं सकता है । क्रमशः कार्य करनेवाले सहकारि कारणों की सहायता से क्रमशः कार्यों की उत्पत्ति होती है ' । इस प्रसङ्ग में बौद्धगण कहते हैं कि ( प्र ० ) सहकारि कारण मुख्य कारण में किसी विशेष सामर्थ्य का उत्पादन करते हैं या नहीं? यदि नहीं करते हैं तो फिर उस कार्य के लिए वे अपेक्षित ही नहीं हैं ( फलतः कारण ही नहीं हैं ) क्योंकि वे कार्योत्पत्ति के लिए. कुछ भी नहीं करते । यदि सहकारि कारण मुख्य कारण में किसी विशेष सामर्थ्य का उत्पादन करते हैं तो फिर यह पूछना है कि यह सामर्थ्य क्या अपने आश्रयीभूत मुख्य कारण से भिन्न है. या अभिन्न? यदि भिन्न है तो फिर कार्य की उत्पत्ति उसी से होगी, क्योंकि कार्य का अभ्वय और व्यतिरेक उसी के साथ है । इस से यह सिद्ध होता है. कि अक्षणिक वस्तुओं से कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है, क्योंकि उनके रहते हुए भी ( क्षणिक उस शक्ति के विना ) कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है । ( उ ० ) सहकारी कारणों से विलक्षण शक्ति की उत्पत्ति होती है एवं उस शक्ति से युक्त बीजादि हो कारण हैं । ( प्र ० ) यह ' अतिशय ' ( विलक्षण सामर्थ्य ) उन बीजादि बस्तुओं में किसी दूसरे अतिशय को जन्म देता है या नहीं? अगर नहीं तो फिर सहायता कैसी? अगर हाँ? तो अनवस्था दोष का क्या परिहार होगा? यद्यपि यह कहना ठीक सा लगता है कि सहकारियों से अतिशय की उत्पत्ति अवश्य होती है किन्तु वह क्षणिक वस्तुओं का धर्म नहीं है, किन्तु अक्षणिकों का धर्म है । यह कहता भी ठीक नहीं हैं कि ' वह ' अतिशय या सामर्थ्य विशेष सहकारियों से अवश्य ही उत्पन्न होता है, एवं वह अपने १. अभिप्राय यह है कि बीजादि में सर्वदा अङकुरादि के उत्पन्न का सामर्थ्य है । ही । जब उसे खेत, पानी प्रभृति सहकारियों की सहायता पहुंचती है तभी उन से अङ्कुरादि कार्यों की उत्पत्ति होती है ।

पृष्ठ 253

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १७८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्य आत्म-पूर्वोत्पन्नस्य पुनरुत्पत्त्यभावात् । प्राक्तनो हि भावोऽनतिशयात्मा निवर्त्तते, अन्य-चातिशयात्मा जायत इति चेत्? क्षणिकत्वसिद्धिः । ननु क्षणिकस्यापि सहकारिभि कि क्रियते? न किञ्चित् किमर्थं तहिते अपेक्ष्यन्ते? को ब्रूते अपेक्ष्यन्ते इति, प्रत्येकमेव हि कार्यजननाय समर्था अन्त्या-वस्थाभाविनः क्षणाः, का तेषां परस्परापेक्षा? यत्तु तदानीं परस्परं प्रत्यासीदन्ति तदुपसर्पणकारणस्यावश्यम्भावनियमात् न तु सम्भूयकार्यकरणाय, तत्काले चोप-सर्पण हेतु नियमस्तेषां वस्तुस्वाभाव्यात् । प्रत्येकं समर्था हेतवः प्रत्येकं कार्यं जनयेयुः । किमित्येकमनेके कुर्व्वन्ति? अत्राप्यमीषां कारणानि प्रष्टव्यानि, यान्यप्रत्येकार्थनिर्वर्तनशीलानि प्रभावयन्ति । वयं तु यथादृष्टस्य वस्तुस्वभावस्य वक्तारो न पर्यनुयोगमर्हामः । कार्य्यमेकेनैव कृतं किमपरे कुर्व्वन्तीति चेत्? न कृतं कुर्व्वन्ति किन्त्वेकेन क्रियमाणमपरेऽपि कुर्व्वन्ति । भूत मुख्य कारण से अभिन्न है, क्योंकि अनुपकार्य और अनुपकारक में ( सहाय्य -सहायकभाव ) सम्बन्ध असम्भव है " क्योंकि एक बार उत्पन्न वस्तु की फिर से उत्पत्ति नहीं होती है । ( उ ० ) अतिशय स्वरूप पहली वस्तु का नाश होता है एवं अतिशय स्वरूप दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) फिर तो क्षणिकत्व का सिद्धान्त अटल है । ( उ ० ) वस्तुओं को क्षणिक मान लेने पर भी सहकारियों से उन्हें क्या सहायता मिलती है? ( प्र ० ) कुछ भी नहीं? ( उ ० ) फिर वे सहकारियों की अपेक्षा क्यों रखते हैं? ( प्र ० ) कौन कहता है कि बीजादि कारण अपने कार्यों के लिए सह-कारियों की अपेक्षा रखते हैं । ' अन्त्य क्षण अर्थात् कार्योत्पत्ति के अव्यवहित पूर्वक्षण में रहनेवाले सभी ( मुख्य और सहकारी दोनों ही प्रकार के ) कारण अङकुरादि कार्यों को उत्पन्न करने में समर्थ हैं । इस में सब की परस्परापेक्षा कैसी? उस क्षण में मुख्य सहकारी दोनों प्रकार के कारणों का सम्मेलन इसलिए नहीं होता कि मिलकर ही वे कार्य को उत्पन्न कर सकते हैं, किन्तु उस क्षण में नियमित रूप से सम्मेलन की सामग्री रहती है अतः उस क्षण में सभी कारण अवश्य ही सम्मिलित होते हैं । प्रश्न यह रह जाता है कि ' नियमत: उसी क्षण में क्यों एकत्र हों? इस का यही उत्तर है कि ' यह उनका स्वभाव है ' ( उ ० ) मुख्य कारण और सहकारियों में से प्रत्येक भी यदि स्वतन्त्र रूप से कार्य कर सकते हैं तो फिर वे अलग अलग अपना काम करेंगे, एक ही काम को सब मिलकर क्यों करेंगे? ( प्र ० ) यह तो उन कारणों से ही पूछिये कि प्रत्येकशः वे कार्य करने में समर्थ होते हुए भी क्यों सम्मिलित होकर एक ही कार्य को करते हुए से प्रतीत होते हैं । इस अभियोग के भागी हमलोग नहीं । हमलोग तो वस्तुओं को जैसा देखते हैं वैसा ही वर्णन करते हैं । ( उ ० ) कार्य जब एक ही कारण से सम्पादित हो जाता है तब शेष For Private And Personal

पृष्ठ 254

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १७६ यत्रैकमेव समर्थं तत्रापरेषां क उपयोग इति चेद्? सत्यम्, न ते प्रेक्षापूर्वकारिणो देवं विमृश्योदासते । एकं कार्य्यमनेकस्मादुत्पद्यत इति दुर्घटमिदम्, कारण-भेदस्य कार्य्यभेदहेतुत्वादिति चेन्नैवम्, सामग्रीभेदाद्धि कार्य्यभेदो न सहकारिभेदात् एककार्यकारितैव सहकारिता, तस्मात् क्षणिकत्वे क्रमवतां भावानां क्रमेण कार्य्यकरणं घटते, दुर्घटा तु अक्षणिकस्यार्थक्रियेति । युगपत्करण-मपि दुर्घटम्, तावत्कार्य्यकरणसमर्थस्य स्वभावस्योत्तरकालमप्यनिवृतेः । कृतस्य करणं नास्ति, कर्त्तव्यञ्चास्य न विद्यते । निखिलस्य कार्य्यकलापस्य सकृदेव कृत-त्वात् अतः क्षणान्तरे न करोतीति चेत्? तर्हि अयं तदानीमसन्नेव, समस्तार्थ-क्रियाविरहात् । तदेवं व्यापकयोः क्रमयौगपद्ययोरनुपलम्भेनाक्षणिकान्निवर्त्तमानं कारण क्या करते हैं, ठीक है वे उस एक कारण से किए जाते हुए कार्य को ही ( प्र ० ) कारण से को ही शेष करते हैं? एक उत्पन्न हुए कार्य कारण नहीं करते हैं किन्तु एक के द्वारा सम्पादित होते हुए कार्य का ही सम्पादन शेष कारण भी करते हैं । ( उ ० ) जहाँ एक ही कारण से कार्य सम्पादन की सम्भावना है वहाँ और कारणों का क्या उपयोग है? ( प्र ० ) यह आक्षेप सत्य है, किन्तु वे कारण तो कुछ समझ कर काम करने को क्षमता नहीं रखते कि एक ने इस काम को कर ही दिया तो हम लोगों को इस झंझट से क्या प्रयोजन? यह समझकर इस से उदासीन हो जाँय । ( उ ० ) फिर भी यह दुर्घट ही है कि समान शक्ति वाले अनेक कारणों से एक ही कार्य की उत्पत्ति हो, क्योंकि कारणों के भेद से ही कार्यों के भेद होते हैं । ( फलतः विभिन्न कारणों से विभिन्न हो कार्य होंगे, एक कार्य नहीं ) ( प्र ० ) यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि सहकारियों के भेद से कार्यों का भेद नहीं होता है, किन्तु सामग्रियों ( कारणसमूहों ) के भेद से कार्यों में भेद होता है । एक कार्यकारित्व ही अर्थात् मुख्य कारण से होनेवाले कार्य को मुख्य कारण के साथ मिलकर करना ही ' सहकारित्व ' है । अतः वस्तुओं को क्षणिक मानने पर ही क्रमशील भावों से क्रमशः कार्य की उत्पत्ति की सम्भावना है । अक्षणिक स्थिर वस्तुओं से कार्य की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं है । एवं युगपत्कारित्व ( एक ही काल में अनेक कार्यों का सम्पादन ) भी सम्भव नहीं है, क्योंकि एक ही काल में अनेक कार्यों की सम्पादकता ही ' युगपत्कारिता ' है, इस युगपत्कारिता रूप सामर्थ्य का तो कारणों से लोप नहीं होगा? तब फिर उन्हीं कार्यों की उत्पत्ति बराबर होती रहेगी । ( उ ० ) उत्पन्न कार्यों की फिर से उत्पत्ति नहीं हो सकती है । अपने से होनेवाले सभी कार्यों का सम्पादन वह कर चुका है यतः उस को कुछ कर्तव्य भी नहीं है । अतः उसके बाद वह कार्य का सम्पादन नहीं कर सकता । ( प्र ० ) फिर आगे के क्षणों में उस की सत्ता ही सम्भव नहीं है, क्योंकि उन क्षणों में उस में किसी किसी अर्थक्रिया का For Private And Personal

पृष्ठ 255

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १८० न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-सत्त्वं क्षणिके व्यवतिष्ठते । तथा च सति सुलभं क्षणिकत्वानुमानं यत् सत् तत् क्षणिकं, सन्ति च द्वादशायतनानीति । अत्रोच्यते - न सत्त्वात् क्षणिकत्वसिद्धिः, तस्य विपक्षव्यावृत्त्यनवगमात् । यत्क्रमयौगपद्यरहितं तदसत् यथा वाजिविषाणम्, क्रमयौगपद्यरहितञ्चाक्षणिकमिति बाधकेनाक्षणिकात् क्रमयौगपद्यव्यावृत्त्या सत्त्वव्यतिरेकप्रतीतिरिति चेन्न, अक्षणिकस्याप्रतीतौ सत्त्वस्य ततो व्यावृत्ति-प्रतीत्यसम्भवात्, यथा प्रतीयमाने जले तत्र वह्निधूमयोरभावप्रतीतिः " एवमक्ष-णके f दृश्यमाने क्रमयौगपद्याभावात्सत्त्वाभाव: प्रत्येतव्यः । न चाक्षणिको नाम कश्चिदस्ति भवताम्, यथाऽप्रतीयमानेऽपि पिशाचे ततोऽन्यव्यावृत्तिः प्रतीयते जनकत्व नहीं है । अतः सत्त्व के व्यापक क्रमकारित्व युगपत्कारित्व ये दोनों ही अक्षणिक स्थिर वस्तुओं में नहीं रह सकते ( अतः अक्षणिक स्थिर किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है ) फलतः सत्त्व क्षणिक वस्तुओं में ही नियमित हो जाता है । अत: सभी वस्तुओं में क्षणिकत्व का यह अनुमान सुलभ हो जाता है कि जो सत् है अवश्य ही क्षणिक है, जैसे कि द्वादश आयतन । ( उ ० ) हम लोग इस आक्षेप का यह समाधान करते हैं कि सत्त्व हेतु से क्षणिकत्व की सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि इस अनुमान के हेतु में ' विपक्षव्यावृत्ति ' अर्थात् विपक्षासत्त्व का ज्ञान नहीं हो सकता है । ( प्र ० ) " जिसमें न क्रमशः कार्य के उत्पादन का सामर्थ्य है अर्थात् क्रमकारित्व है और न कार्यों को एक ही समय में उत्पादन का सामर्थ्य अर्थात् युगपत्कारित्व है वह सत् भी नहीं है जैसे कि घोड़े की सींग ” इस बाधक अनुमान के बल से स्थिर वस्तुओं से सत्व हट जाता है, अतः स्थिर वस्तुओं में सत्त्व के अभाव की प्रतीति होती है । अक्षणिक वस्तु ही प्रकृत में विपक्ष है । अत. अक्षणिक वस्तु रूप विपक्ष के ज्ञान के विना विपक्षव्यावृति का ज्ञान सम्भव नहीं है । प्रतीत होनेवाले जल में ही वह्नि और धूम के अभाव की प्रतीति होती है । इसी प्रकार जब अक्षणिक कोई वस्तु देखी जायेगी तब उस में क्रम और योगपद्य के न होने . से सत्र का अभाव समझेंगे । किन्तु आप ( बौद्ध ) के मत में कोई भी वस्तु अक्षणिक १. अभिप्राय यह है कि वही हेतु साध्य का ( १ ) पक्ष सत्त्व ( २ ) सपक्षसश्व ( ३ ) विपक्षासत्त्व असत्प्रतिपक्षितत्व ये पाँच रूप निर्णीत रहे । प्रकृत हेतु में विपक्षध्यावृत्ति या विपक्षासत्त्व का निर्णय नहीं हो संसार की सभी वस्तुओं में क्षणिकत्व का साधन करते हैं । अन्तर्गत आ गये हैं । विपक्ष के लिए कोई बचा ही नहीं ज्ञापक हो सकता है जिसमें ४ ) अबाधितत्व एवं ( ५ ) क्षणिकत्व के साधक सत्त्व सकता है, क्योकि बौद्धगण अतः सभी पदार्थ पक्ष के हो । अतः प्रकृत में विपक्ष को अप्रसिद्धि के कारण विपक्षव्यावृत्ति भी अप्रसिद्ध ही है । अतः साध्यसाधक हेतु का ज्ञान न होने के कारण प्रकृतानुमान ठीक नहीं है । For Private And Personal

पृष्ठ 256

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 256 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १८१ स्तम्भः पिशाचो न भवतीति तद्वदेतदपि भविष्यती ' ति चेद्? न व्यावृत्तेर-नुपलब्धिप्रमाणैकगोचरत्वात् तद्विविक्तेतरपदार्थोपलब्धिस्वभावत्वाच्चानुपलब्धेः प्रतियोग्युपलब्धिमन्तरेणाभावात् । न च स्वरूपविप्रकृष्टत्वे पिशाचस्य ततो व्यावृत्तिप्रतीतिसम्भवः । कथं तहि स्तम्भः पिशाचो न भवतीति प्रतीतिरिति चेत्? नायं संसर्गप्रतिषेधः, किन्तु तादात्म्यप्रतिषेधोऽयम् । स च स्तम्भात्मतया प्रसञ्जितस्य पिशाचस्य दृश्यत्वाभ्यनुज्ञानात् प्रवर्त्तते नान्यथा, यथोक्तम्--“ तादात्म्येन यावान्निषेधः स सर्व उपलब्धिलक्षणप्राप्तत्वाभ्युपगमेन क्रियते " इति । तत्र स्तम्भस्वरूयैकनियता स्तम्भप्रतीतिस्तदनात्मन्यवच्छेदकारणम्, यदि स्तम्भः पिशाचो भवेत् तेनाप्यात्मना ज्ञातः स्यात् । न च ज्ञानं स्तम्भत्ववत्पिशाचात्मता-मपि गृह्णाति तस्मादयं पिशाचो न भवतीति । अथ मतम्, न नीलादिव्यतिरिक्तोऽक्षणिक क्षणिको वा कश्चिदस्ति, नहीं है । ( प्र ० ) जैसे कि अप्रतीत पिशाच में अन्य से व्यावृत्ति की यह प्रतीति होती है कि ' स्तम्भ पिशाच नहीं है ' यहाँ भी वैसे ही विपक्ष - व्यावृत्ति की प्रतीति होगी? ( उ ० ) ' व्यावृत्ति ' अर्थात् वृत्तित्व के अभाव का निश्चय अनुपलब्धिरूप अभाव प्रमाण से ही हो सकता है । अनुपलब्धि केवल उपलब्धि का अभाव ही नहीं है, किन्तु प्रतीत होनेवाले अभाव के प्रतियोगी से भिन्न की उपलब्धिरूप है । अतः ( विरक्ष व्यावृत्ति में अपेक्षित ) अनुपलब्धि साध्याभाव के प्रतियोगीरूप साध्यकी उपलब्धि के विना असम्भव है ( अर्थात् पिशाच की, यदि असत्ता सिद्ध हो जाय तो फिर उस का ज्ञान ही असम्भव है ' ) ( प्र ० ) तो फिर स्तम्भ पिशाच नहीं है ' यह प्रतीति कैसे होती है? ( उ ० ) यह संसर्ग के अर्थात् आधारआधेयभाव के नियामक पिशाच के सम्बन्ध के अभाव की प्रतीति नहीं है, किन्तु यह उस के तादात्म्य के प्रतिषेध की प्रतीति है, यह भी स्तम्भ रूप से सम्भावित पिशाच को दृश्य मान कर ही प्रवृत्त होता है, अन्यथा नहीं, । जैसा कहा है कि तादात्म्य सम्बन्ध से जितने निषेधों की प्रतीति होती है वे निषिद्ध होनेवाले सभी वस्तुओं की सत्ता मान कर ही होती है । यहाँ केवल स्तम्भ में ही होनेवाली ' यह स्तम्भ है ' यह प्रतीति ही स्तम्भ के स्वरूप से भिन्न पिशाचादि के निषेध का कारण होती है । तदनुकूल न्याय का प्रयोग ऐसा है कि ' अगर यह स्तम्भ पिशाच होता तो यह पिशाचत्व रूप से ज्ञात होता, किन्तु स्तम्भोऽयम् ' यह ज्ञान स्तम्भत्व की तरह पिशाचत्व को समझाने में असमर्थ है । अतः स्तम्भ पिशाच नहीं है । ( प्र ० ) प्रतीत होनेवाले नीलादि पदार्थों से भिन्न क्षणिक या अक्षणिक कोई पदार्थ है ही नहीं किन्तु पहले की बुद्धि से ज्ञात नीलादि क्षणों में जब वर्त्तमान कालिक For Private And Personal

पृष्ठ 257

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 257 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-किन्तु प्राक्तनबुद्धिवेद्यो नीलादिक्षणोऽधुनातनबुद्धिवेद्यान्नीलक्षणादभेदेनारोप्य-माणोऽक्षणिक इत्युच्यते । भेदेन व्यवस्थाप्यमाणश्च क्षणिक इति । तत्र नीला-दिष्वेव क्रमाक्रमव्यावृत्त्या सत्वाभावप्रतीतिः । यदि पूर्वोपलब्धक्षण एवाय-मुपलभ्यते तदा सम्प्रतितनीमर्थक्रियां प्रागेव कुर्य्यात्, प्राक्तनीं वा सम्प्रत्येव, न पुनः क्रमेण कुर्य्यात्, एकस्य कारकत्वाकारकत्वविरोधात् । नापि सर्व पूर्वमेव कुर्य्यात्, सम्प्रत्यर्थक्रियारहितस्यासत्वप्रसङ्गादिति । तत्रापि किमेवं सत्त्वस्य तोर्वास्तवो विपक्षो दर्शितः? कल्पनासमारोपितो वा समर्थित:? न ताव -द्वास्तव विपक्ष:, नीलादीनामक्षणिकस्यावास्तवत्वात्, तस्मादनुमानाद्वास्तवीमर्थगति-मिच्छता लिङ्गस्य त्रैरूप्यविनिश्वयार्थ धूमानुमानवत् सर्वत्र प्रमाणसिद्धः पक्षा-दिभाव दर्शयितव्यः, न कल्पनामात्रेण । न चाक्षणिकस्तथाभूतोऽस्तीति व्यतिरेका-सिद्धिः । तदसिद्धावन्वयस्याप्यसिद्धिस्तस्यास्तत्पूर्वकत्वादित्यसाधारणत्वं हेतोः । बुद्धि के द्वारा ज्ञात क्षण का अभेदभ्रम होता है तभी नीलादि अक्षणिक ( स्थिर ) कहलाते हैं । जब वे ही क्षण भिन्न भिन्न रूप से ज्ञात होते हैं तभी नीलादि क्षणिक कहलाते हैं । यही स्थिर रूप से अभिमत नीलादि न क्रमशः कार्यों का उत्पादन कर सकते हैं, न एक ही समय में ( युगपत् ) कार्यों का उत्पादन कर सकते हैं । इस ( क्रम योग-पद्याभाव ) की प्रतीति से स्थिर रूप से अभिमत नीलादि में हो सत्त्व के अभाव की प्रतीति होगी । क्योंकि अगर पहिले के ज्ञात क्षण में ही नीलादि की प्रतीतियाँ होती हैं, तो फिर वह ( क्षण ) अभी उत्पन्न होने वाले कार्यों को पहिले ही उत्पन्न करता, या पहिले उत्पन्न होनेवाले काय को अभी उत्पन्न करता । किन्तु क्रमशः तो वह कार्यों का उत्पादन कर नहीं सकता है, क्योंकि एक ही वस्तु में कारकत्व एवं अकारकत्व दोनों विरुद्ध धर्मों का समावेश असम्भव है । यह भी सम्भावना नहीं है कि सभी कार्यों को पहिले ही कर देता है तब तो इस समय अर्थ क्रिया से रहित होने के कारण वस्तु की ( वर्त्तमान काल में सत्ता हो ) उठ जायगी । ( उ ० ) आप के प्रदर्शित विपक्ष की ( स्थिरत्वेन व्यवहृत नीलादि की ) सत्ता यथार्थ है? या काल्पनिक? इस की सत्ता वास्तविक तो है नहीं, क्योंकि उक्त नीलादि का अक्षणिकत्व ( आप के मत से ) अवास्तविक है । अतः अनुमान के द्वारा वास्तव वस्तुओं की सिद्धि की इच्छा रखनेवाले को चाहिए कि हेतु के तीनों रूपों ( पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व, एवं विपक्षासत्त्व ) के निश्चय के लिए धूमानुमान की तरह पक्षादि ( पक्ष, सपक्ष, एवं विपक्ष ) की काल्पनिक नहीं, वास्तविक सत्ता दिखलावे, किन्तु आप के मत से अक्षणिक वस्तुओं की वास्तविक सत्ता है नहीं । फलत: व्यतिरेक व्याप्ति भी नहीं बन सकती है | ( क्योंकि विपक्ष असिद्ध है ) इसी तरह अन्वय व्याप्ति भी नहीं बन सकती है, For Private And Personal

पृष्ठ 258

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 258 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १८३ अपि च बाधकेनाक्षणिकात् सत्त्वव्यतिरेक: प्रसाधितः, क्षणिकत्वसत्वयोरन्वयः कुतः सिद्धयति? न च तत्र विपक्षव्यावृत्तिमात्रेण हेतुत्वमसाधारणस्यापि हेतुत्व-प्रसङ्गात् । केवलव्यतिरेक्यनुमानञ्च स्वयमनिष्टम् । अक्षणिकेऽपि सत्त्वं न भवतीत्यवस्थापितेऽर्थात् क्षणिकाश्रयं सत्त्वमित्यन्वयसिद्धिरिति चेत्? न तावदर्थादिति सत्त्वस्य हेतोः परामर्शः, असिद्धान्वयस्य तस्याद्यापि हेतुत्वा-भावात् । बाधकमेव तूभयव्यापारं प्रमाणन्तरं व्याप्ति प्रसाधयद् द्वादशायतनेष्वेव प्रसाधयेन्निव्विषयाया व्याप्तेः प्रत्येतुमशक्यत्वात्, द्वादशायतनव्यतिरिक्तस्य चार्थस्या-भावात् । तेषु चान्वयप्रतीतौ क्षणिकत्वस्यापि प्रतीति:, सम्बन्धिप्रतीतिनान्तरीय-कत्वात् सम्बन्धप्रतीतेरिति सत्त्ववैयर्थ्यम् । पक्षे सामान्येन व्याप्तिग्रहणं, विशेषे सत्वस्य हेतुत्वमिति चेन्न, निर्विशेषस्य सामान्यस्य प्रतीतेरभावात् । विशेष-क्योंकि अन्वयव्याप्ति में भी विपक्ष का ज्ञान आवश्यक है | अतः कथित सत्त्व रूप हेतु ( केवल पक्ष में ही रहने के कारण ) असाधारण नाम का हेत्वाभास है । और भी बात है कि ( कार्यकारणभाव की अनुपपत्ति रूप ) बाध मूलक अक्षणिकत्व हेतु से विपक्ष में असस्त्र रूप साध्य के अभाव का आपने निश्चय किया है, किन्तु क्षणिकत्व और सत्व में ( नियत ) सामानाधिकरण्य रूप अन्वय ( व्याप्ति ) किस हेतु से सिद्ध होगा? केवल विपक्ष में न रहने से ही हेतु साध्य का साधन नहीं कर सकता है । क्योंकि इस प्रकार तो असाधारण हेत्वाभास से भी यथार्थ अनुमिति की आपत्ति होगी । केवल व्यतिरेकी अनुमान तो स्वयं ही दूषित है । ( प्र ० ) अक्षणिकों ( स्थिरों ) ' सत्त्व नहीं है ' यह सिद्ध हो जाने पर यह ' अन्वय ' अर्थात् सिद्ध हो जाता है कि ' सत्त्व क्षणिक वस्तुओं में ही है । ( उ ० ) " अर्थात् " पञ्चमी विभक्ति युक्त इस हेतु बोधक पद से ' सत्त्व ' हेतु ही अभिप्रेत है, किन्तु अन्वय के असिद्ध होने के कारण उसमें हेतुत्व ही असिद्ध 1 ( 50 ) कथित कार्यकारणभाव की अनुपपत्ति रूप दोष के ही दो व्यापारों की कल्पना करेंगे, एक से अक्षणिकों में असत्त्व की सिद्धि होगी और दूसरे से क्षणिकों में सत्व की सिद्धि होगी । अथवा वही बाधक अम्वयसाधक दूसरी व्याप्ति रूप प्रमाण को उपस्थित करता हुआ द्वादशायतनों में ही सत्त्र को सिद्ध करेगा । क्योंकि व्याप्ति की प्रतीति विषय के विना नहीं हो सकती है । एवं द्वादशायतनों से भिन्न किसी की सत्ता है नहीं । उस में अन्वय की प्रतीति से क्षणिकत्व की प्रतीति अवश्य होगी । वस्तु क्योंकि जहाँ सम्बन्ध की प्रतीति रहेगी वहाँ सम्बन्धियों को भी प्रतीति अवश्य ही रहेगी । अतः पहिले पक्ष में सत्त्वसिद्धि की कोई आवश्यकता नहीं है: व्याप्ति सामान्य रूप से ही गृहीत होगी और सत्त्व हेतु से विशेष की सिद्धि होगी ' अर्थात् उस सामान्य व्याप्ति से ही विशेष तत्तद्वयक्तियों में सत्त्व की सिद्धि होगी । ( उ ० ) For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-परिनिष्ठयोश्च क्षणिकत्वसत्त्वसामान्ययोः प्रतीयमानयोर्नीलादिगतं क्षणिकत्वं प्रतीतमिति सूक्तं व्यावृत्त्योर्व्याप्तिग्रहणम्, सत्त्ववैयर्थ्यमिति । बाधकक्षणिकत्वव्यावृत्त्यत्त्व-सत्त्वात्तु वस्त्वात्मकक्षणिकत्वप्रतीतिरिति चेन्न, व्यावर्त्यभेदेन कल्पितभेदयोर्व्यावृत्त्योस्तादात्म्यभावात् । तादात्म्यञ्चानुमानाङ्ग-मुक्तम्, वस्त्वात्मनोः क्षणिकत्वसत्त्वयोस्तादात्म्यभावात् । तदात्मकत्वेनाध्यवसित-योरपि व्यावृत्त्योस्तादात्म्यमिति चेत्? न वस्तुनोस्तादात्म्यस्यान्यतोऽप्रसिद्धः, प्रसिद्धौ वा बाधकस्यापि वैयर्थ्यम् । न च व्यावृत्त्योः प्रतिबन्धनिश्चये वस्तुसिद्धि-रस्ति वस्त्ववस्तुनोर्भेदादसम्बन्धाच्च । यदयुक्तम् - धर्मोत्तरेण घटे बाधकेन व्याप्ति प्रसाध्य शब्दे सत्त्वात् क्षणिकत्वप्रसाधनमित्युभयोरपि सार्थकत्वं विषयभेदादिति । तत्रापोदमुत्तरम् । यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि विशेषों को छोड़कर सामान्य की प्रतीति नहीं होती है | एवं जब कि विशेष व्यक्तियों में क्षणिकत्व सामान्य और सत्व सामान्य की सिद्धि उस सामान्य व्याप्ति से हो ही गयी तो फिर नीलादि वस्तुओं में भी क्षणिकत्व ज्ञात हो ही गया । उसके लिए सत्त्व हेतु की फिर से आवश्यकता नहीं है अतः हम ने ठीक ही कहा है कि सत्त्व हेतु की कोई सार्थकता नहीं है । ( प्र 1 ) कार्यकारणभाव की अनुपपत्ति रूप बाधक से ही अक्षणिकत्वव्यावृत्ति ' ( अक्षणिकत्वाभाव ) एवं ' असत्त्व-व्यावृत्ति ' ( अर्थात् असत्त्वाभाव ) इन दोनों की व्याप्ति का ज्ञान होता है और सत्त्व से भावस्वरूप क्षणिकत्व की प्रतीति होती है । ( उ ० ) व्यावर्त्य ( व्यावृत्ति के अभाव के प्रतीति का प्रयोजक ) के भेद से ( असत्त्वव्यावृत्ति एवं अक्षणिकत्व व्यावृत्ति इन ) दोनों व्यावृत्तियों में भी भेद की कल्पना करनी पड़ेगी । किन्तु साध्य और हेतु के तादात्म्य को आप ( बौद्ध ) अनुमान का अङ्ग मानते हैं । ( प्र ० ) भावस्वरूप क्षणिकत्व और सत्त्व इन दोनो में तो तादात्म्य है ही, इस वादात्म्य से ही, ' सत्त्व और क्षणिकत्व ' इन दोनों के अभिन्न रूप से कल्पित अक्षणिकत्वव्यावृत्ति और असत्त्वव्यावृत्ति इन दोनों में भी तादात्म्य होगा । ( उ ० ) वस्तुओं का तादात्म्य किन्हीं और चीजों से साधन करने योग्य वस्तु नहीं है । अगर वह तादात्म्य अन्य वस्तु से ही सिद्ध हो तो फिर उक्त कार्यकारणभाव की अनुपत्ति का प्रदर्शन ही व्यर्थ है । ( अभाव रूप ) दोनों व्यावृत्तियों में व्याप्ति निश्चय होने पर भी क्षणिकत्व रूप भाव पदार्थ की सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि भाव और अभाव दोनों भिन्न वस्तुएँ हैं । एवं इन दो विरुद्ध वस्तुओं में सम्बन्ध भी असम्भव है । धर्मोत्तर ने यह कहा है कि ( प्र ० ) उक्त बाधक के बल से घटादि में व्याप्ति की सिद्धि के बाद शब्दादि में सत्त्व हेतु से क्षणिकत्व की सिद्धि करेंगे । इस For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] २४ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् १८५ न्यायकन्दली For Private And Personal घट इव शब्देऽपि बाधकस्य प्रवृत्त्यविरोधात् प्रमाणान्तरानुसरणमफलमिति । न चाक्षणिकस्यार्थक्रियानुपपत्तिः, सहकारिसाहित्ये हि सति कार्य्यकरणस्वभावो हि भावो नानपेक्ष कारकस्वरूपः, तस्य यथान्वयव्यतिरेकावगतसामर्थ्याः सह-कारिणः सन्निपतन्ति तथा कार्य्योत्पत्तिरित्युपपद्यते स्थिरस्यापि क्रमेण करणम् । अनेककारणाधीनस्य कार्य्यस्यैकस्मादुत्पत्त्यभावात् । न च सहकारिसापेक्षित्वे सति सत्कृतादेवातिशयात् कार्य्योत्पत्तेर्भावो न कारक इति युक्तम्, भावस्वरूपा-नुगमनेन काय्र्योत्पाददर्शनात् । अकारकत्वे हि यवबीजस्य क्षित्युदकसंनिधौ शालिबीजाद्यङ्कुरोऽपि स्यात्, नियमकारणाभावात् । नापि सहकारिणो भावस्य स्वरूपातिशयमादधति, किन्तु सहकारिण एव ते । अतिशयः पुनरेतस्य सहकारि-साहित्यम् अनतिशयोऽपि तदभाव एव तस्मिन् सति ततः कार्य्यस्य भावाद-प्रकार बाधक के उपन्यास और सत्व हेतु दोनों की सार्थकता विषय भेद से है | ( उ ० ) किन्तु उनका यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि शब्दादि में ( घटादि पदार्थों की तरह ) उस बाधक के बल से ही क्षणिकत्व की सिद्धि होगी, उसके लिए भी सत्त्व हेतु का अवलम्बन व्यर्थ ही है । वस्तुतः यह कहना ही भूल है कि ' वस्तुएँ अगर क्षणिक न मानी जाँय तो उन से अर्थक्रिया का सम्पादन असम्भव है ' । क्योंकि वस्तुओं का यह स्वभाव है कि वे सह-कारियों से सहायता प्राप्त करके ही कार्यों का सम्पादन करती हैं उन से निरपेक्ष रह कर नहीं । अतः यह निश्चित होने में कोई बाधा नहीं है कि अन्वय और व्यतिरेक से जिस में कार्य को उत्पन्न करने का सामार्थ्यं ज्ञात हो गया है, वे सहायक जब बीजादि प्रधान कारणों के साथ सम्मिलित होते हैं तभी कार्यों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार स्थिर वस्तुओं से भी क्रमशः कार्यों की उत्पत्ति हो सकती है । क्योंकि अनेक कारणों से उत्पन्न होने से एक कार्य की उत्पत्ति केवल किसी एक कारण से नहीं हो सकती है | ( प्र ० ) तब फिर सहकारि कारणों से उत्पन्न ' अतिशय ' रूप विलक्षण सामर्थ्य से ही उत्पत्ति होगी, ' भाव ' ( अर्थात् बीजादि मुख्य कारणों ) को कारण मानने की क्या आवश्यकता है? ( उ ० ) इसलिए कि कार्यों में भावों के मूल कारणों की अनुवृत्ति देखी जाती है । यदि बीज ( अङ्कुर का ) कारण ही न हो, तो फिर यब के बीज से पृथिवी जलादि सहकारियों का संनिधान रहने पर धान के अङ्कुरः की भी उत्पत्ति होगी । क्योंकि ( यत्र बीज से यवाङ्कुर ही हों एवं धान्य बीज से धान्याकुर ही ) इस नियम का कोई ज्ञापक नहीं है । यह कहना भी दूषित है कि मूल कारण में सहकारिकारणों से किसी अतिशय की उत्पत्ति होती है । क्योंकि वे सहकारी हो हैं और उन का साहित्य ही ' अतिशय ' है, इस साहित्य का अभाव ही ' अनतिशय ' अर्थात् विलक्षण सामर्थ्य का न रहना है । ( प्र ० ) मूल