प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 261–270
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 261–270
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १८६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-न्यायकन्दली सत्यभावात्, जनकाजनकक्षणभेदाभ्युपगमः सर्वदावस्थानग्राहिप्रत्यक्षबाधितः, सुसदृशक्षणानामव्यवधानोत्पादेनान्तराग्रहणादवस्थानभ्रमोऽयमिति चेत्? स्थिते क्षणिकत्वे प्रत्यक्षस्य भ्रान्तता, तद्भ्रान्तत्वे च क्षणिकत्वसिद्धिरित्यन्योन्यापेक्षता । न च यद्यस्योत्पत्तिकारणं विनाशकारणश्वान्वयव्यतिरेकाभ्यामवगतं तयोरभावे तस्योत्पत्तिविनाशकल्पना युक्ता, निर्हेतुको विनाशो, बीजमपि बीजस्य कारण-मिति चासिद्धम् । अङ्कुरजनकं बीजं बीजकृतं न भवति बीजत्वाच्छालिस्तम्भ-मूर्द्धस्थितबीजवत् । निर्भागं वस्तु तस्य कारकत्वमकारकत्वञ्चेत्यंशावनुपपन्नाविति यत् किश्विदेतत् । यथा वदहिं प्रति कारकत्वम्, अकारकत्वश्व स्नानं प्रति, कारण को जिस क्षण में सहकारियों का साहित्य मिलता है, उस से अव्यवहित आगे कार्य की उत्पत्ति होती है । और जिन क्षणों में वह साहित्य उन को नहीं मिलता है । उनसे अव्यवहित अग्रिम क्षण में कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है । इस अन्वय और व्यतिरेक से यह समझते हैं कि वह साहित्यक्षण ही ' जनकक्षण ' है और उस से भिन्न सभी ' अजनकक्षण ' है ( दो प्रकार के क्षणों में रहनेवाले बीजादि कोई एक स्थिर वस्तु नहीं हैं ) ( उ ० ) किन्तु ' जिस बीज को मैंने कल घर में देखा था उसी बीज को आज खेत में देख रहा हूँ इस प्रकार एक ही बीज में अनेक कालों के सम्बन्ध का ग्राहक प्रत्यक्ष बीजों के क्षणिकत्व का बाधक है । ( प्र ० ) एक ही बीज में अनेक कालों के सम्बन्ध का भान इस लिए होता है कि उत्पन्न हुए अनेक बीजक्षण परस्पर अत्यन्त सदृश हैं, अतः उन का परस्पर भेद समझ नहीं पड़ता है । फलतः एक हो बीज में अनेक कालों के सम्बन्ध का ग्राहक उक्त प्रत्यक्ष ही भ्रम रूप है । ( उ ० ) उक्त प्रत्यक्ष भ्रान्त क्यों है? इस लिए कि सभी वस्तुएँ क्षणिक हैं । सभी वस्तुएँ क्षणिक क्यों है? इसलिए कि उक्त प्रत्यक्ष भ्रान्ति रूप है । इस प्रकार इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष स्पष्ट है । यह तो ठीक नहीं है कि अन्वय और व्यतिरेक से जिन में उत्पत्ति और विनाश की कारणता सिद्ध हो गयी है उन के बिना भी उत्पत्ति और विनाश माने जाँय । एवं ये दोनों बातें भी ठीक नहीं है कि ( १ ) विनाश विना कारण के हो उत्पन्न होता है एवं ( २ ) बीज ही बीज का कारण है । ( ' बीज हो बीज का कारण नहीं है ' इस में यह अनुमान भी प्रमाण है कि ) बीज अङकुरजनक बीज का कारण नहीं है क्योंकि मञ्च पर रखे हुये बीज की तरह वह भी बीज है आप ( बौद्धों ) का यह कहना भी ठीक नहीं है कि ( प्र ० ) ' वस्तुओं के अनेक भाग नहीं हैं अतः एक ही वस्तु में कारकत्व और अकारकत्व इन दोनों विरुद्ध धर्मों का समावेश नहीं हो सकता है ' ( उ ० ) क्योंकि एक हो अग्नि में दाह का कारकत्व भी है एवं स्नान का अकारकत्व For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १८८७ न च ताभ्यामस्य स्वरूपभेद:, तथैकस्यैव भावस्य सहकारिभावात्कारकत्वमकार-कत्वश्व तदभावात् कथमन्यस्य सन्निधावन्यस्य कारकत्वं कारकत्वेऽपि कथं कस्यचिदेव न सर्वस्येति चेत्? अत्र वस्तुस्वभावाः पर्य्यनुयोक्तव्याः । वयन्तु यत्र येषामन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्यमवगच्छामः, तत्र तेषामेव सामग्रीभाव-मभ्युपगच्छन्तो नोपालम्भमर्हामः । त्वत्पक्षे s पि क्षित्युदकबीजानामेवाङ्कुरो-पत्तौ सहकारिता नापरेषाम्, ( अत्र ) तवापि वस्तुस्वभावादपरः को हेतुः? प्रत्येकमेव बीजादयः समर्था न परस्परसहकारिण इति चेत्? किमर्थं तहि कृषीबल: परिकषितायां भूमौ बीजमावपति उदकञ्चासिश्वति? परस्परा-धिपत्येन तेभ्यः प्रत्येकमङ्कुरजननयोग्यक्षणजननायेति चेत्? यद्यङ्कुरजनन-योग्यक्षणोपजननाय बीजं स्वहेतुभ्यः समर्थमुपजातं किमवनिसलिलाभ्याम्? अथासमर्थम्? तथापि तयोरकिञ्चित्करः सन्निधिः स्वभावस्यापरित्यागात् । क्षित्युदकाभ्यां बीजस्य स्वसन्तानवत्तन्यसमर्थक्षणान्तरारम्भणशक्तिनिरुद्धयते भी है । इस कारकत्व या अकारकत्व से वह्नि में कोई अन्तर नहीं आता है । इसी प्रकार एक भाव ( बीजादि ) में सहकारियों के सहयोग से कारकत्व और असहयोग से अकारकत्व दोनों ही रह सकते हैं ( इसके लिए उन के स्वरूप में कोई अन्तर मानने की आवश्यकता नहीं है ) ( प्र ० ) अन्य वस्तुओं के सांनिध्य से अन्य वस्तु में कारकत्व ही क्यों आता है? और कुछ विशेष वस्तुओं में ही वह क्यों सीमित रहता है? सभी वस्तुओं में नहीं । ( उ ० ) यह अभियोग तो वस्तुओं के स्वरूप के ऊपर लाना उचित है, हम लोगों के ऊपर नहीं । पृथिवी, जल और बीज ये तीन ही अङकुर के उत्पादन में परस्पर सहकारी हैं ' इस अपने पक्ष में आप ही स्वभाव को छोड़ कर और क्या उत्तर देंगे । ( प्र ० ) बीजादि प्रत्येक ही स्वतन्त्र रूप से ) अङ्कुर के उत्पादन में समर्थ है, वे तो परस्पर सहकारी नहीं हैं । ( उ " ) तो फिर जोते हुए खेत में बीजों को बो कर उसे पानी से सींचते क्यों हैं? ( प्र ० उन सभी कारणों से परस्पर के आधिपत्य के द्वारा अङ्कुरोत्पत्ति की योग्यता रखने वाले क्षण की उत्पत्ति के योग्य क्षण की उत्पत्ति के लिए ही जल सिवनादि की आवश्यकता होती है । ( उ ० ) यदि बीज में अपने कारणों से ही अङ्कुर के उत्पादन योग्य क्षण को उत्पन्न का सामर्थ्य उत्पन्न होता है तो फिर खेत और जल वहाँ क्या करते हैं? अगर बीज उस में असमर्थ है तो असामर्थ्य रूप अपने स्वभाव को छोड़ नहीं सकता है । ( प्र ० ) प्रत्येक क्षण में रहनेवाले बीज अनेक हैं, सुतरामु क्षण भी अनेक हैं, उन क्षणों के समूह में से जो क्षण अकुर के उत्पादन में असमर्थ है उन में अङ्कुर की उत्पादिका शक्ति को जल और पृथिवी रोकते हैं । ( उ ० ) मान लिया कि पृथिवी और जल से असमर्थ क्षण की For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १८५ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये सृष्टिसंहार-इति चेत्? अस्तु तस्मादसमर्थक्षणानुत्पत्तिः, समर्थक्षणोत्पत्तिस्तु दुर्लभा कारणाभावात् । न च स्वभावभूतायाश्शक्तेरस्ति निरोधो भावस्यापि निरोध-प्रसङ्गात् । सहेतुकश्च विनाशः प्राप्नोति, विशिष्टक्षणोत्पादनशक्त्याधानश्व बीजस्याशक्यं, क्षणिकत्वात् । स्वभावाव्यतिरिक्तशक्त्युत्पादने चोत्पन्नोत्पादन-प्रसङ्गात् । तस्मादसमर्थस्योत्पादवतो न काचित् क्रिया, समर्थस्योत्पादानन्तरमेव करणमिति द्वयी गतिः । न त्वर्थान्तरसाहित्ये सति करणम्, तस्यानुपयोगात् । अथ मतम् एकस्मात्कार्य्यानुत्पत्तेर्बहुभ्यश्च तदुत्पत्तिदर्शनात् सहितानामेव सामर्थ्यमिति? किमित्येवं वदद्भ्योऽस्मभ्यं भ्राम्यति भवान्? तदेवमक्षणिकस्यार्थक्रियोपपत्तेर-नैकान्तिको हेतुः । यदप्युक्तं कृतकानामवश्यम्भावी विनाशः, तेनापि शक्यं क्षणिकत्व-मनुमातुम्, तथाहि यद्येषां ध्रुवभावि तत्र तेषां कारणान्तरापेक्षा नास्ति, यथा उत्पत्ति रोकी जाती है । फिर भी समर्थक्षण की कोई कारण नहीं है । एवं स्वभाव रूप शक्ति का भाव का अर्थात् वस्तु । उत्पत्ति असम्भव ही है, क्योंकि उसका कभी नाश नहीं होगा, क्योंकि इससे का भी नाश हो जायगा अतः विनाश का भी कारण अवश्य है । यह कहना भी ठीक नहीं है कि ( प्र ० ) सहकारियों में बीजादि में समर्थ क्षण की उत्पत्ति की शक्ति लायी जाती है, ( उ ० ) क्योंकि बीजादि क्षणिक हैं । स्वभाव से अभिन्न ही शक्ति का यदि उत्पादन मानें तो फिर वह उत्पन्न वस्तु का ही पुनरुत्पादन होगा | अतः आप के मत में भी ये दो ही गतियाँ सम्भव हैं कि ( १ ) जो उत्पत्तिशील होने पर भी असमर्थ हैं उनसे कभी कार्यों की उत्पत्ति हो ही नहीं सकती है । या फिर ( २ ) उन में जो समर्थ हैं वह उत्पन्न होने के बाद ही अपना काम करेगा । किन्तु यह तो ( आप के मत में ) सर्वथा असम्भव है कि सहकारियों की सहायता से मुख्यकारण भाव कार्य को उत्पन्न करते हैं । ( प्र ० ) केवल एक ही वस्तु से कार्य की उत्पत्ति ( नहीं देखी जाती है, एवं बहुत सी वस्तुओं से कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है, अतः समझते हैं कि सहकारियों सहित मुख्यकारण में ही कार्य को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है । ( उ ० ) तो फिर यही कहते हुए भी आपने हम लोगों को चक्कर में क्यों डाल रक्खा है? तस्मात् अक्षणिकत्व की सिद्धि में बाधा डालनेवाली अर्थक्रिया की उपपत्ति रूप हेतु ही व्यभिचारी है! ( प्र ० ) बनाई हुई वस्तुओं का विनाश अवश्यम्भावी है । इस अवश्यम्भावी विनाश से भी वस्तुओं के क्षणिकत्व का अनुमान होता है । अभिप्राय यह है कि जो जिसका ' ध्र ुवभावी ' ( अवश्यम्भावी ) धर्म है वह किसी की अपेक्षा नहीं रखता है, For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १८६ शरकृपाणादीनां लोहमयत्वे, ध्रुवभावी च कृतकानां विनाश इत्यनुमानं विना-शस्य हेत्वन्तरायत्ततां प्रतिक्षिपति । ये हेत्वन्तरसापेक्षा न ते ध्रुवभाविनः, यथा वाससि रागादयः तथा यदि भावा अपि स्वहेतुभ्यो विनाशं प्रति हेत्वन्तर-मपेक्षन्ते तदा हेत्वन्तरस्य प्रतिबन्धवैकल्ययोरपि सम्भवे कश्चित्कृतकोऽपि न विनश्येत्? स्वहेतुतश्च विनश्वरस्वभावा जायमाना उत्पत्त्यनन्तरमेव विनश्य न्तीति सिद्धं क्षणिकत्वम् । अपि च भावस्याविनश्वरस्वभावत्वे विनाशोऽशक्यकरणो वह्नेरव शीतिमा, विनश्वरस्वभावत्वे वा नार्यो हेतुभिः, न च भावादभिन्नस्य विनाशस्य हेत्वन्तरजन्यता, कारणभेदस्य भेदहेतुत्वात्! भिन्नस्य हेत्वन्तरादुत्पादे च भावस्योपलब्ध्यादिप्रसङ्गः, अन्योत्पादादन्यस्वरूपप्रच्युतेर-भावात् । घटो नष्ट इति च भावकर्त्तृ को व्यपदेशो न स्यात् किन्त्वभावो जात इति व्यपदिश्येत, तथा च सति घटः किमभूदिति वार्त्ताप्रश्ने तस्य निवृत्तौ प्रस्तुता-जैसे कि शर, कृपाण आदि वस्तुओं का लौहमपत्व | बनाई हुई वस्तुओं का विनाश ' ध्रुवभावी ' है । यह ( ध्रुवभावित्व ) अनुमान खण्डन करता है कि ' वस्तुओं का विनाश किन्हीं स्वतन्त्र दूसरे हेतुओं से होता है ' क्योंकि जो किसी दूसरे हेतुओं से उत्पन्न होते हैं ' वे ' ध्रुवभावी ' नहीं हैं । जैसे की कपड़े का रङ्ग! अगर भाव भी अपने विनाश के लिए अपने उत्पादन के हेतुओं से भिन्न दूसरे हेतुओं की अपेक्षा रक्खे, तो फिर उन कारणों में किसी प्रतिबन्ध के आ जाने से या विघटन हो जाने से कभी कभी बनाई हुई वस्तुओं में से किसी किसी का विनाश असम्भव हो जायगा । अतः अपने हेतुओं से विनाश स्वभाव की ही वस्तुओं की उत्पत्ति होती है और उत्पत्ति बाद ही वे विनष्ट हो जाती है । इस प्रकार ( ध्रुवभावित्व के द्वारा ) सभी वस्तुओं में क्षणिकत्व सिद्ध है । और भी बात है । वस्तुएँ अगर अविनश्वर स्वभाव की ही उत्पन्न हों तो फिर ह्न की शता की तरह उनका विनाश करना ही शक्ति के बाहर होगा । अगर ( कारणों से ) विनाशस्वभाव की ही वस्तुओं की उत्पत्ति होती है तो फिर विनाश के लिए दूसरे हेतुओं का क्या प्रयोजन? एवं वस्तुओं से अभिन्न विनाश का कोई और कारण हो भी नहीं सकता है, क्योंकि कारणों की विभिन्नता हो वस्तुओं की विभिन्नता का कारण है । विभिन्न हेतुओं से भावों से भिन्न हो विनाशों की उत्पत्ति मानें तो फिर उन के स्वतन्त्र रूप से उपलब्धि प्रभृति आपत्तियाँ सामने आयेंगी । एवं एक वस्तु की उत्पत्ति से दूसरी वस्तु के स्वरूप का विघटन भी असम्भव है । अतः विनाश की प्रतीति ' घड़ा फूट गया ' इस प्रकार से भाव मूलक नहीं होगी किन्तु ' अभाव उत्पन्न हुआ है, इसी प्रकार का व्यवहार होगा । तब फिर यदि कोई पूछे कि घट का क्या हुआ? तो फिर ' अभाव उत्पन्न हुआ ' इस प्रकार का उत्तर देना होगा जो असम्बद्ध ही होगा । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आकाश-यामप्रस्तुतमेव कथं स्यात्? तस्माद् भावस्वभाव एव विनाश इति । अत्रो-च्यते- उत्पन्नो भावः किमेकक्षणावस्थायी? किं वा क्षणान्तरेऽप्यवतिष्ठते? क्षणान्तरावस्थितिपक्षे तावत्क्षणिकत्वव्याहतिः, अनेककालावस्थानात्, एकक्षणा-स्थायित्वे तु क्षणान्तरे स्थित्यभाव इति न भावाभावयोरेकत्वम्, कालभेदात् । अथ मतं न ब्रूमो भावः स्वस्यैवाभावः, किन्तु द्वितीयक्षणः पूर्वक्षणस्याभाव इति, तदप्यसारम्, पूर्वापरक्षणयोर्व्यक्तिभेदेऽपि स्वरूपविरोधस्याभावात् । घटो यथा भिन्नसन्ततिर्वात्तना घटान्तरेण सह तिष्ठति एवमेकसन्ततिर्वात्तनाऽपि सह तिष्ठेत्, द्वितीयक्षणग्राहिप्रमाणान्तरस्य तत्स्वरूपविधेश्वरितार्थस्य प्रथमक्षणे निषेधे प्रमाण-त्वाभावात् । अभावस्तु भावप्रतिषेधात्मैव, घटो नास्तीति प्रतीत्युदयात् । तत-स्तस्योत्पत्तिर्भावस्य निवृत्तिः, तस्यावस्थानं भावस्यानवस्थिति:, तस्योपलम्भो भावस्यानुपलम्भ इति युक्तम्, परस्परविरोधात् । एवश्व सति न भावस्य क्षणिकत्वं पश्चाद् भाविनस्तदभावस्य हेत्वन्तरसापेक्षस्य भावानन्तर्य्यनियमाभा-वात्, तथा च दृश्यते घटस्योत्पन्नस्य चिरेणैव विनाशो मुद्गराभिघातात् । अतः भाव एवं अभाव दोनों अभिन्न हो हैं । ( उ ० ) इस पर यह पूछना है कि उत्पन्न भाव एक ही क्षण तक रहता है? या अनेक क्षणों तक भी? यदि अनेक क्षणों तक उसकी सत्ता मानें तो फिर अनेक क्षणों में रहने के कारण उनका क्षणिकत्व ही व्याहत हो जायगा । यदि एक ही क्षण तक वस्तु की सत्ता मानें तो फिर आगे के क्षण में उत्पन्न होनेवाले विनाश काल में तो उस की सत्ता ही नहीं है फिर भाव और विनाश दोनों एक कैसे हैं? ( प्र ० ) हम यह तो कहते नहीं कि भाव अपने ही अभाव अभिन्न है किन्तु ( हमारा यह कहना है कि ) द्वितीयक्षण पूर्वक्षण का ही अभाव है । ( उ ० ) यह कथन भी असङ्गत हो क्योंकि पूर्वक्षण रूप व्यक्ति और उत्तरक्षण रूप व्यक्ति भिन्न ही हैं, और उन में कोई विरोध नहीं है । जैसे एक घट दूसरे घट के साथ विद्यमान रहता है. वैसे ही क्षण समूहरूप एक ममुदाय के भी दूसरे व्यक्तियों के साथ रहने में कोई बाधा नहीं है । द्वितीय क्षण का ज्ञापक प्रमाण उसी में चरितार्थ हो जायगा । अतः प्रथमक्षण के निषेध में वह लागू नहीं होगा । भाव का प्रतिषेध ही अभाव है, क्योंकि ' घट नहीं है ' इस प्रकार से अभाव की प्रतीति होती है । अतः अभाव की उत्पत्ति ही भाव की निवृत्ति है और अभाव का रहना ही भाव का न रहना है एवं अभाव की उपलब्धि हो भाव की अनुपलब्धि है, क्योंकि भाव और अभाव दोनों परस्पर विरोधी हैं । अतएव भाव क्षणिक भी नहीं हैं, क्योंकि भावों के बाद दूसरे हेतुओं से उत्पन्न होनेवाले अभावों का यह नियम नहीं हो सकता कि भाव की उत्पत्ति के अव्यवहित क्षण में ही उत्पन्न हों । यह देखा भी जाता है कि घटादि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १ ९ १ भावात्मको घटविनाशो मुद्गराभिघातात् तु कपालसन्तानोत्पाद: स्यादित्य-सङ्गतम् । सन्तानप्रतिबद्धायाः सदृशारम्भणशक्तेरप्रतिघाते विलक्षणसन्तानो-त्पत्त्यसम्भवात् । मुद्गराघातेन तस्याः प्रतिहत च भावप्रतिघाते कः प्रद्वेषः? न च कारणकार्यत्वे भाववदभावस्यापि वस्तुत्वप्रसक्तिस्तस्य वस्तुप्रतिषेधस्वभावस्य प्रत्यक्षादिसिद्धत्वात् । स्वरूपं यदयं कृतकोऽपि भाववन्न विनश्यति, नष्टस्यानुपलम्भात् । प्रमाणाधिगतस्य वस्तुस्व-भावस्य परसाधर्म्येण निराकरणत्वे जगद्वैचित्र्यस्यापि निराकरणम् । अन्योत्पादे कथमन्यस्य स्वरूपप्रच्युतिरित्यपर्य्यनुयोज्यम्, वस्तुस्वाभाव्याद् । घटो विनष्ट इति च व्यपदेशस्तदवयव क्रियादिन्यायेनाभावोत्पत्त्यैव । अत एवायं तस्यैवाभावो न सर्वस्य । न चास्य समवायिकारणं किश्वित्, तदभावान्नासमवायि-कारणम् । क्व कार्य्यमनाधारं दृष्टम्? इदमेव दृश्यते तावत् न ह्ययं घटे समवैति, उत्पन्न होने के बहुत दिनों बाद मुद्गरादि के प्रहार से नष्ट होते हैं । ( प्र ० ) मुद्गर के प्रहार से उत्पन्न होनेवाला घट का विनाश भावरूप ही है, क्योंकि कपाल समूह का उत्पादन ही घट विनाश का उत्पादन है? ( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ' सन्तान अपने सदृश ही दूसरे सन्तान को जन्म देता है " आप का यह नियम जब तक अक्षुण्ण है तब तक उससे विसदृश वस्तु को उत्पत्ति नहीं हो सकती है । यदि मुद्गर प्रहार से उस की साहशारम्भकत्व - शक्ति का विनाश हो इष्ट है तो फिर मुद्गरादि प्रहार से घटादि का नाश मानने में ही क्यों द्वेष है? ( प्र ० ) भावों की तरह अभाव भी स्वतन्त्र कारण जन्य हों तो उन में भी वस्तुत्व ( भावत्व ) मानना अनिवार्य होगा । ( उ ० ) नहीं, क्योंकि वे वस्तुओं के प्रतिषेध रूप से ही प्रत्यक्ष के विषय हैं । यही उन का स्वरूप है कि भावों की तरह कृतिजन्य होते हुए भी वे भावों की तरह नष्ट नहीं होते हैं, क्योंकि विनष्ट वस्तु की फिर से उपलब्धि नहीं होती है । प्रमाण से सिद्ध वस्तुओं का स्वभाव अगर किसी के सादृश्यमात्र से हट जाय तो फिर जगत् की विचित्रता ही ( प्र ० ) लुप्त हो जायगी । एक ( अभाव ) की उत्पत्ति से दूसरे ( अभाव ) की स्वरूपप्रच्युति क्यों होती है । ( उ ० ) यह अभियोग लाने योग्य नहीं है, क्योंकि वस्तुओं का स्वभाव ही इस प्रकार का है । घट के अवयवों में क्रिया, तब विभाग इत्यादि द्रव्यनाश की सामान्य रीति से घटाभाव की उत्पत्ति होने पर ही " घट नष्ट हो गया " यह व्यवहार होता है, अतः यह अभाव घट का ही है नहीं । अभाव का कोई समवायिकारण नहीं है अतएव असमवायिकारण भी नहीं है । ( प्र ० ) कार्य को विना आधार के कहाँ देखा है? ( उ ० ) यहीं, इस अभाव रूप कार्य को ही देखते हैं । क्योंकि समवाय सम्बन्ध से घट इसका आधार नहीं है, क्योंकि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir EK न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आकाश-तस्याभावात् नापि भूतले, अन्यधर्म्मत्वात् । कथं तर्हि नियतदेशः प्रतीयते? प्रतियोगिनियमात् । अयमस्य स्वभावो यत् संयुक्तप्रतिषेधे संयुक्तवत् प्रति-भाति, समवेतप्रतिषेधे समवेतवत् प्रतिभाति । विशेषणमपीत्थमेव, न पुनरस्य संयोगसमवायौ, तयोर्भावधर्मत्वात् । तदेवं सिद्धोऽभावो भावविरोधी नास्ति बुद्धिवेद्योऽर्थः यत्कृतो दहनतुहिनयोरपि विरोधः । दहनाभावस्तुहिने तुहिना-भावश्च दह इत्यनयोविरोधो न स्वरूपेण विधेविध्यन्तरविरोधाभावात् । यच्च ध्रुव भावित्वादभावस्य हेत्वन्तरानपेक्षेत्युक्तम्, तदपि सवितुरुदयास्त-मयाभ्यामनैकान्तिकम्, तयोरनपेक्षत्वे हि कालभेदो न स्यात् । एकसामग्रीप्रति-बन्धेऽपि स एव दोषः । नियतो हि वाससि रागहेतुनियतकालश्च तस्य तत्काला-सन्निधिमात्रेण रागस्यानुत्पादः सिद्धयति अनन्तास्तु विनाशहेतवो नियतकालाश्च वह उसका अभाव ही है । भूतल भी उसका आधार नहीं है, क्योंकि वह दूसरे का धर्म है । इसका यह भी स्वभाव है कि वह जहाँ किसी वस्तु में संयोग सम्बन्ध से किसी भाव के प्रतिषेध का स्वरूप होता है वहाँ उस संयुक्त भाव की तरह प्रतीत होता है एवं जहाँ किसी वस्तु में समवाय सम्बन्ध से किसी वस्तु के प्रतिषेध - स्वरूप होता है वहां उस समवेत वस्तु की तरह प्रतीत होता है । प्रतियोगियों में रहने वाले संयोगादि के अनुसार ही वह विशेषण भी होता है । अभाव में स्वतः संयोग या समवाय नहीं है, क्योंकि ये दोनों हीं भाव के धर्म हैं । अतः अभाव नाम का एक स्वतन्त्र पदार्थ है और वह भाव पदार्थों का विरोधी है जो ' नास्ति ' प्रभृति शब्दों से प्रतीत होता है । जिससे कि वह्नि और पाला में विरोध है क्योंकि वह्नि में पाले का अभाव है और पाले में वह्नि का अभाव है । यही उन दोनों में विरोध है । स्वतन्त्र रूप से सिद्ध एक भाव का स्वतन्त्र रूप से सिद्ध दूसरे भाव के साथ विरोध का कोई दूसरा प्रकार नहीं है । यह जो आप ने कहा कि ( प्र ० ) अभाव यत: ' ध्रुवभावी ' है, अतः उसे भाव के कारणों से अतिरिक्त किसी कारण की अपेक्षा नहीं है ' ( उ ० ) आपका यह ' ध्रुव भावित्व ' हेतु भी सूर्य के उदय और अस्त में नहीं देखा जाता है । वे दोनों अगर विभिन्न हेतुओं की अपेक्षा न रक्खें तो फिर वे दोनों विभिन्नकालिक भी न होंगे उदय और अस्त दोनों को आपत्ति एक ही क्षण में होगी । अगर एक की उत्पादक सामग्री से दूसरे का प्रतिरोध मानें तो फिर वही ( ध्रुवभावित्वानुपपत्ति की ) आपत्ति होगी । वस्त्र के रङ्ग के काल और हेतु दोनों ही नियत हैं, अतः उस नियत काल का भी सांनिध्य न रहने के कारण वस्त्र में राम के अनुत्पाद की सिद्धि होती है, किन्तु भावों के विनाश के काल नियत होने पर भीउसके हेतु अनन्त हैं । अतः सर्वदा सभी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] २५ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १ ९ ३ For Private And Personal तेषां सर्वदा सर्वेषां प्रतिबन्धस्याशक्यत्वात् कश्चिदेको निपतत्येव । कालान्तरे च निपतितः क्षणेनैव भावं विनाशयतीत्युपपद्यते कृतकत्वेऽपि ध्रुवो वशः । सर्वञ्चैतत्क्षणभङ्गसाधनं कालात्ययापदिष्टम्, प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षेण प्रतीतस्य पुनः प्रतीतेः । नन्वेष प्रत्ययो न भावस्य पूर्व्वापरकालावस्थानं शक्नोति प्रतिपादयितुम्, न ह्येतदेकं विज्ञानम्, कारणाभावात् । इन्द्रियं सन्निहितविषयं न पूर्वकालत्वमव-गाहते, संस्कारोऽपि पूर्वानुभवजन्या तद्विषये नियतो नापरकालतां परिस्पृशति, न च ताभ्यामन्यदुभयविषयं किश्विदेकमस्ति यदेतद् विज्ञानं प्रसुवीत । इतोऽपि नैतदेकं विज्ञानं स्वभावभेदात् इदमिति हि प्रत्यक्षता तदिति हि परोक्षत्वम्, प्रत्यक्षतापरोक्षत्वे च परस्परविरोधिनी नैके युज्येते, तस्माद् ग्रहणस्मरणात्मके इमे संवित्तभिन्नविषये । अत्र ब्रूमः प्रतीयते तावदेतस्माद् विज्ञानात् पूर्वापर-का प्रतिरोध असम्भव है । अतः नियमित कालों में से किसी क्षण में कोई अप्रतिरुद्ध कारण रह ही जायगा, वही कारण ज्यो क्षण में भाव का विनाश कर देगा । इस प्रकार कृतिजन्य होने पर भी विनाश के ध्रुवभावित्व में कोई बाधा नहीं है । क्षणभङ्ग ( भाव एक क्षण में उत्पन्न होते हैं और उसके बाद के अगले ही क्षण में नष्ट हो जाते हैं इस सिद्धान्त ) के साधक उक्त सभी हेतु कालात्ययापदिष्ट ' अर्थात् बाध रूप हेत्वाभास से दूषित हैं । क्योंकि जिस घट को कल देखा था उसी को मैं आज देखता हूँ इस प्रत्यभिज्ञा से ज्ञात वस्तु ही फिर से ज्ञात होती है । ( १० ) यह प्रत्यभिज्ञा नाम को व्रतोति अपने विषय घट में पूर्वकालवर्तित्व और उत्तरकालवर्तित्व इन दोनों को नहीं समझा सकती है, क्योंकि कारण की अनुपपत्ति से यह एक विज्ञान ही सिद्ध नहीं होती है । इन्द्रियाँ अपने सनिहित विषयों को ही ग्रहण करती हैं उनके पूर्व-कालिकत्वादि को नहीं । संस्कार भी चूँकि पूर्वानुभव जनित है अतः पहिले अनुभूत विषयों की ही स्मृति को उत्पन्न कर सकता है, उत्तरकालिकत्व विषयक स्मृति को नहीं । पूर्वकालिकत्व और उत्तरकालिकत्व इन दोनों को छोड़ कर कोई दूसरा उभय ' यहाँ नही है, जिनसे युक्त घट विषयक ज्ञान को वह जन्म दे । प्रत्यभिज्ञा नाम का कोई एक विज्ञान नहीं है । इसमें यह हेतु भी है कि ' उसको ' यह प्रत्यक्षत्व का द्योतक है ' जिसको ' यह परोक्षत्व का द्योतक है । परोक्षत्व और प्रत्यक्षत्व दोनों परस्पर विरोधी हैं । परस्पर विरुद्ध दो वस्तुएँ एक काल में एक ही वस्तु में सम्बद्ध नहीं हो सकती हैं । अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा वस्तुतः दो ज्ञानों का एक समूह है, जिसमें ' जिस घट को ' यह अंश स्मृति रूप है एवं ' उसी को मैं देखता हूँ ' ही भन्न यह अंश अनुभव रूप हैं किन्तु दोनों के हैं । ( उ ० ) इस आक्षेप के समाधान में मैं कहता हूँ कि इस प्रत्यभिज्ञा से पूर्वकाल और उत्तर काल दोनों से सम्बद्ध एक ही वस्तुत्त्व की प्रतीति
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १ ९ ४ न्यायकन्द लोसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-कालावच्छिन्नमेकं वस्तुतत्त्वम्, तदप्यस्य विषयो न भवतीति संविद्विरुद्धम् । ग्रहणस्मरणे च नैकं विषयमालम्बेते, तस्मादेकमेवेदं विज्ञानमिति प्रतीतिसामर्थ्या-। प्रतीयमान कार्य्योत्पत्तये चाप्रतीयमानमपि कारणं दुभयविषयमास्थेयम् कल्पयन्ति विद्वांसो, न तु कारणाप्रतीत्या विशदमपि कार्य्यमपह्नवते, जगद्-वैचित्र्यस्याप्यपह्नवप्रसङ्गात् । तेन यद्यपि प्रत्येकमिन्द्रियसंस्कारावसमथ तथापि संहताभ्यामिदमेकं कार्यं प्रत्यभिज्ञास्वभावं प्रभावयिष्यते, भविष्यति चैतदुभयकारणसामर्थ्यादुभयविषयम्, प्राप्स्यति च प्रत्यक्षतां विष-येन्द्रियसामर्थ्यानुविधानात् । न च यत्रैकैकमसमर्थ तत्र मिलितानामपि तेषा -मसामर्थ्यम्? प्रत्येक मकुर्वतामपि क्षित्युदकन्बीजानामन्योन्यसन्निधिभाजामकु-रादिजननोपलब्धेः । यत्र विलक्षणा सामग्री तत्र कार्य्यमपि विलक्षणमेव स्था-दिति सुप्रतीतम् तेनास्य सन्निहितातन्निहितविषयतालक्षणे प्रत्यक्षतापरोक्षते न विरोत्येते । अत एव चेन्द्रियसन्निकर्षाभावेऽपि पूर्वकालप्रत्यक्षतैव, इन्द्रिय-होती है । यह अनुभव से बाहर की बात है कि ' वह एक वस्तु प्रत्यभिज्ञा का विषय नहीं है ' यहाँ स्मृति और अनुभव दोनों एक विषयक नहीं हैं । अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा नाम की प्रतीति से यह कल्पना करनी पड़ेगी कि एक ही विज्ञान उभय विषयक है । विद्वान् लोग दृष्ट कार्य से अष्ट कारण को कल्पना करते हैं । कारण की अप्रतीति से अनुभूत कार्य का ही अपलाप नहीं करते । ऐसा करने पर संसार की विचित्रता ही लुप्त हो जायगी । ( अतः यह कल्पना करनी पड़ेगी कि ) यद्यपि संस्कार और इन्द्रिय इन दोनों में से प्रत्येक प्रत्यभिज्ञा रूप कार्य के उत्पादन में समर्थ हैं तथापि मिलकर वे ही दोनों उक्त प्रत्यभिज्ञा रूप कार्य का सम्पादन कर सकते हैं । उक्त दोनों कारणों के प्रभाव से यह प्रत्यभिज्ञा पूर्वकाल और उत्तर काल दोनों विषयक होंगी । एवं इन्द्रियजन्य होने से प्रत्यक्ष भी कहलाएगी । यह कोई बात नहीं है कि जो स्वयं अकेला जिस कार्य को न कर सके, वह दूसरे के साथ मिलकर भी उस कार्य को न कर सके । क्योंकि पृथिवी जल और बो इनमें से प्रत्येक अङ्कुर के उत्पादन में असमर्थ होने पर भी तीनों मिल कर अङ्कुर का उत्पादन करते ही हैं । रही यह बात कि एक ही प्रत्यभिज्ञा में इन्द्रियों से जन्य होने के कारण प्राप्त संनिहित विषयवाला ' प्रत्यक्षत्व ' एवं संस्कार से उत्पन्न होने के कारण प्राप्त असंनिहित विषयवाला ' परो-क्षत्व ' परस्पर विरुद्ध इन दोनों धर्मों का समावेश कैसे होगा? किन्तु यह अनुभव की बात है कि सामग्री की विलक्षणता से कार्य की विलक्षणता होती है । फलतः ये दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध ही नहीं हैं । अत एव इन्द्रियसंनिकर्ष के न रहने पर भी ' पूर्वकाल ' में भी प्रत्यक्षविषयत्व है क्योंकि तह इन्द्रियजन्य ज्ञान का विषय है । इन्द्रियजन्य ज्ञान For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् । भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १६५ जज्ञानविषयत्वात् तन्मात्रानुबन्धित्याच्च प्रत्यक्षतायाः । असन्निहितमपि परिच्छि ददिन्द्रियं पूर्वकालतामेव परिच्छिनत्ति न भविष्यत्कालताम्, तत्र संस्कारस्य सहकारिणोऽभावात् । न चैकस्योभयकालतायां काचिदनुपपत्तिः, येनास्योभय-कालां सङ्कलयतः कल्पनात्वम्, दृष्टो ह्येकस्यानेकेन विशेषणेन सम्बन्ध यथा चैत्रस्य छत्र पुस्तकाभ्याम् । युगपच्छत्र पुस्तकसम्बन्धे क्रमेण कालद्वय-सम्बन्धे च न कश्चिद् विशेषः, एकस्योभयविशेषणावच्छेदप्रतीतेरुभयत्राविशे-षात् । तदेवं देशकालावस्थाभेदानुगतमेकं वस्तुतस्वमध्यवसन्ती प्रत्यभिज्ञा भावानां प्रतिक्षणमुत्पादविनाशौ तिरयतीति । भ्रान्तेयं प्रतीतिरिति चेन्न, बाधका-भावात् । क्षणभङ्गसाधनमेतस्या बाधकमिति चेत्? प्रत्यक्षबाधे सत्यबाधित-विषयत्वादनुमानोदयः, उदिते च तस्मिन् प्रत्यक्षबाध इत्यन्योन्याश्रयत्वम् । प्रत्यक्षे विषयत्व ही ( विषयनिष्ठ ) प्रत्यक्षत्व है । ( इन्द्रिय सविकर्ष उसका प्रयोजक नहीं है ) । असंनिहित विषयों में से इन्द्रियाँ पूर्वकालिक विषयों को ही ग्रहण करती हैं. भविष्यत्कालिक विषयों को नहीं, क्योंकि ( असंनिहितविषयक प्रत्यक्ष का ) संस्कार रूप सहकारी नहीं रहता है ' | ( अतः ) वर्तमान और अतीत काल विषयक एक ज्ञान में कोई विरोध नहीं है, जिससे कि दोनों कालविषयक प्रत्यभिज्ञा रूप ज्ञान में भ्रमत्व को कल्पना की जाय । एक ही वस्तु में अनेक विशेषणों का सम्बन्ध हो सकता है, जैसे कि छाता और पुस्तक दोनों के साथ एक ही चैत्र का सम्बन्ध देखा भी जाता है । चैत्र में इन दोनों के और एककालिक सम्बन्ध और विभिन्नकालिक सम्बन्ध में कोई अन्तर नहीं है । क्योंकि एक ही विशेष्य में दोनों विशेषणों से वैशिष्ट्य की प्रतीति दोनों ( चैत्र और प्रत्यभिज्ञा ) स्थानों में समान ही है । तस्मात् उक्त रीति से विभिन्न देश विभिन्न काल और विभिन्न अवस्था इन तीनों में एक ही वस्तुतत्त्व को समझाने वाली उक्त प्रत्यभिज्ञा भावों की प्रतिक्षण उत्पत्ति और विनाश ( क्षणभङ्ग ) को जड़ मूल से उखाड़ फेंकती है । ( प्र ० ) उक्त प्रत्यभिज्ञा तो भ्रान्ति है? ( उ ० ) क्यों? कोई बाधक तो नहीं है? ( प्र ० ) क्षणभङ्ग के साधक ही उक्त प्रत्यभिज्ञा के प्रमात्व के बाधक हैं | ( उ ० ) इसमें यह अन्योन्याश्रय दोष है यतः उक्त प्रत्यभिज्ञा रूप प्रत्यक्ष बाधित है अत: क्षणिकत्व का अनुमान होता है, और वह प्रत्यक्ष बाधित क्यों है? क्योकि अनुमान के द्वारा क्षणिकत्व सिद्ध है । प्रत्यक्ष में यह बात नहीं है, क्योंकि उसे किसी दूसरे प्रमाण की अपेक्षा नहीं है । ( ० ) प्रत्यक्ष प्रमाण से दीप की शिखा अनेक कालों तक रहनेवाली प्रतीत होती है, किन्तु सभी मतों से सिद्ध अनुमान के द्वारा यह निर्णीत है कि वहाँ प्रतिक्षण ज्वाला की उत्पत्ति होती है । अत: प्रत्यक्ष से बाधित For Private And Personal