प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 271–280

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 271–280

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 271 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १ ९ ६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली | द्रव्ये आत्म-तु नायं विधिस्तस्यानपेक्षत्वात्, ज्वालादिषु सामान्यविषयं प्रत्यक्षं विशेषविषय-वानुमानमित्यविरोधान्न प्रत्यक्षेणानुमानोत्पत्तिनिषेध इत्यलम् । योऽप्यतिप्रौढिम्ना प्रत्यक्षसिद्धं क्षणभङ्गमाह तस्यानुभवाभाव एवोत्तरम् । नोलमेतदिति प्रतिपत्तिर्न क्षणिकमेतदिति नीलत्वाव्यतिरेकिणी क्षणिकता, तस्याः पृथगर्थक्रियाया अभावात् । अतो नीलत्वे गृह्यमाणे क्षणिकत्वमपि गृह्यते, सुसदृशक्षणभेदाग्रहणात् । तथा नाध्यवसीयत इति चेत्? अहोऽपरः प्रज्ञाप्रकर्षो यदयमनुभवमपि व्याख्याय कथयति । यन्नाध्यवसितं तद्गृहीतमिति मृगतृष्णिकेयम्, प्रत्यक्षबलोत्पन्नादध्यवसायादन्यस्य प्रत्यक्षदृष्टत्वव्यवस्थानिबन्धनस्यानभ्युपगमात् । यस्मिन्नध्यवसीसमाने धन्नियमेन नाध्यवसीयते नीलपीतयोरिव तयो-स्तादात्म्याभिधानमपि प्रलापः । क्षणिकं प्रत्यक्षं ज्ञानं स्वसमानकालवत्तिनमर्थस्य सत्तां परिच्छिन्दत् तत्कालासम्बद्धतां व्यवच्छिन्दत् तत्कालभावाव्यभिचारिणः कालान्तरसम्बन्धमपि व्यवच्छिन्दत् तदेकक्षणावस्थायित्वं क्षणिकत्वं गृह्णातीति सभी अनुमान भ्रम ही नहीं होते । ( उ ० ) दीपशिखा स्थल में प्रत्यक्ष केवल सामान्य विषयक होता है और अनुमान विशेष विषयक होता है, अतः विभिन्न विषयक होने के कारण वहाँ प्रत्यक्ष से अनुमान का बाध नहीं होता है । जो कोई अति प्रौढ़तावश क्षणभङ्ग को प्रत्यक्षप्रमाण से ही सिद्ध करना चाहते हैं उनके लिए अनुभव का अभाव ही उत्तर है । क्योंकि ' यह नोल है ' यही प्रतीति होती है यह ' क्षणिक है ' इस प्रकार की प्रतिति नहीं होती है | ( प्र ० ) नोलत्व से क्षणिकत्व कोई भिन्न वस्तु नहीं है, क्योंकि क्षणिकत्व का कोई कार्य नहीं है, अतः यदि नीलत्व गृहीत होता है तो क्षणिकत्व भी ज्ञात हो ही जाता है । ' यह नील है ' इस बुद्धि में क्षणिकत्व के स्फुट प्रतिभास न होने का यह हेतु है कि दोनों ( नील-क्षण और क्षणिकत्व का प्रतिभासक क्षण ) अत्यन्त सदृश हैं । ( उ ) यह तो बड़ी विलक्षण प्रज्ञा है कि जो अनुभव की भी व्याख्या करके यह समझाती है कि ' जो आपने नहीं समझा है वह भी उस अनुभव का विषय है अतः ( उक्त कथन से अभिप्राय सिद्धि की अभिलाषा ) मृगतृष्णा ही है । क्योंकि ' अमुक वस्तु प्रत्यक्ष सिद्ध है इस व्यवस्था का मूल प्रत्यक्ष प्रमाण जनित निश्चय से भिन्न और किसी को नहीं माना जा सकता । जिसके निश्चित हो जाने पर जो अवश्य ही निश्चित नहीं हो जाते. जैसे की नील और पीत उन दोनों को अभिन्न कहना भी प्रलाप ही है । ( प्र ० ) क्षणमात्र स्थायी प्रत्यक्षा-त्मक ज्ञान अपने काल में रहनेवाली वस्तु की सत्ता को समझाता हुआ एवं उस वस्तु में उस काल की असम्बद्धता को हटाता हुआ उस काल में रहनेवाली वस्तु की सत्ता के अव्यभिचारी दूसरे काल के सम्बन्ध का भी निषेध करता हुआ उस वस्तु के एक For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १६७ चेत्? काशकुशावलम्बनमिदम्, स्वात्मानमेव न गृह्णाति विज्ञानम्, कुतः स्वसमान-कालतामर्थस्य गृह्णाति? गृह्णातु वा, तथापि पूर्वमयं नासीत् पश्चाच्च न भविष्यतीत्यत्र प्रत्यक्षमजागरूकं पूर्वापरकालताग्रहणात् । वर्त्तमानकालपरि-च्छेदे चातत्कालव्यवच्छेदो युक्तो भावाभावयोविरोधान्न तु कालान्तरसम्बन्ध-व्यवच्छेदो मणिसूत्रव देकस्यानेकसम्बन्धत्वादिरोधात् । प्रपञ्चितश्चायमर्थोऽस्माभि-स्तत्त्वप्रबोधे तत्त्वसंवादिन्याञ्चेति नात्र प्रतन्यते । किश्व सर्वभावक्षणिकत्वाभ्युपगमे कस्य संसार:? ज्ञानसन्तानस्येति चेत्? न सन्तानिव्यतिरिक्तस्य सन्तानस्याभावात् । अथ मतम् - नैकस्यानेक-शरीरादियोगः संसारः, किं तर्हि? ज्ञानसन्तानाविच्छेदः, स च क्षणिकत्वेऽपि नानुप-पन्नः । तदप्यसारम्, गर्भादिज्ञानस्य प्राग्भवीयज्ञानकृतत्वे प्रमाणाभावात् नहि समानजातीयादेवार्थस्योत्पत्तिः, विजातीयादप्यग्नेर्धूमस्योत्पत्तिसम्भवात् । अथ क्षणावस्थायित्व रूप क्षणिकत्व को भी ग्रहण करता है । ( उ ० ) यह कहना भी युक्ति से दुर्बल है । क्योंकि जो विज्ञान अपने स्वरूप को भी ग्रहण नहीं कर सकता वह अपने विषय रूप अर्थ की समानकालीनता ( क्षणिकत्व ) को कैसे ग्रहण करेगा? अगर यह मान भी लें कि उक्त प्रत्यक्ष से क्षणिकत्व की प्रतीति होती है तो भी ' यह वस्तु पूर्वक्षण में नहीं थी, और आगे के क्षणों में भी नहीं रहेगी ' यह समझाने में उक्त प्रत्यक्ष कैसे समर्थ होगा १ क्योंकि पूर्वकाल? ( भूत ) और पश्चात् काल ( भविष्यत् ) इन दोनों को समझाने में प्रत्यक्ष असमर्थ है । यह ठीक है कि किसी वस्तु में वर्त्तमान काल के सम्बन्ध का ज्ञान होने पर उस ज्ञान से भविष्यत् काल और भूतकाल दोनों हट जाते हैं, किन्तु ज्ञान के विषय उप नीलादि वस्तुओं से अनेक कालों का सम्बन्ध क्यों हटेगा? एक ही सूत्र के साथ अनेक मणियों का सम्बन्ध तो होता है, क्योंकि उसमें कोई विरोध नहीं है । अपने ' तत्त्वप्रबोध ' और ' तत्त्वसंवादिनी ' नाम के ग्रन्थों में इन्हीं विषयों की आलोचना की है, अतः इस विषय के विस्तार से यहाँ विरत होते हैं । अब बात है कि अगर सभी वस्तुएँ क्षणिक हों तो संसार किसको होगा? ( प्र ० ) ज्ञान समूह को? ( उ ० ) नहीं, क्योंकि सन्तान ( समूह ) अपने सन्ता -नियों ( अर्थात् सन्तान घटक प्रत्येक व्यक्ति ) से भिन्न नहीं है । ( प्र ० ) एक ही वस्तु ( आत्मा ) का अनेक शरीरादि के सम्बन्ध ही संसार नहीं है किन्तु ज्ञान की निरवच्छिन्न ( अविरल ) धारा रूप सन्तान हो संसार है । यह संसार तो वस्तुओं को क्षणिक मान लेने पर भी उत्पन्न हो सकता है । ( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि ' गर्भादि विषयक ज्ञान पहिले के ही ज्ञान से उत्पन्न होते हैं ' इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसका भी कुछ ठीक नहीं है कि वस्तुओं से ही समानजातीय वस्तुओं की उत्पत्ति होती हो, For Private And Personal

पृष्ठ 273

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-मतम् -- यस्यान्वयव्यतिरेकावतिशयश्च यदनुविधत्ते तत्तस्य समानजातीयमुपादान-ञ्चेति स्थितिः, ज्ञानञ्च बोधात्मकत्वमतिशयं बिर्भात तच्च पृथिव्यादिभूतेषु नास्ति, तस्माद्यस्यायमतिशयस्तदस्य समानजातीयमुपादानकारणमिति स्थिते गर्भज्ञानं ज्ञानान्तरपूर्वकं सिद्ध्यति, कारणव्यभिचारे कार्य्यस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गा-दिति । तदप्यसारम्, अदहनस्वभावेभ्यो दारुनिर्मथनादिभ्यो वह्नेर्दाहातिश-योत्पत्तिवदबोधात्मकेभ्योऽपि चक्षुरादिभ्यो बोधात्मकत्वातिशयोत्पत्तिसम्भवे बोधात्मक कारणकल्पनानवकाशात्, न अतो प्राक्तनजन्मसिद्धिर्भविष्यति । जन्मान्तरमित्यपि न सिद्ध्यति, मरणे शरीरान्त्यज्ञानेन ज्ञानान्तरं प्रतिसन्धातव्य-मित्यत्र प्रमाणाभावात् । यद्यत्राविकलकारणावस्थं तज्जनयत्येव यथाविक-लजननावस्थं बीजमङ्कुरं प्रति अविकलजननावस्थं चान्त्यं ज्ञानमिति प्रमाण-मस्तीति चेत्? न, ज्वालादीनामन्त्यक्षणेन व्यभिचारात्, स्नेहवत्तिक्षयादीना-क्योंकि वह्नि से विभिन्नजातीय धूम की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) वस्तुस्थिति यह है कि जिसका जिसमें अन्वय और व्यतिरेक दोनों ही हों, एवं जिसमें जिसके असाधारण रूप की अनुवृत्ति हो वही उसका समानजातीय है और उपादान भी है । ( अतः यह सिद्ध है कि गर्भादि ज्ञान भी पहिले के अपने राजातीय ज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं ) बोधरूपता ही ज्ञान का असाधारण धर्म है, वह पृथिव्यादि भूतों में नहीं हैं । अतः जिसमें वह ( बोधरूपता है ) वही उसका समानजातीय है और उपादान भी है । इससे यह सिद्ध है कि गर्भज्ञान भी पहिले के गर्भज्ञान से ही उत्पन्न होता है, क्योंकि कार्य अगर कारणों के बिना भी हों तो फिर उनकी उत्पत्ति अनियमित हो जायगी । ( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि काष्ठों के संघर्ष का स्वभाव दाह नहीं है काष्ठ से उनके मन्थन के द्वारा दाह स्वभाव के वह्नि को उत्पत्ति होती है | वैसे ही चक्षुरादि इन्द्रियों में बोधात्मकत्व शक्ति के न रहने पर भी उन से बोध स्वरूप विलक्षण धर्मविशिष्ट ज्ञान की उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं है । इसके लिए वोध स्वरूप कारण की कल्पना की आवश्यकता नहीं है । अतः इस मत में पूर्वजन्म की सिद्धि असम्भव है । आगे के जन्म की सिद्धि भी असम्भव है क्योंकि इसमें कोई प्रमाणनहीं कि मृत्यु हो जाने पर अन्तिम ज्ञान रूप शरीर अवश्य ही आगे के दूसरे शरीर रूप ज्ञान का अनुसन्धान करेगा । जहाँ पर जिस वस्तु की कारणावस्था में कोई विघटन नहीं हुआ रहता है वहाँ उस कारण से वस्तु की उत्पत्ति अवश्य ही होती है, जैसे कि कारणावस्था के विघटन से रहित बीज से अकुर की उत्पत्ति अवश्य होती है । शरीर के उक्त अन्तिम ज्ञान की भी कारणावस्था विघटित नहीं है । अतः यही प्रमाण इस पक्ष में अपर जन्म का साधक है । ( उ ० ) उक्त हेतु अन्तिम क्षण For Private And Personal

पृष्ठ 274

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् . प्रशस्तपादभाष्यम् १ ९ ६ हिताहितप्राप्तिपरिहारयोग्याभ्यां शरीरसमवायिनीभ्याञ्च प्रवृत्तिनिवृत्तिभ्यां रथकर्मणा सारथिवत् विग्रहस्याधिष्ठातानुमीयते, प्राणादिभिचेति । प्रयत्नवान् कथम्? ( ३ ) शरीर में समवाय सम्बन्ध से रहने वाली हित की प्राप्ति एवं अहित का परि-हार इन दोनों की प्रयोजक क्रियाओं के द्वारा प्रयत्न से युक्त आत्मा रूप शरीर के अधिष्ठाता का अनुमान करते हैं । जैसे कि रथ की गति रूप क्रिया से सारथि का अनुमान होता है । ( ४ ) प्राणादि से भी वायु का अनुमान होता है । ( प्र ० ) कैसे? न्यायकन्दलो मन्त्यज्वालाक्षणस्य कारणावस्थावैकल्यादविकलत्वं नास्तीति चेत्? अन्त्य-ज्ञानस्यापि मरणपीडया पोडितस्याविकलकारणावस्थात्वमसिद्धमिति सुव्याहृतं क्षणिकत्वे परलोकाभाव इत्युपरम्यते । आत्मसिद्धौ प्रमाणान्तरमप्याह - शरीरसमवायिनीभ्यामिति । प्रवृत्ति. निवृत्तिभ्यां प्रयत्नवान् विग्रहस्थ शरीरस्याधिष्ठातानुमीयते । लतादिप्रवृत्ति-व्यवच्छेदार्थ शरीरसमवायिनीभ्यामित्युक्तम् । स्रोत: पतितमृतशरीरप्रवृत्तिनि-वृतिव्यवच्छेदार्थश्व हिताहितप्राप्तिपरिहारयोग्याभ्यामिति । हितं सुखमहितं दु: खम्, तयोः प्राप्तिपरिहारौ हितस्य प्राप्तिरहितस्य परिहारः, तत्र योग्याभ्यां समर्थाभ्यामिति बुद्धिपूर्वकचेष्टापरिग्रहः । कर्मणा सारथिवदिति दृष्टान्त-की ज्वाला में व्यभिचरित है । ( प्र ० ) अन्तिम क्षण में तेल बत्ती प्रभृति कारणता के अवैकल्य के सम्पादक नष्ट हो जाते हैं अतः उस क्षण की दीपशिखा की कारणावस्था विघटित हो जाता है | ( उ ० ) तो फिर मरण की पीड़ा से दुःखी अन्तिम शरीर रूप विज्ञान की भी कारणावस्था अविघटित नहीं है । अतः हमने ठीक हो कहा है कि वस्तु मात्र को क्षणिक मानने के पक्ष में परलोक की सिद्धि नहीं होगी अतः इससे विरत होता हूँ । ' शरीरसमवायिनीभ्याम् ' इत्यादि से आत्मा की सिद्धि में और भी प्रमाण देते हैं । प्रवृत्ति और निवृत्ति से शरीर रूप विग्रह ( मूर्ति ) के प्रयत्न वाले अधिष्ठाता का अनुमानकरते हैं । लताओं ( वृक्षादि पर चढ़ने ) की प्रवृत्ति में व्यभिचार वारण करने के लिए ' शरीरसमवायिनीभ्याम् ' यह पद कहा है । जल के प्रवाह में गिरे हुए शरीर की प्रवृत्ति और निवृत्ति में व्यभिचार वारण के लिए ' हिताहितप्राप्तिपरिहारयोग्याभ्याम् ' इत्यादि से प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों में क्रमशः हितप्राप्तियोग्यत्व एवं अतिपरिहार-योग्यत्व ये दोनों विशेषण दिये गये हैं । ' हित ' शब्द का अर्थ है ' सुख ' एवं ' अहित ' शब्द का अर्थ है दुःख । इन दोनों का जो प्राप्ति परिहार ' अर्थात् सुख की प्राप्ति एवं दुःख का परिहार इन दोनों में समर्थ ' अर्थात् क्षम । इन दोनों विशेषणों में से ज्ञानजनित चेष्टा का संग्रह For Private And Personal

पृष्ठ 275

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २०० न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-शरीरपरिगृहीते वा विकृतकर्मदर्शनाद् भस्त्राध्मापयतेव निमेषोन्मेष-कर्मणा नियतेन दारुयन्त्र प्रयोक्तेव, देहस्य वृद्धिक्षतभग्नसंरोहणादिनिमित्त-( उ ० ) वायु की गति स्वभावतः कुटिल होती है, किन्तु उसके विपरीत प्राण वायु की गति कभी ऊर्ध्व भी देखी जाती है, अतः भाथी को चलाने वाले की तरह् शरीर सम्बन्धी वायु को भी ऊपर की तरफ चलाने वाला कोई अवश्य है । उसी का नाम है ' आत्मा ' । ( ५ ) निमेष और उन्मेष की क्रिया से भी कठपुतली को नचाने वाले की तरह आत्मा का अनुमान होता है । ( ६ ) देह की वृद्धि, घाव एवं टूटे हुए अङ्गों न्यायकन्दली कथनम् । साधनोपादानपरिवर्जनद्वारेण हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्था चेष्टा प्रयत्नपूर्विका विशिष्ट क्रियात्वात् रथक्रियावत् । शरीरं वा प्रयत्नवद-धिष्ठितं विशिष्टक्रियात्वात् रथवत् । प्राणादिभिश्चेति । प्राणादिभिश्व प्रयत्नवानधिष्ठातानुमीयत इत्यनुषञ्जनीयम् । प्राणादिभिरित्यनेन “ प्राणापान-निमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियविकारः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि " इति सूत्रोक्तमस्तलिङ्गपरिग्रहः । कथमिति प्रश्नपूर्वक्रं प्राणापानयोलिङ्गत्वं दर्शयति-- शरीरपरिगृहीत इति । वायुस्तिर्य्यग्गमनस्वभावः, शरीरपरिगृहीते arat returned विकृतं स्वभावविपरीतं कमौर्ध्वगमनमधोगमनञ्च दृश्यते, तस्मात् प्रयत्नवान् विग्रहस्याधिष्ठातानुमीयते यस्तथा वायु प्रेरयति, अन्य-किया गया है । ' रथकर्म्मणा सारथिवत् यह वाक्य अनुमान का दृष्टान्त दिखाने के लिए है । सुखसाधनों के ग्रहण के द्वारा ही जिस चेष्टा से हित की प्राप्ति होती है, एवं दुःख साधनों के परिवर्जन के द्वारा ही जिस चेष्टा से अहित का परिहार होता है, से दोनों प्रकार की चेष्टायें प्रयत्न से उत्पन्न होती हैं क्योंकि ये विशेष प्रकार की क्रियायें हैं जैसे कि रथ की क्रिया । अथवा प्रयत्न से युक्त कोई व्यक्ति ही शरीर का अधिष्ठाता है. क्योंकि उसमें विशेष प्रकार की क्रिया है जैसे कि रथ में प्राणा-दिभिश्च ' अर्थात् प्राणादि से भी " प्रयत्न से युक्त अविष्ठाता का अनुमान होता है ” यह अनुषङ्ग कर लेना चाहिए । ' प्राणादिभि: ' इस ' आदि ' पद घटित हेतु वाक्य से प्राणापानादि, निमेष उन्मेष 1 जीवन, मन की गति इन्द्रिय का विकार आदि " सुख-दुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि ( ३ अ. २ आ. ४ सू. ) इस सूत्र के द्वारा कथित सभी हेतु अभीष्ट हैं । ' कथम्? ' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न करके " शरीरपरिगृहीत " इत्यादि वाक्य से प्राण और अपान वायु में आत्मानुमान का हेतुत्व दिखलाते हैं । टेढ़े मेढ़े चलना वायु का स्वभाव है, किन्तु शरीर की प्राण और अपान नाम को वायुओं में ' विकृत ' अर्थात् उन स्वभाव से विपरीत क्रमशः ऊर्ध्वगति और अधोगति देखी जाती For Private And Personal

पृष्ठ 276

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 276 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] २३ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् २०१ न्यायकन्दली For Private And Personal थास्य विकृतवाय्वसम्भवात् । भस्त्राध्मापयितेव दृष्टान्तः शरीरं प्रयत्नवद-धिष्ठितमिच्छापूर्वक विकृतवाय्वाश्रयत्वाद् भस्त्रावत् । शरीरपरिगृहीतेत्यनेनेच्छा-पूर्वकत्वं दर्शितम्, तेन हि द्विवायुकादिभिर्नानैकान्तिकम् । निमेषोन्मेषकर्मणा नियतेन दारुयन्त्र प्रयोक्तेवेति । अक्षिपक्ष्मणोः संयोगनिमित्तं कर्म निमेषः, विभागार्थं कर्मोन्मेषः । तेन कर्मणा दारुयन्त्रप्रयोक्तेव विग्रहस्य प्रयत्नवानधिष्ठाता अनुमीयते । वायुवशेनापि दारुयन्त्रस्य निमेषोन्मेषौ स्याताम्, तन्निवृत्त्यर्थं नियतेनेति । अनेनेच्छाधीनत्वं कथयति । शरीरं प्रयत्नवदधिष्ठितमिच्छाधीन-निमेषोन्मेषवदवयवयोगित्वाद् दारुयन्त्रवत् । जीवन लिङ्गकमनुमानं कथयति -देहस्येति । वृद्धिः प्रसिद्धैव । क्षतस्य भग्नस्य च संरोहणं पुनः सङ्घटनं तयोनि-मित्तत्वाद् गृहपतिरिव प्रयत्नवानधिष्ठाता अनुमीयते । शरीरस्य वृद्धिक्षत-संरोहणं प्रयत्नवता कृतं वृद्धिक्षतभग्नसंरोहणत्वाद् गृहवृद्धिक्षतभग्नसंरोहणवत् । हैं, अतः इस शरीर रूप मूर्ति के प्रयत्नशील अधिष्ठाता का अनुमान करते हैं जो उन दोनों वायुओं को विपरीत गति से चलने के लिए प्रेरित करते हैं । अन्यथा उक्त वायु में उक्त विपरीत गति की सम्भावना नहीं है । ' भस्त्राध्मापयितेव ' इस वाक्य से उसी अनुमान का दृष्टान्त कहा गया है । अर्थात् जैसे कि भाथी की वायु से प्रयत्नशील किसी चलाने वाले का अनुमान होता है, इसी प्रकार शरीर का भी कोई प्रयत्न से युक्त अधिष्ठाता अवश्य है, क्योंकि इच्छा जनित विपरीत गति से युक्त वायु का वह ( शरीर ) आश्रय है जैसे कि भाथी । ' शरीर - परिगृहीत ' इत्यादि से यह दिखलाया गया है कि शरीर में रहने वाली वायु की उक्त विपरीत गति इच्छा से उत्पन्न होती है । अतः विपरीत दशाओं में बहनेवालो दो वायुओं की विपरीत गति में व्यभिचार नहीं है । शरीर के किसी प्रयत्नशील अधिष्ठाता का अनुमान कठपुतली को नचाने वाले की तरह ' निमेष ' एवं ' उन्मेष ' रूप क्रियाओं से भी होता है । जिस क्रिया से आँख के दोनों पलकों का संयोग उत्पन्न हो उसे ' निमेष ' एवं जिस क्रिया से उन्हीं दोनों पलकों का विभाग उत्पन्न हो उसे ' उन्मेष ' कहते हैं । उन दोनों क्रियाओं से कठपुतली को नचाने वाले की तरह शरीर रूप मूर्ति के प्रयत्नशील अधिष्ठाता का अनुमान होता है । वायु से कठपुतली में भी निमेष और उन्मेष हो सकते हैं अतः ' नियतेन ' यह पद दिया है । इससे यह लाभ होता है कि निमेष और उन्मेष इच्छा से ही उत्पन्न होते हैं । फलत: ( यह अनुमान होता है कि ) शरीर का कोई प्रयत्नविशिष्ट अधिष्ठाता है, क्योंकि उसमें इच्छाजनित निमेष और उम्मेष क्रियाओं से युक्त अवयवों का सम्बन्ध हैं, जैसे कि कठपुतली में । ' देहस्य ' इत्यादि से ' जीवन ' हेतुक अनुमान दिखलाया गया है । ' वृद्धि ' शब्द का ( बढ़ना ) अर्थ प्रसिद्ध है । घाव और टूटे हुए अङ्गों का ' संरोहण ' अर्थात् पहिले की तरह होना इन दोनों के कारण रूप में भी घर के मालिक की तरह शरीर ( रूप घर ) के प्रयत्नशील अधिष्ठाता का अनुमान होता है । शरीर की वृद्धि, उसके घाव और टूटे हुए अङ्गों का पुनः सङ्घटन ये सभी

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-त्वात् गृहपतिरिव, अभिमत विषयग्राहककरण सम्बन्धनिमित्तेन मन: -कर्म्मणा गृहकोणेषु पेलकप्रेरक इव दारकः, नयनविषयालोचनानन्तरं रसानुस्मृतिक्रमेण रसनविक्रियादर्शनादनेक गवाक्षान्तर्गत प्रेक्षकवदुभय-दर्शी कश्चिदेको विज्ञायते । सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयस्नैश्च गुणैर्गुण्यनुमीयते । का पुनः संघटन इन दोनों से भी घर के मालिक की तरह प्रयत्न विशिष्ट आत्मा का अनुमान होता है । ( ७ ) अभिमत विषयों को ग्रहण करनेवाली चक्षुरादि इन्द्रियों ICT विषयों के साथ सम्बन्ध करानेवाले मन की क्रिया से भी आत्मा का अनुमान होता है । जैसे घर के एक कोने में रक्खी हुई लाख की गोली पर दूसरी लाख की गोली फेंक कर खेलने वाले लड़के का अनुमान होता है । ( ८ ) चाक्षुष ज्ञान के बाद रस की स्मृति के क्रम से रसनेन्द्रिय में विकार देखा जाता है । ( अर्थात् मुँह में पानी भर आता है ) । इससे भी अनेक गवाक्षों से एक देखने वाले की तरह रूप और रस दोनों के एक ज्ञाता रूप आत्मा का अनुमान होता है । ( ६ ) सुख, दु: ख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्नादि गुणों से भी गुणी आत्मा का अनुमान होता है । वे ( सुखादि ) न्यायकन्दली वृक्षादिगतेन वृद्धघादिना व्यभिचार इति चेन्न तस्यापीश्वरकृतत्वात् न तु वृक्षादयः सात्मकाः, बुद्ध्याद्युत्पादनसमर्थस्य विशिष्टात्मसम्बन्धस्याभावात् । मनोगति लिङ्गकमनुमानमुपन्यस्सति - अभिमतेत्यादिना । अभिमतो विषयो जिघृक्षितोऽर्थः, तस्य यद्ग्राहकं करणं चक्षुरादि तेन योगो मनस्सम्बन्धस्तस्य निमित्तेन मनः कर्मणा । गृहे कोणेषु कोष्ठेषु भूमौ रोपितं पेलकं प्रति हस्त-स्थितस्य पेलकस्य प्रेरको दारक इव प्रयत्नवान् मनः प्रेरकोऽनुमीयते । प्रयत्न-किसी प्रयत्नवान् के द्वारा उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे भी वृद्धि और संरोहण हैं, जैसे कि घर की वृद्धि और टूटे हुए अङ्गों का जुटना । ( प्र ० ) वृक्ष में भी तो ये भग्नक्षत संरोहणादि है? ( उ ० ) वे भी ईश्वर रूप आत्मा से ही उत्पन्न होते हैं, किन्तु वृक्ष में आत्मा ( जीव ) का सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि आत्मा का वह विलक्षण प्रकार का सम्बन्ध बुद्धि का कारण है, किन्तु विलक्षण सम्बन्ध वृक्षादि में नहीं है । ' अभिमत ' इत्यादि से मनोगतिहेतुक आत्मा का अनुमान दिखलाते हैं । ' अभिमत-विषय ' अर्थात् जिस विषय को लेने की इच्छा हो, उस वस्तु के ज्ञान का उस बस्तु के साथ एवं चक्षुरादि विषयों के साथ ' योग ' अर्थात् मन का संयोग है । इस सम्बन्ध के कारण मन की क्रिया से भी ( आत्मा का अनुमान होता है ) । ' घर में ' अर्थात् घर के कोने में, अथवा भूमि में गड़े हुए एक लाह की गोली पर जब बालक अपने हाथ की दूसरी गोली चलाता है, तब उस दूसरी गोली की क्रिया से For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 278 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २०३ वता प्रेर्य मनः, अभिमतविषय सम्बन्धनिमित्त क्रियाश्रयत्वाद्दारकहस्तगतपेलकवत् । वाय्वादिप्रेरितस्यानभिमतेनापि सम्बन्धो भवति । नयनविषयेति । नयन-विषयस्य रूपस्यालोचनाद् ग्रहणानन्तरं रसस्यानुस्मरणक्रमेण रसनेन्द्रियान्तरविकारो दृश्यते, तस्मादुभयोर्गवाक्षयोरन्तःप्रेक्षक इव द्वाभ्यामिन्द्रियाभ्यां रूपरसयोर्दर्शी कश्चिदेकोऽनुमीयते । किमुक्तं स्यात्? कस्यचिदिष्टफलस्य रूपं दृष्ट्वा तत्सचहरितस्य पूर्वानुभूतस्य रसस्य स्मरणात्तत्रेच्छा भवति, ततोऽपि प्रयत्न आत्ममनस्संयोगापेक्षो रसनेन्द्रियविक्रियां करोति । सा दन्तोदकसंप्लवानुमिता रसनेन्द्रियविक्रिया इन्द्रियचैतन्ये न स्यात्, प्रत्येकं नियताभ्यां चक्षूरसनाभ्यां रूपरसयोः साहचर्य्यप्रतीतौ रूपदर्शनेन रसस्मृत्यभावात् । अस्ति चायं विकारैः तस्मादिन्द्रियव्यतिरिक्तः कोऽप्युभयदर्शी यो रूपं दृष्ट्वा रसस्य स्मरति । शरीरमेवोभयदशि भविष्यतीति चेन्न बालवृद्धशरीरयोः परिमाणभेदेनान्यत्वे गोली चलानेवाले प्रयत्न से युक्त उक्त बालक का अनुमान होता है । अतः मन प्रयत्न से युक्त किसी व्यक्ति के द्वारा प्रेरित होता है, क्योंकि वह इच्छित विषय के सम्बन्ध का कारण क्रिया का आश्रय है, जैसे बालक के हाथ की लाह की गोली | वायु प्रभृति से प्रेरित वस्तुओं का सम्बन्ध अनभीष्ट विषयों के साथ भी होता है । " नयनविषयेति " चक्षु से देखे जाने वाले रूप के आलोचन अर्थात् ज्ञान के बाद रस के स्मरणक्रम से रसनेन्द्रिय में विकार ( मुँह में पानी आना ) देखा जाता है, उसी से दो गवाक्षों के द्वारा एक देखने वाले की तरह दो इन्द्रियों से देखने वाले एक ज्ञाता का अनुमान करते हैं । इससे यही तात्पर्य क्या निकला? कि किसी अभीष्ट फल के रूप को देखकर उस रूप के साथ रहनेवाले पूर्वानुभूत रस की स्मृति से उस रस के आस्वादन की इच्छा होता है । उस इच्छा से प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इस प्रयत्न, ( आत्मा और मन के संयोग ) से रसनेन्द्रिय में विकृति हो जाती है । इन्द्रिय को अगर चेतन मानें तो मुँह के पानी से अनुमित रसनेन्द्रिय की विकृति की उपपत्ति नहीं होगी, क्योंकि इन्द्रियों के विषय नियमित हैं । चक्षु से रूप का ही ज्ञान होता है रसादि का नहीं, एवं रसना से रस का ही ज्ञान हो सकता है रूप का नहीं । अतः रूप और रस के सामानाधिकरण्य की प्रतीति के बाद जो रूप को देखने से रस की स्मृति होती है, वह नहीं हो सकेगी, और वह विकार है अवश्य । अतः इन्द्रियादि से भिन्न कोई दोनों का अभिज्ञ एक व्यक्ति अवश्य है जो रूप को देखकर रस का स्मरण करता है । ( प्र ० ) रूप को देखनेवाला और रस को स्मरण करनेवाला शरीर हो क्यों नहीं है? ( उ ० ) एक ही व्यक्ति की बाल्यावस्था का शरीर और वृद्ध अवस्था का शरीर यतः भिन्न हैं, दोनों भिन्न परिमाणों के हैं । ( ऐसी स्थिति में शरीर को ही अनुभविता और स्मर्त्ता दोनों For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २०४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-ते च न शरीरेन्द्रियगुणाः कस्मादहङ्कारेणैकवाक्यताभावात् प्रदेशवृत्ति-शरीर और इन्द्रिय के गुण नहीं हैं, क्योंकि ( १ ) अहङ्कार के साथ उनकी प्रतीत नहीं होती है । ( २ ) वे अपने आश्रय के किसी प्रदेश में रहते है । ( ३ ) जब तक न्यायकन्दली सिद्धे बाल्यावस्थानुभूतस्य वृद्धावस्थायामस्मरणप्रसङ्गात् । न केवलं पूर्वोक्तैर्हेतुभिः सुखदुःखेच्छाद्वेषादिभिश्च गुणैर्गुण्यनुमीयते । अहङ्कारेणाहमितिप्रत्ययेनैकवाक्यत्वमेकाधिकरणत्वं सुखादीनां ' अहं सुखी, अहं दुःखी ' इत्यहङ्कारप्रत्ययविषयस्य सुखाद्यवच्छेद्यस्य प्रतीतेः । अहं प्रत्ययश्च न शरीरालम्बनः, परशरीरेऽभावात् । स्वशरीरे एवायं भवतीति चेन्न, अविशेषात् । शरीरा-लम्बनोऽहं प्रत्ययः स्वशरीवत् परशरीरमपि चेत् प्रत्यक्षं तत्र यथा स्थूलादिप्रत्ययः स्वशरीरे परशरीरेऽपि भवति, एवमहमिति प्रत्ययोऽपि स्यात्, स्वरूपस्यो-भयत्राविशेषात् । स्वसम्बन्धिताकृते तु विशेषे तत्कृत एवायं प्रत्ययो न शरीरालम्बनः, तदालम्बनत्वे चान्तर्मुखतयापि न भवेत् । अत एवायं नेन्द्रियावलम्बनः, इन्द्रियाणामतीन्द्रियत्वात्, अस्य च लिङ्गशब्दानपेक्षस्य मान लेने पर ) बाल्यावस्था में अनुभूत विषय का स्मरण वृद्धावस्था में अनुपपन्न हो जायगा । केवल पहिले कहे हुए हेतुओं से ही नहीं, किन्तु सुख, दुःख, इच्छा, द्वेषादि गुणों से भी गुणी आत्मा का अनुमान होता है । ' अहङ्कार से ', ' अहम् ' इस प्रकार की प्रतीति से, एवं सुखादि के एकवाक्यत्व अर्थात् एकाधिकरणत्व से भी ( आत्मा का अनुमान होता है ), क्योंकि अहं सुखी, अहं दुःखी ' इत्यादि प्रतीतियों में ' अहम् ' शब्द के अर्थ का सुखादियुक्त रूप से ही भान होता है, ' अहम् ' इस आकार की प्रतीति का विषय शरीर नहीं हो सकता है, क्योंकि दूसरे के शरीर में ' अहम् ' इस आकार की प्रतीति नहीं होती है । केवल अपने ही शरीर में ' अहम् ' शब्द की प्रतीति होती है । ( प्र ० ) ( यतः ) अपने ही शरीर में ' अहम् ' इस आकार की प्रतीति होती है, ( अतः वही अहं प्रत्यय का विषय हो ) | ( उ ० ) इस कथन में कोई विशेष नहीं हैं, क्योंकि ' अहम् ' यह प्रतीति यदि शरीर विषयक है तो फिर स्वशरीरविषयक और परशरीर विषयक दोनों होगी, जैसे कि स्थूलत्व का प्रत्यक्ष होता है, वह स्वशरीर में भी होता है एवं पर शरीर में भी होता है । इसी प्रकार ' अहम् ' प्रतीति भी दोनों में समान होगी, क्योंकि स्वशरीर और परशरीर के स्वरूपों में कोई अन्तर नहीं है । यदि अपना सम्बन्ध ही अपने शरीर में विशेष मानें? तो फिर वह प्रतीति उस सम्बन्ध विषयक ही होगी ( आत्मविषयक नहीं ) । एवं ' अहम् ' प्रतीति अगर शरीर विषयक हो तो फिर अन्त-मुखतया उसकी उत्पत्ति नहीं होगी । अत एव ' अहम् ' प्रतीति इन्द्रिय विषयक भी नहीं है, क्योंकि इन्द्रियाँ अतीन्द्रिय हैं, एवं ' अहम् ' प्रतीति प्रत्यक्षरूप है, क्योंकि इस For Private And Personal

पृष्ठ 280

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 280 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २०५ प्रशस्तपादभाष्यम् स्वादयावद्द्रव्यभावित्वाद् बाह्येन्द्रियाप्रत्यक्षत्वाच्च तथाहंशब्देनापि पृथिव्यादिशब्दव्यतिरेकादिति । उनके आश्रय विद्यमान रहें तब तक रहते ही नहीं हैं ( अयावद्द्रव्यभावी हैं ) । ( ४ ) एवं बाह्य इन्द्रियों से उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है । ( १० ) ' अहम् ' शब्द से भी आत्मा का अनुमान होता है, क्योंकि पृथिवी प्रभृति अन्य द्रव्यों के लिए ' अहम् ' शब्द का मुख्य प्रयोग कहीं नहीं देखा जाता है । न्यायकन्दली प्रत्यक्ष प्रत्ययत्वात्, तस्मात् सुखादयोऽपि न शरीरेन्द्रियविषयाः । किश्व, योऽनु-भविता तस्यैव स्मरणमभिलाषः, सुखसाधनपरिग्रहः, सुखोत्पत्तिः, दुःखप्रद्वेष इति सर्वशरीरिणां प्रत्यात्मसंवेदनीयम् । अनुभवस्मरणे च न शरीरेन्द्रियाणामित्युक्तम् । ततो s पि सुखादयो न तद्विषयाः । युक्त्यन्तरश्वाह – प्रदेशवृत्तित्वादिति । दृश्यते प्रदेशवृत्तित्वं सुखादीनां पादे मे सुखं शिरसि मे दुःखमिति प्रत्ययात् । ततश्च शरीरेन्द्रियगुणत्वाभावः । तद्विशेषगुणानां व्याप्यवृत्तिव्यभिचारात् । सुखादयः शरीरेन्द्रियविशेषगुणा न भवन्ति, अव्याप्यवृत्तित्वात् । ये तु शरीरेन्द्रियविशेष-गुणास्ते व्याप्यवृत्तयो दृष्टाः, यथा रूपादयः, न च तथा सुखादयो व्याप्यवृत्तयः, तस्मान्न शरीरेन्द्रियगुणा इति व्यतिरेकी । कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नस्य नभोदेशस्य में ' हेतु ' और ' शब्द ' इन दोनों की ( अर्थात् अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण की ) अपेक्षा नहीं है । ( यतः शरीर और इन्द्रिय अहम् प्रत्यय के विषय नहीं हैं ) अतः सुखादि भी शरीर और इन्द्रिय के धर्म नहीं हैं । एवं यह सभी शरीरधारियो का अनुभव है कि स्मरण, अभिलाषा, सुख के साधनों का ग्रहण, सुख की उत्पत्ति, दुःख के प्रति द्वेष प्रभृति अनुभव करने वाले को ही होते हैं । यह कह चुके हैं कि अनुभव और स्मरण दोनों शरीर और इन्द्रियों को नहीं हो सकते । इस हेतु से भी शरीरादि सुखादि के आश्रय नहीं हैं । ' सुखादि के आश्रय शरीरादि नहीं हैं ' इसमें ' प्रदेश वृत्तित्वात् ' इत्यादि से दूसरी युक्ति भी देते हैं । ' पैर में सुख है, और शिर में वेदना है ' इत्यादि प्रतीतियों से समझते हैं कि सुखादि प्रदेशवृत्ति हैं, अर्थात् अपने आश्रय के किसी एक देश में ही रहते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि सुखादि शरीर इन्द्रियों के गुण नहीं हैं, क्योंकि सुखादि विशेषगुण कभी ' व्याप्यवृत्ति ' अर्थात् अपने आश्रय के समस्त अंशों में रहनेवाले नहीं होते । शरीर और इन्द्रियों के जितने भी विशेष गुण हैं, सभी व्याप्यवृत्ति अर्थात् अपने आश्रय के सभी अंशों में रहनेवाले होते हैं, जैसे कि रूपादि । सुखादि रूपादि - विशेष गुणों की तरह व्याप्यवृत्ति नहीं हैं, अतः सुखादि शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं । यह व्यतिरेक व्याप्ति जनित अनुमान भी ( ' सुखादि For Private And Personal