प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 281–290
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 281–290
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २०६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-श्रोत्रेन्द्रियभावमापन्नस्य यश्शब्दो गुणो भवति स तद्विवरव्यापीत्यव्यभिचारः । इतोऽपि न शरीरेन्द्रियगुणाः सुखादयो भवन्ति, अयावद्द्रव्यभावित्वात्, व्यति-रेकेण रूपादय एवं निदर्शनम् । इन्द्रियगुणप्रतिषेधे तु नायं हेतु:, श्रोत्रगुणेन शब्देनानैकान्तिकत्वात् । इतोऽपि न शरीरेन्द्रियगुणाः सुखादयो बाह्येन्द्रिया-प्रत्यक्षत्वात् । शरीरेन्द्रियगुणानां द्वयी गतिः - अप्रत्यक्षता गुरुत्वादीनाम्, बाह्येन्द्रिय-प्रत्यक्षता रूपादीनाम् । विधान्तरन्तु सुखादयस्तस्मान्न तद्गुणा इति शरीरेन्द्रिय-गुणत्वे प्रतिषिद्धे परिशेषात्तैरात्मानुमीयत इति स्थितिः । ननु सुखं दुःखञ्चेमौ विकाराविति नित्यस्यात्मनो न सम्भवतः । भवत-श्चेत् सोऽपि चर्म्मवदनित्यः स्यात् । न तयोरुत्पादविनाशाभ्यां तदन्यस्यात्मनः शरीरादि के गुण नहीं हैं ) इसका साधक है । यद्यपि आकाश रूपी विभु - श्रोत्रेन्द्रिय का विशेषगुण शब्द अव्याप्यवृत्ति प्रतीत होता है, तथापि विभु आकाश श्रोत्रेन्द्रिय नहीं है, किन्तु कर्णशष्कुली से सीमित आकाश ही श्रोत्रेन्द्रिय है और इस आकाश में शब्द व्याप्यवृत्ति ही है । अतः इन्द्रियादि के विशेषगुण अवश्य ही व्याप्यवृत्ति होते हैं ' इस नियम में कोई व्यभिचार नहीं है । ' सुखादि शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं ' इसमें यह हेतु भी है कि ' वे अयावद्द्रव्यभावी ' हैं ( अर्थात् वे आश्रय रूप द्रव्य के विद्यमान समय तक बराबर नहीं रहते ), अयावद्रव्य भावित्व हेतु के न्याय प्रयोग में भी रूपादि ही व्यतिरेक दृष्टान्त हैं । ' सुखादि इन्द्रिय के विशेष गुण नहीं है ' अयावद्द्रव्य हेतुक अनुमान इसका साधक नहीं है ( इस अनुमान से केवल यही सिद्ध होता है कि सुखादि शरीर के गुण नहीं हैं ) क्योंकि यह हेतु श्रोत्रेन्द्रिय के शब्द रूप गुण में व्यभिचरित है । इस हेतु से भी सुखादि शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं, क्योंकि सुखादि का बाह्य इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहींहोता है । वस्तुस्थिति यह है कि शरीर और इन्द्रियों के गुण के दो ही प्रकार हैं ( १ ) किन्हीं गुणों का तो किसी भी प्रकार प्रत्यक्ष ही नहीं होता है जैसे कि गुरुत्वादि का या फिर ( २ ) बाह्य इन्द्रियों से ही प्रत्यक्ष होता है, जैसे कि रूपादि का । सुखादि दोनों प्रकारों से भिन्न तीसरे प्रकार के हैं, अतः शरीरादि के गुण सुखादि नहीं हैं । इस प्रकार यह सिद्ध हो जाने पर कि ' सुखादि शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं ' इन सुखादि हेतुओं से होनेवाले परिशेषानुमान से भी आत्मा का अनुमान होता है । ( प्र ० ) सुख और दुःख ये दोनों तो विकार हैं, अत: वे नित्य आत्मा के गुण नहीं हो सकते, अगर विकार स्वरूप सुखादि भी आत्मा के गुण हों तो फिर आत्मा चर्म की तरह अनित्य वस्तु होगी । ( प्र ० ) नहीं, क्योंकि सुख और दुःख दोनों की उत्पत्ति और विनाश से उन दोनों से भिन्न आत्मा के स्वरूप में कोई विघटन नहीं For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्द्रलो २०७ स्वरूपप्रच्युतेरभावात् । नित्यस्य हि स्वरूपविनाशः स्वरूपान्तरोत्पादश्च विकारो नेष्यते, गुणनिवृत्ति र्गुणान्तरोत्पादश्चाविरुद्ध एव । अथास्य नित्यस्य सुखदुःखाभ्यां किं क्रियते? स्वविषयोऽनुभवः । सुखदुःखानुभवे सत्यास्यातिशयानति-शयरहितस्य क उपकारः? अयमेव तस्योपकारोऽयमेव चातिशयो यस्मिन् सति सुख-दुःखभोक्तृत्वम् । तथाहंशब्देनापीति । यथा सुखादिभिरात्मा अनुमीयते तथाहंशब्देना-प्यनुमीयते अहंशब्दो लोके वेदे चाभियुक्तैः प्रयुज्यमानो न तावन्निरभिधेयः । न च स्वरूपमभिधेयं युक्तं स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । यथोक्तम्-' नात्मानमभिधत्ते हि कश्चिच्छन्दः कदाचन । ” तस्माद् यो s स्याभिधेयः स आत्मेति । नन्वयं पृथिव्यादीनामेव वाचको भविष्यति तत्राह - पृथिव्यादि -शब्दव्यतिरेकादिति । यो यस्यार्थस्य वाचकः स तच्छब्देन समानाधिकरणो दृष्ट:, यथा द्रव्यं पृथिवीति । अहंशब्दस्य तु पृथिव्यादिवाचकैः शब्दैः सह व्यति हो सकता है । एक स्वरूपविनाश और दूसरे स्वरूप की उत्पत्ति ये दोनों त्रिकार तो नित्य वस्तुओं में होते नहीं हैं । एक गुण का नाश और दूसरे गुण की उत्पत्ति ये दोनों विकार उसके नित्यत्व के विरोधी नहीं हैं । ( प्र ० ) नित्य आत्मा को सुख और दुःख से क्या होता है? ( उ ० ) सुख दुःखादि का अनुभव होता है । ( प्र ० ) अतिशय ( वैशिष्ट्य ) और अनतिशय से रहित आत्मा का सुख और दुःख के अनुभव से क्या उपकार होता है? ( उ ० ) इनसे यही उपकार होता है और इनसे आत्मा में यही अतिशय उत्पन्न होता है कि इन दोनों के रहने से ही सुख दुःख के भोक्तृत्व का व्यवहार उस में होता है । " तथाऽहंशब्देनापि " जैसे कि सुखादि से आत्मा का अनुमान होता है वैसे ही ' अहम् ' शब्द से भी आत्मा का अनुमान होता है । लोक में और वेदों में प्रयुक्त ' अहम् ' शब्द अपने वाच्य अर्थ से रहित नहीं हैं और अपना स्वरूप ( आनुपूर्वी ) भी उसके वाच्य अर्थ नहीं है, क्योंकि एक ही वस्तु में एक क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व दोनों नहीं रह सकते, क्योंकि वे दोनों परस्पर विरोधी हैं । जैसा कहा है कि ' कोई भी शब्द अपने स्वरूप ( आनुपूर्वी ) को कभी भी अभिधावृत्ति से नहीं समझाते, अतः आत्मा ही ' अहम् ' शब्द का वाच्य अर्थ है । ' अहम् ' शब्द पृथिव्यादि का वाचक हो सकता है? इस आक्षेप के समाधान में ' पृथिव्यादिशब्दव्यतिरेकात् ' यह वाक्य कहा है । जो शब्द जिस अर्थ का वाचक रहता है वह उस अर्थ के वाचक दूसरे शब्द के साथ ' समानाधिकरण ' अर्थात् अभेद का बोध करनेवाले रूप से प्रयुक्त होता है, जैसे कि ' द्रव्यं पृथिवी ' इत्यादि । ' अहम् ' शब्द का पृथिव्यादि वाचक शब्दों केसाथ व्यतिरेक ' अर्थात् सामानाधिकरण्य नहीं है, क्योंकि ' अहं पृथिवी, अहमुदकम् ' इत्यादि प्रतीतियाँ नहीं होती हैं । अत: ' अहम् ' शब्द पृथिव्यादि का वाचक नहीं है | For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २०८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-प्रशस्तपादभाष्यम् तस्य गुणा बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधम्र्म्माधर्म्म संस्कारसङ्ख्या-परिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः । आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्धयादयः ( १ ) बुद्धि, ( २ ) सुख, ( ३ ) दु: ख, ( ४ ) इच्छा, ( ५ ) द्वेष, ( ६ ) प्रयत्न, ( ७ ) धर्म्म, ( ८ ) अधर्म्म, ( ६ ) संस्कार, ( १० ) संख्या, ( ११ ) परिमाण, ( १२ ) पृथक्त्व, ( १३ ) संयोग और ( १४ ) विभाग ये चौदह गुण आत्मा के हैं ' आत्म-लिङ्गाधिकार ' अर्थात् ‘ प्राणापानादि ' ( ३।२।४ ) सूत्र के द्वारा बुद्धि से प्रयत्न पर्यन्त न्यायकन्दली रेकः समानधिकरणत्वाभाव:, अहं पृथिव्यहमुदकमिति प्रयोगाभावात् तस्मान्नायं पृथिव्यादिविषयः । ननु शरीरविषय एवायं दृश्यते स्थूलोऽहमिति? न, अहं जानामि अहं स्मरामतिप्रयोगात् । शरीरस्य च ज्ञानस्मृत्यधिकारणत्वं निषिद्धम्, तस्मादात्मो-पकारकत्वेन लक्षणया शरीरे तस्य प्रयोगः, यथा भृत्येऽहमेवायिमिति व्यपदेशः I । एवं व्यवस्थिते सत्यात्मनो गुणान् कथयति - तस्य च गुणा इत्यादिना । बुद्ध्यादीनामात्मनि सद्भावे सूत्रकारानुमतं दर्शयति- आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ताः सिद्धा इति । आत्मलिङ्गाधिकार इति प्राणापानादिसूत्रं लक्षयति धर्माधर्मा-। धर्माधर्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्ववचनादिति । वात्मान्तरगुणानामकारणत्वादिति वचनात्सिद्धौ । दारि वर्तमानो दानधर्मः प्रतिगृहीतरि अधर्मं जनयतीति कस्यचिन्मतं निषेद्ध सूत्रकृतोक्तम्-( प्र ० ) ' अहम् ' शब्द तो शरीर के लिए ही प्रयुक्त दीखता है, जैसे कि ' स्थूलोऽहम् ' इत्यादि । ( उ ० ) नहीं, " अहं जानामि, अहं स्मरामि " इत्यादि भी प्रयोग होते हैं । यह कह चुके हैं कि अनुभव और स्मृति शरीर के धर्म नहीं हैं, अतः शरीर चूंकि आत्मा को उपकार पहुँचाने वाला है, अतः आत्मा के वाचक ' अहम् ' शब्द का लक्षणावृत्ति से शरीर में भी प्रयोग होता है, जैसे कि भृत्य में ' यह मैं ही हूं " यह प्रयोग होता है । इस प्रकार आत्मा की सिद्धि हो जाने पर ' तस्य च गुणाः ' इत्यादि से आत्मा के गुणकहे जाते हैं । आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्धयादयः प्रयत्नान्ताः सिद्धाः ' इत्यादि से आत्मा में बुद्धयादि गुणों की सत्ता में सूत्रकार की अनुमति सूचित करते हैं । ' आत्मलिङ्गाधिकार ' शब्द से ' प्राणापानादि ' सूत्र सूचित होता है । ' धर्माधर्मावात्मान्तर-गुणानामकारणत्ववचनात् " अर्थात् " आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् " ( ६।१।५ ) सूत्रकार की इस उक्ति से आत्मा में धर्म और अधर्म की सिद्धि समझनी चाहिए । किसी का कहना है कि दाता के दानजनित धर्म से ग्रहण करनेवाले पुरुष में अधर्म की उत्पत्ति होती है, इस मत को खण्डन करने के लिए सूत्रकार ने ' आत्मान्तरगुणानाम् ' इत्यादि सूत्र लिखा है । इस सूत्र का अभिप्राय है कि जैसे कि एक आत्मा का धर्मरूप गुण For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] २७ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २०६ भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal प्रयत्नान्ताः सिद्धाः । धर्माधर्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्ववचनात् । संस्कारः, स्मृत्युत्पत्तौ कारणवचनात् । व्यवस्थावचनात् सङ्ख्या । छः गुण आत्मा में कहे गये हैं । यतः " आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारणत्वात् ” ( ६ । १ । १५ ) इस सूत्र के द्वारा एक आत्मा के गुणों को दूसरी आत्मा के गुणों का अकारण कहा गया है, इससे सिद्ध होता है कि धर्म और अधर्म ये दोनों भी आत्मा गुण हैं । महर्षि ने “ आत्ममनसोः संयोगविशेषात्संस्काराच्च स्मृति: " ( ६ । २ । ६ ) इस सूत्र के द्वारा संस्कार को स्मृति का कारण कहा है, अतः आत्मा में संस्कार नामक गुण का रहना भी उनको अभिप्रेत समझना चाहिए । “ व्यवस्थातो नाना " ( ३।२।२० ) सूत्रकार की इस उक्ति से आत्मा में संख्या की सिद्धि समझनी " आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरगुणेष्वकारणत्वात् " इति । अस्यायमर्थः - आत्मा-न्तरगुणानां सुखादीनामात्मान्तरगुणेषु सुखादिषु कारणत्वाभावाद्धर्माधर्म्मयो. रन्यत्र वर्त्तमानयोरन्यत्रारम्भकत्वमयुक्तमिति । एतेन धर्माधर्म्मयोरात्मगुणत्वं कथितम्, अन्यथा तयो: सुखादिसाधर्म्यकथनेनानारम्भकत्वसमर्थनं न स्यात् । संस्कारः स्मृत्युत्पत्ताविति । आत्ममनसोः संयोगात्संस्काराच्चेति स्मृतिसूत्रं लक्षयति । पूर्वानुभूतोऽर्थः स्मर्य्यते, न तत्रानुभव: कारणम्, चिरविनष्टत्वात्, नाप्यनुभवाभावः कारणमभावस्य निरतिशयत्वेन पटुमन्दादिभेदानुपपत्तेरभ्यासवैयर्थ्याच्च । दूसरी आत्मा में सुख का उत्पादन नहीं कर सकता है, वैसे ही एक आत्मा का धर्म या अधर्मं दूसरी आत्मा में धर्म या अधर्म को भी उत्पन्न नहीं कर सकता । इससे यह कथित हो जाता है कि ' धर्म और अधर्म आत्मा के गुण हैं ' । अगर ये आत्मा के गुण न हों तो फिर जैसे एक आत्मा में रहनेवाले सुखादि दूसरी आत्मा में सुखादि के उत्पादक नहीं हैं, वैसे ही धर्म और अधर्म भी, तथा एक आत्मा में रहनेवाले सुखादि भी, इस सादृश्य उत्पन्न न होने का समर्थन असङ्गत हो जायगा । महर्षि से दूसरी आत्मा में अधर्मादि के कणाद ने संस्कार को स्मृति का कारण कहा है, अतः आत्मा में संस्कार ( भावना नाम का ) गुण भी समझना चाहिए । ' संस्कार: ' इत्यादि भाष्य को पंक्ति " आत्ममनसोः संयोगात्संस्का-( च्च स्मृतिः ” ( ६।२।६ ) इस सूत्र की ओर सङ्केत करती है । पूर्वकाल में अनुभूत विषय की ही स्मृति होती है । स्मृति के प्रति पूर्वानुभव कारण नहीं हो सकता है, क्योंकि स्मृति की उत्पत्ति से बहुत पहिले वह नष्ट हो जाता है । उस अनुभव का नाश भी उसका कारण नहीं हो सकता है, क्योंकि अभाव में अर्थात् अनुभवनाशजनित अनुभव की असत्ता रूप
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-तस्मादनुभवेनात्मनि कश्चिदतिशयः कृतो यतः स्मरणं स्यादिति संस्कारकल्पना । ये तु विनष्टमप्यनुभवमेव स्मृतेः कारणमाहुः, तेषां विनष्टमेव ज्योतिष्टोमादिकं स्वर्गादिफलस्य साधनं भविष्यतीत्यदृष्टस्याप्युच्छेदः स्यात् । व्यवस्था-वचनात् संख्येति । " नानात्मानो व्यवस्थातः " इति सूत्रेणात्मनानात्वप्रति-पादनाद् बहुत्वसङ्ख्या सिद्धेत्यर्थः । अथ व्यवस्था? केयं नानाभेदभाविनां ज्ञानसुखादीनाम-प्रतिसन्धानम्, ऐकात्म्ये हि यथा बाल्यावस्थायामनुभूतं वृद्धावस्था-यामनुसन्धीयते मम सुखमासीन्मम दुःखमासीदिति, एवं देहान्तरानुभूतमप्यनु-सन्धीयते, अनुभवितुरेकत्वात् । न चैवमस्ति, अत: प्रतिशरीरं नानात्मानः । यथा सर्वत्रैकस्य [ काशस्य श्रोत्रत्वे कर्णशष्कुल्याद्युपाधिभेदाच्छन्दोपलब्धिव्यवस्था, अभाव में और अनुभव की अनुत्पत्तिमूलक अनुभव की असत्ता रूप अभाव में कोई भी अन्तर नहीं है, अतः अधिक काल तक स्मरण रखने से ' पटु ' और थोड़े समय तक स्मरण रखने से मन्द, इस प्रकार की दोनों स्मृतियों में कोई अन्तर नहीं रहेगा । एवं चिरकाल तक स्मरण रखने के लिए अभ्यास की भी जरूरत न रह जायगी अतः संस्कार रूप अतिशय की कल्पना की जाती है । जो कोई विनष्ट अनुभव को ही स्मृति का कारण मानते हैं, उनके मत में विनष्ट ज्योतिष्टोमादि याग से ही स्वर्गादि की उत्पत्ति माननी पड़ेगी । अतः उनके मत में धर्म और अधर्म इन दोनों को भी मानने की आवश्यकता नहीं रहेगी । ' व्यवस्था के रहने से संख्या भी ' अर्थात् " व्यवस्थातो नाना " ( ३२ २० ) इस सूत्र से आत्मा में नानात्व को सिद्धि की गयी है । इससे आत्मा में बहुत्व संख्या की भी सिद्धि होती है । ( प्र ० ) ( आत्मा अनेक हैं ) इसमें क्या युक्ति है? ( उ ० ) यही कि एक के ज्ञानसुखादि का दूसरे को स्मरण नहीं होता है । अर्थात् आत्मा अगर एक माना जाय तो फिर बाल्यावस्था में विषय का जैसे वृद्धावस्था में स्मरण होता है कि ' मुझे दुःख था, मुझे सुख था ' वैसे ही और देहों के द्वारा अनुभूत विषयों का स्मरण भी हो, क्योंकि अनुभव करने वाला आत्मा सभी देहों में एक ही है, किन्तु ऐसा नहीं होता । अतः प्रत्येक शरीर में रहनेवाले आत्मा भिन्न भिन्न हैं । ( प्र ० ) जैसे यह नियम है कि आकाश के एक होने पर भी कर्णशष्कुली रूप उपाधि से युक्त आकाश से ही शब्द सुना जाता है, वैसे ही आत्मा के एक होने पर भी जिस देह रूप उपाधि से युक्त होकर वह ( आत्मा ) जिन सुखादि का अनुभव करता है, उस देह रूप उपाधि से युक्त आत्मा ही उन सुखादि का स्मरण भी करेगा दूसरा नहीं, यह व्यवस्थां भी की जा सकती है । ( इस For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २११ तथात्मैकत्वेऽपि देहभेदादनुभवादिव्यवस्थेति चेद्? विषमोऽयमुपन्यासः, प्रति-पुरुषं व्यवस्थिताभ्यां धर्माधर्म्माभ्यामुपगृहीतानां शब्दोपलब्धिहेतूनां कर्ण-शष्कुलीनां व्यवस्थानाद्युक्ता तदधिष्ठाननियमेन शब्दग्रहणव्यवस्था | ऐकात्म्ये तु धर्माधर्म्मयोरव्यवस्थानाच्छरीरव्यवस्थाभावे किं कृता सुखदुःखोत्पत्तिव्य-वस्था? मनस्सम्बन्धस्यापि साधारणत्वात् 1 यस्य तु नानात्मानः, तस्य सर्वेषामात्मनां सर्वगतत्वेन सर्वशरीरसम्बन्धेऽपि न साधारणो भोगः । यस्य कर्म्मणा यच्छरीरमारब्धं तस्यैव तदुपभोगायतनं न सर्वस्य, कर्मापि यस्य शरीरेण तस्येव तद्भवति नापरस्य एवं शरीरान्तरनियमः कर्मान्तिरनियमादित्यनादिः । अथ मतम् एकत्वेऽपि परमात्मनो जीवात्मनां परस्परभेदाद् व्यवस्थेति तदसत्, परमात्मनो भेदेऽद्वैत सिद्धान्तक्षतिः, “ अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकर-वाणि ' इति जीवपरमात्मनोस्तादात्म्यश्रुतिविरोधाच्च । अविद्याकृतो जीवपर-मात्मनोर्भेद इति चेत्? कस्येयमविद्या? किं ब्रह्मणः? किमुत जीवानाम्? के लिए आत्मा को नाना मानने की आवश्यकता नहीं है ) । उ ० ) प्रत्येक पुरुष के शब्दोपलब्धि के अदृष्ट से कर्णशष्कुली रूप कारण की कल्पना की गयी है । अतः यह ठीक है कि उसी कर्णशष्कुली रूप उपाधि से युक्त आकाश श्रवणेन्द्रिय ) से ही शब्द का प्रत्यक्ष होता है, औरों से नहीं, किन्तु आत्मा को एक मान लेने से धर्म और अधर्म की कोई व्यवस्था नहीं रहेगी, फिर सुखदुःखादि की भी व्यवस्था नहीं होगी, फिर सुखदुःखादि का भी नियम नहीं रहेगा, क्योंकि मन का सम्बन्ध तो सभी देहों में समान ही है, अतः उक्त आक्षेप असङ्गत है । यद्यपि जिनके मत में आत्माएँ अनेक हैं, उनके मत में भी ( व्यापक होने के कारण प्रत्येक ) आत्मा सभी मूत्तं द्रव्यों के साथ सम्बद्ध है, फिर भी भोग के सर्वसाधारणत्व की आपत्ति नहीं होती है, क्योंकि जिस आत्मा के कर्म ( अदृष्ट ) से जो शरीर उत्पन्न होगा वह शरीर उसी आत्मा के भोग का ' आयतन ' होगा, दूसरी आत्माओं के भोग का नहीं, एवं जिस आत्मा के शरीर से जो कर्म ( अ ) उत्पन्न होगा वह कर्म उसी आत्मा का होगा और आत्माओं का नहीं । इसी प्रकार अन्य शरीर और अन्य कर्मों की भी व्यवस्था समझनी चाहिए । ( प्र ० ) जीवात्मा और परमात्मा ये दो मान लेने से ही ( शरीर भेद से अनन्त जीव न मानने पर भी ) सभी व्यवस्थायें ठीक हो जाती हैं? ( उ ० ) यह मान लेने पर भी अद्वैत सिद्धान्त तो विघटित हो हो जायगा । एवं ' अनेन जीवेन ' इत्यादि श्रुतियाँ भी विरुद्ध हो जायँगी । ( प्र ० ) जीव और ईश्वर वास्तव में तो अभिन्न ही हैं, किन्तु ' अविद्या ' से अर्थात् अज्ञान से दोनों में भेद की कल्पना की जाती है । ( उ ० ) यह अविद्या किसकी? जीव की? या ब्रह्म की? ब्रह्म की तो For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २१२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-न तावद् ब्रह्मणोऽस्त्य विद्यायोगः, शुद्धबुद्धस्वभावत्वात् । जीवाश्रयाविद्येति चान्योन्याश्रय दोषपराहतम्, अविद्याकृतो जीवभेदो जीवाश्रयाविद्येति । बीजा-ङकुरवदनादिरविद्या जीवप्रभेद इति चेत्? बीजाङकुरव्यक्तिभेदवदविद्याजीवयोः पारमार्थिकत्वाभावादनुपपन्नं व्यक्तिभेदेन च बीजाङ्कुरयोरन्योन्यकारणता, जीवस्तु सर्वासु भवकोटिष्वेक एव मानुषपशुपक्ष्यादियोनिप्रत्यग्रजातस्य शिशो-जतिसाम्यादाहारविशेषाभिलाषेण तासु तासु जातिषु जन्मान्तरकृतस्य तत्तदा-हारविशेषस्यानुमानपरम्परया तस्यानादिशरीरयोगप्रतीतेः, तत्राविद्याकृतो जीव-भेदो जीवभेदाच्चाविद्येत्यसङ्गतिः । ब्रह्मवज्जीवस्याप्यनादिनिधनत्वेन ब्रह्म-प्रतिबिम्बता, तस्मात् " तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति " इति श्रुतिप्राण्यादनादिनिधनं ब्रह्मतत्त्वमेवेदं सर्वदेहेषु प्रतिभासत इति न वाच्यम्, तथा सति चानुपपन्ना व्यवस्थितेति सूक्तं ' नानात्मानो व्यवस्थात ' इति । वह हो नहीं सकती है, क्योंकि वे शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाव के हैं | अगर अविद्या का आश्रय जीव को मानें, तो फिर अन्योन्याश्रय दोष होगा, क्योंकि अविद्या से ही जीव की कल्पना की जाती है और वह अविद्या उसी में आश्रित है । अविद्या के रहने से ही वह जीव होगा एवं जीव के रहने से ही अविद्या की सत्ता रहेगी, इन दोनों में पहिले कौन होगा? और पीछे कौन? यह निर्णय असम्भव है, अतः इस निर्णय के बल पर कोई भी निर्णय सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) बीज और अङ्कुर की तरह जीव और अविद्या का सम्बन्ध भी अनादि है । ( उ ० ) जब बीज और अङ्कुर नाम के दो स्वतन्त्र वस्तु हैं, तब यह स्वीकार करना पड़ता है कि अकुर के कारण बीज का भी कोई दूसरा अङ्कुर ही कारण है । अतः अन्योन्याश्रय से दूषित होते हुए भी बीज और अङ्कुर का सामान्य कार्यकारणभाव मानना पड़ता है । किन्तु जीव और अविद्या वास्तव में दो व्यक्ति नहीं हैं, अतः यहाँ अन्योन्याश्रयदोष को सह्य करना उचित नहीं है । ( प्र ० ) संसार के सभी देहों में जीव एक ही है । मनुष्य, पशु, पक्षी प्रभृति जिस योनि में अभी उसका जन्म होता उस जाति के विशेष प्रकार के भोजन की अभिलाषा से उस जीव में इससे पहिले जन्म में भी इस प्रकार के आहार का अनुमान होता है और यही अनुमान की परम्परा जीव में शरीर के अनादि सम्बन्ध को प्रमाणित करती है । ( उ ० ) इस पक्ष में भी अविद्या के कारण जीवों में भेद एवं जीवभेद के कारण अविद्या, यह असङ्गति है ही । ( प्र ० ) ब्रह्म की तरह जीव भी आदि और अन्त से रहित है, फलतः जीव ब्रह्म का ही प्रतिबिम्ब है । " तमेव भान्तम् ' इत्यादि श्रुतियां भी इस अर्थ को पुष्ट करती हैं, अतः आदि और अन्त से रहित ब्रह्मतत्त्व ही सभी देहों में प्रतिभासित होता है । ( उ ० ) इस पक्ष में भी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] पृथकत्वमप्यत भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् एव! तथा चात्मेतिवचनात् २१३ परममहत्परिमाणम्! चाहिए । यतः आत्मा में संख्या है, अतः पृथक्त्व भी अवश्य ही है । वैभव सूत्र ( ७ | १ | २२ ) में प्रयुक्त ' तथा चात्मा ' इस उक्ति से आत्मा में परममहत्परिमाण गुण का रहना भी महर्षि का अभिप्रेत समझना चाहिए । यतः सुखादि न्यायकन्दली अभेदश्रुतयस्तु गौणार्या इति दिक् । न च नानात्मपक्षे सर्वेषां क्रमेण मुक्तावन्ते संसारोच्छेदः, अपरिमितानामन्त्यन्यूनातिरिक्तत्वायोगात् । यथाहु-वर्तिकका रमिश्रा: -अत एव च विद्वत्सु मुच्यमानेषु सन्ततम् । ब्रह्माण्डलोके जीवानामनन्तत्वादशून्यता ॥ अन्त्यन्यूनातिरिक्तत्वे पूज्यते परिमाणवत् । वस्तुन्यपरिमेये तु नूनं तेषामसम्भवः ॥ इति । पृथक्त्वमप्यत एव । " नानात्मानो व्यवस्थातः " इति वचनादेव पृथक्त्वं सिद्धम्, सङ्ख्यानुविधायित्वात्पृथक्त्वस्येत्यभिप्रायः । तथा चात्मेतिवच-नात्परममहत्परिमाणमिति । " विभववान् महानाकाशस्तथा चात्मा " इति सूत्रकारवचनादाकाशवदात्मनोऽपि विभुत्वात् परममहत्परिमाणं सिद्धमित्यर्थः । विभुत्वश्वात्मनो वह्नेरूर्ध्वज्वलनाद् वायोस्तिऽर्यग्गमनादवगतम् । दृष्ट-व्यवस्था की उक्त अनुपपत्ति रहेगी ही, अतः " तीनात्मानो व्यवस्थातः ' " " की सूत्रकार यह उक्ति ठीक है । जीव और ब्रह्म में अभेद को प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ गौण हैं । जीव को नाना मान लेने से इसका भी समाधान हो जाता है कि ' सभी आत्माओं के मुक्त हो जाने पर अन्त में संसार का ही लोप हो जायगा ', क्योंकि ' अपरिमित ' अर्थात् अनन्त वस्तुओं में अन्तिम, न्यूनत्व, अधिकत्व प्रभृति की चर्चा ही नहीं उठती है । जैसा वांतिककार मिश्र ने कहा है कि यतः जीव अनन्त हैं, अतः बराबर ज्ञानी जीवों को मुक्त होते रहने पर भी यह ससार जीवों से शून्य नहीं होता है । अन्तिम, न्यून, और अधिक ये सभी बातें परिमित वस्तुओं की हैं, अपरिमत वस्तुओं में ये सभी बातें असम्भव हैं । आत्मा में पृथकूत्व नाम के गुण की भी सिद्धि संख्या रहेगी वहाँ पर पृथक्त्व भी अवश्य ही रहेगा । सूत्र में प्रयुक्त सूत्रकार की इस उक्ति से त्रिभुत्व समझनी चाहिए क्योंकि जहाँ पर " तथा चात्मा " ( ७ | १ | २२ ) वैभव हेतु से आत्मा में भी आकाश की आग की ऊर्ध्वगति और तरह परममहत्परिमाण की सिद्धि होती है । आत्मा का विभुत्व वायु की कुटिल गति से समझते हैं, क्योंकि वे दोनों ही अष्टकृत हैं । उन गतियों For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २१४ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये आत्म-कारिते । न च तदाश्रयेणासम्बद्धमदृष्टं तयोः कारणं भवितुमर्हति अतिप्रसङ्गात् । न चात्मसमवेतस्यादृष्टस्य साक्षात् द्रव्यान्तरसम्बन्धी घटत इति स्वाश्रय सम्बन्ध -द्वारेण तस्य सम्बन्ध इत्यायातम् । ततः समस्तमूर्त्तद्रव्यसम्बन्धलक्षणमात्मनो विभुत्वं सिद्धयति । स्वभावत एव वह्नेरूर्ध्वज्वलनं नादृष्टादिति चेत्? कोऽयं स्वभावो नाम? यदि वह्नित्वमुत दाहकत्वम्? रूपविशेषो वा? तप्तायःपिण्डे वह्नेरपि स्यात् । अथेन्धन विशेषप्रभवत्वं स्वभाव इति? अनि-न्धनप्रभवस्य विद्युदादिप्रभवस्य चौधैर्ध्वज्वलनं न स्यात् । अथातीन्द्रियः कोऽपि स्वभाव: कासुचिद् व्यक्तिष्वस्ति यासामूर्ध्वज्वलनं दृश्यत इति, पुरुषगुणे कः प्रद्वेषः? यस्य कर्म्मणो गुरुत्वद्रवत्ववेगा न कारणं तस्यात्म विशेषगुणादुत्पादः, यथा पाणिकर्मणः पुरुषप्रयत्नात्, ऊर्ध्वज्वलनतिर्यक्पवनादिनां कर्म्मणां गुरुत्वादयो न कारणमभावात्, तत्तत्कार्य्यविपरीतत्वाच्च । तस्मादेषामप्यात्म विशेष-के आश्रयों में असम्बद्ध अदृष्ट उनके कारण नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा मानने से अतिप्रसङ्ग होगा, एवं आत्मा में समवाय सम्बन्ध से रहने के कारण अट का बाह्य वस्तुओं के साथ कोई भी साक्षात् सम्बन्ध नहीं हो सकता हैं, अतः यही मानना पड़ेगा कि अदृष्ट के आश्रय आत्मा के साथ वह्निप्रभृति के सम्बन्ध होते हैं । इस प्रकार तद्गत अदृष्ट के साथ भी उनका परम्परा सम्बन्ध होता है । अतः मूर्त्त द्रव्यों के साथ आत्मा का सम्बन्ध अवश्य है और सभी मूर्त द्रव्यों के साथ सम्बन्ध ही विभुत्व ' है । ( प्र ० ) ' स्वभाव ' से ही वह्नि ऊपर की ओर जलती है, इसमें अदृष्ट कारण नहीं है । ( उ ० ) ' स्वभाव ' शब्द का यहाँ क्या अर्थ है? ' स्व ' वह्नि का जो ' भाव ' अर्थात् धर्म वह तो ( १ ) वह्नित्व ( २ ) दाहकत्व और ( ३ ) विशेष प्रकार का रूप ये तीन ही हैं, ' स्वभाव ' शब्द से इन तीनों धर्मों को कारण मानने से तपे हुए लोहे का भी ऊर्ध्वज्वलन मानना पड़ेगा, क्योंकि उसमें भी स्वभाव शब्द के उक्त तीनों अर्थ हैं । ( प्र ० ) लकड़ी की आग ही ऊपर को तरफ जलती है, अतः वह्नि का लकड़ी से उत्पन्न होना ही ऊर्ध्वज्वलन का कारणीभूत ' स्वभाव ' है । ( उ ० ) फिर इन्धन के बिना हो उत्पन्न विद्युत् प्रभृति वह्नि का ऊर्ध्वज्वलन नहीं होगा । अगर किसी वह्नि में कोई ऐसी अतीन्द्रिय सामर्थ्य मानते हैं, जिससे उसी वह्नि में ऊर्ध्वज्वलन होता है, तो फिर जीव के अतीन्द्रिय धर्म्म रूप अदृष्ट को ही अगर ऊध्वंज्वलन का कारण मानते हैं तो आपको क्यों जलन होती है? जिस क्रिया का कारण गुरुत्व, द्रवत्व और वेग नहीं है, वह क्रिया आत्मा के विशेष गुण से ही उत्पन्न होती है, जैसे कि पुरुष के प्रयत्न से उत्पन्न हाथ की क्रिया | गुरुत्व, द्रवत्व या वेग वह्नि के ऊर्ध्वज्वलन या वायु की कुटिलगति रूप क्रिया के कारण नहीं हैं, क्योंकि वे वहाँ नहीं है, एवं उनसे होनेवाली क्रियायें भी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] तृष्णा और दुःख के साधनों में द्वेष, www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् २१५ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal सन्निकर्षजत्वात् सुखादीनां संयोगः । तद्विनाशकत्वाद्विभाग इति । संयोग से उत्पन्न होते हैं, अतः आत्मा में संयोग भी है । यतः विभाग संयोग का नाशक है, अतः आत्मा में विभाग भी है । गुणादेवोत्पाद न्याय्यः ऊर्ध्वज्वलन तिय्यं पवनान्यात्मविशेषगुणकृतानि गुरुत्वादिकारणाभावे सति कर्म्मत्वात् पुरुषप्रयत्नजपाणिकर्म्मवत् । सन्निकर्षजत्वात्सुखादीनां संयोगः । सुखादीनामात्मगुणानां मनःसंयोग-जत्वादात्मनि संयोगः सिद्धः, व्यधिकरणस्यासमवायिकारणत्वाभावात् । तद्विनाश-कत्वाद् विभाग इति । तस्य संयोगस्य विनाशकत्वाद् विभागः सिद्धः, आत्म-मनसोनित्यत्वेनाश्रयविनाशस्य विनाशहेतोरभावादित्यर्थः । नन्वात्मनि नित्ये स्थिते नित्यात्मदर्शिनः सुखतृष्णापरिप्लुतस्य सुखसाधनेषु रागो दुःखसाधनेषु द्वेषस्ताभ्यां प्रवृत्तनिवृत्ती, ततो धर्माधम्मौ ततः संसार इत्यदिर्मोक्षः । नैरात्म्ये त्वहमेव नास्मि कस्य दुःखमित्यनास्थायां सर्वत्र रागद्वेषरहितस्य प्रवृत्त्यादेरभावे सत्यपवर्गो घटत इति चेन्न, नित्यात्मदशिनोऽपि विषयदोष-दर्शनाद् वैराग्योत्पत्तिद्वारेण तस्योत्पत्तिरित्यलम् । विलक्षण प्रकार की होती हैं, अतः यही न्याय सङ्गत है कि ऊर्ध्वज्वलनादि क्रियाओं का कारण भी आत्मा का विशेषगुण ही हो । जिस प्रकार हाथ की क्रिया पुरुष में रहने वाले प्रयत्न रूप विशेष गुण से उत्पन्न होती है, उसी प्रकार वह्नि की ऊध्वंज्वलन रूप क्रिया एवं वायु की कुटिल गति रूपा किया ये दोनों ही आत्मा के विशेष गुण से उत्पन्न होती हैं, क्योंकि गुरुत्वादि उनके कारण वहां नहीं हैं जैसे कि पुरुष के प्रयत्न से उत्पन्न हाथ की क्रिया । ' यतः सुखादि संयोग से उत्पन्न होते हैं, अतः संयोग भी आत्मा का गुण है ', क्योंकि ' व्यधि-करण ' अर्थात् विभिन्न अधिकरणों में रहने वाले कारणों से उस अधिकरण में कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है । ' विभाग चूंकि संयोग का नाशक है, अतः वह भी आत्मा का गुण है ' अर्थात् विभाग संयोग का नाशक है इससे आत्मा में विभाग नाम के गुण की भी सिद्धि समझनी चाहिए । अभि-प्राय यह है कि आत्मा और मन दोनों ही नित्य हैं, अतः सुखादि के कारणीभूत संयोग का नाश आश्रयों के नाश से नहीं हो सकता, फलतः उक्त संयोग का नाश विभाग से ही मानना पड़ेगा । ( प्र ० ) नित्य आत्मा के सिद्ध हो जाने पर नित्य आत्मा के ज्ञान से युक्त एवं सुख की एवं दुःख की वितृष्णा से ) ओतप्रोत जीव का सुख के साधनों में राग राग से प्रवृत्ति एवं द्वेष से निवृत्ति एवं प्रवृत्ति से धर्म और निवृत्ति से अधर्म और धर्माधर्म से संसार इस प्रकार मोक्ष की ही अनुपपत्ति होगी । अगर ' नैरात्म्य ' अर्थात् आत्मा का विनाश मान लिया जाय ' जब हम ही नहीं तो फिर दुःख किसको? इस प्रकार की अवज्ञा से पुरुष स्वभावतः राग और द्वेष से