प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 291–300
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 291–300
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २१६ न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः-मनस्त्वयोगान्मनः । सत्यध्यात्मेन्द्रियार्थसान्निध्ये ज्ञानसुखादीनाम-भूत्वोत्पत्तिदर्शनात् करणान्तरमनुमीयते । श्रोत्राद्यव्यापारे स्मृत्युत्पत्ति-मनस्त्वजाति के सम्बन्ध से मन का व्यवहार होता है । आत्मा और इन्द्रिय का संयोग, विषय और इन्द्रिय का संयोग इन दोनों के रहने पर भी किसी को ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति कभी होती है, कभी नहीं । अतः आत्मा, इन्द्रिय और विषय इन सबों से भिन्न ( ज्ञानादि के कारण का अनुमान करते हैं, श्रोत्रादि इन्द्रियों के व्यापार के न रहने पर भी स्मृति की उत्पत्ति होती है । एवं बाह्य इन्द्रियों से न्यायकन्दली प्रधानत्वात् प्रथममात्मनमाख्याय तदनन्तरं मनोनिरूपणार्थमाह-मनस्त्वयोगान्मन इति । व्याख्यानं पूर्ववत् । मनस्त्वं नाम सामान्यं मनो-व्यक्तीनां भेदे स्थिते सत्यनुमेयम् । या हि समानगुणकार्य्या व्यक्तयस्तासु परं सामान्यं दृष्टं यथा घटादिषु, समानगुणकार्य्याश्च मनोव्यक्तयस्तस्मात्तासु सद्भावे सामान्ययोगः । असिद्धे मनसि तस्य धर्मनिरूपणमन्याय्यमिति मत्वा तस्य सद्भावे प्रमाणमाह – सत्यप्यात्मेन्द्रियार्थसान्निध्ये इति । आत्मनस्तावत् सर्वेन्द्रियैर्युग-पत्सम्बन्धोऽस्त्येव, इन्द्रियाणामपि सन्निहितैरर्थः सन्निकर्षो भवति, तथाप्येकस्मिन् निवृत्त हो जायगा । राग और द्वप से शून्य पुरुष को न किसी विषय में प्रवृत्ति होगी किसी से निवृत्ति । प्रवृत्ति और निवृत्ति के न रहने से धर्म और अधर्म की धारा रुक जायगी । इससे जन्म की धारा रुक जाएगी इस प्रकार इस ( नैरात्म्य ) पक्ष में अपवर्ग की उपपत्ति हो सकती है । ( उ ० ) नित्य आत्मा के ज्ञान से युक्त पुरुष को भी विषयों में दोष दीख पड़ते हैं, इस दोष दर्शन से वैराग्य की उत्पत्ति होती है, फिर मोक्ष की उत्पत्ति असम्भव नहीं है । अब इस विषय में इतना ही बहुत है । आत्मा और मन इन दोनों में आत्मा ही प्रधान है, अतः आत्मा का निरूपण करके बाद में ' मतस्त्वयोगात् ' इत्यादि से मन का निरूपण करते हैं । इस पङ्क्ति की व्याख्या ' आत्मत्वाभिसम्बन्धात् ' इत्यादि पङ्क्तियों की तरह समझनी चाहिये । भिन्न - भिन्न मनोव्यक्तियों की सिद्धि हो जाने पर ' मनत्व ' जाति का अनुमान करना चाहिए | जिनसे समान रूप के ( जितने भी ) कार्य होते हैं एवं समान गुणवाले जिनने भी व्यक्ति हैं, उन सबों में एक परसामान्य देखा जाता है, जैसे कि घटादि में । मनोव्यक्तियों से भी समान कार्य होते हैं, एवं मनोव्यक्तियां भी समान गुणवाली हैं, अतः उनमें भी एक परसामान्य अवश्य ही है । ' मन की सिद्धि के बिना उसके गुणों का निरूपण सङ्गत नहीं है ' यह मान कर ही ' सत्यपीन्द्रियार्थसंनिकर्षे ' इत्यादि से मन की सत्ता में प्रमाण देते हैं । आत्मा का सभी इन्द्रियों के साथ एक ही काल में For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] २८ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् २१७ न्यायकन्दली से ( ज्ञानादि की उत्पादन में जिसकी अपेक्षा होती की उपलब्धि होती है, उसी समय संनिकर्ष है ', इसमें क्या प्रमाण For Private And Personal विषये प्रतीयमाने विषयान्तरे ज्ञानसुखादयो न भवन्ति, तदुपरमाच्च भवन्तीति दृश्यते, तद्दर्शनादात्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षेभ्यः करणान्तरमनुमीयते यस्य सन्निधाना-ज्ञानसुखादीनामुत्पत्तिः, असन्निधानाच्चानुत्पत्तिः । आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षाः काय्र्यो-त्पत्तौ करणान्तरसापेक्षाः, सत्यपि सद्भावे कार्य्यानुत्पादकत्वात् तन्त्वादिवत्, यच्च तदपेक्षणीयं तन्मनः । एकार्थोपलब्धिकालेऽनुपलभ्यमानस्याप्यर्थान्तरस्येन्द्रियसन्नि-कर्षोऽस्तीति किं प्रमाणम्? इन्द्रियाधिष्ठानसन्निधिरेव । रूपोपलब्धिकाले गन्धा-दो s पि घ्राणादिभिः सन्निकृष्यन्ते, तदधिष्ठानसन्निहितत्वादुपलभ्यमानगन्धादिवत् । प्रमाणान्तरमप्याह— श्रोत्राद्यव्यापारे स्मृत्युत्पत्तिदर्शनादिति । स्मृतिस्ताव-दिन्द्रियजा ज्ञानत्वाद् गन्धादिज्ञानवत्, न चास्याः श्रोत्रादीनि करणानि, बधिरा-दीनां श्रोत्रादिव्यापाराभावे तस्या उत्पत्तिदर्शनात् । तस्माद्यदस्याः करणमिन्द्रियं , न केवलं पूर्वस्मात्कारणात् करणान्तरानुमानं बाह्येन्द्रियैश्चक्षुरादिभि-तन्मनः सम्बन्ध है ही, ( क्योंकि आत्मा विभु है ) इन्द्रियाँ भी समीप के अपने विषयों के साथ सम्बद्ध हैं हो । तब भी जिस क्षण में एक ज्ञान की उत्पत्ति होती है, उस क्षण में दूसरे ज्ञान या सुखादि रूप आत्मा के दूसरे विशेष गुणों की उत्पत्ति नहीं होती । उस ज्ञान का नाश हो जाने पर दूसरे ज्ञान या सुखादि की उत्पत्ति देखी जाती है । इससे ज्ञान के प्रति आत्मा और इन्द्रिय का संनिकर्ष एवं विषय और इन्द्रिय का सन्निकर्ष इन दोनों को छोड़ कर तीसरे कारण का भी अनुमान होता है, जिसके संनिहित रहने से दूसरे ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति होती है एवं जिसके संनिहित न रहने पर नहीं होती है, अतः आत्मा और इन्द्रिय का संनिकर्ष एवं इन्द्रिय और विषय का संनिकर्ष ये दोनों ज्ञानादि के उत्पादन में किसी और व्यक्ति की भी अपेक्षा रखते हैं, क्योंकि उनके रहते हुए भी ज्ञानादि की उत्पत्ति नहीं होती है, जैसे कि तन्तु प्रभृति उत्पत्ति नहीं होती है ) । उन संनिकर्षो को ज्ञानादि के है वही मन हैं । ( प्र ० ) जिस समय एक विषय अनुपलब्ध दूसरे विषयों के साथ भी इन्द्रियों का है? ( उ ० ) इन्द्रियों के अधिष्ठान ( चक्षुगोलकादि आश्रय प्रदेश, ही प्रमाण हैं । जिस समय ( चक्षु से ) रूप की उपलब्धि होती है, उसी समय घ्राणादि इन्द्रियों के साथ भी उनके विषय गन्धादि सम्बद्ध रहते हैं, क्योंकि वे भी अपने ग्राहक घ्राणादि इन्द्रियों के अधिष्ठान के समीप हैं, जैसे कि उपलब्धि कालिक गन्धादि । ' श्रोत्राद्यव्यापारे ' इत्यादि से मन को सत्ता में और भी प्रमाण देते हैं । स्मृति भी इन्द्रिय से उत्पन्न होती है, क्योंकि वह भी ज्ञान है, जैसे कि गन्धादि का ज्ञान । श्रोत्रादि इन्द्रियाँ स्मृति के हेतु नहीं हैं, क्योंकि श्रोत्रादि व्यापार के न रहने पर भी बहरे व्यक्ति को भी स्मृति होती है, अतः स्मृति का हेतु जो इन्द्रिय वही ' मन ' है । केवल इन कहे हुए हेतुओं से ही मन का अनु-
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २१८ दर्शनाद् न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः-बाह्येन्द्रियैरगृहीतसुखादिग्राह्यान्तरभावाच्चान्तःकरणम् । गृहीत न होने वाले एवं दूसरे प्रकार से प्रत्यक्ष होने वाले सुखादि की भी सत्ता है । इन दोनों से भी ' अन्तःकरण ' ( मन ) का अनुमान होता है । न्यायकन्दली गृहीतानां सुखादीनां रूपाद्यपेक्षया ग्राह्यान्तराणां भावाच्च मित्याह - बाह्येन्द्रियैरिति । सुखादिप्रतीतिरिन्द्रियजा, तदनुमान. अपरोक्षप्रतीतित्वाद् रूपादिप्रतीतिवत् यच्च तदिन्द्रियं तन्मनः, चक्षुरादीनां तत्र व्यापाराभावात् । अभिन्नकरणत्वाज्ज्ञानात्मकाः सुखदाय: सुखसंवेदनानि ( च ) न कारणान्तरेण गृह्यन्ते इति चेन्न, ज्ञानस्वभावत्वे सुखदुःखयोरविशेषप्रसङ्गात् । परस्परभेदे चन तयोर्ज्ञानात्मकता, बोधाकारस्योभयसाधारणत्वेऽपि सुखदुःखाकारयोः परस्पर-व्यावृत्तत्वात् । न चानयविज्ञानाभिन्नहेतुत्वम्, ज्ञानस्यार्थाकारादुत्पत्तेः, तस्माच्च वासनासाहयात् सुखदुःखयोरुत्पादात्, अन्यथोपेक्षाज्ञानाभावप्रसङ्गात् । न च स्वसंवेदनं विज्ञानमित्यपि सिद्धम् एकस्य कर्म्मकरणादिभावे दृष्टान्ताभावात्, मान नहीं होता है, किन्तु ' बाह्य इन्द्रियों से ' अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों से जिन सुखादि विषयों का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, वे रूपादि से विलक्षण अर्थ, अथ च प्रत्यक्ष योग्य इत्यादि से कहते हैं । सुखादि से भी मन का अनुमान होता है! यही बात ' बाह्येन्द्रियैः ' सुख की प्रतीति भी इन्द्रिय से होती है, क्योंकि वह भी अपरोक्ष प्रतीति है, जैसे कि रूपादि की प्रतीति । सुखादि का प्रत्यक्ष करानेवाली इन्द्रिय हो ' मन ' है, क्योंकि ( वहाँ ) चक्षुरादि अन्य इन्द्रियों का व्यापार असम्भव है । ( प्र ० ) ज्ञान एवं सुखादि वस्तुतः अभिन्न हैं, क्योंकि एक ही सामग्री से इन सबों की उत्पत्ति होती है, अतः सुख एवं उसके ज्ञान के लिए ज्ञान के उत्पादकों को छोड़ कर और किसी को अपेक्षा के होते तो और दुःख में कोई अन्तर नहीं है | ( उ ० ) सुखादि अगर ज्ञान स्वभाव सुख न रहता । सुख और दुःख परस्पर भिन्न हैं तो फिर दोनों ज्ञान स्वभाववाले नहीं हो सकते । सुखादि में ज्ञानाकारतारूप एक धर्मं मान लेने पर भी उनमें से प्रत्येक में रहनेवाले सुखाकारत्व एवं दुःखाकारत्व रूप विभिन्न धर्म तो परस्पर भिन्न हैं हो । ( बौद्ध मत में भी ) केवल ज्ञान के कारण विज्ञान से सुख और दुःख की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि विषयाकार विज्ञान से ज्ञान को ही उत्पत्ति होती है । विषयाकारविज्ञान को ही जब वासना का साहाय्य मिलता है तो उससे सुख दुःख की उत्पत्ति ( बौद्ध मत से ) होती है, अगर ज्ञान के उत्पादक विषयाकार विज्ञान से ही सुख और दुःख की भी उत्पत्ति मानें तो संसार से उपेक्षात्मक ज्ञान की सत्ता उठ जायगी, ( क्योंकि सुख और दुःख से भिन्न ज्ञान ही बौद्ध मत में उपेक्षा ज्ञान है । ) विज्ञान ' स्वसंवेदन ' अर्थात् स्वप्रकाश ही है ' इसमें भी कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है कि एक ही वस्तु एक ही क्रिया का एक ही समय For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसंहितम् न्यायकन्दली २१६ स्वप्रकाशः प्रदीपोऽस्ति दृष्टान्त इति चेन्नैवम्, सोऽपि हि पुरुषेण ज्ञायते ज्ञाप्यते चक्षुषा । ज्ञानञ्च तस्य क्रिया, न च स्वयं करणं कर्ता कम्मं क्रिया च भवति । यथात्मवादिनां स्वप्रतीतावात्मना युगपत्कर्मकर्तृभाव:, तथा ज्ञानस्यापि करणादिभाव इति चेन्न, अविरोधात्, ज्ञानक्रियाविषयत्वं कर्मत्वमात्मनस्तस्या-मेव च स्वातन्त्र्यात् कर्त्तृत्वम्, न स्वातन्त्र्यविषयत्वयोरस्ति विरोधः । करणत्वं क्रियात्वन्तु सिद्धसाध्यत्वाभ्यामेकस्य परस्परविरुद्धम्, कारणकरणयोरेकत्वा-भावात् । एवं परप्रयोज्यता करणत्वमितराप्रयोज्यत्वं कर्त्तृत्वमित्यनयोरपि विरोधः, विधिप्रतिषेधस्वभावत्वादित्यतो नैषामेकत्र सम्भवो युक्तः । अथ मतम् न ज्ञानस्य करणाद्यभावः स्वसंवेदनार्थः, किन्तु स्वप्रकाशस्वभावस्य तस्योत्पत्तिरेव स्वसंवेदनमिति । अत्रापि निरूप्यते कि तदर्थस्य प्रकाशः? स्वस्य वा? यद्यर्थस्य प्रकाशः, तदुत्पत्तेरर्थस्य संवेदनं स्यान्न तु स्वस्येति तस्यासंवेद्यतादोषः । में करण भी हो एवं कर्मादि अन्य कारक भी हो । ( प्र ) स्वतः प्रकाश प्रदीप हो इस विषय में दृष्टान्त है? ( उ ) नहीं, प्रदीप का ज्ञान पुरुष को होता है, ( अतः वह उसका कर्ता है ) । वह चक्षु से उत्पन्न होता है, अतः चक्षु उसका करण है, ( वह ज्ञान प्रदीप - विषयक होने के कारण प्रदीप कर्म है ), वह क्रिया ( धात्वर्थ ) प्रदीप विषयक ज्ञान रूप है । अतः एक ही वस्तु एक ही समय में क्रिया, कर्त्ता, कर्म और करण नहीं हो सकती है । ( प्र ० ) आत्मवादियों ( विज्ञानादि भिन्न स्थिर नित्य आत्मा माननेवालो ) के मत में एक ही आत्मतत्त्वज्ञान ( क्रिया ) का कर्तृत्व और कर्मत्व दोनों एक ही समय में एक ही आत्मा में है हो, अतः कर्तृत्व और कर्मत्व दोनों में कोई विरोध नहीं है, उसी प्रकार विज्ञानवादियों के मत में भी उपपत्ति हो सकती है । ( उ ० ) सविषयक ( ज्ञानादि रूप एक ही क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व ये दोनों विरुद्ध नहीं हैं, क्योंकि सविषयक ज्ञान क्रिया का विषयत्व ही उसका कर्मत्व है, एवं उसी क्रिया में स्वतन्त्रता है कर्तृत्व, ये दोनों ही आत्मा में रह सकते हैं, किन्तु क्रियात्व एवं करणत्व ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं, क्योंकि करण सिद्ध रहता है, एवं क्रिया साध्य होती है, अतः एक ही व्यक्ति में क्रियात्व एवं करणत्व दोनों नहीं रह सकते । करणत्व एवं कर्तृत्व ये दोनों भी परस्पर विरुद्ध हैं, क्योंकि करण दूसरे के द्वारा प्रयुक्त होता है, एवं कर्ता दूसरे कारकों से बिलकुल ही अप्रयोज्य होता है, अर्थात् स्वतन्त्र होता है । अतः ये दोनों भी एक समय एक में नहीं रह मकते । ( प्र ० ) ज्ञान के प्रकाश के लिए करणादि का अभाव कभी हो ही नहीं सकता, क्योंकि ज्ञान की उत्पत्ति ही उसका प्रकाश है । ( उ ० ) इस विषय में यह पूछना है कि ज्ञान अपने विषयों का प्रकाश रूप है? या ' स्वसंवेदन ' ' स्व ' अर्थात् अपना ही प्रकाश रूप है? अगर अर्थ प्रकाश रूप है तो फिर उससे अर्थ का ही ' संवेदन ' अर्थात् प्रकाश होगा, For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २२० न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये मन: -अथेदं स्वस्य प्रकाश:, तदेव प्रकाश्यं प्रकाशश्चेति क्रियाकरणयोरेकत्वं तदवस्थम् । न च स्वोत्पत्तिरेव स्वात्मनि क्रियेत्यपि निदर्शनमस्ति । यदपि स्वसंवेदनासिद्धौ प्रमाणमुक्तं यद्यदायत्तप्रकाशं तत्तस्मिन् प्रकाशमाने प्रकाशते, यथा प्रदीपायत्त-प्रकाशो घटो, ज्ञानायत्तप्रकाशाश्च रूपादय इति । तत्रापि यदि ज्ञानमेवार्थप्रका शोऽभिमतः, तदा तदायत्तप्रकाशा रूपादय इत्यसिद्धमनैकान्तिकञ्चेन्द्रियेण । अथ च ज्ञानजन्योऽर्थप्रकाशो न तु ज्ञानमेवार्थप्रकाशस्तदा दृष्टान्ताभाव:, ज्ञान-जनकस्य प्रदीपस्यार्थप्रकाशकत्वाभावात् । एतेनैतदपि प्रत्युक्तम् - " अप्रत्यक्षोप-लम्भस्य नार्थदृष्टिः प्रसिद्धयति " इति । नहि ज्ञानस्य प्रत्यक्षताऽर्थस्य दर्शनम्, किन्तु विज्ञानस्योत्पत्तिः, तत्रासंविदितेऽपि ज्ञाने तदुत्पत्तिमात्रेणैवार्थस्य संवेदनं fearfa | कथमन्यस्योत्पत्तिरन्यस्य संवेदनमिति चेत्? किं कुर्मो वस्तु-स्वभावत्वात् । न चैवं सति सर्वस्य संवेदनम्? तस्य स्वकारणसामग्री नियमात् प्रतिनियतार्थसंवित्तिस्वभावस्य प्रतिनितप्रतिपत्तृसंवेद्यस्यैव चोत्पादात् । ' स्व ' अर्थात् ज्ञान का नहीं, अतः ज्ञान को अर्थप्रकाश रूप मानने से बौद्ध मत में ज्ञान ' असंवेद्य ' अर्थात् अतीन्द्रिय हो जायगा । अगर ज्ञान को ' स्व का ही प्रकाशक मानें तो फिर एक ही वस्तु प्रकाश्य और प्रकाशक दोनों ही होगी, अतः इस पक्ष में भी करणत्वं और क्रियात्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का समावेश रूप असामञ्जस्य है ही । ' स्व ' की उत्पत्ति हो ' स्व रूपा किया है, इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है । ' स्वसंवेदन ' अर्थात् ज्ञान के स्वप्रकाशत्व में जो यह युक्ति दी जाती है | ( प्र ० ) जिस का प्रकाश जिसके अधीन रहता है, उस प्रकाशक के प्रकाशित होने पर वह ( प्रकाश्य ) भी प्रकाशित हो जाता है, जैसे कि प्रदीप से प्रकाशित होने वाले घटादि एवं ज्ञान से प्रकाशित होने वाले रूपादि । ( उ ० ) इस विषय में यह पूछना है कि ' प्रकाश ' शब्द से अगर रूपादि विषय का ज्ञान ही इष्ट है तो फिर यह सिद्ध नहीं होता कि रूपादि का प्रकाश ज्ञान के अधीन है । अतः उक्त हेतु इन्द्रियों में व्यभिचरित है । अगर यह कहें कि ( प्र ० २ ) ज्ञान अर्थ - प्रकाश रूप नहीं है, किन्तु ज्ञान से अर्थ का प्रकाशहोता है, ( उ ० ) तो फिर इ विषय में कोई दृष्टान्त नहीं मिलेगा, क्योंकि प्रदीप में अर्थ को प्रकाशित करने का सामर्थ्य नहीं है । चूँकि ज्ञान कोही अर्थ का प्रकाशक माना है । प्र ) अप्रत्यक्ष ज्ञान से अर्थ प्रकाशित नहीं होता है । ( उ ० ) ज्ञान का प्रत्यक्षत्व और अर्थ का प्रकाशन दोनों एक नहीं है, अतः ज्ञान को प्रत्यक्ष न होने पर भी उसकी उत्पत्ति से ही अर्थ प्रकाशित हो जाता है, ( फलतः ज्ञान की उत्पत्ति ही अर्थ का प्रकाश है ) | ( प्र ० ) एक वस्तु की उत्पत्ति दूसरे की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? ( उ ० ) इसके लिए हम क्या करें? यह तो वस्तुओं के स्वभाव के अधीन है । ( प्र ) इस प्रकार से तो सभी अर्थों का प्रका-शन होना चाहिए? ( उ ० ) वह तो अपने विलक्षण कारणसमूह रूप सामग्री के अधीन है, जिससे कि कुछ नियमित विषयों का ज्ञान कुछ नियमित ज्ञाताओं को ही होता है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् २२१ तस्य गुणाः संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्व-संस्काराः । प्रयत्नज्ञानायौगपद्यवचनात्प्रतिशरीरमेकत्वं सिद्धम् । पृथक्त्व-मन के संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व और संस्कार ये आठ गुण हैं । चूंकि सूत्रकार ने कहा है ( ३।२३ ) कि प्रयत्न और ज्ञान एक क्षण में ( एक आत्मा में ) नहीं होते, अतः सिद्ध होता है कि प्रति शरीर में एक एक मन है । एकत्व संख्या के रहने से ही उसमें पृथकत्व गुण की भी सिद्धि न्यायकन्दली अपरे पुनरेवमाहुः - ज्ञानसंसर्गाद्विषये प्रकाशमाने प्रकाशस्वभावत्वात् प्रदीप-द्विज्ञानं प्रकाशते, प्रकाशाश्रयत्वात् प्रदीपवर्तिवदात्माऽपि प्रकाशत इति त्रिपुटी-प्रत्यक्षतेति । तदप्यसत्, घटीऽयमित्येतस्मिन् प्रतीयमाने ज्ञातृज्ञानयोरप्रतिभासनात् । यत्र त्वनयोः प्रतिभासो घटमहं जानामीति, तत्रोत्पत्रे ज्ञाने ज्ञातृज्ञानविशिष्ट-स्यार्थस्य मानसप्रत्यक्षता । न तु ज्ञातृज्ञानयोश्चाक्षुषज्ञाने प्रतिभासः, तयोरपि चाक्षुषत्वप्रसङ्गात् । तदेवं सिद्धे मनसि तस्य गुणान् प्रतिपादयति - तस्य गुणा इत्यादिना । सङ्ख्याद्यष्टगुणयोगोऽपि मनसो वैधर्म्यम् । सङ्ख्यासद्भावं कथयति - प्रयत्नेत्या-दिना । प्रतिशरीरमेकं मन आहोस्विदनेकमिति संशये सति सूत्रकृतोक्तम्- “ प्रयत्ना-कोई कहते है कि ( प्र ० ) जब ज्ञान के सम्बन्ध से विषय प्रकाशित होता है, उसी समय ' प्रकाशस्वभाव ' के कारण ज्ञान भी प्रदीप की तरह प्रकाशित हो जाता है, एवं प्रकाश के आश्रय होने के कारण जैसे प्रदीप भी प्रकाशित होता है, वैसे ही प्रकाश रूप ज्ञान के प्रकाशित होने पर आत्मा भी प्रकाशित होता है । इस प्रकार ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय इन तीनों ' पुटों ' से युक्त होने के कारण प्रत्यक्षता ' त्रिपुटी ' है । ( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि यह घट है ' इस प्रकार का प्रत्यक्ष होने पर भी उसमें ज्ञान और ज्ञातो प्रतिभासित नहीं होते । ' घट को मैं जानता हूँ ' इत्यादि जिन ज्ञानों से वे प्रकाशित होते हैं, वे घटप्रत्यक्ष के बाद ज्ञान और ज्ञाता विशिष्ट घटादिविषयक और ही मानस प्रत्यक्षात्मक ज्ञान हैं, किन्तु पहिले के घटादि विषयक चाक्षुष प्रत्यक्ष में ही ज्ञान और ज्ञाता ये दोनों भी विषय नहीं होते, क्योंकि तब ज्ञाता और ज्ञान इन दोनों को भी चाक्षुष प्रत्यक्ष का विषय मानना पड़ेगा । सिद्ध हो जाने पर ' तस्य गुणाः ' इत्यादि से मन का गुण इस प्रकार मन के कहते हैं । संख्यादि आठ गुणों का सम्बन्ध है । प्रयत्न ' इत्यादि से ' मन में संख्यादि आठ हैं । ' प्रति शरीर में मन एक है या अनेक? " मन का ' वैधर्म्य ' अर्थात् असाधारण धर्म गुणों का सम्बन्ध है ' इसमें प्रमाण देते इस संशय में सूत्रकार ने कहा है कि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २२२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ द्रव्ये मनः-यौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्च प्रतिशरीरमेकं मनः " इति । तेन प्रतिशरीरमेकत्वं सिद्धमिति । मनोबहुत्वे ह्यात्ममनः संयोगानां बहुत्वाद्युगपज्ज्ञानानि प्रयत्नाश्च भवेयुः, दृश्यते च क्रमो ज्ञाननामेकोपलम्भव्यासक्तेन विषयान्तरानुपलम्भाद् निवृत्तव्यासङ्गेन चोपलम्भादित्युक्तम् । एवं प्रयत्नानामपि कपोत्पाद एव एकत्र प्रयतमानस्यान्यत्र व्यापाराभावात्, समाप्त क्रियस्य च भावात् तस्मादेकं मनः । तस्यैकत्वे खल्वेक एबैकदा संयोग इत्येकमेव ज्ञानमेकः प्रयत्न इत्युप-पद्यते । यस्तु क्वचिद्युगपदभिमानस्तदलाचक्रवदाशुभावात् 1 न तु तात्त्विकं यौगपद्यमेकत्र दृष्टेन कार्यक्रमेणान्यत्रापि करणस्य तस्यैव सामर्थ्यानुमानात् । वेद्वाविमा पुष्पितास्तरव इत्यनेकार्थप्रतिभास: कुत:? कुतश्च स्वशरीरस्य सह प्रेरणधारणे, न, अर्थसमूहालम्बनस्यैकज्ञानस्याप्रतिषेधाद् बुद्धि-भेदएव, न तु तथा प्रतिभासः, सर्वासामेकैकार्थनियत्वात् । एवं शरीरस्य चूँकि एक काल में ( एक आत्मा में ) दो ज्ञानों और दो प्रयत्नों की उत्पत्ति नहीं होती है. अतः एक शरीर में एक ही मन है ' इस कथन से ( एक शरीरस्थ ) मन में एकत्व संख्या की सिद्धि होती है । अभिप्राय यह है कि ( एक ही शरीर में ) अगर अनेक मन मानें जाँय तो मन और आत्मा के संयोग भी उतने ही होंगे, फिर उन संयोगों से ( एक ही आत्मा एक साथ में ) अनेक ज्ञान एवं अनेक प्रत्यत्तों की उत्पत्ति होनी चाहिए, किन्तु ज्ञानादि की उत्पत्ति क्रमशः हो देखी जाती है, क्योंकि एक प्रयत्न के समय अन्य विषयों के व्यापार नहीं देखे जाते । उस प्रयत्न जनित व्यापार के समाप्त होने पर फिर अन्य विषयक व्यापार भी होते हैं, अतः ( एक शरीर में ) एक हो मन है । उसे एक मान लेने पर आत्मा और मन का संयोग भी एक ही होगा, अतः एक क्षण में एक ही ज्ञान और प्रयत्नादि की उत्पत्ति होगी । कभी - कभी एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों और अनेक प्रयत्नों की जो उत्पत्ति दीख पड़ती है, वह भी एक ही क्षण में नहीं होती है, किन्तु अलातचक्र भ्रमण की तरह क्रमशः ही होती है । यह और बात है कि अतिशीघ्रता के कारण वह क्रम समझ में नहीं आता है । एक स्थान पर देखे हुए कार्य के क्रम से दूसरी जगह भी उन्हीं सामर्थ्य से युक्त कारणों का अनुमान होता है । ( प्र ० ) तो फिर ' ये दो वस्तुएँ हैं, ये वृक्ष फूले हैं ' इत्यादि अनेक विषयों का ज्ञान एवं एक समय अपने शरीर में धारण और प्रेरण आदि क्रियायें कैसे होती हैं? ( उ ० ) अनेक विषयक एक समूहालम्बन ज्ञान का खण्डन करना उक्त कथन का अभिप्राय नहीं है, किन्तु एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति का खण्डन करना ही उसका अभिप्राय है, चाहे वे एक ही विषयक क्यों न हों? अगर उक्त ( समूहालम्बन ) ज्ञान विभिन्न विषयक अनेक ज्ञान ही होते तो फिर उनके आकार भी परस्पर विलक्षण ही होते, क्योंकि वे सभी सरस्पर विभिन्न व्यक्तियों में नियत होते हैं । इसी प्रकार विशेष प्रकार के एक ही प्रयत्न से शरीर For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् २२३ मध्यत एव । तदभाववचनादणुपरिमाणम् । अपसर्पणोपसर्पणवचनात्संयोग-होती है । " तदभाववचनादणु मनः " ( ७।१।२२ ) सूत्रकार की इस उक्ति से मन में अणु परिमाण की सिद्धि होती है । ' असर्पणोसपण ' वचन से अर्थात् " अपसर्पणमुप-सर्पणमशितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्टकारितानि ” ( ५।२।१७ ) सूत्रकार न्यायकन्दली प्रेरणधारणे च प्रयत्नविशेषादेकस्मादेव भवतः यथानेकविषयमेकं ज्ञानं तथा तत्कारणाविच्छाप्रयत्नावपीति न किञ्चिद् दुरुपपादम् । पृथक्त्वमप्यत एवेति । सङ्खयानुविधानादेव पृथक्त्वमपि सिद्धमित्यर्थः । तदभाववचनादणुपरिमाणम् । विभववान्महानाकाशस्तथा चात्मेत्यभिधाय तदभावादणु मन इत्युक्तम् । तस्मा-दणुपरिमाणं मन इति सिद्धम् । नित्यद्रव्यगतस्य विभवाभावस्य अणुपरि माणत्वाव्यभिचारात् । विभवाभावाश्चास्य युगपज्ज्ञानानुपपत्त्यैव समधिगतः । मनसो विभुत्वे युगपत्समस्तेन्द्रियसम्बन्धाच्चक्षुरादिसन्निकृष्टेषु रूपादिषु ज्ञानयोग-पद्यं स्यात् । अथ कथमेकेन्द्रियग्राह्येषु घटादिषु मनोधिष्ठितेन चक्षुषा युग-पत्सन्निकृष्टेषु ज्ञानानि युगपन्न भवन्ति? आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षाणां यौगपद्यान्न भवन्ति । लादनेनात्ममनः संयोगस्यैकस्य युगपदनेकस्य ज्ञानस्योत्पादनसामर्थ्या-भावः कल्प्यत इति चेत्? समानमेतद्विभुत्वेऽपि मानस:, तस्मादविभुत्वेऽपि का धारण और प्रेरण दोनों हो होंगे । जैसे कि एक ही सामग्री से अनेक विषयक एक ज्ञान की उत्पत्ति होती है, वैसे ही एक ही इच्छा और प्रयत्नवाली सामग्री से धारण और प्रेरण दोनों की उत्पत्ति होगी इसमें कुछ भी असङ्गति नहीं है । ' अत एव मन में पृथक्त्व भी है ' अर्थात् चूँकि मन में संख्या है, अतः उसमें पृथक्त्व भी है । ' उसके ' अभाव ' के कहने से मन में अणु परिमाण भी है ' अर्थात् महर्षि कणाद ने वैभवसूत्र के बाद कहा हैं कि ' तदभावादणु मनः, इसमें मन में अणु परिमाण की सिद्धि होती है । ' जो निश्य द्रव्य विभु न हो वह अवश्य हो अणु परिमाण का हो ' इस नियम में कोई व्यभिचार नहीं है । एक क्षण में एक आत्मा में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं होती हैं, इसी से समझते हैं कि मन विभु नहीं है । अगर मन विभु हो तो फिर एक ही क्षण में अनेक इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध होने के कारण चक्षुरादि इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध रूपादि विषयक अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति हो जायगी । ( प्र ० ) ( हर एक शरीर में एक एक ही मन मान लेने पर भी ) एक ही इन्द्रिय से सम्बद्ध घटादि विषयक अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति क्यों नहीं होती है? क्योंकि आत्ममन: संयोग इन्द्रिय का मन के साथ संयोग, एवं अनेक विषयों के साथ इन्द्रिय का संयोग ये सभी तो एक ही क्षण में है ही । अगर यह कल्पना करें कि ' उस सामग्री को एक क्षण में एक ही ज्ञान को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है, अनेक ज्ञानों को उत्पन्न करने का नहीं तो फिर ज्ञान यौगपद्य For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २२४ न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ ब्रव्ये मन: -युक्त्यन्तरं वाच्यम् तदुच्यते विभुत्वादात्ममनसोः परस्परसंयोगाभावे सत्यात्म-आत्मार्थसंयोगस्य गुणानां ज्ञानसुखादीनामनुत्पत्तिरसमनायिकारणाभावात् । ह्यसमवायिकारणत्वेऽर्थदेशे ज्ञानोत्पत्तिः स्यादसमवायिकारणाव्यवधानेन प्रदेश-वृत्तीनां गुणानामुत्पादात् । आत्मेन्द्रियसंयोगस्यासमवायिकारणत्वे शब्दज्ञानानु-त्पत्तिः, आकाशात्मकेन श्रोत्रेणात्मनः संयोगाभावात् । न च बहिर्देशे प्रत्ययो नापि शब्दज्ञानानुत्पाद:, तस्मादात्मार्थसंयोगस्यात्मेन्द्रियसंयोगस्य चासमवायि-कारणत्वं प्रतिषिद्धे परिशेषादात्ममनः संयोगस्यासमवायिकारणत्वं व्यवतिष्ठते, तच्च मनसो व्यापकत्वे न सम्भवतीत्यनुत्पत्तिरेव ज्ञानमुखादीनाम्, अस्ति च तेषा-मुत्पाद: स एव मनसो विभुत्वं निवर्त्तयतीति । अपसर्पणोपसर्पणवचनात् संयोग-विभागावति । “ अपसर्पणमुपसर्पणम शितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्ट-का कारण मन को विभु मान लेने पर भी हो सकता है, इसके लिए मन को अणु मानना व्यर्थ ही होगा, अतः ' मन विभु नहीं है ' इसके लिए दूसरी युक्ति कहनी चाहिए । ( उ ० ) कहते हैं, आत्मा और मन ये दोनों हो अगर विभुहों तो फिर इन दोनों का संयोग ही नहीं होगा और उन दोनो के संयोग न होने पर आत्मा के विशेषगुण ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति ही नहीं होगी क्योंकि उसका कोई असमवायिकारण नहीं होगा । आत्मा और विषय इन दोनों के संयोग को अगर ज्ञानसुखादि का असमवायिकारण मानें तो फिर उस विषय के देश में ही ज्ञानादि की उत्पत्ति माननी पड़ेगी क्योंकि प्रादेशिक ( अव्याप्यवृत्ति ) गुणों का यह स्वभाव है कि वे असमवायिकारण के अव्यवहित प्रदेश में ही उत्पन्न हों । आत्मा एवं ( श्रोत्रादि ) इन्द्रियों के संयोग को ही अगर आत्मा के उन ज्ञानादि गुणों का असमवायिकारण मानें तो शब्दज्ञान की ही अनुत्पत्ति माननी पड़ेगी, क्योंकि आका-शात्मक ( विभु ) श्रोत्र के साथ ( बिभु ) आत्मा का संयोग ही असम्भव हैं, तस्मात् भूतलादि प्रदेशों में ज्ञानादि गुणों की उत्पत्ति नहीं होती हैं, एवं शब्दादि गुणों की उत्पत्ति होती हैं । इन ( अनुत्पत्ति और उत्पति ) दोनों से यह सिद्ध होता है कि आत्मा के साथ विषयों के संयोग एवं इन्द्रियों के साथ आत्मा का संयोग ये दोनों आत्मा के विशेष गुणों के असमवायिकारण नहीं हैं, अतः आत्मा और मन का संयोग हो उनका असमवायिकारण है । यह ( असमवायिकारण ) संयोग मन को विभु मानने पर असम्भव होगा, फलतः ज्ञान की उत्पत्ति अनुपपन्न हो जायगी, किन्तु ज्ञान की उत्पत्ति होती है, अतः ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति से ही मन से विभुत्व हट जाता है । " अपसर्पण और उपसर्पण के कहने से मन में संयोग और विभाग भी हैं " अर्थात् सूत्रकार ने लिखा है कि " अर्पणमुपसर्पणमशितपीत संयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्टकारितानि ” । अभि-प्राय यह है कि मन का एक शरीर से ' अपसर्पण ' अर्थात् हटना एवं ' उपसर्पण ' अर्थात् दूसरे शरीर For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] २ ९ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् २२५ प्रशस्तपादभाष्यम् For Private And Personal विभाग | मूर्तत्वात्परत्वापरत्वे संस्कारश्च । अस्पर्शवश्वाद् द्रव्यानारम्भ-कत्वम् । क्रियावच्चान्मूर्त्तत्वम् । साधारणविग्रहवत्वप्रसङ्गादज्ञत्वम् । की इस उक्ति से मन में संयोग और विभाग भी सिद्ध हैं । यतः इसमें मूर्त्तत्व है, अतः परत्व, अपरत्व और ( वेगाख्य ) संस्कार भी हैं । यत: इसमें स्पर्श नहीं है, अतः यह किसी द्रव्य का समवायिकारण भी नहीं है । यतः इसमें क्रिया है, अतः इसमें मूर्त्तत्व भी है । मन चेतन नहीं है, क्योंकि मन को चेतन मान लेने पर कारितानि ” इति सूत्रेण मनसः पूर्वशरीरादपसर्पणं शरीरान्तरे चोपसर्पणञ्चा-दृष्टकारितमित्युक्तम्, तस्मादस्य संयोगविभागौ सिद्धौ । मूर्त्तत्वात्परत्वापरत्वे संस्कारश्च । विभवाभावान्मूर्त्तत्वं सिद्धं तस्माद् घटादिवत् परत्वापरत्ववेगाः सिद्धाः । अस्पर्शवत्त्वाद् द्रव्यानारम्भकत्वम् । अस्पर्शवत्त्वं मनसः शरीरान्यत्वे सति सर्वविषयज्ञानोत्पादकत्वादात्मवत् सिद्धम्, तस्माच्चात्मवदेव सजातीय-द्रव्यानारम्भकत्वम् । क्रियावत्त्वान्मूर्त्तत्वमिति । अणुत्वप्रतिपादनान्मूर्त्तत्वे सिद्धेऽपि विस्पष्टार्थमेतदुक्तम् । साधारणविग्रहवत्त्वप्रसङ्गादज्ञत्वम् । यदि ज्ञातृ मनो भवेच्छरीरमिदं साधारणमुपभोगायतनं स्यात् । न चैवम्, एकाभिप्रायानुरोधेन तस्य सर्वदा प्रवृत्तिनिवृत्तिदर्शनात् तस्मादज्ञं मनः । चैतन्ये निषिद्धेऽपि प्रक्रमात् में जाना ये दोनों ही अदृष्ट से होते हैं, अतः मन में संयोग और विभाग की सिद्धि होती है । चूंकि मन में मूर्तस्व है, अतः परत्व, अपरत्व और ( वेगाख्य ) संस्कार भी हैं । विभुत्व केन रहने पर ही मन में मूर्त्तत्व सिद्ध है । मूर्त्तत्व हेतु से घटादि की तरह मन में परत्व, अपरत्व और वेग ( संस्कार ) ये तीनों भी सिद्ध होते हैं । चूँकि मन में स्पर्श नहीं है, अतः वह किसी द्रव्य का समवायिकारण भी नहीं है । मन में स्पर्श इसलिए नहीं है कि शरीर से भिन्न होने एवं आत्मा की तरह ही अपने सजातीय है, अतः मूर्त्तत्व भी है । यद्यपि उसमें अणु पर भी आत्मा की तरह ज्ञान का कारण है, द्रव्य का अनारम्भक है । चूंकि मन में क्रिया परिमाण के कह देने से ही मूर्त्तत्व भी सिद्ध हो जाता है, फिर भी और स्पष्ट करने के लिए क्रिया रूप हेतु का भी उपादान किया है । ' वह अज्ञ ( अचेतन ) इस लिए है कि ( उसको चेतन मानने पर ) ' साधारण विग्रहवत्त्व ' प्रसङ्ग होगा ' । अभिप्राय यह है कि मन में अगर ज्ञान ( चैतन्य ) मान लिया जाय तो शरीर जो केवल आत्मा के ही भोग का ' आयतन ' है, उसे आत्मा और मन दोनों के ही भोग का ' आयतन ' मानना पड़ेगा, किन्तु शरीर की प्रवृत्ति और निवृत्ति ये दोनों ही एक ही व्यक्ति के अनुरोध से देखी जाती हैं, अतः मन ' अज्ञ ' ( चेतन नहीं ) है । यद्यपि मन के