प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 301–310

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २२६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मन: -करणभावात्परार्थम् । गुणवत्वाद् द्रव्यम् । प्रयत्नादृष्टपरिग्रहवशादाशु-सञ्चारि चेति । इति प्रशस्तपादभाष्ये द्रव्यपदार्थः ॥ आत्मा की तरहमन को भी शरीर का अधिष्ठाता मानना पड़ेगा । चूँकि यह करण है अत: दूसरों के उपभोग का ही साधन ( पदार्थ ) है | चूँकि इसमें गुण हैं, अतः यह द्रव्य है । प्रयत्न और अदृष्ट के कारण यह तीब्र गतिवाला है । न्यायकन्दली पुनरेतदुक्तम् । अज्ञत्वे सिद्धे सत्याह- करणभावात् परार्थमिति । परस्यो -पभोगसाधनमित्यर्थः । गुणवत्त्वाद् द्रव्यं पृथिव्यादिवत् । प्रयत्नादृष्टपरिग्रह-वशादाशु सञ्चारि चेति द्रष्टव्यम् । इच्छाद्वेषपूर्वकेण जीवनपूर्वकेण च प्रयत्नेन परिगृहीतं स्थानात् स्थानान्तरमाशु सञ्चरति तथा अदृष्टेन परिगृहीतं मरणाच्छ-रीरान्तरमाशु सञ्चरतीति द्रष्टव्यम् । इतिशब्दः परिसमाप्तौ । विशुद्धविविध न्यायमौक्तिकप्रकराकरः सेव्यतां द्रव्यजलधिः स्फुटसिद्धान्तविद्रुमः ॥ I इति भट्ट श्रीश्रीधरकृतौ पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां द्रव्यपदार्थः समाप्तः ॥ चैतन्य का निषेध कर चुके हैं ( देखिये आत्मनिरूपण ) अज्ञत्व के सिद्ध हो जाने के अर्थात् दूसरों के उपभोग का तरह वह द्रव्य है । " आत्मा के उसे फिर से दुहराया है । करण है, अतः ' परार्थ ' है, गुण है, अतः पृथिवी की चलना उसका स्वभाव है " तीनों के साथ सम्बद्ध होने के तथापि प्रसङ्ग आने के कारण बाद कहते हैं कि यतः वह साधन मात्र है । चूंकि उसमें प्रयत्न और अदृष्ट से शीघ्र अर्थात् जिस प्रकार से इच्छा, द्वेष और जीवनयोनि यत्न इन कारण मन क्षिप्रगति से एक स्थान से दूसरे स्थान को जाता है, वैसे ही यह अदृष्ट से प्रेरित होकर मरण के बाद दूसरे शरीर में भी शीघ्र चला जाता है । यह ' इति ' शब्द समाप्ति का बोधक है । अनेक प्रकार के न्याय रूपी विशुद्ध मोतियों की खान निश्चित सिद्धान्त रूपी मूंगों से युक्त ' द्रव्य समुद्र ' ( द्रव्य निरूपण ) का ( विद्वान लोग ) सेवन करें । भट्ट श्रीश्रीषर द्वारा रचित पदार्थों की बोधिका न्यायकन्दली नाम की टीका में द्रव्य का निरूपण समाप्त हुआ । For Private And Personal

पृष्ठ 302

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir अथ गुणपदार्थनिरूपणम् प्रशस्तपादभाष्यम् रूपादीनां गुणानां सर्वेषां गुणत्वाभिसम्बन्धो द्रव्याश्रितत्वं निग णत्वं निष्क्रियत्वम् । गुपदार्थों का निरूपण गुणत्व जाति का सम्बन्ध, द्रव्यों में ही रहना, गुणों का राहित्य एवं क्रियाओं का राहित्य ( ये चार ) रूपादि सभी गुणों के साधर्म्य हैं । ॐॐॐ न्यायकन्दली

नमो जलदनीलाय शेषपर्यङ्कशायिने ।

लक्ष्मीकण्ठग्रहानन्दनिष्यन्दायासुरद्विषे ॥

द्रव्यपदार्थं व्याख्याय गुणानां निरूपणार्थमाह - रूपादीनां गुणानामिति । गुणत्वं नाम सामान्यं तेनाभिसम्बन्धो गुणानामिति परस्परसाधर्म्यकथनम् । इतरपदार्थवैधर्म्यकथनमप्येतत् । गुणत्वं रूपादिषु रत्नत्वमिवोपदेश सहकारिणा प्रत्यक्षेणैव गृह्यते । यत्तु प्रथममस्य कर्मादिविलक्षणतया न ग्रहणं तदाश्रयपार-तन्त्र्यस्यात्यन्तिका सादृश्यस्य सम्भवात् । रूपादीनां गुणानामिति स्वरूपमात्रकथनम् । सर्वेषामित्यभिव्याप्तिप्रदर्शनार्थम् । द्रव्याश्रितत्वं द्रव्योपसर्जनत्वम् । एतच्च धर्म-मात्रकथनं न तु वैधर्म्याभिधानं द्रव्यकर्मादिष्वपि सम्भवात् । शेषनाग रूपी पलंग पर सोनेवाले, लक्ष्मी के कठालिङ्गन से उत्पन्न आनन्द में विभोर, प्रणवस्वरूप मेघ के समान नीलवर्णवाले एवं असुरों के विनाशक ( श्री विष्णु ) को मैं प्रणाम करता हूँ । द्रव्य की व्याख्या करने के बाद ( क्रमप्राप्त ) गुणों का निरूपण करने के लिए ' रूपादीनां गुणानाम् ' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । ' गुणत्व नाम की जाति के साथ सभी गुणों का सम्बन्ध है ' इस उक्ति से सभी गुणों का परस्पर साधर्म्यं कथित होता है । गुणों के इस साधर्म्य के कथन से ही ' गुणत्वादि जातियों का सम्बन्ध ही गुण से भिन्न पदार्थों का वैधम्यं है ' यह भी कयित हो जाता है । उपदेश के सहारे जिस प्रकार प्रत्यक्ष से ही रत्नों का रत्नश्व गृहीत होता है, उसी प्रकार उक्त प्रकार के प्रत्यक्ष से ही गुणत्व भी गृहीत होता है । ( उपदेश से ) पहिले कर्मादि से भिन्न रूप में जो गुणों का ग्रहण नहीं होता है, कर्मादि पदार्थों के साथ गुणों का ' आश्रय पारतन्त्र्य ' रूप अत्यन्त सादृश्य ही इसका कारण है । ' रूपादीनां गुणानाम् ' इस वाक्य से गुणों का केवल स्वरूप ही कहा गया है । सर्वेषाम् ' इस पद से इन साधयों का सभी गुणों में रहना अभिव्यक्त होता है । ' द्रव्याश्रितत्व ' शब्द का अर्थ है द्रव्योपसर्जनत्व, अर्थात् द्रव्य रूप मुख्य का अप्रधान होना । For Private And Personal

पृष्ठ 303

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २२८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य-एवं निर्गुणत्वं गुणरहितत्वं गुणानां स्वरूपं तेषां स्वात्मनि गुणान्तराना-रम्भकत्वात्, तदनारम्भकत्वच रूपादिषु रूपाद्यन्तरानुपलब्धेरनवस्थानाच्च । एवं सत्येकं रूपमणुः शब्द इत्यादिव्यवहार उपाचारात् । सङ्ख्यादिकं रूपाद्या-श्रयं न भवति गुणत्वाद् रूपादिवत् । स्वरूपान्तरं कथयति - निष्क्रियत्वमिति । द्रव्ये गच्छति रूपादिकमपि गच्छतीति चेत्? न, वेगवद्वायुसंयोगेन व्योमादिषु क्रियाया अभावाच्छाखादिषु च भावाद् अन्वयव्यतिरेकाभ्यां मूर्त्तत्वक्रियावस्त्वयो र्व्याप्यव्यापकभावसिद्धौ मूर्त्यभावेन रूपादिषु क्रियानिवृत्तिसिद्धेः कथं तर्हि तेषु गमनप्रतीति:? आश्रयक्रियया, यथैव सत्तायां नहि सत्ता स्वाश्रयेण सह गच्छति, एकस्य गमने विश्वस्य गमनप्रसङ्गादिति । यह द्रव्याश्रितत्व गुणों के केवल साधर्म्य समझाने के लिए ही कहा गया है, कर्मादि पदार्थां का वैधर्म्यं समझाने के लिए नहीं, क्योंकि द्रव्य एवं कर्म प्रभृति पदार्थों में भी ' द्रव्याश्रितत्व ' तो है ही । इसी प्रकार गुणरहितत्व रूप निर्गुणत्व भी गुणों का साधर्म्य ही है ( गुण से भिन्न पदार्थों का वैधर्म्य नहीं ) क्योंकि एक गुण में दूसरे गुण की उत्पत्ति नहीं हाती है । एक रूप दूसरे रूपों का उत्पादक इसलिए नहीं है कि एक रूप में दूसरे रूपों की उपलब्धि नही होती है एवं एक रूप में दूसरे रूप की सत्ता मानने में अनवस्था भी होगी! इस प्रकार ( गुण में गुण की असत्ता सिद्ध हो जाने पर यही कहना पड़ेगा कि ) ' एकं रूपम् ', ' अणुः शब्दः ' इत्यादि प्रयोग लक्षणामूलक हैं । इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि रूपादि गुणों में संख्यादि गुण नहीं है, क्योंकि वे भी गुण हैं, जैसे कि रूप! ' निष्क्रियत्वम् ' इत्यादि से गुणों का दूसरा साधर्म्य कहते हैं । ( प्र ० ) द्रव्य के चलने पर उसी के साथ रूपादि भी तो चलते हैं? ( उ ० ) आकाश में वेग से युक्त वायु का संयोग रहने पर भी क्रिया होती है । किन्तु वेग से युक्त वायु का संयोग रहने पर शाखादि में क्रिया होती है । इस अन्वय और व्यतिरेक के बल से क्रिया और मूर्त द्रव्य में इस प्रकार व्याप्यव्यापकभाव निश्चित होता है कि क्रिया मूर्त द्रव्य में ही रहती है । ऐसा सिद्ध हो जाने पर रूपादि में व्यापकीभूत मूर्त्तत्व के अभाव से व्याप्यभूत क्रिया का अभाव सिद्ध होता है । ( प्र ० ) फिर रूपादि में गमन की उक्त प्रतीतियाँ कैसे होती हैं? ( उ ० ) जिस प्रकार सत्ता में आश्रय की क्रिया से क्रिया की प्रतीति उसके स्वयं न चलने पर भी होती है, उसा प्रकार रूपादि में भी आश्रय की क्रिया से ही क्रिया की प्रतीति होती हूँ । इस प्रकार अगर क्रिया की प्रतीति से ही क्रिया की सत्ता मानी जाय तो फिर समस्त संसार का ही चलना स्वीकार करना पड़ेगा । For Private And Personal

पृष्ठ 304

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २२ ९ प्रशस्तपादभाष्यम् रूपरसगन्धस्पर्शपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहवेगा मूर्त्तगुणाः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्म भावनाशब्दा अमूर्त्तगुणाः । सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागा उभयगुणाः । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह और वेग ये दस ' मूर्त्तगुण ' ( अर्थात् मूर्त्त द्रव्यों में ही रहनेवाले गुण ) हैं । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना, और शब्द ये दश ' अमूर्त्तगुण ' ( अर्थात् अमूर्त्त द्रव्यों में ही रहने वाले गुण ) हैं । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, और विभाग ये पाँच ' उभय-गुण ' ( अर्थात् मूर्त्तद्रव्य और अमूर्त्तद्रव्य दोनों में ही रहनेवाले गुण ) हैं । न्यायकन्दली सभ्प्रति परस्परमेव तेषां साधर्म्यं वैधर्म्यश्व प्रतिपादयन्नाह - रूपेत्यादि । एते मूर्तानामेव गुणा नामूर्त्तानाम् । तथा हि रूपस्पर्शपरत्वापरत्ववेगाः पृथिव्यादिषु त्रिषु, वायौ रूपवर्जम्, रूपस्पर्शवजं मनसि, रसगुरुत्वे पृथिव्युदकयोः, द्रवत्वं पृथिव्युदकतेजस्सु, स्नेहोऽम्भसि, गन्धः पृथिव्याम् । अमूर्त्तगुणान् कथयति -- बुद्धिसुखेत्यादि । बुद्ध्यादयो भावनान्ता आत्म-गुणाः । आकाशगुणः शब्दः । संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः उभयगुणाः मूर्त्तामूर्त्तगुणाः । अब गुणों में ही परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्यं का निरूपण करते हुए ' रूप रस ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । ये मूतं ( द्रव्यों ) के ही गुण हैं, अमूर्त ( आकाशादि ) के नहीं | अभिप्राय यह है कि रूप, स्पर्श, परत्व, अपरत्व और वेग ये पाँच गुण ( मिल-कर ) पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहते हैं । इनमें से रूप को छोड़कर शेष चार गुण वायु में रहते हैं । कथित पाँच गुणों में से रूप और स्पर्श को छोड़ कर शेष तीन गुण मन में रहते हैं । पृथिवी और जल इन दोनों में ( इन पांच में से ) रस और गुरुत्व ये दो ही गुण हैं । द्रवत्व पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहता है । स्नेह केवल जल में और गन्ध केवल पृथिवी में रहता है । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द ये दश अमृतं गुण ( अर्थात् मुत्तं द्रव्य से भिन्न द्रव्यों में ही रहते ) हैं । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये पाँच ' उभय गुण ' अर्थात् मूर्त्त द्रव्य और अमूर्त्त द्रव्य दोनों में रहने वाले गुण हैं । For Private And Personal

पृष्ठ 305

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २३० न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् संयोग विभाग द्वित्वद्विपृथक्त्वादयोऽनेकाश्रिताः । शेषास्त्वेकैकवृत्तयः । [ गणसाधर्म्यवैधर्म्य -रूपरसगन्धस्पर्शस्नेहसांसिद्धिकद्रवत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्मा-धर्मभावनाशब्दा वैशेषिकगुणाः । संयोग, विभाग, द्वित्व और द्विपृथक्त्वादि गुण ( अर्थात् इनमें से प्रत्येक अनेक द्रव्यों में ही रहने वाला है ) हैं । ' अनेकाश्रित ' शेष सभी गुण ' एकद्रव्यवृत्ति ' अर्थात् एक एक द्रव्य में ही रहते हैं रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, स्नेह, सांसिद्धिक द्रवत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना, संस्कार और शब्द ये ( सोलह ) विशेष गुण हैं । न्यायकन्दली संयोगविभागद्वित्वद्विपृथक्त्वादयोऽनेकाश्रिताः, एका संयोगव्यतिरेका च विभागव्य क्तिरुभयोर्द्रव्योर्वर्त्तत इत्यनेकाश्रितत्वम् । एवं द्वित्वद्विपृथक्त्वव्यक्त्यो-रपि । आदिशब्दगृहीतास्तु त्रित्वत्रिपृथक्त्वादिव्यक्तयो यथासम्भवं बहुष्वा-श्रिताः । अनेकशब्दरच ' एको न भवति ' इति व्युत्पत्त्या द्वयोर्बहुष्वपि साधारणः । शेषास्त्वेकैकवृत्तयः ' शेषा ' रूपादिव्यक्तयः, एकस्यामेव व्यक्तौ वर्त्तन्ते, न पुनरेका रूपव्यक्तिः संयोगवदुभयत्र व्यासज्य वर्त्तत इत्यर्थः । विशेषगुणान् निरूपयति - रूपरसगन्धेत्यादि । विशेषो व्यवच्छेदः, तस्मै प्रभवन्ति ये गुणास्ते वैशेषिका गुणा रूपादयः । ते हि स्वाश्रयमितरस्मा-एक ही संयोग और एक ही विभाग ( अपने प्रतियोगी और अनुयोगी ) दोनों द्रव्यों में रहता है, अतः ये दोनों ' अनेकाश्रित ' गुण हैं । इसी प्रकार द्वित्व और द्विपृथक्त्व-ये दोनों भी ' अनेकाश्रित ' गुण हैं । आदि ' शब्द के द्वारा बहुत से द्रव्यों में रहनेवाले त्रित्व एवं त्रिपृथक्त्वादि गुण भी अनेकाश्रित कहे गये हैं । ' एको न भवति ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' दो ' एवं इससे अधिक ' बहुत ' सभी ' अनेक ' शब्द के अर्थ हैं । ' शेष ' अवशिष्ट रूपादि गुणों की इकाइयाँ एक एक द्रव्य में हो रहती है । अभिप्राय यह है कि एक ही रूपादि इकाई संयोग की तरह दो व्यक्तियों को व्याप्त कर नहीं रहती । ' रूपरस ' इत्यादि वाक्य के द्वारा विशेष गुणों का वर्णन करते हैं । ' विशेष ' शब्द का अर्थ है ' व्यवच्छेद ' अर्थात् भेदबुद्धि । इतने गुण भेदबुद्धि के उत्पादन में समर्थ है | For Private And Personal

पृष्ठ 306

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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra भाषानुवादसहितम् प्रकरणम् ] प्रशस्तपादभाष्यम् त्ववेगाः सामान्यगणाः । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यैकै केन्द्रियग्राह्याः । न्यायकन्दली स आश्रयविशेषकृतः एवेति बोद्धव्यम् । For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २३१ गुरुत्व, भिन्न रूप में नहीं समझा ) स्वतः कोई उसे आश्रय के सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वनैमित्तिकद्र-संख्या, परिमाण, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये ( ग्यारह ) सामान्य गुण हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच में से प्रत्येक एक ही इन्द्रिय से गुहीत होता है, एवं बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होता है । द्वयवच्छिन्दन्ति न संख्यादय:, तेषां स्वतो विशेषाभावात् । यस्तु तेषां विशेषः संख्यादय: सामान्यगुणाः 1 सामान्याय स्वाश्रयसाधम्र्माय गुणाः, न स्वाश्रयविशेषायेत्यर्थः 1 नन्वणुपरिमाणं परमाणूनां व्यवस्थापकम्? न जात्यन्तरपरमाणुसाधारणत्वात् । सांसिद्धिकद्रवत्वमपां विशेषगुण एव तेन नैमित्तिकग्रहणम् । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यकै केन्द्रियग्राह्याः । बाह्यानीन्द्रियाणि चक्षुरा-दीनि बाह्यर्थप्रकाशकत्वात् । तैः प्रत्येकं रूपादयो गृह्यन्ते । वे ही ' वैशेषिक गुण ' हैं, जैसे कि रूपादि । ये अपने आश्रयों को औरों से समझाते हैं । संख्यादि सामान्य गुण अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप में सकते, क्योंकि ( एक द्रव्य की एक संख्या से दूसरे द्रव्य की उसी संख्या में अन्तर अर्थात् विशेष नहीं है । उन दोनों संख्याओं में जो कुछ अन्तर है विशेषों से ही समझना चाहिए । ऊपर कहे हुए संख्यादि सामान्य गुण हैं । अर्थात् ' सामान्याय गुणा: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कथित संख्यादि ' सामान्य ' अर्थात् अपने आश्रयों में परस्पर साधर्म्य प्रतीति के ही कारणीभूत गुण हैं, इनसे इनके आश्रयों में परस्पर विभिन्नता की प्रतीति नहीं होती है । ( प्र ० ) अणु परिमाण तो परमाणुओं का व्यवस्थापक है, अर्थात् और परि-माणवालों से विभिन्नत्व बुद्धि का कारण है? ( उ ० ) नहीं, अणु परिमाण भी विभिन्न जातीय परमाणुओं में समान रूप से रहने के कारण परस्पर ( परमाणुत्व रूप ) साधर्म्य -बुद्धि का ही कारण है । सांसिद्धिक ( स्वाभाविक ) द्रवत्व जल का विशेष गुण है, अतः नैमित्तिक द्रवत्व को ही सामान्य गुणो में गिनाया है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच गुण ' बाह्येकै केन्द्रियग्राह्य ' हैं, अर्थात् बाह्य विषयों के ही प्रकाशक होने के कारण चक्षुरादि ' बाह्येन्द्रिय ' हैं । शब्दादि में से प्रत्येक

पृष्ठ 307

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्य वैध प्रशस्तपादभाष्यम् सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्व संयोग विभागपरत्वापरत्वद्रवत्वस्नेहवेगा द्वीन्द्रियग्राह्याः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेष प्रयत्नास्त्वन्तःकरणग्राह्याः । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये नौ गुण दो इन्द्रियों से ( भी ) गृहीत हो सकते हैं । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ये छ: गुण ' अन्त: -करण ' अर्थात् मन से ज्ञात होते हैं । संख्यादयो चक्षुषा ' स्निग्धोऽयम् ' स्नेहोऽपि तदुभयग्राह्यः । न्यायकन्दली द्वीन्द्रियग्राह्याः चक्षुस्पर्शनग्राह्याः । यथा इति प्रतीतिरेवं त्वगिन्द्रियेणापि भवति, संख्यादिवत् बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ता अन्तःकरणग्राह्याः, मनसा प्रतीयन्त इत्यर्थः । बुद्धिरनुमेया नान्तःकरणेन गृह्यत इति केचित् तदयुक्तम्, लिङ्गा-भावात् । न तावदर्थमात्रं लिङ्गम्, तस्य व्यभिचारात् । ज्ञातोऽर्थो लिङ्ग चेत्? ज्ञानसम्बन्धो ज्ञातता, याऽसौ ज्ञानकर्मता सा प्रतीयमाने ज्ञाने न प्रतीयते, सम्बन्धिप्रतीत्यधीनत्वात् सम्बन्धप्रतीतेरिति कथं तद्विशेषेणार्थो लिङ्गं स्यात्? चक्षुरादि बाह्य इन्द्रियों में से ही किसी एक इन्द्रिय से गृहीत होता है । संख्या से लेकर वेग पर्यन्त कथित ये दश गुण ' द्वीन्द्रियग्राह्य ' हैं, अर्थात् चक्षु और त्वचा दोनों इन्द्रियों से गृहीत होते हैं । ' यह स्निग्ध है ' यह प्रतीति जैसे चक्षु से होती है, वैसे ही त्वचा से भी होती है अतः संख्यादि की तरह स्नेह भी ' द्वीन्द्रियग्राह्य ' है । बुद्धि से लेकर प्रयत्न पर्यन्त कहे हुये ये छः गुण ' अन्तःकरणग्राह्य हैं ', अर्थात् इनका प्रत्यक्ष मन रूप अन्तरिन्द्रिय से ही होता है । कोई कहते हैं कि ( प्र ० > बुद्धि का अनुमान हो होता है, अतः अन्तरिन्द्रिय से भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता । ( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि बुद्धि को अनुमिति का कोई उपयुक्त हेतु नहीं है । केवल ( ज्ञेय ) अर्थ के ज्ञान अनुमिति के हेतु नहीं हो सकते, क्योंकि यह व्यभिचरित है । ज्ञात अर्थ के ज्ञानों को अनुमिति का हेतु माने ( तो भी नहीं हो सकता, क्योंकि ) अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध ही उसकी ' ज्ञातता ' है । अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध ( ज्ञानक्रिया का ) कर्मत्व रूप ही है । अत: ज्ञान के प्रतीत हुये बिना ज्ञानकर्मत्व रूप ज्ञातता की प्रतीति नहीं हो सकती, किन्तु अनुमिति में लिङ्ग की तरह उसका विशेषण For Private And Personal

पृष्ठ 308

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ३० www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३३३ भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली For Private And Personal लिङ्गवल्लिङ्गविशेषणस्यापि ज्ञायमानस्यैवानुमान हेतुत्वम् । अथ मन्यसे ' ज्ञानेन स्वोत्पत्त्यनन्तरमर्थे ज्ञातता नाम काचिदवस्था जन्यते पाकेनेव तण्डुलेषु पक्वता, सा चार्थधर्मत्वादर्थेन सह प्रतीयते ' इति । तदप्यसारम् अननुभवात् । यथा हि तण्डुलानामेवोदनीभावः पक्वताऽनुभूयते नैवमर्थस्य ज्ञातता । या चेयमपरोक्षरूपता हानादिव्यवहारयोग्यता च तस्य, साऽपि हि ज्ञानसम्बन्धो न धर्मान्तरम् । यथा चार्थे ज्ञायमाने ज्ञातता, तथा ज्ञातताया-मपि ज्ञायमानायां ज्ञाततान्तरमित्यनवस्था । अथेयं स्वप्रकाशा? ज्ञाने कः प्रद्वेषः? वस्तुतस्त्रिकालविशिष्टोऽप्यर्थो ज्ञानेन प्रतीयमानो वर्त्तमानकालावच्छिन्नः प्रतीयते । या च त्रिकालस्य वर्त्तमानकालावच्छिन्नावस्था सा ज्ञातता, ज्ञानकृतत्वात्तस्य लिङ्गमिति कश्चित् । तदपि न किञ्चित् वर्त्तमानावछिन्नता भी कारण है वह लिङ्ग की तरह ज्ञात होकर ही । अगर यह मानें कि ( प्र ० ) ज्ञान की उत्पत्ति के बाद इस ज्ञान से ही अर्थ की एक विशेष प्रकार की अवस्था होती हैं, जिसे ज्ञात -तावस्था कहते हैं । जिस प्रकार कि चावल में पाक से पक्वता नाम की एक अवस्था उत्पन्न होती है । ( उ ० ) इस कथन में भी कुछ विशेष सार नहीं है, क्योंकि पाक से चावल में जिस प्रकार ओदनावस्था रूप पक्वता का अनुभव होता है, वैसे ही अर्थ में ज्ञातता का कोई अनु-भव नहीं होता । ( विषयों के ज्ञान के बाद जो ) उसमें अपरोक्ष रूपता, त्याग या ग्रहण करने की जो योग्यता भासित होती है, वह भी ज्ञान सम्बन्ध को छोड़ कर और कुछ नहीं है | एवं इस पक्ष में अनवस्था दोष भी है, क्योंकि जिस प्रकार ज्ञात होने पर अथों में ज्ञातता मानते हैं, उसी प्रकार ज्ञातता के ज्ञात होने पर उसमें भी कोई दूसरी ज्ञातता माननी पड़ेगी । जिसका पर्यवसान अनवस्था में होगा । अगर ज्ञातता को स्वप्रकाश मान लें तो फिर ज्ञान की ही स्वप्रकाश मान लेने में क्यों द्वेष है? कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) तीनों कालों में से वर्तमान काल ही ऐसा है जिससे युक्त अर्थ का प्रत्यक्ष होता है अर्थात् वर्त्तमानकालिक वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष होता है । श्रतः वस्तुओं की जो वर्त्तमानावस्था, भूतावस्था और भविष्यदवस्था है इनमें से वस्तुओं के प्रत्यक्षमूलक होने के कारण केवल वर्तमानावस्था ही उसकी ज्ञातता है! यह ज्ञातता ही ज्ञानानुमिति का हेतु है ( उ ० ) किन्तु इस कथन में भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि वस्तुओं का वर्तमान काल के साथ सम्बन्ध ( या उसमें रहना ) ही उनकी

पृष्ठ 309

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणधर्म्य वैधर्म्य -हि वर्त्तमानकालविशिष्टता सा चार्थस्य स्वाभाविकी, न ज्ञानेन क्रियते किन्तु प्रतीयते । यो s पि हि विषयसंवेदनानुमेयं ज्ञानमिच्छति, सोऽप्येवं पर्यनुयोज्यः ---किं विषयसंवेदनमात्मनि समवैति? विषये वा? न तावद्विषये, तच्चैतन्य-प्रतिषेधात् । अथात्मनि समवैति? ततः किमन्यद्विज्ञानं यदस्यानुमेयम् । अस्य कारणं ज्ञातृव्यापारलक्षणं तदिति चेत्? तत्किं नित्यम्? अनित्यं वा? यद्यनित्यं तदुत्पत्तावपि कारणं वाच्यम् । विषयेन्द्रियादिसहकारी ज्ञानमनः संयोगोऽस्य कारणमिति चेत्? सेव सामग्री विषयसंवेदनोत्पत्तावस्तु किमन्तर्गडुनानेन? अथ तन्नित्यम्? कादाचित्कविषयेन्द्रियसंनिकर्षादिसहकारि कादाचित्कं विषयसंवेदनं करोतीत्यभ्युपगः, तदस्याप्यागन्तुककारणकलापादेव विषयसंवेदनोत्पत्तिसिद्धौ तत्कल्पनावैयर्थ्यम्? विषयसंवेदनादेवार्थावबोधस्य तत्पूर्वकस्य व्यवहारस्य च सिद्धेः । वर्त्तमानकालावच्छिन्नता है । यह उनका स्वाभाविक धर्म है, यह धर्म ज्ञान से उत्पन्न नहीं होता, ज्ञान के द्वारा प्रतीत भर होता है । जो कोई विषय संवेदन ज्ञान का अनुमान मानते हैं, उन्हें इस प्रकार पराजित करना चाहिये कि यह ' विषयसंवेदन ' समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है? या विषयों में? विषयों में तो रह सकता नहीं, क्योंकि विषयों में चैतन्य का खण्डन कर चुके हैं ( देखिए आत्मनिरूपण पृ ० १७१ ) । अगर यह समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है तो फिर ज्ञान उससे भिन्न कौन सी वस्तु है? जिसका विषय संवेदन से अनुमान होता है । ( ० ) अनुमेयज्ञान एवं विषयसंवेदन ये दोनों भिन्न हैं, क्योंकि ( अनुमेय ) ज्ञान विषयसंवेदन का कारण और ज्ञाता का व्यापार है । ( उ ० ) विषयसंवेदन का कारणीभूत ज्ञान नित्य है? अथवा अनित्य? अगर अनित्य है तो फिर उसकी उत्पत्ति के लिए भी अलग से कारण कहना पड़ेगा । विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों से युक्त ज्ञाता मनःसंयोग को अगर उसका कारण मानें, तो फिर इन्हीं कारणों के समूह से विषयसंवेदन की भी उपपत्ति मानिये । विषयसंवेदन के उत्पादक कारणों की पंक्ति में उस ज्ञान को बिठाने की क्या आवश्यकता है? अगर उस अनुमेय ज्ञान को नित्य मानते हैं और विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों के रहने और नहीं रहने से विषयसंवेदन के कादा-चित्कत्व ( कभी होना कभी नहीं ) का निर्वाह करते हैं, तो फिर विषय संवेदन के कादाचित्कत्व के प्रयोजक इन्द्रियादि रूप कारणों से ही विषयसंवेदन की उत्पत्ति मान लीजिए । इस तरह के ज्ञान की कल्पना हो व्यर्थ है जो विषयसंवेदन से अनुमेय हो For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 310 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली अथोच्यते - विषयेन्द्रियादिजन्यं २३५ विज्ञानं कथमात्मन्येव समवैति? यद्यात्मा सहजज्ञानमयो न स्यात् । तस्याचेतनत्वे हि कारणत्वातिशेषादिन्द्रिया-दिष्वपि ज्ञानसमवायो भवेदिति I तत्र स्वभावनियमादेव नियमोपपत्तेः । तन्तूनामपत्वेऽपि तन्तुत्वजातिनियमात्तेषु समवायो न तुर्यादिषु तद्वदचिदा-त्मकेऽप्यात्मन्यात्मत्वजातिनियमाद् ज्ञानसमवायस्य नियमो भविष्यति । एतेनैतदपि प्रत्युक्तं यदाहुरेके स्वसंवेदनमात्मनो निजं चैतन्यम् ' इति, संसारावस्थायामपि तस्यावभासप्रसङ्गात् । अविद्यया वा तस्य तिरोधान-मिति चेत्? किं ब्रह्मणोऽप्यविद्या? कथं च नित्ये स्वप्रकाशे तिरोधान-वाचोयुक्ति:? न च तिरोहिते तस्मिन्नन्यप्रतिभानमस्ति, ' तस्य भासा एवं विषयसंवेदन का कारण हो, क्योंकि उसी विषयसंवेदन से अर्थविषयक बोध एवं तज्जनित व्यवहार दोनों की उपपत्ति हो जायगी । अगर यह कहें कि प्र ० ) विषय एवं इन्द्रियादि से उत्पन्न ज्ञान तब तक आत्मा में समवाय सम्बन्ध से कैसे रह सकता है जब तक कि आत्मा को सहजज्ञानमय न माना जाय । आत्मा अगर स्वतः अचेतन हो किन्तु ज्ञान का कारण होने से ही ( उसमें ) ज्ञान की सत्ता हो तो फिर इन्द्रियादि ( रूप ज्ञान के और कारणों ) में भी ज्ञान का समवाय मानना पड़ेगा । ( उ ० ) उक्त कथन भी असङ्गत ही है, क्योंकि स्वाभाविक नियम के अनुसार ही इस विषय का अवधारण हो जायगा कि ज्ञान अपने आत्मा रूप कारण में ही समवाय सम्बन्ध से है, इन्द्रियादि रूप कारणों में नहीं । जैसे कि तन्तु में पटरूपता न रहने पर भी ( पट के कारणीभूत ) तन्तु में ही समवाय सम्बन्ध से पट रहता है, तुरी, वेमा प्रभृति अपने अन्य कारणों में नहीं । इस नियम को मान लेने से ही आत्मा में हा ज्ञान का समवाय है, इस नियम की भी उपपत्ति हो जायगी । इसी से किसी का यह मत भी खण्डित हो जाता है कि ( प्र ० ) स्वसंवेदन ( स्वतः प्रकाश ) ज्ञान आत्मा का स्वकीयचैतन्य ही है ( वह किसी कारण से उसमें उत्पन्न नहीं होता है ) | ( उ ० ) क्योंकि ( वह ज्ञान अगर स्वतः प्रकाश और नित्य है तो फिर ) संसारावस्था में भी उसका प्रत्यक्ष होना चाहिये । अगर यह कहें कि ( प्र ० ) संसारावस्था में वह अविद्या से ढँका रहता है, ( उ ) तो फिर इस विषय में यह पूछना है कि क्या ब्रह्म में भी अविद्या रहती है? एवं नित्य एवं स्वप्रकाश रूप ज्ञान के तिरोधान में ही क्या युक्ति है? एवं उसके तिरोहित हो जाने पर ( संसारावस्था में ) और विषयों का ज्ञान भी असम्भव होगा, क्योंकि ' तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ' इत्यादि श्रुतियों में कहाँ For Private And Personal