प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 311–320
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 311–320
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २३६ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् गुरुत्वधर्माधर्मभावना तीन्द्रियाः । [ गुणसाधम्यवैधम्र्म्य-अपाकजरूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणैकत्वक पृथक्त्वगुरुत्वद्रवत्व स्नेह-वेगाः कारणगुणपूर्वकाः । गुरुत्व, धर्म, अधर्म और भावना ये चार गुण किसी भी इन्द्रिय से गृहीत नहीं होते ( अर्थात् अतीन्द्रि य हैं ) । अपाकज रूप, अपाकज रस, अपाकज गन्ध, अपाकज स्पर्श, परिमाण, एकत्व, एकपृथक्त्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह और वेग ये ग्यारह गुण कारण-गुणपूर्वक ' हैं, अर्थात् अपने आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों में रहनेवाले अपने-अपने समानजातीय गुण से उत्पन्न होते हैं । न्यायकन्दली सर्वमिदं विभाति ' इति श्रुतेः । भासते चेत्? सर्वमुक्तिः, विद्याविर्भाव ? विद्याप्रकाशस्तस्या-सत्यविद्याविलयात् । अथेयं न विलीयते विलयहेतुरित्यनिर्मोक्षः । निर्भागस्यैकदेशेन प्रतिभानमनाशङ्कनीयम् । गुरुत्वधर्माधर्मभावना अतीन्द्रियाः, न केनचिदिन्द्रियेण गृह्यन्त इत्यर्थः । अपाकजरूपादयो वेगान्ताः कारणगुणपूर्वकाः स्वाश्रयस्य यत्समवायि-कारणं तस्य ये गुणास्तत्पूर्वका रूपादयः, तन्तुरूपादिपूर्वकाः पटरूपादयः, गया है कि उसीके प्रकाश से और सभी प्रकाशित होते हैं । अगर संसारावस्था में भी आत्मा का वह सहज चैतन्य प्रकाशित होता है तो फिर सभी जीवों को मुक्ति मिल जायगी, क्योंकि विद्या रूप तत्त्वज्ञान से अविद्या का विनाश हो जाता है । अगर विद्या के प्रकाशित होने पर भी अविद्या का विनाश नहीं होता है तो फिर विद्या ( तत्त्वज्ञान ) अविद्या के विनाश का कारण ही नहीं है । तब फिर किसी को भी मोक्ष का मिलना असम्भव हो जायगा । अंशों से शून्य किसी अखण्ड वस्तु के किसी अंश के प्रकाशित अप्रकाशित होने की तो शङ्का ही नहीं करनी चाहिए । होने एवं किसी अंश के गुरुत्व, धर्म, अधर्म और भावना ये चार गुण ' अतीन्द्रिय ' हैं, अर्थात् किसी भी इन्द्रिय से इनका ग्रहण नहीं होता । अपाकज रूप से लेकर वेग पर्यन्त कथित ग्यारह गुण ' कारणगुणपूर्वक ' हैं । अर्थात् उक्त रूपादि गुण अपने आश्रय ( द्रव्य ) के समवायिकारण ( अवयव ) में रहनेवाले गुणों से उत्पन्न होते हैं । पट प्रभृति द्रव्यों में रहनेवाले रूपादि की उत्पत्ति तन्तु आदि में रहनेवाले रूपादि गुणों से ही होती है । क्योंकि जिस तरह के रूपादि तन्तुओं में देखे जाते हैं, उसी प्रकार के रूपादि पट में भी देखे जाते हैं । अगर ऐसी बात न हो तो फिर For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २३७ वियभेन तद्धर्मानुविधानात् । अतत्पूर्वकत्वे हि पटे यत्किञ्चद् गुणान्तरं स्यान्नि-यहेतोरभावात् । एकमेव सर्वत्र शुक्लं रूपं प्रत्यभिज्ञानादिति प्रत्युक्तम् । तरतमादि-भावानुपपत्तिप्रसङ्गाच्च । तस्मात्सामान्यविषया प्रत्यभिज्ञा । पार्थिवपरमाणुरूपादयः पाकाद्वह्निसंयोगाज्जायन्ते न तु परमाणुसम-वायिकारणाश्रितरूपादिपूर्वकाः, अतस्तन्निवृत्त्यर्थमपाकज ग्रहणम् । सिद्धाया-मुत्पत्तौ कारणगुणपूर्वकत्वमकारणगुणपूर्वकत्वं चेति निरूपणीयम् । जलादिपरमाणु-पट में ऐसे भी गुणों की उत्पत्ति हो जो जन्तुओं में न देखे जाते हों क्योंकि ( ' अवयव के गुणों से ही अवयवी के गुण उत्पन्न होते हैं इस ) नियम में कोई अन्य ) प्रमाण नहीं हैं । अगर यह नियम न हो तो फिर पट में तन्तुओं में न रहनेवाले किसी गुण की उत्पत्ति होने में भी कोई बाधा नहीं है, क्योंकि ' पट में इतने ही गुण उत्पन्न हों ' इस विषय में ( उक्त नियम को छोड़ कोई अन्य ) कारण नहीं हैं । कथित युक्ति से ही किसी आचार्य का निम्नलिखित यह मत भी खण्डित हो जाता है कि ( प्र ० ) शुक्ल रूप से युक्त जितने भी द्रव्य दीख पड़ते हैं, उन सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप है, क्योंकि ( जिस शुक्ल रूप को मैंने घट में देखा था, उसी को पट में भी देख रहा हूँ यह ) प्रत्यभिज्ञा होती है । ( उ ० ) ( ' अवयव गत गुण ही अवयवी में गुण को उत्पन्न करते हैं ' इस नियम की अनुपपत्ति रूप दोष के अतिरिक्त इस पक्ष में ) यह दोष भी है कि अगर शुक्ल रूप से युक्त सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप हो तो फिर उनमें इस न्यूनाधिकभाव की प्रतीति नहीं होगो कि ' यह इससे अधिक शुक्ल है ' या ' यह इससे कम शुक्ल है ', अत: कथित प्रत्यभिज्ञा केवल सादृश्य के कारण होती है ( दोनों द्रव्यों में प्रतीत होने वाले शुक्ल रूपों के एकत्व से नहीं ) । पार्थिव परमाणु के रूपरसादि पाक से ही उत्पन्न होते हैं, अपने आश्रय के समवायि-कारणों में रहनेवाले रूप रसादि से नहीं, क्योंकि उन रूपादि के आश्रयीभूत, परमाणुओं का कोई समवायिकारण ही नहीं है । पार्थिव परमाणुओं के पाकजरूपादि में ' कारण-गुणपूर्वकत्व ' रूप साधर्म्य अव्याप्त न हो जाय, अत: ( प्रकृत साधर्म्य के लक्ष्यबोधक वाक्य में ) ' अपाकज ' पद दिया है । उत्पत्ति की सिद्धि हो जाने पर फिर उस उत्पन्न वस्तु में ही जिज्ञासा होती है कि उसकी उत्पत्ति कारण के गुणों से होती है या और किसी से? जलादि के परमाणुओं के रूपादि को तो उत्पत्ति ही नहीं होती ( क्योंकि वे नित्य हैं ), अतः उनमें कारणगुणपूर्वकत्व साधर्म्य के न होने से भी व्यभिचार दोष नहीं हैं । इन गुणों को ' कारणगुणपूर्वक ' कहने का अभिप्राय केवल इनके स्वरूपों का कथन मात्र है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २३८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य -प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धि सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दा रणगुणपूर्वकाः । अका-बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दतूलपरिमाणोत्तरसं-योगनैमित्तिकद्रवत्वपरत्वापरत्वपाकजाः संयोगजाः । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द ये नौ गुण ' अकारणगुणपूर्वक ' हैं ( अर्थात् ये अपने आश्रयों के अवयवों ' रहनेवाले अपने समानजातीय गुण से नहीं उत्पन्न होते ) । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना, शब्द, रुई प्रभृति के परिमाण, उत्तरदेश के साथ संयोग, नैमित्तिक द्रवत्व ये तेरह गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं । न्यायकन्दली रूपादीनां चोत्पत्तिरेव नास्तीति न व्यभिचारः । एषां कारणगुणपूर्वकत्वा-भिधानं स्वरूपकथनं न त्ववधारणार्थम् नैमित्तिकद्रवत्ववेगयोरकारणगुण-पूर्वकत्वस्यापि सम्भवात् । वेतयोर्द्रष्टव्यम् । कारणगुणपूर्वकत्वमनयोर्वेगवदारब्धजलावयविसम-बुद्ध्यादयः शब्दान्ता अकारणगुणपूर्वकाः स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तद्गुणपूर्वका न भवन्ति, नित्यगुणत्वात् । बुद्ध्यादयः संयोगजाः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावना आत्ममनः संयोगजाः । शब्दो भेर्याकाशसंयोगजः । तूलपरिमाणं प्रचयाख्यसंयोगजम् । इस नियम का यह अभिप्राय नहीं है कि ये सभी गुण कारणगुणपूर्वक ही होते हैं ', क्योंकि नैमित्तिकद्रवत्व और वेग अकारणगुणपूर्वक भी होते हैं । वेग एवं द्रवत्व से युक्त अययवों के द्वारा उत्पन्न जल रूप अवयवी के वेग और द्रवत्व में कथित कारणगुणपूर्वकत्व समझना चाहिए । बुद्धि से लेकर शब्द पर्यन्त कथित ये नौ गुण ' अकारणगुणपूर्वक ' हैं, अर्थात् अपने आश्रयरूप द्रव्य के समवायिकारण में रहनेवाले गुण से नहीं उत्पन्न होते, क्योंकि इनके आश्रय नित्य हैं । इन गुणों के समवायिकारणों का कोई कारण ही नहीं है । ' बुद्धि प्रभूति कथित गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं ' इनमें बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और भावना, ये नौ गुण आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होते हैं । शब्द की उत्पत्ति भेरी ( नगाड़ा ) और आकाश के संयोग से होती है । ' प्रचय ' नाम के संयोग से रूई के परिमाण की उत्पत्ति होती है । संयोगज-For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् संयोग विभाग वेगाः कर्मजाः । शब्दोत्तर विभागौ विभागजौ । परत्वापरत्वद्वित्व पृथक्त्वादयो बुद्धधपेक्षाः । २३६ संयोग, विभाग और वेग ये तीन गुण क्रिया से उत्पन्न होते हैं । शब्द और उत्तर ( विभागज ) विभाग ये दोनों विभाग से उत्पन्न होते हैं । परत्व, अपरत्व, द्वित्व, द्विपृथक्त्व प्रभृति बुद्धिसापेक्ष हैं । न्यायकन्दली उत्तरसंयोगः संयोगजः संयोगोऽभिमतः । नैमित्तिकद्रवत्वं वह्निसंयोगजम् । परत्वा-परत्वे दिक्कालपिण्डसंयोगजे । पार्थिवपरमाणुरूपरसगन्धस्पर्शा वह्निसंयोगजा इति विवेकः । संयोगविभाग वेगाः कर्मजाः । संयोगविभागौ कर्मजा । शब्दोत्तरविभागौ विभागजौ । आद्यः शब्दो विभागादपि जायते, उत्तरो विभागो विभागादेव जायत इति विवेकः । परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वादयो बुद्धयपेक्षाः । एषामुत्पत्तौ निमित्तकारणं बुद्धिः । आदिशब्दात् त्रित्वत्रिपृथक्त्वादिपरिग्रहः । संयोग ही यहाँ उत्तरसंयोग ' शब्द से इष्ट है । वह्नि के उत्पत्ति होती है । द्रव्यों के साथ दिशा एवं काल के संयोग से नैमित्तिक द्रवत्व की संयोग से परत्व एवं अपरत्व की उत्पत्ति होती है । पार्थिव परमाणुओं के रूप, रस, गन्ध और स्पर्श ये सभी ( विशेष प्रकार के ) वह्निसंयोग रूप पाक से उत्पन्न होते हैं ( अतः संयोगज होते हुए भी अपाकज नहीं हैं ) । संयोग, विभाग और वेग ये तीनों क्रिया से उत्पन्न होते हैं । पहिला संयोग और पहिला विभाग ये दोनों ही क्रिया से उत्पन्न होते हैं ( द्वितीय संयोग की उत्पत्ति संयोग से एवं द्वितीय विभाग की उत्पत्ति विभाग से ही होती है ) । शब्द और उत्तरविभाग दोनों ही विभाग से उत्पन्न होते हैं । यह ध्यान रखना चाहिए कि ( इनमें ) प्रथम शब्द विभाग से भी उत्पन्न होता है, किन्तु उत्तर विभाग केवल विभाग से ही उत्पन्न होता है । परत्व, अपरत्व, द्वित्व द्विपृथकत्वादि बुद्धिसापेक्ष ' हैं, अर्थात् इन सबों की उत्पत्ति में बुद्धिनिमित्तकारण है । ' आदि ' पद से त्रित्व एवं त्रिपृथक्त्व प्रभृति को समझना चाहिए | For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २४० न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधम्यंवैध-रूपरसगन्धानुष्णस्पर्शशब्दपरिमाणैकत्वैकपृथक्त्व स्नेहाः समानजा त्यारम्भकाः । सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चासमानजात्यारम्भकाः । रूप, रस, गन्ध, उष्ण से भिन्न सभी स्पर्श, शब्द, परिमाण, एकत्व, एकपृथक्त्व और स्नेह ये नौ गुण अपने अपने समानजातीय गुणों के ही उत्पादक हैं । सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ये पाँच गुण अपने से भिन्नजातीय वस्तुओं के उत्पादक हैं । न्यायकन्दली रूपादय: स्नेहान्ताः समानजात्यारम्भकाः कार्यरूपं कारणरूपात् रसाद्रसो गन्धाद् गन्धः, स्पर्शात् स्पर्शः स्नेहात् स्नेहो महत्त्वान्महत्त्वमित्यादि योज्यम् । शब्दस्तु स्वाश्रये एव शब्दान्तरारम्भकः । अत्र कारणत्दमात्रं विव-क्षितम्, न त्वसमवायिकारणत्वम्, अन्यथा विजातीयानां पाकजानां निमित्त-कारणस्योष्णस्पर्शव्यवच्छेदोऽसङ्गतार्थः स्यात् । नन्वेवं तहि कथं रूपादीनां ज्ञानकारणत्वम्? न तद्व्यतिरेकेण समानजातीयारम्भकत्वस्याभिप्रेतत्वात् । सुखादयोऽसमानजात्यारम्भकाः 1 सुखमिच्छायाः कारणं दुखं द्वेषस्य इच्छाद्वेषौ प्रयत्नस्य सोऽपि कर्मणः । पुत्रसुखं पितरि सुखं जनयति, रूप से लेकर स्नेह पर्यन्त नो गुण कारणों में रहनेवाले रूप से कार्य में रूप की रस से कार्य में रस की उत्पत्ति होती है । समानजातीय गुणों के उत्पादक है । उत्पत्ति होती है । कारण में रहनेवाले कारणों में रहनेवाले गन्ध से कार्य में गन्ध की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले स्पर्श से कार्य में स्पर्श की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले स्नेह से कार्य में स्नेह की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले महत्परिमाण से कार्य में महत्परिमाण की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार के वाक्यों की कल्पना करनी चाहियें । शब्द अपने आश्रय में ही दूसरे शब्द को उत्पन्न करता है । यहाँ ' आरम्भकत्व ' शब्द से सामान्यतः कारणत्व हो विवक्षित है, ( प्रकरण प्राप्त ) असम-वायिकारणत्व नहीं, क्योंकि ऐसा न मानने पर उष्ण स्पर्श को प्रकृत लक्ष्यबोधक वाक्य में छोड़ देना असङ्गत होगा, चूंकि उष्ण स्पर्शं भी अपने विजातीय पाकजरूपादि गुणों का निमित्तकारण तो है ही । ( उष्ण स्पर्श भी अपने सजातीय उष्ण स्पर्श का असमवायिकरण है ) | ( प्र ० ) फिर रूपादि अपने ज्ञान के प्रति कैसे कारण होते हैं? ( उ ० ) प्रकृत में समानजातीय गुणों में ज्ञान से भिन्न गुणों की ही गणना करनी चाहिए । अतः ज्ञान से भिन्न अपने सजातीय गुणों की उत्पादकता ही प्रकृत में विवक्षित है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् २४१ संयोगविभागसङ्ख्यागुरुत्वद्रवत्वोष्णस्पर्शज्ञानधर्माधर्म संस्काराः समानासमान जात्यारम्भकाः । संयोग, विभाग, संख्या, गुरुत्व, द्रवत्व, उष्णस्पर्श, ज्ञान, धर्म, अधर्म और संस्कार ये दश गुण अपने समानजातीय एवं असमानजातीय दोनों तरह की वस्तुओं के उत्पादक हैं । न्यायकन्दली अन्यथा तस्य प्रमोदानुपपत्तिरिति चेत्? तदसारम् पुत्रस्य हि मुखप्रसादादिना सुखोत्पत्तिमनुमाय पश्चात् पितरि सुखं जायते । तत्रास्य पुत्रस्य सुखं न कारणम्, तस्यैतावन्तं कालमनवस्थानात् । किन्तु लैङ्गिकी तद्विषया प्रतीतिः कारणमिति प्रक्रिया | संयोगादयः संस्कारान्ताः समानासमानजात्यारम्भकाः । संयोगात् समानजातीय उत्तरसंयोगो विजातीयं द्वितूलके महत्परिमाणम्, विभागाद्विभागः शब्दश्च, कारणगतैकत्वसङ्ख्यातः कार्यवत्तन्येकत्वसङ्ख्या, द्वित्वबहुत्वसङ्ख्याभ्यां सुखादि अपने असमानजातीय वस्तुओं के उत्पादक हैं । ( जैसे कि ) सुख इच्छा का, दुःख द्वेष का, इच्छा और द्वेष ये दोनों ही प्रयत्न के, एवं प्रयत्न भी क्रिया का उत्पादक है । ( प्र ० ) पुत्र का सुख तो पिता में ( अपने सजातीय ) सुख को उत्पन्न करता है । अगर ऐसा न हो तो फिर सुखी पुत्र को देख कर पिता का प्रफुल्लित होना युक्त नहीं होगा । ( उ ० ) इस आक्षेप में कुछ विशेष सार नहीं है । यहाँ ( पुत्र के सुखसे पिता में सुख की उत्पत्ति ) की यह रीति है कि पुत्र के प्रफुल्लमुख से पिता को उसमें सुख का अनुमान होता है । इस अनुमान से पिता में दूसरे सुख की उत्पत्ति होती है । पिता के इस सुख में पुत्र का सुख ( स्वयं ) कारण नहीं है, क्योंकि वह पिता में सुख की उत्पत्ति के अव्यवहितपूर्व क्षण तक ( क्षणिक होने के कारण ) ठहर नहीं सकता । अतः मुखप्रफुल्लादि हेतुओं से उत्पन्न पुत्रगत सुखविषयक अनुमिति रूप प्रतीति ही पिता के प्रकृत सुख का कारण है । संयोग से लेकर संस्कार पर्यन्त कथित ये नौ गुण अपने समानजातीय एवं असमानजातीय दोनों प्रकार की वस्तुओं के उत्पादक हैं । संयोग से उसके सजातीय उत्तर देशसंयोग ( संयोगजसंयोग ) की उत्पत्ति होती है, एवं संयोग से ही उसके विजातीय तूल ( रुई ) के दो अवयवों से उत्पन्न होने वाले एक बड़े तूल के अवयवी के महत्परिमाण की भी उत्पत्ति होती है । विभाग से उसके सजातीय विभागजविभाग को उत्पत्ति होती है, एवं विभाग से ही उसके विजातीय शब्द की भी उत्पत्ति होती है । कारण में रहनेवाली एकत्व संख्या से कार्य में उसकी सजातीय एकत्व संख्या की उत्पत्ति होती है, एवं द्वित्वबहुत्वादि संख्याओं से उनके विजातीय अणुत्व एवं महत् परिमाणों की भी ३१ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २४२ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधम्र्म्यवैधर्म्य -स्वाश्रयसमवेतारम्भ काः । प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषभावनाशब्दाः रूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणस्नेहप्रयत्नाः परत्रारम्भकाः । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, भावना और शब्द ये सात गुण अपने आश्रय में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली वस्तुओं के उत्पादक हैं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परिमाण, स्नेह और प्रयत्न ये सात गुण अपने आश्रय से भिन्न आश्रयों में ही कार्य को उत्पन्न करते हैं । न्यायकन्दली चाणुत्वमहत्त्वे, गुरुत्वाद् गुरुत्वान्तरं पतनं च द्रवत्वाद् द्रवत्वान्तरं स्यन्दनक्रिया च, उष्णस्पर्शादुष्णस्पर्शः पार्थिवपरमाणुरूपादयश्च ज्ञानाज्ज्ञानं संस्कारश्च, धर्माद्धर्मः सुखं च, अधर्मादधर्मो दुःखं च, संस्कारात् संस्कारः स्मरणं च । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषभावनाशब्दाः स्वाश्रयसमवेतारम्भकाः । सुखादय-' स्तावद्यत्र स्वयं वर्तन्ते तत्रैव कार्यं जनयन्ति । बुद्धिस्तु द्वित्वादिकं परत्रारभमाणा-प्यात्म विशेषगुणं जनयन्ति स्वाश्रयसमवेतमेव जनयति नान्यत्र । रूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणस्नेहप्रयत्नाः परत्रारम्भकाः 1 अवयवेषु उत्पत्ति होती है । ( कारणों में रहनेवाले ) एक गुरुत्व से ( कार्य में रहनेवाली सजातीय ) दूसरी गुरुत्व एवं विजातीय पतन इन दोनों की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले द्रवत्व से कार्य में रहनेवाला उसका सजातीय दूसरा द्रवत्व एवं विजातीय स्यन्दन ( प्रसरण ) क्रिया इन दोनों की उत्पत्ति होती है । ( कारणों में रहनेवाले ) उष्ण स्पर्श से ( कार्य में रहने वाले ) उष्ण स्पर्शरूप सजातीय कार्य की उत्पत्ति होती है, एवं पार्थिव परमाणुओं के रूपादि स्वरूप विजातीय कार्यों की भी उत्पत्ति होती है । ज्ञान से भी अपने सजातीय ज्ञान और विजातीय संस्कार दोनों की उत्पत्ति होती है । धर्म से भी सजातीय धर्म एवं विजातीय सुख दोनों ही प्रकार के कार्य होते हैं । अधर्म भी अपने सजातीय अधर्म एवं विजातीय दुःख दोनों का उत्पादक है । संस्कार भी अपने सजातीय संस्कार एवं विजातीय स्मृति दोनों का उत्पादक है । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, भावना और शब्द ये पदार्थों के उत्पादक हैं । उत्पन्न करते हैं । किन्तु आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले जहाँ स्वयं रहते हैं, वहीं अपने कार्यों को भी से भिन्न पदार्थों में भी द्वित्वादि संख्या को उत्पन्न करती है, गुणों को बुद्धि तो अपने आश्रय में ही समवाय सम्बन्ध से उत्पन्न किसी आश्रय में नहीं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परिमाण, स्नेह और प्रयत्न सात गुण अपने - अपने ( इनमें ) सुखादि बुद्धि अपने आश्रय आत्मा के विशेष करती है, और सात गुण अपने For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् २४३ रम्भकाः । संयोगविभागसङ्ख्यैकपृथक्त्वगुरुत्वद्रवत्ववेगधर्माधर्मास्तूभयत्रा-संयोग, विभाग, संख्या, एकपृथक्त्व, गुरुत्व, द्रवत्व, वेग, धर्म और अधर्म ये नौ गुण अपने आश्रय एवं अनाश्रय दोनों प्रकार की वस्तुओं में कार्य को उत्पन्न करते हैं । न्यायकन्दली वर्त्तमाना रूपादयो यथासम्भवमवयविनि रूपादिकमारभन्ते, आत्मनि समवेतः प्रयत्नो हस्तादिषु क्रिया हेतुः । संयोगादय उभयत्रारम्भकाः । स्वाश्रये तदन्यत्र चारम्भकाः । तन्तुषु वर्त्तमानः संयोगस्तेष्वेव पटमारभते, विषयेन्द्रियसंयोगश्चात्मनि ज्ञानम् । वंशदलयोविभागोऽन्यत्राकाशे शब्दमारभते, वंशदलाकाशविभागश्च स्वाश्रय आकाशे । अवयववत्तिन्येकत्वसङ्ख्या अवयविन्येकत्वसङ्ख्यामारभते, स्वाश्रये च द्वित्वादिसङ्खयाम् । अथावयवेष्वेकपृथक्त्वमवयविन्येक पृथक्त्वं स्वाश्रयेषु त्रिपृथक्त्वादिकमिति । कारणगताश्च गुरुत्वद्रवत्ववेगाः कार्ये तानारभन्ते, स्वाश्रयेषु क्रियाम् । धर्माधर्मवात्मनि सुखदुःखे परत्र चाग्न्यादौ ज्वलनादिक्रियाम् । आश्रय से भिन्न आश्रय में ही कार्य को उत्पन्न करते हैं । अवयवों में रहनेवाले रूपादि यथासम्भव अवयवो में ही रूपादि को उत्पन्न करते हैं । प्रयत्न स्वयं समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है किन्तु हाथ पैर प्रभृति अङ्गों में क्रिया को उत्पन्न करता है । संयोगादि ये नो गुण दोनों ही प्रकार के आश्रयों में कार्य को उत्पन्न करते हैं, अर्थात् ये अपने आश्रय और उससे भिन्न आश्रय, दोनों प्रकार के आश्रयों में कार्य के उत्पादक हैं, ( जैसे कि ) तन्तुओं में रहनेवाला संयोग अपने आश्रयीभूत उन तन्तुओं में ही किन्तु विषय एवं इन्द्रिय का संयोग ( अपने आश्रयीभूत ज्ञान को उत्पन्न करता है । बाँस के दो पटरूप कार्य को उत्पन्न करता है, इन दोनों से भिन्न ) आत्मा में दलों का विभाग ( अपने आश्रयीभूत उन दो वंशदलों से भिन्न ) आकाश में शब्दरूप कार्य को उत्पन्न करता है, किन्तु बाँस के ही दल और आकाश का विभाग अपने आश्रयीभूत आकाश में ही शब्दरूप कार्य को उत्पन्न करते हैं । अवयव में रहनेवाली एकत्व संख्या ( अपने आश्रय से भिन्न ) अवयवी में एकत्व संख्या को उत्पन्न करती है, एवं अपने आभयरूप अवयव मं द्वित्वादि संख्या को भी उत्पन्न करती है । अवयवों में रहनेवाला एकपृथक्त्व अवयवी में एक पृथक्त्व को एवं अपने आश्रय में त्रिपृथक्त्वादि को भी उत्पन्न करता है । इसी प्रकार कारणों में रहनेवाले गुरुत्व, द्रवत्व, वेग और स्नेह आश्रयीभूत उन कारणों के कार्यों गुरुत्व, द्रवत्व, वेग एवं स्नेहरूप कार्यों को उत्पन्न करते हैं, किन्तु अपने आश्रय For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधम्र्म्यवैधम्यं -गुरुत्ववस्ववेगप्रयत्नधर्माधर्मसंयोग विशेषाः क्रियाहेतवः । रूपरसगन्धानुष्णस्पर्शंसङ्ख्यापरिमाणैक पृथक्त्व स्नेहशब्दानामसम वायिकारणत्वम् । गुरुत्व, द्रवत्व, वेग, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और विशेष प्रकार के संयोग से सात गुण क्रिया के कारण हैं । रूप, रस, गन्ध, अनुष्णाशीतस्पर्श, संख्या, परिमाण, एकपृथक्त्व, स्नेह और शब्द ये नौ गुण असमवायिकारण हैं । न्यायकन्दली गुरुत्वादयः क्रियाहेतवः । गुरुत्वात्पतनं द्रवत्वात् स्यन्दनं वेगादिषो-रुत्तरकर्माणि प्रयत्नाच्छरीरादिक्रिया धर्माधर्माभ्यामग्न्यादिक्रिया । विशिष्यते इति विशेषः, संयोग एव विशेषः संयोगविशेषः, विशिष्टः संयोगो नोदनाभिघात-लक्षणः, सोऽपि क्रियाहेतुरिति वक्ष्यते । रूपादयः शब्दान्ता असमवायिकारणम् । सन्नमवधूत सामर्थ्यमसमवायिकारणम् । प्रत्यासत्तिश्च समवायिकारणप्रत्या-समवायिकारणसमवायः समवायिकारणैकार्थसमवायश्च । सुखादीनां समवायिकारणमात्मा, तत्र समवाया-में क्रिया को उत्पन्न करते हैं । धर्म और अधर्म अपने आश्रय में ( क्रमशः ) सुख और दुःख को एवं अपने आश्रय से भिन्न अग्नि प्रभृति में ऊर्ध्वज्वलनादि क्रिया को भी उत्पन्न करते हैं । ये गुरुत्वादि सात गुण क्रिया के उत्पादक हैं । इनमें गुरुत्व से पतनरूप क्रिया, द्रवत्व से प्रसरणरूप क्रिया, वेग से तीर प्रभृति की उत्तर क्रियायें, प्रयत्न से शरीर की क्रिया, धर्म और अधर्म से अग्नि प्रभृति में ऊर्ध्वज्वलनादि क्रियायें होती हैं । ' संयोग एव विशेष: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार नोदन एवं अभिघातरूप विशेष प्रकार के संयोग हा प्रकृत ' संयोगविशेष ' शब्द से इष्ट हैं । आगे कहेंगे कि ये दोनों ही प्रकार के संयोग क्रिया के कारण हैं । रूप से लेकर शब्द पर्यन्त कथित ये सात गुण असमवायिकारण हैं । समवायिकारण में ' प्रत्यासन्न ' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध जिस वस्तु में कार्य करने की सामर्थ्यं निश्चित है, वही असमवायिकारण है । कार्यों के साथ अन्वय ( अर्थात् कारण के अव्यवहित क्षण में कार्य का अवश्य रहना ) एवं व्यतिरेक ( अर्थात् जिसके न रहने पर कार्य उत्पन्न ही न हों ) यही दोनों कारणों में कार्य के उत्पादन की सामर्थ्य हैं । ' प्रत्यासन्न ' शब्द में प्रयुक्त ' प्रत्यासत्ति ' शब्द समवायिकारणानुयोगिकसमवाय सम्बन्ध का वाचक है । यह समवायरूप सम्बन्ध प्रकृत में दो प्रकार का है ( १ ) समवायिकारणानुयोगिक For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २४५ दात्ममनः संयोगस्तेषायसमवायिकारणम् । नन्वेवं तहि धर्माधर्मयोरप्यसमवायिकार-त्वं स्यात्, न, तयोः समस्तात्मविशेषगुणोत्पतौ सामर्थ्यानवधारणात् । तथा हि-धर्मादधर्मदुःखयोरनुत्पत्तिः, अधर्माच्च धर्मसुखयोरनुत्पादः । एवं ज्ञानादीनामपि प्रत्येकं व्यभिचारो दर्शनीयः । सर्वत्रावधृतसामर्थ्यस्तु ज्ञातृमनः संयोग इत्येतावता विशेषेण तस्यैवासमवायिकारणत्वम् । तथा पटरूपस्य समवायिकारणेन पटेन कस्मिन्नर्थे तन्तौ समवायात् तन्तुरूपं पटरूपस्यासमवायिकारणं, न रसादयः, तस्यैव तदुत्पत्तावन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्यावधारणात् । एवं रसादिष्वपि योज्यते । उष्णस्पर्शस्य पाकजारम्भे निमित्तकारणत्वमप्यस्ति, तदर्थमनुष्णस्य ग्रहणम् । रूपरसगन्धानुष्णस्पर्शपरिमाणस्नेहानां समवायिकरणकार्थसमवायाद-समवायिकारणत्वम्, कारणवर्तिनामेषां कार्यसजातीयारम्भकत्वात् । शब्दस्य समवाय, एवं ( २ ) समवायिकारण जिस वस्तु में समवेत हो तदनुयोगिक समवाय । ( प्रथम प्रकार के सम्बन्ध के अनुसार ) आत्मा और मन का संयोग सुखादि का असमवायि-कारण है, क्योंकि सुभ के समवायिकारण आत्मा में आत्मा और मन का संयोग समवाय सम्बन्ध से है । ( प्र ० ) इस प्रकार तो धर्म और अधर्म भी असमवायिकारण होंगे । ( उ ० ) नहीं, क्योंकि उन दोनों में आत्मा के किसी भी विशेष गुण को उत्पन्न करने की सामर्थ्य ( अन्वय और व्यतिरेक से ) निश्चित नहीं है । इसी रीति से धर्म के द्वारा अधमं और दुःख की उत्पत्ति और अधर्म से सुख तथा धर्म की उत्पत्ति का निराकरण होता है । इसी प्रकार आत्मा के ज्ञानादि सभी विशेष गुणों में व्यभिचार दिखाना चाहिए । आत्मा के सभी गुणों में से केवल आत्मा और मन का संयोग ही ऐसा गुण है, जिसमें आत्मा के सभी विशेष गुणों के उत्पादन की सामथ्य ( अर्थात् अन्वय और व्यतिरेक ) निर्णीत है, इसी वैशिष्ट्य के कारण आत्मा के गुणों में से केवल आत्मा और मन का संयोग ही आत्मा के सभी विशेष गुणों का असमवायिकारण है । ( असमवायिकारण के लक्षण में कथित एक दूसरे सम्बन्ध के अनुसार ) तन्तुओं का रूप पट के रूप का असमवायिकारण हैं, क्योंकि पटगत रूप का सम-वायिकारण पट है, वह तन्तुओं में समवाय सम्बन्ध से रहता है, एवं तन्तुओं का रूप भी तन्तुओं में ही समवाय सम्बन्ध से हैं । इस प्रकार तन्तुओं के रूपों में ही पटगत अतः तन्तुओं के रूप ही पटगत रूप के उत्पादन का सामथ्यं निश्चित है रसादि में नहीं, रूप के असमवायिकारण हैं पटगत रसादि नहीं । इसी प्रकार अवयवियों में रहनेवाले रसादि का असमवायिकारणत्व अवयवों में रहनेवाले रसादि में ही समझना चाहिए । उष्ण स्पर्श पाकज रूपादि का निमित्तकारण भी है, ( अतः लक्ष्यबोधक वाक्य में ) ' अनुष्ण ' पद लिखा है । समवायिकरणरूप एक वस्तु में कार्य के साथ समवाय सम्बन्ध से रहने के कारण रूप, रस, गन्ध, अनुष्ण स्पर्श परिमाण और स्नेह ये छः गुण असमवायिकारण होते हैं । For Private And Personal