प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 41–50

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 41 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २८ ) अभाव भी अवश्य है । अतः अनुमिति होगी । विस्तृत ज्ञान के लिए अध्यापकों का सहाय्य अपेक्षित है । हेत्वाभास किस भी विषय के तत्त्व को अनुमान के द्वारा समझने के लिए जिस प्रकार हेतुओं को समझना आवश्यक है, उसी प्रकार जो हेतु नहीं हैं किन्तु हेतु की तरह दीखते हैं, उन हेत्वाभासों को भी समझना आवश्यक है । अगर ऐसा न मानें तो हेतुओं और हेत्वाभासों के संमिश्रण से कदाचित् अतत्त्व भी तत्त्व की तरह प्रतिभात होकर अन्त में अभीष्ट प्रवृत्ति को विफल कर देंगे, और अनभीष्ट स्थिति में भी डाल देंगे । अतः हेतुओं की तरह विशेष रूप से आचार्यों ने हेत्वाभासों का भी निरूपण किया है । ' हेत्वाभास ' शब्द दो व्युत्पत्तिओं से निष्पन्न होता है । ( ६ ) हेतोरभासा हेत्वा-भासाः और ( २ ) हेतुवदाभासन्ते इति हेत्वाभासाः । इन में पहिली व्युत्पत्ति के अनुसार हेत्वाभास शब्द का अर्थ होता है ' हेतु का दोष ' । महर्षि गौतम ने हेत्वाभासों को ( १ ) सव्यभिचार ( २ ) विरुद्ध ( ३ ) प्रकरणसम ( ४ ) साध्यसम और ( ५ ) कालात्ययापादिष्ट भेद से पाँच प्रकारों का माना है, और सव्यभिचार हेत्वाभास को समझाने के लिए ' अनैकान्तिकः सव्यभिचारः इस सूत्र की रचना की है । जो हेतु साध्य या साध्याभाव इन दोनों में से किसी एक के साथ नियमित रूप से सम्बन्ध न हो, वही हेतु ' अनैकान्तिक ' है । अर्थात् जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहे केवल साध्य के ही साथ न रहे, वही हेतु ' अनैकान्तिक ' है । सव्यभिचारशब्द के अर्थ की आलोचना से भी इसी अर्थ की पुष्टि होती है । ' व्यभिचारेण सहितः सव्याभिचारः ' इस व्युत्पत्ति से सव्यभिचार शब्द बना है । ' व्यभिचार ' शब्द ' वि ' ' अभि ' और ' चार ' इन तीन शब्दों से बना है । इनमें ' वि ' शब्द विरुद्धार्थक है और ' अभि ' शब्द उभयार्थक है । ' चार ' शब्द सम्बन्ध का बोधक है । इसके अनुसार परस्पर विरोधी दो वस्तुओं के . साथ अर्थात् साध्य और साध्याभाव के साथ किसी आश्रय में हेतु का रहना ही व्यभि-चार है । यह व्यभिचार अर्थात् साध्याधिकरण और साध्याभावाधिकरण दोनों में समान रूप से रहना जिस हेतु का हो, वही ' सव्यभिचार ' है I साध्य के साथ नियत सम्बन्ध ही हेतु की व्याप्ति है । इस व्याप्ति के बल से ही हेतु साध्य का ज्ञापक होता है । जो हेतु उक्त प्रकार से सव्यभिचार या अनैकान्तिक होगा वह कभी कथित रीति से व्यासियुक्त नहीं हो सकता । अतः व्यभिचार युक्त हेतु ' सव्यभिचार ' नाम का हेत्वाभास है, हेतु नहीं । किन्तु बाद में सूक्ष्म निरूपण से यह निष्पन्न हुआ कि व्याप्ति का उक्त स्वरूप ठीक नहीं है । किन्तु हेतु के नियत सम्बन्ध से युक्त साध्य के साथ सपक्षों में हेतु का रहना ही हेतु की व्याप्त है । इस प्रकार व्याप्तिशरीर के दो अंश माने गये, एक तो साध्य में हेतु का नियत सम्बन्ध अर्थात् व्यापकत्व, दूसरा हेतु के व्यापकीभूत साध्य का सपक्षों में हेतु के साथ रहना अर्थात् सामानाधिकरण्य । इस स्थिति में साध्य में हेतु के For Private And Personal

पृष्ठ 42

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 42 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( २६ ) व्यापकत्ववाला जो अंश है, उसका विरोध परोक्ष रूप से ही सही, कथित व्यभिचार करेगा । क्योंकि जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहेगा, उस हेतु की व्यापकता उस साध्य में नहीं जा सकती । व्यापक होने के लिए यह आवश्यक है कि व्याप्य के अधिकरण में व्यापक का अभाव न रहे । कथित व्यभिचारी हेतु के आश्रय में तो साध्य का अभाव रहता है । अतः साध्य कभी भी व्यभिचारी हेतु का व्यापक नहीं हो सकता । इस प्रकार व्याप्ति के उक्त स्वरूप मानने के पक्ष में भी कथित व्यभिचार दोष से युक्त हेतु अवश्य ही सव्यभिचार हेत्वाभास होगा । किन्तु उक्त व्यासिशरीर का एक अंश और है ' व्यापकीभूत साध्य का हेतु साथ सपक्षों में रहना ' । इस अंश को विघटित करनेवाला दोष भी अगर हेतु में रहेगा तो भी वह ' व्यभिचार ' दोष से ही युक्त होने के कारण ' सव्यभिचार ' हेत्वाभास होगा क्योंकि सामान्यतः व्याप्ति का विघटन ही व्यभिचार होता है । , व्याप्ति के उक्त द्वितीय अंश का विघटन दो प्रकारों से सम्भव । जिस स्थल में कोई सपक्ष या विपक्ष नहीं है वहाँ साध्य का हेतु के साथ सपक्ष में रहना संभव नहीं होगा क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है । एवं जहाँ संसार के सभी पदार्थ पक्ष होंगे, वहाँ भी सपक्ष का मिलना सम्भव नहीं होगा । अतः ऐसे स्थलों में भी हेतु के साथ साध्य का सामानाधिकरण्य सपक्ष में सम्भव नहीं होगा । पहिले का उदाहरण है ' शब्दो नित्यः शब्दत्वात् ' । यहाँ शब्दत्व हेतु केवल शब्द में ही है । शब्द ही पक्ष है । पक्ष में साध्य अनिर्णीत रहता है । सपक्ष में साध्य और हेतु दोनों जो पहिले से निश्चित रहना चाहिए । नित्यत्व निर्णीत है आकाशादि में, वहाँ शब्दत्व हेतु नहीं है । शब्दस्य निर्णीत है शब्द में, वहाँ नित्यत्वरूप साध्य ही निर्णीत नहीं है । अतः ऐसे स्थलों में सपक्ष न मिलने के कारण सपक्ष में साध्य और हेतु का सामानाधिकरण्य संभव न होने से व्याप्ति सम्भव न होगा । अतः शब्दत्व हेतु में भी सव्यभिचार हेत्वाभास होगा । किन्तु नित्यत्व रूप साध्य का अभाव निर्णीत है घटादि अनित्यवस्तुओं में, वहाँ शब्दत्व भी नहीं है । अतः पूर्व कथित व्यभिचार दोष यहाँ सम्भव नहीं है । सुतराम् यहाँ नित्यत्व हेतु का केवल पक्ष में रहना किसी सपक्ष या विपक्ष में न रहना ही व्याप्ति का विघटक है । इसको ' असाधारण ' नाम का व्यभिचार कहते. | क्योंकि यह हेत्वाभास साध्य के अधिकरण और साध्याभाव के अधिकरण दोनों में साधारण रूप से सामान्य रूप से नहीं है, जैसे कि साधारण हेत्वाभास रहता है । यह शब्दत्व हेतु केवल शब्द रूप पक्ष में ही है, अतः उक्त शब्दत्व हेतु ' असाधारण ' नाम का व्यभिचार है । इसी प्रकार जिस स्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष होंगे जैसे ' सर्वमभिधेय प्रमेयत्वात् ', ऐसे स्थलों के हेतु में भी उक्त समानाधिकरण्य संभव नहीं होगा । क्योंकि प्रकृतस्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष के अन्तर्गत आ गये हैं । सपक्ष के लिए कोई नहीं बचा है । व्यापक साध्य का पक्ष को पक्ष से किसी सपक्ष में भिन्न होना चाहिए । अतः ऐसे हेतु के साथ रहना संभव नहीं स्थलों में भी हेतु के होगा । अतः इस For Private And Personal

पृष्ठ 43

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 43 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३० ) प्रकार के हेतुओं में भी व्याप्ति नहीं रह सकती । फलतः व्यभिचार रहेगा । किन्तु कथित साधारण या असाधारण व्यभिचार यहाँ संभव नहीं है । अतः ' अनुपसंहारी ' नाम का अतिरिक्त ही व्यभिचार दोष माना गया है । जिससे उक्त हेतु ' अनुपसंहार ' नाम का तीसरा सव्यभिचार होगा । अतः तत्त्वचिन्तामणिकार ने अपने सव्यभिचार प्रकरण में लक्षण करने से भी पहिले ' सव्यभिचारस्त्रिविधः संधारणासाधारणानुपसंहारिभेदात् ' यह विभाग वाक्य ही लिखा है । यद्यपि सूत्र - भाष्यादि में इस त्रैविध्य की चर्चा नहीं है फलितार्थ यह है कि सव्यभिचार ( १ साधारण ( २ ) असाधारण ( ३ ) और अनुपसंहारी भेद से तीन प्रकार का है । इनमें जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहे. उसे साधारण कहते हैं । जैसे कि ' धूमवान् वह्नेः ' का ह्नि हेतु । वह्नि धूम - के साथ भी महानसादि में है, और धूमाभाव के साथ भी तप्त अयःपिण्डादि में है । जो हेतु केवल पक्ष में ही रहे, सपक्ष या विपक्ष में जो न रहे उस हेत को ' असाधारण ' सव्यभिचार कहते । जैसे कि ' शब्दो नित्यः शब्दत्वात् ' इस अनुमान का शब्दत्व हेतु । यह शब्दत्व हेतु केवल शब्द रूप पक्ष में ही है । न आकाशादि सपक्षों में है, और न घटादि विपक्षों में । अतः शब्दत्व हेतु ' असाधारण ' सव्यभिचार है । जिस धर्म का सभी वस्तुओं में केवल अन्वय ही रहे, व्यतिरेक या अभाव किसी भी वस्तु में न रहे उस धर्म को केवलान्वयि धर्म कहते हैं, केवलान्वयि धर्म जिस पक्ष का विशेषण ( अवच्छेदक ) हो उस पक्ष के अनुमान का हेतु भी ' व्यभिचारी ' है, क्योंकि इस अनुमान में भी कोई सपक्ष नहीं हो सकता, चूँकि सभी पदार्थ पक्ष के अन्तर्गत आ जाते हैं । अतः उक्त अनुमान के हेतु का व्यापकत्व साध्य में रहने पर भी व्यापकीभूत वह साध्य किसी सपक्ष में हेतु के साथ नहीं रह सकता, क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है । जो हेतु साध्य के बदले साध्याभाव के साथ ही नियमित रूप से रहे, उस हेतु को ' विरुद्ध ' हेत्वाभास कहते हैं । अर्थात् हेतु का साध्याभाव के साथ नियमित रूप से रहना ' विरोध ' नाम का हेतुदोष है जिस दोष से युक्त हेतु ' विरुद्ध ' नाम का हेत्वाभास है । ' वि ' अर्थात् विशेष रूप से साध्य की अनुमिति को जो ' रुद्ध ' करें, अर्थात् साध्य के साथ नियत रूप से न रहकर साध्यभाव के साथ ही नियमित होकर व्यतिरेकव्याप्ति को विघटित करते हुए जो अनुमिति को विघटित करे, वही विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है । नियमत: साध्य के साथ ही रहनेवाले हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही ' विरोध ' दोष है, इस विरोध दोष से युक्त हेतु ही ' विरुद्ध ' नाम का हेत्वाभास है । जैसे कि ‘ हृदो वह्निमान् जलात् ' इस अनुमिति का जल हेतु ' विरुद्ध ' हेत्वाभास है, क्योंकि जल रूप हेतु वह्नि रूप साध्य के साथ न रहकर वह्नि अभाव के साथ ही नियमित रूप से रहता है । अतः जल रूप हेतु का अभाव वह्नि का व्यापकीभूत अभाव है, इस अभाव का प्रतियोगित्व कथित जल में है । जिस प्रकार हेतु के साथ साध्य का नियमित रूप से रहना व्याप्ति का प्रयोजक है, उसी प्रकार साध्याभाव के साथ हेत्वभाव का नियमित रूप से रहना भी व्याप्त का For Private And Personal

पृष्ठ 44

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 44 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ११ ) एक प्रयोजक है । जिसे व्यतिरेक व्याप्ति कहते हैं । साध्याभाव के साथ नियमित रूप से रहनेवाले ( साध्याभाव व्यापकीभूत ) हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही व्यतिरेकव्याप्ति है । है । इस व्याप्ति के शरीर में साध्याभावव्यापकीभूताभाववाला जो अंश है, उसी को विरोध दोष अपने साध्यव्यापकीभूताभाववाले अंश के द्वारा विघटित कर व्यतिरेक व्याप्ति को विघटित कर देता है । इस विरोध दोष के प्रसङ्ग में एवं विरुद्ध हेत्वाभास के प्रसङ्ग में बाद में भी अधिक परिवर्तन नहीं हुआ । जिस हेतु के प्रयोग करने पर ' प्रकरण ' की अर्थात् परस्पर विरुद्ध दो पक्षों की ' चिन्ता ' अर्थात् संशय ही उपस्थित हो, उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष का निर्णय संभव न हो, वह हेतु अगर उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष के निर्णय के लिए प्रयुक्त हो, तो वह हेतु ' प्रकरणसम ' नाम का हेत्वाभास होगा । शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए नैयायिक अगर नित्यधर्मानुपलब्धि ' को हेतु रूप से उपस्थित करें तो उनका यह हेतु ' प्रकरणसम ' नाम का हेत्वाभास होगा । क्योंकि प्रतिपक्षी मीमांसक भी तुल्य युक्ति से शब्द में नित्यत्व साधन के ' अनित्यधर्मा -नुपलब्धि ' हेतु को उपस्थित कर सकते हैं । ऐसी स्थिति में शब्द में अनित्यत्व या नित्यत्व का निर्णय नहीं होगा, किन्तु शब्द में नित्यत्व और अनित्यत्व का संशय ही होगा | अतः उक्त ' नित्यधर्मानुपलब्धि ' या ' अनित्यधर्मानुपलब्धि ' रूप हेतु प्रकरणसम वाभास होगा । यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि उक्त विवरण के अनुसार साध्यधर्म की अनुपलब्धि ही अगर हेतु रूप से उपस्थित किया जाएगा तो वह ' प्रकरणसम ' हेत्वाभास होगा । और कोई हेतु प्रकरणसम नहीं होगा । किन्तु श्री वाचस्पति मिश्र ने तात्पर्यटीका में प्रकरणसम के उक्त लक्षण को असपूर्ण ठहराया है, और प्रकरणसम को सत्प्रतिपक्ष का नामान्तर कहा है । ‘ सन् प्रतिपक्षो यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस हेतु का प्रतिपक्ष अर्थात् विरोधी दूसरा हेतु रहे वही हेतु सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रस्त है । वादी अगर किसी पक्ष में किसी साध्य की सिद्धि के लिए एक हेतु का प्रयोग करता है, उसके बाद ही कोई प्रतिवादी अगर उसी पक्ष में उसी साध्य के अभाव की सिद्धि के लिए दूसरे हेतु का प्रयोग करता है, तो फिर ये दोनों हेतु सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रस्त समझे जाएँगे । अगर दोनों हेतु अर्थात् हेतु और प्रतिहेतु दोनों समानबल के हों । अर्थात् दोनों में व्याप्ति और पक्षता समान रूप से रहे, तो वे दोनों सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रसित होंगे और दोनों ही हेतु न होकर ' सत्प्रतिपक्षित ' नाम के हेत्वाभास होंगे । इसी बात को दृष्टि में रखकर ' समान बलों सत्-प्रतिपक्षौ ' यह लक्षणवाक्य प्रचलित हैं । इन दोनों हेतुओं में से अगर एक हेतु व्याप्ति और पक्षधर्मता से युक्त होने के कारण प्रबल रहेगा और दूसरा उन दोनों से रहित होने के कारण दुर्बल रहेगा तो फिर वहाँ सत्प्रतिपक्ष दोष नहीं होगा । दुर्बल हेतु में केवल व्यमिचार या स्वरूपासिद्धि दोष होगा । और सबल हेतु से अभीष्ट अनुमिति हो जाएगी । प्राचीन नैयायिकों ने सत्प्रतिपक्ष को अनित्य दोष माना है । उन लोगों का अभिप्राय है कि जब तक कि हेतुलिङ्गकपरामर्श और प्रतिहेतुलिङ्गकपरामर्श इन दोनों ५ For Private And Personal

पृष्ठ 45

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 45 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३२ > में से किसी एक परामर्श के किसी भी अंश में भ्रमत्व का निश्चय नहीं हो जाता, तब तक ही उक्त दोनों हेतु सत्प्रतिपक्षित रहेंगे, उक्त भ्रमत्व निश्चय के बाद नहीं । अतः कुछ नियमित समय में ही रहने के कारण सत्प्रतिपक्ष अनित्य दोष है । इस मत में सद्धेतु स्थल में भी अगर विरोधी प्रतिहेतु का भ्रमात्मक परामर्श भी है, तो सद्धेतु भी तक तक सत्प्रतिपक्षित रहेगा, जब तक कि उक्त भ्रमात्मक विरोधी प्ररामर्श का भ्रमत्व ज्ञात नहीं हो जाता । नव्य नैयायिकों के मत से सत्प्रतिपक्ष नित्य दोष हैं । क्योंकि किसी हेतु को सत्प्रतिपक्षित होने के लिए इतना ही आवश्यक है कि प्रकृत हेतु से जिस पक्ष में साध्य का साधन इष्ट है, उस पक्ष में उक्त साध्य के अभाव की व्याप्ति से युक्त दूसरा ( प्रतिहेतु ) अगर विद्यमान है, तो वह पहिला हेतु सत्प्रतिपक्षित होगा । जल में वह्नि के साधक सभी हेतु सत्प्रतिपक्षित होंमे । क्योंकि वह्नि के अभाव की व्याप्ति जलत्व में है, एवं जल मेंवह्नयभावव्याप्यजलत्व सर्वदा ही विद्यमान है । अतः इस प्रकार का हेतु सदा ही सत्प्रतिपक्षित रहेगा । अतः सत्प्रतिपक्ष नित्य दोष है । महर्षि गौतम ने चौथे हेत्वाभास का नाम ' साध्यसम ' कहा है । और उसके स्वरूप को समझाने के लिए ' साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः ' यह सूत्र लिखा है । पहिले से जो सिद्ध नहीं रहता है वहीं ' साध्य ' कहलाता है । हेतु के लिए यह आवश्यक है कि वह पहिले से ' सिद्ध ' रहे । अर्थात् उसमें असाध्य की व्याप्ति सिद्ध रहे । एवं ( साध्य-व्याप्ति से युक्त ) हेतु स्वयं पक्ष में सिद्ध रहे । किन्तु जिस अनुमान का हेतु पहिले से सिद्ध नहीं है, वह हेतु साध्य के समान ही है, अतः उसे ' साध्यसम ' कहा गया है । अगर कोई ' छाया द्रव्य है क्योंकि वह गतिशील है ' इस प्रकार से अनुमान का प्रयोग करे तो यहाँ ' गतिशीलत्व ' हेतु ' साध्यसम ' हेत्वाभास होगा । क्योंकि ' छाया में गति है ' यही पहिले से सिद्ध नहीं है । अतः छाया में द्रव्यत्व की सिद्धि की तरह छाया में गति की भी सिद्धि अपेक्षित है । ' साध्यसम ' हेत्वाभास को ही नव्य नैयायिकों ने ' असिद्ध ' शब्द से व्यक्त किया है । एवं ( १ ) आश्रयासिद्ध ( २ ) स्वरूपासिद्ध और ( ३ ) व्याप्यत्वासिद्ध इसके ये तीन भेद किये हैं । जिसमें साध्य की सिद्धि अभिप्रेत हो उसे पक्ष कहते हैं । पक्ष को ही ' आश्रय ' भी कहते हैं । आश्रय अगर सिद्ध नहीं रहेगा तो अनुमान कहाँ होगा? अगर कोई साधा-रण फूलों के दृष्टान्त से आकाशकुसुम में गन्ध का अनुमान करे तो वहाँ के सभी हेतु आश्र-यासिद्ध होंगे । एवं स्वर्णमय पर्वत में अगर कोई वह्नि का अनुमान करे तो वहाँ के भी सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे । यद्यपि पर्वत असिद्ध नहीं है, किन्तु पर्वत में स्वर्णमयत्व असिद्ध है । अतः स्वर्णमयपर्वतरूप विशिष्टपक्ष भी असिद्ध है । हेतु यदि कथित पक्ष में विद्यमान न रहे तो वह हेतु ' स्वरूपासिद्ध ' हेत्वाभास होगा | जैसे कि जल में कोई धूम हेतु से भी वह्नि का अनुमान करना चाहेगा तो वहाँ का धूम हेतु स्वरूपा सिद्ध हेत्वाभास होगा । क्योंकि जल रूप पक्ष में धूम हेतु नहीं है । भाष्यकार ने जो असिद्ध का उदाहरण दिया है, वह स्वरूपासिद्ध का ही उदाहरण For Private And Personal

पृष्ठ 46

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 46 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३३ ) है, क्योंकि छाया या अन्धकार में गति रूप हेतु नहीं है । इससे ऐसा भान होता है कि वात्स्यायनादि प्राचीन नैयायिकों ने केवल स्वरूपासिद्ध को ही असिद्ध मानते थे । असिद्ध और भेद बाद में किये गये । हेतु में उसके विशेषणीभूत धर्म ( हेतुतावच्छेदक ) के अभाव और साध्य में साध्यतावच्छेदक के अभाव को व्याप्यत्वासिद्धि दोष कहते हैं । इस दोष से युक्त हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास है । ' पर्वतो वह्निमान् काञ्चनमयधूमात् ' इस अनुमान के हेतु -धूम काञ्चनमयत्व रूप हेतुतावच्छेदक नहीं है । अतः वह ( हेत्वप्रसिद्धि रूप ) व्याप्यत्वा-सिद्ध हेत्वाभास है । एवं ' पर्वतः काञ्चनमयवह्निमान् धूमात् ' इस अनुमान के साध्य वह्नि में काञ्चनमयत्व रूप साध्यतावच्छेदक नहीं है, अतः यह हेतु ( साध्या प्रसिद्ध रूप ) ब्याप्यत्वासिद्ध है । इसी प्रकार व्याप्ति में अनुपयोगी ( व्यर्थ ) विशेषणादि से युक्त हेतु भी व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास ही है, जैसे कि ' पर्वतो वह्निमान् नीलधूमात् ' इत्यादि स्थलों का नीलधूम रूप हेतु व्याप्यत्वासिद्ध है, क्योंकि धूम का नील विशेषण व्यर्थ है । यह ध्यान रहना चाहिए कि दोष जहाँ कहीं भी रहे, किन्तु दुष्टता हेतु में ही आवेगी । पाँचवें हेत्वाभास को महर्षि ने ' कालातीत ' की संज्ञा दी है, और इसके परिचय के लिए " कालात्ययापदिष्टः कालातीतः ” इस सूत्र का निर्माण किया है । पक्ष में पूर्ण रूप से निश्चित साध्य के लिए अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती है । एवं पक्ष में जिस साध्य का अभाव ही पूर्णरूप से निश्चित है, उस साध्य के लिए भी न्याय की प्रवृत्ति नहीं होती है । किन्तु जो साध्य पक्ष में सन्दिग्ध रहता है, उस साध्य को उस पक्ष में निश्चित रूप से समझाने के लिए ही न्याय का प्रयोग होता है । हेतुवाक्य का प्रयोग भी न्याय के ही अन्तर्गत है । जिस समय जिस पक्ष में जिस साध्य का सन्देह वर्त्तमान है, वही समय हेतु-प्रयोग के लिए उपयुक्त है । यदि उस समय उस पक्ष में उप साध्य का अभाव दूसरे किसी बलवत् प्रमाण से निश्चित है, तो उस समय उस पक्ष में साध्य का सन्देह नहीं रह सकता । साध्यसन्देह का समय पक्ष में साध्याभाव निश्चय के पूर्व ही था, जो ' अतीत ' हो चुका है । अतः जिस पक्ष में जिस साध्य का अभाव किसी बलवत् प्रमाण से निश्चित है, उस पक्ष में उस साध्य की अनुमिति के लिए अगर कोई हेतु का प्रयोग करे तो वह हेतु व्याप्ति - पक्षधर्मता प्रभृति से युक्त होने पर भी ' कालातीत ' नाम का हेत्वाभास होगा | उससे प्रमा अनुमिति नहीं हो सकती । इसका अतीतकाल ' नाम भी प्राचीन ग्रन्थों में है । नवीननैयायिक इस हेत्वाभास को ही ' बाधित ' और उसके विशेषणीभूत दोष को ' बाध ' कहते हैं | पक्ष में बलवत् प्रमाण के द्वारा निश्चित साध्य के अभाव का निश्चित रहना ही बाध है । फलतः पक्ष में साध्याभाव का रहना ही बाघ दोष है । जिस किसी भी सम्बन्ध के द्वारा इस बाध दोष से युक्त हेतु ही ' बाधित ' नाम का हेत्वाभास है । For Private And Personal

पृष्ठ 47

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 47 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३४ ) दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार हेत्वाभास शब्द का अर्थ होता है ' दुष्टहेतु ' । दोषों से युक्त हेतु ही दुष्ट हेतु है । फलतः कथित दोष ही दुष्ट हेतुओं को सद्धेतुओं से पृथक् करते है । अतः दुष्टहेतु रूप हेत्वाभासों को समझने के लिए हेतु के दोषों को समझना पहिले आवश्यक है । दोषों को समझ लेने के बाद ' इस दोष से युक्त ही दुष्ट हेतु है ' इस प्रकार दुष्टहेतुओं को समझना सुलभ हो जाता है । इसी दृष्टि से ' हेतोरभासा हेत्वा-भासाः ' इस व्युत्पत्ति से लभ्य हेतु के दोषों का ही लक्षण आकर ग्रन्थों में किया गया है । हेतुओं के ये दोष दो प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं । एक सीधे ही अनुमिति को रोकते हैं । जैसे कि सत्प्रतिपक्ष और बाध । कुछ हेत्वाभास अनुमिति के कारण व्याप्ति या पक्षधर्मता का विघटन करते हुए अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं, जैसे कि व्यभिचार एवं स्वरूपासिद्धि | कुछ हेत्वाभास ऐसे भी हैं जो उक्त दोनों ही प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं, जैसे कि आश्रयासिद्धि एवं साध्याप्रसिद्धि । हेत्वाभास की संख्याओं में और नामों में भी मतभेद देखा जाता है । जैसे कि वैशेषिकदर्शन के सूत्र में इसके तीन ही भेद कहे गये हैं, किन्तु भाष्यकार ने उनमें अनध्य-वसित नाम को जोड़कर निम्नलिखित चार भेद किया है । ( १ ) असिद्ध ( २ ) विरुद्ध ( ३ ) सन्दिग्ध और ( ४ ) अनध्यवसित । न्यायमत में ( १ ) सव्यभिचार ( २ ) विरुद्ध ( ३ ) सत्प्रतिपक्ष ( ४ ) असिद्ध और ( ५ ) बाध ये पाँच हेत्वाभास के मुख्य भेद माने गये हैं । मीमांसकों ने महर्षि कणाद की रीति से इसके तीन ही भेद किये हैं । इस प्रकार ज्ञान के परिशोधन के अभिप्राय से आचार्यों ने हेतु की तरह हेत्वा-भासों को भी समझाने में बहुत श्रम किया है । जिसका लाभ हम लोगों को उठाना चाहिए । एक पक्ष के स्थापन के लिए विरुद्ध पक्ष के हेतुओं में दोषों का प्रदर्शन आवश्यक है । जो आज भी न्यायालयों के व्यवस्थाओं को सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर अवगत हो सकता है । प्राचीन समय के धर्मशास्त्रानुयायी व्यवस्थाओं को देखने से तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है । जिसके लिए भारतीय व्यवहार के द्वैतपरिशिष्टादि निबन्ध ग्रन्थों के व्यवहारप्रकरणों को देखना उपयोगी होगा । सुख जिस इच्छा के लिए और किसी इच्छा की आवश्यकता न हो उसे ' सुख ' कहते हैं । सुख की इच्छा से ही चन्दनवनितादि सभी विषयों की इच्छा होती है । अर्थात् चन्दनादि विषय चूँकि सुख के कारण हैं, इसीलिए उनकी इच्छा होती हैं । सुख की इच्छा के लिए किसी और इच्छा की आवश्यकता नहीं होती । अतः किसी और इच्छा के अनधीन इच्छा का विषय ही ' सुख ' है । दुःख इसी प्रकार जिसमें द्वेष उत्पन्न होने के लिए मध्य में दूसरे विषयों के द्वेष की अपेक्षा न हो वही ' दुःख ' है । मुख्यतः जीवों को दुःखों से ही द्वेष है । फिर ' ये मुझे न For Private And Personal

पृष्ठ 48

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 48 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३५ ) मिलें ' इस प्रकार की धारणा से जिनसे साक्षात् या परम्परा से दुःख मिलने की सम्भा-वना समझ में आती है, उन सभी वस्तुओं से द्वेष उत्पन्न होता है | इच्छा अपने लिए अथवा दूसरे के लिए किसी अप्राप्त वस्तु की ' मुझे यह मिले या उसे यह मिले ' इस प्रकार की जो प्रार्थना, उसे ही ' इच्छा ' कहते हैं । काम अभिला • बादि इसके अनेक अवान्तर भेद हैं । आत्मा के जिस गुणके द्वेष द्वारा जीव अपने को जलता सा अनुभव करे वही ' द्वेष ' हैं । क्रोध द्रोहादि इसी के अवान्तर भेद हैं । प्रयत्न उत्साह को ही ‘ प्रयत्न ' कहते हैं । यह तीन प्रकार का है ( १ ) जीवनधारणोपयोगी ( या जीवनयोनि ) ( २ ) इच्छा से उत्पन्न और ( ३ ) द्वेष से उत्पन्न | इनमें जीवन-योनि यत्न से सोते हुए जीव के प्राणादि वायुओं की क्रियायें उत्पन्न होती हैं । एवं जागते हुए पुरुष का इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध होता है । अपने अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिए आवश्यक क्रिया का कारण ही इच्छाजनित ' प्रयत्न ' है । इस इच्छाजनित प्रयत्न के कारण ही शरीर का पतन नहीं होता । एवं अहित वस्तुओं से बचने के लिए जो व्यापार होते हैं, उनका कारण भी प्रयत्न ही है, जो द्वेष से उत्पन्न होता है । बुद्धि से लेकर प्रयत्न तक कहे गये ये १७ गुण ही महर्षि कणाद के सूत्रों के द्वारा कहे गये हैं 1 । गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, संस्कार, धर्म अधर्म और शब्द इन सात वस्तुओं में गुणत्व की व्यवस्था भाष्यकार प्रशस्तपाद ने की है । और इसे कथित सत्रह गुणों के विधायक सूत्र में पटित ' च ' शब्द के द्वारा सूत्रकार का अनुमत माना है । गुरुत्व पृथिवी और जल का पहिला पतन जिस गुण के कारण हो उसे ' गुरुत्व ' कहते हैं । यह ' गुरुत्व ' नाम का गुण केवल पृथिवी और जल में ही रहता है । गुरुत्व से पतन का सिद्धान्त पृथ्वी के मध्याकर्षणवाले आधुनिक सिद्धान्त से बिलकुल विपरीत है । जो केवल जल का ही आटा प्रभृति पिसे हुए द्रव्यों पार्थिवद्रव्यों से उक्त आकृतियाँ ही वैसा होता है । स्नेह विशेषगुण हो उसे ' स्नेह ' कहते हैं । स्नेह के हीकारण की गोल आकृति बन सकती हैं । घृतादि जिन बनती हैं, वहाँ भी घृतादि में जल सम्बन्ध के कारण For Private And Personal

पृष्ठ 49

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 49 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३६ ) संस्कार ' संस्कार ' नाम का भी एक गुण है जिसके ( १ ) वेग ( २ ) भावना और ( ३ ) स्थितिस्थापक ये तीन भेद हैं । ( १ ) वेग नाम संस्कार क्रिया से उत्पन्न होता है और पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में रहता है । ( २ ) ' भावना ' नाम का संस्कार आत्मा में रहता है । इसी के बल से स्वयं तीसरे क्षण में ही विनष्ट हो जाने पर भी पूर्वानुभव स्मृति को उत्पन्न करता है । ( ३ स्थितिस्थापक संस्कार के कारण ही बाँस प्रभृति द्रव्यों के अग्रभाग को बलात् नीचे से ले आकर छोड़ देने बाद वे फिर अपनी पहिले की स्थिति में आ जाते हैं । धर्म जीव के उस गुण को धर्म कहते हैं, जिससे उसे सुख मिलता है, इसी का दूसरा नाम पुण्य है । ' किन क्रियाओं से धर्म की उत्पत्ति होती है? ' इसको श्रुति स्मृति ही समझा सकते हैं । तदनुसार ' श्रुत्यादि प्रमाणों के द्वारा निर्दिष्ट क्रियाओं से उत्पन्न गुण ही धर्म ' विहितकर्मजन्यो धर्मः ' धर्म का लक्षण किया ' ' है इस प्रकार यह जाता है । अधर्म अधर्म भी जीव का ही विशेष प्रकार का गुण है । जिससे जीवों को दुःख मिलता है । शास्त्रों में निषिद्ध जीवहत्यादि क्रियाओं से इसकी उत्पत्ति होती है । शब्द श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले गुण को ही शब्द कहते हैं । यह संयोग से विभाग से और शब्द से उत्पन्न होता है । दण्ड और भेरी के संयोग से शब्द की उत्पत्ति होती है । एवं बाँस प्रभृति के विभाग से भी शब्द की उत्पत्ति होती है । किन्तु संयोग और विभाग से उत्पन्न शब्दव्यक्ति का श्रवण संभव नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष के लिए विषय के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध आवश्यक है । शब्द रूप विषय का ग्राहक श्रवणेन्द्रिय है । यह आकाश रूप है । आकाश अमूर्त्त होने के कारण कहीं जा नहीं सकता । अतः शब्द की उत्पत्ति जिस देशावच्छिन्न आकाश में होता है, वहाँ श्रवणेन्द्रिय जा नहीं सकता । किन्तु उस शब्द का प्रत्यक्ष तो होता है । इसलिए यह कल्पना करनी पड़ती है कि संयोग या विभाग से जिस शब्दव्यक्ति की उत्पत्ति होती है, उसी शब्द से उसी शब्द के सदृश दूसरे शब्द की उत्पत्ति अनन्तर प्रदेश में होती है । इस प्रकार एक शब्द से दूसरे शब्द की उत्पत्ति, और दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति की धारा जल की तरङ्गों की तरह चलती है । उस धारा के अन्तर्गत जब किसी की उत्पत्ति कर्णवाले आकाश प्रदेश में होती है, तो उस शब्द का प्रत्यक्ष होता है । अतः संयोग और विभाग की तरह शब्द से भी शब्द की उत्पत्ति माननी पड़ती है । For Private And Personal

पृष्ठ 50

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 50 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३७ ) कर्म सभी प्रकार के चलने को या गतियों को ' कर्म ' कहते हैं । ऊपर की तरफ उछालने की क्रिया को उत्क्षेपण एवं निचे की तरफ गिराने की क्रिया को अप-क्षेपण ' कहते हैं । समेटने की क्रिया को ' आकुञ्चन ', और सामने बाहर की तरफ फैलाने की क्रिया को प्रसारण कहते हैं । शेष सभी क्रियाओं का ' गमन ' कहते हैं । क्रियाओं का ऐसा विशद एवं सूक्ष्म वर्णन और किसी दर्शन में नहीं है । उसे इस मूल ग्रन्थ में देखा जा सकता है । सामान्य सभी व्यक्तियों के कुछ असाधारण धर्म होते हैं, जो उसी व्यक्ति में रहते हैं । इसके द्वारा ही जगत् के और सभी वस्तुओं से उस व्यक्ति को अलग रूप में समझा जाता है । इसी प्रकार कुछ ऐसे भी धर्म हैं जिनके कारण पदार्थ व्यक्तिशः भिन्न होते हुए भी एक आकार की प्रतोति के विषय होते हैं । जैसे सभी घट व्यक्तियाँ अलग - अलग हैं । किन्तु ' अयं घट: ' इस एक ही प्रकार से सब की प्रतीति होती है । विभिन्न व्यक्तियों की यह एक आकार की प्रतीति का कोई प्रयोजक अवश्य है । उस प्रयोजक को ही ' सामान्य ' कहते हैं । अतः जो समान आकृत्यादिवाले विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति का कारण हो वहीं ' सामान्य ' है । इसे जाति भी कहते हैं । बौद्धों का इस प्रसङ्ग में कहना है कि कोई भी व्यक्ति केवल अपने से भिन्न और सभी व्यक्तियों से विभिन्न रूप में ही प्रतीति होती है । अतः घटव्यक्ति में घंटों से भिन्न पटादि सभी व्यक्तियों का जो भेद है, वही विभिन्न घटों में " यह घट है " इस प्रकार की प्रतीति से भासित होता है, क्योंकि सभी घटों में घट से भिन्न और सभी पदार्थों का भेद समान रूप से विद्यमान है । इस समान विषयक प्रतीति का सम्पादक है यह तद्भिन्न-भिन्नत्व या अपोह, इससे ही उक्त विभिन्न व्यक्तियों में समान आकार की प्रतीतियों का सम्पादन होता है । इसके लिए अलग जाति का नाम के भाव पदार्थ की कल्पना अनावश्यक है । विशेष ' विशेष ' नाम का भी एक पदार्थ वैशेषिक लोग मानते हैं । इसे केवल वैशेषिक लोग ही मानते हैं । इसको मानने में वे इस युक्ति का प्रयोग करते हैं कि जिस प्रकार घटपटादि दृश्य पदार्थों में परस्पर भेद मानते हैं उसी प्रकार उनके उत्पादक परमाणुओं में और आकाशकालादि विभु पदार्थों में भी भेद मानना होगा । किन्तु घट पटादि सावयव पदार्थों में परस्पर भेद के नियामक उनके अवयवों के भेद हैं । अर्थात् घट पट से भिन्न इसलिए हैं कि घट के उत्पादक कपाल और पट के उत्पादक तन्तु परस्पर भिन्न हैं । जिनके उत्पादक अवयव परस्पर भिन्न जाति के होते हैं, वे सभी द्रव्य भी परस्पर भिन्न जाति के ही होते हैं । किन्तु निरवयव परमाणु और आकाशादि के तो अवयव नहीं हैं । अवयवों के भेद से उसमें परस्पर भेद का नियम नहीं किया For Private And Personal