प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 321–330

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 321–330

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २४६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य -निमित्तकारणत्वम् । प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनानां संयोगविभागोष्णस्पर्श गुरुत्वद्रवत्ववेगानामुभयथा कारणत्वम् । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न धर्म, अधर्म और भावना ये सभी निमित्तकारण ( ही ) होते हैं । संयोग, विभाग, उष्ण स्पर्श, गुरुत्व, द्रवत्व और वेग ये छः गुण असमवायिकारण भी हैं और निमित्तकारण भी । न्यायकन्दली समवायिकारणसमवायादसमवायिकारणता, आकाशाश्रितेनाकाशे एव शब्दान्तरा-रम्भात् । सङ्ख्यापृथक्त्वयोरुभयथा कारणत्वम्, कारणवर्तिनोस्तयोः कार्ये यथा-सङ्ख्यमेकत्वैकपृथक्त्वारम्भकत्वात्, स्वाश्रये द्वित्वद्विपृथक्त्वजनकत्वात् । बुद्ध्यादीनां निमित्तकारणत्वम् । तेषां निमित्तकारणत्वमेवेत्यर्थः । संयोगविभागोष्णस्पर्शगुरुत्वद्रवत्ववेगानामुभयथा कारणत्वम् । असमवा-यिकारणत्वं निमित्तकारणत्वं चेत्यर्थः 1 तथा हि- भेरीदण्डसंयोगः शब्दोत्पत्तौ निमित्तं भेर्याकाशसंयोगोऽसमवायिकारणम् । एवं विभागे दलविभागो निमित्तं वंशदलाकाशविभागोऽसमवायिकारणम् । उष्णस्पर्श उष्णस्पर्शस्या-समवायिकारणं पाकजानां निमित्तकारणम् । गुरुत्वं स्वाश्रये पतनस्यासमवायि-शब्द अपने कार्य के समवायिकारण ( आकाश ) में रहने से ही असमवायिकारण है, क्योंकि आकाश में रहने वाले शब्द से आकाश में ही शब्दों की उत्पत्ति होती है । संख्या एवं पृथक्त्व ये दोनों ही प्रकार से असमवायिकारण होते हैं, क्योंकि ( कारणगत ) ये दोनों कार्यगत एकत्व एवं पृथक्त्व के कारण है, एवं अपने ही समवायिकारणरूप आश्रय में ही द्वित्व या द्विपृथक्त्व के कारण हैं । बुद्धि प्रभृति इन तो गुणों का निमित्तकारणत्व साधर्म्य है, अर्थात् ये निमित्त-कारण ही होते हैं ( असमवायिकारण भी नहीं ) । संयोग, विभाग, उष्ण स्पर्श, गुरुत्व, द्रवत्व और वेग इन छः गुणों का ' उभयथा कारणत्व ' साधर्म्य है, अर्थात् ये सभी गुण असमवायिकारण और निमित्तकारण दोनों ही होते हैं । भरी और आकाश का संयोग शब्द का असमवायिकारण है, एवं भेरी और आकाश का संयोग शब्द का ही निमित्तकारण है, एवं विभाग में भी ( उभयथा कारणत्व ) है, क्योंकि बाँस के दोनों दलों का विभाग शब्द का निमित्तकारण है, एवं बाँस के दल और आकाश का विभाग शब्द का ही असमवायिकारण भी है । ( कारणगत ) उष्ण स्पर्श ( कार्यगत ) उष्ण स्पर्श का असमवायिकारण हैं, एवं पाकज रूपादि का निमित्त-For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् परत्वापरत्वद्वित्वद्वि पृथक्त्वादीनामकारणत्वम । संयोग विभागशब्दात्म विशेषगुणानां प्रदेशवृत्तित्वम् । २४७ परत्व, अपरत्व, द्वित्व, और द्विपृथक्त्वादि गुण किसी के भी कारण नहीं हैं । संयोग, विभाग, शब्द एवं आत्मा के सभी विशेष गुण ये सभी प्रादेशिक ( अव्याप्यवृत्ति ) हैं । न्यायकन्दली कारणम् । नोदनाभिघातः क्रियोत्पत्तौ निमित्तकारणम् । द्रवत्ववेगयोरपि योज्यम् । परत्वापरत्वादीनामकारणत्वम् । नैतान्यसमवायिकारणं नापि निमित्तकारणम् । द्वित्वद्वि पृथक्त्वा दीनामित्यादिपदेन त्रिपृथक्त्वानां परमाणुपरि-माणपरममहत्परिमाणयोश्च परिग्रहः । संयोगविभागशब्दात्मविशेषगुणानां प्रदेश वृत्तित्वमिति । प्रवेश-वृत्तयोऽव्याप्यवृत्तयः स्वाश्रये वर्त्तन्ते, न वर्त्तन्ते चेत्यर्थः । नन्वेतदयुक्तम्, युगपदेक-स्यैकत्र भावाभावविरोधात् । नानुपपन्नम् प्रमाणेन तथाभावप्रतीतेः । तथा हि-महतो वृक्षस्य पुरुषेण सहाग्रे संयोगो मूले च तदभावः प्रतीयते, मूले वृक्षोप-लम्भेऽपि संयोगस्य सर्वैरनुपलम्भात् । न च मूलाग्रयोरेव संयोगतदभावौ, तत्प्रदेशा-कारण भी है । गुरुत्व अपने आश्रय की पतन क्रिया का असमवायिकारण है, एवं नोदन और अभिघातजनित क्रिया का निमित्तकारण भी है । इसी तरह द्रवत्त्र और वेग में भी विचार करना चाहिए । परत्व एवं अपरत्व प्रभृति चार गुणों का ' अकारणत्व ' साधम्यं है, अर्थात् ये न तो असमवायिकारण हैं और न निमित्तकारण ही ( समवायिकारण तो द्रव्य से भिन्न कोई होता ही नहीं है ) । ' द्वित्वद्विपृथक्त्वादि ' शब्द में प्रयुक्त ' आदि ' पद से त्रिपृथक्त्व, परमाणुओं के परिमाण, एवं परममहत्परिमाण प्रभृति को समझना चाहिए ( अर्थात् ये भी किसी के कारण नहीं होते ) । संयोग, विभाग, शब्द और आत्मा के सभी विशेष गुण इन सबों का ' प्रदेश -वृत्तित्व ' साधर्म्य है । ' प्रदेशवृत्ति ' शब्द का अर्थ है अव्याप्यवृत्ति अर्थात् ये अपने आश्रय ( के किसी अंश ) में रहें भी, एवं अपने आश्रय ( के ही दूसरे किसी अंश में ) न भी रहें । ( प्र ० ) यह तो ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही समय में एक ही आश्रय में एक ही वस्तु रहे भी और न भी रहे, क्योंकि ' रहना ' और ' त रहना ' दोनों परस्पर विरोधी हैं? ( उ ० ) इसमें कुछ भी असङ्गति नहीं है कि एक ही आश्रय में भाव और अभाव की उक्त प्रतीति प्रमाण से उत्पन्न होती है । एक ही महावृक्ष के अग्रभाग के साथ पुरुष के संयोग की प्रतीति होती है, उसी वृक्ष के मूल भाग में उसी पुरुष के संयोग के For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २४८५ न्यायकन्दलीसंवलिप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणसाधम्र्यवैधम्यं-वच्छेदेन वृक्षे एव पुरुषस्य भावाभावप्रतीतेः । यदि प्रदेशस्य संयोगो न प्रदेशिनस्तदा प्रदेशस्यापि स्वप्रदेशापेक्षया प्रदेशित्वान्निष्प्रदेशे परमाणुमात्रे संयोगः स्यात् । तद्वृत्तिस्तु संयोगो न प्रत्यक्ष इति संयोगप्रतीत्यभाव एव पर्यवस्यति । यथा च रूपादिभेदेऽप्येकोऽवयवी न भिद्यते तथा संयोगतदवाभ्यामपि उभयत्रापि तदेक-त्वस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । यद्यप्युभयाश्रयः संयोगस्तयोरुपलब्धावुपलभत एव, तथापि तस्य रूपादिवद् गृह्यमाणाखिलावयवावच्छेदेनानुपलम्भादव्यापकत्वम् । एवं शब्दोऽप्याकाशं न व्याप्नोति तत्रैवास्य देशभेदेनोपलम्भानुपलम्भाभ्यां युगपद्-भावाभावसम्भवात् । बुद्धयादयो ह्यन्तर्बहिश्चोपलम्भानुपलम्भाभ्यामव्यापकाः । कथं तहि धर्माधर्माभ्यामग्न्यादिषु क्रिया, तयोस्तद्देशेऽभावादिति चेन्न तत्रासतोरपि तयोः स्वाश्रयसन्निधिमात्रेण निमित्तत्वान् । यथा वस्त्रस्यैकान्ते चाण्डालस्पर्शोऽ-परान्तसंयुक्तस्य त्रैवर्णिकस्य प्रत्यवायहेतुस्तथेदमपि द्रष्टव्यम् । अभाव की भी प्रतीति होती है । अगर प्रदेशों ( अवयवों ) मे ही संयोग मानें प्रदेशी ( अवयवी ) में संयोग न मानें तो उन प्रदेशों में भी संयोग का मानना सम्भव न होगा, क्योंकि वे प्रदेश भी अपने अवयवों की अपेक्षा अवयवी हैं ही, फलतः अवयवों ( प्रदेशों ) से शून्य परमाणुओं में ही संयोग मानना पड़ेगा । जिससे संयोग का प्रत्यक्ष ही असम्भव हो जायगा, क्योंकि उसका आश्रय परमाणु अतीन्द्रिय है । अतः ( अवयवों में ही संयोग है अवयवियों में नहीं ) इस पक्ष में संयोग का प्रत्यक्ष ही न हो पायेगा । जैसे रूप रसादि के परस्पर भिन्न होने पर भी उनके आश्रय रूप अवयवी परस्पर भिन्न नहीं होते, उसी प्रकार संयोग और संयोगाभाव के आश्रय दो वस्तुओं के आधार होने के कारण ही परस्पर भिन्न नहीं हैं, क्योंकि इन दोनों के आश्रयों में एकता की प्रतीति प्रत्यक्ष प्रमाण से होती है । यद्यपि संयोग अपने प्रतियोगी एवं अनुयोगी दोनों में ही आश्रित है, क्योंकि उसके प्रत्यक्ष के लिए दोनों का प्रत्यक्ष आवश्यक है, तथापि जिस प्रकार रूपादि की उपलब्धि प्रत्यक्ष होनेवाले अवयवी के सभी अवयवों में होती है, संयोग की उपलब्धि उस प्रकार से सभी अवयवों में नहीं होती । अतः संयोग ' अव्यापक ' अर्थात् अव्याप्यवृत्ति है । इसी प्रकार शब्द भी ( अपने आश्रय ) आकाश के समूचे प्रदेश में नहीं रहता है, अतः एक ही समय आकाश में प्रदेश भेद से शब्द की सत्ता और असत्ता दोनों की ही सम्भावना है | ज्ञानादि गुणों की प्रतीति अन्तर्मुखी होती है, बहिर्मुखी नहीं होती, अतः वे भी अव्यापक अर्थात् प्रादेशिक हैं । ( प्र ० ) तो फिर धर्म और अधर्म से वह्नि प्रभृति में क्रिया कैसे होती है? क्योंकि वे तो वहीं नहीं है? ( उ ) क्रिया के प्रदेश में धर्मादि के न रहने पर भी धर्मादि आत्मा में रहते हैं, आत्मा का क्रिया प्रदेश से सान्निध्य है, इसी परम्परा सम्बन्ध के द्वारा धर्मादि क्रिया के कारण हैं । जिस प्रकार कपड़े के एक छोर में चाण्डाल का स्पर्श उसी कपड़े के दूसरे छोर से संयुक्त त्रैवर्णिकों के प्रत्यवाय का कारण होता है, वैसे ही यहां भी समझना चाहिए । For Private And Personal

पृष्ठ 324

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् २४६ शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् । अपाकजरूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणै कपृथक्त्व सांसिद्धिकद्रवत्वगुरुत्व-स्नेहानां यावद्रव्यभावित्वम् । शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वञ्चेति । अवशिष्ट सभी गुण अपने आश्रय के सभी अंशों में रहते हैं । अपाकज रूप, अपाकज रस, अपाकज गन्ध, अपाकज स्पर्श, परिमाण, एकत्व, एकपृथक्त्व, सांसिद्धिक द्रवत्व, गुरुत्व और स्नेह इन दश गुणों का ' यावद्द्रव्यभावित्व ' साधर्म्य है । ' शेष ' अर्थात् कथित अपाकज रूपादि से भिन्न सभी गुणों का ' अयावद्द्रव्य-भावित्व ' साधर्म्य है । न्यायकन्दली शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् । उक्तेभ्यो येऽन्ये ते शेषाः । तेषामाश्रय-व्यापित्वं संयोगादिवदव्यापकं न भवतीत्यर्थः । अपाकजरूपादीनां यावद्द्रव्यभावित्वम् । यावदाश्रयद्रव्यं तावद्रूपादयो विद्यन्ते । पाकजरूपादयः सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यपाकजग्रहणम् । शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वम् । अपाकजरूपादिव्यतिरिक्ता गुणा यावद्द्रव्यं न सन्ति, सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यर्थः । शेष सभी गुणों का ' आश्रयव्यापित्व ' साधर्म्य है । ऊपर जितने भी गुण कहे गये हैं, उनसे भिन्न सभी गुण यहाँ शेष ' शब्द से अभिप्रेत हैं । उन सबों का ' आश्रय-व्यापित्व ' ( साधर्म्य है ), अर्थात् वे संयोगादि गुणों की तरह अव्याप्यवृत्ति नहीं हैं । कथित अपाकज रूपादि गुणों का ' यावद्द्द्रव्यभावित्व ' ( साधर्म्य है ), अर्थात् जब तक आश्रयरूप द्रव्य रहते हैं, तब तक ये अपाकज रूपादि रहते हैं । इसमें ' अपाकज ' पद का उपादान इस लिए किया गया है कि पाकज रूपादि आश्रय के रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं । ' शेष ' गुणो का ' अयावद्द्रव्यभावित्व ' साधर्म्य है । अर्थात् उक्त अपाकज रूपादि से भिन्न जितने भी गुण हैं, वे तब तक नहीं रहते, जब तक उसके आश्रय द्रव्य रहते हैं, किन्तु उनके रहते ही नष्ट हो जाते है । अव प्रत्येक गुण का असाधारण धर्म कहना है, अत: ' रूपादीनाम् ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । रूपमादिर्येषाम् ' इस व्युत्पत्ति से सिद्ध ' रूगदि ' शब्द से युक्त प्रकृत ३२ For Private And Personal

पृष्ठ 325

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २५० न्यायकन्दली संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेरूपादि-भवन्ति । रूपादीनां सर्वेषां गुणानां प्रत्येकमपरसामान्यसम्बन्धाद्रूपादिसंज्ञा रूपादि सभी गुणों के रूपादि नाम इसलिए हैं कि उनमें ( रूपत्वादि ) अपर जातियों का सम्बन्ध है । न्यायकन्दली सम्प्रति प्रत्येकं गुणानां परस्परवैधर्म्यप्रतिपादनार्थमाह-- रूपादीना-मिति । रूपमादिर्येषां तेषामेकैकं प्रत्यपरजाते रूपत्वादिकायाः सम्बन्धा-द्रूपादिसंज्ञा रूपमिति रस इति संज्ञा भवन्ति । रूपत्वाद्यपरसामान्यकृता रूपादिसंज्ञा रूपादीनां प्रत्येकं वैधम्र्म्यम् । रूपत्वसामान्यं नास्तीति केचित्, तदयुक्तम्, नीलपीतादिभेदेषु रूपं रूपमिति प्रत्ययानुवृत्तेः । चक्षुर्ग्राह्यतोपाधिकृता तदनुवृत्तिरिति चेन्न तेषां रूपमित्येवं चक्षुषाऽग्रहणात् । तद्गाह्यतानिमित्तत्वे हि ग्रहणादनन्तरं तथा प्रत्ययः स्यात् । चक्षुर्ग्राह्यता तद्ग्रहणयोग्यता, सा च नीलादिषु त्रिकालावस्थायिनीति चेत्? अस्तु कामम्, किन्त्वेषा यदि प्रतिरूपं व्यावृत्ता, प्रत्ययानुगमो न स्यात्, एकनिमित्ताभावात् । अथानुवृत्ता, संज्ञाभेदमात्रम् । एवं रसादयोऽपि व्याख्याताः । क्य का अर्थ है कि रूपादि गुणों में से प्रत्येक में रूपत्वादि स्वरूप अपर जातियों के सम्बन्ध से रूप, रस आदि संज्ञायें होती । रूपादि नाम ही रूपादि गुणों के असाधारण धर्म हैं, जिनकी मूल हैं रूपत्वादि जातियाँ । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) रूपत्व नाम की कोई जाति नहीं है । ( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं क्योंकि नीलपीतादि विभिन्न रूपों में यह रूप है ' इस एक प्रकार की ( अनुवृत्त) प्रतीतियाँ होती हैं ( प्र ० ) सभी रूप आँख से देखे जाते हैं, इसीसे सभी रूपों में एक आकार की प्रतीति होती है । ( उ ० ) नीलपीतादि में ' यह रूप है ' इस आकार की प्रतीति आँख से नहीं होती है, अगर चक्षु से गृहीत होने के कारण ही नीलादि में ' यह रूप है ' इस प्रकार की प्रतीति हो, तो फिर चक्षु के द्वारा ग्रहण के बाद ही ' यह रूप है ' इस प्रकार की प्रतीति होनी चाहिए । ( प्र ० ) ' चक्षुर्ग्राह्यत्व ' ( चक्षु से गृहीत होने का ) का अर्थ है चक्षु के द्वारा गृहीत होने की स्वरूपयोग्यता, यह तो नीलादि में तीनों कालों में है ही । ( उ ० ) मान लिया कि है, किन्तु यह योग्यता नीलादि प्रत्येक रूप में अगर अलग अलग है तो फिर सभी रूपों में ये रूप हैं ' इस एक आकार की प्रतीति नहीं होगी, क्योंकि उसका कोई एक कारण नहीं है । अगर चक्षुर्ब्राह्यता सभी रूपों में एक है तो फिर जाति को मान लेने में कोई विवाद ही नहीं रह जाता है । इसी प्रकार से रसादि की भी व्याख्या हो जाती है । For Private And Personal

पृष्ठ 326

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 326 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् तत्र रूपं चक्षुर्या पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति २५१ द्रव्याघु-पलम्भकं नयनसहकारि शुक्लाद्यनेकप्रकारं सलिलादिपरमाणुषु नित्यं उनमें चक्षु से ही जिसका ग्रहण हो वही यह ' रूप ' है । पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में रहता है । द्रव्यादि के प्रत्यक्ष के उत्पादन में आँख का सहारा है । यह शुक्लादि भेद से अनेक प्रकार का है । जलादि के परमाणुओं में यह नित्य है, एवं पृथिवी के परमाणु में न्यायकन्दली सर्वपदार्थानामभिव्यक्तिनिमित्तत्वादादौ रूपं निरूपयति- – तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यमिति । तेषां गुणानां मध्ये रूपं चक्षुषैव गृह्यते नेन्द्रियान्तरेण । ननु रूपत्वमपि चक्षुषैव गृह्यते कथमिदं वैधर्म्य रूपस्य? न, गुणेभ्यो वैधर्म्यस्य विवक्षितत्वात् । तथा च प्रकृतेभ्यो निर्द्धारणार्थं तत्रेत्युक्तम् । सामान्यादस्य वैधर्म्यं तु सामान्यवत्त्वमेव । पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति । पृथिव्युदकज्वलनेष्वेव वर्त्तते । द्रव्याद्युपलम्भकम् । यस्मिन्नाश्रये वर्त्तते तस्य द्रव्यस्य तद्गतानां च गुणकर्मसामान्यानामुपलम्भकम् । नयनसहकारि । स्वगतं रूपं चक्षुषो विषय-ग्रहणे सहकारि । शुक्लाद्यनेकप्रकारम् । शुक्लादयोऽनेके प्रकारा यस्य तत् तथाविधम् । सलिलादिपरमाणुषु नित्यम् । सलिलपरमाणुषु तेजः परमाणुषु च रूप सभी वस्तुओं के प्रत्यक्ष में किसी न किसी प्रकार से अवश्य ही कारण है, अतः ‘ तत्र रूपं चक्षुर्ग्राह्यम् ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा गुणों में सबसे पहिले रूप का ही निरूपण करते हैं । इन सभी गुणों में रूप चक्षु के ही द्वारा गृहीत होता है और किसी भी इन्द्रिय के द्वारा नहीं । ( प्र ० ) रूपत्व भी तो केवल चक्षु से ही गृहीत होता है तो फिर ' चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व ' रूपों का असाधारण धर्म कैसे है? ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि और गुणों की ही अपेक्षा चक्षुर्ग्राह्यत्व को रूप का असाधारण धर्म कहना यहाँ अभिप्रेत है, सभी पदार्थों की अपेक्षा नहीं । इसी ' निर्द्धारण ' को ही समझाने के लिए ' तत्र ’ शब्द का प्रयोग किया गया है । रूपों में जाति का रहना ही ( रूपत्वादि ) जातियों से रूप के भिन्न होने का प्रयोजक है ( क्योंकि सामान्य में सामान्य नहीं रह सकता ) । ' पृथिव्युदकज्वलनवृत्ति ' अर्थात् रूप पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहता है । ' द्रव्याद्युपलम्भकम् ' अर्थात् रूप जिस आश्रय में रहता है उस द्रव्य का, एवं उस आश्रय द्रव्य में रहनेवाले अन्य गुणों, क्रियाओं और सामान्यों के भी प्रत्यक्ष का प्रयोजक है । ' नयनसहकारि ' चक्षुरूपद्रव्य में रहनेवाला रूप चक्षु से होनेवाले सभी प्रत्यक्षों का सहकारिकारण है । शुक्लाद्यनेकप्रकारम् ' ' शुक्लादयो s ने के प्रकाश यस्य ' इस व्युत्पत्ति के द्वारा जिसके शुक्लादि अनेक प्रकार हों वही शुक्लाद्यनेकप्रकार ' है ( अर्थात् शुक्लादि भेद से रूप अनेक प्रकार के हैं ) । ' सलिलादिपरमाणुषु नित्यम् ' जल के और तेज के For Private And Personal

पृष्ठ 327

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २५२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् पार्थिव परमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि माश्रयविनाशादेव विनश्यतीति । [ गुणेरूपादि-सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वक-अग्नि के संयोग से उसका विनाश होता है । जन्य द्रव्यों में उनके अवयवों में रहनेवाले रूप से यह उत्पन्न होता है, एवं आश्रय के विनाश से उसका विनाश होता है । न्यायकन्दली नित्यम् । पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि | अग्निसंयोगो विनाशकः पार्थिव-परमाणुरूपस्येति च वक्ष्यामः । सर्वकार्य द्रव्येषु कारणगुणपूर्वकम् । कार्यद्रव्यगतं रूपं स्वाश्रयसमवायिकारणरूपपूर्वकम् । आश्रयविनाशादेव विनश्यति । कार्य-रूपविनाशस्याश्रयविनाश एव हेतुः । आश्रयविनाशाद्रूपस्य विनाश इति न मृष्यामहे सहैव रूपद्रव्ययो-विनाशप्रतीतेरिति चेन्न कारणाभावात् । मुद्गराभिघातात् तावदवयवक्रिया-विभागादिक्रमेण द्रव्यारम्भकसंयोगनिवत्तौ तदारब्धस्य द्रव्यस्य विनाशः कारणविनाशात्, तद्तरूपविनाशे तु किं कारणम्? यदि ह्यकारणस्या-t यवयवसंयोगस्य विनाशाद्रूपविनाशः, कपालरूपाण्यपि ततो विनश्येयु-परमाणुओं के रूप नित्य हैं । एवं ' पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि ' अर्थात् पार्थिव परमाणुओं में रहनेवाले रूपों का अग्नि के संयोग से नाश होता है, यह हम आगे कहेंगे । ' सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वकम् ' अर्थात् कार्य द्रव्यों में रहनेवाले सभी रूप अपने आश्रय के समवायिकारणों में रहनेवाले रूपों से ही उत्पन्न होते हैं । आश्रय विनाशादेव विनश्यति अर्थात् उत्पन्न होनेवाले सभी रूपों का नाश अपने आश्रयों के नाश से ही होता है । ( प्र ० ) हम यह नहीं मानते कि रूप का आश्रय के नाश से होता है, क्योंकि रूप के नाश एवं उसके आश्रयीभूत द्रव्य के नाश दोनों की प्रतीति साथ ही होती है | ( उ ० ) नहीं, क्योंकि आश्रयीभूत द्रव्य के नाश के साथ उसमें रहनेवाले रूप के नाश का कारण ही ( उस समय ) नहीं है । मुद्गरादि के आघात से कार्य द्रव्य के अवयवों में क्रिया, क्रिया से अवयवों का विभाग, इस क्रम के अनुसार द्रव्य के अवयवों के उत्पादक संयोग का विनाश हो जाने पर अवयवी द्रव्य का विनाश होता है । किन्तु तद्गत रूप का विनाश किससे मानेंगे? आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों का संयोग रूप का कारण नहीं है । अकारणीभूत इस संयोग के नाश को ही अगर रूपनाश का कारण मानें तो फिर उक्त संयोग के नाश से कर्पालादि अवयवों में रहनेवाले रूप का भी नाश मानना पड़ेगा, क्योंकि अवयवों का संयोग जैसे कि अवयवी के रूप का कारण नहीं है, वैसे ही कपालादिगत रूप का भी कारण नहीं है । अगर अवयवी में For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 328 का मूल पृष्ठ
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra भाषानुवादसहितम् प्रकरणम् ]. न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २५३ अभिन्न हैं, अतः जो रविशेषात् । तस्मात् पूर्वं द्रव्यस्य विनाशस्तदनु रूपस्य, आशुभावात् क्रमस्या-ग्रहणमिति युक्तमुत्पश्यामः । ये तु रूपद्रव्ययोस्तादात्म्यमिच्छन्तो द्रव्यकारणमेव रूपस्य कारण-माहस्ते इदं प्रष्टव्याः - - किं परमाणुरूपं रूपान्तरमारभते न वा? आरंभ-माणमपि किं स्वात्मन्यारभते? किं वा स्वाश्रये परमाणौ? यदि नारभते? यदि वा स्वात्मनि स्वाश्रये चारभते? द्वयणुके रूपानुत्पत्तौ तत्पूर्वकं जगदरूपं स्यात् । अथ तद् द्व्यणुके आरभते, अविद्यमानस्य स्वाश्रयत्वायोगादुत्पन्ने द्वयणुके पश्चात्तत्र रूपोत्पत्तिरित्यवश्यमभ्युपेतव्यम्, निराश्रयस्य कार्यस्यानुत्पादात् । तथा सति तादा-त्म्यं कुतः? पूर्वापरकालभावात् । किञ्चावस्थित एव घटे रूपादयो वह्निसंयोगाद्वि-नश्यन्ति तथा सति जायन्ते चेति भवतामभ्युपगमः, यस्य चोत्पत्तौ यस्यानुत्पत्ति-रहनेवाले रूप के प्रति कारण न होते हुए भी अवयवों का संयोग अपने नाश से अवयवी में रहनेवाले रूप का नाश कर सकता है, तो फिर वही संयोग कपालादि अवयवों में रहनेवाले रूप का नाश क्यों नहीं कर सकता? अतः हम यही युक्त समझते हैं कि पहिले द्रव्य का नाश होता है, उसके बाद तद्गत गुण का नाश होता | द्रव्य के एवं तद्गत गुण के नाश का यह क्रम मालूम इसलिए नहीं पड़ता है कि दोनों के मध्य में अत्यन्त थोड़े समय का व्यवधान रहता है । किसी सम्प्रदाय का मत है कि ( प्र ० ) द्रव्य एवं गुण दोनों द्रव्य का कारण है वही गुण का भी कारण है । ( उ ० ) उनसे यह पूछना चाहिए कि परमाणुओं के रूप किसी दूसरे रूप को उत्पन्न करते हैं या नहीं? अगर उत्पन्न करते हैं तो कहाँ? अपने में ही? या अपने आश्रय परमाणु में? अगर यह मान लें कि परमाणु के रूप किसी भी दूसरे रूप को उत्पन्न नहीं करते हैं या फिर यही मान लें कि परमाणु का रूप अपने आश्रय में एवं अपने में भी रूप को उत्पन्न करते हैं — हर हालत में द्वयणुक में रूप की उत्पत्ति न हो सकेगी, जिससे समूचे जगत् कोही रूप शून्य मानना पड़ेगा । अगर परमाणुओं के रूप से द्वणुक में रूप की उत्पत्ति मानें तो फिर द्वयणुक में रूप की उत्पत्ति के पहिले द्वणुक की उत्पत्ति माननी ही होगी । अतः यही कहना पड़ेगा कि द्वयणुक के उत्पन्न हो जाने पर पीछे उसमें रूपादि की उत्पत्ति होती है । क्योंकि बिना आश्रय के कार्य की उत्पत्ति नहीं होती । अगर यह स्थिति है तो फिर रूप ( गुण ) और द्रव्य का अभेद कैसा १ क्योंकि द्रव्य पहिले उत्पन्न होता है और रूप पीछे | और भी बात है, वह्नि के संयोग से घटगत रूप का नाश घट के रहते ही हो जाता है, अतः यही मानना पड़ेगा कि अग्नि के संयोग से ही उसी घट में दूसरे रूप की उत्पत्ति होती है । अतः यही रीति माननी होगी कि जिसकी उत्पत्ति से

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २५४ रसो निमित्तं न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणस्पर्श-रसनग्राह्यः पृथिव्युदकवृत्तिर्जीवन पुष्टिबलारोग्य-रसन सहकारी मधुगम्ललवणतिक्तकटुकषाय मेदभिन्नः । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो रूपवत् । रसनेन्द्रिय से गृहीत होनेवाला ( गुण ही ) ' रस ' है । वह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में ही रहता है, एवं जीवन, पुष्टि, बल और आरोग्य का कारण है । प्रत्यक्ष के उत्पादन में रसनेन्द्रिय का सहायक है । वह मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त भेद से छः प्रकार का है । नित्यत्व एवं अनित्यत्व के प्रसङ्ग में इसकी सभी बातें रूप की तरह है । न्यायकन्दली यन्निवृत्तौ चानिवृत्तिर्न तयोस्तादात्म्यमिति प्रक्रियेयम् । न चात्यन्तभेदे पृथगुपलम्भ प्रसङ्गः, सर्वदा रूपस्य द्रव्याश्रितत्वात् । एतदेव कथम्? वस्तुस्वाभाव्यादिति कृतं गुरुप्रतिकूलवादेन । सम्प्रति बाहाँकै केन्द्रियग्राह्यस्य प्रत्यक्षद्रव्यवृत्तविशेषगुणस्य निरूपण-प्रसङ्गेन रसगन्धयोर्व्याख्यातव्ययोरुभयद्रव्यवृत्तित्वविशेषेणादौ रूपं व्याख्याय रसं व्याचष्टे - रसो रसनग्राह्य इति । गुणेषु मध्ये रस एव रसनग्राह्यो रसन-ग्राह्य एत रसः । पृथिव्युदक्वृत्तिः । पृथिव्युदकयोरेव वर्त्तते । जीवनपुष्टिबला-ही जिसकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं हो जाती एवं जिसके विनाश से हो जिसका विनाश सिद्ध नहीं हो जाता वे दोनों अभिन्न नहीं हो सकते । ( प्र ० ) अगर रूप और द्रव्य अत्यन्त भिन्न हैं तो द्रव्य को छोड़ कर भी रूप की प्रतीति होनी चाहिए । ( उ ० ) नहीं, क्योंकि रूप सभी कालों में द्रव्य में ही रहता है । ( प्र ० ) यहीं क्यों होता है? ( उ ० ) यह तो वस्तुओं का स्वभाव है । गुरुचरणों के विरुद्ध व्यर्थ की बातों को बढ़ाना व्यर्थ है । अब एक ही बाह्य इन्द्रिय से गृहीत होनेवाले एवं प्रत्यक्ष योग्य द्रव्यों में ही रहने वाले गुणों का निरूपण करना है । इस प्रसङ्ग में रस और गन्ध इन दोनों की व्याख्या समान रूप से प्राप्त हो जाती है, किन्तु इन दोनों में गन्ध एक ही द्रव्य में रहता है और रस दो द्रव्यों में, इस विशेष के कारण रूप के निरूपण के बाद और गन्ध के निरूपण से पहिले ' रसो रसनग्राह्य ', इत्यादि से रस का निरूपण करते हैं । गुणों में से केवल रस ही रसनेन्द्रिय से गृहीत होता है, अतः रसनेन्द्रिय से गृहीत होनेवाला गुण ही रस है । पृथिव्युदकवृत्तिः ' अर्थात् यह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में रहता है । ' जीवनबलारोग्यनिमित्तम् ' प्राण के धारण को ' जीवन ' कहते हैं । शरीर के अवयवों की वृद्धि ही ' पुष्टि ' है । विशेष प्रकार के उत्साह को ' बल ' कहते For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् २५५ गन्धो घाणग्राह्यः पृथिवीवृत्तिर्घाण सहकारी सुरभिरसुरभिश्च । अस्यापि पूर्ववदुत्पश्यादयो व्याख्याताः । जिस गुण का प्रत्यक्ष घ्राणेन्द्रिय से हो वही ' गन्ध ' है । वह केवल पृथिवी में ही रहता है । ( प्रत्यक्ष के उत्पादन में ) वह घ्राण का सहायक है । सुरभि एवं असुरभि भेद से यह दो प्रकार का है । इसकी उत्पत्ति और विनाश प्रभृति पहिले की तरह जानना चाहिए । न्यायकन्दली रोग्यनिमित्तम् । जीवनं प्राणधारणम्, पुष्टिरवयवोपचयः, बलमुत्साहविशेषः, आरोग्यं रोगाभावः, एषां रसो निमित्तम् । एतच्च सर्वं वैद्यशास्त्रादवगन्तव्यम् । रसन सहकारी । स्वगतो रसो रसनस्य बाह्यरसोपलम्भे सहकारी । मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायभेदभिन्नः । मधुरादिभेदेन भिन्नः षट्प्रकार इत्यर्थः । तस्य च नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो रूपवत् । यथा रूपं पार्थिवपरमाणुष्वग्नि-संयोगादुत्पत्तिविनाशवत् सलिलपरमाणुषु नित्यं कार्ये कारणगुणपूर्वकमाश्रम-विनाशाद्विनश्यति, तथा रसोऽपि । गन्धो घ्राणग्राह्यः । गन्ध एव प्राणग्राह्यो घ्राणग्राह्य एव गन्धः । ननु कथमयं नियमः? स्वभावनियमात् । ईदृशो गन्धस्य स्वभावो यदयमेव घ्राणेनैकेन गृह्यते नान्यः, दृष्टानुमितानां नियोगप्रतिषेधाभावात् । पृथिवीवृत्तिः । हैं । रोगों का अभाव हो ' आरोग्य ' है । रस इन सबों का कारण है । ये सभी बातें आयुर्वेद से जाननी चाहिए । ' रमन सहकारी ' अर्थात् रसनेन्द्रिय रूप द्रव्य में रहने वाला रस रसनेन्द्रिय के द्वारा होनेवाले रस के बाह्य प्रत्यक्ष में सहकारी कारण हैं । ' मधुरा-म्ललवणकटुकषायादिभेदभिन्नः ' अर्थात् मधुरादि भेदों से विभक्त होकर वह छः प्रकार का है । रस के नित्यश्व एवं अनित्यत्व की निष्पत्ति रूप की तरह जाननी चाहिए, अर्थात् जिस प्रकार से रूप पार्थिव परमाणुओं में अग्निसंयोग से उत्पन्न भी होता हैं और नष्ट भी होता है एवं ( रूप ) जलादि परमाणुओं में नित्य है और कार्य द्रव्यों में कारण के गुणों से उत्पन्न होता है, एवं आश्रय के विनाश से नाश को प्राप्त होता है, उसी प्रकार से रस के प्रसङ्ग में भी व्यवस्था समझनी चाहिए । ' गन्धो घ्राणग्राह्य: ' ( उक्त गुणों में से ) केवल गन्ध का ही ग्रहण घ्राणेन्द्रिय से होता है, अतः घ्राण से जिस गुण का प्रत्यक्ष हो वही ' गन्ध ' है । ( प्र ० ) ( गन्ध का ही प्रत्यक्ष घ्राण से होता है ) यह नियम क्यों? ( उ ० ) स्वाभाविक नियम के अनुसार गन्ध का ही यह स्वभाव निर्णीत होता है कि गुणों में से केवल वही घ्राणे-न्द्रिय के द्वारा गृहीत होता है कोई और गुण नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा For Private And Personal