प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 331–340
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 331–340
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २५६ सहकारी न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यः [ गुणस्पर्श-क्षित्युदकज्वलन पवनवृत्तिस्त्वक्-रूपानुविधायी शीतोष्णनुष्णाशीतभेदात् त्रिविधः । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववत् । त्वगिन्द्रिय से गृहीत होनेवाला गुण ही ' स्पर्श ' है । यह पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों में रहता है । स्पर्श त्वगिन्द्रिय ( से प्रत्यक्ष के उत्पादन में उसका ) सहायक है । रूप के आश्रयों में वह अवश्य ही रहता है । यह शीत, उष्ण और अनुष्णशीत भेद से तीन प्रकार का है । इसके नित्यत्व और अनित्यत्व की रीति पहिले की तरह जाननी चाहिए । न्यायकन्दली पृथिव्यामेव वर्त्तते नान्यत्र । घ्राणसहकारी । स्वगतो गन्धो घ्राणस्य सहकारी । सुरभिरसुरभिश्चेति भेदः । अस्यापि पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः । यथा रसः पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगादुत्पत्तिविनाशवान् कार्ये कारणगुणपूर्वक आश्रय-विनाशाद्विनश्यति तथा गन्धोऽपि । नित्यत्वं पुनरस्य नास्त्येव । स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यः । त्वचि स्थितमिन्द्रियं त्वगिन्द्रियम् तेनेव स्पर्शो गृह्यते नान्येन । क्षित्युदमकज्वलनपवनवृत्तिः । एतेष्वेव वृत्तिरेव । त्वक्-सहकारी | स्पर्शस्त्वगिन्द्रियस्य विषयग्रहणसहकारी । रूपानुविधायी रूपमनु-विधातुमनुगन्तु शीलमस्य, यत्र रूपं नियमेन तस्य सद्भावात् । शीतोष्णा-सिद्ध विषयों में नियोग या प्रतिषेध नहीं किया जा सकता । ' पृथिवीवृत्तिः ' अर्थात् गन्ध पृथिवी में ही रहता है और किसी द्रव्य में नहीं । इसके सुरभि ( सुगन्ध ) एवं असुरभि ( दुर्गन्ध ) दो भेद हैं । ' अस्यापि पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः ' अर्थात् जिस प्रकार पार्थिव परमाणुओं के रस की उत्पत्ति और विनाश दोनों ही अग्नि के संयोग से होते हैं एवं कार्य द्रव्यों में वे कारणगत गुणों से उत्पन्न होते हैं, एवं आश्रय के विनाश से विनष्ट होते हैं उसी प्रकार से गन्ध में भी समझना चाहिए । गन्ध नित्य होता ही नहीं । त्वचा में रहनेवाली इन्द्रिय ही ' त्वगिन्द्रिय ' है । स्पर्श का प्रत्यक्ष इसी से होता है, और किसी इन्द्रिय से नहीं । क्षित्युदकज्वलनपवनवृत्तिः ' अर्थात् पृथिवी, जल तेज और वायु इन चार द्रव्यों में वह रहता है और अवश्य रहता है । ' त्वक्सहकारी ' ( स्वगिन्द्रिय में रहनेवाला स ) स्वगिन्द्रिय के द्वारा स्पर्श के प्रत्यक्ष में सहायक है । ' रूपानुविधायी ' ' रूपमनुविधातुं शीलमस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त वाक्य का यह अभिप्राय है कि स्पर्श रूपानुगमनशील है, अर्थात् जहाँ रूप रहता है वहाँ स्पर्श भी अवश्य ही रहता हैं । शीत, उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से स्पर्श तीन प्रकार का है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ३३ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् २५७ प्रशस्तपादभाष्यम् For Private And Personal पार्थिवपरमाणुरूपादीनां पाकजोत्पत्तिविधानम् । घटादे -रामद्रव्यस्याग्निना सम्बद्धस्याग्न्यभिघातान्नोदनाद्वा तदारम्भकेष्वणुपु पार्थिव परमाणुओं के रूपादि की पाक से उत्पत्ति की रीति ( कहते हैं ) | घटादि कच्चे द्रव्यों के उत्पादक परमाणुओं के साथ अग्नि का ( अभिघात या नोदन नाम का ) संयोग होता है । उक्त परमाणुओं के साथ न्यायकन्दली नुष्णाशीतभेदात् त्रिविधः । काठिन्यप्रशिथिलादयस्तु संयोगविशेषा न स्पर्शान्तरम्, उभययेन्द्रियग्राह्यत्वात् । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववदिति । व्यवहितस्य रसस्य ग्रहणं न गन्धस्य, तस्य नित्यत्वाभावात् । पार्थिवपरमाणुरूपादीनामुत्पत्तिविनाशनिरूपणार्थमाह-- पार्थिवपरमाणुरूपा-दीनामिति । यद्यपि परमाणव एव पृथिवी, तथापि ते कार्यरूपपृथिव्य-पेक्षया पार्थिवा उच्यन्ते । पृथिव्या इमे कारणं परमाणवः पार्थिवपरमाणवः, तेषां ये रूपादयस्तेषां पाकजानामुत्पत्तविधानं प्रकारः कथ्यते । नन्वेवं सति श्यामादिविनाशनिरूपणं न प्रतिज्ञातं स्यात्, नैवम् यकारशब्देन तस्यावबोधात् । यथा हि रूपादीनां पाकादुत्पत्तिप्रकारः । यत्र पूर्वेषां विनाशादपरेषमुत्पादस्तमेव प्रकारं दर्शयति - घटादेरामद्रव्यस्येत्यादिना आदिशब्देन शरावादयो गृह्यन्ते । कठिनता और कोमलता नाम के कोई अतिरिक्त स्पर्श नहीं हैं वे विशेष प्रकार के संयोग ही है, क्योंकि आँख और त्वचा दोनों इन्द्रियों से इनका प्रत्यक्ष होता है । ' अस्यापि नित्यत्वानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववत् ' इस वाक्य में ' पूर्व ' शब्द से ठीक पहिले कहा गया गन्ध अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि गन्ध नित्य है ही नहीं । किन्तु गन्ध से पहिले कहे हुए रस का ग्रहण है ( जो नित्य और अनित्य दोनों प्रकार का होता है ) । ' पार्थिव परमाणुरूपादीनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ पार्थिव परमाणुओं के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश का निरूपण करने के लिए है । पृथिवी के परमाणु यद्यपि स्वयं ही पृथिवी है, फिर भी ' पृथिव्या इमे कारणं परमाणवः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कार्यरूप पृथिवी की अपेक्षा ये परमाणु भी ' पार्थिव ' कहलाते हैं । पार्थिव परमाणुओं के जो ' रूपादि ' अर्थात् पाकजरूपादि उनकी जो उत्पत्ति उसका ' विधान ' अर्थात् प्रकार कहते हैं । ( प्र ० > इस प्रकार की व्याख्या में ( कच्चे घटादि के ) श्यामादि रूपों का विनाश प्रतिज्ञा के अन्दर नहीं आवेगा? ( उ ० ) ( उक्त प्रतिज्ञा वाक्य में ) ' प्रकार ' शब्द के रहने से ( उस प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा ) रूपादि के विनाश का भी बोध हो जायगा । अर्थात् पाक से रूपादि की उत्पत्ति के जिस प्रकार में रूपादि के विनाश से दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है, वही ' प्रकार ' ' घटादेरामद्रव्यस्य ' इत्यादि से कहते हैं ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २५८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणरूपादीनां पाकजोत्पत्ति ' प्रशस्तपादभाष्यम् कर्माण्युत्पद्यते तेभ्यो विभागा विभागेभ्यः संयोगविनाशाः संयोग-विनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति । तस्मिन् विनष्टे स्वतन्त्रेषु परमाणुष्वसंयोगादौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां विनाशः पुनरन्यस्मादग्निसं-योगादौयापेक्षात् पाकजा जायन्ते । अग्नि के उस नोदन या अभिघात से उनमें क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । उन क्रियाओं से परमाणुओं में विभाग होते हैं । इन विभागों से परमाणुओं के परस्पर के सारे संयोग टूट जाते हैं । संयोग के इन विनाशों से घटादि द्रव्यों का विनाश हो जाता है । उनके विनष्ट हो जाने के बाद परस्पर अलग हुए उन परमाणुओं में उष्णता और अग्नि के संयोग से पाकज रूपादि की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली आमद्रव्यस्येत्यपक्वद्रव्यस्येत्यर्थः । पाकार्थमग्निना सम्बद्धस्य परमाणुषु कर्माण्यु-त्पद्यन्ते, आमद्रव्यस्य घटादेः संयोगिनोऽप्युदकपरमाणवः सन्ति, तन्निवृत्त्यर्थमाह-तदारम्भकेष्विति । तस्य घटादेरारम्भकेष्वित्यर्थः । घटाद्यारम्भकाश्च परमा-णवः पारम्पर्येण कर्मणां कारणमित्याह - अग्न्यभिघातान्नोननाद्वेति । पार्थिवस्य परमाणोरग्निनाऽभिघातो नोदनं वा संयोगविशेषः, स च कर्माधिकारे वक्ष्यते । तेभ्यो विभागा विभागेभ्यः संयोगविनाशाः संयोगविनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति, तेभ्यः कर्मभ्यः परमाणूनां विभागा विभागेभ्यो द्वयणुकलक्षणं कार्यद्रव्यं विनश्यति । तस्मिन् विनष्टे स्वतन्त्रेषु परमाणुष्वग्निसंयोगादग्नि-( घटादिपद में प्रयुक्त ) ' आदि ' शब्द से शराव प्रभृति द्रव्यों को समझना चाहिए । ' आमद्रव्य ' का अर्थ है बिना पका हुआ कच्चा द्रव्य । पाक के लिए अग्नि के साथ सम्बद्ध परमाणुओं में क्रिया उत्पन्न होती हैं, किन्तु घटादि कच्चे द्रव्यों में तो जलादि के परमाणु भी सम्बद्ध हैं, किन्तु उनके परमाणुओं में पाक इष्ट नहीं है, अतः उनको हटाने के लिए ' तदारम्भकेषु ' यह वाक्य दिया गया है । ' तस्य ' शब्द के ' तत् ' शब्द से घटादि द्रव्य अभिप्रेत हैं । उनके आरम्भक अर्थात् उत्पादक परमाणुओं में । ' अग्न्यभिघाता-न्नोदनाद्वा ' इत्यादि से यह कहते हैं कि घटादि के उत्पादक परमाणु भी परम्परा से उक्त क्रिया के कारण हैं । पार्थिव परमाणु के साथ अग्नि का नोदन या अभिघात नाम का संयोग ( होता है ) इसकी बातें आगे कर्मपदार्थ - निरूपण में कहेंगे । ' तेभ्यो विभागः । विभागेभ्यः संयोगविनाशः, संयोगविनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति ' अर्थात् उन क्रियाओं से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं, उन विभागों से संयोगों के नाश उत्पन्न होते हैं, संयोग के उन विनाशों से द्वणुक रूप कार्य द्रव्यों का नाश होता है । ' तस्मिन् विनष्टे स्वतन्त्रेष्वग्नि-For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २५६ गौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां पूर्वरूपरसगन्धस्पर्शानां विनाशः । पुनरन्यस्मादग्नि-संयोगात् पाकजा जायन्ते । स्वतन्त्रेषु परमाणुषु पाकजोत्पत्तौ कार्यानवरुद्ध एव द्रव्ये सर्वत्र रूपाद्युत्पत्तिदर्शनं प्रमाणम् । परमाणुरूपादयः कार्यानवरुद्धेष्वेव द्रव्येषु भवन्ति, आरभ्यमाणरूपादित्वात् तन्त्वादिरूपवत् । पूर्वरूपादिविनाशेऽपि रूपान्तरोत्पत्तिःप्रमाणम् । रूपादिमति रूपाद्यन्तरारम्भासम्भवाद् रक्तादि-रूपादयो रूपादिमत्सु नारभ्यन्ते रूपादित्वात्, तन्त्वादिरूपादिवत् । एवं परमाणुषु पूर्वरूपादिविनाशे सिद्धे वह्निसंयोग एव विनाशहेतुरवतिष्ठते, तद्भावित्वा-दन्यस्यासम्भवात् । न च यदेवं रूपादीनां विनाशकारणं तदेव तेषामुत्पत्तिकारण-मित्यवगन्तव्यम्, तन्तुरूपादीनामन्यत उत्पत्तेरन्यतरच विनाशदर्शनात् । तेन परमाणुषु रूपादीनामन्यस्मादग्निसंयोगादुत्पत्तिरन्यस्मादग्निसंयोगाद्विनाश इत्य-संयोगादौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां विनाशः, पुनरन्यस्मादग्निसंयोगादोपण्यापेक्षात्पाकजा जायन्ते ' ' स्वतन्त्र ' अर्थात् परस्पर असम्बद्ध परमाणुओं में पाक से विलक्षण रूपादि की उत्पत्ति होती है । जिस समय द्रव्य दूसरे द्रव्य के उत्पादनकार्य से विरत रहता है, उसी समय उसमें गुण की उत्पत्ति होती है । पटरूप कार्य के उत्पादन में लगने से पहिले ही तन्तुओं में रूपादि की उत्पत्ति होती है, अतः यही प्रामाणिक है कि द्वयणुक रूप कार्य में व्याप्त होने से पहिले पार्थिव परमाणुओं में भी रूपादि की उत्पत्ति होती है, क्योंकि ये भी उत्पत्तिशील रूपादि ही हैं । एवं यह भी प्रमाण से सिद्ध है कि एक आश्रय में दूसरे रूपादि की उत्पत्ति तब तक नहीं हो सकती, जब तक उसके पहिले के रूपादि का नाश न हो जाय । अतः यह अनुमान ठीक है कि पाक से रक्त रूपादि की उत्पत्ति रूप से युक्त किसी द्रव्य में नहीं होती है, जैसे कि तन्तु प्रभृति के रूपादि किसी रूपयुक्त द्रव्य में नहीं उत्पन्न होते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि परमाणुओं क पहिले रूपादि का नाश हो जाने पर पाक से उनमें दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । एवं रूप का उक्त नाश भी अग्निसंयोग के रहते ही होता है एवं नहीं रहने से नहीं होता है, अतः पाकज रूपादि की उत्पत्ति की तरह उस आश्रय में रहनेवाले अपाकज ) रूपादि के नाश का भी अग्निसंयोग ही कारण है । किन्तु रूप का नाश एवं रूप की उत्पत्ति दोनों एक कारण से सम्भव नहीं हैं, क्योंकि तन्तु प्रभृति के रूपों का नाश एवं उत्पत्ति विभिन्न कारणों से देखे जाते हैं । इससे यह फलितार्थ निकलता है कि अग्नि के एक संयोग से पहिले के रूपादि का नाश होता है, एवं अग्नि के हो दूसरे संयोग से दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार तन्तु प्रभृति के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश दोनों एक सामग्री से इसलिए नहीं होते कि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २६० तदनन्तरं न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेरूपादीनां पाकजोत्पत्ति-प्रशस्तपादभाष्यम् भोगिनामापेक्षादात्मानुसंयोगादुत्पन्नपाक जेष्वणुषु कर्मोत्पत्तौ तेषां परस्परसंयोगाद् द्व्यणुकादिक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते । तत्र च कारणगुणप्रक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः । इसके बाद भोग करनेवाले आत्मा के अदृष्ट, एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन दोनों से पाकजनित विलक्षण रूपादि से युक्त परमाणुओं में परस्पर संयोग उत्पन्न होते हैं । इन संयोगों से द्वयणुकादि की उत्पत्ति के क्रम से ( घटादि ) स्थूल द्रव्य की उत्पत्ति होती है । फिर इस ( नये ) कार्य - द्रव्य में स्वाभाविक कारणगुण के क्रम से रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दलो वसीयते । परमाणुरूपादिविनाशोत्पादावेककारणकौ न भवतः, रूपादिविनाशो-त्पादत्वात् तन्तुरूपादिविनाशोत्पादवत् । तदनन्तरमित्यादि । उत्पन्नेषु घटादिषु येषां तत्साध्ययोः सुखदुःखयो-रनुभवो भोगो भविष्यति ते भोगिनः, तेषामदृष्टं धर्माधर्मलक्षणम्, तमपेक्षमाणादात्मपरमाणु संयोगादुत्पन्नपाकजरूपरसगन्धस्पर्शेषु परमाणुषु कर्माण्यु-पद्यन्ते । तेभ्यस्तेषां परमाणूनां परस्परसंयोगास्ततश्च द्वयणुकं त्रिभिद्वर्यणुकैस्त्र्यणुक मित्यनेन क्रमेण कार्यद्रव्यं घटादिकमुत्पद्यत इति । तत्र च कारणगुणप्रक्रमेण रूपाद्युत्पतिः । परमाणुद्वयरूपाभ्यां द्वणुके रूपं द्वयणुकरूपेभ्यश्च त्र्यणुकरूपमित्यनेन क्रमेण घटादौ रूपरसगन्धस्पर्शोत्पत्तिः! वे भी उत्पत्ति और विनाश हैं, उसी प्रकार उसी हेतु से यह भी निष्पन्न होता है कि परमाणुओं के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश दोनों ही एक सामग्री से उत्पन्न नहीं होते । ' तदनन्तरम् ' अर्थात् घटादि द्रव्यों के उत्पन्न हो जाने के बाद उन घटादि द्रव्यों से जिन जीवों को सुख या दुःख का अनुभव रूप ' भोग ' होगा, वे ही जोव ( भोगिनाम् ' इस पद के ) ' भोग ' शब्द से अभिप्रेत हैं । उन्हीं के अदृष्ट अर्थात् धर्म और अधर्म एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन सबों से पाकज रूपादि से युक्त परमाणुओं में क्रियायें उत्पन्न होती हैं । इन क्रियाओं से उन परमाणुओं में हैं । उक्त संयोग एवं दो परमाणुओं से द्वणुक, एवं तीन परस्पर संयोग उत्पन्न होते द्वयणुकों से ' त्र्यणुक ' इसी क्रम से ( अभिनव ) घटादि द्रव्यों की उत्पत्ति होती है । ' उसमें ' अर्थात् द्वणुक में ' कारणगुणक्रम ' से अर्थात् परमाणुओं के ( पाकज रूपों से ( द्वणुकों में ) रूपों की उत्पत्ति होती है । अर्थात् दोनों परमाणुओं के दोनों रूपों से घणुक में एक रूप की उत्पत्ति होती है । एवं तीन द्वणुकों के तीनों रूपों से त्र्यणुक में एक For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २६१ सङ्ख्यादीनां न पाकजत्वं तेषामविलक्षणत्वात् । ननु स्पर्शस्यापि वैलक्षण्यं न दृश्यते, सत्यम् तथाप्यस्य पाकजत्वमनुमानात् । तच्च पृथिव्यधिकारे दर्शितम् । पाकजोत्पत्यनन्तरं परमाणुषु क्रिया, न तु श्यामादिनिवृत्तित्समकालमेवेति रूपादि-सत्येव द्रव्ये रूपादिसत्कार्य द्रव्यारम्भहेतुभूतक्रियादर्शनाद् दृश्यते । परमाणुक्रिया रूपादिमत्येव जायते रूपादिमत्कार्यारम्भहेतुभूतक्रियात्वात् पटारम्भकसंयोगो-त्पादकतन्तुक्रियावत् । अथ कथं कार्यद्रव्ये एव रूपादीनामग्निसंयोगादुत्पादविनाशौ न कल्प्येते? प्रतीयन्ते हि पाकार्थमुपक्षिप्ता घटादयः सर्वावस्थासु प्रत्यक्षा-छिद्र विनिवेशितदृशा, प्रत्यभिज्ञायन्ते च पाकोत्तरकालमपि त एवामी घटादय इति, तत्राह - न चेति । उपपत्तिमाह - सर्वावयवेष्विति । अन्तर्वहिश्च रूप की उत्पत्ति होती है । इसी ( कारणगुणपूर्वक ) क्रम से घटादि स्थूल द्रव्यों में भी ( पाकज ) रूा, रस गन्ध एवं स्पर्श की उत्पत्ति होती है । ( पके हुए घटादि में भी ) संख्यादि गुणों की उत्पत्ति पाक से नहीं होती हैं, क्योंकि पाक के बाद भी संख्यादि गुणों में कोई अन्तर नहीं दीखता है । ( प्र ० ) स्पर्श में भी तो पाक के बाद कोई अन्तर नहीं दीखता है? ( उ ० ) हाँ, फिर भी पृथिवी निरूपण में इस अनुमान को दिखा चुके हैं, जिसके द्वारा पके हुए द्रव्यों के स्पर्शो में पाकजन्यत्व की सिद्धि होती है । जिस क्रिया के द्वारा रूपादि से युक्त द्रव्य की उत्पत्ति होती है वह क्रिया रूपादि से युक्त द्रव्यों में हो देखी जाती है, अतः यह समझना चाहिए कि पार्थिव परमाणुओं में पाक से रूपादि की उत्पत्ति के बाद ही उसमें ( पके हुए द्वणुक को उत्पन्न करनेवाली ) क्रिया उत्पन्न होती है, श्यामादि रूपों के नाशक्षण में नहीं । इस प्रकार यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार पट के कारणीभूत तन्तुओं के संयोग को उत्पन्न करने-वाली क्रिया रूप से युक्त तन्तुओं में हो देखी जाती है, क्योंकि वह क्रिया ( तन्तुसंयोग के द्वारा ) रूप से युक्त पट स्वरूप द्रव्य का उत्पादक है, उसी प्रकार रूप से युक्त द्वयणुक. स्वरूप द्रव्य के उत्पादक दोनों परमाणुओं की क्रिया भी रूप से युक्त परमाणुओं में ही उत्पन्न होती है । ( प्र ० ) घटादि कार्य द्रव्यों में ही अग्निसंयोग से रूपादि का विनाश एवं उत्पत्ति क्यों नहीं मान लेते? क्योंकि भट्टी में पकने के लिए दिये गये घटादि का तीनों अवस्थाओं में प्रत्यक्ष होता है । एवं भट्टी के किसी छेद से झाँकनेवाले को यह वही घट है ' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा भी होती है । इसी आक्षेप के समाधान के लिए ' न च ' इत्यादि. वाक्य लिखते हैं । ' सर्वावयवेषु ' इत्यादि वाक्य से उक्त आक्षेप के खण्डन की ही युक्ति का प्रतिपादन करते हैं । अभिप्राय यह है कि भीतर और बाहर के सभी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेरूपादीनां पाकजोत्पत्ति-प्रशस्तपादभाष्यम् न च कार्यद्रव्य एव रूपाद्युत्पत्तिर्विनाशो वा सम्भवति, सर्वावयवेष्वन्तर्बहिश्च वर्त्तमानस्याग्निना व्याप्त्यभावात । अणुप्रवेशादपि च व्याप्तिर्न सम्भवति, कार्यद्रव्यविनाशादिति । उस ( कच्चे स्थूल घटादि ) द्रव्यों में ही ( अग्निसंयोग से पाकज ) रूपादि की उत्पत्ति या ( नीलादि पहिले ) रूपादि का विनाश नहीं हो सकता, क्योंकि बाहर और भीतर के सभी अवयव केवल बाहर में विद्यमाम अग्नि के संयोग से व्याप्त नहीं हो सकते । ( अग्नि के ) परमाणुओं से भी उक्त व्याप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि इसके मानने पर भी कार्य द्रव्य का नाश मानना ही पड़ेगा । न्यायकन्दली सर्वेष्ववययेषु वर्त्तमानस्य समवेतस्यावयविनो बाह्ये वर्त्तमानेन वह्निना व्याप्ते-र्व्यापकस्य संयोगस्याभावात् कार्यरूपादीनामुत्पत्तिविनाशयोरक्लृप्तेरन्तर्वत्तिना-मपाक प्रसङ्गादिति भावः । सच्छिद्राण्येवावयविद्रव्याणि । तत्र यदि नाम महतस्ते-जोऽवयविनो नान्तःप्रवेशोऽस्ति तत्परमाणूनां ततो व्याप्तिर्भविष्यति? तत्राह -अणुप्रवेशादपीति । न तावत्परमाणवः सान्तराः, निर्भागत्वात् । द्व्यणुकस्य सान्तरत्वे चानुत्पत्तिरेव तस्य परमाण्वोरसंयोगात् । संयुक्तौ चेदिमा निरन्तरावेव । सभागयोहि अवयवों में ' वर्तमान ' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अवयवी में केवल बाहर रहनेवाले वह्नि की ' व्याप्ति ' अर्थात् व्या कसंयोग ( बाहर और भीतर सभी अवयवों के साथ संयोग ) नहीं हो सकता । एवं कार्यद्रव्यों के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश भी ( बिना कारण के ) नहीं हो सकते ( अतः आक्षेप करनेवाले के पक्ष में कथित व्यापक-संयोग रूप कारण के अभाव से ) भीतर के अवयवों में पाक ही उत्पन्न नहीं होगा ( फलतः भीतर की तरफ घटादि कच्चे ही रह जाएँगे ) | ( प्र ० ) जितने भी अवयवो रूप द्रव्य हैं सभी छोटे छोटे छिद्रों से युक्त हैं, उन छोटे छिद्रों के द्वारा यद्यपि बड़े तेज-द्रश्य का प्रवेश सम्भव नहीं है, फिर भी तेज के परमाणुओं का प्रवेश उन छोटे छिद्रों से भी हो सकता है । इस प्रकार घट का विनाश न मानने पर भो ( अवयवी के बाहर और भीतर पाक का प्रयोजक ) कथित व्यापक वह्निसंयोग की उपपत्ति हो सकती है । इसी आक्षेप के समाधान में ' अणुप्रवेशादपि ' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । अभिप्राय यह है कि परमाणुओं के तो अंश हैं नहीं, जिससे कि वे छिद्रयुक्त होंगे? द्वथणुकों को अगर छिद्र युक्त मानें तो फिर उनकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २६३ वस्तुनोः केनचिदंशेन संयोगात् केनचिदसंयोगात् सान्तरः संयोगः । निर्भागयोस्तु नायं विधिरवकल्पते । स्थूलद्रव्येषु प्रतीयमानेष्वन्तरं न प्रतिभात्येव, त्र्यणुकेष्वे-वान्तरम्, तच्चानुपलब्धियोग्यत्वान्न प्रतीयत इति गुर्वीयं कल्पना । तस्मान्निरन्तरा एव घटादयः । तेषामन्तस्तावदग्निपरमाणूनां प्रवेशो नास्ति यावत्पार्थिवावयवानां व्यतिभेदोन स्यात् । स्पर्शवति द्रव्ये तथाभूतस्य द्रव्यान्तरस्य प्रतीघाताद् व्यतिभिद्यमानेषु चावयवेषु क्रियाविभागादिन्यायेन द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशा-car यं द्रव्यविनाश इति कुतस्तस्याणुप्रवेशादभिव्यक्तिः । न च कार्यद्रव्येष्का-श्रयविनाशादन्यतो रूपादीनां विनाशः कारणगुणेभ्यश्चान्यत उत्पादो दृष्टः, तेनादि घटवह्निसंयोगाद्रूपादीनामुत्पत्तिविनाशौ न कल्प्येते । घटरूपादय आश्रयविनाशादेव नश्यन्ति कार्यद्रव्यगत रूपरसगन्ध-स्पर्शत्वाद् मुद्गराभिहतनष्टघटरूपादिवत् । तथा घटरूपादयः कारणगुणेभ्य प्रकार का संयोग असम्भव है ( जिससे छिद्र क्योंकि दोनों परमाणु अगर संयुक्त हैं तो फिर किसी अंश में संयोग होगी, क्योंकि दो परमाणुओं में इस युक्त द्वयक की उत्पत्ति सम्भव हो ) उनमें अन्तर नहीं हो सकता । अनुयो और प्रतियोगी के एवं किसी अंश में असंयोग से ही अन्तरयुक्त संयोग की सम्भावना नहीं है । एवं प्रतीत नहीं जाता । अब केवल एक कल्पना बच में ही छिद्र है, किन्तु अतीन्द्रिय होने के कल्पना में बहुत ही गौरव है । अतः भीतर अग्नि के परमाणुओं का प्रवेश तब तक अवयव विभक्त न हों जाँय । स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य में जब दूसरे द्रव्य का प्रतिघात होता है, तब उसके अवयव अवश्य ही फिर ' क्रिया से विभाग, विभाग से आरम्भक संयोग का नाश ' इस संयोग होता है, निरंश परमाणुओं में उक्त होनेवाले स्थूल द्रव्यों में छिद्र देखा भी जाती है कि केवल व्यसरेणु रूप अवयवी कारण उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, किन्तु इस घटादिद्रव्य छिद्रों से युक्त नहीं हैं । उनके सम्भव नहीं है, जब तक उनके स्पर्श से युक्त किसी विभक्त हो जाते हैं । रीति से आरम्भक फिर अणुप्रवेश के रूपादि का नाश संयोग के नाश के द्वारा अवयवी द्रव्य का भी नाश अवश्य ही होगा बाद अग्नि के व्यापक संयोग की उत्पत्ति कैसे होगी? एवं कार्यद्रव्यों के आश्रयनाश को छोड़कर और किसी कारण से नहीं देखा जाता है, इसी प्रकार किसी और कार्यद्रव्य के रूपादि की उत्पत्ति भी कारणों में रहनेवाले रूपादि से भिन्न कारण से नहीं देखी जाती है । इन सभी युक्तियों से भी घटादि कार्यद्रव्यों के रूपादि की उत्पत्ति घटादि कार्यद्रव्य और वह्नि के संयोग से कल्पित नहीं हो सकती । इस प्रकार यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार घटादिद्रव्यों के रूप रस, गन्ध एवं स्पर्श मुद्गरादि के प्रहार से उत्पन्न होते हैं, एवं घटादि कार्यद्रव्यों के नाश से ही नष्ट होते हैं, क्योंकि वे भी कार्यद्रव्य के रूपादि हैं, उसी प्रकार सभी कार्यद्रव्यों के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २६४ एव न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणरूपादीनां पाकजोत्पत्ति-न्यायकन्दली जायन्ते कार्यद्रव्यगतरूपादित्वात् पटगतरूपादिवत् । किञ्च, न च पूर्वमवयवानां प्रशिथिलता आसीदिदानीं काठिन्यमुपलभ्यते, नोदनाभिघातयोरिव शैथिल्यकाठिन्ययोरेकत्र समावेशो युक्तः, परस्परविरोधात् । तस्मात् पूर्वव्यूहनिवृत्त व्यूहान्तरमेतदुपजातम् । तथा सति प्राक्तनद्रव्यविनाशः कारणविनाशात्, द्रव्यान्तरस्योत्पादः कारणसद्भावादेवेत्यवतिष्ठते । प्रत्यभिज्ञानं च ज्वालादिवत् सामान्यविषयम् । सर्वावस्थोपलब्धिरपि कार्यस्य विनश्यतोऽपि क्रमेण विनाशात् । नहि घटः परमाणुसञ्चयारब्धो येन विभक्तेषु परमाणुषु सहसैव विनश्येत्, किन्तु द्वणु-कादिप्रक्रमेणारब्धः । तस्य द्वयणुकत्र्यणुकाद्यसङ्घयेयद्रव्यविनाशात्परम्परया चिरेण विनश्यतो यावदविनाशस्तावदुपलब्धिरस्त्येव । एकतश्च पूर्वेऽवयवा विनश्यन्ति, अन्यतश्चोत्पन्नपाकजैरणुभिरपूर्वे तत्स्थाने एवं द्वयणुकादिप्रक्रमेणारभ्यन्ते, तेन रूपादि अपने आश्रयों के नाश से ही नष्ट होते हैं । एवं जिस प्रकार पटस्वरूप कार्य-द्रव्य के रूपादि अपने कारणीभूत तन्तुओं के रूपादि से ही उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार घटादि सभी कार्यद्रव्यों के रूपादि अपने कारणीभूत द्रव्यों के रूपादि से ही उत्पन्न होते हैं । और भी बात है कि पाक से पहिले घटादि में रहनेवाला प्रशिथिल संयोग, एवं पाक के बाद होनेवाला कठिन संयोग दोनों परस्पर विरोधी हैं, नोदनसंयोग एवं अभिघात संयोग इन दोनों की तरह वे परसर अविरोधी नहीं हैं, अतः एक घट में पाक से पहिले का प्रशिथिल संयोग एवं पीछे का कठिन संयोग ये दोनों नहीं रह सकते । अतः यही मानना पड़ेगा कि पहिले ' व्यूह ' अर्थात् अवयवों के संयोग का नाश हो जाने पर अवयवों के दूसरे व्यूह ( संयोग ) की उत्पत्ति होती है । फलतः पहिले अवयवी का नाश हो गया; क्योंकि उसके कारण अवयवों के संयोग ( पूर्वव्यूह ) का नाश हो गया है । दूसरे अवयवी की उत्पत्ति होती है, क्योंकि कारणीभूत दूसरे व्यूह ( अवयवसंयोग ) की सत्ता है । पकने के बाद भी यह वही घट हैं ' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा तो दोनों में अत्यन्त सादृश्य के कारण होती है जैसे कि दीपादि की ज्वालाओं में इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञायें होती हैं । घटादि की सभी अवस्थाओं की उक्त उपलब्धि में यह युक्ति है कि ( पाक से ) घटादि द्रव्यों का विनाश क्रमशः होता है । परमाणुओं के समूहों से हो तो घट उत्पन्न होते नहीं कि उनमें परस्पर विभागों के उत्पन्न होते ही उनका सहसा नाश हो जाय । द्वघणुकादि क्रम से उनकी उत्पत्ति होती है, अतः द्वणुक त्र्यसरेणु प्रभृति के नाश की असंख्य परम्परा से बहुत समय के बाद घटादि का नाश भी होगा, अतः जितने समय तक उनका नाश नहीं हो जाता उतने समय तक उनको उपलब्धि होना उचित ही है । अग्नि के एक संयोग से पहिले के अवयव नष्ट होते हैं एवं अग्नि के ही दूसरे संयोग से उसी स्थान पर पाकज रूपादि से युक्त अवयवों से For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली २६५ पक्वापक्वावयवदर्शनम् । यदा चान्यावयवानां नाशात्पूर्वावयविनो विनश्यत्ता तदेव पूर्वावयवानामुत्पादात् क्षणान्तरे पूर्वावयविविनाशेऽवयव्यन्तरस्य चोत्पाद इत्याधाराधेयभावोऽवधारणं च स्यात्, यावन्तः पूर्वस्यावयवास्तावन्त एवोत्तरस्या-रम्भका ( इति ) तत्परिमाणत्वं तत्सङ्ख्यात्वं चोपपद्यते । प्रक्रिया तु द्वयणुकस्य विनाशः, त्र्यणुकस्य विनश्यत्ता, श्यामादीनां विनश्यत्ता, सक्रिये परमाणौ विभागजविभागस्योत्पद्यमानता, रक्ताद्युत्पादक-स्याग्निसंयोगस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः । ततस्त्र्यणुकविनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, विनश्यत्ता, विनाश:, श्यामादीनां विनाशः, विभागजविभागस्योत्पाद:, संयोगस्य रक्ताद्युत्पादकाग्निसंयोगोत्पादः, रक्तादीनामुत्पद्यमानता, विनश्यत्तेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्य-तत्कार्यविनश्यत्ता, उत्तरस्य संयोगस्योत्पाद्यमानता, श्यामादिनिवर्त्तकाग्निसंयोगस्य नवीन अवयवी की सृष्टि होती जाती है, अतः पके हुए एवं बिना पके हुए दोनों प्रकार के अवयव देखने में आते हैं । जिस समय कुछ अवयत्रों के विमाश से पहिले के अवयवी के विनाश की सम्भावना होती है, उसी समय अपूर्व अवयवों की उत्पत्ति भी होती है । इसके बाद दूसरे क्षण में पहिले अवयवी का नाश एवं दूसरे अवयवी की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार आधार आधेयभाव और नियम दोनों की ही उपपत्ति होती है । जितने ही अवयव पहिले अवयवी के उत्पादक थे उतने ही अवयव नवीन अवयवी के भी उत्पादक हैं, अतः दूसरे अवयवी में पहिले अवयवी के समान ही संख्या एवं परिमाण का भी सम्बन्ध ठीक बैठता है । ( पाकज रूपादि की उत्पत्ति की ) रीति यह है कि ( १ ) परमाणुओं में अग्नि के नोदन या अभिघात संयोग से परमाणुओं के विभक्त हो जाने से द्वयणुक के उत्पादक परमाणुओं के संयोग नष्ट हो जाते हैं । उसके बाद द्वयणुकों का नाश, व्यसरेणु के विनाश की सम्भावना, श्याम रूपादि के विनाश की सम्भावना, क्रिया से युक्त परमाणुओं में विभागजविभाग की उत्पत्ति की सम्भावना, रक्तरूपादि के उत्पादक अग्नि के संयोग की उत्पत्ति की सम्भावना, ये पाँच काम एक समय में होते हैं । ( २ ) उसके बाद एक ही समय में व्यसरेणु का विनाश, त्र्यसरेणु से बननेवाले अवयवों के नाश की सम्भावना, श्याम रूपादि का विनाश, विभागजविभाग की उत्पत्ति, संयोग के विनाश की सम्भावना, रक्त रूपादि के उत्पादक अग्निसंयोग की उत्पत्ति, रक्त रूपादि की उत्पत्ति की सम्भावना, श्यामरूपादि का नाश एवं अग्निसंयोग के विनाश की सम्भावना ये आठ काम होते हैं । ( ३ ) इसके बाद व्यसरेणु से उत्पन्न द्रव्य का विनाश, इस द्रव्य से उत्पन्न द्रव्य के विनाश की सम्भावना, उत्तरदेश संयोग के उत्पत्ति की सम्भावना, ३४ For Private And Personal