प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 391–400
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 391–400
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३१६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे परिमाण-तदर्थविवक्षा सहसोपजाता गच्छत्तृणसंस्पर्शज्ञानवदस्पष्टरूपा कार्येण कल्पनीयेति चेत्? विप्रलम्भकस्यापि विवक्षाविशेषेण तदर्थानुभवः कल्प्यताम्, असं विदितेऽर्थे तद्विषयस्य विवक्षाविशेषस्यायोगात् । तदानीं विप्रलम्भकस्य तदर्थानुभवो नास्तीति चेत्? मा स्म भूत्, स्मरणं तावद्विद्यते विप्रलम्भको हि पूर्वानुभूतमेवार्थमन्यथाभूत-मन्यथा च कथयति । तत्रास्य तदर्थविवक्षा स्मरणकारणिका भवन्ती पारम्पर्येण तदनुभवकारणिकेति नास्ति व्यभिचार:, मिथ्यानुभवपूविकाया अपि विवक्षायाः पारम्पर्येण सत्यानुभवपूर्वकत्वात् । अनुभवश्चार्थाव्यभिचारीति शब्दादर्थसिद्धिः । अन्यथा वाक्यश्रुतौ श्रोतुरर्थप्रतीत्यभावाद् विवक्षामात्रप्रतीतेश्चापुरुषार्थत्वाच्छाब्दो व्यवहार उच्छिद्येत, वादिप्रतिवादिनोर्जयपराजयव्यवस्थानुपपत्तिः, विवक्षामात्रं प्रत्युभयोरपि भूतार्थवादित्वात् । यच्चोक्तं द्रव्यादव्यतिरिक्तं परिमाणम्, द्रव्याग्रहे तद्बुद्धयभावदिति, तदसिद्धम् । दूराद् द्रव्यग्रहणेऽपि तत्परिमाणविशेषस्याग्रहणात् । अत एव महानप्यणुरिव भ्रान्त्या दृश्यते । अतः ( भ्रान्तपुरुष के शब्द प्रयोग रूप ) कार्य से ही यह अनुमान करते हैं कि ( शब्द प्रयोग से पहिले ) भ्रान्त पुरुष को भी अज्ञात अर्थ विषयक अस्फुट विवक्षा सहसा उत्पन्न होती है । जैसे कि राह चलते आदमी को तृण के स्पर्श का हठात् अस्पष्ट प्रतिभास होता है | ( उ ० ) तो फिर उस प्रतारक के विशेष प्रकार की विवक्षा से उसके उस अर्थविषयक अनुभव की भी कल्पना कीजिए, क्योंकि अज्ञात अर्थ की विवक्षा कभी भी नहीं उत्पन्न होती । ( प्र ० ) उस समय ठगनेवाले पुरुष को उस विषय का अनुभव तो नहीं है । ( उ ० ) अनुभव न रहे, स्मरण तो रह सकता है । पहिले समझी हुई वस्तु को ही वह प्रतारक दूसरों से कहता है । इस प्रकार प्रकृत में भी चूँकि अर्थ विषयक विवक्षा स्मरण का कारण है. अतः परम्परा से वह अनुभव का भी कारण होती है । सुतराम् ( शब्द और विवक्षा के कार्यकारणभाव में ) व्यभिचार नहीं है । अतः मिथ्या अनुभव से उत्पन्न होनेवाली विवक्षा का सत्यानुभव भी परम्परा से कारण है । तस्मात् विवक्षा एवं यथार्थानुभव इन दोनों के कार्यकारणभाव में भी व्यभिचार नहीं है! अगर ऐसी बात न होती तो वाक्य के सुनने से सुननेवाले को अर्थ की प्रतीति न होकर विवक्षा की ही प्रतीति होती, किन्तु यह वाक्य का प्रयोग करनेवाले को अभीष्ट नहीं है, अतः शब्द से होनेवाले व्यवहार का ही उच्छेद हो जाएगा । वादी एवं प्रतिवादी में हार - जीत की व्यवस्था भी उठ जाएगी, क्योंकि विवक्षा के प्रसङ्ग में तो दोनों बराबर ही कहते हैं । यह जो आपने कहा कि ( प्र ० ) द्रव्य और उसके परिमाण दोनों अभिन्न हैं, क्योंकि द्रव्यज्ञान के बिना उसके परिमाण का ज्ञान नहीं होता है, ( उ ० ) सो ठीक नहीं है, For Private And Personal
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra भाषानुवादसहितम् प्रकरणम् | न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३१७ संस्थाव की अर्थात् अवयवों दीर्घत्वादि की प्रतीति दूर क्योंकि वह महत्परिमाण एवं व्यवस्थिते परिमाणे तस्य भेदं कथयति तच्चतुर्विधमिति । येन रूपेण चातुविध्यं तद्दर्शयति- अणु महद् दीर्घं ह्रस्वं चेति । चतुरस्रादिकं त्ववयवानां संस्थानविशेषो न परिमाणान्तरम् । दीर्घत्वादयोऽपि तथा भवन्तु? न अवयवसंस्थानानुपलम्भेऽपि दूराद् दीर्घादिप्रत्ययत्य दर्शनात् । अपि च भोः! द्व्यणुकपरिमाणं तावदणु, महत्परिमाणोत्पत्तौ कारणाभावात् । तस्माच्च परमाणुपरिमाणमपकृष्टम्, कार्यपरिमाणात् कारणपरिमाणस्य होनत्वदर्शनात् । ततश्च परमाणोः परिमाणं द्वयणुकपरिमाणाद्भिन्नम् । एवं घटादीनां परिमाणादन्यदेव प्रकर्षपर्यन्तप्राप्त-माकाशादिपरिमाणम्, तथा दीर्घं ह्रस्वं चेति परिमाणमष्टविधमेव, कुतश्चातु-विध्यमित्याह -- तत्रेति । तेषु चतुर्षु परिमाणेषु मध्ये महद् द्विविधं नित्यमनित्यं चेति । केषु नित्यमित्याह - नित्यमाकाशकालदिगात्मसु । तच्च परममहत्त्वमित्युच्यते । क्योंकिदूर से द्रव्य का ज्ञान होने पर भी उसके विशेष प्रकार के परिमाण का ज्ञान नहीं होता है, अतः भूल से बड़ी चीज भी छोटी प्रतीत होती है । इस प्रकार परिमाण की सत्ता सिद्ध हो जाने पर ' तच्चतुविधम् ' इत्यादि से उसके भेद कहे गये हैं । जिन भेदोंसे परिमाण के चार भेद हैं यह ' अणु महद्दीर्घ ह्रस्वञ्चेति ' इस पङ्क्ति से कहा गया है । चौकोर आदि आश्रय द्रव्यों के अवयवों के विशेष प्रकार के विन्यास ही हैं, कोई स्वतन्त्र परिमाण नहीं । ( उ ० ) फिर दीर्घत्वादि भी अवयवों के विशेषविन्यास ही हों स्वतन्त्र परिमाण नहीं | ( उ ० ) के विशेष विन्यास की प्रतीति दूर से नहीं होती है, किन्तु से भी होती है । ( प्र ० ) द्वयणुक ' अणु ' परिमाण वाला है, का कारण नहीं । एवं परमाणु का परिमाण ( अणु होते हुए भी ) द्वयणुक के परिमाण से न्यून है क्योंकि कार्य के परिमाण से कारण का परिमाण न्यून ही देखा जाता है । अतः परमाणु के परिमाण और द्वयणुक के परिमाण ( दोनों ही अणु होते हुए भी ) भिन्न प्रकार के हैं । एवं घटादि के महत्परिमाण एवं महत्परिमाण के अन्तिम अवधि आकाशादि का महत्परिमाण दोनों ही ( महत्त्वत्वेन समान होने पर भी ) भिन्न प्रकार के हैं । इसी प्रकार दीर्घ और ह्रस्व में भी समझना चाहिए । अतः परिमाण का आठ भेद होना ही उचित है चार भेद नहीं ' । इसी प्रश्न का उत्तर ' तत्र ' इत्यादि १. मुद्रित न्यायकन्दली पुस्तक में षड्विधमेव ' ऐसा पाठ है, किन्तु सो असङ्गत मालूम होता है, क्योंकि जैसे द्वथणुक और परिमाणु के अणुत्व में अन्तर है, वैसे ही दोनों के ह्रस्वश्व में भी अन्तर है । एवं जैसे कि घट और आकाशादि के महत्परिमाण में अन्तर है,
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३१८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-प्रशस्तपादभाष्यम् काशकालदिगात्मसु परममहत्त्वम् । अनित्यं त्र्यणुकादावेव । तथा चावपि द्विविधम्- नित्यमनित्यं च । नित्यं परमाणुमनस्सु तत् पारि-इनमें महत् ( परिमाण ) नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है । नित्य महत्परिमाण आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन चार द्रव्यों में है, क्योंकि वे परममहत्त्व रूप हैं । इसी तरह अणु भी नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है । इन दोनों में से नित्य अणु ( परिमाण ) परमाणुओं और मनों में है । न्यायकन्दली अनित्यं महत्परिमाणं त्र्यणुकादावेव नाकाशादिष्वित्यर्थः । यथा महद् द्विविधं तथावपि द्विविधं नित्यमनित्यं च । उभयत्रापि चकारः प्रकारान्तरव्यवच्छे-दार्थः । नित्यमणुपरिमाणं परमाणुमनःसु, उत्पत्तिविनाशकारणाभावात् । पारि-माण्डल्यमिति सर्वापकृष्टं परिमाणम् । अनित्यमणुपरिमाणं द्वयणुक एव नान्य-त्रेत्यर्थः । एतेनैतदुक्तं भवति, अणुपरिमाणप्रभेद एव परमाणुपरिमाणं महत्परिमाणप्रभेदश्च परममहत्परिमाणम्, अन्यथा परमशब्देन विशेषणायोगात् । यत् खलु परिमाणं रूपसहायं स्वाश्रयं प्रत्यक्ष यति तत्र महदिति व्यपदेशः, यच्च से देते हैं । ' तत्र ' अर्थात् उन चारों प्रकारों के परिमाणों में ' महत् ' नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है किन द्रव्वों में वह नित्य है? इस आकाङ्क्षा की पूर्ति ' नित्यमाकाशकालदिगात्मसु ' इस वाक्य से की गयी है । आकाशादि द्रव्यों में रहनेवाले ' महत्त्व ' को ही ' परममहत्त्व ' कहते हैं । अनित्य महत्परिमाण त्र्यसरेणु प्रभृति द्रव्यों में ही है, आकाशादि द्रव्यों में नहीं । जिस प्रकार महत्त्व नित्य और अनित्व भेद से दो प्रकार का है, उसी प्रकार ' अणु ' भी दो प्रकार का हैं । दोनों वाक्यों के ' च ' शब्द परिमाण की और प्रकार की सम्भावनाओं को हटाने के लिए हैं । परमाणुओं और मनों में केबल नित्य अणु परिमाण ही रहता है, क्योंकि उनके परिमाणों का कोई बिनाशक नहीं है । सब से छोटे परिमाण को पारिमाण्डल्य कहते हैं । अनित्य अणुपरिमाण केवल द्वथणुकों में ही है और कहीं नहीं । इससे यह अर्थ निकला कि परमाणुओं का परिमाण भी अणुपरिमाण का ही एक भेद है । एवं आकाशादि का परममहत्परिमाण भी महत्परिमाण का ही एक भेद है । अगर आकाशादि का परिमाण महत् न हो तो फिर उसमें ' परम ' विशेषण ही व्यर्थ हो जाएगा । रूप के साहाय्य से जो परिमाण अपने आश्रय के प्रत्यक्ष का कारण होता है, उसे महत्परिमाण कहते हैं । जिससे यह वैसे ही दोनों की दोर्घता में भी । फलतः ह्रस्वस्व एवं अणुत्व के दो दो भेद एवं महत्त्व और दीर्घव के दो दो भेद सब मिलाकर आठ भेद को ही आपत्ति ठीक बैठती है, और यह बात न्यायकन्दली के ' दीर्घ ह्रस्वञ्चेति ' इस वाक्य से भी स्पष्ट होती है, अतः मैंने ' षड्विधमेव ' के स्थान पर ' अष्टविधमेव ' ऐसा ही पाठ रखना उचित समझा । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् BRE प्रशस्तपादभाष्यम् माण्डल्यम् । अनित्यं द्वयणुक एव । कुवलयामलकबिल्वादिषु महत्स्वपि तत्प्रकर्षभावाभावमपेक्ष्य भाक्तोऽणुत्वव्यवहारः । यही अणुपरिमाण पारिमाण्डल्य कहलाता है । अनित्य ( अणुपरिमाण ) केवल द्वणुक रूप द्रव्य में ही है । कुवलय, आमला और बेल प्रभृति के महत्परि-माणों में अणुत्व का जो व्यवहार होता है, वह महत्परिमाणों के न्यूनाधिकभाव के कारण गौण है । जिन आश्रयों के महत् ( परिमाण ) और अणु ( परिमाण ) उत्पत्ति-न्यायकन्दली नो प्रत्यक्षयति तत्राविति व्यवहारः । न चैवं सति त्र्यणुकस्याप्यणुत्वप्रसक्तिः? तस्यापि प्रत्यक्षत्वात् त्र्यणुकमस्मदादिप्रत्यक्षं बहुभिः समवायिकारणैरारब्धत्वात्, घटवत् । यस्य च प्रत्यक्षस्य द्रव्यस्यावयवा न प्रत्यक्षास्तदेव त्र्यणुकम् । आकाश-परिमाणस्य तु प्रत्यक्ष हेतुत्वाभावेऽपि महत्त्वमेव, तदाश्रयस्य द्वघणुकव्याप्तितोऽधि-कव्याप्तित्वात्, घटादिपरिमाणवत् । अनित्यमणुपरिमाणं द्वणुक एवेत्ययुक्तम्, कुवलयामलकबिल्वादिषु परस्परापेक्षयाणुव्यवहारदर्शनादत आह- कुवलयामलकबिल्वादिष्विति । बिल्वे यः प्रकर्षभावो महत्परिमाणातिशययोगित्वं तस्यामलकेऽभावमपेक्ष्याणुव्यवहारो भाक्तः । उभाभ्यां भज्यते इति भक्तिः सादृश्यम्, तस्यायमिति भाक्तः, सादृश्यमात्र निबन्धनो गौण इत्यर्थः । एवमामलकपरिमाणातिशयाभावं काम नहीं होता है उस परिमाण को ' अणु ' कहते हैं । इसी से त्र्यसरेणु के परिमाण में अणुत्व की आपत्ति नहीं होती है, क्योंकि उसका प्रत्यक्ष होता है । त्र्यणुक की उत्पत्ति घटादि की तरह अनेक अवयवों से होती है, अतः वह हम लोगों के प्रत्यक्ष का भी विषय है । प्रत्यक्ष दोखने वाले जिस द्रव्य के अवयवों का प्रत्यक्ष न हो उसे ' क ' कहते हैं । घटादि के परिमाणों की तरह आकाशादि के परिमाण की व्याप्ति क के परिमाण की व्याप्ति से अधिक है, अतः आकाशादि के परिमाण भी महत् ही हैं । ( प्र ० ) यह कहना ठीक नहीं कि ' अनित्य अणुपरिमाण ' केवल द्वयणुक में ही है, क्योंकि कुवलय, आंवला और बेल इन सबों में आपेक्षिक अणु ' को व्यवहार देखा जाता है । इसी प्रश्न का उत्तर " कुवलयामलकबिल्वादिषु ' इत्यादि पङ्क्ति से देते हैं । बेल में जो प्रकर्षभाव अर्थात् विलक्षण महत्परिमाण का सम्बन्ध है वह आँवले में नहीं है, इसी से आंवले में ' अणुत्व ' का भाक्त व्यवहार होता है । अभिप्राय यह है कि ' उभाभ्यां भज्यते इति भक्ति: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार केवल सादृश्य से होनेवाले व्यवहार को ' भाक्त ' कहते हैं । इसी प्रकार आँवले में जिस उत्कृष्ट महत्परिमाण का सम्बन्ध है, उस प्रकार के महत्परिमाण का सम्बन्ध कुवलय में नहीं हैं । इसी से कुवलय For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३२० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-चोत्पाद्ये महदत्वैकार्थसमवेते । समिदिक्षुवंशादिष्वञ्जसा दीर्घेष्वपि तत्प्रकर्षभावावमपेक्ष्य भाक्तो ह्रस्वत्वव्यवहारः । अनित्यं चतुर्विध-शील हैं उन आश्रयों में ह्रस्वत्व और दीर्घत्व भी समवाय सम्बन्ध से उत्पत्तिशील ही हैं । लकड़ी, ईख, बाँस प्रभृति दीर्घ वस्तुओं में भी उनके उत्कर्ष और अपकर्ष से ह्रस्वत्व का गौण व्यवहार होता हैं । चारों प्रकार के अनित्य परिमाण न्यायकन्दलो कुवलयेऽपेक्ष्याणुव्यवहारः । यत्र हि मुख्यमणुत्वं द्वयणुके तत्र महत्परिमाण-स्याभावो दृष्टः । आमलकेऽपि यादृशं बिल्वे महत्परिमाणं तादृशं नास्तीत्येतावता साधर्म्येणोपचारप्रवृत्तिः । दीर्घत्वह्रस्वत्वयोविशेषं दर्शयति - दीर्घत्वह्रस्वत्वे इति । महच्चाणुत्वं च महदणुत्वे, उत्पाद्ये च ते महदणुत्वे चेत्युत्पाद्यमहदणुत्वे, ताभ्यामेकस्मिन्नर्थे समवे ह्रस्वत्वदीर्घत्वे । यत्रोत्पाद्यं महत्त्वं त्र्यणुकादौ तत्रोत्पाद्यं दीर्घत्वम्, यत्र चोत्पाद्यमणुत्वं द्वयणुके तत्रोत्पाद्य ह्रस्वत्वमित्यर्थः । तत्र परमाणोः परिमण्डलत्वाद्धस्वत्वाभावो व्यापकत्वाच्चाकाशस्य दीर्घत्वाभाव में अव का व्यवहार होता है । जहाँ अणुत्व का मुख्य व्यवहार होता है जैसे कि द्वय में, वहाँ महत्परिमाण के अभाव की भी प्रतीति होती है । आँवले में भी अस्व के गौण व्यवहार की प्रवृत्ति केवल इतने ही सादृश्य से होती है कि बिल्व में जिस प्रकार का उत्कृष्ट महत्परिमाण है, वह आँवले में नहीं है । ' ' दीर्घत्व हस्वत्वे ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दीर्घत्व एवं ह्रस्वत्व रूप दोनों परिमाणों का अन्तर दिखलाते हैं । ' महच्चाणुत्वञ्च महदणुत्वे ' कथित इस व्युत्पत्ति के द्वारा ' दीर्घत्व ह्रस्वत्वे ' इत्यादि वाक्य का यह अर्थ है कि जिन द्रव्यों में उत्पत्तिशील महत्त्व एवं उत्पत्तिशील अणुत्व रहते हैं, उन्हीं में उत्पत्तिशील दीर्घत्व एवं उत्पत्तिशील ह्रस्वत्व भी समवाय सम्बन्ध से रहते हैं । अर्थात् त्र्यणुकादि द्रव्यों में चूँकि उत्पत्तिशील महत्व ही है, अतः वहाँ दीर्घत्व भी उत्पत्तिशील ही है । एवं द्व्यणुक में चूँकि उत्पत्ति-शील अणुत्व है तो फिर वहीं ह्रस्वत्व भी उत्पत्तिशील ही है । इस प्रसङ्ग में कोई कहते हैं कि ( अणु परिमाण के आश्रय ) परमाणुरूप ' परिमण्डल ' सभी से अल्पपरिमाण के होने के कारण ह्रस्वत्व परिमाण का आश्रय नहीं १. द्वणुक में अणुत्व का मुख्य व्यवहार होता है, वहाँ महत्व नहीं है । कुवलयादि द्रव्यों में एक विशेष प्रकार का उत्कृष्ट महत्त्व न रहने के कारण महत्व के रहते हुए भी प्रणुत्व का गौण व्यवहार होता है । गौण व्यवहार वस्तु की सत्ता का साधक नहीं है, अतः कुवलयादि द्रव्यों में अणुत्व नहीं है । तस्मात् यह कहना ठीक है कि अनित्य अणुपरिमाण ham aaye में ही है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ४१ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३२१ भाषानुवादसहितम् For Private And Personal इत्येके । अन्ये तु परमाणुपरममहद्वयवहारवत् परमहस्त्रपरम दीर्घव्यवहारस्यापि लोके दर्शनात् परमाणुषु परमहस्वत्वं परमदीर्घत्वं चाकाशे इत्याहुः । दीर्घ-परिमाणाधिकरणमाकाशं महत्परिमाणाश्रयत्वात् स्तम्भादिवत् । एवं ह्रस्वपरिमा-णाश्रयः परमाणुः, अणुपरिमाणाश्रयत्वात्, द्वयणुकवत् । यदि ह्रस्वत्वमुत्पाद्येनाणुत्वेनैकार्थसमवेतं कथमन्यत्र हस्वत्वव्यवहारः? तत्राह- समिदिक्षुवंशादिष्विति । समिच्चेक्षुश्च वंशाश्च समिदिक्षुवंशाः । एतेष्वञ्जसा परमार्थतो दीर्घेष्वपि वंशे यः परिमाण प्रकर्षभावो दीर्घातिशययोगित्वं तस्याभाव-मिक्षावपेक्ष्य प्रतीत्य भाक्तो गोणो व्यवहारः, एवमिक्षोः प्रकर्षभावस्तस्याभावं समिध्यपेक्ष्य ह्रस्वव्यवहारः । यत् खलु परमार्थतो ह्रस्वं द्वयणुकं तत्र दैर्ष्याभाव:, है । एवं आकाशादि में भी परममहत्परिमाण के रहने से उनमें दीर्घत्व परिमाण नहीं है । कोई कहते हैं कि ( जैसा कि आकाशादि में परममहत्त्व का एवं ( परमाणु में ) परम अणुत्व का व्यवहार लोक सिद्ध है वैसे ही ( दोनों में क्रमशः ) परमदीर्घव एवं परमह्रस्वत्व का भी व्यवहार लोकसिद्ध है, अतः आकाशादि में परमदीर्घत्व भी है एवं परमाणु में परम ह्रस्वत्व भी है । ( इस प्रसङ्ग में अनुमानों का प्रयोग इस प्रकार है कि ) ( १ ) जिस प्रकार स्तम्भ महत्परिमाण के आश्रय होने से दीर्घत्व परिमाण का भी आश्रय है, वैसे ही आकाशादि भी परमदीर्घत्व परिमाण के आश्रय हैं । ( २ ) एवं जिस प्रकार द्वणुक में अणुपरिमाण के रहने से उसमें ह्रस्वपरिमाण भी रहता है वैसे ही परमाणु में भी ह्रस्वपरिमाण है, क्योंकि वह भी अणुपरिमाणवाला है । ( प्र ० ) जहाँ समवाय सम्बन्ध से उत्पत्तिशील अणुत्व रहता है वहीं अगर उत्पत्ति-शील ह्रस्वत्व भी समवाय सम्बन्ध से रहता है तो फिर अन्यत्र ( महत्परिमाण के आभय ) बाँस प्रभृति में, ह्रस्वत्व का व्यवहार कैसे होता है? इसी प्रश्न का समाधान ' समिदादिषु ' इत्यादि से देते हैं । समिध् ( इन्धन ), ईख और बाँस इन सबों में ' अञ्जसा ' अथात् वस्तुतः दीर्घत्व के रहने पर भी बाँस के परिमाण का जो ' प्रकर्षभाव ' अर्थात् विशेष प्रकार के दीर्घपरिमाण का सम्बन्ध है, उस प्रकार के दीर्घपरिमाण का सम्बन्ध ईख में नहीं है । इसी कारण ईख में ह्रस्वत्व का ' भाक्त ' अर्थात्, गौण व्यवहार होता है । इसी तरह ईख में जो परिमाण का प्रकर्ष है वह समिघ् में नहीं है । इसी से ईख में भी ह्रस्वत्व का गौण व्यवहार होता है । जो द्रव्य वास्तव में ह्रस्व है, जैसे कि द्वणुक उसमें दीर्घत्व अवश्य ही नहीं है । ईख में भी बाँस में रहनेवाला परिमाण का प्रकर्ष नहीं है, अतः उसमें भी अणुत्व का भाक्त व्यवहार ही होता है । ( प्र ० ) इनमें ह्रस्वत्व के व्यवहारों को भी मुख्य ही क्यों नहीं मानते? ( उ ० ) चूँकि उनमें ही
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३२२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-मपि संख्यापरिमाणप्रचययोनि । तत्रेश्वरबुद्धिमपेक्ष्योत्पन्ना परमाणु-द्वयणुकेषु बहुत्वसंख्या, तैरारब्धे कार्यद्रव्ये त्र्यणुकादिलक्षणे रूपाद्य्-( १ ) परिमाण ( २ ) संख्या और ( ३ ) प्रचय ( इन तीनों में से किसी ) से उत्पन्न होते हैं । ( परमाणुओं से उत्पन्न होनेवाले ) तीन परमाणु द्वणुकों में से प्रत्येक में रहनेवाली तीन एकत्व संख्या एवं उक्त तीन एकत्व विषयक star की अपेक्षा बुद्धि इन दोनों से तीनों परमाणु द्वयणुकों में बहुत्व संख्या की उत्पत्ति होती है । इन तीन परमाणु द्वयणुकों से उत्पन्न होनेवाले त्र्यसरेणु न्यायकन्दली इक्षावपि वंशस्य यादृशं दैर्घ्यं तादृशं नास्तीत्युपचारः । नन्वेतेषु वास्तव एव ह्रस्वत्वव्यवहारः किं नेष्यते? नेष्यते, तेष्वेव परापेक्षया दीर्घव्यवहारदर्शनात् । न चैकस्य दीर्घत्वं ह्रस्वत्वं चोभयमपि वास्तवं युक्तम्, विरोधात् । अथ कस्माद् दीर्घव्यवहार एव गौणो न भवति? न तस्योत्पत्तिकारणासम्भवात् । सर्वत्रैव भाक्तो हस्वव्यवहारो भवतु? नैवम्, मुख्यभावे गौणस्यासम्भवात् । अथेदानीमुत्पाद्यस्य परिमाणस्य कारण निरूपणार्थमाह- अनित्यं चतुर्विधमपीति । अनित्यं चतुर्विधमपि दीर्घं ह्रस्वं महद् अणु चेति चतुविधं परिमाणम्, संख्यापरिमाणप्रचययोनि संख्यापरिमाणप्रचयकारणकम् । संख्याया-परस्पर साक्षेप दीर्घत्व का भी व्यवहार होता है । ह्रस्वत्व और दोघंव दोनों परस्पर विरुद्ध दो धर्म हैं, अतः एक आश्रय में उक्त दोनों धर्मो की वास्तविक सत्ता नहीं मानी जा सकती । ( प्र ० ) तो फिर दीर्घत्व का ही व्यवहार गौण क्यों नहीं हैं? ( उ ० ) उनमें भाक्त दीर्घश्व के व्यवहार को गौण मानने का कारण नहीं है, अतः वहाँ दीर्घत्व व्यवहार को गौण नहीं मानते । ( प्र ० ) सभी जगहों में ह्रस्वत्व व्यवहार को गौण ही क्यों नहीं मान लेते? ( उ ० ) जहाँ जिसका मुख्य व्यवहार सम्भव होता है, वहाँ उस व्यवहार को गौण नहीं माना जा सकता । अब उत्पत्तिशील परिमाण के कारणों का निरूपण करने के लिए ' अनित्यं चतुर्विधमपि ' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । ' अनित्यं चतुविधमपि ' अर्थात् अनित्य दीर्घे, ह्रस्व, अणु एवं महत् ये चारों प्रकार के परिमाण ' संख्यापरिमाणप्रचययोनि ' अर्थात् ये चारों प्रकार के परिमाण संख्या परिमाण एवं प्रचय इन तीनों में से ही किसी से उत्पन्न होते हैं । संख्यादि तीनों कारणों में से ( क्रमप्राप्त ) संख्या में परिमाण को कारणता ' तत्र ' इत्यादि से दिखलाते हैं । ' परमाणुभ्यामारब्धं द्वयणुकम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार दो द्वथणुकों से उत्पन्न होने के कारण ' द्वणुक ' ही यहाँ ' परमाणुद्वयणुक ' शब्द का अर्थ है । ' तेषु त्रिषु ' अर्थात् For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३१३ स्तावत्कारणत्वमाह - तत्रेति । परमाणुभ्यामारब्धं द्वयणुकं परमाणुयणुक-मित्युच्यते । तेषु त्रिष्वेकगुणालम्बनामीश्वरबुद्धिमपेक्ष्योत्पन्ना या त्रित्वसंख्या सा त्रिभिर्द्वयणु कैरारब्धकार्यद्रव्ये त्र्यणुकलक्षणे रूपाद्युत्पत्तिसमकालमेव महत्त्वं दीर्घत्वं च करोति । तत्रेतिपदं महत्परिमाणका रणनिवारणार्थम्, त्र्यणुकादीत्यादिपदं चतुर-कादिपरिग्रहार्थम् । कथं पुनरेष निश्चयः, त्र्यणुकादिपरिमाणस्य द्व्यणुकगता बहुत्वसंख्यैवासमवायिकारणमिति? अन्यस्यासम्भवात् । न तावद् द्वयणुकवृत्तयो रूपरसगन्धस्पर्शेकत्वैकपृथक्त्वगुरुत्व द्रवत्वस्नेहास्तस्यासमवायिकारणम्, तेषां कारणवृत्तीनां कार्ये गुणमारभमाणानां समानजातीयगुणान्तरारम्भे एव सामर्थ्य-दर्शनात् । द्वद्यणुकाणुपरिमाणानां चारम्भकत्वे त्र्यणुकस्याणुत्वमेव स्यान्न महत्त्वम्, परिमाणात् समानजातीयस्यैव परिमाणस्योत्पत्त्यवगमात् । अस्ति चात्र महत्त्वम्, भूयोऽवयवारब्धत्वात् घटादिवत् । न चासमवायिकारणं विना कार्यमुत्पद्यते दृष्ट-श्चान्यत्रावयवसंख्याबाहुल्यात् समानपरिमाणारब्धयोः कार्ययोरेकत्र महत्त्वा उक्त तीनों परमाणु द्वघणुकों में से प्रत्येक में एक गुण विषयक ( एकत्व संख्या विषयक ) ' यह एक है ' इस आकार के ईश्वरीयज्ञान ( रूप अपेक्षा बुद्धि ) से जो त्रित्व संख्या उत्पन्न होती है. वही तीन द्वयणुकों से उत्पन्न व्यसरेणु रूप द्रव्य में रूपादि गुणों की उत्पत्ति के समय ही महत्त्व और दीर्घत्व परिमाण को उत्पन्न करती है । ( ' तत्रेश्वरबुद्धि ' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त ) ' तत्र ' पद यह समझाने के लिए है कि व्यसरेणु में रहनेवाले महत्त्व की कारणता महत्परिमाण में नहीं है । ( त्र्यणुकादि पद में प्रयुक्त ) ' आदि ' पद ' चतुरणुक ' का संग्राहक है । ( प्र ० ) यह निर्णय कैसे करते हैं कि त्र्यणु-कादिगत परिमाणों का द्वयणुकों में रहनेवाली बहुत्व संख्या ही कारण है? ( उ ० ) चूंकि दूसरी किसी वस्तु में उक्त परिमाण की कारणता सम्भव नहीं है । समवायि-कारणों में रहनेवाले रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, एकत्व, एकपृथक्त्व, गुरुत्व, द्रवत्व और स्नेह ये सभी गुण अपने आश्रय रूप समवायिकारणों से उत्पन्न द्रव्य में रहनेवाले कथित रूपादि गुणों में से कोई भी व्यसरेणु में रहनेवाले परिमाणों के असमवायि-कारण नहीं हो सकते । द्वणुकों के अणुपरिमाण भी त्र्यणुकादि के परिमाणों कारण के नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा मानने पर त्र्यणुक का परिमाण भी ' अणु ' ही होगा ' महत् ' नहीं, क्योंकि यह नियम है कि परिमाण अपने समानजातीय दूसरे परिमाण को ही उत्पन्न कर सकता है, विभिन्न जातीय परिमाणों को नहीं । व्यणुकादि द्रव्यों में महत्परिमाण ही है, क्योंकि ( महत्परिमाणवाले ) घटादि की तरह वे भी बहुत से अवयवों से उत्पन्न होते हैं । असमवायिकारण के बिना ( समवेत ) कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है, और स्थानों में भी समानपरिमाण के विभिन्न न्यूनाधिक संख्या के अवयवों से उत्पन्न द्रव्यों For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३२४ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-त्पत्तिसमकालं महत्वं दीर्घत्वं च करोति । द्विबहुभिर्महद्भिश्चाधे कार्यद्रव्ये कारण महत्वान्येव महत्वमारभन्ते न बहुत्वम् । समान-रूप द्रव्य में जिस समय रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी समय उक्त बहुत्व संख्या से उक्त द्रव्य में महत्त्व एवं दीर्घत्व परिमाणों की भी उत्पत्ति होती है । महत्परिमाणवाले दो या उससे अधिक अवयवों से उत्पन्न द्रव्य में कारणों ( अवयवों ) के महत्त्व ही महत्परिमाण को उत्पन्न करते हैं, न्यायकन्दली तिशयः । तेनात्र संख्याया एव कारणत्वं कल्प्यते । द्वयणुकसंयोगाभ्यां त्र्यणुके महत्त्वोपपत्तिः स्यात्, यदि भूयसामवयवानां संयोगः कारणमित्युच्यते, प्राप्ता-प्राप्तविवेकादवयवानां भूयस्त्वमेव कारणं समर्थितं स्यात्, ईश्वरबुद्धयपेक्षस्य त्रित्वस्य स्थितिहेत्वदृष्टक्षयाद्विनाशो न तु कदाचिदाश्रयविनाशादपि विनाशः, ईश्वरबुद्धेनित्यत्वात् । सम्प्रति महत्त्वान्महत्त्वोत्पत्तिमाह - द्विबहुभिर्महद्भिरिति । द्वौ च वहवश्च, तैरारब्धे कार्यद्रव्ये कारण महत्त्वान्येव महत्त्वमारभन्ते यत्र द्वाभ्यां महद्भ्यामप्रचिताभ्यामारम्यते द्रव्यं तत्रावयवमहत्त्वाभ्यामेव महत्त्व -स्योत्पादो बहुत्वसंख्याप्रचययोरभावात् । यत्र च बहुभिर्महद्भिरवयवैः कार्यमा -रभ्यते तत्रावयवमहत्त्वेभ्योऽवयविनि महत्त्वस्योत्पादो न बहुत्वसंख्यायाः, समान-में परिमाण का न्यूनाधिकभाव देखा जाता है, अतः कल्पना करते हैं कि ( त्र्यणुकादि द्रव्यों के परिमाण का ) संख्या ही ( असमवायि ) कारण है । अगर बहुत से अवयवों के संयोग को ही उन महत्त्वों का कारण मानें तो फिर विचार कर देखने से समवायि-कारणोंके बहुत्व में ही उक्त महत्त्वों की कारणता का समर्थन होता है । ईश्वर की अपेक्षा बुद्धि से उत्पन्न होनेवाले त्रित्व का विनाश उसके संस्थापक अदृष्ट के नाश से ही होता है. आश्रय के विनाश से उसका विनाश कभी नहीं होता, क्योंकि ईश्वर नित्य है । ' द्विबहुभिर्महद्भिः ' इत्यादि से महत्परिमाण से पहत्परिमाण की उत्पत्ति कहते हैं । ' द्वौ च बहवश्च द्विबहवः तैः द्विबहुभिः इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि दो या उनसे अधिक महान अवयवों से आरब्ध द्रव्य के महत्त्व की उत्पत्ति समवायिकारणों के महत्त्व से ही होती है । अभिप्राय यह है कि जिस द्रव्य की उत्पत्ति प्रचय से शून्य दो महान् अवयवों से होती है, उस द्रव्य के महत्व का ( असमवायि ) कारण उन दोनों अवयवों के दोनों महत्त्व ही हैं, क्योंकि महत्त्व के उक्त कारणों में से बहुत्व संख्या और प्रचय ये दोनों ही वहाँ नहीं हैं जहाँ बहुत से महान् अवयवों से कार्यद्रव्य की उत्पत्ति होती है, उसमें अवयवों के महत्त्व से ही For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् संख्ये चारब्धेऽतिशय दर्शनात् । प्रचयश्च पिण्डारम्भकावयव प्रशिथिलसंयोगानपेक्षमाण ३२५ तूलपिण्डयोर्वर्तमानः इतरेतर पिण्डावयव-बहुत्व संख्या नहीं, क्योंकि समान संख्या के ( अथ च न्यूनाधिक परिमाणवाले ) अवयवों से उत्पन्न द्रव्यों में न्यूनाधिक परिमाण की उपलब्धि होती है । रूई के खण्डों से उत्पन्न एक अवयवी रूप रूई का महत्त्व, इन अवयवी के उत्पादक रूई के खण्डों में रहनेवाले ' प्रचय ' से ही उत्पन्न होता है न्यायकन्दली संख्यैः स्थूलैः सूक्ष्मैश्चारब्धयोर्द्रव्ययोः स्थूलारब्धे महत्त्वातिशयदर्शनात् । संख्यायाः कारणत्वे हि कार्यविशेषो न स्यात्, तस्या अविशेषात् । यत्र तु समानपरि-मारवयवैरारब्धयोरवयवसंख्या बाहुल्यादेकत्र परिमाणातिशयो दृश्यते तत्रावयव-संख्यापि कारणमेष्टव्या, अन्यथा कार्यविशेषायोगः | यत्र समान संख्यैः सामानपरिमाणैश्च कार्यमारब्धम्, तत्र महत्त्वोत्पत्तावुभयोरपि कारणत्वम्, प्रत्येक-मुभयोरपि सामर्थ्यदर्शनात्, तत्रान्यतरविशेषादर्शनादित्येके । अपरे तु परिमाणस्यैव कारणतामाहुः समानजातीयात् कार्योत्पत्तिसम्भवे विजातीयकारणकल्पना-नवकाशात् । प्रचयमाह — प्रचयश्चेति । संयोगविशेषः 1 स तु प्रचय इति द्रव्यारम्भकः प्रशिथिलः द्वितलकद्रव्यारम्भकयोस्तूलपिण्डयोर्वर्तमानः महत्त्व की उत्पत्ति होती है, अवयवों की बहुत्व संख्या से नहीं, क्योंकि समान संख्या के स्थूल और सूक्ष्म अवयवों से आरब्ध दो द्रव्यों के दोनों महत्त्वों में अन्तर देखा जाता है । अगर अवयवों में रहनेवाली संख्याओं को ही महत्त्व का कारण मानें तो उक्त अन्तर की उपपत्ति नहीं होगी, क्योंकि वह तो दोनों द्रव्यों के अवयवों में समान ही है । जहाँ समान परिमाण के अथ च विभिन्न संख्या के अवयबों से उत्पन्न दो द्रव्यों के दोनों महत्त्वों में अन्तर देखा जाता है, वहाँ ( महान् अववयों से उत्पन्न द्रव्य में रहनेवाले महत्परिमाण के प्रति भी ) अवयवों में रहनेवाली संख्या ही कारण है, अन्यथा उक्त महत्परिमाणों में अन्तर की उपपत्ति नहीं होगी । किसी सम्प्रदाय का कहना है कि समान संख्या के एवं समान परिमाणों के अवयवों से जिस द्रव्य की उत्पत्ति होती है, उस द्रव्य के महत्परिमाण का अवयवों की संख्या और उनके महत् परिमाण दोनों ही कारण हैं, क्योंकि संख्या एवं परिमाण दोनों में ही परिमाण की कारणता निश्चित है । उक्त स्थल में दोनों में से किसी एक को ही कारण मानने की कोई विशेष युक्ति नहीं है । इसी प्रसङ्ग में किसी दूसरे सम्प्रदाय का कहना है कि अवयवों का महत्त्व ही प्रकृत महत्परिमाण का कारण है, अवयवों की संख्या नहीं, क्योंकि जहाँ समानजातीय कारण से ही कार्य की सम्भावना हो वहाँ विभिन्न जातीय वस्तु में उसकी कारणता की कल्पना व्यर्थ है । For Private And Personal