प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 401–410

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३२६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे परिमाण-प्रत्येकं पिण्डयोरारम्भकान् प्रशिथिलानवयवसंयोगानपेक्षमाण इतरेतरपिण्डयोरवयवानां परस्परसंयोगानपेक्षमाणो वा द्वितल महत्त्वमारभ्यते । यत्र पिण्डयोः संयोगः स्वयं प्रशिथिलस्तयोरा-रम्भकाश्चावयवसंयोगा अपि प्रशिथिलास्तत्र पिण्डाभ्यामारब्धे द्रव्ये निबिडा-वयवसंयोगारब्धपिण्डद्वयनिबिड संयोगजनितद्रव्यापेक्षया महत्त्वातिशयदर्शनात्, पिण्डयोः प्रशिथिलः संयोगः पिण्डारम्भक प्रशिथिलसंयोगापेक्षो महत्त्वस्य कार-णम् । यत्र तु पिण्डयोः संयोगः प्रशिथिल इतरेतरपिण्डावयवानामितरेतरावयवः संयोगा अपि प्रशिथिलाः, पिण्डयोरारम्भकाश्च न प्रशिथिलाः, तत्र पिण्डाभ्या-मारब्धे द्रव्येऽत्यन्तनिबिडपरस्परावयवसंयोग पिण्डद्वयारब्धद्रव्यापेक्षया महत्त्वा तिशयदर्शनात् पिण्डयोः प्रशिथिलः संयोग इतरेतरपिण्डावयवसंयोगापेक्ष महत्त्वस्य कारणमिति विवेकः । ' प्रचयश्च ' इत्यादि से प्रचय ( का स्वरूप ) कहते हैं । द्रव्य के उत्पादक ( असम-वायिकारण ) विशेष प्रकार के संयोग को ही ' प्रचय ' कहते हैं । रूई के दो खण्डों से रूई के जिस एक अवयवी की उत्पत्ति होती है, उस अवयवी रूप ( द्विलकपिण्ड ) में महत्परिमाण की उत्पत्ति इस द्रव्य के उत्पादक दोनों अवयवों में रहनेवाले प्रचय से होती है । ( १ ) कोई कहते हैं कि इस प्रकार अवयवों के प्रचय से अवयवी के महत्परिमाण उत्पादन में उन उत्पादक अवयवों के अवयवों में रहनेवाले प्रशिथिल संयोग रूप प्रचय के भी साहाय्य की आवश्यकता होती है । ( २ ) ( कोई कहते हैं कि ) इसकी आवश्यकता नहीं होती है, अवयवों के अवयवों में रहनेवाले साधारण, संयोग रहने से ही काम चल जाएगा । ( इनमें प्रथम पक्ष का स्वारस्य यह है कि ) जिस अवयवी के उत्पादक दोनों अवयवों का संयोग प्रशिथिलात्मक है एवं अवयवों के उत्पादक अवयवों का संयोग भी प्रशिथिलात्मक ही है, इन दोनों मूलावयवों से उत्पन्न अवयवी रूप द्रव्य में जो महत्त्व है, एवं जिन अवयवों का निर्माण निबिड़ संयोग वाले दो अवयवों से हुआ है, उन अवयवों के निविड़ संयोग से उत्पन्न द्रव्य में जो महत्त्व है, उन दोनों महत्त्वों में अन्तर देखा जाता है, अतः अवयवों के प्रशिथिल संयोग के द्वारा महत्त्व के उत्पादन में उसके अवयवावयवों के परस्पर प्रशिथिल संयोग को भी अपेक्षा होती है । एवं जहाँ दोनों अवयवों का ( अनारम्भक ) संयोग प्रशिथिलात्मक है, एवं अवयवावयवों के परस्पर संयोग भी प्रशिथिलात्मक हो है, किन्तु दोनों अवयवों का आरम्भक संयोग प्रशिथिलात्मक नहीं है, इन दोनों से आरब्ध अवयवी का महत्त्व उस द्रव्य के महत्व से अधिक देखा जाता है । जिसके अवयवों का संयोग एवं अवयवावयवों के परस्पर संयोग सभी घन ' ( निबिड़ ) हैं । इन अवयवों से जिस द्रव्य की उत्पत्ति होती है, उस द्रव्य में रहनेवाले महत्त्व का उत्पादन अवयवों का प्रशिथिल संयोग अवयवावयवों के परस्पर निबिड़ संयोग के साहाय्य से ही करता है । For Private And Personal

पृष्ठ 402

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३२७ संयोगापेक्षो वा द्वितूल के महत्त्वमारभते न बहुत्वमहत्त्वानि, समान-संख्यापलपरिमाणैरारब्धेऽतिशय दर्शनात् । द्वित्वसंख्या चाण्योर्वर्तमाना बहुत्व संख्या से नहीं, महत्परिमाण से भी नहीं । अवयवों में रहनेवाला यह प्रचय उक्त महत्त्व के उत्पादन में कहीं अपने आश्रय रूप रूई के दो खण्डों के अवयवों के प्रशिथिल संयोग रूप प्रचय की अपेक्षा रखता है, कहीं वह अपने आश्रयीभूत दोनों अवयवों के उत्पादक साधारण संयोग की सहायता से ही उक्त महत्परिमाण को उत्पन्न करता है । दो परमाणुओं में रहनेवाली द्वित्व संख्या द्वयणुक में परिमाण को उत्पन्न करती है । जिस न्यायकन्दली अथ कथं तत्र बहुत्वमहत्त्वयोरेव क्लृप्तसामर्थ्ययोः कारणत्वं नेष्यते? तत्राह - न बहुत्वमहत्त्वानीति । प्रचयभेदापेक्षया बहुवचनम् । यत्र प्रचयविशेषात् परिमाणविशेषप्रतीतिरस्ति तत्र बहुत्वं महत्त्वं च न कारणमित्यर्थः । अत्रोपपत्ति: -समानसंख्यापलपरिमाणैरारब्धेऽतिशयदर्शनात् । संख्या च पलं च परिमाणं च संख्यापलपरिमाणानि, समानानि संख्यापलपरिमाणानि येषां तैरारब्धे कार्येऽतिशयदर्शनात् । यदि हि संख्येव कारणं समानसंख्यैस्त्रिभिश्चतुभिर्वा प्रशिथिलसंयोगनिबिड संयोगैश्चारब्धयोर्द्रव्ययोः प्रशिथिल संयोगारब्धे निबिड -संयोगारब्धापेक्षया महत्त्वातिशयो न स्यात्, कारणसंख्याया उभयत्रापि तुल्य-त्वात् । तथा यदि महत्त्वमपि कारणं समान महत्त्वः प्रचितैरप्रचितैश्चारब्धयो-महत्परिमाण में एवं बहुत्व संख्या में महत्परिमाण की कारणता स्वीकृत है ही, फिर इन्हीं दोनों में से किसी को इस महत्परिमाण का भी कारण क्यों नहीं मान लेते? इसी प्रश्न का समाधान ' न बहुत्व महत्त्वानि ' इत्यादि से देते हैं । ' बहुत्व महत्त्वानि ' इस पद में बहुवचन का प्रयोग उन दोनों के आश्रयों में जो बहुत्व है उसके अभिप्राय से है । ' विशेष प्रकार के प्रचय से उत्पन्न महत्परिमाण का कारण महत्त्व और बहुत्त्व संख्या नहीं हो सकती ' इस सिद्धान्त की युक्ति ही ' समान संख्यापलपरिमाणैरारब्धेऽतिशयदर्शनात् ' इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित हुई है । ' संख्या च पलव परिमाणञ्च संख्यापलपरिमाणानि, समानानि संख्यापल-परिमाणानि येषां तैः आरब्धेऽतिशयदर्शनात् ' अगर उक्त महत्त्व का कारण केवल संख्या ही हो प्रचय नहीं तो फिर तीन या चार अवयवों के प्रशिथिल संयोग से उत्पन्न परिमाण में एवं तीन या चार ही अवयवों के निबिड़ संयोग से उत्पन्न परिमाण में अन्तर उपपन्न नहीं होगा, क्योंकि दोनों द्रव्यों के कारणों की संख्या समान हैं । अगर केवल अवयवों के महत्त्व को ही उक्त महत्परिमाण का भी कारण मानें ( प्रचय को नहीं ) तो फिर For Private And Personal

पृष्ठ 403

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३२८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे परिमाण-द्रव्ययोरप्रचितारब्धापेक्षया प्रचितारब्धे परिमाणातिशयो न भवेत्, अस्ति च विशेष:, तेनैव तर्कयामो न संख्या कारणं न महत्त्वमिति । यत्र त्वप्रचिते-रणुभिर्महद्भिश्च प्रचितैरारब्धयोर्द्रव्ययोः प्रचितैर्महद्भिरारब्धे महत्त्वातिशय-दर्शनं तत्र महत्त्वप्रचययोः कारणत्वम् । यत्र प्रचितैः समानपरिमाणैर्बहुतर-संख्याकै र प्रचितैश्चारब्धयोर्द्रव्ययोर्बहुतरसंख्याकैः प्रचितैरारब्धेऽतिशयदर्शनम्, तत्र संख्याप्रचययोः कारणत्वम् । यत्राप्रचितैरणुभिरल्पसंख्यैरारब्धात् प्रचितबहुतर-स्थूलारब्धे विशेषदर्शनम्, तत्र त्रयाणामेव बोद्धव्यम् । यस्तु मन्यते तुलापरि-मेयेषु द्रव्येषु कारणगतानि पलानि परिमाणोत्पत्तौ कारणं न महत्परिमाणानि, तन्मतेपलस्य कारणत्वमभ्युपगम्य प्रतिषेधः कृतः, स्वमते तु पलस्याकारणत्वात् । द्वित्वसंख्या चाण्वोर्वर्तमाना द्वयणुकेऽणुत्वमारभते । यस्तु परमाणु-परिमाणाभ्यामेव द्र्यणुके परिमाणोत्पत्तिमिच्छति, तं प्रति द्वयणुकस्याप्यणु-महत्त्व एवं प्रचय इन दोनों से युक्त अवयवों के द्वारा उत्पन्न द्रव्य के परिमाण में एवं महत्त्व से युक्त किन्तु प्रचय से रहित अवयवों से उत्पन्न द्रव्य के महत्त्व में अन्तर की उपलब्धि नहीं होगी, किन्तु उक्त दोनों द्रव्यों के परिमाणों में अन्तर अवश्य है । अतः यह तर्क करते हैं कि उन महत्परिमाणों का अवयवों के महत्परिमाण या संख्या कारण नहीं हैं, क्योंकि प्रचयशून्य अणुओं से उत्पन्न द्रव्य के परिमाण की अपेक्षा प्रचय एवं महत्त्व इन दोनों से युक्त अवयवों के द्वारा उत्पन्न द्रव्य के परिमाण में विशेष प्रकार के महत्त्व की उपलब्धि होती है, अतः ऐसे स्थलों के महत्त्व का महत्व और प्रचय दोनों ही कारण हैं । प्रचय से युक्त बहुत से समान परिमाण के अवयवों से उत्पन्न द्रव्य के महत् परिमाण में, प्रचय से युक्त उससे अधिक संख्या के एवं उसी प्रकार के महत्त्व से युक्त अवयवों से उत्पन्न द्रव्य के परिमाण में भी अन्तर उपलब्ध होता है, अतः ऐसे स्थलों में संख्या, प्रचय एवं महत्परिमाण ये तीनों ही उस प्रकार के महत्परिमाण के ) कारण हैं । जो कोई यह मानते हैं कि योग्य द्रव्यों के महत्परिमाणों का कारण कारणों में रहनेवाले तराजू से तौले जाने ' पल ' ( कर्षचतुष्टय ) ही हैं, कारणों में रहनेवाले महत्परिमाण नहीं, उनके मत के अनुसार पल में महत्परिमाण की कारणता मानकर ही उसका खण्डन किया है, क्योंकि अपने सिद्धान्त में पल में महत्व-रिमाण की कारणता स्वीकृत नहीं है ' द्वित्वसंख्या चाण्वोर्वर्तमाना द्वयणुकेऽणुत्वमारभते ' जो कोई दो परमाणुओं के दोनों अणुत्वों को ही द्वघणुक परिमाण का कारण मानते हैं, उनके लिए पहिले को इस युक्ति को दुहराना भी ठीक है कि उनके मत में द्वणुक का परिमाण परमाणुओं के For Private And Personal

पृष्ठ 404

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३२६ णुकेऽणुत्वमारभते । महत्त्ववत् त्र्यणुकादौ कारण बहुत्व महत्त्व-समानजातीय प्रचयेभ्यो दीर्घत्वस्योत्पत्तिः । अणुत्ववद्यणुके द्वित्व-संख्यातो ह्रस्वत्वस्योत्पतिः । प्रकार महत्त्व की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार समवायिकारणों में रहने-वाली संख्या, समवायिकारणों में रहनेवाले महत् ( दीर्घ ) परिमाण, एवं समवायिकारणों में रहनेवाला समानजातीय प्रचय इन्हीं सबों से व्यसरेणु प्रभृति द्रव्यों में दीर्घत्व की भी उत्पत्ति होती है । द्व्यणुक में अणुत्व परिमाण की तरह ह्रस्वत्व की भी उत्पत्ति द्वयणुक के अवयव भूत दोनों परमाणुओं में रहने-वाली द्वित्व संख्या से ही होती है । न्यायकन्दली तमत्वप्रसक्तिरिति पूर्विकैव युक्तिरावर्तनीया । अधिकं चैतद् यन्नित्यद्रव्यपरिमा-णस्यानारम्भकत्वम् । परमाणुपरिमाणं न भवति कस्यचिदारम्भकं नित्यद्रव्य-परिमाणत्वात्, आकाशादिपरिमाणवत्, अणुपरिमाणत्वाद्वा मनःपरिमाणवत् । दीर्घत्वस्योत्पत्तिमाह- महत्त्ववदिति । यथा महत्त्वस्य कारणबहुत्वात् समानजातीयात् कारणमहत्त्वात् प्रचयाच्चोत्पत्तिरिति सर्वमस्य महत्त्वेन सह तुल्यम् । द्वयणुके ह्रस्वत्वस्यापि द्वित्वसंख्यैवासमवायिकारणमित्याह - अणुत्व-वदिति । कथमेकस्मात् कारणात् कार्यभेदः? अदृष्टविशेषस्य सहकारिणो भेदात् । महत्त्वविशेष एव दीर्घत्वम्, अणुत्वविशेष एव ह्रस्वत्वमिति मन्यमान परिमाणों से भी अल्प हो जाएगा । इस प्रसङ्ग में इतना और भी कहना चाहिए कि नित्यपरिमाण कभी कारण नहीं होता है, अतः आकाश परिमाण की तरह नित्य होने के कारण परमाणुओं के परिमाण किसी के कारण नहीं हो सकते । एवं जिस प्रकार मन का परिमाण अणु होने से किसी का कारण नहीं होता है, उसी प्रकार परमाणुओं का परिमाण भी अणु होने से किसी का कारण नहीं हो सकता । ' महत्त्ववत् ' इत्यादि सन्दर्भ से दीर्घत्व परिमाण की उत्पत्ति का क्रम कहते है । जैसे कि महत्परिमाण की उत्पत्ति ( उस के आश्रय द्रव्य के उत्पादक अवयवरूप ) कारणों की बहुत्व ( संख्या ) से और कारणों के महत्त्व और प्रचय से होती है, ये सभी दीर्घत्व में भी महत्त्व के ही जैसे हैं । द्वणुक के हस्वत्व में भी ( उसके अणुत्व की तरह ) कारणों में रहनेवाली द्वित्व संख्या ही कारण है, यही बात ' अणुत्ववत् ' इत्यादि से कहते हैं । ( प्र ० ) ( परमाणुओं की ) एक ही ( द्वित्व संख्यारूप ) कारण से ( अणुत्व और ह्रस्वत्व रूप ) दो विभिन्न कार्यं कैसे होते हैं? ' ( उ ० ) अदृष्ट रूप सहकारिकारणों के भेद से ( उक्त एक कारण से ) विभिन्न कार्यों की उत्पत्ति होती हैं । ४२ For Private And Personal

पृष्ठ 405

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३३० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-अथ त्र्यणुकादिषु वर्त्तमानयोर्महत्त्वदीर्घस्वयोः परस्परतः को विशेषः? द्वयणुकेषु चाणुत्वह्रस्वत्वयोरिति । महत्वदीर्घत्वयोः परस्परतो विशेषः, महत्सु दीर्घमानीयताम्, दीर्घेषु ( प्र ० ) त्र्यसरेणु प्रभृति द्रव्यों में रहनेवाले महत्त्व और दीर्घत्व एवं द्वयणुकादि रहनेवाले अणुत्व ह्रस्वत्व में और इनमें क्या अन्तर है? ( उ ० ) ' भारी वस्तुओं में से जो लम्बी हो उसे ले आओ ' यह व्यवहार ही प्रकृत में महत्त्व और दीर्घत्व में भेद का आह - अथेति । समाधत्ते - तत्रास्तीति । यदि दीर्घ महत्त्वयोरभेदो दीर्घेषु महदानीयतामिति निर्धारणं न स्यादभेदात् । नहि भवति रूपवत्सु रूपवदा-नीयतामिति, अस्ति चेदं निर्धारणम् । तेन दीर्घत्वमहत्त्वयोर्भेदः कल्प्यते, परि-माणस्य व्याप्यवृत्तित्वादेकस्मिन् द्रव्ये परिमाणद्वयानुपपत्तिरिति चेन्न, विजातीय-योरेकत्र वृत्त्यविरोधात् अवान्तरजातिभेदेऽपि नीलपीतयोरेकत्र समावेशो न दृष्ट इति चेत्? ययोर्न दृष्टस्तयोर्मा भूत्, दीर्घत्वमहत्त्वयोस्तु सहभावः सर्वलोक-प्रतीतिसिद्धत्वादशक्यनिराकरणः । ' अर्थ ' इत्यादि से कोई आक्षेप करते हैं कि ( प्र ० ) दीर्घत्व विशेष प्रकार के महत्त्व से कोई अलग वस्तु नहीं है । एवं ह्रस्वत्व भी अणुत्व का ही एक विशेष रूप है ( दीर्घत्व और ह्रस्वत्व नाम का कोई अलग परिमाण नहीं है ) । ' तत्रास्ति ' इत्यादि सन्दर्भ से इसका उत्तर देते हैं कि अगर महत्व और दीर्घत्व दोनों अभिन्न हों तो फिर ' इन लम्बे द्रव्यों में जो सबसे भारी हो उसे ले आओ ' इत्यादि प्रकार के निर्द्धारिणों की उपपत्ति नहीं होगी, क्योंकि दोनों अभिन्न हैं । यह निद्धरण नहीं होता कि ' रूपयुक्तों में से रूपयुक्त को ले आओ, किन्तु ( पहिला ) निर्द्धारण होता है, अतः दीर्घत्व और महत्त्व में अवश्य ही अन्तर है । ( प्र ० ) परिमाण व्याप्यवृत्ति ( अपने आश्रय को व्याप्त करके रहनेवाली ) वस्तु है, अतः एक द्रव्य में दो ( दीर्घत्व और महत्त्व या हस्वत्व और अणुत्व ) परिमाण नहीं रह सकते । ( उ ० ) विभिन्न जाति के दो ( व्याप्यवृत्ति ) वस्तुओं का भी एक आश्रय में सत्ता मानने में कोई विरोध नहीं है । ( प्र ० ) ( रूपत्व धर्म के एक होने पर भी ) अवान्तर ( रूपत्वव्याप्यनीलत्वादि ) रूपों से विभिन्न नीलपीतादि रूप एक आश्रय में नहीं देखे जाते । ( उ ० ) जिन्हें एकत्र नहीं देखा जाता है उनका एकत्र रहना मत मानिए, किन्तु इससे साधारण जनों के अनुभव से सिद्ध महत्त्व और दीर्घत्व का एकत्र रहना आप नहीं रोक सकते । For Private And Personal

पृष्ठ 406

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३३१ प्रशस्तपादभाष्यम् च महदानीयतामिति विशिष्टव्यवहारदर्शनादिति । अणुत्वह्रस्वत्व-योस्तु परस्परतो विशेषस्तद्दर्शिनां प्रत्यक्ष इति । तच्चतुर्विधमपि परिमाणमुत्पाद्यमाश्रयविनाशादेव विनश्यतीति । बोधक प्रमाण है । अणुत्व और ह्रस्वत्व के अन्तर का प्रत्यक्ष तो उसके श्रीभूत ( परमाणु एवं द्वणुक ) के प्रत्यक्ष से युक्त पुरुष को ही होता है । उत्पत्तिशील ये चारों प्रकार के परिमाण आश्रयों के विनाश से ही विनाश को प्राप्त होते हैं । न्यायकन्दली द्वयणुकवतनो रणुत्व ह्रस्वत्वयोस्तु भेदो योगिनां प्रत्यक्ष इत्याह- अणुत्व-ह्रस्वत्वयोस्त्विति । अस्मदादीनां तु भाक्तयोरणुत्वहस्वत्वयोर्भेदे तन्मुख्ययोरपि भेदानुमानम् । एतच्चतुर्विधमपि परिमाणमाश्रयविनाशादेव विनश्यति नान्यस्मा-दिति नियमः । उत्पाद्यग्रहणेन परमाणुपरमहस्वपरममहत्परमदीर्घव्यवच्छेदः । महत्त्वयोः दीर्घत्व ह्रस्वत्वयोश्च परस्परापेक्षाकृतत्वम्, न तु स्वाभाविक-त्वमिति चेत्? तत्र केवलावस्थायां हस्तवितस्त्यादिपरिमितस्य परिमाणस्य सापेक्षावस्थायामपि भेदानुपलब्धेः उदयाभावप्रसङ्गाच्च । किमर्थं तर्ह्यपेक्षा? ' rga स्वत्वयोस्तु ' इत्यादि से कहते हैं कि द्वयणुक में रहनेवाले ह्रस्वत्व एवं अणुत्व इन दोनों को योगीजन हो अपने ( असाधरण ) प्रत्यक्ष के द्वारा देख सकते हैं । ' यह नियम है कि ये चारों प्रकार के उत्पन्न होनेवाले परिमाण अपने अपने आश्रयों के नाश से ही नष्ट होते हैं ' ( इस अर्थ के ज्ञापक वाक्य में ) ' उत्पाद्य ' पद के उपादान से ( परमाणु में रहनेवाले ) परम ह्रस्वत्व एवं परमाणुत्व तथा ( आका-शादि में रहनेवाले ) परममहत्त्व एवं परमदीर्घत्व को ( आश्रय के नाश से नष्ट होने-वाले परिमाणों से ) पृथक् करते हैं । ( प्र ० ) अणुस्व एवं ह्रस्वत्व, दीर्घत्व एवं महत्त्व ये सभी तो आपेक्षिक हैं, स्वाभाविक नहीं । ( उ ) एक हाथ या एक बीताभर द्रव्य जिस समय केवलावस्था में रहते हैं ( अर्थात् किसी ऐसे दूसरे द्रव्य के साथ नहीं रहते जिनकी अपेक्षा इनमें ह्रस्वता या दीर्घता का व्यवहार होता हो ) और जब कि वही द्रव्य न्यून या अधिक परिमाणवाले किसी दूसरे द्रव्य के साथ रहते हैं, तब उन दोनों अवस्थाओं के द्रव्य के परिमाण में अन्तर की प्रतीति नहीं होती है, एवं ( एक की परस्परापेक्ष होने के कारण ) इनकी उत्पत्ति अपेक्षा से अगर दूसरे की उत्पत्ति मानें तो, ही असम्भव हो जाएगी । ( प्र ० ) ( एक द्रव्य के परिमाण में ह्रस्वत्व या दीर्घत्व के व्यवहार के लिए ) दूसरे की अपेक्षा क्यों होती है? ( उ ० ) जिन दो परिमाणों में न्यूनाधिक व्यवहार की प्रतीति उनके आश्रयीभूत द्रव्यों के ग्रहण से ही होती है, उन दोनों परिमाणों में न्यूनाधिकभाव की प्रतीति के लिए हो दूसरे द्रव्य की अपेक्षा For Private And Personal

पृष्ठ 407

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३३२ न्याय कन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे पृथक्त्व-प्रशस्तपादभाष्यम् पृथक्त्वमपोद्धारव्यवहारकारणम् T तत्पुनरेकद्रव्यमनेकद्रव्यं च । तस्य तु नित्यत्वानित्यत्वनिष्पत्तयः संख्यया व्याख्याताः । ' अपोद्धार ' अर्थात् ' इससे यह पृथक् है ' इस व्यवहार ( ज्ञान और शब्दप्रयोग ) का कारण ही ' पृथक्त्व ' है । यह भी ( १ ) एकद्रव्य और ( २ ) अनेकद्रव्य भेद से दो प्रकार का है । इसके नित्यत्व और अनित्यत्व की सिद्धि भी संख्या की भाँति ही समझनी चाहिए | ( किन्तु संख्या से पृथक्त्व में इतना ही अन्तर है कि ) जिस प्रकार एकत्वादि संख्याओं में न्यायकन्दली प्रत्येकमाश्रयग्रहणे गृहीतयोरेव परिमाणयोः प्रकर्षभावाभावप्रतीत्यर्था, ययोरधि-गमादिदमस्माद्दीर्घमिदं ह्रस्वमिति व्यवहारः स्यात् । पृथक्त्वमपोद्धारव्यवहारकारणम् । अपोद्धारव्यवहार इदमस्मात् पृथगिति ज्ञानं व्यपदेशश्च तस्य कारणं पृथक्त्वमिति । व्याख्यानं पूर्ववत् । इतरेतराभावनिमित्तोऽयं व्यवहार इति चेन्न, प्रतिषेधस्य विधिप्रत्ययविषयत्वा-योगात् । तत्पुनरेकद्रव्यमनेकद्रव्यं च । एकं द्रव्यमाश्रयो यस्य तदेकद्रव्यम्, अनेकं द्रव्यमाश्रयो यस्य तदनेकद्रव्यम्, पुनःशब्द एकद्रव्यवृत्तेः परिमाणात् पृथक्त्वस्यैकानेकद्रव्यवृत्तित्वविशेषावद्योतनार्थः । परिमाणमेकद्रव्यम्, एक-पृथक्त्वं पुनरेकद्रव्यमनेकद्रव्यं चेति विशेषः । होती है, जिन दोनों को प्रतीति से ' इससे यह ह्रस्व है ' या ' इससे यह दीर्घ है ' इत्यादि व्यवहार होते हैं । ' पृथक्त्वमपोद्धारव्यवहारकारणम् ' कथित व्याख्या को तरह ' यह इससे पृथक् है ' इस आकार का ज्ञान एवं इस आनुपूर्वी के शब्द का प्रयोग ये दोनों ही ' अपोद्धारव्यवहार ' शब्द के अर्थ हैं । ( प्र ० ) उक्त व्यवहार तो ( अवधि और आश्रय ) इन दोनों में रहनेवाले भेद से ही होता है । ( उ ० ) ( भेद से पृथक्त्व की प्रतीति ) नहीं होती है, क्योंकि प्रतिषेध ( अभाव ) विधि प्रत्यय ( विना नञ्पद के वाक्य ) का विषय नहीं हो सकता । ' तत्पुनरेकद्रव्यमनेकद्रव्यञ्च ' इस वाक्य के ' एकद्रव्य ' शब्द की व्युत्पत्ति ' एकं द्रव्यम् आश्रयो यस्य ' इस प्रकार की है । उक्त वाक्य के ' पुन: ' शब्द से पृथक्त्व में परिमाण से इस अन्तर की सूचना दी गयी है कि परिमाण एक ही आश्रय ( द्रव्य ) में रह सकता है, किन्तु पृथक्त्व दोनों प्रकार का है । कोई पृथक्त्व एक ही द्रव्य में रहता है जैसे कि एकपृथक्त्व ) और कोई पृथक्त्व अनेक द्रव्यों में ही रहता है, ( जैसे कि द्विपृथक्त्वत्वादि ) । For Private And Personal

पृष्ठ 408

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३३३ तवांस्तु विशेषः - एकत्वादिवदेक पृथकृत्वादिष्व परसामान्याभावः, संख्यया तु विशिष्यते तद्विशिष्टव्यवहारदर्शनादिति । संख्यात्वरूप पर - सामान्य से अतिरिक्त एकत्वत्वादि अपर - सामान्य भी हैं, उस प्रकार से पृथक्त्व में एकपृथक्त्वत्वादि नाम का कोई भी अपर-सामान्य नहीं है । किन्तु पृथक्त्व संख्या के द्वारा ही औरों से अलग रूप समझा जाता है, क्योंकि पृथक्त्व का व्यवहार संख्या से युक्त होकर ही देखा जाता है । न्यायकन्दली तस्य तु नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः संख्यया व्याख्याताः । तस्य द्विविधस्यापि पृथक्त्वस्य नित्यत्वं चानित्यत्वं च निष्पत्तिश्च संख्यया व्याख्याताः । यथैक-द्रव्यैकत्वसंख्या परमाणुषु नित्या कार्ये कारणगुणपूर्विका आश्रयविनाशाच्च नश्यति, तथैकद्रव्यमेकपृथक्त्वम् । यथा अनेकद्रव्या द्वित्वादिका संख्या अनेक-गुणालम्बनाया अपेक्षाबुद्धेरुत्पद्यते तद्विनाशाच्च विनश्यति क्वचिच्चाश्रयविनाशा-द्विनश्यति तथानेकद्रव्य द्विपृथक्त्वादिकमपीत्यतिदेशार्थः । नित्यं चानित्यं च नित्यानित्ये, तयोर्भावो नित्यानित्यत्वमिति द्वन्द्वात् परं श्रवणात् त्वप्रत्ययस्य प्रत्येकमभिसम्बन्धः । अत्रापि वाक्ये तुशब्दो विशेषावद्योतनार्थः । तस्य नित्यत्वा -दयः संख्यया व्याख्याताः, न परिमाणस्येत्यर्थः । ' तस्य तु नित्यत्वानित्यत्वनिष्पत्तयः संख्यया व्याख्याताः ' अर्थात् इन दोनों प्रकार पृथक्त्वों के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय संख्या के नित्यत्व और अनित्यत्व के निर्णय के अनुसार समझना चाहिए । अर्थात् जैसे कि कार्यद्रव्य में रहनेवाली एकत्व रूप ' एकद्रव्या ' संख्या अनित्य है, क्योंकि आश्रय के नाश से उसका नाश हो जाता है, और परमाणु में रहनेवाली वही संख्या नित्य है । वैसे ही एक पृथक्त्व भी अनित्य और नित्य दोनों है । एवं जिस प्रकार द्वित्वादिरूप ' अनेकद्रव्या ' संख्या अनेक एकत्व रूप गुण विषयक अपेक्षा बुद्धि से उत्पन्न होती हैं और उस ( अपेक्षा ) बुद्धि के विनाश से विनष्ट होती है, उसी प्रकार द्विपृथक्त्वादि भी उत्पन्न और विनष्ट होते हैं । संख्या के धर्मो का पृथक्त्व में ' अतिदेश ' का यही अभिप्राय है । ' नित्यत्वानित्यत्व ' शब्द में ' त्वल् ' प्रत्यय नित्यञ्चानित्यञ्च नित्यानित्ये, तयोर्भावो नित्यानित्यत्वम् ' इस तरह के द्वन्द्व समास के बाद किया गया है, अत: उसका सम्बन्ध ( प्रयोग केवल अनित्य पद के बाद होने पर भी ) उस द्वन्द्व समान में प्रयुक्त प्रत्येक पद के साथ है । इस वाक्य में प्रयुक्त ' तु ' शब्द इस विशेष की सूचना के लिए है कि पृथक्त्वादि के नित्यत्वादि तो संख्या से व्याख्यात हो जाते हैं, किन्तु परिमाण के नित्यत्वादि नहीं । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे पृथक्त्व-एवं संख्यया सह पृथक्त्वस्य साधर्म्यं प्रतिपाद्य वैधम्र्म्यं प्रतिपादयति-एतावांस्त्विति । संख्यायाः सकाशात् पृथक्त्वस्यैतावान् भेदो यथा संख्यात्वपर-सामान्यापेक्षयैकत्वद्वित्वादिकमपर सामान्यमस्ति, तथा पृथक्त्वत्वपरसामान्या-पेक्षयैकपृथक्त्वत्वादिकमपरसामान्यं नास्तीति । कथं तर्ह्यनेकेष्वेकपृथक्त्वादिष्व-वान्तरप्रत्ययविशेषस्तत्राह - संख्यया तु विशिष्यत इति । अयमेकः पृथग् द्वाविमौ पृथगित्येकत्वादिसंख्या विशिष्टो व्यवहारः पृथक्त्वे दृश्यते । तत्रैकत्र द्रव्ये वर्तमानं पृथक्त्वमेकार्थसमवेतयैकत्वसंख्यया विशिष्यते, तद्विशेषश्चावान्तर-व्यवहारविशेषः, अनुवृत्तिप्रत्ययश्च पृथक्त्वसामान्यकृत एवेत्यभिप्रायः । एतेन परमाणुपरिमाणेष्वपि परमाणुत्वं सामान्यं प्रत्याख्येयम्, परमशब्दविशेषिता-देवाणुत्वसामान्याद् व्यवहारानुगमोपपत्तेः । अथ कस्मात् सर्वद्रव्यानुगतमेकमेव पृथक्त्वमेकत्वादिसंख्या विशेषणभेदात् प्रत्यय भेदहेतुरिति नेष्यते? नेष्यते, इस प्रकार संख्या के साथ पृथक्त्व का साधर्म्य दिखला कर अब ' एतावांस्तु ' इत्यादि ग्रन्थ से संख्या से इसमें जो असाधारण्य है उसका प्रतिपादन करते हैं । अर्थात् संख्या से पृथक्त्व में इतना ही अन्तर है कि संख्या में संख्यात्व रूप परसामान्य के अतिरिक्त एकत्वत्व द्विस्वत्वादि और अपरजातियाँ भी हैं, किन्तु पृथक्त्व में पृथक्त्वत्व रूप परसामान्य को छोड़कर एकपृथक्त्वत्वादि कोई अपर सामान्य नहीं हैं । ( प्र ० ) तो फिर द्विपृथक्त्वादि विभिन्न पृथक्त्वविषयक प्रतीतियों में अन्तर क्यों कर होता है? ' संख्यया तु विशिष्यते ' इत्यादि से इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । अभिप्राय यह है कि ' अयमेकः पृथक्, द्वाविमौ पृथक् ' इत्यादि स्थलो में पृथक्त्व का व्यवहार संख्या के साथ ही देखा जाता है । इनमें एक ही द्रव्य में रहनेवाला पृथक्त्व अपने आश्रय रूप द्रव्य में समवायसम्बन्ध से रहनेवाली एकत्वसंख्या के द्वारा ही और पृथक्त्वों से अलग रूप में समझा जाता है । उस संख्या रूप विशेष से ही एकपृथक्त्व विषयक प्रतीति में द्विपृथक्त्वादि विषयक प्रतीतियों से अन्तर होता है । विभिन्न पृथक्त्व विषयक सभी प्रतीतियों में एकाकारत्व की प्रतीति ( अनुवृत्तिप्रत्यय ) तो पृथक्त्वस्व सामान्य से ही होता है । इसी रीति से परमाणुओं में रहनेवाले परिमाण मे परमाणुत्व जाति का खण्डन करना चाहिए, क्योंकि ( ' परम ' शब्द से युक्त सभी अणुओं में रहनेवाले अणुत्व रूप पर ) सामान्य से ही सभी परमाणुओं में परमाणुत्व के व्यवहार का अनुगम होगा । ( प्र ० ) इस प्रकार सभी द्रव्यों में रहनेवाला एक हो पृथक्त्व क्यों नहीं मानते? उसीसे संख्या रूप विशेषण के बल से ( एक पृथक्त्व, द्विपृथक्त्वादि ) विशेष प्रकार के व्यवहारों की उपपत्ति होगी, उ ० ) इस लिए नहीं मानते हैं, चूँकि क्रमशः उत्पन्न होनेवाले द्रव्यों में सामान्य की तरह ( उत्पत्तिक्षण में हो ) For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३३५ संयोगः संयुक्तप्रत्ययनिमित्तम् । स च द्रव्यगुणकर्महेतुः । ( ये दोनों संयुक्त हैं ) संयुक्त विपयक ( इस प्रकार की ) प्रतीति का कारण ही ' संयोग ' है । यह द्रव्य, गुण और कर्म तीनों का कारण है । न्यायकन्दली क्रमेणोपजायमानेषु द्रव्येषु सामान्यवद् गुणस्य समवायादर्शनात् । अथेदं सामान्य-मेव भविष्यति? न, पिण्डान्तराननुसन्धाने सामान्यबुद्धिवत् पृथक्त्वबुद्धेरभावात् । संयोग सद्भाव निरूपणार्थमाह - संयोगः संयुक्तप्रत्ययनिमित्तमिति । अस्ति तावदिदमनेन संयुक्तमिति प्रत्ययो लौकिकानाम्, न चास्य रूपादयो निमित्तं तत्प्रत्ययविलक्षणत्वात् । अतो यदस्य निमित्तं स संयोगः । नैरन्तर्य-निबन्धनोऽयं प्रत्यय इति चेत्? किं द्रव्ययोः परस्परसंश्लेषो नैरन्तर्यम्? अन्तरा-भावो वा? आद्ये कल्पे न किञ्चिदतिरिक्तमुक्तं स्यात्, द्रव्ययोः परस्परोपसंश्लेष एव हि नः संयोगः । द्वितीये कल्पे सान्तरयोरन्तराभावे संयोगादन्यः को हेतुरिति गुण का समवाय उपलब्ध नहीं होता हैं । ( प्र ० ) तो फिर यह पृथक्त्व जातिरूप ही होगा, गुण नहीं? ( उ ० ) इसलिए यह सामान्य नहीं है कि इसकी प्रतीति एक द्रव्य में भी होती है, किन्तु पृथक्त्व की प्रतीति आश्रय और अवधि दोनों की प्रतीति के बिना नहीं होती है । संयोग का अस्तित्व समझाने के लिए ' संयोगः संयुक्तप्रत्ययनिमित्तम् ' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । ( अभिप्राय यह है कि ) ' वह इसके साथ संयुक्त है ' इस प्रकार की प्रतीति साधारण जनों को भी होती है । इस प्रतीति के कारण रूपादि नहीं हैं, क्योंकि रूपादि से जितनी प्रतीतियाँ उत्पन्न होती हैं, उनसे यह प्रतीति विलक्षण प्रकार की है । अतः उक्त प्रतीति का जो कारण है वही संयोग है । ( प्र ० ) उक्त प्रतीति तो न ( नैरन्तर्य ) रहने से होती है । ( उ ० ) यह ' नैरन्तयं ' परस्पर मिलन है? या दोनों में व्यवधान का अभाव? दोनों अवधियों में अन्तर के क्या वस्तु है? दो द्रव्यों का इनमें प्रथम पक्ष को स्वीकार स्वीकार करने पर पूछना है बीच में व्यवधान न रहने का करना संयोग को ही स्वीकार करना है । दूसरे पक्ष को कि संयोग को छोड़कर परस्पर मिलित दो वस्तुओं के और भी क्या कारण है? ( प्र ० ) आपके मत से दो असंयुक्त वस्तुओं में संयोग का जो कारण हैं, वही मेरे मत से दो अलग रहनेवाली वस्तुओं के बीच अन्तर न रहने का भी कारण है । ( उ ० ) मान लिया कि वही कारण है, ( किन्तु पूछना यह है कि ) वह कारण अपने को मिटाता है या दूसरे देश के आश्रय को दूसरे देश से सम्बद्ध करके उस अन्तर साथ सम्बद्ध न करके ही? अगर दूसरा पक्ष For Private And Personal