प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 411–420
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 411–420
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ३३६ स एव संयोगः । ही संयोग है । www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-प्रशस्तपादभाष्यम् उत्पादन भवति ' औरं ' सापेक्षेभ्यो निरपेक्षे-सिद्ध है । गुण के उत्पादन में इसे क्योंकि ' संयुक्तसमवायादग्नेर्वैशेषिकम् ' न्यायकन्दली For Private And Personal द्रष्यारम्भे निरपेक्षस्तथा भवतीति, “ सापेक्षेम्यो निरपेक्षेभ्यश्च " इति बच-नात् । गुणकर्मारम्भे तु सापेक्षः, “ संयुक्तसमवायादग्ने वैशेषिकम् " इति वचनात् । यह द्रव्य का स्वतन्त्र उत्पादक है । ( द्रव्य के औरों से ) इस विशेष की सूचना ' तथा भ्यश्च ' सूत्रकार की इन दो उक्तियों से और कारणों की भी अपेक्षा होती है, सूत्रकार की ऐसी उक्ति है । वाच्यम् । यदेव भवतामसंयुक्तयोः संयोगे कारणं तदेव नः सान्तरयोरन्तराभावे कारणमिति चेत्? अस्तु, कामं किन्त्विदं स्वाश्रयं देशान्तरं प्रापयत् तदन्तराभावं करोति? अप्रापयद्वा? अप्राप्तिपक्षे तावदन्तराभावो दुर्लभो पूर्वावष्टब्धे एव देशेऽवस्थानात् । देशान्तरप्राप्तिपक्षे तु तस्याः को नामान्यः संयोगो यः प्रतिषि ध्यते? अविरलदेशे द्रव्यस्योत्पादे संयोगव्यवहार इति चेत्? न, उत्पादमात्रे संयोगव्यवहारः किन्त्वविरलदेशोत्पादे ,, यैवेयमुत्पाद्यमानयोरविरलदेशता स च द्रव्यगुणकर्महेतुः । तन्तु संयोगो द्रव्यस्य पटस्य हेतु:, आत्ममनः संयोगो बुद्धयादीनां गुणानाम्; एवं भेर्याकाशसंयोगः शब्दस्य गुणस्य हेतु:, प्रयत्नवदात्महस्तसंयोगो हस्तकर्मणो हेतु:, तथा वेगवद्वायु-मानें तो फिर व्यवधान का अभाव सम्भव न होगा, क्योंकि ( कारण का आश्रय ) अपने ही देश में बैठा है । अगर दूसरा पक्ष कहें कि दूसरे देश में अपने आश्रय को सम्बद्ध करके ही वह व्यवधान को मिटाता है ' तो फिर संयोग को छोड़कर वह कौन सी दूसरी वस्तु है जिसका आप निषेध करते हैं? ( प्र ० ) अविरल ( व्यवधान शुन्य ) द्रव्य की उत्पत्ति होने पर हो संयोग का व्यवहार होता है । ( उ ० ) उत्पन्न हुई सभी वस्तुओं में तो संयोग का व्यवहार नहीं होता है, तो फिर अविरल देश में उत्पन्न जिन दो वस्तुओं में संयोग का व्यवहार होता है, उन दोनों वस्तुओं का अविरलदेशत्व ' सच द्रव्यगुणकर्महेतुः ' ( संयोग द्रव्य, गुण और कर्म का कारण है ) तन्तुओं का संयोग ( पट रूप ) ' द्रव्य ' का कारण है । आत्मा और मन का संयोग बुद्धिप्रभृति ' गुणों ' का कारण है । भेरी और आकाश का संयोग शब्द ( रूप गुण ) का कारण है । प्रयत्न से युक्त आत्मा और हाथ का संयोग हाथ की क्रिया का कारण है । वेग से
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ४३ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ३३७ न्यायकन्दली For Private And Personal संयोगस्तृणकर्मणो हेतुरित्यादिकमूह्यम् । यथायं द्रव्यमारभते, यथा च गुण-कर्मणी, तं प्रकारं दर्शयति - द्रव्यारम्भ इत्यादिना । कर्तव्ये संयोगः स्वाश्रयं स्वनिमित्तं च कारणमन्तरेण नान्यदपेक्षते । न त्वयमन-पेक्षार्थः पश्चाद्भावि निमित्तान्तरं नापेक्षत इति, श्यामादिविनाशानन्तरभावि-नोऽन्त्यस्य परमाण्वग्निसंयोगस्य पाकजानां गुणानामपि आरम्भे निरपेक्षकारणत्व-प्रसङ्गात् । कथमेतदवगतं त्वया यदयं द्रव्यारम्भे निरपेक्षः संयोग इति? तत्राह -- तथा भवतीति । ' सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्च ' इति वचनात् पटार्थमुपक्रिय-माणेभ्यस्तन्तुभ्यो ' भविष्यति पट: ' इति प्रत्ययो जायत इति पूर्वं प्रतिपाद्य सूत्र-कारेणैतदुक्तम् - - तथा त भवतीति सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्चेति । अस्यायमर्थो यथोपक्रियमाणेभ्यो भविष्यति पट इति प्रत्ययस्तथा सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्चेति युक्त वायु का संयोग तिनके की क्रिया का कारण है ' द्रव्यारम्भे ' इत्यादि से यह प्रतिपादन करते हैं कि संयोग किस रीति से द्रव्य का उत्पादन करता है, एवं किस प्रकार वह गुण एवं क्रिया का उत्पादन करता है । ' द्रव्यारम्भे निरपेक्षस्तथा भवति ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' अनपेक्ष ' शब्द का यही अर्थ है कि संयोग को द्रव्य के उत्पन्न करने में द्रव्य के समवायिकारणों और निमित्तकारणों को छोड़कर और किसी की अपेक्षा नहीं होती है । उक्त ' अनपेक्ष ' शब्द का यह अर्थ नहीं है कि पीछे उत्पन्न होनेवाले भी किसी गुण की अपेक्षा उसे नहीं होती है, अगर ऐसा मानें तो श्यामादि गुणों के नष्ट होने के बाद उत्पन्न होनेवाले अग्निसंयोग को भी पाकज रूपादि के प्रति निरपेक्ष कारण मानना पड़ेगा । ( प्र ० ) यह तुमने कैसे समझा कि द्रव्य के उत्पादन में संयोग को और किसी को अपेक्षा नहीं होती है? इसी प्रश्न का समाधान ' तथा भवति ' और ' सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्च ' इत्यादि दो सूत्रों के उल्लेख से करते हैं । अभिप्राय यह है कि सूत्रकार ने पहिले यह प्रतिपादन किया है कि ' पट पट की उत्पत्ति होगी ' इस प्रकार की प्रतीति होती है । के लिए व्यापृत तन्तुओं से इसके बाद सूत्रकार के द्वारा ' तथा भवति ' एवं ' सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्च ' ये दो सूत्र कहे गये हैं । इन दोनों सौत्र वाक्यों का यह अर्थ है कि जिस प्रकार पट के लिए व्यापृत तन्तुओं में यह प्रतीति होती है कि सापेक्ष और निरपेक्ष दोनों प्रकार के पट की इनसे १. समवाय सम्बन्ध से उत्पन्न होनेवाले कार्यों का असमवाथिकारण भी अवश्य होता है । अतः कार्यरूप द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों के असमवायिकारण भी अवश्य हैं । किन्तु इसमें द्रव्य के असमवायिकारण में यह विशेष है कि उसके उत्पन्न हो जाने पर कार्य के उत्पादन में और किसी की अपेक्षा नहीं रहती है । असमवायिकारण का सम्बन्ध होने के अव्यवहित उत्तर क्षण में ही कार्य उत्पन्न हो जाता है । कपालों का संयोग होने पर या तन्तुओं में संयोग होने पर घट या पट रूप कार्य अव्यवहित उत्तर क्षण में उत्पन्न हो ही जाता है,
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३३८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संयोग-भवतीति वर्तमानप्रत्ययः, अन्यथा सापेक्षेभ्यो निरपेक्षेभ्यश्चेति भवतीति वर्तमान-प्रत्ययो न स्यात् यदा कतिचित्तन्तवः संयुक्ता वर्तन्ते कतिचिच्चासंयुक्तास्तदा तेभ्यो भवति पट इति प्रत्ययः स्यादित्यर्थः । अत्र सूत्रे वार्तमानिकप्रतीति-हेतुत्वेनाभिधीयमानेषु तन्तुषु संयुक्तेष्वेवानपेक्षशब्दप्रयोगात् संयोगो द्रव्यारम्भे निरपेक्ष इति प्रतीयत इति तात्पर्यम् । तुशब्देन पूर्वस्माद्विशेषं प्रतिपाद-यन्नाह – गुणकर्मारम्भे तु सापेक्षः । कुतो ज्ञातमित्यत आह- संयुक्तसमवायादिति । अग्ने वैशेषिकमित्यग्निगतमुष्णत्वं विवक्षितम् । तत्पार्थिवपरमाणु संयुक्ते वह्नौ समवायात् परमाणौ रूपाद्युत्पत्तिकारणमित्यस्माद्वचनाद् गुणारम्भे परमाण्व-ग्निसंयोगस्योष्णस्पर्शसापेक्षत्वं प्रतीयते, अन्यथा वह्निसंयोगजेषु रूपादिषु वह्नि-स्पर्शस्य कारणत्वाभिधानायोगात्, बुद्धयारम्भे आत्ममनः संयोगस्य स्वाश्रय-उत्पत्ति होगी, उसी प्रकार यह वर्त्तमानत्वाविषयक प्रतीति भी होती है कि सापेक्ष और निरपेक्ष दोनों प्रकार के तन्तुओं से पट उत्पन्न हो रहा है । संयोग अगर निरपेक्ष होकर द्रव्य का उत्पादक न हो तो फिर उक्त वर्त्तमानत्व विषयक प्रतीति नहीं हो सकेगी, प्रत्युत जिम समय पट के उत्पादक तन्तुओं में से कुछ परस्पर संयुक्त हैं और कुछ असंयुक्त, उस समय भी वर्त्तमानत्व की प्रतीति होगी । कहने का तात्पर्य है कि वर्त्तमान-कालिक उक्त प्रतीति के कारण रूप से कथित परस्पर संयुक्त उक्त तन्तुओं में ' अनपेक्ष ' शब्द का प्रयोग किया गया है, अतः समझते हैं कि संयोग को द्रव्य के उत्पादन में किसी और की अपेक्षा नहीं है । ' गुणकर्मारम्भे तु सापेक्ष: ' यह वाक्य अपने ' तु ' शब्द के द्वारा अपने पहिले पक्ष इस पक्ष में अन्तर को समझाने के लिए लिखा गया है । यह आपने कैसे समझा? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए ' संयुक्तसमवायात् ' यह वाक्य लिखा गया है । ' अग्ने वैशेषिकम् ' इस वाक्य से अग्नि में रहनेवाला उष्ण स्पर्श उष्ण स्पर्श पार्थिवपरमाणु से संयुक्त वह्नि में समवाय सम्बन्ध से रहने के अभीष्ट है । वह कारण परमाणु में होनेवाले ( पाकज ) रूप की उत्पत्ति का कारण है, इस वाक्य से यह समझते हैं कि परमाणु और अग्नि के संयोग से जो पाकजरूप की उत्पत्ति होती है, उसमें उसे उष्णस्पर्श की भी अपेक्षा रहती है । अगर ऐसी बात न हो तो फिर वह्निसंयोग से उत्पन्न होनेवाले रूपादि के प्रति वह्निको कारण कहना ही असङ्गत हो जाएगा । एवं आत्मा और मन के संयोग को बुद्धि के उत्पादन में अपने आश्रय और निमित्त को छोड़कर अतः ब्रव्य के उत्पादन में असमवायिकारणीभूत संयोग को किसी और की अपेक्षा नहीं रह जाती है | गुणों के असमवायिकारण के प्रसङ्ग में यह बात नहीं है, क्योंकि कपाल में रूप की उत्पत्ति के बाद कपालसंयोगादि क्रम से जब घट की उत्पत्ति हो जाती है, उसके बाद घट में उस रूप की उत्पत्ति होती है, जिसमें कपाल का रूप असमवायिकारण है, अतः गुण के उत्पादन में असमवायिकारण को उस गुण के आश्रयादि की भी अपेक्षा रहती है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३३६ स्वनिमित्तकारणव्यतिरेकेणापि धर्माद्यपेक्षत्वमिति यथासंभवमप्यूह्यम्, कर्मारम्भे-ऽपि तृणे कर्मारम्भकत्वात् । बीजविनाशानन्तरमङ्कुरस्योत्पत्तेर्मृ त्पिण्डध्वंसानन्तरं घटस्योत्पादादभावादेव द्रव्यस्योत्पादो न संयोगादिति चेत्? तदयुक्तम्, अवयवसंयोगविशेषेभ्यो द्रव्यस्योत्पत्तिदर्शनात्, अभावस्य निरतिशयत्वे कार्यविशेषस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गाच्च । इदं त्विह निरूप्यते - कि सत् क्रियते? असदेव वा? सत् क्रियत इति सांख्याः । असदकरणात्, न ह्यसतो गगनकुसुमस्य सत्त्वं केनचिच्छक्यं कर्तुम्, सतश्च सत्कारणं युक्तमेव तद्धर्मत्वात् । दृष्टं हि तिलेषु सत एव तैलस्य निष्पीडनेन करणम् । असतस्तु करणे न निदर्शनमस्ति । इतश्च सत्कार्यम् - उपादानग्रहणात्, उपादानानि धर्मादि वस्तुओं की भी अपेक्षा रहती है । इसी प्रकार यथासम्भव ऊह करना चाहिए । इसी प्रकार तृणादि में कर्म के उत्पादन में भी संयोग इतर सापेक्ष ही है ( द्रव्योत्पादन की तरह इतर निरपेक्ष नहीं ) | ( प्र ० ) ( अवयवों का ) संयोग द्रव्य का कारण ही नहीं है, क्योंकि बीज के विनाश के बाद अङ्कुर की उत्पत्ति होती है, एवं मिट्टी के गोले के नष्ट होने के बाद ही घट की उत्पत्ति होती है, अतः अभाव ( ध्वंस ) ही द्रव्य का कारण है । ( उ ० ) यह पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि अवयवों के विशेष प्रकार के संयोग से विशेष प्रकार के द्रव्य की उत्पत्ति देखो जाती है । एवं अभावों में कोई अन्तर न रहने के कारण इस पक्ष में कार्यों की उत्पत्ति अनियमित भी हो जाएगी १ । अब यहाँ यह विचार करते हैं कि पहिले से विद्यमान वस्तु की ही उत्पत्ति कारणों से होती है? या पहिले से सर्वथा अविद्यमान वस्तु की? इस प्रसङ्ग में सांख्य दर्शन के अनुयायियों का कहना है कि ' सत् ' अर्थात् पहिले से विद्यमान वस्तु की हृीं उत्पत्ति कारणों से होती है । ( इसके लिए इस हेतु वाक्य का प्रयोग करते हैं ) ' असदकरणात् ' अर्थात् ' असत् ' को कोई उत्पन्न नहीं कर सकता । सर्वथा अविद्यमान आकाशकुसुम को कोई भी उत्पन्न नहीं कर सकता । ' सत् ' कार्य का कारण भी ' सत् ' ही होना चाहिए, क्योंकि कार्य कारण के धर्म से युक्त होता है । यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि तिल में पहिले से विद्यमान तेल को ही पेरकर उससे निकालते हैं । असत् वस्तु के उत्पादन में ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं हैं । ' उपादानग्रहण ' रूप हेतु से भी १. कहने का तात्पर्य है कि अभाव को ही द्रव्य का असमवायिकारण मानें तो बीज से ही अङ्कुर की उत्पत्ति होती है, एवं मिट्टी के गोले से ही घट की उत्पत्ति होती है, इस प्रकार के नियम नहीं रह जायेंगे । क्योंकि बोज के अभाव में एवं मिट्टी के गोले के अभाव में कोई अन्तर तो है नहीं, अतः यह भी कहा जा सकता है कि मिट्टी के गोले के अभाव से अङ्कुर की उत्पत्ति और बीज के अभाव से घड़े की उत्पत्ति होती है । यही कार्योत्पत्ति की अनिय मितता या आकस्मिकत्व है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३४० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संयोग-कारणानि तेषां कार्येण ग्रहणं कार्यस्य तैः सह सम्बन्धः, तस्मात् तत्कार्यं सदेव, अविद्यमानस्य सम्बन्धाभावात् । असम्बद्धमेव कार्य कारणैः क्रियत इति चेत्? न, सर्वसम्भवाभावात्, असम्बद्धत्वाविशेषे सर्वं सर्वस्माद्भवेत् । न चैवम्, तस्मात् कार्यं प्रागुत्पत्तेः कारणैः सह सम्बद्धम् । यथाहुः— असत्त्वान्नास्ति सम्बन्धः कारणैः सत्त्वसङ्गिभिः । असम्बद्धस्य चोत्पत्तिमिच्छतो न व्यवस्थितिः ॥ इति । अपि च शक्तस्य जनकत्वम्? अशक्तस्य वा? अशक्तस्य जनकत्वे तावद-तिप्रसक्तिः । शक्तस्य जनकत्वे तु किमस्य शक्तिः सर्वत्र? क्वचिदेव वा? सर्वत्र चेत्? संवातिव्याप्तिः । अथ क्वचिदेव? कथमसति तस्मिन् कारणस्य तत्र शक्ति-नियतेति वक्तव्यम्, असतो विषयत्वायोगात् । तस्माच्छक्तस्य समझते हैं कि कार्य ( कारण व्यापार से पहिले भी ) सत् है । ' उपादान ' शब्द का यहाँ ' कारण ' अर्थ है । अर्थात् कारणों के साथ कार्य के सम्बन्ध से भी समझते हैं कि कार्य ( कारण व्यापार से पहिले भी ) सत् है, क्योंकि अविद्यमान वस्तु के साथ किसी सम्बन्ध से रहित कार्य की ही क्योंकि सभी कारणों से सभी कार्यों का भी सम्बन्ध सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) कारणों के उत्पत्ति कारणों से होती है? ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, की उत्पत्ति नहीं होती है, सर्वसम्भवाभावात् ' ( अगर कारणों के सम्बन्ध से रहित कार्य की उत्पत्ति हो तो ) सभी कारणों से सभी कार्यों की उत्पत्ति होनी चाहिए, क्योंकि कार्य की असम्बद्धता जैसे कारणों में है, वैसे और वस्तुओं में भी समान ही है, किन्तु सभी वस्तुओं से सभी कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है, अतः उत्पत्ति से पहिले भी कार्य के साथ कारण का सम्बन्ध अवश्य है । जैसा कि सांख्यवृद्धों ने कहा है कि विद्यमान कारणों के साथ अविद्यमान कार्य का सम्बन्ध नहीं है । जो कोई कारण से असम्बद्ध कार्य की उत्पत्ति ( उस ) कारण से मानते हैं, उनके मत में ( नियत कारण से ही नियत कार्य की उत्पत्ति हो इस ) व्यवस्था की उपपत्ति नहीं होगी । और भी बात है, ( १ ) कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति से युक्त वस्तुओं में कारणता है? या ( २ ) कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति से रहित वस्तुओं में कारणता है । इनमें दूसरा पक्ष मानें ( तो तन्तुप्रभृति कारणों से घटादि कार्यों की उत्पत्ति रूप ) अतिप्रसक्ति होगी । अगर कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति से युक्त ही कारण है, तो फिर इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि कारण में रहनेवाली यह शक्ति सभी कार्य -विषयक है? या विशेष कार्यविषयक? इनमें अगर पहिला पक्ष मानें तो फिर कथित अतिप्रसक्ति वनी बनायी 1 अगर दूसरा पक्ष मानें तो यह भी कहना पड़ेगा कि कारण की वह शक्ति किसी विशेष असत् कार्य में नियमित कैसे है? क्योंकि असत् वस्तु तो किसी का विषय नही हो सकती, अतः शक्ति से युवत For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३४१ यच्छक्यं शक्तिविषयो योऽर्थः, तस्य करणात् प्रागपि शक्यं सदेव । इतोऽपि सत् कार्यम्, कारणभावात्, कारणस्वभावं कार्यमिति नान्योऽवयवी अवयवेभ्यस्तद्देशत्वात् । यत्तु यस्मादन्यन्न तत्तस्य देशो यथा गौरश्वस्येत्यादिभिः प्रमाणैः प्रतिपादितम्, कारणं च सत्, अतस्तदव्यतिरेकि कार्यमपि सदेवेति । तदेतदुक्तम्--असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत् कार्यमिति ॥ अत्रोच्यते, यदि कारणव्यापारात् प्रागपि पटस्तन्तुषु सन्नेव, किमि-त्युपलब्धिकारणेषु सत्सु सत्यामपि जिज्ञासायां नोपलभ्यते? अनभिव्यक्तत्वा-दिति चेत्? केयमनभिव्यक्तिः? यद्युपलब्धेरभावस्तस्यैवानुपपत्तिश्चोदिता कथं तदेवोत्तरम्? अथोपलब्धियोग्य स्यार्थक्रियानिवर्तनक्षमस्य रूपस्य विरहो s न-भिव्यक्ति:? तदानीमसत्कार्यवाद:, तथाभूतस्य रूपस्य प्रागभावे पश्चाद्भावात् । अथ मतं पटस्य चक्षुरादिवत् कुविन्दादिकारणव्यापारोऽप्युपलब्धिकारणं तस्या-उस कारण से उत्पन्न होनेवाला एवं शक्ति का विषय वह कार्य रूप अर्थ अपने कारण में उत्पत्ति से पहिले भी ' सत् ' हो है । ' कारणभाव ' हेतु से भी यह सिद्ध होता है कि कार्य अपनी उत्पत्ति से पहिले भी ' सत् ' है । अभिप्राय यह है कि कार्य अपने ( उपादान ) कारण के स्वभाव का होता है अतः अवयवों से भिन्न अवयवी नाम को कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं हैं, क्योंकि अपने अवयव ही उसकी उत्पत्ति के देश हैं । जो जिससे भिन्न होता है, वह उसकी उत्पत्ति का देश नहीं होता, जैसे कि गाय का भैंस उत्पत्ति देश नहीं होता । इन प्रमाणों से यह सिद्ध है कि कार्य अपने उपादानों से अभिन्न है । उपा-दान तो अवश्य ही सत् हैं, अतः उनसे अभिन्न कार्य भी ' सत् ' है । ( सत्कार्यवाद के साधक इन हेतुओं की ही सूचना ' असदकरणात् ' इत्यादि ( सां ० का ० 8 ) कारिका से दी गई है । ( सत्कार्यवाद के साधक इन हेतुओं का खण्डन असत्कार्यवादी वैशेषिकादि ) इस प्रकार करते हैं कि कारणों के व्यास होने के पहिले भी अगर तन्तुओं में पट है तो फिर पट को जानने की इच्छा रहने पर भी एवं पटप्रत्यक्ष के कारणों के रहते हुए भी सूत में पट का प्रत्यक्ष क्यों नहीं होता? ( प्र ० ) उस समय पट अनभिव्यक्त रहता है, अतः उस समय उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है । ( उ ० ) यह ' अनभिव्यक्ति ' क्या है? अगर वह उपलब्धि का अभाव हो है तो फिर पूर्वपक्ष और समाधान दोनों एक ही हो गये । अगर उपलब्ध हो सकनेवाली वस्तु में उस वस्तु से होनेवाले प्रयोजन के सम्पादक रूप का अभाव ही अनभिव्यक्ति है, तो उस समय ' असत्कार्यवाद ' स्वीकार करना पड़ेगा, क्योंकि पट में पहिले से अविद्यमान उसके प्रयोजन सम्पादक रूप की उत्पत्ति हुई है । अगर यह कहें कि ( प्र ० ) जैसे कि चक्षुरादि इन्द्रियाँ पट प्रत्यक्ष के कारण हैं, वैसे ही पट के जुल । हे प्रभृत कारणों का व्यापार भी पट के प्रत्यक्ष का कारण है । इन कारणों के न For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३४२ न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् भावात् सतोऽप्यनुपलब्धिरिति? न, [ गुणे संयोग-कारणव्यापारस्यापि सर्वदा तत्र सम्भवात्, व्यापारोऽपि पूर्वमनभिव्यक्तः सम्प्रति कारणैरभिव्यज्यमानो भावसु-पलम्भयतीति चेत्? अभिव्यक्तिरपि यद्यसती? कथं तस्याः कारणम्? सतोति चेद्भावोपलम्भप्रसङ्गस्तदवस्थ एवेति कस्यचिदपूर्वस्य विशेषस्योपजननमन्तरेण प्रागनुपलब्धस्य पश्चादुपलम्भो दुर्घटः । यच्चोक्तम् -- असदशक्यकरणं व्योमकुसुमवदिति, तत्र स्वभावभेदाद् असदेकस्वभावं गगनकुसुमम्, सदसत्स्वभावं तु घटादिकम्? तत्पूर्वमसत् पश्चात्सद्भ-वति । कथं सदसतोरेकत्र न विरोध इति चेत्? कालभेदेन समावेशात् । प्रागुत्पत्तेः पटस्य धर्मिणोऽभावात् कथमसत्त्वं तस्य धर्मं इति चेत्? यादृशो यक्षस्तादृशो बलिः सत्त्वमसतो धर्मो न स्यादसत्त्वं त्वसत एव युक्तम् । यदसत् पूर्वमासीत् तस्य कथं सत्त्वमिति चेत्? कारणसामर्थ्यात् अस्ति स कोऽपि महिमा तुर्यादीनां रहने से ही उत्पत्ति से पहिले तन्तुओं में विद्यमान रहने पर भी पट का प्रत्यक्ष नहीं होता है । ( उ ० ) ऐसा आप नहीं कह सकते, क्योंकि आपके मत से सभी कार्य उत्पत्ति से पहिले भी सत् हैं, अतः जुलाहे प्रभृति का व्यापार भी सत् है, अतः वे भी सर्वदा रहेंगे ही । ( प्र ० ) कारणों का वह व्यापार भी पहिले से अनभिव्यक्त ही रहता है, उन्हीं कारणों से अभिव्यक्त होकर पटादि कार्यों के प्रत्यक्ष में सहायक होता है । ( उ ० ) कारणों की यह अभिव्यक्ति सत् है? या असत्? अगर असत् है तो फिर वह उस प्रत्यक्ष का कारण कैसे हो सकती है? अगर सत् है तो पटादि प्रत्यक्ष की उक्त आपत्ति है ही । अतः किसी अपूर्व विशेष की उत्पत्ति के बिना पहिले से अनुपलब्ध वस्तु की पीछे उपलब्धि सम्भव नहीं है । यह जो आपने कहा कि ' आकाशकुसुम की तरह असत् वस्तु का उत्पादन असम्भव है ' यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि वस्तु भिन्न भिन्न स्वभाव की होती हैं । आकाश कुसुम का केवल ' असत्त्व ' ही स्वभाव है । घटादि वस्तुओं के सत्त्व और असत्त्व दोनों ही स्वभाव हैं । वे पहिले असत् रहते हैं, पीछे से सत् हो जाते हैं । ( प्र ० ) एक आश्रय में सत्त्व और असत्त्व दोनों में विरोध क्यों नहीं होता है? ( उ ० ) ( यद्यपि वे दोनों एक ही समय एक आश्रय में नहीं रह सकते फिर भी ) काल भेद से वे दोनों एक आश्रय में रह सकते हैं । ( प्र ० ) उत्पत्ति से पहिले तो पट रूप धर्मी ही नहीं है, फिर असत्त्व उसका धर्म किस प्रकार होगा? ( उ ० ) ' जैसा देवता वैसा ही उनका भोग ' ( इस न्याय से ) असत् वस्तुओं का सत्त्व धर्म तो होगा नहीं, अतः यही ठीक है कि अव उसका धर्म है । ( प्र ० ) जो पहिले असत् रहा कभी भी सत्त्व उसका धर्म कैसे हो सकता है? ( उ ० ) कारणों के सामर्थ्य से ( असत् वस्तुओं का भी सत्त्व धर्म हो सकता है / तुरीवेमादि कारणों की ही यह अपूर्व महिमा है कि जब ये मिलकर काम For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३४३ देतेषु सम्भूय व्याप्रियमाणेष्वसन्नेव पटः संभवति । असतोऽसम्बद्धस्य जन्यत्वे ऽतिप्रसक्तिरिति चेन्नैतत् तन्तुजातीयस्य पटजातीय एव सामर्थ्यात् । कुत एतत्? त्वत्पक्षेऽपि कुत एतत्? तन्तुष्वेव पटात्मता, न सर्वत्रेति? वस्तुस्वाभाव्यादिति चेत्? सैवात्रापि भविष्यति । अत एव चोपादाननियमः, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां तज्जातीय नियमने तज्जातीयस्य शक्त्यवधारणात् । यत् पुनरेतत् कार्यकारणयो-व्यतिरेकात् कारणावस्थानादेव कार्यस्याप्यवस्थानमिति तदसिद्धमसिद्धेन साधितम्, कार्यकारणयोः स्वरूपशक्ति संस्थानभेदस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । प्रधानात्मक विश्वस्यातीन्द्रियत्वप्रसङ्गाच्च । तद्देशत्वं तु तदाश्रितत्वमात्र-निबन्धनमेवेत्यलं बृद्धेष्वति निर्बन्धेन । एतत् तु विमृश्यतां केयं शक्तिरिति? अतीन्द्रिया काचिदित्यार्याः । अथ मन्यसे यथाभूतादेव तदयुक्तम्, तस्याः सद्भावे प्रमाणाभावात् । करते हैं तब पहले से असत् होनेपर भी पट सत् हो जाता है । ( प्र ० ) पहिले से बिलकुल असत् एवं कारणों के साथ बिलकुल असम्बद्ध कार्य की अगर उत्पत्ति मानें तो ' अतिप्रसक्ति ' ( अर्थात् कपालादि कारणों से भी पट की उत्पत्ति ) होगी । ( उ ० ) यह अतिप्रसङ्ग ) नहीं होगा, क्योंकि तन्तुजातीय वस्तुओं में पट जाति को वस्तुओं के उत्पादन का ही सामर्थ्य है । ( प्र ० ) यही क्यों है? ( उ ० ) ( इसके उत्तर में हम भी पूछ सकते हैं कि ) तन्तु ही पटस्वरूप क्यों हैं, ( कपालादि पदस्वरूप क्यों नहीं हैं ), अगर इसका आप यह उत्तर दें कि ( प्र ० ) यह इसका स्वभाव है? ( उ ० ) तो फिर यही उत्तर मेरे लिए भी होगा । अतएव यह नियम भी ठीक बैठता है कि ' अमुक वस्तु ही अमुक वस्तु का उपादान है, क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से तज्जातीय ( पटादिजातीय ) वस्तुओं के उत्पादन की शक्ति तज्जातीय ( तन्त्वादि-जातीय वस्तुओं में ही निश्चित है । आपने जो यह कहा कि कार्य और कारण अभिन्न हैं, अतः कारण यह तो असिद्ध ( हेतु ) से अगर सत् हो तो फिर उससे ही असिद्ध का साधन करना है अभिन्न कार्य भी सत् ही है ' ( कारण और कार्य का अभेद ही सिद्ध नहीं है ), क्योंकि कार्य और कारण दोनों के स्वरूप ( आकार ) शक्ति और अगर पूरा संसार ही प्रकृति से अभिन्न कार्य में जो उपादान का अन्वय देखा जाता का आश्रय है ( ओर कारण नहीं ) । विन्यास सभी में विभिन्नता देखी जाती है । हो तो फिर पूरा संसार ही अतीन्द्रिय होगा । है, उसका मूल तो इतना ही है कि वही कार्य यह विचारये कि यह ' शक्ति ' क्या वस्तु है? आर्यों ( मीमांसकों ) का कहना है कि ' शक्ति एक अतीन्द्रिय स्वतन्त्र पदार्थ है ' किन्तु उनका यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि उसकी सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है । अगर आप ( मीमांसक ) यह मानते हों For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संयोग-वह्नेर्दाहोत्पत्तिरवगता तथाभूतादेव मन्त्रौषधिसन्निधाने सति न दृश्यते, यदि दृष्टमेव रूपं दाहस्य कारणं स्यात् तस्य सम्भवाद् दाहानुत्पादो न स्यात् । अस्ि च तदनुत्पत्तिः, सेयमदृष्टरूपस्य वैगुण्यं गमयन्ती हुतभुजि शक्तेरतीन्द्रियायाः सत्त्वं कल्पयति, यस्या मन्त्रादिनाभिभवो विनाशो वा क्रियते । यत्र प्रतीकार-वशेन पुनः कार्योदयस्तत्राभिभवः यत्र तु सर्वथैवानुत्पत्तिः कार्यस्य तत्र विनाशः । न चैतद्वाच्यम्, न मन्त्रो वह्निसंयुक्तो नापि तत्समवेतः कथं व्यधिकरणां शक्ति विनाशयेत् विनाशयति चेदतिप्रसङ्गः स्यादिति, तदुद्देशेन प्राप्तत्वात् । यथैवासम्बद्धोऽप्यभिचारो यमुद्दिश्य क्रियते तमेव हिनस्ति, न पुरुषान्तरम् एवं यामेव व्यक्तिमभिसन्धाय मन्त्रः प्रयुज्यते तस्या एव शक्ति निरुणद्धि, न सर्वासाम् । नाप्येतदुद्घोषणीयम् - - यदि शक्तिर्द्रव्यात्मिका? कि ( प्र ० ) जिस प्रकार की वह्नि से दाह देखा जाता है, उस प्रकार की ही वह्नि से ( दाह के प्रतिरोधक ) मन्त्र ओर औषध का सामीप्य रहने पर दाह की उत्पत्ति नहीं भी होती है, अगर केवल अपने दृष्टस्वरूप से ही वह्निदाह का कारण हो तो फिर उस रूप से युक्त वह्नि तो मन्त्रादि संनिहित देशों में भी है ही, अतः उन स्थानों में दाह के अनुत्पाद का निर्वाह नहीं होगा । दाह की उक्त उत्पत्ति और अनुत्पत्ति इन दोनों से वह्नि में दाह के प्रयोजक किसी अतीन्द्रिय धर्म की कल्पना अनिवार्य हो जाती है, जो वृद्धि में अतीन्द्रिय शक्ति की कल्पना को उत्पन्न करती है । जिस ( शक्ति ) का मन्त्रादि से अभिभव या विनाश होता है, ( अर्थात् ) जहाँ फिर से प्रतीकार करने पर दाहादि कार्यों की उत्पत्ति होती हैं, वहाँ शक्ति के अभिभव की कल्पना करते हैं और मन्त्रादि प्रयोग के बाद जहाँ दाहादि कार्यों की उत्पत्ति फिर कभी नहीं होती, वहाँ शक्ति के विनाश की कल्पना करते हैं । एवं यह भी कहना ठीक नहीं है कि ( उ ० ) वह्नि का मन्त्र के साध न संयोग सम्बन्ध है, न समवाय, तो फिर विभिन्न अधि-करणों में रहनेवाली शक्ति का नाश वह कैसे करेगा? अगर मन्त्र से व्यधिकरण ही शक्ति का नाश मानें तो अतिप्रसङ्ग होगा, ( अर्थात् दाह के प्रतिरोधक मन्त्र से संसार के सभी काम रुक जाएँगे ) । ( प्र ० ) यह आक्षेप ठीक नहीं है, क्योंकि शक्ति को नष्ट करने या प्रतिरुद्ध करने के उद्देश्य से ही मन्त्र का प्रयोग किया जाता है । जैसे कि अभिचार ( मारण प्रयोग ) जिस व्यक्ति को उद्देश्य कर किया जाता है, उस व्यक्ति के साथ सम्बद्ध न रहने पर भी वह उसी व्यक्ति की हत्या करता है । वैसे ही जिस व्यक्ति को मन में रखकर मन्त्रप्रयुक्त होता है, उसी व्यक्ति की शक्ति को वह नष्ट करता है या अभिभूत करता है, सभी व्यक्तियों की शक्ति को नहीं । यह घोषणा भी न करनी चाहिए कि शक्ति अगर द्रव्यरूप है? तो फिर अपने समवायिकारण या असमवायिकारण क नाश से ही नष्ट होगी ( मन्त्रादि प्रयोग For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली II समवाय्य समवायिकारणयोरन्यतरविनाशाद्विनश्येत्? अथ गुणानतिरेकिणी? तदाश्रयविनाशाद्विरोधिगुणप्रादुर्भावाद्वा विनश्येदिति, समवायस्यानभ्युपगमात् । यस्य यतो विनाशं प्रतीमस्तस्य तमेव विनाशहेतु ब्रूमो न पुनरमुं त्वत्कृतं समय-मभ्युपगच्छामः, प्रतीतिपराहतत्वात् । यदि चावश्यमभ्युपेयस्तदा द्रव्यगुणयोरेव विनाशं प्रत्यभ्युपगम्यतां यत्र परिदृष्टः शक्तिः पुनरियं सादृश्यवत् पदार्थान्तरं प्रकारान्तरेणापि विनंक्ष्यति । कार्योत्पादानुत्पादाभ्यां वह्नावधिगता शक्तिः कुत एव सर्वभावेषु कल्प्यते इति चेत्? एकत्र तस्या: कार्योत्पादानुगुणत्वेन कल्पितायाः सर्वत्र तदुत्पत्त्यैवात्रानुमानात् । अत्रोच्यते न मन्त्रादिसन्निधौ कार्यानुत्पत्तिरदृष्टं रूपमाक्षिपति । यथान्वयव्यतिरेकाभ्यामवधृतसामर्थ्यो वह्निर्वाहस्य कारणम्, तथा प्रतिबन्धक-मन्त्रादिप्रागभावोऽपि कारणम् । स च मन्त्रादिप्रयोगे सति निवृत्त इति सामग्री -वैगुण्यदेव दास्यानुत्पत्तिर्न तु शक्तिवैकल्यात् । भावस्य भावरूपकारणनियतत्व-से नहीं ) अगर वह गुण स्वरूप है, तो फिर वह आश्रय के नाश से या विरोधी दूसरे गुण की उत्पत्ति से ही नष्ट होगी, क्योंकि हम समवाय नहीं मानते । जिससे जिसके नाश की हमको प्रतीति होती है, उसे ही हम उसके नाश का कारण मानते हैं । तुम्हारे बनाये हुए ( द्रव्य का नाश उसके समवायिकारण के नाश से हो या असमवायि-कारण के नाश से ही हो, एवं गुण का नाश आश्रय के नाश से या विरोधी गुण की उत्पत्ति से ही हो ) इस नियम को हम नहीं मानते, क्योंकि यह प्रतीति के विरुद्ध है । अगर उक्त सिद्धान्त को मानना आवश्यक ही हो तो द्रव्य और गुण के नाश के लिए ही उसे मानिए, जहाँ कि वह देखा गया है । शक्ति तो सादृश्यादि की तरह दूसरा ही पदार्थ है, अतः वह दूसरे ही प्रकार से नष्ट होगा । ( उ ० ) दाह रूप कार्य की उत्पत्ति और अनुत्पत्ति से वह्नि में जिस प्रकार की शक्ति का निश्चय करते हैं, उस प्रकार की शक्ति की कल्पना सभी भाव पदार्थों में क्यों करते हैं? ( प्र ० ) एक जगह कार्य की अनुकूलता से जैसी शक्ति की कल्पना करते हैं, दूसरी जगह भी कार्य की उत्पत्ति से ही उसी प्रकार की शक्ति की कल्पना करते हैं । ( उ ० ) इस पूर्वपक्ष के समाधान में कहना है कि मन्त्रादि का सामीप्य रहने पर दाह की अनुत्पत्ति से वह्नि में किसी अदृश्य शक्ति की कल्पना आवश्यक नहीं है, क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से वह्नि में दाह के कारणता की कल्पना जिस प्रकार करते हैं, उसी प्रकार अन्वय और व्यतिरेक से ही दाह के प्रति मन्त्रादि प्रतिबन्धकों के प्रागभाव में भी कारणता की कल्पना करते हैं । मन्त्रादि का प्रागभाव रूप यह कारण मन्त्रादि की संनिधि रहने पर नहीं रहते हैं, अतः मन्त्रादि के प्रयोग के स्थल में दाह नहीं होता है । उक्त स्थल में दाह की अनुत्पत्ति शक्ति के For Private And Personal