प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 51–60

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 51–60

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३८ ) जा सकता । अतः निरवयव द्रव्यों में परस्पर भेद का नियामक कोई पदार्थ मानना पड़ेगा । इसी पदार्थ का नाम ' विशेष ' है । अर्थात् जो अपने - अपने आश्रयीभूत द्रव्य को अपने से भिन्न सभी वस्तुओं से ' विशेष ' रूप में या भिन्न रूप में समझावे वहीं ' विशेष ' है । यह प्रत्येक निरवय द्रव्य में अलग अलग है फलतः अनन्त है । किन्तु इस प्रसङ्ग में यह समझना शेष रहता है कि एक परमाणु में एक विशेष है, दूसरे परमाणु में दूसरा विशेष है । अतः एक परमाणु से दूसरा परमाणु भिन्न है । फलतः दोनों परमाणुओं में रहनेवाले दोनों विशेषों के परस्पर भेद ही दोनों परमाणु में परस्पर भेद के प्रयोजक हैं । किन्तु इन दोनों विशेषों में परस्पर भेद है? इसका ही कौन नियामक है? इस प्रसङ्ग में वैशेषिकों का कहना है कि ये विशेष ' स्वतः व्यावृत्त ' इनमें परस्पर भेद के लिए किसी दूसरे नियामक की आवश्यकता नहीं है । इस ' स्वतोव्यावृत्ति ' वाली दुर्बलता के कारण ही नव्यवैशिषकों ने ' विशेष ' पदार्थ को अस्वीकार कर दिया है । उन लोगों का कहना है कि अगर परमाणु प्रभृति निरवयव द्रव्यों में रहनेवाले विशेषों को स्वतः व्यावृत्त मानते हैं, तो फिर परमाणुप्रभृति सभी निरवयव द्रव्यों को ही स्वतोव्यावृत्त क्यों नहीं मान लेते? इसमें क्या लाभ है कि निरवय पदार्थों में परस्पर भेद के लिए उनमें स्वतोव्यावृत्तस्वभाववाले विशेषों की कल्पना की जाय? समवाय समवाय नाम का एक पष्ठ पदार्थ भी महर्षि ने माना है । संयोग की तरह समवाय भी सम्बन्ध रूप है, क्योंकि यह भी विशेष्यविशेषणभाव का नियामक है । संयोग सम्बन्ध से समवाय सम्बन्ध में यह अन्तर है कि यह अपने आधार और आधेय इन दोनों में से एक के विनष्ट होने तक बना रहता है । संयोग में यह बात नहीं है । यह अपने आधार और आधेय दोनों के बने रहने पर भी विनष्ट हो जाता है । आधार या आधेय के सत्ता पर्यन्त समवाय का रहना ही वस्तुतः समवाय की नित्यता है । यद्यपि आकाशादि की तरह समवाय की नित्यता का भी उपपादन किया गया है! विशेष्यविशेषणभाव का नियामक ही सम्बन्ध है । ' घटवद्भूतलम् ' इत्यादि स्थल में घट का संयोग भूतल में है, अतः घट विशेषण है । एवं भूतल विशेष्य इसलिए है कि भूतानुयोगिक संयोग घट में है । इसी प्रकार महर्षि कणाद ने समवाय का लक्षण करते हुए लिखा है कि ' इहेदमिति यतः कार्यकारणयोः सम्बन्धः स समवायः ' ( ७-२-२६ ) ' इह कुण्डे दधि ', ' इह कुण्डे वदराणि ' इत्यादि प्रतीतियों में जिस प्रकार कुण्ड और दही एवं कुण्ड और बेर इन विशेष्य और विशेषणों को छोड़कर दोनों के संयोग सम्बन्ध भी विषय होते हैं; उसी प्रकार ' इह तन्तुषु पट ' ' इह वीरणेषु कटः ', ' इह द्रव्ये द्रव्य गुण-कर्माणि ', ' इह गवि गोत्वम् ', ' इहात्मनि ज्ञानम्, ' इहाकाशे शब्द: ' इत्यादि प्रतीतियों में भी तन्तु आधारों और पट प्रभृति आधेयो से अतिरिक्त कोई सम्बन्ध अवश्य ही भासित होता है । क्योंकि कोई भी विशिष्टबुद्धि विशेष्य और विशेषण के सम्बन्ध के बिना For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ३६ ) उत्पन्न ही नहीं हो सकती । ' इह तन्तुषु पट: ' इत्यादि प्रतीतियों का नियामक यह सम्बन्ध संयोग हो नहीं सकता, क्योंकि संयोग तो अन्यतरकर्मज होगा, अथवा उभयकर्मज होगा किं वा संयोगज होगा । प्रकृत में तन्तु प्रभृति में पट प्रभृति के सम्बन्ध की उत्पत्ति उक्त कर्मादि से नहीं होती है । दूसरी बात यह है कि जिन दो वस्तुओं का संयोग होता है, उन दोनों का विभाग भी अवश्य होता है । किन्तु तन्तु प्रभृति का प्रयादि के साथ कभी विभाग नहीं होता । जब तक पट की सत्ता रहेगी, तब तक वह तन्तु के साथ सम्बद्ध ही रहेगा । अतः संयोग से भिन्न समवाय नाम का भी सम्बन्धात्मक एक स्वतन्त्र पदार्थ वैशेषिक लोग मानते हैं । वैशेषिक सम्प्रदाय से भिन्न नैयायिक और मीमांसक ( प्रभाकर ) भी इसे मानते हैं । किन्तु इसके स्वरूप में कुछ मतभेद है । जैसे कि वैशेषिकगण इसे अतीन्द्रिय और नित्य मानते हैं, किन्तु नैयायिक इसे नित्य मानते हुए भी प्रत्यक्षवेद्य मानते हैं । प्रभाकर इसकी नित्यता को ही अस्वीकार करते हैं । वेदान्ती और सांख्यदर्शन के अनुयायी इसके कट्टर विरोधी हैं । सभी सम्बन्धों के प्रतियोगी और अनुयोगी होते हैं । तदनुसार इसके भी प्रतियोगी और अनुयोगी हैं । द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इसके प्रतियोगी हैं । एवं द्रव्य, गुण और कर्म ये तीन ही इसके अनुयोगी हैं । अर्थात् कथित द्रव्यादि पाँच पदार्थ ही समवाय सम्बन्ध से रहते हैं, और द्रव्य, गुण और कर्म में ही रहते हैं । संयोग सम्बन्ध को दृष्टान्त मानकर इसकी सिद्धि की गयी है । संयोग अपने अनुयोगियों और प्रतियोगियों में समवाय सम्बन्ध से रहकर ही विशिष्ट बुद्धि का सम्पादन करता है । अतः समवाय को अगर विशिष्टबुद्धि के नियामक रूप से स्वीकार करते हैं, तो यह भी निर्णय करना होगा कि वह अपने प्रतियोगी और अनुयोगी में किस सम्बन्ध से रहकर उक्त विशिष्टबुद्धियों का सम्पादन करेगा? समवायवादियों के ऊपर इसके विरोधी इसी प्रश्न के द्वारा अपना चरम प्रहार करते हैं । विरोधियों का अभिप्राय है कि अगर • समवाय के रहने के लिए किसी दूसरे सम्बन्ध की कल्पना करेंगे तो फिर उस सम्बन्ध के रहने के लिए भी दूसरे सम्बन्ध की कल्पना आवश्यक होगी, जिसका पर्यवसान अनवस्था में होगा । यदि स्वरूप सम्बन्ध से उसके प्रतियोगी और अनुयोगी में समवाय की सत्ता मानेंगे, तो फिर द्रव्यादि जिन पाँच पदार्थों का समवाय सम्बन्ध मान रहे हैं, उनका स्वरूप सम्बन्ध ही क्यों नहीं मान लेते? इस आक्षेप का उत्तर समवायवादी वैशेषिकादि इस प्रकार देते हैं कि घटादि द्रव्यों में रूपादि गुण यायादि का अगर स्वरूप सम्बन्ध से ही रहना मानें, तो फिर यह निर्णय करना कठिन होगा कि ये सम्बन्ध किसके स्वरूप हैं? क्योंकि घटादि भी अनन्त हैं, और उनमें रहनेवाले गुण एवं क्रियादि भी अनन्त हैं । सम्बन्ध को अनन्त पदार्थ स्वरूप मानना सम्भव नहीं है । हमलोग अगर इसके लिए अलग समवाय नाम का सम्बन्ध मान लेते हैं, तो फिर इस प्रकार की कोई भी आपत्ति नहीं रह जाती है । क्योंकि वह अपने सभी प्रतियोगियों और अनुयोगियों में एक ही है, और स्वाभिन्न स्वरूप सम्बन्ध से ही है । एवं समवाय में रहनेवाला सम्बन्ध भी चूँकि समवाय रूप ही है, अतः आगे For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ४० ) विभिन्न सम्बन्ध की कल्पना की धारा ही रुक जाती है । अतः इस पक्ष में न अनवस्था दोष है, और न कल्पना का गौरवदोष है । अतः समवाय का मानना आवश्यक है । अभाव अभाव पदार्थ को महर्षि कणाद के द्वारा उनके सूत्रों से स्वीकृत मानकर मैं उसका विवरण दे रहा हूँ । इस प्रकरण के अन्त में ' अभाव पदार्थ भी महर्षि कणाद को अभीष्ट था ' इसकी उपपत्ति यथामति दे दी है । प्रथमतः अभाव के ( १ ) अन्योन्याभाव और ( २ ) संसर्गाभाव ये दो भेद हैं । तादात्म्य नाम का एक सम्बन्ध है, जिसके द्वारा इस सम्बन्ध के प्रतियोगी का अभेद उसके अनुयोगी में प्रतीत होता है । जैसे कि ' नरः सुन्दरः ' इस बुद्धि में भासित होनेवाले तादात्म्य सम्बन्ध के द्वारा नर ' और ' सुन्दर ' में अभेद प्रतीत होता है । जिस अभाव की प्रतियोगिता इस तादात्म्य सम्बन्ध से नियमित हो या अविच्छिन्न हो, उस प्रतियोमिता के आश्रयीभूत वस्तु का अभाव ही अन्योन्याभाव है । इस अभिप्राय से ही ' तादात्म्य-सम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताको भावोऽन्योन्याभाव ' अन्योन्याभाव का यह लक्षण प्रसिद्ध है । ' अन्योन्याभाव का ही दूसरा नाम ' भेद ' है । ' अन्योन्यस्मिन् अन्योन्यस्याभाव: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो अभाव जिस अनुयोगी में रहे, अगर उस अनुयोगी का अभाव भी प्रथमोक्त अभाव के प्रतियोगी में रहे तो वह अभाव ' अन्योन्याभाव है ' । जैसे कि ' घटो न ' इस आकार का अन्योन्या-भाव पट में है । यतः अनुयोगीभूत इस पट का भी अन्योन्याभाव घट में है । अन्योन्याभाव के बोधक वाक्य में उसके प्रतियोगी के योषकपद और अनुयोगी के बोधकपद दोनों ही प्रथमान्त होते हैं, जैसे कि ' घटो न पटः । किन्तु संसर्गभाव के अभिलापक वाक्य प्रतियोगि के बोधक पद तो प्रथमान्त होते हैं, किन्तु अनुयोगी के बोधक पद प्रायः सप्तम्यन्त होते हैं, जैसे कि ' भूतले घटो नास्ति ' । अन्योन्याभाव को छोड़कर ओर सभी अभाव संसर्गाभाव कहलाते हैं । संसर्गाभाव के द्वारा अनुयोगी में प्रतियोगी के संसर्ग का ही प्रतिषेध होता है ' भूतले घटो नास्ति ' यहाँ पर यद्यपि भूतल में घट के निषेध का ही व्यवहार होता है, " किन्तु सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर वह प्रतिषेध भूतल में घटसंयोग का ही प्रतिषेध प्रतिपन्न होता है । क्योंकि भूतल में यतः घट का संयोग है, अतः भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट की सत्ता है । सुतराम् भूतल में घट संयोग की सत्ता ही घटना का नियामक है । अतः भूतल में घट संयोग की असत्ता ही घट की असत्ता की प्रयोजिका होगी । ( १ ) प्रागभाव ( २ ) प्रध्वंसाभाव और ( ३ ) अत्यन्ताभाव भेद से संसर्गाभाव तीन प्रकार का है । कार्य की उत्पत्ति से पहिले उपादानकारण में कार्य के जिस अभाव का व्यवहार होता है वह ' प्रागभाव ' है जैसे कि तन्तु में पट का अभाव दूध में दही का अभाव इत्यादि । यह यद्यपि अनादि है, किन्तु इसका विनाश होता है । क्योंकि पट की उत्पत्ति के बाद तन्तु में पुनः इस अभाव की प्रतीति नहीं होती है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ४ ९ ) मुद्गरादि के प्रहार से घटादि के नाश को ही प्रध्वंस या ध्वंश कहते हैं । इस की उत्पत्ति तो होती है, किन्तु विनाश होता । ध्वंस का विनाश मानने पर फूटे हुए घड़े की पुनः उत्पत्ति माननी पड़ेगी, क्योंकि घटादि के ध्वंस का ध्वंस घटादि के उत्पत्ति स्वरूप हो हो सकता है । अतः ध्वंस सादि होने पर भी अनन्त है । संसर्गभावों में जो अभाव नित्य हो उसे ही ' अत्यन्ताभाव ' कहते हैं । अत्यन्ताभाव की न उत्पत्ति होती है ' न उसका विनाश ही होता है जैसे कि वायु में रूपादि का अभाव अन्तन्ताभाव है, भूतल में घटाभाव भी अत्यन्तामाव ही है ॥ इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठता है कि अत्यन्ताभाव यदि नित्य है तो वह अपने आश्रयों में बराबर रहेगा । अतः भूतल में घट की सत्त्वदशा में भी घटाभाव की प्रमा प्रतीति होनी चाहिए । किन्तु भूतल में घट की स्थिति दशा में घटाभाव की प्रतीति को प्रमा नहीं स्वीकार किया जा सकता । इसको दो उत्तर दिये जाते हैं । ( १ ) कुछ लोगों का कहना है, अत्यन्ताभाव नित्य और अनित्यभेद से दोनों प्रकार का है । वायु में रहनेवाला रूप का अत्यन्ताभाव नित्य है । एवं भूतलादि में रहनेवाला घटाभाव अनित्य है, क्योंकि भूतल में घट के न रहने पर वह उसन्न होता है, पुनः घट के आ जाने पर वह घटाभाव नष्ट हो जाता है । अतः उस समय भूतल में घटाभाव नहीं है । ( २ ) कुछ लोगों का कहना है कि सभी अत्यन्ताभाव नित्य हैं । अगर ऐसी बात. न हो, भूतल में घट के आ जाने पर घटात्यन्ताभाव का नाश मान लिया जाय तो उस समय अन्यत्र भी घटात्यन्ताभाव की सत्ता न रह पायेगी । जिससे भूतल की तरह और सभी आश्रयों में भी जहाँ कि उस समय घट की सत्ता नहीं है - घटाभाव की प्रतीति प्रमा न हो सकेगी । अतः सभी अत्यन्ताभाव नित्य ही है भूतल में घट की स्थिति दशा में जो घटाभाव की प्रतीति प्रमा नहीं होती है, उसका कारण है उस समय भूतल में घटाभाव के सम्बन्ध का न रहना सम्बन्ध के रहने से ही सम्बद्ध वस्तुओं की सत्ता होती है । भूतल में घट का संयोग है, अतः संयोग सम्बन्ध से भूतल में घट है । तन्तुओं में पट का समवाय सम्बन्ध है, अतः समवाय सम्बन्ध से तन्तुओं में पट की सत्ता है । भूतल में घटाभाव की सत्ता का प्रयोजक स्वरूप सम्बन्ध केवल साधारण भूतल स्वरूप ' नहीं है । किन्तु घट का असमानकालिक जो भूतल, तत्स्वरूप है । जिस है, समय असमान- भूतल में घट की सत्ता रहती है,, उस समय का भूतल घट का समानकालिक कालिक नहीं । अतः उस समय भूतल में घटाभाव की सत्ता का उपयुक्त स्वरूप सत्ता रहते हुए भी भूतल में सम्बन्ध नहीं है । सुतराम् उस समय अन्यत्र घटाभाव की घटाभाव की सत्ता नहीं है । अतः उस समय भूतल में होनेवाली घटाभाव की प्रतीति प्रमा नहीं होती है । सुतराम् किसी भी अत्यन्ताभाव को अनित्य मानने की आवश्यकता नहीं है । सभी अत्यन्ताभाव उत्पत्ति और विनाश से रहित है, अतः पूर्णरूप से नित्य है । अभाव के प्रसन में नव्य नैयायिकों ने इतना अधिक विचार किया है कि उसके कुछ अंशों को भी जाने बिना अभाव का ज्ञान अधूरा ही रहेगा । अतः तदनुसार मैं For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ४१ ) अभाव को प्रकृत रूप से समझने के लिए उससे सम्बद्ध कुछ विषयों का परिचय देना आवश्यक समझता हूँ । जिस प्रकार संयोगादि सभी सम्बन्धों का एक प्रतियोगी और एक अनुयोगी होता है उसी प्रकार सभी अभावों के भी प्रतियोगी और अनुयोगी होते हैं । प्रतियोगी शब्द यहाँ प्रतिपक्षी का बोधक है । अतः जो अभाव जिसका विरोधी अर्थात् प्रतिपक्ष होगा वही उसका प्रतियोगी होगा । फलतः अभाव जिस वस्तु का होगा, वही वस्तु उस अभाव का प्रतियोगी होगा । जैसे कि ' घट का अभाव पट का अभाव, रूप का अभाव ' इत्यादि रीति से जिसके सम्बन्ध से युक्त होकर जिस अभाव की प्रतीति होती है, वही उस अभाव का प्रतियोगी होता है । जैसे कि जहाँ पर घटाभाव रहेगा, वहाँ घट नहीं रहेगा, अतः घटाभाव घट का विरोधी है । एवं घट का अभाव ही घटाभाव है ", अतः घटाभाव का प्रतियोगी घट है । एवं पटाभाव का प्रतियोगी पंट है, रूपाभाव का प्रतियोगी रूप है । जो अभाव जिस आश्रयीभूत वस्तु में रहेगा, वही वस्तु उस अभाव का अनुयोगी हाँगा । जैसे किं वायु रूपाभाव का अनुयोगी है, घटादि जड़ पदार्थ ज्ञानाभाव के अनुयोगी हैं । कथित प्रतियोगी में रहनेवाला धर्म ही प्रतियोगित्व या प्रतियोगिता है, एवं कथित अनुयोगी में रहनेवाला धर्म ही अनुयोगिता है । इस प्रसन्न में यह विशेष रूप से विचारणीय है कि एक स्थान में एक सम्बन्ध विद्यमान वस्तु का भी दूसरे सम्बन्ध से उसी स्थान में अभाव रहता है । जैसे कि भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहने पर भी समवाय सम्बन्ध से भूतल में घट का अमाव रहता है । इसी प्रकार एक स्थान में एक रूप से एक वस्तु की सत्ता रहने पर भी दूसरे रूप से उसी वस्तु का अभाव उसी आश्रय में रहता है । जैसे कि किसी गृह में पटत्व रूप से शुक्ल पट के रहने पर भी नीलपट रूप विशेष रूप से पट नहीं रहता, अतः उक्त शुक्लपट के आश्रय गृह में ' नीलपटत्वेन पटो नास्ति ' यह ( विशेष रूप ' सामान्याभाव ) अभाव रहता है । क्योंकि शुक्ल पट की सत्ता गृह में है, इससे नील-पट की सत्ता गृह में नहीं रह जाती । एवं वही पट जब घर से बाहर रहता है, उस समय उसमें बहिर्वृत्तित्व रूप धर्म रहता है । इस बहिर्वृत्तित्व रूप से पट कभी भी घर मैं नहीं रह सकता । अतः घर में पट की सत्स्व दशा में पटत्वेन पट के रहते हुए भी तित्वेन पट का अभाव रहता है । एवं जिस समय घर में पट तो है, किन्तु घट नहीं है, उस समय केवल घट के रहने पर भी घट पट दोनों नहीं है । अतः पटत्वेन पट की सत्ता घर में रहने पर भी घटपटोभयत्वेन पट की सत्ता नहीं है । क्योंकि ऐसा तो नहीं कह सकते कि घट है इस लिए घट और पट दोनों ही है । अतः उभयाभाव के एक प्रतियोगी के रहने पर भी उमयत्वेन उसी प्रतियोगी का अभाव रहता है । इसको ही ' एकसत्वेऽपि द्वयं नास्ति ' इस वाक्य के द्वारा व्यवहार करते हैं । इस प्रकार सम्बन्ध के द्वारा और धर्म के द्वारा अभावों में वैलक्षण्य होता है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ४३ ) किन्तु प्रतियोगिता के द्वारा ही अभावों में वैलक्षण्य आ सकता है । अतः यह कहा जाता है कि अभाव की प्रतियोगितायें किसी सम्वन्ध से एवं किसी धर्म से नियमित ( अविच्छिन्न ) होती हैं । जो प्रतियोगिता जिस सम्बन्ध से एवं जिस धर्म से अविच्छिन्न ( नियमित ) होगी, वही सम्बन्ध और वही धर्म उस प्रतियोगिता का अवच्छेदक होगा । जैसे कि ' समवायेन घटो नास्ति " इस अभाव की प्रतियोगिता समवाय सम्बन्ध और घटत्व धर्म से अवच्छिन्न है । अतः उक्त अभाव का प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध समवाय है, और प्रतियोगितावच्छेदक धर्म घटत्व है । तदनुसार नवीन नैयायिक ‘ समवायेन घटों नास्ति ' इस वाक्य का अर्थ करते हैं -- " समवायसम्बन्धावच्छिन्नघटत्वावच्छिन्नप्रतियोगिता-काभावोऽस्ति " | सम्बन्ध को अभाव का प्रतियोगितावच्छेदक मानने में यह युक्ति है कि सामान्यतः किसी भी वस्तु का अभाव कहीं भी नहीं है । अन्ततः कालिक सम्बन्ध से सभी वस्तुएँ सभी जगह वर्तमान हैं । अतः जब भी किसी वस्तु का अभाव कहीं व्यवहृत होता है, तो उसके मध्य में कोई विशेष प्रकार का सम्बन्ध कार्य करता रहता है । सम्बन्ध का यह कार्य प्रतियोगिता में वैलक्षण्य सम्पादन के द्वारा ही हो सकता है, और किसी प्रकार नहीं । जिस सम्बन्ध से जो वस्तु जहाँ नहीं है, वहीं सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता में और अभाव की प्रतियोगिताओं से वैलक्षण्य का सम्पादन करता है । अतः वही सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता का ' अवच्छेदक ' है । एवं वह प्रतियोगिता उस सम्बन्ध से अवच्छिन्ना होती हैं । जैसे कि भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए समवायेन घटो नास्ति ' इस प्रकार का जो अभाव रहता है, उस अभाव की प्रति-योगिता में समवाय सम्बन्ध ही ( संयोगसम्बन्धावच्छिन्नघट निष्ठप्रतियोगिता की अपेक्षा ) वैलक्षण्य का सम्पादन करता है । अगर समवाय सम्बन्ध उक्त प्रतियोगिता में वैलक्षण्य का प्रयोजक न हो तो फिर घटनिष्ठ सभी प्रतियोगिताएँ समान रह जाएगी । जिससे जिस प्रकार भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए संयोगेन घटो नास्ति ' यह प्रतीति नहीं होती है, उसी प्रकार ' समवायेन घटो नास्ति ' यह प्रतीति भी न हो सकेगी । अतः ' समवायेन घटो नास्ति ' इस अभाव की प्रतियोगिता में और प्रतियोगिताओं से वैलक्षण्य का सम्पादक समवाय सम्बन्ध को मानना पड़ेगा । सम्बन्धों में प्रतियोगिताओं का यह ' विशेषकत्व ' ही सम्बन्ध का प्रतियोगितावच्छेकत्व है । धर्म को प्रतियोगिता का नियामक ( अवच्छेदक ) मानने में यह युक्ति है कि किस अभाव की प्रतियोगिता कहाँ कहाँ है? एवं कहाँ नहीं? इसके लिए प्रतियोगिता का कोई ऐसा नियामक ( अवच्छेदक ) धर्म मानना पड़ेगा जो सभी प्रतियोगियों में रहे एवं अप्रतियोगिभूत वस्तुओं में न रहे । इसी नियामक धर्म को प्रतियोगिता का ' अवच्छे-दक धर्म ' कहते हैं, जो इस नियामक के द्वारा नियमित होता है, वह उस धर्म से ' अवच्छिन्न ' होता है । जैसे कि घटाभाव की प्रतियोगिता कहाँ कहाँ है? एवं कहाँ कहाँ नहीं? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि घटत्वधर्म जहाँ कहीं भी है, उन सभी स्थानों में अर्थात् सभी घटों में घटाभाव की प्रतियोगिता है । एवं जिन सब स्थानों में घटत्व नहीं है अर्थात् घट से भिन्न पटादि सभी वस्तुओं में वह प्रतियोगिता नहीं है । अतः घटत्व For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ४४ ) ही घटाभाव की प्रतियोगिता की स्थिति का नियामक है । एवं घटाभाव की प्रतियोगिता घटत्व से नियम्य है । वस्तुतः नियामकत्व ही अवच्छेदकत्व है और नियम्यत्व ही अव-च्छिन्नत्व है । इस दृष्टि से यद्यपि ' अच्छेदक ' पद के स्थान में ' नियामक ' पद का और ' अवच्छिन्न ' पद के स्थान में ' नियम्य ' पद का भी प्रयोग किया जा सकता है, किन्तु ' अवच्छेदक ' पद ही उक्त अर्थ में परम्परा से प्रयुक्त है, अतः उसके स्थान में दूसरे पदों की प्रयुक्ति से झटिति बोध में बाधा पहुँचेगी और अप्रयुक्तत्व दोष प्रयोक्ता के ऊपर आ पड़ेगा । सप्तपदार्थी इधर वैशेषिकदर्शन के मूर्द्धन्य प्रकरण ग्रन्थों के प्रभाव से विद्वानों की यह धारणा चली आ रही है कि महर्षि कणाद और उनके अनुयायी द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव इन सात पदार्थों की सत्ता मानते थे । किन्तु महर्षि कणाद ने " धर्मप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्यानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् ” ( अ१- आ -१ - सू ० ४ ) इस पदार्थोद्देश्य सूत्र में पदार्थ का उल्लेख नहीं किया है । एवं वैशेषिक दर्शन के सब से प्रामाणिक भाष्यकार प्रशस्तपाद ने भी अभाव पदार्थ का उल्लेख नहीं किया है । एवं विपक्षियों के

धर्मं व्याख्यातुकामस्य षटपदार्थोपवर्णनम् ।

सागरं गन्तुकामस्य हिमबद्गमनोपम् ॥

( अर्थात् " धर्म की व्याख्या के लिए प्रवृत्त पुरुष के द्वारा छः पदार्थों का वर्णन वैसा ही अयुक्त है जैसा कि समुद्र की ओर जानेवाले पुरुष के लिए हिमालय पर जाना अयुक्त है ) | " इत्यादि उक्तियों से भी इस धारणा को बल मिला है कि महर्षि कणाद द्रव्यादि छः भावपदार्थों को ही मूलतः मानते थे । पीछे आकर उपपत्ति की दृष्टि से आव-श्यक समझकर आचार्यों ने ' अभाव ' को भी वैशेषिक दर्शन के द्वारा अभिमत स्वतन्त्र पदार्थों में गणना कर ली, और तब से ही वैशेषिकदर्शन को सप्तपदार्थवादी माना जाने लगा । अत एव किरणावलीकार उदयनाचार्य न्यायकन्दलीकार श्रीधर भट्ट, न्यायलीला-वतीकार वल्लभाचार्य प्रभृति वैशेषिकदर्शन के सभी प्रमुख आचार्यों को इसकी उपपत्ति देनी पड़ी है कि “ पदार्थोद्देश " सूत्र में अभाव पदार्थ की अनुक्ति से उसका महर्षि कणाद के द्वारा अस्वीकृति का समर्थन नहीं किया जा सकता । किन्तु महर्षि कणाद के द्वारा निर्मित सूत्रों में निम्नलिखित पाँच सूत्र ऐसे हैं, जिनसे अभाव पदार्थ का स्वातन्त्र्य और उसके प्रागभावादि चार भेदों का स्पष्टतः उल्लेख है । एवं ये पाँच सूत्र उन सभी सूत्र व्याख्याताओं के द्वारा स्वीकृत है जो अभी तक उपलब्ध हैं । कणाद सूत्र की अभीतक तीन प्राचीन स्वतन्त्र टीकाएँ उपलब्ध है ( १ ) अनेकशः प्रकाशित शङ्कर मिश्र कृत उपस्कार टीका, ( २ ) मिथिला विद्यापीठ के द्वारा प्रकाशित अज्ञातनामा किसी दाक्षिणात्य विद्वान् की टीका, एवं ( ३ ) बड़ौदा से प्रकाशित चन्द्रानन्द पंडित कृत टीका । इन सभी टीकाकारों के द्वारा ये पाँच सूत्र स्वीकृत हैं और इनकी व्याख्या भी प्रायः उक्त सभी टीकाओं में एक सी । पं. जयनारायण तर्कपञ्चानन की विवृति और चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार के भाष्य ये दो For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 58 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ४५ ) वैशेषिक सूत्र की अर्वाचीन टीकाएँ हैं । इन दोनों में भी उक्त पाँच सूत्र हैं । इन उपपत्तियों से अपने निर्णय पर पहुँचने के बाद मैंने चौखम्बा सिरीज से प्रकाशित शङ्कर मिश्र कृत ‘ कणादरहस्य ' के अन्त में चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार महाशय कृत वैशेषिक दर्शन-भाष्य की एक आलोचना छपी देवी है, आलोचक का नाम उसमें नहीं है, इस आलो-चना के अन्त में स्वतन्त्र रूप से इन पाँच सूत्रों का उल्लेख किया गया है, और व्याख्या लिखी गय है | और उन्होंने लिखा है कि ' अभाव को कणाद के द्वारा अस्वीकृति का जो आक्षेप किया जाता है, उसके निराकरण के लिए ही मैंने इन सूत्रों की व्याख्या की है ' । अतः इन पाँच सूत्रों की प्रामाणिकता में कोई सन्देह नहीं है । सूत्र हैं— ( १ ) क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ( ६-१-१ ) । उत्पत्ति से पहिले ( घटादि कार्य ) असत् हैं, क्योंकि उस समय उनमें क्रियाओं का और गुणों का व्यवहार नहीं होता । ( २ ) सदसत् ( ६-१-२ ) । पहिले से विद्यमान मी घटादि कार्य नाश के बाद असत् हैं ( क्योंकि नाश के बाद भी उनमें गुण क्रियादि का व्यवहार नहीं होता ) । ( ३ ) असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् । अविद्यमान पदार्थों में यतः क्रियादि का व्यवहार नहीं होता है, अतः अभाव पदार्थ द्रव्यादि भावपदार्थों से भिन्न पदार्थ है । ( ४ ) सच्चासत् ( E - १-४ ) । सत् अर्थात् विद्यमान घटादि का भी प्रतिपेध होता है ( यह प्रतिषेध ही अन्योन्याभाव हैं ) । ( ५ ) यच्चान्यदसतस्तदसत् ( ६-१-५ ) । कथित तीनों प्रकार के अभावों से भिन्न अभाव भी हैं ( यही अत्यन्ताभाव है ) । इनमें तीसरे सूत्र से अभाव को द्रव्यादि छः पदार्थों से भिन्न ठहराया गया है, और शेष चार सूत्रों में से पहिला प्रागभाव का, दूसरा ध्वंस का चौथा अन्योन्याभाव का एवं पाँचवाँ अत्यन्ताभाव का ज्ञापक है । अतः इन सूत्रों के द्वारा अभाव का इत्यादि छः पदार्थों से स्वातन्त्र्य और उसके प्रागभावादि चारों भेद सुव्यवस्थ हैं । सुतराम् उद्देश्य सूत्र में अभाव पदार्थ का पृथक रूप से उल्लेख न रहने के कारण सूत्रकार के ऊपर न्यूनता का ही आक्षेप कथञ्चित् हो सकता है । इससे अभाव के प्रसङ्ग में उनकी असम्मति नहीं मानी जा सकती । उपसंहार सूत्रों के अनुसार भी उपक्रम सूत्र में ह्रासवृद्धि अनेक स्थानों में देखी जाती है । इस बात यह है कि मिथिलाविद्यापीठ से और बड़ौदा से जो वैशेषिकसूत्र छपे हैं, उन दोनों में ही " द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानाम् " इत्यादि उद्देशसूत्र हैं ही नहीं । अतः इस सूत्र का प्रामाण्य ही सन्दिग्ध है । अतः सन्दिग्धप्रामाण्यवाले सूत्र के द्वारा किसी निश्चित प्रणाम पर नहीं पहुँचा जा सकता । वैशेषिक दर्शन के प्रसङ्ग में षट्पदार्थ प्रतिपादक और जितने भी वाक्य हैं, वे सभी कथित बैशेषिक सूत्रों से दुर्बल ही हैं । अतः प्रवादों के बल पर अभाव की वैशेषिक-शास्त्रीय स्वीकृति काटी नहीं जा सकती है । For Private And Personal

पृष्ठ 59

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ( ४६ ) इन सभी उपपत्तियों के अनुसार मेरी सम्मति में अभाव पदार्थ भी महर्षि कणाद । के द्वारा स्वीकृत है । इस पुस्तक के पाठ के प्रसङ्ग में मैंने साधारणतः मुद्रित न्यायकन्दली का ही अनुसरण किया है । किन्तु जहाँ कहीं मुझे ऐसे पाठ मिले, जिससे प्रकृत अर्थ का बोध ही संभव नहीं था, उनको यथामति संशोधन करके तदनुसार ही अनुवाद किया है । किन्तु मूल में यथावत् प्रायः मुद्रित पुस्तक के पाठ को ही रहने दिया है । नीचे टिप्पणी में उपपत्ति सहित उन पाठभेदों का उल्लेख कर दिया है । विद्वान् लोग इस पर अवश्य ष्ट करें | अनुवाद में मैंने अर्थ को स्पष्ट करने के अभिप्राय से कुछ अधिक शब्दों के प्रयोग का स्वातन्त्र्य ग्रहण किया है । इतने बड़े आकार के ग्रन्थ में न्यूनता के अतिरिक्त भ्रम और प्रमाद की पूरी संभावना है । अतः विद्वानों से क्षमा याचना पूर्वक प्रार्थना है कि ऐसे स्थलों से मुझे अवश्य अवगत करावें । जिससे अगर इसका पुनः संस्करणं संभव हुआ तो उन अवगतियों से लाभ उठाया जा सके ।

द्विद्वांसोऽनुगृह्णन्तु चित्तश्रौत्रः प्रसादिभिः ।

सन्तः प्रणयिवाक्यानि गृह्णन्ति ह्यनसूयवः ॥

आचार्य कुमारिलभट्ट के इस श्लोक के साथ मैं इस भूमिका को समाप्त करता हूँ । दुर्गाधर झा अनुसन्धान सहायक, वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी । For Private And Personal

पृष्ठ 60

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 60 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४७ कारणत्वञ्चान्यत्र पारिमाण्डन्यादिभ्यः । पारिमाण्डल्य प्रभूति पदार्थों को छोड़कर और सभी पदार्थों का कारणत्व साधर्म्य है । विनाशो वस्तुकाले न्यायकन्दली नास्ति, तथापि प्रमाणान्तरसिद्धसद्भावो भवत्येव विशेषणम्, अनित्यो घट इति प्रत्येतुरेकत्वात् । तथा लोके विनाशि शरीरमध्रुवा विषया इति । कारणत्वञ्चान्यत्र पारिमाण्डल्यादिभ्य इति पारिमाण्डत्यमिति परमाणुपरिमाणम्, आदिशब्दाद् द्वयणुकपरिमाणम्, आकाशकालदिगात्मनां विभुत्वमन्त्यशब्दमनःपरिमाणं परत्वापरत्वे द्विपृथक्त्व मन्त्यावयविपरिमाणञ्चेत्यादि दशा में विनाश नहीं रहता है । ( उ ० ) तथापि जिसकी सत्ता प्रमाण सिद्ध से है, वह भी अवश्य विशेषण ही होता है । साधारण जनों को भी इस प्रकार की स्वारसिक प्रतीतियाँ होती हैं कि शरीर विनाशशील है, सभीं वस्तु चिरकाल तक रहनेवाली नहीं हैं । ' पारिमाण्डल्य ' शब्द का अर्थ है परमाणुओं का परिमाण । ( पारिमाण्डल्यादि पद में प्रयुक्त ) ' आदि ' पद से आकाश काल, दिशा और आत्मा इन चार पदार्थों का ' विभुत्व ' अर्थात् परममहत्परिमाण अन्तिम शब्द मन का परिमाण तथा उसी का परत्व और अपरत्व, द्विपृथक्त्व अन्त्यावयवी द्रव्य ( जो अवयवी किसी दूसरे अवयवी का अवयव न हो, जैसे घट ) का परिमाण, ये सभी अभिप्रेत हैं । इनसे भिन्न द्रव्यादि तीन १. पूर्वपक्षी का आशय है कि विनाश ही अगर अनित्यत्व हो तो ' घटोऽनित्यः ' इस प्रकार की विशिष्ट प्रमाबुद्धि नहीं होगी, क्योंकि विशिष्ट प्रमा के लिए विशेष्य में विशेषण का रहना आवश्यक है । जब तक धटरूप विशेष्य रहेगा, तब तक उसमें विनाशरूप अनित्यत्व नहीं रहेगा और जब घट विनष्ट हो जाएगा, तब अनित्यत्वरूप विशेषण रहेगा कहाँ? सुतरम् चूँकि विद्यमान वस्तु और विनाश दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः उनमें विशेष्यविशेषणभाव नहीं हो सकता । २. इस समाधान ग्रन्थ का आशय है कि विशेष्यविशेषणभाव के लिए दोनों का एक समय में रहना आवश्यक नहीं है, केवल इतना ही आवश्यक है कि दोनों प्रमाणसिद्ध हों एवं परस्पर सम्बद्ध हों । इसका भी कोई बन्धन नहीं है कि वह सम्बन्ध आधारा-घेयभाव का नियामक ही हो । अतः ' घटो विनष्ट: ' इत्यादि विशिष्ट प्रतीति के अनुरोध से घट और विनाश में भी प्रतियोगित्वादि सम्बन्ध की कल्पना करेंगे । अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है । For Private And Personal