प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 421–430
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 421–430
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३४६ न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संयोग-दर्शनादभावकार्यत्वं नास्तीति चेत्? न, नित्यानां कर्मणामकरणात् प्रत्यवा-स्योत्पादात्, अन्यथा नित्याकरणे प्रायश्चित्तानुष्ठानं न स्याद्वैयर्थ्यात् । नित्याना -मकरणेऽन्यकरणात् प्रत्यवायो न तु नित्याकरणस्य करण प्रागभावस्य हेतुत्वमिति चेत्? नित्याकरणस्य तद्भावभावित्वनियतस्य सहायत्वेन व्यापारात् । ननु यदि प्रतिबन्धकस्य प्रयोगे तदभावो निवृत्त इति दाहस्यानुत्पत्तिस्तदा प्रतिबन्धक-प्रतिबन्धकेऽपि दाहो न स्यात्, तत्कारणस्य प्रागभावस्य निवृत्तत्वात् । दृश्यते च प्रतिबन्धकस्यापरेण मन्त्रादिना प्रतिबन्धे सति दाहः तेन नाभाव: कारण-मित्यवस्थितेयं शक्तिः कारणम् । सा च प्राक्तनेन प्रतिबद्धा द्वितीयेनोत्तम्भितेति कल्पना अवकाशं लभते । तदप्यपेशलम्, सम्भवत्यदृष्टकल्पनानवकाशात् । कदाचित् प्रतिबन्धकमन्त्राद्यभाव-विघटन से नहीं होती है । ( प्र ० ) यह नियमित रूप से देखा जाता है कि भाव रूप कारण से ही भाव रूप कार्य की उत्पत्ति होती है ( अभाव रूप कारण से नहीं ), अतः अभाव को दाह रूप भाव कार्य का कारण मानना सम्भव नहीं है । ( उ ० ) ( भाव रूप कारण से ही भाव कार्य की उत्पत्ति ) नहीं होती है, क्योंकि नित्य कर्मों के न करने से भी पापों की उत्पत्ति होती है । अगर ऐसी बात न हो तो फिर नित्य कर्म के न करने से हो जाएगा । ( प्र ० ) नित्य कर्म के अनुष्ठान के समय उसे प्रायश्चित्त का अनुष्ठान व्यर्थ न कर दूसरा जो कर्म किया जाता है, उसी से पाप की उत्पत्ति नहीं होती है । ( वहाँ ) नित्य कर्म के अनुष्ठान के प्रागभाव से पाप की उत्पत्ति नहीं होती है । ( उ ० ) जिस समय नित्य कर्म का अनुष्ठान नहीं होगा, उस समय अवश्य ही किसी दूसरे कर्म का अनुष्ठान होगा, अतः नियत रूप से पहिले रहने के कारण दूसरे कर्म का अनुष्ठान उस पाप का कैवल सहायक व्यापार ही हो सकता है, कारण नहीं । ( प्र ० ) अगर प्रतिबन्धकीभूत मन्त्रादि के प्रयोग से उक्त मन्त्रादि के प्रागभाव नष्ट हो जाते हैं और इसीलिए मन्त्र के प्रयोग के स्थलों ह्न से दाह नहीं होता है, तो फिर दाह के प्रतिबन्धक मन्त्र के प्रभाव के प्रति-रोधक दूसरे मन्त्र के रहने पर भी दाह की उत्पत्ति नहीं होगी, क्योंकि उसका कारण प्रतिबन्धक का प्रागभाव तो नष्ट हो गया है । किन्तु दाह्रादि के प्रतिबन्धक मन्त्र के प्रयोग के रहने पर भी उसके विरोधी मन्त्र के प्रयोग से दाह की उत्पति देखी जाती है, अतः मन्त्र का प्रागभाव दाह का कारण नहीं हो सकता।तस्मात् वह्नि प्रभृति कारणों में दाहादि अवश्य है । इससे यह कल्पना वह शक्ति प्रतिरुद्ध कार्यों के उत्पादन करने की ( एक अतिरिक्त ) शक्ति भी सुलभ हो जाती है कि पहिले ( प्रतिरोधक ) मन्त्र के प्रयोग से हो जाती है, और दूसरे ( प्रतिबन्धक के विरोधी ) मन्त्र के प्रयोग से न्मुख हो जाती है । ( उ ० ) दृष्ट कारणों से ही कार्यों की हो सकती है, ऐसी स्थिति में अदृष्ट ( शक्तिरूप ) कारण की वह फिर से कार्यों-उत्पत्ति अच्छी प्रकार से कल्पना व्यर्थ है । कभी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३४७ अथ कथंलक्षणः? कतिविधश्चेति । अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः । स च त्रिविधः --- अन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजः, संयोगजश्च । ( उ ० ) ( प्र ० ) उसका स्वरूप ( लक्षण ) क्या है? एवं वह कितने प्रकार का अप्राप्त है? ( परस्पर न मिले हुए दो द्रव्यों की प्राप्ति ) मिलन ( ही ) संयोग है । वह ( १ ) अन्यतरकर्मज, ( २ ) उभयकर्मज और ( २ ) संयोगज भेद से तीन प्रकार का है । इसमें ( १ ) न्यायकन्दली सहिता सामग्री कारणम्, कदाचिद् द्वितीयमन्त्रादिसहिता कारणमित्यस्यां कल्प-नायां को विरोधः? यदनुरोधाददृष्टमाश्रीयते । दृष्टो ह्येकरूपस्यापि कार्यस्य सामग्रीभेदः, यथा दारुनिर्मथनप्रभवो वह्निः सूर्यकान्तप्रभवश्चेति तर्कसिद्धान्त-रहस्यम् । मीमांसासिद्धान्तरहस्यं तत्त्वप्रबोधे कथितमस्माभिः । संयोगः संयुक्तप्रत्ययनिमित्तमित्यवगतं तावत् किन्त्वस्य स्वरूपं भेदश्च न ज्ञायते तदर्थं परिपृच्छति - अथ कथंलक्षणः कतिविधश्चेति । अथेति प्रश्नोपक्षेपे कथं शब्दः किंशब्दार्थे, यथा को धर्मः कथंलक्षण इति । लक्षणशब्दश्च स्वरूप-वचन इति किस्वरूपः संयोगः? कतिविधश्चेति कतिप्रकार इत्यर्थः । लक्षणं कथयति - अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः । पूर्वमप्राप्तयोर्द्रव्ययोः पश्चाद्या प्रतिबन्धकीभूत मन्त्रादि सहित कारणों का समूह ही कार्य को उत्पन्न करता है, एवं कभी द्वितीय ( प्रतिबन्धक मन्त्रादि के विरोधी ) मन्त्रादि सहित कारणों का समूह हो उसका कारण होता है, इन दोनों कल्पनाओं में कौन सा विरोध है कि जिसके लिए आप ( मीमांसक ) अदृष्ट ( शक्ति ) का अवलम्बन करते हैं । एक तरह के कार्यों की उत्पत्ति अनेक प्रकार के कारणों से देखी जाती है । जैसे कि काठ की रगड़ से भी अग्नि की उत्पत्ति होती है, एवं सूर्यकान्तमणि से भी । ( शक्ति के विषय में ) यही तार्किकों के सिद्धान्त का रहस्य है । ( शक्ति पदार्थ की सत्ता के प्रसङ्ग में ) मीमांसकों के अभिमत सिद्धान्त के रहस्य का निरूपण मैंने ' तत्त्वप्रबोध ' नाम के ग्रन्थ में किया है । यह तो समझा कि ' ये परस्पर संयुक्त हैं ' इस आकार की प्रतीति का कारण ही संयोग है । किन्तु यह तो नहीं समझ सके कि इसका स्वरूप क्या है? इसके कितने भेद हैं? यही समझाने के लिए ' अथ कथं लक्षण:? कतिविधश्च? ' इत्यादि प्रश्न करते हैं । यहाँ ' अर्थ ' शब्द का अर्थ है ' किम् ' शब्द के स्थान में आया है । ‘ को घर्मः? कथं लक्षणः? ' इत्यादि ' प्रश्न का आरम्भ करना ' एवं ' कथम ' शब्द जैसे कि ( शाबरभाष्य - अ ०१ - पा ० - १ - सू ० -१ के ) स्थलों में ( ये शब्द ) प्रयुक्त हुए हैं । प्रकृत में For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३४८ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-तत्रान्यतरकर्मजः क्रियावता निष्क्रियस्य, यथा स्थाणोः श्येनेन, विभूनां च मूर्त्तेः । उभय कर्मजो विरुद्ध दिक्रिययोः संनिपातः, क्रिया से युक्त द्रव्य के साथ निष्क्रिय द्रव्य का संयोग अन्यतरकर्मज संयोग है, जैसे कि सूखे वृक्ष के साथ बाज पक्षी का संयोग एवं विभु द्रव्यों के साथ मूर्त्त द्रव्यों का संयोग । ( २ ) दो विरुद्ध दिशाओं में रहनेवाले क्रियायुक्त दो द्रव्यों का संयोग उभयकर्मज है । जैसे ( कि लड़ते हुए ) दो पहलवानों का न्यायकन्दली प्राप्तिः परस्परसंश्लेषः स संयोगः । अप्राप्तयोरिति समवायव्यवच्छेदार्थम् । sarai तस्य भेदं प्रतिपादयति - स च त्रिविध इति । च शब्दोऽवधारणे - संयोगस्त्रिविध एव । त्रैविध्यमेव दर्शयति - अन्य -तरकर्मज इत्यादिना । द्वयोः संयोगिनोर्मध्ये यदन्यतरद् द्रव्यं तत्र यत्कर्म तस्माज्जातोऽन्यतरकर्मजः । उभयोर्द्रव्ययोः कर्मणी उभयकर्मणी ताभ्यां जात उभयकर्मजः । संयोगादपि संयोगो जायते । तत्रान्यतरकर्मजः । तेषां तत्र त्रयाणां मध्ये क्रियावता द्रव्येण निष्क्रियस्य द्रव्यस्य संयोगोऽन्यतरकर्मजः । अस्योदाहरणम् - यथा स्थाणोः श्येनेन विभूनां च मूर्तेः । निष्क्रियस्य स्थाणोः ' लक्षण ' शब्द का अर्थ है स्वरूप ', तदनुसार उक्त वाक्यों का यह अभिप्राय है कि संयोग का स्वरूप क्या है? एवं उसके कितने भेद हैं? ' अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः ' इस वाक्य से संयोग का लक्षण ( स्वरूप ) कहा गया है । पहिले से अप्राप्त दो द्रव्यों की बाद में जो ' प्राप्ति ' अर्थात् सम्बन्ध ( होता है ), वही ( सम्बन्ध ) संयोग है । इस लक्षण वाक्य ) ' अप्राप्तयोः ' यह पद समवाय में अतिव्याप्ति को हटाने के लिए है । ' सच त्रिविधः ' इत्यादि से अब इसके भेदों को समझाते हैं । ( प्रकृत वाक्य में ) ' च ' शब्द अवधारण के लिए है । तदनुसार प्रकृत वाक्य का यह अर्थ है कि संयोग तीनही प्रकार के हैं । ' अन्यतरकर्मजः ' इत्यादि से वे तीनों भेद दिखलाये गये हैं । संयोग के दोनों सम्बन्धियों में जो ' अन्यतर ' अर्थात् एक द्रव्य है, केवल उसी द्रव्य की क्रिया से उत्पन्न होने वाले संयोग को अन्यतरकर्मज कहते हैं । ' उभयोः द्रव्ययोः ' इत्यादि व्युत्पत्ति के अनुसार ' उभयकर्मज ' शब्द का वह संयोग अर्थ है - जिसकी उत्पत्ति संयोग के सम्बन्धी रूप दोनों द्रव्यों की दोनों क्रियाओं से होती है । उसी को ' उभयकर्मज् ' संयोग कहते हैं । संयोग से भी संयोग की उत्पत्ति होती है, ( अर्थात् संयोग से उत्पन्न संयोग को ही संयोग संयोग कहते हैं ) । ' तत्रान्यतरकर्मजः ' अर्थात् ' तेषां त्रयाणां मध्ये ' अर्थात् उन तीनों संयोगों में से क्रिया से युक्त एक द्रव्य के साथ तथा क्रिया से रहित दूसरे द्रव्य के साथ के संयोग को ' अन्यतरकर्मज संयोग ' कहते है । ' यथा स्थाणो: ' इत्यादि वाक्य से अन्यतर-For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ve क्रियावता श्येनेन सह संयोगः श्येनकर्मजः । एवमाकाशादीनां विभूनां निष्क्रि-याणां क्रियावद्भिर्मूर्तेरसर्वगतद्रव्यपरिमाणैः मूर्तद्रव्यकर्मजः । नन्वेकस्य मन्दं गच्छतोऽपरेण तत्पृष्ठमनुधावतान्यतरकर्मजः संयोगो दृष्टः कथमुक्तं क्रियावता निष्क्रियस्येति? सत्यम् । निष्क्रियत्ववाचोयुक्तिस्तु विवक्षितसंयोगहेतुभूत-कर्माभिप्रायेणेति मन्तव्यम् । प्रथमं श्येनचरणस्थाणुशिरसोः संयोगः, तदनु स्थाणुश्येनावयविनो: । तत्रा-वयवयोः संयोगः कर्मजः, अवयविनोस्तु संयोगजः संयोग इति केचित् । तदप्यसारम्, सक्रियस्याप्यवयविनः क्रियावत एवावयव्यन्तरेण संयोगात् । यदि चैवं नेष्यते, अवयवानामपि स्वावयवापेक्षयावयवित्वेन सर्वत्रावयविषु कर्मजस्य संयोगस्योच्छेदः स्यादिति । तथा सति चावयविनि कर्माभावो कर्मज संयोग का ही उदाहरण कहा गया है, अर्थात् जैसे कि स्थाणु ' अर्थात् सूखे हुए वृक्ष और श्येन ( बाज ) पक्षी इन दोनों का संयोग केवल बाज पक्षी की क्रिया से उत्पन्न होने के कारण ' अन्यतरकर्मज ' संयोग है उसी प्रकार विभु अर्थात् क्रिया से रहित आकाशादि द्रव्यों का मूर्त्त द्रव्यों के साथ अर्थात् क्रिया से युक्त द्रव्यों के साथ जितने भी संयोग उत्पन्न होते हैं, वे सभी मूर्त्त द्रव्य रूप केवल एक द्रव्य की क्रिया से ही उत्पन्न होने के कारण ' अन्यतरकर्मज ' ही हैं । ( प्र ० ) एक आदमी अगर मन्दगति से जा रहा है, दूसरा तीव्र गति से चलकर उससे टकरा जाता है, इन दोनों आदमियों का संयोग भी तो अन्यतरकर्मज ही है, फिर क्रिया से युक्त एक द्रव्य का क्रिया से शून्य दूसरे द्रव्य के साथ होनेवाले संयोग को ही अन्यतरकर्मज कैसे कहते हैं? ( उ ० ) यह ठीक है ( कि अन्यतरकर्मज सभी संयोगों का एक सम्बन्धी नियमतः निष्क्रिय नहीं होता ) फिर भी अन्यतरकर्मज संयोग के प्रकृतलक्षण में निष्क्रियत्व ' का उपादान अन्यतरकर्मज संयोग के कहे हुए दोनों उदाहरणों को ही दृष्टि में रखकर किया गया है, ( क्योंकि स्थाणु और इन का संयोग एवं विभु द्रव्यों का मूर्त्त द्रव्यों के साथ संयोग इन दोनों उदाहृत संयोगों का एक सम्बन्धी अवश्य ही निष्क्रिय हैं ) । कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) पहिले श्येन के पैर और स्थाणु के आगे का भाग इन दोनों अवयवों में संयोग उत्पन्न होता है । इसके बाद श्येन रूप अवयवी और स्थाणु रूप अवयवी इन दोनों अवयवियों में दूसरा संयोग उत्पन्न होता है । इन दोनों में से पहिला संयोग ही कर्मज है और दूसरा किन्तु इस कथन में कुछ सार नहीं है, क्योंकि संयोग के संयोग संयोगज है । ( उ ० ) क्रियाशील सम्बन्धी एक अवयवी अवयवी के साथ संयोग हो जाता में क्रिया के रहने से ही दूसरे ( निष्क्रय या सक्रिय ) है । अगर ऐसा न मानें तो वे ( श्येन के पैर या स्थाणु के अग्रभागादि ) अवयव भी तो अपने - अपने अवयवों की अपेक्षा अवयवी हैं ही । इस प्रकार सभी अवयवियों से कर्मज For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३५० न्यायकन्दलौ संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-यथा मल्लयोपयोर्वा । संयोगजस्तूत्पन्नमात्रस्य चिरोत्पन्नस्य वा निष्क्रियस्य कारणसंयोगिभिरकारणैः कारणाकारणसंयोगपूर्वकः संयोग, अथवा ( लड़ते हुए दो ) भेड़ों का संयोग । ( ३ ) उत्पन्न होते ही या उत्पन्न होने के बहुत बाद किसी निष्क्रिय द्रव्य का अपने अवयवों के संयोग से युक्त अपने अकारणीभूत द्रव्यों के साथ जो संयोग होता है, वह ' संयोगजसंयोग ' है, ( इस संयोगजसंयोग की उत्पति कारण और अकारण के न्यायकन्दली वक्तव्यः, त्यक्तव्यं वावयविकर्मणः संयोगविभागयोरनपेक्षकारणं कर्मेति कर्मलक्षणमिति । दुरक्षरदुर्विदग्धानां युक्तिमाचार्यवचनं चोत्सृजतामन्धानामिव पदे पदे कियत् स्खलितं दर्शयिष्यामः । उभयकर्मजो विरुद्ध दिक्रिययोः सन्निपातः । याभ्यां दिग्भ्यां द्वयोः परस्परमागच्छतोरन्योन्यप्रतीघातो भवति ते विरुद्धे दिशौ यथा प्राचीप्रतीच्या दक्षिणोदीच्याविति । विरुद्धयोदिशोः क्रिया ययोर्द्रव्ययोस्ते विरुद्ध दिक्रिये, तयोः सन्निपात उभयकर्मजः संयोगः, प्रत्येकमन्यत्र द्वयोरपि सामर्थ्यावधारणात् । यथा मल्लयो मेंषयोर्वेत्युदाहरणम् । संयोगजस्तु संयोग उत्पन्नमात्रस्य चिरोत्पन्नस्य वा निष्क्रियस्य कारणसंयोगिभिरकारणः कारणाकारणसंयोगपूर्वकः कार्याकार्यगतः । संयोग का ही लोप हो जाएगा । ( अन्त में ) इससे यही कहना पड़ेगा कि अवयवियों में क्रिया होती ही नहीं है । या फिर अवयवियों में रहनेवाले कर्म के लिए कर्म सामान्य के इस लक्षण को ही छोड़िए कि ' संयोग और विभाग का निरपेक्ष कारण ही कर्म है । ' ( फलतः अवयवी में रहनेवाले कर्म के लिए दूसरा लक्षण करिए ) । इस प्रकार आचार्य के वचनों को छोड़नेवाले मूर्खों के पद पद पर गिरनेवाले अन्धों की तरह कितने स्खलनों को दिखलावें? हम ' उभयकर्मजो विरुद्धदिक्क्रिययोः संनिपातः ' जिन दो दिशाओं से आते हुए दो व्यक्तियों में संघर्ष हो सके वे दोनों दिशाएँ परस्पर विरुद्ध हैं, जैसे कि पूर्व और पश्चिम एवं दक्षिण और उत्तर । विरुद्धयोदिशोः क्रिया ययोर्द्रव्ययोस्ते विरुद्ध दिविक्रये, तयोः संनिपात उभयकर्मजः संयोगः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विरुद्ध दो दिशाओं में रहनेवाली क्रियाओं से युक्त दो द्रव्य ही द्विवचनान्त प्रकृत ' विरुद्धदिक्रिये ' शब्द के अर्थ हैं । इन दोनों द्रव्यों का संयोग ही ' उभयकर्मज ' संयोग है, क्योंकि दोनों क्रियाओं में से प्रत्येक में संयोग के उत्पादन का सामर्थ्य और स्थलों में देखा जाता है । ' यथा मल्लयोर्मेषयोव ' यह वाक्य उभयकर्मज संयोग के उदाहरण को समझाने के लिए है । ' संयोगजस्तु संयोग उत्पन्नमात्रस्य ' इत्यादि वाक्य ' प्रयुक्त ' कारण ' शब्द से समवायिकारण और ' अकारण ' For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३५१ कार्याकार्यगतः संयोगः । स चैकस्माद् द्वाभ्यां बहुभ्यश्च भवति । एकस्मात्तावत् तन्तुवीरणसंयोगाद् द्वितन्तुकवीरणसंयोगः । द्वाभ्यां संयोग से होती है, एवं इसकी स्थिति ( उस कारण के ) कार्य और ( उसी कारण के अकार्य द्रव्यों में ) रहती है । यह ( संयोगजसंयोग ) एक संयोग से, दो संयोगों से, एवं बहुत से संयोगों से भी उत्पन्न होता है । ( १ ) ( एक संयोग से इस प्रकार उत्पन्न होता है कि ) तन्तु और वीरण ( तृणविशेष ) के एक ही संयोग से दो तन्तुओं वाले एक पट और वीरण के संयोग की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली कारणशब्देनात्र समवायिकारणमभिमतम्, अकारणशब्देन समवायिकारणाद-न्यदुच्यते । शेषमुदाहरणे व्यक्तीकरिष्यामः । स चैकस्माद् द्वाभ्यां बहुभ्यश्च भवति । एकस्मात् तन्तुवीरण-संयोगाद् द्वितन्तुकवीरणसंयोगः । वीरणसंयुक्तस्य तन्तोस्तन्त्वन्तरेण संयोगा-दुत्पन्नमात्रस्य द्वितन्तुकद्रव्यस्य निष्क्रियस्य समवायिकारणभूतैकतन्तुसंयोगिना वीरणेन संयोगः प्राक्तनात् तन्तुवीरणसंयोगादेकस्माद्भवति, स चायं कारणा-कारणपूर्वसंयोगपूर्वकः कथ्यते, द्विन्तुकस्य समवायिकारणं तन्तुकारणं वीरणं तयोः संयोगेन जनितत्वात् । कार्याकार्यगतश्चायं तन्तुकार्ये द्वितन्तुके शब्द से ' समवायिकारण से भिन्न ' अभिप्रेत हैं । संयोगजसंयोग की और बातें हम इसके उदाहरण में कहेंगे । “ स चैकस्मात् द्वाभ्यां बहुभ्यश्च भवति, एकस्मात्तन्तुवीरणसंयोगाद् द्वितन्तुक-वीरणसंयोगः ” अभिप्राय यह है कि जहाँ वीरण ( तृण विशेष ) के साथ संयुक्त एक तन्तु का दूसरे तन्तु के साथ के संयोग से ( द्वितन्तुक ) पट की उत्पत्ति होती है । इस ( द्वितन्तुक ) पट का उस वीरण के साथ भी संयोग होता है जो क्रिया से सर्वथा रहित है, एवं इस पट के समवायिकारणीभूत तन्तु के साथ संयुक्त है । पट एवं ( तन्तुसंयुक्त ) वीरण का यह संयोग ( कथित ) तन्तु और वीरण के संयोग से ही उत्पन्न होता है । इसी प्रकार का संयोगजसंयोग ' कारणाकारणसंयोगपूर्वक ' कहलाता है, क्योंकि उक्त द्वितन्तुक पट का समवायिकारण है तन्तु, एवं अकारण है वीरण, इन दोनों के संयोग से वह उत्पन्न होता है | यह ( संयोगजसंयोग ) ' कार्याकार्यगत ' भी है, क्योंकि ( असमवायिकारणीभूत तन्तु और वीरण के संयोग का एक सम्बन्धी ) तन्तु के कार्य द्वितन्तुक पट एवं उस तन्तु के अकार्य वीरण इन दोनों में वह संयोग समवाय सम्बन्ध से है । उक्त ( पट और वीरण के ) संयोग का ( असमवायि ) कारण ( तन्तु और वीरण का ) संयोग ही है, क्योंकि यहाँ कोई दूसरा असमवायिकारण नहीं हो सकता । अतः संयोग में संयोग की कारणता परिशेषा-For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३५२ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-तन्त्वाकाशसंयोगाभ्यामेको द्वितन्तुकः संयोगः । बहुभ्यश्च तन्तु-( २ ) दो संयोगों से संयोगजसंयोग की उत्पत्ति इस प्रकार होती है कि दो तन्तुओं के साथ आकाश के दो संयोगों से उन दोनों तन्तुओं से बने न्यायकन्दली तदकाय च वीरणे समवेतत्वात् संयोगस्य संयोग हेतुत्वमन्यस्यासम्भवात् परिशेषसिद्धम् । प्रत्यासत्तिश्चात्र कार्येकार्थसमवायः, तन्तुवीरणसंयोगस्य द्वितन्तुक-वीरणसंयोगेन कार्येण सहैकस्मिन्नर्थे वीरणे समवायात् । संयोगस्यैकस्य संयोगजनकत्वे गुणाश्च गुणान्तरमारभन्त इति सूत्रविरोधः? न, सूत्रार्था-परिज्ञानात् । गुणानामपि गुणं प्रति कारणत्वमित्यनेन कथ्यते, न पुनरस्थाय-मर्थो बहव एव गुणा आरभन्ते, नैको न द्वावित्यवधारणस्याश्रवणात् । यत् पुनरत्र गुणाश्च गुणान्तरमारभन्त इति, कारणवृत्तीनां समानजात्यारम्भकारणा-नामयं नियमो न सर्वेषामिति समाधानम्, तदश्रुतव्याख्यातॄणां प्रकृष्टधियामेव निर्वहति नास्माकम् । द्वाभ्यां तन्त्वाकाशसंयोगाभ्यां द्वितन्तुकाकाशसंयोग इति । आकाशं तावदुत्पन्नमात्रेण द्वितन्तुकेन समं संयुज्यते, तत्कारणसंयोगित्वात् नुमान से सिद्ध है । यहाँ कारणता का सम्पादक ( अवच्छेदक ) सम्बन्ध कार्यकार्थसमवाय ' है, क्योंकि तन्तु और वीरण का संयोग रूप कारण, द्वितन्तुक पट और वीरण के संयोग रूप कार्य के साथ वीरण रूप एक वस्तु ( अर्थ ) में समवाय सम्बन्ध से है । ( प्र ० ) अगर एक भी संयोग दूसरे संयोग का कारण हो तो फिर ' गुणाश्च गुणान्तरम् ' सूत्रकार की यह उक्त विरुद्ध हो जाएगी? क्योंकि उन्होंने ( उक्त सूत्र के द्वारा ) कहा है कि बहुत से गुण ( मिलकर ) दूसरे गुण को उत्पन्न करते हैं । ( उ ० ) यहाँ उक्तिविरोध नहीं हैं, क्योंकि आपने उक्त सूत्र का अर्थ ही नहीं समझा है । इस सूत्र का इतना ही अर्थ है कि गुण दूसरे गुण के ( भी ) कारण हैं । इसका यह अर्थ नहीं है कि बहुत से गुण मिलकर ही किसी दूसरे गुण को उत्पन्न करते हैं, एक या दो गुण नहीं, क्योंकि इस प्रकार के ' अवधारण ' को समझाने के लिए सूत्र में कोई शब्द नहीं है । कुछ लोग उक्त सूत्र का यह अर्थ करते हैं कि कारणों में रहनेवाले गुण से जहाँ समानजातीय गुण की उत्पत्ति होती है वहीं के लिए यह नियम है कि बहुत से गुण मिलकर ही किसी दूसरे गुण को उत्पन्न करते हैं । किन्तु इस प्रकार की अश्रुतपूर्व व्याख्या से उनके जैसे उत्कृष्ट बुद्ध का ही निर्वाह हो सकता है, मुझ जैसे साधारण बुद्धिवालों का नहीं । ' द्वाभ्यां तन्त्वाकाशसंयोगाभ्यां द्वितन्तुकाकाशसंयोगः ' द्वितन्तुक पट के उत्पन्न होते ही उसके साथ आकाश संयुक्त हो जाता हैं, क्योंकि उस ( द्वितन्तुक ) पट के कारण के साथ ( आकाश ) संयुक्त है । जैसे कि तन्तु के साथ संयुक्त वीरण उस तन्तु के द्वारा पट क For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५३ प्रशस्तपादभाष्यम् तुरीसंयोगेभ्य एकः पटतुरीसंयोगः । एकस्माच्च द्वयोरुत्पत्तिः कथम्? हुए पट और आकाश के ( ( ३ ) ( बहुत से संयोगों से है कि ) तुरी और तन्तुओं के एक ही संयोगज ) संयोग की उत्पत्ति होती है । एक संयोगजसंयोग की उत्पत्ति इस प्रकार होती बहुत से संयोगों से तुरी और पट के एक ही ( संयोगज ) संयोग का उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) ( किन्तु ) एक ( संयोग ) न्यायकन्दली द्वितन्तुक कारणसंयुक्तवीरणवत् । न च तस्य संयोगस्य कारणान्तरमस्ति, अतो द्वितन्तुककारणयोस्तत्त्वोराकाशसंयोगाभ्यामेव तस्योत्पत्तिः । बहुभ्यश्च तन्तुतुरीसंयोगेभ्य एक: पटतुरीसंयोग:, पटकारणानां तन्तूनां प्रत्येकं तुर्या सह संयोगः, तेभ्यो बहुभ्य एकः पटतुर्योः संयोगो जायते । पटारम्भ-कत्वं तु तन्तूनां खण्डावयविद्रव्यारम्भपरम्परया । न च मूर्तानां समानदेशतादोषः, यावत्सु तन्तुष्वेकोऽवयवी वर्त्तते तावत्स्वेवान्यूनानतिरिक्तेषु परस्य समवाया-नभ्युपगमात् । द्वितन्तुकं द्वयोस्तन्त्वोः समवैति त्रितन्तुकं तु तयोस्तन्त्वन्तरे चेत्युत्तरोत्तरेषु कल्पनायां कुतः समानदेशत्वम्? अत एव च पटे पाटिते तिष्ठति चाल्पतरतमादिभावभेदेन खण्डावयविग्रहणम् । तेषु विनष्टेषु तु यद्यारभ्यते पटो दुर्घटमिदम् । उत्पन्न होते ही उस पट के साथ संयुक्त हो जाता है, क्योंकि आकाश और द्वितन्तुक पट के संयोग का कोई दूसरा कारण नहीं है । अतः द्वितन्तुक पट के कारणीभूत दोनों तन्तुओं के साथ आकाश के दोनों संयोगों से ही उसकी उत्पत्ति होती है । ' बहुभ्यश्च तन्तुतुरीसंयोगेभ्य एकः पटतुरीसंयोगः पट के कारणीभूत तन्तुओं में से प्रत्येक तन्तु के तुरी के साथ भिन्न भिन्न संयोग हैं । तुरी और तन्तु के उन बहुत से संयोगों से तुरी के साथ पट के एक संयोग की उत्पत्ति होती है । तन्तुओं से खण्डपटों की, और खण्डपटों से महापट की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार तन्तुओं में भी परम्परा से महापट की जनकता है । ( प्र ० ) इससे तो मूर्ती के समानदेशत्व की आपत्ति होगी? ( उ ० ) समानदेशत्व की आपत्ति नहीं है, क्योंकि जितने तन्तुओं में एक खण्डपट रूप अवयवी को वृत्तिता मानते हैं, ठीक उतने ही तन्तुओं में - न उनसे अधिक में न उनसे कम अवयवों में दूसरे खण्ड पटरूप अवयवी की वृत्तिता नहीं मानते । द्वितन्तुक पट दो ही तन्तुओं में समवाय सम्बन्ध से रहता है, और त्रितन्तुक पट उन दोनों तन्तुओं में और एक तीसरे तन्तु में भी समवाय सम्बन्ध से रहता है । इस प्रकार के उत्तरोत्तर खण्डपटों की कल्पना में उक्त समानदेशत्व की आपत्ति क्योंकर होगी १ इसलिए कपड़े के किसी बड़े थान को टुकड़े टुकड़े कर देने पर किन्तु बिलकुल नष्ट न कर देने पर छोटे बड़े ४५ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ३५४ रनुगन्तव्या । हो सकेगी । www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir [ गुणे संयोग-न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal नन्वेवं बालशरीरावयवा अविनष्टे एव तस्मिन्नाहारावयव सहिताः शरीरान्तरमारभेरन्? आरभन्ताम्? यदि पट इव खण्डावयविनां वृद्धशरीरे तिष्ठति विनाशिते वा पूर्वशरीराणामुपलम्भः सम्भवति? अथ नास्ति, न तत्रायं विधि:, यथादर्शनं व्यवस्थापनात् । एतेनारभ्यारम्भकवादपक्षे परमाण्ववस्थि-तस्य जगतो ग्रहणं न स्यादित्यपि प्रत्युक्तम्, परमाणूनां त्र्यणुकादिकारणत्वा-भावस्य पृथिव्यधिकारे दर्शितत्वात् । अथवा यदि परमाणवो द्वयणुकमारभ्य तत्सहितास्त्र्यणुकमारभन्ते, त्र्यणुकसहितास्तु द्रव्यान्तरम्, तथापि कुतो विश्वस्या-? महत्त्वानेकद्रव्यवत्त्वरूपविशेषाणामुपलब्धिकारणानां सम्भवात् । ग्रहणम् अथ सत्स्वपि तेष्वतीन्द्रियाश्रयत्वादतीन्द्रियत्वमेव, एवं द्वयणुकारब्धस्य त्र्यणुक-स्यातीन्द्रियत्वे तत्पूर्वकस्य विश्वस्यातीन्द्रियत्वं त्वत्पक्षेऽपि दुर्निवारम् । तस्मान्नेय-मत्रानुपपत्तिः । परमाणूनां त्र्यणुकानारम्भकत्वे पृथिव्यधिकारोक्तंव युक्ति-कपड़े के टुकड़ों की उपलब्धि होती है । अगर उस महापट के बिलकुल नष्ट होने पर ही उन उपलब्ध छोटे बड़े ) पटों को उत्पत्ति हो, तो फिर कथित उपलब्धि को उपपत्ति नहीं ( प्र ० ) तो फिर बालक के शरीर के अवयव भी उसी शरीर में बिना उसके विनष्ट हुए हा भोजन द्रव्यों के अवयवों की सहायता से दूसरे शरीर को उत्पन्न कर सकते हैं? ( उ ० ) कर ही सकते हैं, अगर वृद्ध शरीर के नष्ट होने पर या रहते हुए ही पट की तरह उसके खण्ड अवयवियों को भी उपलब्धि सम्भव हो । अगर यहाँ खण्ड अवयवियों की उपलब्धि नहीं होती है तो फिर दूसरे शरीर की उत्पत्ति का वह प्रकार भी यहीं नहीं है । जहाँ जैसी स्थिति रहती है वैसी व्यवस्था की जाती है । उक्त निरूपण से किसी सम्प्रदाय की यह आपत्ति भी मिट जाती है कि ' आरभ्य आरम्भकवाद ' पक्ष परमाणुओं में विद्यमान संसार की उपलब्धि नहीं होगी । क्योंकि परमाणुओं में कयणुकादि द्रव्यों की कारणता किस प्रकार से है? सो पृथिवी निरूपण में दिखला चुक हैं । अथवा यह मान भी लें कि यदि परमाणु ही द्वयणुकों को उत्पन्न कर उन्हीं द्वणुकों से मिलकर व्यसरेणु को भी उत्पन्न करते हैं, एवं यसरेणु से मिलकर और द्रव्यों को भी, तब भी विश्व का अप्रत्यक्ष क्यों होगा? चूँकि प्रत्यक्ष के जितने भी महत्त्व अनेकद्रव्य-अगर विशेष कारणों के रहते हुए भी केवल कारण ही द्वयणुक अतीन्द्रिय हो तो फिर अतीन्द्रिय होंगे, और व्यसरेणु के कारण अतीन्द्रियत्व को आपत्ति यहाँ नहीं है । परमाणु साक्षात् पृथिवी निरूपण में कही गयी वत्त्वादि विशेष कारण हैं, सभी विद्यमान हैं । अतीन्द्रियों ( परमाणुओं ) में आश्रित होने के द्रिय द्वणुकों से आरब्ध होने के कारण व्यसरेणु भी से आरब्ध सम्पूर्ण विश्व में ही अतीन्द्रिय में आश्रित होने तुम्हारे पक्ष में भी समानरूप से होगी । अतः यह दोष ही व्यसरेणुओं का उत्पादन नहीं करते ' इस प्रसङ्ग में युक्तियों का ही अनुसन्धान करना चाहिए । ( देखिये पृ ० ८० पं ० ३ )
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra भाषानुवादसहितम् प्रकरणम् ] प्रशस्तपादभाष्यम् For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३५५ उक्त जलीय परमाणु का उत्पत्ति होती है । वहाँ इन पार्थिव द्वयणुक की एवं दोनों यदा पार्थिवाप्ययोरवोः संयोगे सत्यन्येन पार्थिवेन पार्थिवस्य, अन्येन चाप्यस्य युगपत्संयोगौ भवतस्तदा ताभ्यां संयोगाभ्यां पार्थिवाप्ये द्वद्यणुके युगपदारभ्येते । ततो यस्मिन् काले द्वयणुकयोः कारणगुणपूर्वक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले इतरेतर कारणा-से दोनों संयोगों की उत्पत्ति कैसे होती है? ( उ ० ) जब पृथिवी का एक परमाणु जल के एक परमाणु के साथ संयुक्त होता है, फिर वही पार्थिव परमाणु दूसरे पार्थिव परमाणु के साथ एवं वही जलीय परमाणु दूसरे जलीय परमाणु के साथ एक ही समय संयुक्त होता है, ( इसके बाद दोनों पार्थिव परमाणुओं के एवं दोनों जलीय परमाणुओं के ) दोनों संयोगों से एक ही समय पार्थिव द्वयणुक और जलीय द्वयणुक दोनों की उत्पत्ति होती है । इसके बाद जिस समय कारणगुणक्रम से दोनों द्वयणुकों में न्यायकन्दली एकस्माच्च संयोगाद् द्वयोरुत्पत्तिः कथमित्यज्ञेन पृष्टः सन्नाह— यदेति । पार्थिवाप्ययोः परमाण्वोः संयोगे सत्यन्येन पार्थिवेन परमाणुना पार्थिवस्य परमाणोरन्येनाप्येन चाप्यस्य परमाणोर्युगपत्संयोगौ भवतस्तदा ताभ्यां संयोगाभ्यां पार्थिवाप्ये द्वयणुके युगपदारभ्येते । समानजातीयसंयोगस्य द्रव्यान्तरोत्पत्तिहेतुत्वात् । ततो यस्मिन्नेव काले पार्थिवाप्यद्वयणुकयोः कारण-गुणपूर्वक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः तस्मिन्नेव काले इतरेतरकारणाकारणगतात् संयोगा-किसी अज्ञपुरुष के द्वारा ' एक ही संयोग से दो संयोगों की उत्पत्ति कैसे होती है? ' यह पूछे जाने पर ' यदा ' इत्यादि से इसका उत्तर कहते है । ( जहाँ ) एक पार्थिव परमाणु और एक जलीय परमाणु दोनों परस्पर संयुक्त रहते हैं ( वहाँ ) उक्त पार्थिव परमाणु का दूसरे पार्थिव परमाणु के साथ, एवं दूसरे जलीय परमाणु के साथ, एक ही समय दो संयोगों की दोनों संयोगों में से दोनों पार्थिव परमाणुओं के संयोग से जलीय परमाणुओं के संयोग से जलीय द्वयणुक की उत्पत्ति अवश्य ही होगी, क्योंकि एक जाति के दो द्रव्यों का संयोग ( उसी जाति के ) दूसरे द्रव्य की उत्पत्ति का कारण है | इसके बाद जिस समय कथित पार्थिव और जलीय दोनों घणुकों में ' कारणगुणपूर्वक्रम ' से रूपादि ( गुणों ) की उत्पत्ति होती है, उसी समय दोनों द्वथणुर्कों के समवायिकारण पार्थिव और जलीय परमाणु और ( पार्थिव द्वथणुक के ) अकारण जलीय परमाणु और ( जलीय द्वणुक के अकारण ) पार्थिव परमाणु इन दोनों ( कारणाकारण ) के एक ही संयोग